शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - १-२ - मोतीलाल शास्त्री
Shatpath Brahman 1 2 · 1265 पृष्ठ · 127 खण्ड
विषय सूची
- शतपथब्राह्मण - हिन्दी - विज्ञानभाष्य - प्रथमकाण्डान्तर्गत द्वितीय - चतुर्थ - पञ्चम- षष्ठ - ( प्रक्रान्त ) - अध्यायात्मक द्वितीयखण्ड २ निबन्धा - मोतीलाल… 1–10
- शपथब्राह्मण २ खण्ड अथापरा -- यथा तदक्षरमधिगम्यते, यत् - यत्-- श्रद्रश्यम् - अग्राह्यम् - श्रगोत्रम् श्रवर्णम्-अचक्षुःश्रोत्रम् -तत् - ग्र गणिपादम् नित्यम्… 11–20
- शतपथब्राह्मण २ खण्ड संन्यास ने, एवं ऐसे संन्यास के कर्णधार संन्यामियोंने हीं तथ्यात्मक उस महान् कारण को जन्म दिया है, जिस संस्मरणीय कारणानुबन्ध से ही… 21–30
- शतपथब्राह्मण २ ख एड कार नहीं है । सर्वरहस्यवित् तथाविध दीर्घतमा नामक वैसे महामहर्षि अपने व्यक्तित्त्व की स्वरूप - मीमांसा के लिए जब प्रवृत्त होते हैं, तो… 31–40
- शतपथब्राह्मण २ खण्ड पञ्चावयत्र विश्व की, एवं तद्गर्भीभूता प्रजा की स्वरूप व्यवस्थिति श्रानुपूर्बी से व्यवस्थित है… 41–50
- शतपथब्राह्मण २ खण्ड पर ही मण्डलात्मक -- ' वैश्वरूय ' का वितान हुआ है, जिस वैश्वरूप्य के माध्यम से ही षाँचों विश्वपुरों में परस्पर वसुधानकोशात्मक-- वह… 51–60
- शतपथब्राहाण २ खण्ड प्राकृत - प्राणी स्वतः ही स्व - स्व - प्राकृतिक क्षेत्रों में शिक्षापटु बन जाते हैं… 61–70
- शतपथब्राह्मण २ खण्ड सम्पुटित मानव अपने स्वरूपानुगत - आत्मचैतन्य से उत्तरोत्तर विजड़ित होता हुआ स्वयमपि एक जड़- भूतपिण्ड रूप में परिणत होजाने के लिए ही… 71–80
- शतपथब्राह्मण २ खण्ड मन्यवे ॰ ' इत्यादि रूपेण भगवान् शङ्कर के सम्मुख होने वाले रुद्रपाठों में लोकप्रसिद्ध है, सनातनधर्मावलम्बी-जगत् क्यों व्यर्थ में हीं… 81–90
- शतपथब्राह्मण २ खण्ड प्रकृत में निवेदनीय यही है कि, वैध - यज्ञकर्म्म भारतीय - विज्ञानकाण्ड का आचारनिष्ठात्मक — वह महान् स्तम्भ है, जिसे केवल पूजन हवन - पाठ… 91–100
- शतपथब्राहागा २ खण्ड उक्त आख्यान के द्वारा प्रस्तुत प्रक्रान्त - यज्ञकर्म के सम्बन्ध में एक विशेष प्रश्न का समाधान करती हुई आगे जाकर शतपथी श्रुति कहती है… 101–110
- शतपथब्राह्मण २ ख गुड है, एवमेव सूर्य अपने अयनवृत्त के आधार पोमय पारमेष्ठ्य महान् के चारों ओर परिक्रममा लगा रहा है… 111–120
- शतपथब्राह्मण २ खण्ड वचन भी आदर्शात्मक प्राण की अभिव्यक्ति को ही यज्ञरूप - यथार्थ का श्रासन प्रदान कर रहा है… 121–130
- श्रीः शतपथब्राह्मण - हिन्दी - विज्ञानभाष्यान्तर्गत - प्रथमकाण्डानुगत प्रस्तुत - ' द्वितीय खण्ड ' ( २ ) - में समाविष्ट प्रमुख - याज्ञिक - कम्र्मों की सूची… 131–140
- शतपथब्राह्मण २ खण्ड ३६८ - एक तप, और विभिन्न तीन ग्रंथों के सम्बन्ध में समस्यात्मक महान् प्रश्न ३६६- पुरुषभावानुत्रन्धेन तीन अर्थों की स्वीकृति " ३७० -… 141–150
- शतपथब्राह्मण २ खण्ड ६४ - ' ग्रस्थन्वन्तं यदनस्था विभत्तिं ' मन्त्रार्थ का समन्वय ६५ - ' यावानुवै रसस्तावानात्मा ' ६६ - रस, और पारिभाषिक ' श्राज्य ', ६७ -… 151–160
- शतपथब्राह्मण २ खण्ड २० - ब्राहृताग्नि, उद्ध ताग्नि, प्रहृताग्नि, विहृताग्नि, भेदेन चतुर्द्धा विभक्त अग्नि ७१० २१- अधिलोक - श्रधिदैव - अधियज्ञ - अधियाज्ञिक… 161–170
- शपथब्राह्मण २ खण्ड ५४५ - मानवसमाज की रक्षा, और तत्सम्मता आजकी प्रचण्डा हिंसा ५४६ - यज्ञियपशुहिंसानुगत आक्षेप की प्रात्यन्तिकी निरर्थकता " ५४७ - माँस, और… 171–180
- शतपथब्राह्मण २ खण्ड ६५ - श्राख्यानानुगत - इन्द्र वृत्र - स्पय, यूप - रथ-शर - नामक - षड् विध भावों का संस्मरण ६६ - भूपिण्डपरिभ्रमण, श्रौर तदनुगत दिव्य, तथा… 181–190
- शतपथब्राह्मण २ ख एड ६०७ - ' व्रजं गच्छ गोष्ठानम् ' का तात्विकस्वरूप-८३५ ६३ - परमेष्ठी के वारुणमण्डल, और सोम-मण्डल रूप दो मेद ६३६ - उभयलोक के माध्यम से… 191–200
- शतपथब्राह्मण २ खण्ड ३४६ - ध्रुव की ध्रुवता, एवं ध्रुवशब्द - व्यवहार ८६५ का पारिभाषिक समन्वय " 3 ३५० – कदम्ब के चारों और परिभ्रममाण ध्रुव ३५१ -… 201–210
- शतपथब्राह्मण २ लगत ८० - हृदयम, और अक्षरत्रयी ८४१ - शक्तित्रयो का रहस्यात्मक कार्य्य - समन्वय ८४२ - ' मध्ये वामनमासीनं सर्वे देवा उपासते ' का रहस्यात्मक… 211–220
- शतपथब्राह्मण २ खण्ड १६६ - स्व: - श्रौर पर: - रूप तन्त्रों के पारिभाधिक तत्वार्थ १६७ - स्वतन्त्र - परतन्त्र - भावानुगत आत्मभाव, और अनात्मभाव का पारिभाषिक -… 221–230
- ६३३ -स्थूल भूतप्रधान दाम्पत्यजीवन शतपथब्राह्मण २ खण्ड " ६३४ - प्राकृतिक कारण के साथ गजनिमीलिका, और लौकिक - कारण निदर्शन १०२४ ६३५ -- उभय- सद्भावना, और… 231–240
- २५२ - उपभृत् की नैदानिकी अन्नरूपता २५३- भूयांसं कनीयांसं करोति २५४ - समृद्ध का स्वरूप - लक्षण शपथब्राह्मण २ खण्ड २५५ - जुहू, और उपभृत् से श्रनुगता… 241–250
- शतपथब्राह्मण २ खण्ड अथ- कस्थापनकम्र्म्मोपपत्तिः ३३५ - विधृती के ऊपर ' प्रस्तर ' का स्थापन ३३६ - कपात्रों का वेदि पर संस्थापन ३३७ - ' सेदं प्रियेण धाम्ना ०… 251–260
- ३३६- माल्व्य के द्वारा बुद्धयनुगत घृतिगुण का अभिभव शतपथब्राह्मण २ खण्ड ३४० - सङ्गीत का शरीर प्रधान नृत्याङ्ग, और माल्य दोष ३४१ - सङ्गीत का मनःप्रधान… 261–270
- ७६७ - सन्तरस, और सप्त उपरस ७६८ - सप्तविष, और सप्त उपविष ७६६ - सप्तक- भाव-- परिणति के सम्बन्ध में प्रमाणभूत श्रुति- सन्दर्भ शतपचत्राह्मण २ खण्ड ७७० - मानव… 271–280
- शतपथब्राह्मण २ खण्ड ११६६ - स्वरभावानुबन्धी मण्डलात्मक - साम के प्रसङ्ग से उपात्ता सङ्गीत चर्चा १२७४ ६७ - वत्तं मानयुगानुबन्धी- मनः शरीरानुगत आत्मबुद्धि… 281–290
- १६२८- अग्नि का रहस्य- पूर्ण दौत्यक शतपथब्राह्मण २ खण्ड २६ - होसारं विश्ववेदसम् ' का समन्वय 33 ३० - ' होता यो विश्ववेदसम् ' रूप का काल्प-निक स्वरूपोपबृ ंहण… 291–300
- शतपथब्राह्मण २ खरड ११३ - श्राहवनीयाग्नि में मनः प्राणवाक्सम्पत्ति के अधिष्ठाता होता, तथा श्रध्वर्यु, और प्रथमकर्त्तव्य की स्वरूप- निष्पत्ति १३४७ ११४ -… 301–310
- अथ - पञ्चमोऽध्यायः ५ अथ - शतपथब्राह्मण - हिन्दी विज्ञानभाष्ये - प्रथम काण्डे पञ्चमाध्याये - प्रथमं ब्राह्मणं, चतुर्थप्रपाठके च द्वितीयं “ प्रवरब्राह्मणम्… 311–320
- शतपथब्राह्मण २ खण्ड १३ - केनापि देवेन हृदिस्थितेन यथा नियुक्तो-S म्म, तथा करोमि १४ - आत्मसमपणात्मक भक्तियोग का पावन संस्मरण १५ - श्रन्तयमी की उपेक्षा से… 321–330
- शतपथब्राह्मण २ खण्ड ३७१ - द्युलोकस्थ खगोलीय तत्त्वविशेष का वृष्टिजनकत्त्व ३७२ - दोनों दृष्टिकोणों से विभिन्न एक तीसरे दृष्टिकोण का दिग्दर्शन ३७३ -… 331–340
- शतपथब्राह्मण २ खण्ड ७३५ - बायु नैवोद्धृतं तोयं वायुरेव प्रवर्षति, और कादम्बिनी ७३६- कृष्णवस्त्र -- धामच्छदमेघ --कृष्ण - जल --कृष्णमरुत् श्रादि से… 341–350
- शतरथब्राह्मण प्रथागारैरभ्यूहति- " भृगूणामङ्गिरसां तपसा तप्यध्वम् " - ( १ श्र ० १ = मं ० ) इति । एतद्वै तेजिए तेजो यद् भृग्वङ्गिरसाम्… 351–360
- शतपथब्राह्मण देवनाओं के लिए नाम बोल बोलकर उतना हीं हविद्रव्य लिया जाता है । उस सवय आज्य के लिए किसी देवता का नामोल्लेख नहीं होता! अतः ज्यग्रहण - ' महीनां… 361–370
- शतपथब्राह्मण गोल ) इस सम्वत्सरमुपर्ण का उत्तरपक्ष है । दक्षिण भाग ( दक्षिण गोल ) दक्षिणपक्ष है… 371–380
- द्वितीय अध्याय शतपथब्राह्मण प्रथम ब्राह्मण तपः- स्वरूप - दिग्दर्शनम् प्र. उङ्ग उस- ' तपः ' शब्द का उपस्थित होपड़ा है, जिसके साथ वत्तमान युग की प्रत्यक्ष… 381–390
- द्वितीयाध्याय शतपथब्राह्मण प्रथमत्राह्मण और यही है शब्दसृष्टि की मूलाधिष्ठात्री । तथैव स्वायम्भुव - ' स्थिति ' तत्त्व का ( वागात्मक -- ' जू ' तत्त्व का )… 391–400
- द्वितीयाध्याय शतपथब्राह्मगा द्वितीयब्राह्मण हैं । ये ही दोनों ( आपः ओषधि ) परस्पर मिल जाते हैं… 401–410
- द्वितीयअध्याय शतपथब्राह्मण द्वितीयब्राह्मण मनोमयी ब्रह्मप्रतिष्ठा पर प्रतिष्ठित इन्द्र और विष्णु में स्पर्द्धा होती रहती है… 411–420
- द्वितीयध्याय शतपथब्राह्मण द्वितीयाकारण है । घट पानी का आयतन है । ये सब अपने आधेयों के एकत: आधार हैं । मन के उपरि भाग में विषयों का प्रतिबिम्ब पड़ता है… 421–430
- द्वितीयअध्याय ) ( अग्नि रचन्वर ) ( वाक शाकर ) ( आप वैरूर्य : ) गौ मंडल अब ( ) वाक् मंडल अम्नि ( ) द्यौः मंडल ( टिङ् द्वितीयब्राह्मण शतपथब्राह्मण : पिण्ड →… 431–440
- द्वितीय अध्याय शतपथब्राह्मण तृतीयब्राह्मण स निनयति - " त्रिताय त्वा द्विताय वैकताय त्वा " - ( १ ० २३ मं ० ) इति । पशुर्ह वा एष आलभ्यते यत्पुरोडाशः । ५… 441–450
- द्वितीय अध्याय इ – छन्दस्याग्निः---४-सावित्राग्निः— तृतीयब्राह्मण शतपथब्राह्मण ७१५ का स्वरूप-प्रत्येक वस्तु का अपना एक ' अायतन ' अवश्य होता है… 451–460
- द्वितीयाध्याय शतपथब्राहाण तृतीयब्राह्मण त्याग्नि प्रतिफलित सौर अग्नि है । अतः त्रिवृत्स्थानीय एकता, और अग्नि पृथिवी के सम्बन्ध से स्वस्वरूप से पूर्ण… 461–470
- द्वितीयध्याय निष्कर्ष है । अधिभूतसम्बन्धी - आप्त्या विज्ञान-तृतीया शतपथब्राह्मण ७३५ परन्तु उक्त यज्ञकर्म्म की सिद्धि तभी होती है, जत्रा के आत्यारूप… 471–480
- द्वितीय अध्याय शतपथब्राह्मण तृतीयब्राह्मण होता हुआ भी पुरीष के सम्बन्ध से बुद्धि का व्याघातक है । अतः इसे न खाना हीं श्रेयस्कर है… 481–490
- द्वितीयाध्याय शतपथब्राह्मण तृतीयब्राह्मण प्रमाणों पर प्रति-श्रचतक गौपशु के सम्बन्ध में हमने जो कुछ बतलाया है, वह निम्नलिखित ष्ठित है--१ – ' इमे वैं लोका… 491–500
- द्वितीयश्रध्याय शतपथब्राह्मण तृतीयब्राह्मण ' हमेदस्तु पासा ' के अनुसार हृदयस्थान में एक श्वेत झिल्ली के आकार का सर्वशरीर - प्रति- । यही ' मेद ' कहलाता है… 501–510
- द्वितीय अध्याय शतपथब्राहाण चतुर्थत्राह्मण से वाहिर निकाल देता है । ( देवताओं की भाँति अध्वर्यु अन्तरिक्षादि लोकों में जाने में अस-मर्थ है | फिर इसने… 511–520
- द्वितीयाय श्राहवनीया--टि गाईपत्यः शतपथब्राह्मण : - तृतीयभाग तृतीयभाग २८. - तृती प्रभाग २८ लान श्रङ्ग --१६८ --सम्भूय - मध्यविन्दु २८ - तृतीय भाग २८… 521–530
- द्वितीय अध्याय शतपथवाह्मण चतुर्थब्राह्मण भूनि इस्थ अन्धकाररूप वृत्रप्राण के लिए विनाशक शस्त्र है । शस्त्र भी कैसा, महाकटोर, अव्यर्थ, विद्युद्-रूप… 531–540
- द्वितीयअध्याय शतपथब्राह्मण चतुर्थब्राह्मण ऋषिगण निदान उसी वस्तु को बनाते हैं, जिसमें निदान के द्वारा विदित होने वाली वस्तु के धर्म्म आंशिकरूप से ममाविष्ट… 541–550
- द्वितीयअध्याय शतपथब्राह्मण चतुर्थब्राह्मणप्र चन्द्रमा भूपिड का उपग्रह होने से सूर्य की अपेक्षा भूपिण्ड का अनुयायी रहता है… 551–560
- द्वितीय अध्याय शतपथब्राह्मण चतुर्थब्राह्मण निकालो । यदि तुम किसी समय अशुभ बोलोगे, और दुर्भाग्य से उस समय यदि तुझारे आत्मा में कामगवी का भोग होरहा होगा, तो… 561–570
- द्वितीय अध्याय शतपथब्राह्मण चतुर्थत्राह्मण शब्द, एवं मनोव्यापार के लिए ' निदिध्यासन ' शब्द प्रयुक्त हुए हैं… 571–580
- द्वितीय अध्याय शतपथब्राह्मण पञ्चमब्राह्मण तस्मादाहू: -- यावती वेदिः तावती पृथिवीति- एतया हीमां सर्वा समविन्दन्त । एवं ह वा इमां सर्वा ' सपत्नानां संवृक्त… 581–590
- द्वितीय श्रध्याय शतपथब्राह्मण पञ्चमब्राह्मण २ । ६ । १२ । ) इत्यादि रूप से पितृयज्ञ में, " लिखित्वा SS- हर त्रिरिति, हरत्याग्नीध्रः " ( शत ० ब्रा ० ७ | २२… 591–600
- द्वितीय अध्याय शतपथब्राह्मण पञ्चमत्राह्मण भूगोल - खगोल - विद्या का ऐसा विस्पष्ट निरूपण और किसी पुराण में नहीं हुआ… 601–610
- द्वितीययव्याय शतपथब्राह्मगा पादगम्यं तु यत् किश्चित् वस्त्वस्ति पृथिवीमयम् । स भूलोकः समाख्यातो विस्तारोऽस्य पुरोदितः । ३… 611–620
- द्वितीय ग्रध्याय शतपथब्राह्मण पञ्चमब्राह्मण दूसरी है भौगोलिक - गणितव्यवस्था | इस व्यवस्था में राजशासन व्यवस्था का कोई महत्त्व नहीं है… 621–630
- द्वितीयाध्याय १- मंरुत्रिलोकी--प्रथमकाण्ड पचमत्राह्मण मेरुबिन्दु को हमने पूर्व में दृश्य उत्तरी गोलार्द्ध का केन्द्र माना है… 631–640
- द्वितीयअध्याय प्रथमकाण्ड पञ्चमब्राह्मण अस्थान से, किंवा रेड्सी से एशियाखण्ड का प्रारम्भ होता है… 641–650
- द्वितीयाध्याय प्रथमकाण्ड “ स्येदु मातुः सवनेषु सद्यो महः पितु पपिवाञ्चार्थन्ना । मुषा यद् विष्णुः पचतं सहीयान् विध्यद्वराहं तिरो अद्रिमस्ता । १… 651–660
- द्वितीयाध्याय शतपथब्राह्मण पञ्चमब्राह्मण विम्ब ) पोमय परमेष्ठी - मण्डल में प्रतिष्ठित है । सत्य सूर्य के चारों ओर व्याप्त रहने वाले इसी समुद्र को लक्ष्य… 661–670
- दितिः ६३३ उत्त पाशुकाग्निः दितिः bl अध्याय शतपथब्राह्मण पञ्चमब्राह्मण प्राची सावित्राग्निः : अदिति द्वितीय अध्याय प्रथमकाण्ड पञ्चमब्राह्मण प्रकृत प्रकरण… 671–680
- द्वितीय अध्याय शतपथब्राह्मण पञ्चमत्राह्मण णित हो रही थी | अपने तथाविध प्रतिष्ठात्मक सौर- यज्ञिय तेज मे सदा समन्वित रहने के कारण हीं माता-पृथिवी प्रतिष्ठा… 681–690
- द्वितीयश्रध्याय शतपथब्राहाण पचमत्राह्मण दायविभागाख्यान के आधिभौतिक चरित्र में यह विस्तार से बतलाया जाचुका है कि, इसी भूपिण्ड पर किसी समय मनुष्यविध देवता,… 691–700
- तृतीय अध्याय मूलानुवादप्रकरण-प्रथमब्राह्मण प्रथमकाण्ड वेदिसम्पादनकर्म्मा समाप्त होचुका है । हवनीयद्रव्य ( प्राहुतिद्रव्य ) सम्पन्न हो गया है… 701–710
- तृतीय अध्याय ३ – पत्नीकृत ज्यावेक्षण ४ - आज्य स्थापन प्रथमब्राह्मण प्रथमकाण्ड ५ - श्राज्य एवं प्रोक्षणी का पत्रित्रों से उत्पवन ६ -- अध्यय् कृत… 711–720
- तृतीय अध्याय प्रथमब्राह्मगा प्रथमकाण्ड निर्वचन है । आत्मा शब्दप्रवर्तक है, दूसरे शब्दों में आत्मा से शब्द निकलता है, अतएव “ स्वनति " ( शब्दं करोति… 721–730
- तृतीयश्रध्याय प्रथमत्रा प्रथमकाण्ड नहीं करते, वचतक रोते ही रहते हैं । इसी आधार पर ब्रह्मन्थों में ' रुद्र ' शब्द का " सोऽरोदीन, तद्रु-इम्य रुद्रस्वम " (… 731–740
- तृतीय अध्याय प्रथमत्राह्मण प्रथम काण्ड शोणित का भूतभाग अवश्य ही आग्नेय है । परन्तु शोणित के गर्भ में रहने वाला प्रारा सौम्य है… 741–750
- यतीतायय दक्षिणादिक्-१. दक्षिणामारोह - ग्रीष्म ऋतु: " - श ० ५ | ४ | १ | २४ | २ -- " दक्षिणैव सर्वम् " - गो ० पृ ० ५१५ । ३ -- " अग्निना दक्षिणाम् ” ऐ ० १७… 751–760
- तृतीय अध्याय प्रथम ब्राह्मण येषां चेतसि मोह - मत्सर, मद- भ्रान्तिः समुज्जम्भते । तेऽयं दयया दयाघनविभो! सन्तारणीयास्त्वया… 761–770
- तृतीय अध्याय प्रथम ब्राह्मण प्रथमकाण्ड बस यहीं पर इसकी सत्यभाषण- मर्यादा समाप्त होजाती है । यही रहस्य श्रुति स्मृति के साथ सम्बन्ध रखता है | वेद को ति… 771–780
- तृतीयमध्याय द्वितीयब्राहाण शतपथब्राह्मगा [ अ ] जामिदोष का प्रवतक बनेगा, जो कि यदि ' गाय ये त्या त्रिशु मे त्वा ' इत्यादि रूप से [ नामनिर्देशपूर्वक ]… 781–790
- तृतीयध्याय द्वितीयत्रादाया सूत्रानुगतपद्धतिसंग्रहः जुहू में स्र वसे चार बार आज्यगूहण शतपथब्राह्मण ज्याक्षणकर्म के अनन्तर ' ज्यग्रहणकर्म ' होता है… 791–800
- तृतीय अध्याय द्वितीयब्राह्मण शतपथब्राह्मण रही है । ऐसे यज्ञात्मक इस पुरुषाकार के आधार पर ही, तदनुरूप ही क्योंकि इस वैधयज्ञ का विज्ञान होता है, श्रतएव इस… 801–810
- श्रीः अथ - शतपथब्राह्मण - हिन्दी - विज्ञानभाष्यं - द्विब्राह्मणात्मकं इध्म - परिधि - ब्राह्मणम् अथ - प्रथमकाण्डे - तृतीयाध्याये तृतीयं ब्राह्मणम्… 811–820
- तृतीय अध्याय तृतीय- चतुथ ब्राह्मण ३ -- वेदि पर बस्तियों से त्रिवत् रूप से आच्छादन – शतपथब्राह्मण ( प्रस्तरग्रहण - कर्म के सम्बन्ध में यह बतलाया गया है कि,… 821–830
- तृतीयध्याय तृतीय- चतुर्थ - त्राह्मण शतपथब्राह्मगा तिर्यगूरूप से प्रतिष्ठित करने का एक दूसरा यह भी कारण है कि ) वेदि पर प्रतिष्ठित प्रस्तर ( निदानेन ) तत्र… 831–840
- तृतीयअध्याय तृतीय- चतुर्थ- ब्राह्मण शतपथब्राह्मण मन्त्र बोलता हुआ बहु अध्वर्यु अपने हृह्य का स्पर्श करता है… 841–850
- तृतीय अध्याय तृतीय- चतुर्थब्राह्मण शतथपत्राह्मण के भाग में प्रतिष्टत रहते हैं । इसी केश लोमसम्पत्ति के संग्रह के लिए यहाँ प्रतिरूप - मद से ि छाई जाती है,… 851–860
- तृतीय अध्याय तृतीय- चतुर्थ ब्राह्मण शतपथब्राहाण प्रथमकाण्डान्तर्गत - तृतीय- अध्याय का चतुर्थ ब्राह्मण एवं तृतीय प्रपाठक का प्रथा ब्राह्मण उपक्रान्त… 861–870
- तृतीय- चतुर्थ अध्याय सामिधेनीब्राह्मण प्रथमकाण्ड स यावदस्य वशः स्यात् - एवमेवानुवित्रक्षेत् । तस्यैतस्य परिचना, उत साम्यवान्याद्,… 871–880
- श्री अथ - प्रथमकाण्डे चतुर्थाध्याये तृतीयं ब्राह्मणम् तृतीय पाठके च पञ्चमं ब्राह्मणम् [ सामिधेनी - ब्राह्मणानुगतञ्च चतुर्थ ब्राह्मणम् ] यथ - शान्तिकर्म-यो… 881–890
- तृतीय- चतुर्थ अध्याय सामिधेनीब्राह्मण प्रथमकाण्ड चले, शक्तिभर इसीप्रकार ( पूर्वोक्त अनवान रूप से एक ही श्वास में ) अनुवचन करने का प्रयास करे - ( स यावदेव… 891–900
- तृतीय- चतुर्थ अध्याय सामिधेनीब्राह्मण प्रथम काण्ड विदेघ के उक्त उत्तर पर पुनः गोल्म ने प्रश्न किया कि फिर आप के मुख से वैश्वानर अग्नि कैसे निकल पड़ा? (… 901–910
- तृतीय- चतुर्थ अध्याय सामि बेनीबार प्रथमकाण्ड गया है । " अग्निः पात्रक ईड्यः " इस मन्त्र भाग का यही तात्पर्य है कि, ' यह अग्नि निश्च-येन ( अपने दाहक… 911–920
- तृतीय- चतुर्थ अध्याय सामिधेनीत्राह्मण प्रथमकाण्ड ति कामपूर्ति के अभाव में अतिशय रूप से सन्तापजनक, स्वयमपि सन्तप्त, है… 921–930
- तृतीय- चतुर्थ अध्याय सामिधेनीत्राह्मण प्रथमकाण्ड ही सौरलोक “ स्वर्लोक " कहलाया है, जैसाकि ' स्वरहर्देवाः सूर्यः ' ( ० १ १ | २ | २ | १ ) इत्यादि श्रुति से… 931–940
- चतुर्थ अध्याय सामिधेनीब्राह्मण प्रथमकाण्ड अपने इस कृत्स्न सत्य को प्राप्त कर देवताओंने यह निश्चय किया कि, अपन यज्ञ कर के इस सत्य को त्रैलोक्य में फैलादें… 941–950
- चतुर्थ अध्याय सामिधेनीब्राह्मण प्रथमकाण्ड ' सङ्गीतरत्ना-नाद - श्रुति - स्वरात्मकं सङ्गीत के मर्मज्ञ सर्वश्री महाभाग शाङ्ख नादब्रह्म देव- का विरचित यशोगान… 951–960
- चतुर्थ अध्याय सामिधेनीब्राह्मण _प्रथमकाण्ड _____ -सुप्रसिद्ध – ' स्त्र्यक्'ट् इस उदाहरण से स्पष्ट है *… 961–970
- १ ३ I ५ स्वराः--देवाः ' ऋषयः नि कुल छन्दांसि वर्णनातयः ६ वर्णभावाः रसभावाः ८ भूमिः अभिव्यक्ति ) सा ( षडजस्वरः १ -प्रथमः-वह्निः : * ब्राह्मण क्षत्रियः… 971–980
- चतुथ अध्याय सामिधेनीब्राह्मण शतपथब्राह्मण यह तो हुआ नाद - श्रुति - स्वर - भावों का सङ्गीतानुगत, तथा उच्चारणानुगत - स्वरूप - समन्वय का प्रास-ङ्गिक… 981–990
- सामिधेनीब्राहाण प्रथमकाण्ड आत्रेयी योषित् ( स्त्री ) के आतव में अग्नितत्त्व ही प्रधान माना गया है, जैसे कि पुरुष के शुक्र में- ' सोम ' प्रधान माना गया है… 991–1000
- चतुर्थ अध्याय सामिधेनीब्राह्मण प्रथमकाण्ड डूबती हुई पृथिवी का समुदार है, जिस इस तथ्य का ही सुप्रसिद्ध ' वराहपुराण ' में विस्तार से यशोगान हुआ है… 1001–1010
- चतुर्थ अध्याय सामिधेनीवाह्मण प्रथमकाण्ड रेत: -सेक करने वाले का रेत योषा प्राण ( गर्भाशयगत योनिरूप आग्नेय प्राण - श्रार्त्तव ) में आहुत होता हुआ रेतःसेक… 1011–1020
- चतुर्थ अध्याय सामिधेनीवा प्रथमकाण्ड मानी गई । वही दोनों वंशों के वैवाहिक सम्बन्ध का कारण बना । क्षत्रियों का वैवाहिक सम्बन्ध पुरो-हितगोत्रों से ही होता है… 1021–1030
- चतुथ त्रध्याय सामिषेनी ब्राह्मण ऋचा ' पृथुमती ' है । तीनों की समष्टि लोकत्रयसम्पत्ति की संग्राहिका बनती है… 1031–1040
- चतुर्थ अध्याय सामिधेनीब्राह्मण अथ द्यायानुवचनोपपत्तिः प्रथमकाण्ड निंगदानुवचनानन्तर वह होता ' अमुकस्य पौत्रः ० ' इत्यादि रूप से आप मन्त्र का ऊह कर… 1041–1050
- चतुर्थ अध्याय आघारत्राह्मण शतपथब्राह्मण मन्त्रेण तमाघारयति - यं वाच आघारयति । निरुक्ता हि वाक्, निरुक्तो हि मन्त्रः || ६ || सीनस्तमाघारयति - यं मनस… 1051–1060
- चतुर्थ अध्याय श्राधारवाह्मण शतपथब्राह्मण युक्त होकर यह ( नीय ) अग्नि देवताओं के लिए यज्ञस्थ का वहन करे, ( सम्मार्जनकर्म्म की यही उपपत्ति है )… 1061–1070
- चतुर्थ श्रध्याय ग्रामात्राह्मण शतपथब्राह्मण परिधि का, तथा दो बार तूष्णीं, इसप्रकार तीन बार सम्मार्जन करता है… 1071–1080
- चतुर्थ अध्याय श्राघ । ब्राह्मण शतपथब्राह्मण श्रत सिद्धान्त के अनुसार वाक्तत्त्व का ऊर्ध्व वितान अवश्य होता है, तथापि यह स्वयं मनोमय हृद्य निरुक्तभाव तो… 1081–1090
- चतुर्थ अध्याय आधारब्राह्मण शतपथब्राह्मण विभक्तिभाव ही बाकू का विभक्तिकरणलक्षण व्याकरण है, एवं ज्ञानमूर्ति प्राज्ञ इन्द्र ही इस व्याकरण के प्रवर्त्तक हैं… 1091–1100
- पचमन्यध्याय प्रवरब्राह्मण ७- सम्मर्शन कर्म्म -शतपथब्राह्मण अथाध्वर्यु ं चाग्नीध्र ं च संमृशति । मनो वा श्रध्वर्युः वागू होता… 1101–1110
- पचन - अध्याय प्रवरब्राह्मगा शतपथब्राह्मण सूत्रानुगतपद्धतिसंगृहः-" आहवनीयाग्नि के दक्षिण भूप्रदेश में खड़े होकर श्राहवनीयाग्निज्वाला में समन्त्रक बागनुगत… 1111–1120
- पञ्चम श्रध्याय प्रवरब्राह्मण ३ – ग्रामप्रवस्कम्र्मोपपत्तिः— शतपथब्राह्मण ' अग्निर्देवो देव्यो होता ० ' इत्यादि मन्त्रपाठ के द्वारा अपने इस वैध यज्ञ में… 1121–1130
- पञ्चम अध्याय प्रवरब्राह्मण शतपथब्राह्मण कस्ता के लिए यह होता मनःस्थानीय अध्व का स्पर्श वाग्व्यापार प्रतिष्ठाशून्य है… 1131–1140
- पंचम श्रयमय स्त्र गब्राह्मण प्रथमकाउ के [ देवदेवता ] बन गए, जो कि [ आज उन का ] यह देवस्वरूप [ त्रैलोक्यात्मक सम्वत्सरमण्डल प्रतिष्ठित ] है | [ अर्थात्… 1141–1150
- पञ्चम अध्याय स गब्राह्मण प्रथमकाण्ड है । ग्रहण होता है दोनों का, प्रेरणा मिलती है एक के ग्रहण की… 1151–1160
- पञ्चम अध्याय स गब्राह्मण प्रथमकाण्ड फुस्टतमा है । इस पञ्चावयव विश्वयज्ञ ( आधिभौतिकयज्ञ ) से समुत्पन्न अध्यात्मसंस्था के आत्मा, शरीर, इन्द्रियवर्ग, ये तीन… 1161–1170
- पश्चम श्रध्याय ख गवाह्मण प्रथमकाण्ड ' सूर्यो ह वा अग्निहोत्रम् । तद्यदेतस्या अग्राहुतेरुदैन, तस्मात सूर्योऽग्निहोत्रम् | सयत सायमतमिते जुहोति य इदं… 1171–1180
- पञ्चम अध्याय स गत्राहारण प्रथमकाण्ड स्थलों में भी प्रकीर्णक रूप से इस विद्या का स्पीकरगा हुआ है… 1181–1190
- पञ्चम अध्याय ख गब्राह्मरण प्रथमकाण्ड विसृजातिम् ( E ) || ये देवा दिविभागा ये ऽन्तरिक्षभागा ये पृथिवीभागाः, त इमं यज्ञ-मत्रन्तु त इदं क्षेत्रमाविशन्तु त… 1191–1200
- पञ्चम श्रध्याय स्र गब्राह्मण ७१ प्रथमकाण्ड बतलाया गया है कि, अभ्रसमा ' लावन के अनन्तर ' यज ' - ये ' यजामहे ' इत्याकाराकारिता यजना-नुगति, एवं… 1201–1210
- या जाह्मण इति । स एषोऽग्निॠतुष्वाभक्त: - " समिधोऽश्रग्ने ” – “ तनूनपादग्ने ” – “ इडोऽअग्ने " -“ बर्हिरग्ने ” – ' स्वाहाग्निम् ' ( तै ० ना ० ३ | ५ | ५ | )… 1211–1220
- प्रयाजब्राह्मण यजन से यज्ञान्तलक्षण - स्वर्गावाप्ति हो सम्भव है । श्रपेक्षित यह है कि, यज्ञ - कर्त्ता यजमान यावदायुर्भोगपर्य्यन्त ऐहलौकिक सुख का भोग करता… 1221–1230
- प्रया जत्रा झगा ( दिव्य प्रजा को ) ही उत्पन्न करता है । इसीलिए ( प्रजोत्पत्ति के लिए ) इड्याग करता है || ४ || ( ४ ) - वह ( अध्वर्यु इड्याग के अनन्तर (… 1231–1240
- प्रयाजब्राह्मण ( पूर्वप्रकरण से यह निष्कर्ष निकलता है कि, प्रयाजदेवताओं का यजन पहिले होता है । इस निष्कर्ष के सम्बन्ध में - एक पूर्वपक्ष उपस्थित किया जा… 1241–1250
- प्रयाजब्राह्मण गतार्थ बन रहा है । इसके अतिरिक्त यदि एवंवित यजमान से स्वाभाविक मानुषभाव कोई द्वारा असत्कर्म्म भी हो जाता है, तो भी वह यज्ञसीमा से बाहिर… 1251–1260
- प्रयाजब्राह्मण नत्रप्रयाजपत्रे - इत्थम् - * १ – ' एको मम ० ' २ - ' द्वौ मम ० ' ३ – ' त्रयो मम ० ' एकादशप्रय जपते- इत्यम् १ - ' एको मम. ' २ - ' द्वौ मम ० '… 1261–1265