Shatpath Brahman 1 2 — पृष्ठ 11–20
शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - १-२ - मोतीलाल शास्त्री · पृष्ठ 11–20
पृष्ठ 11
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
शपथब्राह्मण २ खण्ड अथापरा -- यथा तदक्षरमधिगम्यते, यत् - यत्-- श्रद्रश्यम् - अग्राह्यम् - श्रगोत्रम् श्रवर्णम्-अचक्षुःश्रोत्रम् -तत् - ग्र गणिपादम् नित्यम् -- विभुम् सर्व्वगतम् सुसूक्ष्मम् तदव्ययम् - तद्भूत-योनिम् - परिपश्यन्ति - धीराः ' । - मुण्डकोपनिषत् १।१।३-४-५-६ कं ० । एक प्रासङ्गिक विशेष - तथ्य की ओर प्रज्ञाशील पाठकों का ध्यान श्राकर्षित करने के लिए ही हमने उक्त मुण्डक - वचन - अत्र उद्धृत करना आवश्यक माना है । विदितवेदितव्य - काम- तपः - श्रम - मूर्ति श्राप्त-महर्षियोंने ' मानव ' के अभ्युदय, तथा निःश्रेयस् संसाधन के लिए ही पराविद्या, अपराविद्या नाम की उन दो महत्त्वपूर्णा- विद्याओं का अन्वेषण किया है, जिन के द्वारा ' मानव ' अपने चतुषपर्वा ‘ मानवस्वरूप ’ को अभ्युदय, तथा निःश्रेयस् - रूपा सिद्धि, और संसिद्धि, से सर्वात्मना समन्वित कर लेने में समर्थ - सफल -प्रमाणित होता आरहा था सुख, एवं शान्ति पूर्वक, आज से तीन सहस्र - - वर्ष पूर्ण की आर्धनिष्टानुगता कालसीमा के पावन - प्राङ्गण में । ' ' मानव सुखी रहे ', और ' मानव शान्त रहे ' इन दो विभिन्नार्थक वाक्यों के गर्भ में हीं मानव के सुख, तथा शान्ति का सम्पूर्ण चिरन्तर इतिवृत्त सुगुप्त - रूपेण सच्छन्दस्क प्रमाणित होरहा है । मानव का श्रद्ध ' - केवल सुख की ही ' इच्छा ' करता रहता है प्रतिक्षण, तो मानव का श्रद्धङ्ग केवल शान्ति की ही ' कामना ' किया करता है अजस्ररूपेण । यद्यपि इन श्रद्ध - श्रद्ध - अङ्ग - भावों से सहसा दाम्पत्यमूला स्त्री- पुम्भावना की ओर ही हमारा ध्यान आकर्षित होजाता है, जो कि आकर्षण प्रकृतिसिद्ध ही माना जायगा । तथापि वस्तुतत्त्व के स्वरूप - समन्वय के लिए हमें यहाँ दाम्पत्यपथानुबन्धी - विभिन्न दो श्रद्ध - श्रद्ध - अङ्गों को यत् किञ्चित् - समय के लिए निरपेक्ष मानकर केवल एक ही मानव, और ही मानवी के अनुबन्ध से अर्द्धा-ङ्गद्वयी की मीमांसा में प्रवृत्त होना पड़ेगा । मानव हो, अथवा मानवी, अर्थात् पुरुष हो, अथवा स्त्री, दोनों के प्रकृतिसिद्ध स्वरूप में ( प्रत्येक में ) दो दो विभिन्न ग्रद्ध ' - श्रद्ध ' अङ्ग - भाव- समन्वित हैं । अर्थात् दो विभिन्न श्रद्ध - श्रद्ध - श्रङ्गों के सम— न्वितरूप का ही नाम तो ' मानव ' है, एवं तथाविध उभयात्मकरूप का ही नाम ' मानवी ' है । प्रथम - श्रद्ध-अङ्ग का पारिभाषिक - साङ्केतिक - नाम है - ' पुरुष ', एवं द्वितीय - अद्ध - अङ्ग का साङ्केतिक नाम है ' प्रकृति ' | पुरुष, और प्रकृति के द्वन्द्वात्मक भौतिकरूप का ही नाम है ' पुरुष ', अर्थात् ' मानव ' । एवं प्रकृति, तथा पुरुषात्मक- द्वन्द्वभाव का ही का ही नाम है - ' स्त्री ', अर्थात् - ' मानवी ' । और इस समानधर्मानुबन्धी समतुलित-साम्य के आधार पर ही मानव, तथा मानवी के सम्बन्ध में - ' सह धर्मं चरताम् ' लक्षण सुप्रसिद्ध साप्त-पदीन - सख्यभाव ( मैत्री- भात्र ) का समन्वय हुआ है, जिस - मैत्री - धर्म का स्वरूप समानशीलव्यसन निबन्ध ही माना गया है । इस समतुलित साम्य के आधार पर ही हमें यह भी स्वीकार कर लेना पड़ेगा कि, * - समानशीलव्यसनेषु मैत्री - सुप्रसिद्धा - सूक्तिः ११
पृष्ठ 12
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
किञ्चिदिव - श्रावेदन प्राजापत्य सर्ग की मानव, तथा मानव - रूपा दोनों विभूतियों का स्थान सर्वात्मना समधरातल पर ही व्यवस्थित है और इसी साम्य के आधार पर यदि यह भी कह दिया जाय, तो अत्युक्ति न होगी कि प्रकृति - पुरुष-समन्वयात्मक साम्य की दृष्टि से सर्ग की ये दोनों ही विभूतियां ' समानाधिकार ' उदाधि से समन्वित भी मानी बासकती है, किंवा मानी जानी चाहिएँ । समानाधिकार के तथाभूत व्यामोहन से व्या मुग्ध भावुक मानव इस दिशा में आज कुछ ऐसी ही कल्पनाओं में मनोविभोर बनते हुए ' स्त्रीसमानाधिकार ' के उद्घोष से पार्थिव श्राकाश को विकम्पित करने लग पड़े हैं, और व्यक्त होने लगी है उन की भावुक भाषा के द्वारा इत्थंभूता वैखरीवाक कि, “ यदि मानबी को भी शिक्षा - बातावरण - आदि के सम्बन्ध में मानव के अनुरूप ही सुविधाएँ दीं जासकेंगी, तो निश्चयेन मानवी किसी भी क्षेत्र के उत्तरदायित्व में मानव से पराठ मुख, किंवा ही पराभूत प्रमाणित नही होगी । अपितु उभय - प में मानवी ही मानव की योग्यता के क्षेत्र का प्रतिक्रमण कर लेगी, अतएव..... इत्यादि इत्यादि । अतएव...... बलप्रयोग - पूर्वक नारी सुलभ सौम्य मायों का श्रभिभव कर मानवी के शरीर और बुद्धि क्षेत्रों को भी कर्कश बनाया जासकता है, जैसे कि अमुक प्रयोगों के कारण मानवसुलभ आग्नेय भाव भी मानव के अभिभूत हो जाते हैं, उस का सुहद - पौरुप धम्र्म भी कोमलता में परिणत होजाया करता है और य प्रकृतिसिद्ध - चिरन्तन - अभ्यास से मानव को मानवी कोटि पर, एवं मानवी को मानव - कोटि पर ला खड़ा किया जासकता है । किन्तु इत्थंभूत बलप्रयोग मानव, और मानवी, दोनों के ही प्रकृतिसिद्ध स्वरूपों के विपरीत जाता हुआ अन्ततोगत्वा उस भावी ' प्रजननधर्म्म ' को ही दोवाकान्त प्रमाणित कर देता है, जिस प्रकृति-सिद्ध- अग्नि - सोम - निबन्धन - यज्ञात्मक - वैज्ञानिक प्रजनन के आधार पर राष्ट्रीय ही मानव, और मानवी वर्ग प्रकृत्या पुष्पित - पावित होते रहते हैं । अतएव श्रावश्यक है कि, बलपूर्विका दुराग्रहात्मिका समानाधिकार-व्यामोहनमूला- युगधर्मानुगता - भावुकता से आत्मपरित्राण करते हुए ही, भारतीय श्रादृष्टि के माध्यम से ही ' सह धर्म्म चरताम् ' मूला समानाधिकार - व्यवस्था का अनुगमन करें, और इसी दृष्टि के माध्यम से आज के काल्पनिक समाधिकाररूप उस विघातक व्यामोहन के प्रति राष्ट्रीय प्रजा को जागरूक करें, जिस व्यामोहन के कारण हमारा राष्ट्रीय प्रजजन विगत तीन सहल - क से उत्तरोत्तर पतनोन्मुख ही प्रमाणित होता आरहा है । अवश्य ही: - श्रद्धात्मक पुरुष पुरुष - भाव माव,, और ई- श्रङ्गात्मक ही प्रकृति - भाव के सहसमन्वय से कृतरूप मानव, और मानवी के स्वरूप में सर्वथैव साम्य है । जो पर्नचतुष्टयीरूपा श्रङ्गद्वयी मानव में है, वही पर्णचतुष्टयी रूपा अङ्गद्वयी मानवी में भी है 1 और इसी साम्य के आधार पर दोनों की अधिकारिकी समता-भ्रान्ति भी सम्भावित है । किन्तु जब सूक्ष्मदृष्टि से वस्तुतत्त्व का अन्वेषण किया जाता है, तो इस साम्य की ' सीमा में ही हमें उस ' वैपम्य ' का भी साक्षात्कार होजाता है, जिसने इन दोनों समभावों को भी विभा में परिणत कर रक्खा है । एवं निश्चयेन समवानुगत, किवा साम्य के आधार पर प्रतिष्ठित यह वैषम्य ही उस ' प्रजातन्तुवितान ' की मूल - प्रतिष्ठा बना हुआ है, जिस तन्तुवितान - परम्परा के द्वारा ही ( मानव-मानवी के दाम्पत्य से ) सम्पूर्ण द्वन्द्वात्मक भौतिक विश्व का स्वरूप ' धाता यथापूर्वमकल्पयत् का स्वरूप-रक्षक बना हुआ है । '
पृष्ठ 13
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
शतपथब्राह्मण २ खण्ड तथाविध वैषम्य का मूलाधार है- ' न्यूनत्त्व ' । मानव, और मानवी, दोनों में हीं यद्यपि साम्यमूलक पुरुष – प्रकृति - भाव समानरूपेण समन्वित हैं । किन्तु ये दोनों हीं साम्य दोनों हीं संस्थानों में एकांशतः ' न्यून ' ही बने हुए हैं । मानव का पुरुषभाव पूर्ण है, तो प्रकृतिभाव अपूर्ण, किंवा न्यून है । एवमेत्र मानवी का प्रकृतिभाव पूर्ण है, तो पुरुषभाव अपूर्ण, किंवा न्यून है । पूर्णता जहाँ समत्त्वानुयोगिनी - विषमत्त्वप्रतियोगिनी है, वहाँ पूर्णता विषमत्त्वानुयोगिनी - समत्त्वप्रतियोगिनी है । पुरुषतत्त्व रसानुबन्ध से पूर्ण बनता हुआ जहाँ ‘ समभावापन्न ' है, वहाँ प्रकृतितत्त्व बलानुबन्ध से अपूर्ण बनता हुआ ' विषमभावापन्न ' है । समत्त्वानुयोगिक पुरुष यदि आधार, और प्रकृति- यदि आधेया है, तो विषमा प्रकृति के साम्राज्यस्थान विश्व में, एवं तत्-प्रजा में भी समत्वमूला शान्ति प्रवाहित रहती है । ठीक इस के विपरीत यदि विषमत्त्वानुयोगिनी प्रकृति श्राधार, और पुरुष आधेय बन जाता है, तो समत्त्वमूला शान्ति का सर्वथैव उच्छेद होजाता है । और सम्भवतः क्यों निश्चयेन इसी आधार पर महाभाग यक्ष के अमुक महत्त्वपूर्ण प्रश्न के समाधान में समुपस्थित ' स्त्रीपु ं वच्च ' तद्धि गेहूं विनम् ' इस प्रकृतिसिद्ध समाधान को पुराणपुरुष भगवान् बादरायण ने अपने ऐतिह्यग्रन्थ में प्रश्रय प्रदान किया है । पुरुष और प्रकृति से अनुप्राणित रस - बल - निबन्धन साम्य - वैषम्य का यह चिरन्तन इतिवृत्त तो स्वतन्त्र - निबन्ध - सापेक्ष हो माना जायगा । प्रकृत में लक्षीभूत वक्तव्य से अनुप्राणित सन्दर्भ की सङ्गति के लिए यही स्पष्टीकरण पर्याप्त मान लिया जायगा कि, मानव का पुरुषभाग जहाँ पूर्ण है, वहाँ प्रकृतिभाग पूर्ण है । अतएव मानव प्रकृतित: - अपूर्ण - अकृत्स्न, किन्तु पुरुषतः पूर्ण कृत्स्न है । ठीक इस के विपरीत मानवी का प्रकृतिभाग जहाँ पूर्ण है, वहाँ पुरुषभाग अपूर्ण है । श्रतएव मानवी पुरुषतः पूर्णा श्रकृत्स्ना, किन्तु प्रकृतितः पूर्णा - कृत्स्ना है । मानव अपनी प्रकृतिनिबन्धना अपूर्णता की पूर्ति के लिए ही उस ' मानवी ' के साथ साप्तपदीन की सहज इच्छा रखता है, जो अपनी पूर्णा प्रकृति के समर्पण से प्रकृत्या अपूर्णं बने हुए इस मानव के विस्रस्त - प्राकृत - भाव को परिपूर्ण कर दे । एवमेव मानवी भी अपनी पुरुष - निबन्धना पू-र्णता की पूर्ति के लिए ही उस ' मानव ' के प्रति समर्पित होजाना चाहती है, जो अपने पूर्ण पुरुषभाव के प्रत्य-र्पण से पुरुषत्त्वेन अपूर्ण बनी हुई इस मानवी के विस्रस्त- पौरुष - भाव को परिपूर्ण करदे । श्रौर यों दोनों दोनों की न्यूनता के क्षति - पूरकात्मक सम्बल प्रमाणित होते हुए उस एकत्त्वनिबन्धना परिपूर्णता को अन्वर्थं बनाते हुए इत्थंभूत दाम्पत्य से प्रजातन्तुवितानात्मिका विश्वस्वरूप - पर्य्यादा की महती थाती को ही अक्षुण्ण बनाए रहें । ' न्यूनाद्वै प्रजाः प्रजायन्ते ' - ' सोऽयमाकाशः पत्न्यापूर्य्यते ' इत्यादि श्रुति - वचन इसी तथा-कथिता रहस्यपूर्णा याज्ञिकी स्थिति का स्पष्टीकरण कर रहे हैं, जिस याज्ञिकी स्थिति के स्वरूप - प्रसङ्ग से ही तत्स्तम्भरूप - प्रकृति - पुरुष - समन्वयात्मक - अध्यात्मयज्ञ ( मानव - मानवी के दाम्पत्यरूप यज्ञ ) के श्रद्ध - श्रद्ध अङ्गभावों का संस्मरण होपड़ा है । मानव का पुरुषभाव ' आत्मा ' है, तो प्रकृतिभाव इस का ' शरीर ' है, जिस का निष्कर्ष यही है कि, आत्मा, श्रौर शरीर, इन दोनों की समन्वितावस्था का ही नाम तो मानव है, एवं तदात्मक ही मानवी का * -- खण्डचतुष्टयात्मक - सामयिक - उद्बोधनात्मक -निचन्धार्न्तगत क्रमप्राप्त तृतीयखण्डरूप -- ' प्रकृतिपुरुष-स्वरूपमीमांसा ' नामक स्वतन्त्र निबन्ध में इस तत्त्व का विशदरूपेण स्पष्टीकरण -- प्रयास हुआ है । १३
पृष्ठ 14
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
किचिदिव - श्रावेदन मौलिक स्वरूप है । आत्मा ' लोकातीत ', किन्तु ' लोकी ' तत्व है, एवं शरीर ' लोक ' है । पार्थिव जगत् की प्रकृति माता धरित्री ही मानी गई है । अतएव प्रकृति - रूप- लोकात्मक- शरीर को हम ' पार्थिव ' ही कहेंगे, जिस में आलोमभ्यः- नवाग्रेभ्यः पार्थिव लौकिक आत्मा प्रतिष्ठित माना गया है । आत्मा ही वह ' पुरुष ' भाव है, जो प्रकृतिरूप -- लोकात्मक ' शरीर ' का सर्वस्त्र माना गया है । आत्मा और पार्थिव शरीर, इन दोनों के मध्य मे दोनों के क्रमिक - सहयोगी माने गए हैं विज्ञानभाव, और प्रज्ञानभाव, जो दोनों भाव दर्शन - जगत् में क्रमशः बुद्धि, और मन नाम से प्रसिद्ध हैं । वैदिक -- विज्ञान की सामान्य - परिभाषाओं से भी परिचित वेद-प्रेमी जानते ही हैं कि, मानवीय मन का उपादान ' सोममय वह चन्द्रमा है, जिसे पृथिवी का उपग्रह माना गया है । अतएव चान्द्र - मन का पार्थिव शरीर के प्रति सहज आकर्षण प्रकृत्यैव संसिद्ध होरहा है । एवमेव चिदात्मा की गर्भभूमिरून पारमेष्ठ्य महद् ब्रह्म का उपग्रह माना गया है वह सूर्य, जो बुद्धि का प्रभव है । अतएव महद्ब्रह्मावच्छिन्न आत्मा के प्रति सौरी - बुद्धि का सहज श्राकर्षण स्वत: ही प्रमाणित होरहा है । और सूर्य्यात्मिका बुद्धि मानव के आत्मरूप पुरुषपर्व की, किंवा श्रद्ध ' - अङ्ग की सहचारिणी बनी हुई है, तो चन्द्ररूप मन पार्थिवशरीररूप प्रकृतिपर्व का, किंवा श्रद्ध ' अङ्ग का सहचारी बना हुआ है । इस साहचर्य कनिष्का यही निकलता है कि मानवीय पुरुषभागरूप श्रर्द्धाङ्ग की व्याप्ति आत्मा, और बुद्धि नामक दो अवान्तर पर्वों से अनुप्राणिता है, एवं मानवीय प्रकृतिभागरूप श्रद्धांङ्ग की व्याप्ति मन और शरीर नामक दो अवान्तर पर्वों से समन्धिता है । फलतः श्रद्ध-- श्रङ्गद्वयात्मक, किंवा पुरुष - प्रकृति - समन्वयात्मक-द्विपर्वा मानव का श्रात्मा, बुद्धि, मनः, शरीर - भेदों से पर्वचतुष्टयात्मकत्व प्रमाणित होजाता है, एवं ठीक यही पर्व चतुष्टयात्मिका स्थिति मानवी की है । दोनों के समन्वितरूप दाम्यपत्य * से निदान भावानुबन्धेन श्रष्टाक्षर-गायत्री छन्द की संख्या - सम्पत् की सहजरूपेणैव गतार्थता प्रमाणित होरही एवं इस दृष्टिकोण से भी-' गायत्री वा इदं सर्वम् ' इस अनुगम वचन की अन्वर्थता संसिद्ध होरही है । मानव, और मानवी सुखी, और शान्त रहें, इसी प्रसङ्ग से अत्र मानव, और मानवी की तथाकथिता स्वरूप -- मीमांसा प्रक्रान्त होपड़ी है, जिस के माध्यम से श्रत्र हमें इस निष्कर्ष पर पहुँचना पड़ा कि, पुरुष--और प्रकृति -- भाव - समन्वयात्मक मानव का पुरुषरूप श्रर्द्धाङ्ग भी आत्म - बुद्धि - भेदेन द्विपर्वा है, एवं मानव का प्रकृतिरूप श्रद्धङ्ग भी मनः - शरीर - मेदेन द्विपर्वा है । तथैव मानवी के दोनों श्रद्ध ' -- श्रद्ध - अङ्ग भी इसी व्यवस्था से समतुलित हैं । या दोनों के आठों पर्वों के समन्वय से अनुगता दाम्पत्यव्यवस्था अष्टाक्षर--गायत्री -- छन्द से समतुलिता प्रमाणित हो रही है । और यों अङ्गदृष्ट्या, तथा पर्वदृष्ट्या यद्यपि मानव, और मानवी के स्वरूपों में पारस्परिकी कोई विभिन्नता प्रतीत नहीं हो रही 1 तदपि मानवसंस्थानुगत पुरुषाङ्ग के प्राधान्य से, एवं मानवी संस्थानुगत प्रकृत्यङ्ग के प्राधान्य से अनुप्राणित सुसूक्ष्म भेद दोनों के समस्वरूपों का प्रात्यन्तिकरूपेण विभाजक बना हुआ है, जिस विभाजन का निष्कपार्थ यही है कि, मानव के चारों पत्र में श्रात्म -- बुद्धि -रूप ' पुरुष ' भाग अभिव्यक्त है पूर्णरूपेण, एवं मनः शरीर - रूप -- ' प्रकृति ' भाग ' अपूर्ण ' है | एबमेव मानवी के चारों पर्वों में मनः -- शरीररूप -- प्रकृतिभाग अभिव्यक्त है पूर्णरूपेण, एवं श्रात्म--* देखिए- प्रस्तुत द्वितीयखण्ड का ' पत्नी सन्न इनकम्मोपपत्तिः ' नामक प्रकरण ( पृष्ठ सं ० ६७६ से पृष्ठ सं ० २०२६ पर्य्यन्त ) । १४
पृष्ठ 15
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
शतपथब्राह्मण २ खराड बुद्धि - रूप ' पुरुष ' भाग अपूर्ण है । और यों दोनी ही अन्योऽन्याश्रयन्यायानुबन्धेन एक दूसरे के सम्बल को अनिवार्यरूपेण अपेक्षा रख रहे हैं । बिना इस उभयात्मक आश्रय श्राश्रयी भाव के न तो मानव ही सुख--शान्ति का अनुगाही बन सकता, एवं न मानवी ही सुख - शान्ति की अनुगामिनी बन सकती । मानव से मानवी चाहती है शान्ति, और मानव मानवी से चाहता है सुख । शान्ति अविकम्पित-स्थिर - श्रानन्द से सम्बद्धा मानी गई है, एवं सुख विकम्पित - अस्थिर - आनन्द से सम्बद्ध माना गया है । शान्ति का क्षेत्र है श्रात्मानुगता बुद्धि एवं सुख का क्षेत्र है मनोऽनुगत शरीर । मानव प्रधानरूपेण श्रात्मबुद्धि-समष्टिरूप पुरुषभाव का प्रातिस्विकरूपेण दायाद - भोक्ता है, तो मानवी प्रधानरूपेण मनःशरीर - समष्टिरूप प्रकृतिभाव की प्रातिस्विकरूपेण दायादभोकूत्री है । मानव की श्रात्मबुद्धयनुगता शान्ति से उपकृत होती है मानबी, एवं मानवी के मनःशरीरानुगत सुख से उपकृत होता है मानव । बिना शान्ति के सुख का कोई मूल्य नहीं, तो बिना सुख के शान्ति का मार्ग सर्वथा अवरुद्ध | अतएव संसिद्ध है कि - मानव, और मानवी की सुख - शान्ति दोनों के दाम्पत्यमूलक – ' गृहस्थधर्म्म ' पर ही अवलम्बित है, और इसी प्रकृतिसिद्ध तथ्य के आधार पर भारतीय - यज्ञकाण्ड के सम्बन्ध में हमें दो शब्द अपने वेदप्रेमी पाठकों के समक्ष उपस्थित करने हैं । समृद्धानन्द, शान्तानन्द - भेद से श्रानन्द के महिमामय दो विवर्त्त सुप्रसिद्ध हैं । जिस श्रानन्द में सहज स्थिति का विकम्पन है, वही समृद्धानन्द है, एवं यह इत्थंभूत पराश्रय से ही सम्बद्ध माना गया है । एक शान्त - सरोवर में बलपूर्वक - प्रक्षिन्त लोष्ठ - पाषाण कुछ समय के लिए जैसे वीची - तरङ्ग - रूप विकम्पन उत्पन्न कर देते हैं, तथैव लोक - वैभवरूप लोठ - पाषाणादि के आगमन से मानस - प्रज्ञा का श्रमुक अवधि के लिए विकम्पन होपड़ता है, एवं इसी विकम्पनावस्था का नाम है - समृद्धानन्द, जिसका भौतिक विश्वानुबन्धी - चाह्य परिग्रहों के संस्कारात्मक- श्रागमन से ही सम्बन्ध माना गया है । यही है – विश्वसुख, लोकसुख, जिसका प्रधान सम्बन्ध माना गया है मानव मानवी के प्रकृतिपर्वों के साथ, अर्थात् मनःशरीर पर्वों के साथ । अर्थात् मानसिक शारीरिक - लोकानन्द का ही नाम है - समृद्धानन्द, एवं इसी की पारिभाषिकी अभिधा है - ' सुख ' । क्योंकि मानवी में सहजरूपेणैव मनःशरीररूप प्राकृतपर्व ही अभिव्यक्त रहते हैं, अतएव मानवी स्वभावतः समृद्धा-नन्दात्मक - मन: शरीर - निबन्ध - लोकसुख की ही सतत इच्छा किया करती है । दूसरा विवर्त्त है शान्तानन्द का । यह स्वाश्रित आनन्द माना गया है । एवं सहजरूपेण म्व की स्वरूपस्थिति ही इस शान्तानन्द की परिभाषा है, जिसे बुद्धयनुगत - श्रात्मानन्द, किंवा श्रात्मनिबन्धन - बौद्धिक आनन्द भी कहा जासकता है । मनोऽनुगत - शारीरिक सुख को कहा जायगा पुष्टि, शरीरानुगत मानसिक सुख को कहा नायगा तुष्टि । एवं दोनों की समन्वितावस्था को माना जायगा समृद्धानन्दात्मक - सुख । एवमेव श्रात्मानुगत बौद्धिक आनन्द को कहा जायगा तृप्ति, एवं बुद्धयनुगत ग्रात्मानन्द को कहा जायगा शान्ति, तथा दोनों की समान्वितावस्था को माना जायगा ' शान्तानन्दात्मिका ' ' शान्ति ' । यों दो आनन्द विवर्त्तो के पर्व-चतुष्टयी के अनुबन्ध से शान्ति - तृप्ति - तुष्टि पुष्टि - रूपेण चार अवान्तर - महिमा - विवर्त्त - सम्पन्न होजायँगे, जिन इन चारों में से शान्ति - तृप्ति - रूप शान्तानन्द की पारिभाषिकी संज्ञा है - ' निःश्रेयस ', एवं तुष्टि - पुष्टि - रूप-समृद्धानन्द की संज्ञा है ‘ अभ्युदय ' । निःश्रेयस् के क्षेत्र हैं- आत्मबुद्धिपर्ण, एवं अभ्युदय के क्षेत्र हैं - मनःशरीर-१५
पृष्ठ 16
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
किञ्चिदिवप वेदन पर्वं । निःश्रेयस् - रूप शान्तानन्द ही ' पारलौकिक शान्तानन्द ' है, एवं श्रभ्युदयरूप - समृद्धानन्द ही - ऐह-लौकिक - सभृद्धानन्द है । और यों दोनों दोनों के पूरक ही प्रमाणित होरहे हैं । इसी आधार पर उस वर्णाश्रमधर्म की अभिव्यक्ति हुई है, जिसे भारतीय दार्शनिकों नें – ' यतोऽभ्यु-दय - निःश्रेयस - सिद्धिः स धर्म्मः ' इत्यादिरूपेण उभयसंसाधक माना है । इत्थंभूत उभयसंसाधक महान् मानवधर्म्म ( वर्णाश्रमधर्म्म ) का आधारस्तम्भ माना गया है वह — ' गृहस्थाश्रम ', जिसकी श्राधारभित्ति है चतुपर्षा मानव, और तथाविधैव - मानवी का दाम्पत्ययज्ञ । इसी यज्ञ के आधार पर मानव का वह गृहस्थाश्रम प्रतिष्ठित है, जिसके माध्यम से ही श्रभ्युदय का अर्जन करते हुए मानव - मानवी प्रभावी वानप्रस्थादि इतर श्राश्रमों से निःश्रेयस् - साधन में भी सर्वात्मना सफल होजाते हैं । इसी प्रकृतिसिद्ध तथ्य के आधार पर अब हम अपने पाठकों का ध्यान उन दोनों विद्याओं की ओर पुनः श्राकर्षित कर रहे हैं, जिनका परात्रिद्या - अपराविद्या रूपेण मुण्डकश्रुति के द्वारा पूर्व में संस्मरण किया जाचुका है । शब्दशास्त्रने ब्रह्म के दो प्रमुख महिमा -विवर्त्त माने हैं, जिनका भी प्रसङ्ग घिया अत्र संस्मरण कर लेना यातयाम नहीं माना जायगा । वे दोनों विबत क्रमशः लोकातीतब्रह्म, एवं लोकब्रह्म, नामों से श्रनुगत माने नासकते हैं, जो दर्शनभाषा में जहाँ क्रमशः निर्गुणब्रह्म - सगुणब्रह्म नामों से, एवं विज्ञानभाषा मे परात्पर, पुरुष - नामों से व्यवहृत हुए हैं । दिक् देश और काल की परिधियों से प्रतीत, विश्वातीत निद्धर्मक ब्रह्मविवर्त्त ' ही लोकातीत - परात्पर ब्रह्म है । एवं दिक्- देश - कालात्मक - सर्वात्मक - सर्वधम्मोपपन्न - ब्रह्मविवर्त्त ' ही पुरुषब्रह्म है । दिक्कालाद्यनवच्छिन्न - लोकातीत ब्रह्म ही शान्तानन्द की प्रतिष्ठाभूमि है, एवं दिक्कालाद्य-वच्छिन्न- लोकात्मक ब्रह्म ही समृद्धानन्द की प्रतिष्ठाभूमि है । इसका तात्पर्य्यं यही हुआ कि शान्तानन्दात्मक-निश्रेयस का आधार है लोकातीतब्रह्मविवत्त ', एवं समृद्धानन्दात्मक - अभ्युदय का श्राधार है लोकात्मक ब्रह्म-विवत्त ' । लोकातीत ब्रह्मविवर्त्त की लोकनिबन्धना उपनिषत् - मानी गई है - ' अहं ब्रह्मास्मि ' यह, जिसका अर्थ होता है – ' बिशुद्ध - निष्कैवल्य - श्रात्मा एवं जिसे माना गया है - दिक - देश - काल- त्रयी से अतीत । सैघा स्थितिः । स्थितस्य गतिश्चिन्तीया । निवेदन किया गया है कि मानव, और मानवी, दोनों में प्रत्येक में श्रात्मादि - शरीरान्त चार चार पर्व हैं । इनमें प्रथम - सर्वाधारभूत पर्वात्मक - आत्मपर्व के साथ बुद्धिपर्व को भी अनुगत मान लिया है एक कारण विशेष के आधार पर, जिसका नत्रखण्ड । त्मिका - गीता भूमिका के ' बुद्धियोगपरीक्षा ' नामक अष्टमखण्ड में विस्तार से स्वरूपोपबृंहण किया गया है । प्रकृत में यही वक्तव्य है कि, ' बुद्धि ' नामक पर्व वस्तुतः दिग्देश- कालानुगत लोकब्रह्म की सीमासे ही प्रधानरूपेण सम्बन्ध रखता है । और इस दृष्टि से आत्मा - बुद्धि, तथा मनः- शरीर - रूपेण चारों पर्वो का विभाजन न कर श्रात्मा को स्वतन्त्र विभागानुगामी माना जायगा, एवं शेष तीनों - बुद्धि - मन: - शरीर नामक पर्वो का एक लोकात्मक स्वतन्त्र विभाग माना जायगा J * - दिककलाद्यनवच्छिन्नानन्तचिन्मात्रमूर्त ये । स्वानुभूत्येक मानाय नमः ' शान्ताय ' तेजसे । --भतृहरिः १६
पृष्ठ 17
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
शतपथब्राह्मगा २ खण्ड इस नवीन दृष्टिकोणानुबन्ध से व आत्मपर्व के साथ तो लोकातीत ब्रह्म से अनुप्राणित निःश्रेयस् का, और तद्रूप शान्तानन्द का सम्बन्ध माना जायगा, एवं शेषभूता बुद्धि मनः - शरीर पर्वत्रयी के साथ लोकब्रह्म से अनुप्राणित अभ्युदय का, और तद्रूप समृद्धानन्द का सम्बन्ध माना जायगा, एवं तदाधारेणैव अत्र राद्धान्तत: यह मान लिया जायगा कि, मानव - मानवी का ग्रात्मपर्व दिग्देशकालातीत बनता हुआ निश्रेयस् - पथानुगामी है, तो शेत्रभूता बुद्धि - मनः शरीर- पर्णत्रयी दिग्देशकालात्मिका प्रमाणित होती हुई अभ्युदय - पथानुगामिनी है । तथाकथित नवीन दृष्टिकोण का आधार है प्राकृतिकी - लोकस्थिति, जिसका भी दो शब्दों में संस्मरण कर ही लेना चाहिए | लोकब्रह्मात्मक - समृद्धानन्दवन - विश्वात्मा से भिन्न भूत - भौतिक- विश्व की अभिव्यक्ति के तीन हीं प्रमुख पर्व माने गए हैं, जो क्रमशः ' सूर्य - चन्द्रमा - पृथिवी ' रूपेण सर्वसाधारण के लिए भी श्रद्धातम हैं । कालसाक्षी सूर्य्य काल से अभिन्न है, और यही अवलोकन - साधन - भूत ' लोक ' है । श्रतएव यह ' लोकमाक्षी ' नाम से भी उपश्रुत है । दूसरा चन्द्रपर्व ही दिक् का साक्षी बनता हुआ दिग्भाव से भिन्न है । एवं तीसरा पृथिवीपर्व ही देश का साक्षी बनता हुआ देशभाव से भिन्न है । तदित्थं सौरमण्डलावच्छिन्न लोक की सीमा में सूर्य्यात्मक - कालभात्र, चन्द्रमात्मक दिग्भाव, एवं पृथिव्यात्मक देशभाव, रूपेण तीन अवान्तर विवर्त्त प्रतिष्ठित हैं । इस त्रयी से तदभिन्न लोकब्रह्म को हमने ' दिग्देश-कालावच्छिन्नब्रह्म ' कहा है, जिसका फलितार्थ निकलता है - ' चन्द्रमा पृथिवी - सूर्यावच्छित्र - व्यक्त-विश्वत्रह्म ' | शेष रह जाता है लोकातीत, श्रतएव दिग्देशकालातीत अर्थात् पृथिवी चन्द्रमा सूर्यात्मक व्यक्त विश्व से अतीत परात्परब्रह्म, जिसे दिग्देशकालातीतत्त्वेनैव ' अविज्ञेयब्रह्म ' भी कहा गया है | मानव - मानवी में समानरूपेण अभिव्याप्त लोकातीत ब्रह्मभाव ही ' आत्मा ' है, जो दिग्देशकालातीत है । कालात्मक सूर्य्य का प्रवर्ग्यरूप ही मानव - मानवी में कालात्मक बुद्धिपर्व है । दिगात्मक चन्द्रमा का प्रवर्ग्यरूप ही दिगात्मक - मनःपर्व है । एवं देशात्मिका पृथिवी का प्रवर्ग्यरूप ही देशात्मक- शरीरपर्व है । इन तीनों पर्वों की समन्वितावस्था ही मानव - मानवी का दिग्देशकालात्मक - लोकानुबन्धी- परिच्छिन्न - स्वरूप है । और यही है उस ' अपराविद्यात्मिका ' ' वेदविद्या ' का स्वरूप - निष्कर्ष, जिसकी काण्डत्रयी के प्रथम-पर्वरूप - ' ब्राह्मणभाग ' की व्याख्या ही ' शतपथब्राह्मणभाष्य ' के रूप से क्रमश: ( खण्डश: ) प्रस्तुत हो रही वर्ष । आर्ष- * भारतराष्ट्र में किस मन्दभाग्यपूर्ण क्षण से इत्थंभूता भयावहा सर्वनाशकारिणी भ्रान्ति उपक्रान्त होपड़ी कि, “ मानव का एकमात्र लक्ष्य श्रात्मानुबन्धी- -निः यम्-- साधन ही है । दिग्देशकाला-नुबन्धी - व्यक्त - विश्व सर्वथैव मिथ्या है । इस का परित्याग कर मानव को केवल निःश्रेयस् - पथानु-चर्मा ही बना रहना चाहिए ", के - कालानुबन्धी काल्वालीकृत इतिवृत्त के स्वरूप - विश्लेषण का यहाँ अवसर नही है | यहाँ तो इसी ऐतिहासिक तथ्य की ओर ही पाठकों का ध्यान श्राकर्षित करना है कि, विगत तीन सहस्र- वर्षों से भारतराष्ट्र ज्ञात - अज्ञात अनेक वारुण - पाशों की दृढतमा - बन्धन - परम्पराओं से आलोमभ्यः-* ऋषिप्रदिष्ट ज्ञान - विज्ञानात्मक पथ का अनुगामी ।
पृष्ठ 18
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
किञ्चिदिव श्रावेदन श्रानखाग्रेभ्यः श्राबद्ध बना रहता हुआ प्रकृतिसिद्ध शरीर - मनो- बुद्धि - मम्मत- देश - दिक् - कालानुबन्धी - लोक-समृद्धिभावों की ओर से न केवल तटस्थ निरपेक्ष ही, अपितु काल्पनिक श्रात्माभिनिवेश से श्राविष्ट होता हुआ विद्रोही ही बनता चला रहा है इन लोक - समृद्धिपरम्पराओं के प्रति । विश्वातीत - निद्धर्मक - लोकातीत - परात्परब्रह्मरूप निर्विशेष ' श्रात्मभाव ' का तो वस्तुगत्या मानव के नि यस से भी सम्पर्क नहीं है अपितु चतुषपर्वा मानव - मानवी का प्रथम - पर्वरूप आत्मभाव ही इन दोनों के लिए नि: श्रेयस् का प्रवर्तक माना गया है, जो आत्मभाव विश्वसीमानुगत बनता हुआ ' विश्वात्मा ' नाम से ही प्रसिद्ध है । अतएव जगन्मास्ववादी - निर्विशेषवादियों का तो निःश्र यस से भी कोई सम्पर्क नहीं रह जाता । अपितु निर्विशेष की उपलब्धि के मिथ्यादम्भ से इनकी स्थिति तो ' इतो भ्रष्टस्ततोऽपि भ्रष्टः ' न्याय को ही चरितार्थ करने वाली प्रमाणित होरही है, और वैसा सा ही क्या, निश्चयेन वैसा ही घटित होरहा है विगत तीन सहल वर्षों की अवधि से निर्विशेषाभिनिविष्टा जगन्मिथ्यात्वादिनी भारतीय प्रजा के सम्बन्ध में । जगन्मिथ्यात्त्ववाद भ्रान्तिमूला निर्विशेषात्माभिनिवेशाविष्टा तथाकथिता श्रात्मधारणाने ही इस ओर की लोकसमृद्धि - परम्परानों से जहाँ भारतीय मानव को पराङमुख प्रमाणित किया, वहाँ काल्पनिक श्रात्माभि-निवेश ने इसे निःश्रेयसु - पथ से भी सर्वात्मना वश्चित ही प्रमाणित कर दिया तथोक्ता भुक्ता - प्रक्रान्ता अवधि में । यो निःश्रेयससाधक आत्मोपयिक ज्ञानपथ के साथ साथ श्रभ्युदयसंसाधक ( बुद्धि - मनः शरीरोपयिक ) विज्ञानपथ से भी भारतीय मानव सर्वात्मना परा परावत ही प्रमाणित होगया पारिशेष्यात् रह गया इसके प्रज्ञाकोश में काल्पनिक शून्यवादात्मक - क्षणवादात्मक - स्वलक्षण निबन्धन दुःखं दुःखं मात्र जिस इत्यंभूता सर्वनाश-कारिणी मतवादात्मिका भावुकता को ही श्राज पुन: बड़े अभिनिवेश के साथ हमारा आज का सर्वतन्त्र - स्वतन्त्र-भारत काल्पनिक मानवता के व्यामोहन से व्यामुग्ध होता हुआ अपना रहा है, जिससे बड़ा सांस्कृतिक अध: -पतन इसका और कुछ भी तो नहीं हो सकता । ` लोकसमृद्धयनुगता - दिग्देशकालानुबन्धिनी - अभ्युदयपयसंसाधिका विज्ञानधारा की विलुप्ति ही तथोक्त सांस्कृतिक अधःपतन का एकमात्र प्रमुख कारण है, जिस पतनगरों को निःशेष प्रमाणित करने के लिए अविलम्ब अपराविद्या के तत्वान्वेषण के आधार पर भारतीय मनीषि - वर्ग को उस आर्थविज्ञानपरम्परा की पुनः अभिव्यक्ति करनी ही पड़ेगी, जिस अभ्युदय साधक विज्ञानका एड की आधारभूमि निःश्र यस् - संसाधक-ज्ञानकाण्ड बना हुआ है । और इस पावन उद्देश्य की पूर्ति के लिए राष्ट्र के मनीषिवर्ग को सर्वप्रथम-अपराविद्या के प्रधान एवं प्रथम - श्रङ्गभूत ' विधि ' नामक ' ब्राह्मण ' भाग की वैज्ञानिकी - परिभाषाओं के पारिभाषिक तत्वान्वेषण में हीं प्रवृत्त होना पड़ेगा, जिन परिभाषाओं के स्वरूप समन्वय के बिना केवल प्रकृति - प्रत्यय - धातु - उपसर्ग - निपातादि के बल पर कदापि विलुप्तप्राया विस्मृतणया विज्ञानधारा की पुनः अभिव्यक्ति सम्भव नहीं है । मुण्डकोपनिषत् ने पराविद्या, श्रपराविद्या नाम की जिन दो विद्याओं का सङ्केत किया है, उनमें लोकातीता पराविद्या का न तो मानव के अभ्युदय से ही सम्बन्ध है, एवं न निः यस से ही क्योंकि दिग्देशकालातीता पराविद्या का न तो ज्ञान से ही सम्बन्ध है, न कर्म्म से ही सम्बन्ध है । शब्दातीता उस विद्या का मानव के लोकजीवन की सापेक्षा ज्ञानधारा, तथा सापेक्षा कम्मंधारा से किसी भी प्रकार का व्यक्त १८
पृष्ठ 19
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
शतपथब्राह्मण २ खण्ड सम्बन्ध नहीं है, जबकि दुर्भाग्यवश उसी लोकातीता पराविद्या को एवं तन्निबन्धन लोकातीत निरपेक्ष - निर्विशेष-ब्रह्म को विश्वसमृद्धि के अन्यतमशत्रु साम्प्रदायिकोंनें मानव के लिए एकमात्र परमपुरुषार्थ घोषित करते हुए उसे ही निःश्रेयस् - संसाधक मान रक्खा है । एवं इसी भावुकतापूर्णा मान्यता से श्रावेशाविष्टा बनी हुई भारतीय प्रजा विगत तीन सहस्र वर्षों से विश्वातीत - निर्विशेषब्रह्म की घोषणा मात्र से आत्मविस्मृता बनती हुई वस्तुस्थिति से अनुप्राणित निःश्र ेयस् ( श्रात्मानुगता शान्ति, और बुद्धयनुगता तृप्ति ), तथा अभ्युदय ( मनोऽनुगता तुष्टि, और शरीरानुगता पुष्टि ), दोनों हीं पुरुषार्थों से सर्वथा ही वश्चित ही होती चली रही है । तथाविधा आत्मवञ्चना का ही यह घोरघोरतम दुष्परिणाम हुआ है कि, सगुण - विश्वेश्वरब्रह्म के ज्ञान विज्ञानात्मक - रहस्यों का प्रतिपादक - उपनिच्छास्त्र तद्द्व्याख्याभूत व्याससूत्र, एवं तत्पारिभाषिकी सूची-रूप गीताशास्त्र, इन तीनों शास्त्रों की समष्टिरूपा सुप्रसिद्धा - ' प्रस्थानत्रयी ' भी तदावेशाविष्टों की महती कृपा से अपनी पारिभाषिकी ज्ञान विज्ञानात्मिका समन्वय - पद्धति से पराङमुख ही प्रमाणित होगई है विगत अवधि से । फलतः प्रस्थानत्रयी आज केवल साम्प्रदायिक ग्रन्थमात्र रूपेणैव श्रवशिष्टा रह गई है । तभी तो तथोक्ता अवधि में अपने अपने वैय्यक्तिक - मनोऽनुगत - मान्यतानुत्रन्धी - मतवादों - सम्प्रदायवादों के समर्थन-प्रमाणन के लिए सभी मतवाद - प्रवत ' कोंनें ' प्रस्थानत्रयी ' का आश्रय ग्रहण करते हुए इसे उसप्रकार स्व - स्व-मतवादों की पोषाणित्मिका ही प्रमाणित करने का जघन्यतम प्रयत्न किया है, मानो ज्ञानविज्ञानात्मिका यह प्रस्थानत्रयी केवल काल्पनिक - मतवादों के पोषण के लिए ही प्रवृत्त हुई हो । उक्त निदर्शन से वक्तव्यांश केवल यही है कि, ' उपनिषत् ' जैसा वैज्ञानिक - शास्त्र, सर्वधर्मोपपन्न ब्रह्म के वैज्ञानिक स्वरूप का विश्लेषक ' वेदान्तसूत्र ' जैसा सूत्रग्रन्थ, एवं समस्त उपनिषदों की रहस्यपूर्णा ज्ञानविज्ञानात्मिका विद्याओं की परिभाषाओं की महत्त्वपूर्ण ' सूची ' रूप श्रीमद्भगवद्गीता जैसा लोको-त्तरशास्त्र, ये सभी ज्ञान - विज्ञान - निधियाँ भी श्राज तथाविधा मतवादाभिनिवेशपरम्परात्रों की प्रतिच्छाया से अपनी मौलिकता से सर्वथा ही अन्तम्मुख प्रमाणित होवुकी है । यही कारण है कि उपनिषत्, और गीता जैसे तस्वप्रधान, एवं आचारप्रधान शास्त्रों के विद्यमान रहते भी भारतराष्ट्र विगत तीन सहस्रवर्षों की अवधि से उत्तरोत्तर निश्रेयस्, तथा अभ्युदय - पथों से वञ्चित रहता हुआ आततायी - र्गं के द्वारा पराभूत ही होता रहा है, जिस इत्थंभूता पराभूति से अद्यावधि भी भारतराष्ट्र का परित्राण नहीं हो सका है । सचमुच ही जिज्ञासात्मक इत्थंभूत महान् प्रश्न प्रत्येक आस्तिक भारतीय मानव के लिए अनतिप्रश्नात्मक एक ' असमाधेय - प्रश्न ' ही प्रमाणित होरहा है कि, जिस नैष्ठिक - राष्ट्र ( भारतराष्ट्र ) के प्रज्ञाकोश में मन्त्रब्राह्म-णात्मक - वेदशास्त्र जैसा रहस्यपूर्ण शास्त्र विद्यमान हो, जिस राष्ट्र के मानस - प्राङ्गण में औपनिषद् - ज्ञानप्रवाह प्रवाहित हो, एवं सर्वोपरि जिस राष्ट्र की आस्था - श्रद्धा - समन्विता बुद्धि में गीताशास्त्र जैसा आचारशास्त्र प्रतिष्ठित हो, वह राष्ट्र कैसे, और क्यों परतन्त्र बन गया?, इन लोकोत्तरा ज्ञान - विज्ञान - विभूतियों की विद्यमानता में भी कैसे और क्यों यह राष्ट्र श्रात्मदृष्टया प्रशान्त, बुद्धिदृष्टया अतृप्त मनोदृष्ट्या असन्तुष्ट, तथा शरीरदृष्ट्या अपुष्ट बना रह गया?, और कैसे, तथा क्यों यह भारतराष्ट्र अपने दायादसिद्ध निःश्रेयस्-तथा अभ्युदय नामक दोनों ही पुरुषार्थों से वञ्चित होता रहा है? | हम समझते हैं, पूर्व निर्दिष्ट मतवादात्मक - सम्प्रदायवाद से अनुप्राणिता ज्ञानविज्ञानात्मिका परि- -भाषाओं की विलुप्ति, ज्ञानविज्ञानात्मक श्राचारधर्म का परित्याग, एवं तत्स्थाने च काल्पनिकी मतवादा-१६
पृष्ठ 20
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
किश्चिदिव - आवेदन भिनिविष्टा - मान्यताओं का अन्धानुकरण ही तथोक्त अनतिप्रश्नात्मक प्रश्न का प्रमुख कारण मान लिया जायगा, जिस इस एक प्रमुख कारण के सहयोगी अन्यान्य कारणों का अत्र स्पष्टीकरणावसर नहीं है । इसी सम्बन्ध में एक विशेष तथ्यात्मक कारण का संस्मरण कर लेना भी श्रप्रासङ्गिक नहीं माना जायगा । ' ज्ञान ' शब्दानुप्राणिता परिभाषा से संस्पृष्ट साम्प्रदायिक मस्तिष्क ने उपनिषदों के ' ज्ञान ' शब्द का इत्थंभूत समन्वय कर डाला कि - " उपनिषद् ग्रन्थ " उस निरपेक्ष - निर्विशेष- निर्धम्र्मक- लोकातीत-दिग्देश - कालातीत - ब्रह्मज्ञान की ओर ही हमारा ध्यान आकर्षित कर रहे हैं, जो निरपेक्ष- निर्विशेष-ब्रह्मज्ञानात्मक- ' ज्ञान ' ही अमृतत्त्वरूप- निःश्रेयस की प्राप्ति का अन्यतम साधन है । " ज्ञानशब्द-निबन्धना इसी महती भ्रान्ति ने लोकातीत ब्रह्मज्ञान का वह महान् व्यामोहन उत्पन्न कर डाला, जिमसे व्यामुग्धा भारतीय - आस्तिक प्रजा आचारात्मक - कर्त्तव्यधर्म से सर्वथैव पराङमुख बन गई, जिस पराङ-मुखता के आधार पर ही ' कलौ वेदान्तिनः सर्वे ' यह आभाणक प्रक्रान्त होपड़ा है | ज्ञानाभिनिवेश का इससे बड़ा और क्या प्रमाण होगा कि, निविशेष- ब्रह्मात्मवादी - जगन्मिथ्यात्त्वा— भिमानी व्याख्याताचों की दृष्ट में मन्त्रब्राझणात्मक सम्पूर्ण वेदशास्त्र का सर्वान्त का केवल ' उपनिषद् ' भाग ही प्रधान बना रहा, और उसी पर उन व्याख्याताओं की व्याख्या - टीका - टिप्पणी - आदि परम्पराएँ उत्तरोत्तर पुष्पित - पल्लावेत होतीं रहीं । शेषभूत ऋक् - यजुः - साम - अथर्व - मेदभिन्ना संहिताचतुष्टयी, कर्म्म -प्रधान विधिभाग तो प्रायः श्रसंस्पृष्ट ही प्रमाणित होते रहे, जब कि बिना इन पूर्व - वेदभागों के पारिभाषिक— ज्ञान - विज्ञानात्मक - समन्वय के उपनिषत् के एकाक्षर का भी वास्तविक ( ज्ञानविज्ञानात्मक ) समन्वय असम्भव है, जैसा कि खएडत्रयानुगता उपनिषद्विज्ञान माध्यभूमिका, एवं ईशोपनिषद्विज्ञानादि - भाष्यों में विस्तार से स्पष्ट किया जाचुका है । तथ्यात्मक कारण के संस्मरण प्रसङ्ग से ही हमें प्रकृत में इत्थभूत प्रिय सत्य की शरणानुगति करनी पड़ रही है । मन्त्रब्राह्मणात्मक - वेदशास्त्र का ' विधि ' भागरूप ' ब्राह्मणभाग ' ही तथ्यात्मक उस संस्मरणीय कारण का मूलाधार है, जिसकी ओर विशेषरूप से हमें अपने पाठकों का ध्यान आकर्षित करना है । मन्त्रा-त्मक संहितावेद ज्ञातव्यवेद है, जिसकी विश्रामभूमि तत्त्वमीमांसा से ही अनुप्राणिता है । दूसरा ब्राह्मणात्मक भाग कर्त्तव्यवेद है, जिसका प्रमुखरूपेण श्राचारनिष्ठा से ही सम्बन्ध है । कर्म, उपासना, ज्ञान, तीनों ह्रीं कर्त्तव्यार्थ हैं मानव के अभ्युदय - निश्रेयस् संसाधन के लिए, जिनका क्रमशः गृहस्थानुबन्धी- कर्त्तव्य, वान-प्रस्थानुबन्धी- कर्त्तव्य एवं संन्यासानुबन्धी- कर्त्तव्य, रूपेण त्रिधा वर्गीकरण हुआ है | ज्ञान - विज्ञाना-त्मक - शिक्षण काल से अनुप्राणिता प्रथमा पञ्चविंशति से अनुप्राणित प्रथम - ब्रह्मचर्याश्रम के अनन्तर प्रकृतिसिद्धा द्वितीया -- पञ्चविंशति में मानव का गृहस्थानुबन्धी- ' कर्म्म ' नामक प्रथम कर्त्तव्य प्रधानरूपेण अनुष्ठित होता है, और सर्वाधारभूत - दाम्पत्यमूलक - यही वह ' कम्र्माश्रम ' है, जिसका प्रधान रूपेण ब्राह्मण के ' विधि ' भाग ही सम्बन्ध माना गया है । चिना इस प्रथम कर्त्तव्य की संसिद्धि के मानत्र के उत्तराङ्गभूत दोनों कर्त्तव्य ( उपासना, और ज्ञान ) कथमपि समन्वित नहीं होसकते । तव गृहस्थधर्म की उपेक्षा कर युवावस्था में, किंवा बालावस्था में ही काल्पनिक वैराग्य की घोषणा कर कपड़े रँग लेना, और अपने आपको ' वीतराग- ब्रह्मनिष्ठ - परहंस परिव्राजकाचार्य -संन्यासी ' घोषित कर देना कुछ भी तो अर्थ नहीं रखता । सकमुच इत्थंभूत संन्यास से बड़ी आत्मप्रतारणा मानव के लिए और कुछ भी तो नहीं है । ऐसे २०