Shatpath Brahman 1 2 — पृष्ठ 1–10
शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - १-२ - मोतीलाल शास्त्री · पृष्ठ 1–10
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शतपथब्राह्मण - हिन्दी - विज्ञानभाष्य - प्रथमकाण्डान्तर्गत द्वितीय - चतुर्थ - पञ्चम- षष्ठ - ( प्रक्रान्त ) - अध्यायात्मक द्वितीयखण्ड २ निबन्धा - मोतीलाल शम्मपाहो यः कश्चिदपि मुक्तरक्तशर्मा, आङ्गिरसो भारद्वाज: वेदवी - पथिकः, जयपत्तनाभिजनः " ( पुनः प्रकाशनाधिकार एकमात्र निबन्धा से ही अनुप्राणित ) ‘ राजस्थानवैदिकतच्चशोधसंस्थानजयपुर के द्वारा प्रकाशित एवं श्रीबालचन्द्रयन्त्रालय, मानवाश्रम - दुर्गापुरा - ( जयपुर ) के द्वारा मुद्रित प्रथमबार ५०० प्रति
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श्राः प्रकाशितग्रन्थसूची-१ - गीताविज्ञान भाग्य भूमिकान्तर्गता- ' बहिरङ्गपरीक्षा ' नामक प्रथमखण्ड २-99 " ३-४-५-" ६-" " = ७-" - ' आत्मपरीक्षा ' नामक द्वितीयखण्ड * - ' ब्रह्मकर्म्मपरीक्षा ' नामक तृतीय खण्ड * - ' कर्मयोगपरीक्षा ' नामक चतुर्थखण्ड * - ' ज्ञानयाग ' - तथा भक्तियोगपरीक्षा-नामक ( पूर्वखण्ड १ ) ) पञ्चम, तथा षष्ठखण्ड - ' भक्तियोगपरीक्षा ' ( उतरखण्ड ) नामक - ' बुद्धियोगपरीक्षा ' नामक अष्टमखण्ड ८ - ईशोपनिषत् - हिन्दी - विज्ञानभाष्य- प्रथमखण्ड ६ ईशोपनिषत् - हिन्दी- त्रिज्ञानभाष्य-१५ ) २० ) २० ) २० ) २० ) सप्तम खण्ड २० ) २० ) १५ ) १५ ) २० ) १५ ) १५ ) १० - उपनिषद्विज्ञान भाष्यभूमिका-प्रथमखण्ड ११ - उपनिषद्विज्ञान भाष्यभूमिका-द्वितीयखण्ड १२ - उपनिषद्विज्ञानमाष्यभूमिका-तृतीयखण्ड १३- श्राद्धविज्ञानग्रन्थानुगत- ' श्रात्म विज्ञानोपनिषत् ' नामक प्रथमखण्ड २० ) १४- श्राद्धविज्ञानग्रन्थानुगत - ' सापिण्ड्य विज्ञानोपनिषत् ' नामक तृतीयखण्ड १५ ) १५ – संस्कृति, और सभ्यता - शब्दों का चिरन्तर इतिवृत्त, एवं भारतीय सांस्कृतिक-आयोजनों की रूपरेखा २५ ) का- ' विश्वस्वरूपमीमांसा ' नामक प्रथमखण्ड १६ - ' भारतीय- हिन्दू - मानव, और उस की भावुकता ' नामक खण्डचतुष्टयात्मक ग्रन्थ १७- ' वेदस्य सर्वविद्या निधानचम् ' ( संस्कृत निबन्ध ) * · * चिह्नाङ्कित प्रन्थ प्रेस में हैं, जो अग्रिम वर्ष में प्रकाशित होजायँगे । १५ ) १ ॥ )
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श्रीः महामहिम राष्ट्रपति श्री डॉ ० राजेन्द्रप्रसादनी महाभाग के मान्य सचिव द्वारा प्राप्त ' राजस्थानवैदिक नवशोधसंस्थान ' मानवाश्रम दुर्गापुरा ( जयपुर ) का ' प्रधानसंरक्षतानुगत - प्रमाणपत्र ' अत्यन्त सम्मान से यहाँ उद्धृत होरहा है - MMMMXMCOMMMMMMMA .. Z Z. .* • Z. X* X * X भारत के राष्ट्रपति डा. राजेन्द्र प्रसाद राजस्थान - वैदिक तत्त्वशोध संस्थान - जयपुर का प्रधान संरक्षक बनने की स्वीकृति प्रदान करते हैं मिलिटी सेक्रेट्री ऑफिस राष्ट्रपति भवन नई दिल्ली दिनांक 30 अग II १ ९ ५६ । भारत के राष्ट्रपति के आदेशानुसार यदुनाथ सिंह ( यदुनाथ सिंह ) मेजर जनरल मिलिट्री सेक्रेट्री टू दि प्रेसिडेन्ट " Z44 X
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१८- भारतीय दृष्टिकोण से ' विज्ञान ' शब्द का समन्वय स्वरूप विचार -१६ - वेद का २०- क्या हम मानव हैं? ( सांस्कृतिक - आमन्त्रण ) २१- दिग्देशकालस्वरूपमीमांसा २२- शतपथब्राह्मण हिन्दी विज्ञान भाष्य- प्रथमकाण्डानुगत - प्रथ नखण्ड १॥ ) २ ) २ || ) २५ ) २५ ) २३-द्वितीयखण्ड " " ३० ) २४ - राष्ट्रपतिभवनानुगत व्याख्यानपञ्चक ६ ) ( १ ) - सम्वत्सरमूला अग्नीषोमविद्या ( प्रथम व्याख्यान ) ( २ ) - पञ्चपर्वात्मिका विश्वविद्या ( द्वितीय- " ) ( ३ ) मानव का स्वरूप परिचय ( तृतीय- " ) ४ ) - ' अश्वत्थविद्या ' का स्वरूप- परिचय ( चतुर्थ- " > ( ५ ) -वेदशास्त्र के साथ पुराणशास्त्र का समन्वय ( पचम- " प्राप्तिस्थान— व्यवस्थापक - ‘ राजस्थानवैदिकतच्च शोधसंस्थान जयपुर ' दुर्गापुरा ( जयपुर - राजस्थान ) * - राष्ट्रपतिभवन के टेपरेकार्डों के आधार पर प्रकाशित, एवं महामहिम श्रीराष्ट्रपति महाभाग के प्रास्ताविक से समन्वित ।
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श्रीः शतपथब्राह्मण - हिन्दी - विज्ञानभाष्य- प्रथमकाण्डानुगत-द्वितीयखण्ड के सम्बन्ध में युगधर्म्मनिबन्धन - किञ्चिदिव - आवेदन ( शतपथभाष्य - द्वितीयखण्ड की प्रस्तावना ) मोतीलाल शर्मोपाह्वोः - य: कश्चिदपि मुक्तरक्तशर्मा आङ्गिरसो भारद्वान:, वेदवीथी - पथिकः मानवोक्थवैराजिकब्रह्मौदन - भोक्ता
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श्रीः शतपथब्राह्मण - हिन्दी - विज्ञानभाष्य- प्रथम काण्डानुगत द्वितीयखण्ड के सम्बन्ध में किं fairs - ावेदन विक्रम सं ० २०१५ की आश्विन शुक्ल दशमी ( विजयदशमी ) बुधवासर ( तदनुसार ता ० अगस्त ) की पावनतिथि में “ शतपथब्राह्मण - हिन्दी - विज्ञानभाष्यान्तर्गत- प्रथम काण्डानुगत प्रथमखण्ड ” संस्थान की ओर से प्रकाशित हुआ था, जिसमें ' प्रथम काण्ड ' के आरम्भ के केवल एक ही ( प्रथम १ ) अध्याय का ' विज्ञानभाष्य ' समाविष्ट था । प्रथम काण्डानुगत - प्रथम अध्यायात्मक तत् प्रथमखण्ड में बिन प्रमुख-याज्ञिक कम्र्मों का पद्धति - पुरस्सर - सोपपत्तिक- समावेश हुआ है, सन्दर्भसङ्गति की दृष्टि से सिंहावलोकन न्यायेन ' द्वितीय खण्ड ' की प्रस्तुत - प्रस्तावना में भी उनका संस्मरण कर लेना अप्रासङ्गिक न माना जायगा । प्रथमकाण्डानुगत - प्रथमाध्यायात्मक - प्रथमखण्ड में प्रतिपादित प्रमुख - कम्मों की, तथा स्मारक - विषयों की " सिंहावलाकनन्यायानुगता स्मृति * क्रमानुगता | स्मारक विषय संख्या पृष्ठसंख्या प्रधान कर्माणि १ व्रतोपायन क ११७ २१३ २ ब्रह्मवरणकर्म्म १५५ १३७ अपांप्रणयनकर्म्म १७० २८५ ४ परिस्तरण, तथा पात्रासादनकर्म्म २०१ ३६३ वाक्संयमनकर्म्म २४३ ४० E पात्रप्रतपनक २४६ ११२३ शकट से हविण, एवं तत्सादनकर्म्म ३५४ ८६३ प्रोक्षणक ४२२ ३१८ रोडाशसम्पादनाङ्गकर्म्म ४५२ १४१६ प्रधानकर्म्मसंख्या - १ - ( नव ) भाष्य पृष्ठसंख्या -स्मारकविषयसंख्या --संकलन ६१० संकलन ४५६१ ' '
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किञ्चिदिव श्रावेदन निर्दिष्ट सालिका के अनुपात से ' प्रथमकाण्डीय - प्रथमखण्ड ' में नव ( ६ ) प्रमुख कम्मों की इति-कर्तव्यता के साथ साथ पारिभाषिक दृष्टिकोण से अनुमानतः पाँचसहस्र पारिभाषिक तथ्यों का स्पष्टीकरण प्रयास हुआ है । ' विज्ञानभाष्य ' से पूर्व उसी प्रथमखण्ड में - ' पारिभाषिक सूचनाएँ ' नाम का एक स्वतन्त्र पारिमात्रिक प्रकरण भी ममाविष्ट हुआ है, जिसमें ' शतपथब्राह्मण ' से सम्बन्ध रखने वाली सभी ज्ञाह्य - दृष्टियों, तथा अन्तरङ्गदृष्ठियों का यथासम्भव सन्निवेश कर देने का प्रयास हुआ है । ११६ ( एकसौ सोलह ) पृष्ठात्मक उस ' पारिभाषिकसूचनाप्रकरण ' में १२३ ( एक्सौ तेइस ) तथ्यों की ओर ही वेदप्रेमियों का ध्यान आकर्षित कराया गया है । उक्त ' पारिभाषिक - सूचना - प्रकरण ' के अतिरिक्त १६४ ( एकसौ चौसठ ) पृष्ठात्मक - दिग्देश-कालानुबन्धी - किञ्चिदेिव - आत्मनिवेदन - ( प्रस्तावना ) भी प्रथमखण्ड का एक महत्त्वपूर्ण ही अङ्ग प्रमाणित होरहा है । वर्त्तमानयुग का प्रमुख उद्घोष है - ' समय के अनुसार काम करो, समय के अनु-सार चलो ', जिस इस सामयिक उद्घोष का फलितार्थ निकलता है- " दिग्देशकालानुबन्धिनी- तात्कालिकी-उपयोगिता ' । इत्थंभूत - सामयिक उद्घोष से एकहेलया प्रभाविता भारतीया - श्रास्तिक- प्रजा भी युगधम्मक्रमण -ननिता निरतिशया भावुकता से मावितान्तःकरणा प्रमाणित होती हुई अपनी प्राच्य - वैदिक - मूल - निधि की र से सर्वात्मना तटस्थप्राया ही बनी हुई है । सामयिक उपयोगितावाद के इत्थंभूत महान् अभ्व, भयावह यक्ष के वास्तविक - स्वरूप के स्पष्टीकरण के लिए ही प्रथमखण्डानुगता - प्रस्तावना में ' ब्राह्मणेन निष्कारणं षडङ्गो वेदो s ध्येयो ज्ञेयश्च ' रूप प्रसिद्ध - देशनावाक्य को आधार बना कर ही प्राच्य वैदिक साहित्य की ' उपयोगिता ' के सम्बन्ध में किञ्चिदिव निवेदन करने की घृष्टता होपड़ी है, जिसे दृष्टिपथानुगामी बनाने के श्रनन्तर हमारे उन भावुक बन्धुत्रों की उपयोगितावाद - व्यामोहनात्मिका युगधर्म्म- निबन्धना उस भयावहा-सर्वनाश कारिणी -कलिवात्या हिता- काल्वालीकृता भावुकता का सर्वथैव निराकरण होजाता है, जिस मलीमसा भाबुकता के वारुणात्मक पाशबन्धन से श्राद्ध भारतीय बन्धु अपने सर्वस्वभूत, ज्ञानविज्ञान परिभाषाओं के महान् कोश - प्राच्य - वैदिक - साहित्य से आज सर्वात्मना ही तटस्थ बने हुए हैं । हम साञ्जलिबन्ध उन आत्मबन्धुओं से श्रावेदन करेंगे कि, अपनी उपयोगितावादात्मिका भ्रान्ति के समन्वय के लिए एकबार अवश्यमेव वे ' तत्प्रास्ताविक ' पर दृक्पात का अनुग्रह करलें । हमारी ऐसी आत्मनिष्ठा है कि - दोषदृष्टि से भी अवलोकिता, तत् - प्रस्तावना आरमचन्धुयों की कारणतामूला जिज्ञासा का यथावत् समाधान कर देगी । ' मन्त्रब्राह्मणोर्वेदनामधेयम् ' इत्यादि सनातन - श्रार्ष - सिद्धान्तानुसार वेदशास्त्र ज्ञातव्यवेद, कर्त्तव्यवंद, मेद से दो प्रमुख भागों में विभक्त होरहा है । ज्ञातव्यवेदभाग ही ' मन्त्रवेद ' कहलाया है, एवं कर्त्तव्यवेदभाग ही ' ब्राह्मण वेद ' कहलाया है । ' विज्ञान - स्तुति - इतिहास, ये तीन प्रमुख ' ज्ञातव्य - विषय ' हैं, जिनका मानव की आचारपद्धति से सम्बन्ध न होकर तत्त्वरूपा अनुशीलनात्मिका- विचारपद्धति से ही प्रधान सम्बन्ध माना गया है । श्रतएव इस ' ज्ञातव्या त्रयी ' को हम ' तत्त्वमीमांसा ' से ही समन्वित मान रहे हैं । ' ज्ञान - कर्म - उपास्ति ', ये तीन प्रमुख ' कर्त्तव्य - विषय ' हैं, जिनका तत्त्वानुशीलन से विशेष सम्बन्ध न होकर आचरणात्मिका कम्र्म्मनिष्ठा से ही प्रधान सम्बन्ध माना गया है । अतएव इस ' कर्त्तव्या त्रयी ' को हम ' आचार मीमांसा ' से ही अनुगत मान रहे हैं । तत्त्वमीमांसा की पूरिका जहाँ श्राचारमीमांसा है, वहाँ आचारमीमांसा की मूलप्रतिष्ठा तत्त्वमीमांसा बनी हुई है । वह ' अनुशीलन ' व्यथ है, जितका तदुत्तररूपात्मक ८
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शतपथब्राह्मण २ खण्ड आचरण से सम्पर्क न हो । एवमेव वह ' आचरण ' भी कालान्तर में सर्वथा यातयाम ही प्रमाणित होजाता है, जिसकी आधारभूमि अनुशीलनात्मक नैष्ठिक विचार नहीं होता । निष्कर्षतः ज्ञातव्यवेद, और कर्त्तव्यवेद, दोनों की परिपूर्णता, सार्थकता उभय- समन्वय पर ही निर्भर है, जैसाकि - ' ज्ञात्वा कम्र्माणि कुर्वीत ' * इत्यादि सुप्रसिद्धा सूक्ति से प्रसिद्ध है लोकप्रसिद्ध - ' जानना ' ही ' ज्ञातव्य भाव ' है, एवं ' करना ' ही ' कर्त्त'भाव ' है । ' जानना ' ' ज्ञान ' शब्द से अनुप्राणित है, तो ' करना ' ' कर्म्म ' शब्द से समन्वित है । ' ज्ञात्त्वा रूप ' जानने से अनुप्राणित ' ज्ञान ' निरपेक्षज्ञान, सापेक्षज्ञान, भेद से दो महिमा - विवर्ती में विभक्त माना गया है । आचारात्मक भूत - भौतिक-विश्वानुचन्धी - कर्म्मविजम्भृणों से यत्किञ्चित् भी सम्पर्क न रखने वाला, विशुद्ध - अनुशीलनात्मक, समान-प्रत्ययप्रवाह- निबन्धन, सर्वनिरपेक्ष, श्रतएव प्रत्यस्ता शेषभेदात्मक - सत्तामात्र - अगोचर, अतएव च वाङ्मनस-पथातीत, श्रात्मसंवेद्य, संविद्भावापन्न लोकातीत - ज्ञान ही ' निरपेक्षज्ञान ' X है, जिसे ' निरपेक्षब्रह्म ' की उपाधि से समलङ ्मकृत किया है तज्ज्ञानानुशीलन - पथानुवर्त्मा लोकातीत श्राप्तपुरुषोंनें । श्रद्वयभावापन्न - निर-पेक्ष, श्रतएव निरपेक्ष - एकत्त्व से समन्वित इत्थंभूत लोकातीत ज्ञान से अनुप्राणिता निरपेक्षज्ञानात्मिका सुसूक्ष्मा विद्या ही उपनिषदों में- ' पराविद्या ' नाम से प्रसिद्ध हुई है, जिस का प्रचारात्मक - कर्त्तव्यरूप-भूतानुबन्धी- अनुष्ठानों से क्योंकि कोई सम्बन्ध नहीं है । अतएव तथाविध लोकातीत ' निरपेक्षज्ञान ' के परा-विद्यानिबन्धन इतिवृत्त के सम्बन्ध में - ' नेति नेतीत्युपनिषत् ' सिद्धान्त ही एकमात्र शरणीकरणीयता के क्षेत्र में शेष रह जाता है ÷ । शेषभूत ' सापेक्षज्ञान ' नामक द्वितीय- महिमा - विवर्त्त ' ही शब्दशास्त्र का प्रतिपाद्यविवर्त्तमाना गया है, जिस शब्द - प्रतिपाद्य - सापेक्ष ज्ञान को ही उपनिषदोंने ' ' अपराविद्या ' कहा है, जिस के कर्म्मसापेक्ष अनेक - विवर्त्त ' शास्त्रों में श्रुतोपश्रुत हैं । अमृत - भावनिबन्धन -- रस तत्त्व ' अपने सहजसिद्ध दिक्कालाद्यन-वच्छिन्न - द्वय भाव से जहाँ तथाविध अद्वयभावापन निरपेक्षज्ञान का स्वरूप प्रमाणित होरहा है, वहाँ
* ज्ञात्वा कर्माणि कुर्वीत नाज्ञाच्या कर्म्म आचरेत् ।
अज्ञानेन प्रवृचस्य स्खलनं स्यात् पदे पदे ॥
X - प्रत्यस्ताशेषभेदं यत्, सत्तामात्रमगोचरम् ।
वचसामात्मसंवेद्य ' तत्ज्ञानं ' ब्रह्म ' संज्ञितम् ॥
- पञ्चदशी
: - संविदन्ति न यं वेदाः, विष्णुर्वेद न वा विधिः ।
यतो वाचो निवर्त्तन्ते अप्राप्य मनसा सह ॥
यश्यामतं -- तस्य मतं, यस्य न वेद सः ।
अविज्ञातं विजानता, विज्ञातमविजानताम् ॥
— उपनिषदि Ε
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किञ्चिदिव- श्राबेदन मृत्यु भावनिबन्धन-- ' बलतत्त्व ' अपने सहजसिद्ध दिक्कालाद्यवच्छिन्न- नानाभाव से तथाविध- नानाभावापन्न सापेक्ष - ज्ञान का स्वरूप संग्राहक बन रहा है । रस - बल- निबन्धना इस सहज - स्वरूप स्थिति के आधार पर यह कह दिया जासकता, एवं मान लिया जासकता है निर्भ्रान्तरूपेणैव किं श्रद्वयभावापन्न - एकत्त्वानुगत निर-पेक्षज्ञान अपने - ' एकं ज्ञानम् - निरपेक्ष ज्ञानम् ' - निर्वचन से जहाँ निष्कैवल्य एकत्त्वनिबन्धन ' ज्ञान ' शब्द से समन्वित है, वहाँ नानाभाव पन्न - अनेकत्वानुगत - सापेक्षज्ञान- ' विविधं ज्ञानं - सापेक्षं-- ज्ञानम् ' निर्वचन से-' विज्ञान ' अभिधा का अधिकारी चना हुआ है और यों एक ही जानतन्त्र मूल भूत रस, तथा बल नामक ' श्रभू ' और ' अस्त्र ' नामक विभिन्न दो अनुबन्धों से कमशः अमृत- मार्य भावों में विभक्त होता हुआ ' ज्ञान ', और ' विज्ञान ' इन दो महिमामय स्वरूपों में परिणत होरहा है, जिन इन दोनों विभिन्न वित्त के आधार पर ही उपनिषदुपवर्णिता सुप्रसिद्धा- ' परा अपरा ' नाम की अक्षर -क्षर - निबन्धना रस--विद्या- बलविद्या -द्वयी समन्वित हुई है । यही निरपेक्षज्ञानात्मक ज्ञान, एवं सापेक्षज्ञानात्मक - विज्ञान, इन दो पारिभाषिक शब्दों का मौलिक, एवं संक्षिप्ततम चिरन्तन- इतिवृत्त है, जिस का विशद यशोवर्णन पूर्वप्रकाशित -शतपथभाष्य- प्रथमखण्ड के ' पारिभाषिक - प्रकरण ' में किया जाचुका है । ' विज्ञान ' शब्द के प्रति विशेषरूप से आकर्षित - मना बने रहने वाले वर्त्तमानयुग के भूतविज्ञानवादी भारतीय बन्धुओं को " भार-तीय - पारिभाषिक - विज्ञान " के तात्त्विक - यशोवर्णनात्मक समन्वय के लिए प्रथम स्त्रण्डानुगत तत्पारिभाषिक प्रकरण पर ही दृकपात का अनुग्रह करना चाहिए । प्रकृत में इस प्रासङ्गिकी चर्चा से केवल यही निवेदनीय है कि, निरपेक्ष - ज्ञानात्मक एकत्त्व धर्मावच्छि - ज्ञान से अपना सर्वथा विभिन्न स्वरूप रखने वाली लोकात्मिका विश्व विद्या ही नानाभावापन्ना-' विज्ञान विद्या ' है, और इसी का नाम है- उपनिषत् के शब्दों में- ' अपरात्रिद्या ', एवं यही लोक में प्रसिद्ध हे - ' वेदविद्या ' नाम से, जिस की मूलप्रतिष्ठा मानी गई है - ज्ञानात्मिका - पराविद्या । निरपेक्षज्ञानानुबन्धिनी-एकत्त्वानुयोगिनी अनेकस्वप्रतियोगिनी - विश्वातीत-- ब्रह्म विद्यात्मिका- ' पराविद्या ' ही ' अक्षरविद्या ' है । एवं सापेक्षज्ञानानुबन्धिनी- अनेकत्वानुयोगिनी एकत्त्वप्रतियोगिनी - विश्वात्मक - लोक -- विद्यात्मिका -- ' अपराविद्या ' ही ' क्षरविद्या ' है । उभयविद्या के परिज्ञान के अनन्तर मानव के बुद्धयनुगत प्रज्ञा कोरा के लिए अन्य कुछ भी तो ‘ ज्ञातव्य ' रूपेण शेष नहीं रह जाता । निम्नलिखिता उपनिषच्छ्र ुति निरपेक्ष - सापेक्ष ज्ञान - विज्ञान- निबन्धना इह्रीं दोनों विद्याओं का संक्षेप से नामस्मरण करा रही है -शौनको ह नै महाशालोऽङ्गिरसं विधिवदुपसन्नः पप्रच्छ - ' कस्मिन्नु भगवो विज्ञाते सर्वमिदं विज्ञातं भवति ' १ इति । तस्मै स होवाच - " द्व े विद्ये वेदितव्ये " - इति हम यह्मविदो वदन्ति- ' परा ' चैत्र - ' अपरा च ' । तत्र - अपरा - ऋग्वेद, यजुर्वेदः, सामवेदः, अथर्ववेदः, शिक्षा - कल्पो - व्याकरणं निरुक्त छन्दो - ज्योतिषम् " इति ।
* ज्ञानं तेऽहं सविज्ञानमिदं वक्ष्याम्यशेषतः ।
यज्ज्ञाच्या नेह भूयोऽन्यज् ज्ञातव्यमवशिष्यते ॥
-गीतायाम् १०