Shatpath Brahman 1 2 — पृष्ठ 1011–1020
शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - १-२ - मोतीलाल शास्त्री · पृष्ठ 1011–1020
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चतुर्थ अध्याय सामिधेनीवाह्मण प्रथमकाण्ड रेत: -सेक करने वाले का रेत योषा प्राण ( गर्भाशयगत योनिरूप आग्नेय प्राण - श्रार्त्तव ) में आहुत होता हुआ रेतःसेक करने वाले की अपेक्षा से ' ति ' भाव का अनुग्राहक बन रहा है । एब - बही सिक्क त १० मास के अनन्तर पूर्णावियव बनकर अपत्यरूप में परिणत होकर एवयामरुत् के प्रत्याघात से भूमिष्ठ बनता हुआ ' ऐति ' भाव का अनुग्राहक बन रहा है । रेतोद्रव्य सिञ्चक की दृष्टि से ' प्रेति ' है, एवं रेतोरूप अपत्य सिञ्चक की दृष्टि से ' एति ' है । हमें इस यज्ञकर्म में प्रजननकर्म्म अपेक्षित है । एवं प्राकृतिक प्रजननक ' एति प्रति ' भावात्मक है । उस का भी यहाँ सम्बन्ध होजाता है । यही ' एति प्रति ' भावात्मक अनुवचन की तीसरी उपपत्ति है । जिस यज्ञ से हमें यजमान के आध्यात्मिक शारीराग्नि के आधार पर दैवात्मा उत्पन्न करना है, उस में श्राध्यात्मिक यज्ञपुरुषवत् ' आत्मा शरीर ' दोनों भाग अपेक्षित हैं । आत्मा भोक्ता है, शरीर भोग्य है । यही भोग्य शरीर ' भोगायतन ' भी कहलाया है, भोग्य भी कहलाया है । श्रात्मवित्त अन्तर्वित्त, बहिर्वित्त - भेट से दो भागों में विभक्त है । शरीर इमका अन्तर्वित्त है, एवं ब्राह्म भौतिक परिग्रह बहिर्वित्त है । दोनों हीं ' पशु ' नामसे व्यवहृत हुए हैं | इस पशुसम्पत्ति के संग्रह के लिए भी ' एति प्रति ' भाव उपयुक्त होरहा है । पशु प्रातः जङ्गल में चरने जाते हैं, यही इन का ' प्रेति ' गच्छन्ति ] भाव है । सायङ्काल वापस लौट आते हैं, यही इन का ' प्रोति ' [ आगच्छन्ति ] भाव है । इसप्रकार पशुसम्पत्ति भी ' एति - प्रति ' भावात्मिका बन रही है । श्राने - जाने वाले पशु चेतन हैं । जिस प्राकृतिक पशुप्राण में इन पशुओं का स्वरूप - निर्माण हुआ है, वही पशुप्राण अन्तर्वित्तलक्षण शरीरात्मक पशुभाव का स्वरूप समर्पक माना गया है । इस सादृश्य से देवात्मा में पशु-- सम्पत्ति का भी आधान होजाता है, एवं अन्तवित्तलक्षणा शरीरसम्पत्ति का भी संग्रह होजाता है । यही ' एति - एति ' - भावात्मक अनुवचन की चौथी उपपत्ति है । अत्र बहिर्वित्त - लक्षणा बाह्य पशुसम्पत्ति का, जिसे कि हम आधिभौतिक सम्पत्ति कहेंगे, संग्रह करना शेष रह जाता है | यह काम भी इसी ' एति प्रेति ' भाव से गतार्थ बन रहा है । सम्पूर्ण भूत- भौतिक पदार्थ इसी ' ऐति - प्रति ' भाव से नित्य सम्बद्ध हैं । कुछ एक उदाहरण हीं इस दिशा में उपोलक मान लिए जाएँगे | त्रैलोक्य के गर्भ में प्रतिष्ठित यच्चयावत् भूत -- भौतिक पदार्थ इसी भावद्वयी से नित्य श्राक्रान्त हैं, जिसका " सम्भूतिं च विनाशं च यस्तद्वेदोभयं सह " ( ईश ० उ ० ) इत्यादि रूप से सर्वत्र प्रत्यक्ष किया जासकता है । सामान्य दृष्टि से विचार करने पर हम इस निश्चय पर पहुँचा करते हैं कि, विश्व, तथा विश्व-गर्भ में प्रतिष्ठित पदार्थ गतिशील हैं, संसरणशील हैं । अतएव इस प्रपञ्च को ' संसार ' कहा जाता है । इसी स्वाभाविकी गति से पदार्थों में अवस्था परिवर्तन हुआ करता है । इसी क्षणिक परिवर्तन के आधार पर दर्शन विशेष ' क्षणिकं क्षणिकम् ' सिद्धान्त स्थापित करने का साहस कर लिया है । परन्तु जब हम दृष्टि से विचार करते हैं, तो हमें यह मान लेना पड़ता है कि, इस गतिभाव के गर्भ में ' आगति ' भी प्रतीत हो रही है गतिभाव विनाश है, तो आगतिभाव सम्भूति है । दोनों का एक ही बिन्दु में समावेश होरहा है । प्रत्येक पदार्थ पूर्वरूप से नम्र होता हुआ ही उत्तररूप से सम्भूत है । बिगडता हुआ ही बन रहा है । इस चलाचल - ( चल - अचल ) - भावद्वयी से ही " सर्वमिदं चलाचलम् ” । इन दोनों में चलभाव ( गतिभाव ) प्रेति का स्वरूप- समर्पक बन रहा है, एवं अचलभाव - स्थिति-भाव एति भाव का अनुग्राहक बन रहा है । ११७६
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चतुर्थ अध्याय सामिधेनीब्राह्मण शतपथब्राह्मण आदान- विसर्ग की दृष्टि से भी इस ' एति - प्रेति ' की व्याप्ति के दर्शन किए जासकते हैं । प्रत्येक पदार्थ से उसके क्षर १ रमाणु विस्रसनधर्म्मा हृद्यप्रजापति के विस्रसनात्मक क्षरणधर्म से विस्वस्त होरहे हैं | साथ ही ' भैषज्ययज्ञ ' नामक प्राकृतिक कर्म के आदान के द्वारा इस निर्गत भाग की क्षतिपूर्ति भी होरही है । प्रतिवस्तु प्रत्येक क्षण में आदान- विसर्ग, दोनों भावों से नित्य श्राक्रान्त है । विश्व क्रियात्मक है । क्रिया गतितत्त्व है । प्रत्येक गति के गर्भ में ' आगति ' है, एवं प्रत्येक प्रगति के गर्भ में ' गति ' है । सूर्य्य की रश्मियों को देखिए । रश्मियाँ चलती हैं, परन्तु पीछे हटती हुई ' । ' अर्चश्वरति ' के अनुसार अपानन करते हुए ही रश्मियों का प्राणन होरहा है, जैसा कि ' अस्य प्राणदपानती ' इत्यादि मन्त्रवर्णन से स्पष्ट है | हमारी मार्गगति में एक पैर आगे बढ़ता हुआ ही चल रहा है, तो दूसरा पीछे हटता हुआ ही आगति का भी प्रवर्त्तक बन रहा है । प्रत्येक गति में गति अनुस्यूत है । चक्षुः - पटल भी इस प्राणन - अपानन से वञ्चित नहीं है । मार्ग में चलते हुए दोनों हाथों की गति पर दृष्टि डालिए । यहाँ भी आप को आगति, गति ये दोनों भाव उपलब्ध होंगे । शरीर का रुधिर भी सर्वत्र सञ्चार करता हुए दोनों का अनुग्राहक बन रहा है । कर्म्मनय विश्व में कोई भी पदार्थ ऐसा नहीं हैं, जिसमें ' एति प्रेति ' दोनों भावों का सम्बन्ध न हो । यही भौतिक जगत् का प्रातिश्विक धर्म है, जो कि इसे गायत्रब्रह्म के अनुग्रह से ही प्राप्त है । इसी आधार पर - ' गायत्री वा इदं सर्वम् ' ( छा ० उपनिषत् ) यह निगम प्रतिष्ठित हुआ है । यही आधिभौतिक - सम्पत्ति है । एति - प्रति पूर्वक अनुवचन से सर्वसाधारण में सामान्यरूप से व्याप्त इस सम्पत्ति का भी संग्रह होजाता है । यही एति प्रति भावात्मक अनुवचन की पाँचवी उपपत्ति है || ६ || तात्पर्य्यं यही हुआ कि, आधिदैविक, आध्यात्मिक, आधिभौतिक, तीनों के समन्वय से इस अधियज्ञ ( वैधयज्ञ -- दर्शपूर्णमास ) से दैवात्मा उत्पन्न करना है । इस की स्वरूप - सिद्धि के लिए हमें पाँच सम्पत्तियाँ अपेक्षित हैं । आधिदैविक - सम्पत्ति पहिली सम्पत्ति है, यजमानाग्निलक्षणा आध्यात्मिक - सम्पत्ति दूसरी सम्पत्ति है, बहिर्वित्तलक्षणा बाह्य भौतिक सम्पत्ति तीसरी सम्पत्ति है, अन्तर्वित्तलक्षणा शरीरसम्पत्ति चौथी सम्पत्ति है, एवं स्वयं यज्ञकर्म्म पाँचवीं सम्पत्ति है । एति प्रेति पूर्वक अनुवचन से पाँचों का संग्रह होजाता है | इसीलिए श्रुति ने पाँच उपपत्तियाँ बतलाई हैं । यही गायत्रानुगत एति - प्रति भाव की सर्वव्याप्ति का संक्षिप्त निदर्शन है, जिसके उपासक सतत ' एति प्रेति ' भाव से युक्त रहते हुए पूर्ण समृद्ध बने रहते हैं । सामिधेनी - कर्म क्यों किया जाता है?, सप्रणव हिङ्कारपूर्वक ही क्यों किया जाता है?, ११, १५, १७ संख्या का क्या रहस्य है १, अनवानन का क्या रहस्य है?, आद्यन्त के त्रिः - त्रिः - श्रावर्त्तन से क्या प्रयोजन अभिप्रेत है?, गायत्री छन्द का, एवं अग्निदेवता का सम्बन्ध क्यों अभीष्ट है? ' एति - प्रति ' पूर्वक अनुवचन क्यों किया जाता है?, इत्यादि उन प्रश्नों की, जिनका कि बहिरङ्गभाव से सम्बन्ध है - क्रमिक उपपत्ति बतलादी गई । अत्र यहाँ से आगे ( सन्तती - कण्डिका से ) पद्धतिप्रदर्शनपूर्वक सामिधेनी मन्त्रों की व्याख्या ही आरम्भ होती है । वही क्रमशः पाठकों के सम्मुख उपस्थित हो रही है । वेद के पश्चिम भाग में, दर्भासन पर खड़ा होकर ' होता ' उच्चारण करता है -अथवा वेदश्रोणि के उत्तर नाम का ऋत्विक सर्वप्रथम भाग में अध्वर्यु के द्वारा बिलाए हुए निम्नलिखित सामिधेनी मन्त्र का तीन बार १२८०
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चतुर्थ अध्याय सामिधेनीब्राह्मण प्रथमकाण्ड ( १ ) ' हिं- हिं - हि - ओम् ' प्रवो वाजा विद्यवो हविष्मन्तो घृताच्या । देवाञ्जिगाति सुम्नुयुः- ओम् ॥ ( १, २, ३, ) । " हिं- हिं- हिं- ओम् " इस सप्रणव हिङ्कार का उच्चारण केबल एकबार प्रथम मन्त्र के साथ ही किया जाता है । आगे के सम्पूर्ण मन्त्र केवल ' ओम् ' पूर्वक ही बोले जाते हैं । इस मन्त्र को ऋतुपरक भी लगाया जाता है, एवं अग्निपरक भी लगाया जासकता है । उभयथा श्रग्नितत्त्व ही अभिप्रेत है । कारण इसका यही है कि, अग्नि की सत्य, ऋत भेढ़ से दो अवस्था मानी गई हैं । सत्याग्नि स्वस्थान में प्रतिष्ठित रहता हुआ सम्वत्सरयज्ञ का साक्षी है, जिसके लिए ' तश्चत् तत् सत्यमसौ स आदित्यः ' ( शत ० ब्राह्मण ) यह कहा जाता है । इस सूर्य्यात्मक सत्य ( सहृदय - सशरीरी ) अग्नि ( जिसे गायत्रीमात्रिक वेदाग्नि भी कहा जाता है ) का जो प्रवर्ग्य भाग है, वही केन्द्र सम्पत्ति से वञ्चित होता हुआ ' ऋत ' कहलाया है । इस ऋत ( वायव्य ) अग्नि में ऋतसोम की आहुति होती है । ऋताग्नि दक्षिण से उत्तर की ओर जाया करता है, एवं ऋतसोस उत्तर से दक्षिण की ओर जाता हुआ इसमें बहुत होता रहता है । इस ऋताग्नि, तथा ऋतसोम के अन्तर्य्याम नामक चिति ( ग्रन्थिबन्ध ) सम्बन्ध से दोनों के पूर्वस्वरूपोपद्दन से जो एक तीसरा उभयात्मक स्वरूप उत्पन्न होता है, उसे ही ' ऋतु ' कहा जाता है । इस ऋतुसमष्टि का ही नाम ' सम्वत्सरयज्ञ ' है । इस प्रकार वही अग्नि ऋतावस्था में आकर सोम के सम्बन्ध से ' ऋतु ' बनता हुआ यज्ञ की प्रतिष्ठा बन रहा है । अतएव ऋतुपक्ष, तथा श्रग्निपक्ष, दोनों का अन्ततोगत्वा श्रग्निपक्ष में हीं पर्य्यवसान सिद्ध होजाता है । ' वाज, अभिदाय हविष्मन्त, घृताची ' ये चारों भाव इस यज्ञाग्नि के स्वरूप - रक्षक हैं । इह्रीं चारों के सम्बन्ध से साम्वत्सरिक यज्ञाग्नि स्वस्परूप से सुरक्षित रहता है । वाज सामान्यतः ‘ १ अन्न ' का बाचक माना गया है । वस्तुतः ' बाज ' उस तत्त्व का नाम है, जो अब रूप से सूर्य्य से भी ऊपर आपोमय परमेष्ठी ( जनल्लोक ) में प्रतिष्ठित रहता है । पारमेष्ठ्य अपतत्त्व ' आपः - वायुः - सोम ' भेद से तीन भागों में विभक्त है । इनमें जो की सोमावस्था है, वही ' बाज ' है । गायत्री जिस सोम का अपहरण करती है, वह भी सोम है, चान्द्रमण्डल में भी सोम है । परन्तु यह ' बाज ' नामक परमेष्ठ्य सोम अपनी तत्रत्या अबस्था से दोनों से भिन्नधर्म्मा है । इसे ब्रह्मवीर्य्य का संग्राहक माना गया है, जैसाकि - ' वीर वै बाजाः ' हविर्यज्ञ में चान्द्र सोम का सम्बन्ध है, सम्बन्ध है । एवं प्राकृतिक वाजपेययज्ञ में इस ( शत • ३।३।४।७ ) । इत्यादि से स्पष्ट है । प्राकृतिक नित्य साम्वत्सरिक ज्योतिष्टोम में सौररश्मिमुक्त ज्योतिर्म्मय सोम का ब्रह्मवीय्य - प्रवर्त्तक, अतएव ' २ ब्रह्मणस्पति ' नाम से प्रसिद्ध पवित्र ' बाज ' नामक पारमेष्ठथ सोम का १ – ' अन्नं वै वाज: ' ( तां ० म ० ब्रा ० ( १३ । ९ । १३ ) । २ - ' पवित्रं ते वितं ब्रह्मणस्पते प्रभुर्गात्राणि पर्येपि विश्वतः । तनूर्न तदामो अश्नुते भृतास इद्वहन्तस्तत् समाशत ' - ऋ ० सं ० ६८८३ | १ | १२८१
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चतुथ अध्याय सामिधेनीब्राह्मण शतपथब्राह्मण सम्बन्ध है | अतएव ' वाजपेय ' यज्ञ का एकमात्र अधिकारी ब्राह्मण ही माना गया है । अतएव इसे ' बृहस्पतिसत्र ' भी कहा गया है । " बृहस्पतिः पूर्वेपामुत्तमो भवति, इन्द्र उत्तरेषां प्रथमः ' के अनुसार परमेष्ठी नामक पूर्वग्रहों के अन्त में ( परमेष्ठी की सीमा पर ) वाजपेय यज्ञ के प्रवर्तक बृहस्पति प्रतिष्ठित हैं, जो कि सुप्रसिद्ध ' बृहस्प-तिग्रह ' तथा ' लुब्धकत्रन्धु ' नामक नात्रिक बृहस्पति से सर्वथा विभिन्न तीसरा पारमेष्ठ्यग्रह माना गया है | सौर इन्द्र सूर्य - चन्द्रमा पृथिवी नामक उत्तरग्रहों से पहिला है । उस ओर की अन्तिम सीमा में बृहस्पति है, एवं इस ओर के उपक्रम में इन्द्र है, वही तात्पर्य है । बृहस्पति ब्रह्मात्मक ब्राह्मण की प्रतिष्ठा है, एवं सौर इन्द्र क्षत्रात्मक क्षत्रिय की प्रतिष्ठा है । बृहस्पतिवत् इन्द्र के साथ भी वाज का सम्बन्ध होरहा है । क्योंकि दोनों सीमापेक्षया समीप हैं । अतएव आगे चलकर श्रुतिने वाजपेय का राजन्य को भी अधिकारी मान लिया है । इसप्रकार वाजपेय का इन्द्र से भी सम्बन्ध अवश्य है, परन्तु वस्तुतः वाजपेय ब्रह्मात्मक ही माना जायगा । इसी आधार पर श्रुति का " ब्रह्म वै वाजपेयः " ( तै ० प्रा ० १ | ३ | २४ | ) यह निगम प्रतिष्ठित है । इस वाज के सम्बन्ध से ही पारमेष्ट्य आप्यपशु ' वाजी ' कहलाया है । इस ' वाजी - प्रारण ' का जिस अश्वजातिविशेष में प्राधान्य रहता है, उस अश्वजाति को भी ' वाजा ' कहा नाता है । प्रकृत में उक्त वाज - स्वरूप दिग्दर्शन से यही बतलाना है कि, इसी पारमेष्ट्य वाजरस की दूसरी अवस्था का नाम ज्योतिर्म्मय सोम है, जिसकी आहुति से ही सौर कृष्णाग्नि ज्योतिर्मय बना हुआ है । तृतीयावस्था चान्द्रसोम है | चौथी अवस्था श्रोषधियाँ ( गोधूमादि ग्रन्न ) हैं । चान्द्रसोम ही प्रवर्ग्य सम्बन्ध से ओषधियों का स्वरूप - सम्र्पक बनता है । पशुओं में भी परम्परया वही वाजरस प्रतिष्ठित है । ऋतुएँ ( ऋताग्नि ) भी इसी वाजरस से परिपुष्ट हैं । वाजरस की इसी व्याप्ति के आधार पर निम्न लिखित निगम प्रतिष्ठित हैं-१ – " वा जो वै पशवः " ( ऐ ० ब्रा ० ५८ । ) । २– “ ओषधयः खलु वै वाजाः " ( तै ० ब्रा ० १।३ ७ १ ) । ३ – " ऋतवो वै वाजिनः " ( शत ० ब्रा ० २।४।४।२२ ) । यह वाजरस सर्वथा अग्नि को समिद्ध करने वाला है । पारमेध्य वाज ब्रह्माग्नि की, ज्यो-तिर्म्मम बाज सम्बत्सराग्नि की, चान्द्रबाज श्रोषध्यग्नि की, एवं ओषधिवाज शारीराग्नि की प्रदीप्ति —— ' स वा एप ब्राह्मणस्यैव यज्ञः यदेनेन बृहस्पतिरयजत । ब्रह्म त्रि बृहस्पतिः । ब्रह्म हि ब्राह्मणः । ' ( शत ० ५ । १ । १ । ११ ) । * - ' अथो राजन्यस्य ( वाजपेगः ) - यदेनेन - इन्द्रोऽयजत । क्षत्रं हीन्द्रः, क्षत्रं राज -न्यः " ( शत ० ५।१।१।११ ) । १२८२
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चतुथ अध्याय सामिधेनीब्राह्मण प्रथमकाण्ड का कारण बन रहा है । क्योंकि वाजरस से अग्नि समिद्ध रहता है, अतएव इसे हम अवश्य ही अग्नि का स्वरूप - रक्षक कह सकते हैं । दूसरा रक्षक है- " अभिद्यव " । पक्षाग्नि का ही नाम अभिद्यव है । श्रवयवी की रक्षा, पुष्टि, तुष्टि, तृप्ति अवयवों की रक्षादि पर ही निर्भर है । सम्वत्सराग्नि अवयवी है, पक्षाग्नि अवयव हैं । इन अवयवों से ही उस अवयवी की स्वरूप - रक्षा होरही है । त: इन " 6 भिद्य " नामक पर्वाग्नियों को भी हम अग्निस्व-रूप - रक्षक मान सकते हैं । ' वि ' से औषधिरूप अन्न, भौतिक शरीर, दोनों ग्रभिप्रेत हैं । भौतिक शरीर श्रायतनरूप से अग्नि का रक्षक है, एवं अन्न आहुतिरूप से अग्नि की रक्षा कर रहा है । अन्न एवं भूत, दोनों हीं मर्त्य होने से पशु हैं । श्रुति ने ' हविष्मन्तः ' का पशु अर्थ किया है । श्रान्तरिक्ष्य वायु में ग्राज्य की मात्रा प्रतिष्ठित रहती है, जैसा कि ' नृतमन्तरिक्षस्य ' ( शत ० ७ | ३२ | ३ | ) इत्यादि से प्रमाणित है । इसी प्राज्याहुति से अग्नि अतिशयरूप से समिद्ध रहता है । श्राज्याहुति देने वाले वायु हैं, यही प्राकृतिक यज्ञ के जुहू स्थानीय ' घृताची ' हैं । इसप्रकार मन्त्र में पटित वाजादि चारों शब्द अग्नि - समिन्धन का भाव ही स्पष्ट कर रहे हैं । इन चारों रक्षकों से युक्त उस दिव्याग्नि का यहाँ ग्राधान ही प्रकृत अनुवचनक से अभिप्रेत है । उसके प्रधान से स्वर्गसुख्वार्थी ( सुम्नुयु ) यजमान यज्ञ के द्वारा दिव्यदेवताओं की सम्पत्ति प्राप्त करने में समर्थ होजाता है । इसी सामयिक अर्थ को लक्ष्य में रख-कर मन्त्र ने कहा है कि--' हे.ने! घृताची के द्वारा वाज, पक्ष, पशु आदि सम्पत्तियाँ ( आपको समिद्ध ने के लिए ) प्रादुर्भूत होतीं हैं । इनके प्रादुर्भाव से ( आपके समिद्ध बन जाने पर ) यज्ञकर्त्ता यजमान देवभाव को प्राप्त करने में समर्थ होजाता है । ' उक्त ऋचा में क्योंकि ' प्र ' उपसर्ग आया है, गायत्री के ‘ प्रेति ' ( गच्छति ) भाव का संग्राहक मानेगे । करने के अनन्तर होता निम्न लिखित ( मौलिक रूप से दूसरी, वचन करता है -अतएव इसे हम ' प्रवती ' ऋचा कहेंगे, एवं इसे इस प्रथम मन्त्र के त्रिरावृत्तिपूर्वक अनुवचन तथा संख्या क्रम से चौथी ) सामिधेनी का अनु-( २ ) - " औं अग्न आयाहि वीतये गृणानो हव्यदातये । नि होता सत्सि बर्हिषि - ओम् ' ( ४ ) इति । प्राकृतिक दिव्याग्नि स्वमण्डल से भूलोक की ओर आता है । यहाँ भलोक ही उसकी प्रतिष्ठा बनता है | इस भूलोक को याज्ञिक परिभाषा में ' बर्हि ' कहा जाता है । पितृपरिभाषा में ' आग्नेय - सौम्य - समशी-तोष्ण ' भेद से तीन प्रकार के ' अन्नपित्तर ' माने गए हैं । सूर्योपलक्षित द्युलोक श्राग्नेय बनता हुआ ' उडाण ' है | चन्द्रपोलक्षित अन्तरिक्ष सौग्य होने से ' शीत ' है । एवं भूलोक अग्नि- सोम के समसमन्वय से अनुष्णा-शीत ( न उष्ण न शीत, है । इस अनुष्णाशीत भूलोक का निदान ' बर्हि ' ( दर्भ ) माना गया है । कारण १२८३
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चतुर्थ अध्याय सामिधेनीब्राह्मण शतपथब्राह्म इसका यही है कि, पारमेष्ठ्य शीत अपतत्त्व का जो भाग सौरमण्डल के अग्नि से मिलकर ' वेन ' कहलाता है, वही ' अपू - अग्नि ' के समसमन्वय से अनुष्णाशीत है । अग्नि के सम्बन्ध से पानी का शैत्य हट जाता है, एवं अपसम्बन्ध से अग्नि की उष्णता शान्त होजाती है । ऐसे अनुष्णाशीत वेनतत्त्व से ही ' बर्हि ' ( दर्भ-डाम ) की उत्पत्ति हुई है, जैसाकि पूर्व में भाग्य के प्रथमखण्डान्तर्गत दर्भेत्पत्ति - त्रिज्ञान - प्रकरण में विस्तार से बतलाया जा चुका है । इसी सादृश्य से बर्हि को तत्समानधर्म्मा भूलोक का प्रतिरूप मान लिया गया है । इसी आधार पर दिव्याग्निगत पितरों को ' अग्निष्वात्ता ', अान्तरिक्ष्य सोमगत पितरों को ' सोमसत् ', एवं अनुष्णाशीत भूलोकस्थ पितरों को ' बर्हिपत् ' कहा गया है । यहाँ इससे यही बतलाना है कि, द्यलोक से आने वाले दिव्याग्नि की प्रतिष्ठाभूमि वह भूलोक ही बनता है, जिसे निदान - विधि से ' बर्हि ' कहा गया है । प्रसङ्गतः यह और ध्यान रखना चाहिए कि, पार्थित्र अतत्त्व, तथा दिव्य अग्नितत्त्व, दोनों के समन्वय से ही पार्थिव - प्रजा की उत्पत्ति हुई है । सौम्य शुक्रभाव अग्नि - गर्भित अपतत्त्व है, एवं श्राग्नेय शोणित सोमगर्भित अग्नित्त्व है । दोनों का दाम्पत्यभाव ही प्रजास्वरूप का कारण है । इस दृष्टि से प्रजा को भी ' बर्हि ' कहा जासकता है । योषधियों में भी पार्थिव अग्नि, वृडिजल रूप से दोनों का समन्वय है, अतः इहें भी ' बाई ' कहा जा सकता है । चतुष्पाद पशुओं में भी पार्थिव अब्रूस, तथा दिव्य अग्निरस का समसमन्वय है । अतः इहें भी ' बर्हि ' कहा जासकता है । इसप्रकार अवग्नि - समन्वित अनुष्णाशीत तत्त्व की दृष्टि से ' बर्हि शब्द निदानेन अनेक स्थानों में अभिव्याप्त होरहा है । द्य लोक से चलकर इस ' बईि ( भष्ठ ) पर आने वाला वह अग्नि अपने साथ प्राणदेवताओं को भी लाता है । " अग्निः सर्वा देवताः " " के अनुसार प्राणाग्नि के गर्भ में हीं सम्पूर्ण दिव्यदेवता प्रतिष्ठित हे | इस ग्राह्वानलक्षण सहप्राप्ति से भी इस भूलोकस्य दिव्य अग्नि को ' होता ' कहा जासकता है । साथ ही यह पार्थिव रसों का आदान करता हुआ इससे देवतृप्ति का कारण बनता हुआ ' हवन ' साधक बनने से भी यह ' होता ' कहा जासकता है । आगत अग्नि का पहिले स्वयं का पार्थिव अन्नरस से सम्बन्ध होता है । अनन्तर इस हवि का प्राणदेवताओं से सम्बन्ध होता है । यही उस अग्नि का मुख्य कर्म है । प्रकृत मन्त्र ने इस अग्निकर्म का वैधयज्ञ की दृष्टि से स्पष्टीकरण करते हुए कहा है कि— दिव्याग्ने! आप पार्थिव रसरूप हविर्भक्षण के लिए, तथा प्राणदेवताओ में इस हवि को पहुँचाने के लिए [ द्युलोक से भूलोक पर्य्यन्त ] व्याप्त होते हुए भूलोक धारिए | * १ - " श्रयं वैं लोका ( भूलोको ) बर्हिः " ( श ० ११८२।११ । ) । - " प्रजा वै बर्हिः ' ( तै ० प्रा ० ११६ | ३ | १० | | |
_ " ओषधयेो वै बर्हिः " ( शत ० । १ । ३ । ३ । ६ ॥
- “ पशवेा नै बर्हिः " ( ऐ ० ब्रा ० ५ । २ । ७ । ) । - " शरद्वं बर्हिः ” ( शत ० १ | ३ | ४ | १० ) । १२८४
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चतुर्थ - अध्याय सामिधेनीब्राह्मण प्रथमकाण्ड यहाँ होता के रूप से इस बर्डि [ भूलोक ] पर विराजिए, [ लोक से भूलोक पर्यन्त अग्नि का व्याप्त होना हीं इस आधिदैविक - पक्ष में अग्नि का स्तवन-कर्म्म हैं ) । " हे दिव्याग्ने! ( होता के सामिधेनी- कम्म से बुलाए जाते हुए ) आप यज्ञिय-हवि ग्रहण के लिए, तथा इस हवि का देवताओं में पहुँचाने के लिए इस यज्ञसंस्था में पधारिए, एवं इस कुशासन पर होता बन कर विराजिए " । उक्त ऋचा में क्योंकि ' आङ ' उपसर्ग आया है, अतएव इसे ' आवती ऋचा ' कहा जायगा । एवं इसे गायत्री के ' एति ( आगच्छति ) भाव ' का ही संग्राहक माना जायगा । इसप्रकार इन दोनों के अनुवचन से होता ' एति - प्रंति ' भाव का ही सग्रह करने में समर्थ होजाता है, जैसाकि ब्राह्मण की सातवी कण्डिका से स्पष्ट है ॥ ७ ॥
यज्ञेतिकर्तव्यता से सम्बन्ध रखने वाले कम्मों का वज्ञानिक रहस्य अवश्य होता है । परन्तु उसका समन्वय श्रीत - पद्धतियों, निगमानुगमवचन - प्रमाणों के आधार पर ही करना चाहिए । अपनी कल्पना से चाहे जो उपपत्ति मानते हुए, पद्धति के विरुद्ध जाना विज्ञानसम्मत नहीं, किन्तु अज्ञानसम्मत है । वर्त्तमान युग में तो ऐसे वेद वैज्ञानिकों की कमी है ही नहीं * । किन्तु पुरायुग में भी किसी किसी को विज्ञान का जीर्ण होजाता था । पद्धति के अनुसार उक्त दोनों मन्त्र ' प्र ' के सम्बन्ध से क्रमशः स्पष्ट ही यद्यपि ' पराक् — अर्वाक ' दोनों भावों के संग्राहक बन रहे हैं । परन्तु वैज्ञानिक --- बन्धुश्रीने पद्धति विरुद्ध अपने व्यक्तित्वविमोहन से यह कल्पना कर डाली कि, ' प्रत्रो बाजा ० ' और ' अग्न आयाहि ' दोनों ऋचाएँ गायत्री के ' प्रेति ' भाव का ही संग्रह कर रहीं हैं । उपपत्ति आप इसकी यह बतला रहे हैं कि, ' प्र ० ' इत्यादि तो ' प्रतिभाव ' से सम्बद्ध है ही । एवं ' अग्न आ ' से श्रागमन बतलाया है, वह जहाँ से ( द्युलोक से ) इसका श्रागमन होता है, वहाँ के देवताओं की अपेक्षा तो इसका पराग्गति रूप प्रयाण ही सिद्ध होता है । सम्भवतः इन वैज्ञानिकों को यह न सूझा कि, इस समय उस यजमान के यज्ञ में इन मन्त्रों का प्रयोग होरहा है, जिसकी अपेक्षा ' अग्न श्रायाहि ० ' का अर्थ अर्वागतिलक्षण श्रागमन ही होसकता है । फलतः उक्त मत का भलीभाँति अवैज्ञानिकत्त्व सिद्ध हो -जाता है ॥ ८ ॥
पूर्व में दोनों मन्त्रों का जो वैज्ञानिक अर्थ हुग्रा है, उसे श्रति अपने शब्दों में स्पष्ट करती हुई कहती है कि, ' प्रति ' भावात्मिका प्रथमा ऋचा के ' प्र वा बाजा ' इस पद का ' बाज ' शब्द ' अन्न ' का, ' अभियव ' शब्द ' पक्षों ' का, एवं ' हविष्मन्त ' शब्द ' पशुसम्पत्ति ' का अनुग्राहक है, जैसाकि पूर्व में स्पष्ट कर दिया गया * व्यक्तित्वविमोहनामिका इत्थंभूता वेदभक्ति का ही यह दुष्परिणाम है कि, आज अपनी मान्यताओं के अनुसार युगधर्म्मानुगता वर्त्तमाना राजनीति, समाजनीति, साम्यवाद, आदि आदि के अनुबन्ध से वेद के अनेक कल्पित अर्थ किए जारहे हैं, जिनका वेद के पारिभाषिक समन्वय से संस्पर्श भी नहीं है । १२८५
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चतुर्थ अध्याय सामिधेनीब्राह्मण शथपथब्राह्मण है । " वाज, अभिधव, हविष्मन्त, घृताची " इन चारों की एक दूसरी वैज्ञानिक व्याख्या का भी समन्वय कर लीजिए । यज्ञकर्म्म मे दैवात्मा उत्पन्न करना है, यह अनेक बार कहा जा चुका है । उत्पन्न प्रजा की समृद्धि जिन भावों से सम्बद्ध है, इन नारों शब्दों से उही समृद्धियों की प्राप्ति हुई है । अन्नसम्पत्ति, पशुसम्बत्ति, वीर सम्पत्ति, और भोग्यशक्ति, ये ही वे चार समृद्धियाँ हैं, जिन से प्रजा सुसमृद्ध । मानी जाती है । अन्नसम्पत्ति का ' वाज ' से, पशुसम्पत्ति का ' हविष्मन्तः ' से ब्रहण हुआ है । जिसप्रकार त्रिवृत् ( ६ ) संख्या अग्नितत्त्व से समतुलित है, वैसे ही पञ्चदशसंख्या इन्द्रतत्त्व से समतुलित है । यही इन्द्रतत्त्व प्राणरूप से भीक्ता बनकर अध्यात्मसंस्था में प्रतिष्ठित रहता है । ' अभिद्यव ' शब्द ' पक्ष ' का वाचक है | पक्ष १५ संख्या का अनुग्राहक है । यह संख्या भोक्ता इन्द्रप्राण की अनुग्राहिका है । इसप्रकार परम्परया ' अभिद्यव ' शब्द भोग्यशक्ति का ही संग्राहक बन रहा है । भोक्ता को भोग्य अन्न - पशु से सम्बद्ध बनाए रखना वीर्य का काम है । ' घृताची ' पद उसी ' अग्निवीर्य ( अन्नादवी ) का मग्राहक बन रहा है ॥ ६ ॥
मन्त्र में ' घृताच्या ' पद है । अग्निसमिन्धनकर्म में प्रयुक्त होने वाली ऋचा के ' घृताच्या ' पद का अन्य सब - पदों की अपेक्षा विशेष महत्त्व है । श्रुति ने एक पुरातन मानुष इतिवृत्त के द्वारा * इस पद के इसी महत्त्व का समर्थन किया है । बहुत सम्भव है कि, कतिपय पाठक अभिनिवेशवश इस ग्राख्यान को ' मानुषेतिवृत्त ' न समझें । परन्तु जिन स्पष्ट शब्दों में श्रुति ने स्थान- नाम - घटना - नदी- पर्वत- राजा-पुरोहित - ग्राम - कृषियोग्य भूमि - ब्राह्मण निवास - राज्य सीमा, आदि भावविशेषो का त्र्याख्यान में उल्लेख किया हैं, उहें सामने रखते हुए प्रस्तुत इतिवृत्त का ' मानवेतिवृत्तता ' में यत् किञ्चित् भी तो सन्देह नहीं रह जाता | जिस अपौरुषेयता की रक्षा के लिए हमारे कतिपय पाठक मानवेतिवृत्त से पराङ्मुख होते हैं, उनका वह भय उस समय दूर होजाता है, जबकि वे वेदापौरुषेयत्व का वास्तविक तात्पर्य समझ लेते हैं, जिसका कि उपनिषद्वि-ज्ञानभाष्यभूमिका - खण्डत्रयात्मिका में महारम्भ से प्रतिपादन हुआ है । अस्तु, प्रकृत में इस श्रौत श्राख्यान को विशुद्ध मानबेतिवृत्तपरक मानते हुए ही हमें कथानक का समन्वय करना है । " सुप्रसिद्ध स्वयम्भू ब्रह्मा के मानसपुत्र, अतएव ' स्वायम्भुव ' नाम से प्रसिद्ध ' विवस्वान् ' नामक श्रादित्य सूर्यवंश के आदिप्रवर्त्तक माने गए हैं । इनके ' श्रद्धादेव ', तथा ' बम ' नामक दो औरसपुत्र उत्पन्न हुए | यही श्रद्धादेव भारतवर्ष के प्रथम सम्राट कहलाए, साथ ही ये विवस्वान् के पुत्र होने से ' वैवस्वत मनु ' नाम से भी प्रसिद्ध हुए, जैसाकि- “ मनुर्वैवस्त्रतो राजेत्याह । तस्य मनुष्या विशः ( प्रजाः ) । तऽइमऽआसत-इत्यश्रोत्रिया गृहमेधिन उपसमेता भवन्ति ' ( शत ० ब्रा ० १३ | ३ | ३ | ६ | ) इत्यादि वाजिश्रुति से माणित है । भारतवर्ष के प्रथम सम्राट् श्रद्धादेवमनु श्रवश्व थे, परन्तु इनका यहाँ स्थायी निवास नहीं हुआ । अपितु ये जीवनपर्यन्त अपनी जन्मभूमि उत्तर * कुरुक्षेत्र में ही रहे । इनके इक्ष्वाकु - प्रमुख १० पुत्र थे, एवं ' इला ' * - मानवचरित्रानुगता ऐतिहासिक घटना के द्वारा * - यह कुरुक्षेत्र उस ' प्राचीसरस्वती ' के सन्निकट था, जिसे आज ' बालकशकील ' कहा जाता है, जो कि आज भी उत्तररूस में प्रवाहित है । भौम- मनुष्यदेवता इसी में ' अवभृथस्नान ' ( यज्ञान्तस्नान ) करते थे । इसी कुरुक्षेत्र की प्रतिकृति पर भारतवर्ष में भी ' कुरुक्षेत्र ' व्यवस्थित हुआ था । १२८६
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चतुर्थ अध्याय सामा प्रथमकाण्ड नाम की एक कन्या थी । उयाकु ही अयोध्यापति सूर्यवंशी प्रथम भारतीय सम्राट् यहाँ के निवासी बने । ये ही अगली पीढ़ियों के मूलपुरुष मान गए । एवं इला से आगे जाकर चन्द्रवंश का विकास हुआ, जैसा कि " बहिरङ्गपरीक्षात्मक - गीताभूमिका प्रथमखण्ड " के ' सन्दर्भसङ्गति ' नामक प्रकरण में विस्तार से प्रतिपादित है । इसी सूर्यवंश में उत्पन्न महाराज ' निमि ' के साथ ही हमारे प्रकृत इतिवृत्त का सम्बन्ध है । आज जो जनकादि विदेहों का स्वतन्त्र राज्य इतिवृत्तों में सुना जाता है, किसी समय वे अयोध्या - राज्य में ही अन्तर्भूत थे । विदेहों के पूर्वपुरुष अयोध्या - सम्राट् के सामन्त राजाओं ( छुटभयों ) में से थे । दोनों के कुलपुरोहित महर्षि वसिष्ठ थे । एकवार विदेही के पूर्वरुप महाराज ' निमि ' ने यज्ञ करने की इच्छा से कुलपुरोहित वसिष्ठ का आमन्त्रण किया । उस समय वसिष्ठ देवताओं के द्वारा वितत यज्ञ में ऋश्विकत्वेन वृत होकर स्वर्ग ( प्राग् - मेरु -- प्रदेशस्थ भौमस्वर्ग ) जाने वाले थे । वहाँ के अनुरोध को महत्त्व देते हुए वसिष्ट स्वर्ग चले गए । महाराज निमि को कुलपुरोहित की यह उपेक्षा असा हुई । फलसः इहोंने मर्यादा विरुद्ध, उस समय के प्रसिद्ध याज्ञिक, रहूगण के पुत्र, अतएव ' राहूगरण ' इस उपनाम से प्रसिद्ध महर्षि गोतम के सहयोग से अपना यज्ञकर्म्म सम्पन्न करा लिया । थोड़े समय पीछे स्वर्ग से परावर्तित होने पर जब वसिष्ठ ने यह सुना कि, निमि ने गोतम के पौरोहित्य में यज्ञ - सम्पादन कर लिया है, तो उन्होंने मर्य्यादा भङ्गनिमित्त निमि को यह शाप दे डाला कि, " तुम इसी क्षण इस यज्ञाग्नि से नष्ट हो जाओ " राजा भी पहिले से तो क्रुद्ध थे ही, वसिष्ठ के इस शाप से और भी उत्तेजित राजा के मुख से भी यह निकल पड़ा कि, ' आप का भी नाश हो ' । परिणामत: दोनों हीं भस्मीभूत होगए । महर्षि गौतम के सम्मुख हीं यह घटना घटित हुई । उस ब्रह्मवेत्ता सर्वसमर्थ ऋषि ने दोनों के भस्म का सञ्चय कर अर्शण से अग्निमन्थन आरम्भ किया । मन्थन प्रक्रिया से उत्पन्न यज्ञाग्नि में आहुति देकर दोनों को पुनर्जीवित कर दिया | क्योंकि महाराज निमि का पुनः प्रादुर्भाव ' मन्थन ' से हुआ, अतएव यहाँ से ये ' मधु ' नाम से प्रसिद्ध हुए । ह्री को यत्र तत्र ' मिथि ' नाम से भी व्यवहृत किया गया । इन मधु के पुत्र ही आगे शकर ' विदेह मायच ' नाम से प्रसिद्ध हुए । उक्त घटना की ग्लानि का विदेह माथत्र के ऊपर यह प्रभाव पड़ा कि, उह्नोंनें भविष्य के लिए अन्यत्र चला जाना हीं श्र ेयस्कर समझा । इस संकल्प को पूरा करने के लिए उन्होंनें अपने श्राध्यात्मिक वैश्वा-नरग्नि का वागिन्द्रिय से संयम करते हुए यह प्रतिज्ञा की कि, " जहाँ, जिस प्रदेश में हमारा वैश्वा-नग्नि वागिन्द्रिय के द्वारा बाहिर निकल जायगा, उसी स्थान में हम अपना स्वतन्त्र राज्य स्थापित करेंगे ” । यह संकल्प कर महाराज माथव वैश्वानर का संयम कर राहूगण गोतम को साथ लेकर चल पड़े । आगे आगे माधव चले जारहे थे, पीछे पीछे गोतम अनुगमन कर रहे थे । गोतम ने अनेक बार लौकिक भाषा में विदेष का सम्बोधन किया । उनके इसप्रकार अकस्मात् राज्य छोड़कर आगे बढ़ने के कारण की जिज्ञासा व्यक्त की । परन्तु विदेघ ने अनेक बार प्रश्न करने पर भी उत्तर नहीं दिया । गोतम उनका वाक् - संयम न तोड़ सके । विवश होकर गोतम को उस मन्त्रशक्ति का आश्रय लेना पड़ा, जिसका फल अव्यर्थ माना गया है । उन्होंने निश्चय किया कि, विदेष ने किसी विशेष लक्ष्यसिद्धि के लिए ही अपने आध्यात्मिक वैश्वानर अग्नि १२८०
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चतुर्थ अध्याय सामिधेनीमब्राह्मण शतपथब्राह्मण का संयम किया । है । अतएव इनके इस वैश्वानराग्नि को प्रदीप्त किए बिना ये कोई उत्तर नहीं देंगे । अतः मन्त्रवाक् से इस संयम को तोड़ना हीं चाहिए । यह निश्चय कर गोतम कहने लगे-" वीतिहोत्रं त्वा कवेद्यमन्तं समिधीमहि । अग्ने बृहन्तमध्वरे " । उक्त मन्त्र से अग्निसमिन्धन कर इस अभिप्राय से कि, अब माथन का संयम अवश्य टूट जायगा, गौतम ने उच्चस्वर से सम्बोधन करते हुए कहा - ' है त्रिदेव ३! | परन्तु कोई परिणाम न निकला । पुनः गोतम ने निम्नलिखित मन्त्र का प्रयोग क्रिया-" उदग्ने शुचयस्तव भ्राजन्त ईरते । तब ज्योतींष्यर्चयः " 1 गोतम का यह प्रयास भी व्यर्थ गया । अन्त में उनके मुख से तीसरे मन्त्र के " तन्त्वा घृतम्नत्रीम हे " इस भाग का निकलना था कि, माथव का संगम टूट गया । चिरकाल से संगत भी वह अग्नि ' घृतपद ' के सम्वन्ध मात्र से प्रज्ज्वलित होपड़ा । अत्र गोतम इस अग्निको अपनी आध्यात्मिक संस्था में न रख सके । फलतः प्रज्ज्वलित अग्नि बाहिर आपड़ा - ( माथव बोल पड़े ) । जिस समय यह घटना घटित हुई, उस समय माथव विदेध सरस्वती नदी के समीप विद्यमान थे । यहाँ से आरम्भ कर आगे का ' सदानीरा ' - पर्यन्त का सम्पूर्णं भूप्रदेश विन्दमान था, काल्वालीकृत था, जल से क्षेत्रवत् था, एकप्रकार से जलपूरित बञ्जड़ ही भूप्र-देश था । यहाँ वाक्संयम टूट जाना माथव ने एक दैवी - सङ्केत समझा, और इसीलिए यही से अपने संकल्पित स्वतन्त्र राज्य की आरम्भसीमा मानली । श्रग्निस्थापन हुआ, यज्ञारम्भ हुआ । ओर ओर ब्राह्मणों से भी स्व-तन्त्र यज्ञानुष्ठान करवाए गए । इन यज्ञाग्नियों से उस क्षेत्र भूप्रदेश की आर्द्रता हटाते हुए इस भूप्रदेश को निवास - योग्य बनाते हुए माथव आगे बढ़ते गए । यहाँतक कि, सम्पूर्ण ' सरस्वतीक्षेत्र ' को अग्नियज्ञों से सुखाते हुए वे ' सदानीरा ' नाम की नदी के तट पर जा पहुँचे, जोकि सदानीरा उत्तरगिरि से निकली है । यही नदी " करतोया, सदानीरा, बाहुदा " इत्यादि नामों से प्रसिद्ध है । इसमें एक हाथ जल सदा बना रहता है, इसलिए इसे ' करतोया ' कहा गया है । इसका पानी बोर गमों में भी श्रतुष्ण बना रहता है, अतएव इसे ' सदानीरा ' कहा गया है । सुप्रसिद्ध स्मृतिकार न्यायमन्त्री ' लिखित ' के ज्येष्ठ भ्राता शङ्ख की आज्ञा के बिना फलग्रहण - जनित अपराध के दण्ड के लिए लिखित का बाहु कटवा दिया गया था । अन्त में इसी नदी में वहणाराधनः के द्वारा शङ्ख ने कनिष्ठ भ्राता के बाहु की पुन: प्राप्ति की थी । इसीलिए इसे ' बाहुदा ' कह । गया है । यही नदी लोकभाषा में ' कुरही ' नाम से पुकारी जाती है । यही विदेहराज्य की पूर्वसीमा का निर्माण करने वाली हुई । बहुत सम्भव है, यह ' गण्डकी ' नदी हो, जिसका भागीरथी में सङ्गम होता है । इस नदी से इस ओर ही क्योंकि यज्ञाग्नि का सम्बन्ध हुआ, अतएव उसी समय से यह नियम बन गया कि, यह नदी यज्ञाग्निसम्बन्धविरह से अशुद्ध है । अतः जो इसका तारण करेगा, वह प्रायश्चित्ती माना जायगा,, जैसा कि - ' करतोया - बिलंबनात् ' इत्यादि से स्पष्ट है । यही नदी कोसलविदेहों की मध्यसीमा १२८८