Shatpath Brahman 1 2 — पृष्ठ 1021–1030

शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - १-२ - मोतीलाल शास्त्री · पृष्ठ 1021–1030

पृष्ठ 1021

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चतुर्थ अध्याय सामिधेनीवा प्रथमकाण्ड मानी गई । वही दोनों वंशों के वैवाहिक सम्बन्ध का कारण बना । क्षत्रियों का वैवाहिक सम्बन्ध पुरो-हितगोत्रों से ही होता है । इस घटना से पहिले दोनों के कुल पुरोहित वसिष्ठ थे । एवं तत्रतक कोसल- विदेहों का वैवाहिक सम्बन्ध अमर्यादित था परन्तु उक्त यज्ञपटना को लेकर जब गोतम ऋषि विदेड़ों के पुरोहित बन गए, तो वैवाहिक सम्बन्ध मर्यादित बन गया । वही विदेह देश श्राज ' तिरहुत ' नाम में परिणित होगया है । उस देश के निवासी यद्यपि ज ‘ मैथिल ' कहलाते हैं । परन्तु वस्तुतः इहें ' मधु ' राजा के सम्बन्ध से ' माथत्र ' ही कहन । चाहिए, जैसा कि— ' ते हि माथवाः ' इत्यादि श्रुति से स्पष्ट है । यदि ' मधु ' के स्थान में ' माथि ' पाठ है, तो ' मैथिल ' शब्द भी सुसङ्गत माना जासकता है । " यह है - आख्यान का संक्षिप्त स्वरूप । प्रकृत सामिधेनी - प्रकरण से इसका यही सम्बन्ध है कि, ' घृत ' पद से माथव के मुखाग्नि का समिन्धन हुआ था । इस से स्पष्ट है कि घृत ' पट समिन्धन का अन्यतम कारण है । क्योंकि यहाँ वहीं समिन्धन कम्मं श्रभिप्रेत है, अतएव ' घृताच्या ' कहना [ अन्य ] बनता है । कहा गया है कि, ' मृताच्या ' पदवीव्यभाव का संग्राहक है । इसी अभिप्राय से कहा गया है- " वीर्य्यमेवास्मिन् दधाति " -( २० वी करिडका १०, ११, १२, १३, १४, १५, १६, १७, १८, १ ९, २० इन ग्यारह करिकाओं में इतिवृत्तपूर्वक उक्तार्थ का ही स्पष्टीकरण हुआ है ॥ ( २० ) ॥ प्रथम मन्त्र का शेष भाग है- " देवान जिगाति सुम्नुयुः " यह इसकी व्याख्या करती हुई भूति कहती है कि, " आज यह यजमान ( मनुष्य होकर ) इस यज्ञाग्नि के समिन्धन के प्रभाव से उन दिव्यलोकस्थ प्राण देवताओं पर विजय प्राप्त करना चाहता है । भला उस दिव्याग्नि - प्रभाव का क्या कहना, जो एक भूलोक निवासी मनुष्य को देवसम्पति से युक्त करदे " | श्रुति इस कथन से अग्नि का ही महत्व सूचित कर रही है । प्रकृत मन्त्र से यद्यपि स्त्ररूपतः अग्नितत्व का ही प्रतिपादन हुआ है, जैसा कि पूर्वव्याख्या से स्पष्ट है । परन्तु मन्त्र में कहीं ' अग्नि ' का नाम नहीं है । अतएव अग्निरूपात्मिका बनती हुई भी यह ऋवा अनिरुक्ता है । सर्वसम्पत् - सिद्धि का अन्यतम द्वार अनिरुक्तभाव ही है । क्योंकि अनिरुक्तभाव निरुक्त सर्वकामपरक प्रजापति का संग्राहक बना हुआ है । अनिरुक्ता सामिधेनी का अनुवचन क्यों किया जाता है? इस प्रश्न की यही संक्षिप्त उपपत्ति है || २१ || प्रथम - मन्त्र पद की व्याख्श समाप्त कर अब श्रुति- अग्न आयाहि ' इत्यादे द्वितीय मन्त्र - पदों की व्याख्या करती है । यह ऋचा ' आ ' उपसर्ग के सम्बन्ध से गायत्री के अर्वाचीरूप का संग्रह कर रही है, यह तो उक्तप्राय ही है । अव उस ' वीतये ' पद के रहस्वार्थ पर दृष्टि डालिए, जिसके लिए अति ने एक महत्त्वपूर्ण ‘ लोकोत्पत्तिविज्ञान ' उद्धृत किया है । सुप्रसिद्ध आपोमय पारमेष्ठ्य मण्डल ही लोकसम्पति का मूलाधिष्ठान माना गया है । चतुर्मुख ब्रह्मा के आपोमुख से ही लोकसृष्टि हुई है, जैसा कि पूर्व में ' पांप्रणयन कम्मपपत्ति ' में विस्तार से बतलाया जाचुका है । यद्यपि परमेष्ठी से ऊपर का स्वयम्भू लोक प्राणमय माना गया है, तथापि ' प्राणा या आप १२८६

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चतुर्थ अध्याय सामिधेनीब्राह्मण शतथपब्राह्मण ( तां ० ब्रा ० ६ ६ | ४ | ) - ' आपो वै प्राण: ' - ( शत ०३८ २४ ) ' प्राणो ह्याप: ' ( जै ० उ ० ३ | १० || ) — ' आपोमयः प्राणः ' ( छा ० उ ० ६ | ४ | ४ | ) इत्यादि निगमों के अनुसार स्वयम्भू का वह प्राणतत्त्व भी - सम्पत से वञ्चित नहीं है । स्वायम्भुवी श्रापः प्राणात्मिका हैं, यही वागात्मक प्राण पारमेष्ठ्य अपतत्त्व की प्रथमावस्था है, जैसा कि - ' सोऽपोऽसृजत वाच एव लोकान् त्रागेव साऽसृज्यत ' ( शत ० ६ | १ | १ | १० | ) इत्यादि से प्रमाणित है । जिसप्रकार स्वयम्भू का अपतत्त्व ' प्राण ' माना गया है, एवमेव परमेष्टी का ' अम्भः ', सूर्य का ' मरीची ', चन्द्रमा का ' श्रद्धा ' एवं पृथिवी का अपतत्त्व ' मर ', कहलाया है - ( ऐ ० उ ० ११४ ' ) । इस दृष्टि से इस अप्तत्त्व की सर्वव्याप्ति तथा सर्वरूपता भली - भाँति सिद्ध होजाती है । पतत्त्व की इसी सर्वव्याप्ति को लक्ष्य में रखकर श्रुति कहती है-" सर्वाणि ह त्वेव भूतानि सर्वे देवा एषोऽग्निश्चितः । आपो वै सर्वे देवाः, सर्वाणि भूतानि । ता ता श्राप एषोऽग्निश्चितः । तस्य नाव्या एव परिश्रितः ” - शत ० १० ५ | ४ | १४ | + पारमेष्ठ्य आपोमय मण्डल मे अनूरूप भृगु - अङ्गिरा की प्रतिष्ठा मानी गई है । ' आपो भृग्वङ्गिरोरूपमापो भृग्वङ्गिरोमयम् ' इस गोपथश्रुति के अनुसार पारमेष्ठ्य ' आप: ' भृगु ( स्नेहलक्षण आप: ) से युक्त हैं | किंवा यह अपतत्त्व ही भृग्वङ्गिरोगय है । भृगुरूप आपः के गर्भ में अङ्गिरारूप आरः ऋतरूप से सर्वत्र प्रतिष्ठित माना गया है । पारमेष्ठ्य समुद्र इन श्रग्न्यात्मक अङ्गिरापुञ्जों से पूर्य्यमाण है | सर्वथा गतिशील इन अग्निपुञ्ज को ही ' धूमकेतु ' कहा गया है । साहस्री - विज्ञानवेत्ता महर्षियोंनें उस समुद्र में अग्निपुञ्जलक्षण ऐसे एक सहस्र धूमकेतु मानें हैं । ये धूमकेतु अपनी अपनी विशेष अवस्थाओं के सम्बन्ध में किरण, वक्रशिख, विशिख, ब्रह्मदण्ड, द्विशिख, विकच, तस्कर, कौङ्कम, तामस कीलक, विश्वरूप, अरुण, गणक, इत्यादि विशेष नामों मे व्यवहृत हुए हैं । इह्री धूमकेतुओं में से कोई एक केतु हमारी रोदसी त्रिलोकी का जन्मदाता बना है I पारमेष्ठ्य मण्डल में ऋतरूप से व्याप्त अग्निज्वाला - पुञ्जात्मक - प्रबल वेग से परिभ्रममाण धूमकेतु-लक्षण अतिरा ही काल पाकर एक स्थान पर सञ्चित होने लगता है । ज्यों ज्यों अग्निकण एक नियत बिन्दु पर सञ्चित होने लगते हैं, त्यों त्यों पिण्डात्मक सत्यभाव का उदय होने लगता है । इसप्रकार कालान्तर मे उस धूमकेतुरूप अग्निपुञ्ज के सञ्चित प्रवर्ग्यरूप से ' सूर्य ' नामक ' सत्य - अग्निपिएड ' स्वतन्त्ररूप से प्रकट

+ " प्सु तं मुञ्च भद्रं ते लोका ह्यप्सु प्रतिष्ठिताः ।

पोमयाः सर्वरसाः सर्वमापमयं जगत् ॥

-महाभारत

* शतमेक ' विकमेके, सहस्रमपरे वदन्ति केतूनाम् ।

रूपकमेव प्राह मुनिर्नारदः केतुम् ॥

— बृहनसंहिता - केतुचाराध्याय ११।५ । १२६०

पृष्ठ 1023

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चतुथ याय सामिधेनीब्राह्मण प्रथमकाण्ड होजाता है । धूमकेतु ही सूर्य का जनक बनता है क्योंकि स्वयं धूमकेतु गतिशील है, अतएव तदुत्पन्न सूर्य्यबिएड भी स्वस्थान में प्रतिष्ठित रहता हुआ प्रबल वेग से श्रद्यावधि परिभ्रममा रहता हुआा परमेष्ठी के चारों चार परिक्रमा लगा रहा है । कल्पना कर लीजिए, अभी सूर्य का प्रादुर्भाव नहीं हुआ, सर्वत्र पारमेष्ठ्य समुद्र का ही साम्राज्य है, सब श्रीर पानी हीं पानी है, और इस पानी में करोड़ो कोम पर्यन्त अपनी व्याप्ति रखते हुए अग्निपुञ्जरूप धूमकेतु ऋतरूप से इतस्ततः चक्कर काट रहे हैं । इनमें से किसी एक धूमकेतु को लक्ष्य बनाकर लोकस्ट का समन्वय अपेक्षित है । स्वयं यह धूप केतु भी ऋताग्निरूप ही है, एवं जिस समुद्र में यह व्याप्त है, वह भी ऋत ही है । इस ऋत समुद्र में प्रतिष्ठत अग्निबुल के अलातचकवत् घूमने से कालान्तर में अग्निपुञ्ज का सर्वाग्रभाग इस से प्रवृक्त होगया, और इस पार्थक्य का कारण बना ' गतिविभेद ', एवं गतिविभेद का कारणा बनााग्नपुत्र का भाव यदि वह अग्निपुज सत्य होता, तो हम का सम्पूर्णरूप अवारपारी रूप से समानगति से ही युक्त रहता । परन्तु ऋतभव के कारण इसकी प्रतिबिन्दु गति में वैपम्य बना रहता है, एवं यही गतिवैषम्य भाव का जनक बनता है । यद्यपि जिस केन्द्रभाग के आधार पर हमनें गतिमाम्य बतलाया है, वहाँ भी एकदृष्टि से घटिकायन्त्रन् गतिवैषम्य बना हुआ है । तथापि यह गतिवैषम्य केन्द्र का परित्याग नहीं करता केवल इसी लक्ष्य से इस गति को ' समानगति ' मान लिया गया है । सूर्यकेन्द्र से सम्पूर्ण सोररश्मियाँ बद्ध हैं । स्वस्थान में परिश्रममाण सूर्य की सभी रश्मियाँ परिभ्रममाणा है । साममण्डल उत्तरोत्तर बृहत् प्रदेश से युक्त है । फलतः रश्मियों की प्रतिविन्दुगति साममण्डलों के उच्चावच संस्थानों से विधम वन रहीं हैं । फिर भी क्योंकि प्रत्येक रश्मि सूर्य-केन्द्र से बद्ध है, अतएव रश्मिगति रश्मि के किसी पर्व को सूर्य्य से पृथक नहीं होने देती । यही अवस्था घटिकायन्त्र की है । घटिकायन्त्र ( बड़ी ) की उस बड़ी सूची ( सुई ) पर दृष्टि डालिए, जो १ घन्टे के ६० मिनिटों का परिज्ञान करवा रही है । घटिका - केन्द्र से ऋद्ध सूची चारों ओर की घटिका परिधि से संलग्न रहती हुई चारों ओर घून रही है । केन्द्र से परिधि पन्तका घटिका प्रदेश उत्तरोत्तर बड़ा है । अतः केन्द्र से आरम्भ कर घटिका - परिधि पर्यन्त व्याप्त सूची की प्रतिबिन्दु की गति उत्तरोत्तर बृहत् - प्रदेशपरिभ्रमण से सम्बन्ध रख रही है । अन्तिम बिन्दु को सत्र से क्रमशः छोटे मण्डल । यहाँतक कि केन्द्र बिन्दु को अभाव है । यदि घटिकायन्त्र में सूची को बद्ध रखने इस बिन्दु वैषम्य का यह होता कि सूची खण्ड हो जाती । क्योंकि उस समय इन विषमगतियों को नहीं रहता | बड़ा मण्डल पूरा करना पड़ता है, पूर्व पूर्व बिन्दुओं को कुछ भी समय नसीं लगत, क्योंकि वहाँ मण्डज का वाला सत्यभाव ( केन्द्र ) न होता, तो परिणाम खण्ड रूप में परिणत होकर चटकायन्त्र से ही पृथक समभाव में परिणत करने वाला कोई नियन्तासूत्र टीक यही अवस्था हमारे इस सत्यभावशून्य ( केन्द्र रहित ) ऋताग्निपुञ्ज ( धूमकेतु ) की समझिए । ऋताग्निपुञ्ज प्रबल वेग से घूम रहा है, यह बतलाया जा चुका है । इसकी गति के सम्बन्ध में यह ध्यान श्रीर रखना चाहिए कि, जहाँ बुवादि अन्य ग्रह सूर्य के चारों ओर सममण्डल बना रक घूम रहे हैं, वहाँ ये धूमकेतु विषम मण्डल बनाकर ही सूर्य के चारों ओर घूम रहे हैं । इनकी सब से बड़ी परिक्रमा ३० सहस्र १२६१

पृष्ठ 1024

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चतुथ - ग्रध्याय सामिधेनीब्राह्मण शतपथब्राह्मण वर्षो तक में पूरी होती मानी गई है । इस परिक्रमा के अनुसार ही भूलोकस्था प्रजा को इसका प्रत्यक्ष हुना करता है । केन्द्रविरहित धूमकेतु घूमने लगा । इस समय इसमें दो भावों का समवेश हुआ । उधर तो पारमेष्ठ्य ' बराहवायु ' के व्यापार से केन्द्र का निर्माण प्रारम्भ हुआ, इधर परिधि - स्थानीय अग्निपुञ्जखण्ड प्रवर्ग्यभाव से युक्त होने लगे । कालान्तर में गतिवैषम्य से अग्निपुञ्ज का सर्वान्त का भाग इससे पृथक् होकर अपना नियत स्थान बनाकर घूमने लगा । वही अग्निपुञ्ज - खण्ड आगे जाकर ' शनैश्चर ' नाम से प्रसिद्ध हुआ । किसी समय अवश्य ही शनैश्चर कक्षा - पर्य्यन्त इस अग्निपुञ्ज की व्याप्ति रही होगी | परन्तु श्राज तो अग्निपुञ्जविशेष सूर्य्य, और शनैश्चर में पय्याप्त अन्तर होगया है । शनैश्चर के अनन्तर जो अग्नि - खण्ड प्रवृक्त हुआ, वह ' बृहस्पति ' कहलाया । तीसरा लण्ड प्रत्रक हुग्रा । यह ग्रागे जाकर १०८ अवान्तर खण्डों में परणित हुआ, जिह्न १०८ ' देवसेनाग्रह ' कहा जाता है । अनन्तर चौथा खण्ड प्रवृक्त हुआ, वही ' मङ्गल ' कहा जाता है । मङ्गल के अनन्तर प्रयुक्त होने वाला खण्ड ही सुप्रसिद्ध ' भूपिण्ड ' है । इस भूपिण्ड का मोमनय प्रवृक्त अत्रिभाग ही ' चन्द्रमा ' है । यागे का खण्ड शुक्र कहलाया । एवं सर्वान्त का खण्ड ' बुध ' नाम से प्रसिद्ध हुआ । इसप्रकार केन्द्रस्थ अग्निपुञ्ज ( जो कि श्राज सूर्य्य नाम से प्रसिद्ध है ) से ही ये सम्पूर्ण ग्रहोपग्रह उसी गतिवैषम्य से उत्पन्न हुए हैं । सूर्य्यात्मक अग्निपुञ्ज के प्रथम प्रवर्ग्य भाग ' सूर्यपुत्र ' नाम से प्रसिद्ध शनिदेव ही माने गए हैं, जिनकी एक माण्डलिक परिक्रमा ३० वर्षों में समाप्त होती है । सूर्य के प्रवर्ग्या-शभूत ये उपग्रह अद्याबधि सूर्य के चारों ओर उसी प्रवृक्त स्थान में परिक्रमा लगा रहे हैं । सूर्य के चारों ओर सर्वप्रथम बुध्व, अनन्तर शुक्र, अनन्तर पृथिवी, पृथिवी के चारों ओर चन्द्रमा, अनन्तर मङ्गल, अनन्तर देवसेना नामक १०८ ग्रह, अनन्तर बृहस्पति, अनन्तर शनि, सर्वान्त में नक्षत्रकक्षा, यही इनका अवस्थानक्रम है । आज भी विधि के इस अलातचक्र की यह परिभ्रमणलीला यथावत् परिक्रान्त है । अवश्य ही कालान्तर में सूर्यं से ओर ग्रह उत्पन्न होंगे, जिनका सङ्केत हमें माठर, कपिल, दण्ड, चण्डांशु, आदि पारिपार्श्वकों से मिल रहा है । इस क्रमसे एक दिन सम्पूर्ण सूर्य्यमात्रा ग्रहनिर्माण में समाप्त होजायगी । स्रष्टा प्रजापति के विध्वस्त होते ही यज्ञप्रक्रिया का अवसान होजायगा । अव्यक्तात्मक रात्र्यागम सबकुछ सुप्त बना देगा | पुनः नवीन धूमकेतु से नत्रीन सृष्टिक्रम आरम्भ होगा । इसप्रकार ' याथातथ्यतोऽर्थान् व्यदधान-शाश्वतीभ्यः समाभ्यः- धाता यथापूर्वमकल्पयत् ' इत्यादि रूप से उपगीयमान विधि का यह विचित्र लीलाचक्र इसीप्रकार चंक्रमण करता रहेगा, जिसके लिए ' इदमित्थमेव ' कहने के लिए मानवीय बुद्धि सर्वथा ही असमर्थ है । ' न विश्वमूर्त्तेरवधार्य्यते वपु: ( महाकवि कालिदास ) “ शनि, बृहस्पति, देवसेनाग्रह, मङ्गल, बुध, ये उपग्रह ज्योतिर्म्मय दिखलाई देते हैं । अतः इहें सूर्योपग्रह मानना सुसङ्गत बन रहा है । परन्तु अनुष्णाशीत भूपिण्ड क्योंकि ज्योतिर्भाव से वञ्चित है, अतएव इसे सूर्योपग्रह मानना असङ्गत सा प्रतीत होता है " इस असङ्गति का उस समय भलिभाँति निराकरण होजाता है, जब हम उक्त ग्रहों के स्वरूप का परिचय प्राप्त करते हुए वैदिक ज्योतिर्विज्ञान के स्वरूप से अवगत हो-जाते हैं । ' स्वज्योतिः, परज्योतिः, रूपज्योतिः अज्योतिः ', भेद से ज्योतिर्विवर्त्त ' चार भागों में विभक्त माना गया है । चारों ओर से स्वतः प्रकाशित ज्योतिर्मण्डल ही ' स्वज्योति ' कहलाए हैं । इहें हीं परिभाषानुसार १२६२

पृष्ठ 1025

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चतुर्थ अध्याय सामिधेनीब्राह्मण प्रथमकाण्ड सूर्य कहा गया है । खगोलीय ज्योतिःपुञ्ज क्योंकि स्वतः प्रकाशित बनता हुआ स्वज्योति है, अतएव इसे ' सूर्य ' कहना अन्वर्थं बनता है । खागोल संस्था में इसीप्रकार स्वतः प्रकाशित स्वाती, चित्रा, लुब्धक, अभिजित, आदि असंख्य नक्षत्र स्वज्योतिर्म्मय बनते हुए ' सूर्य ' हैं । तभी तो स्वाती को ' सविता ' कहा जाता है । जो पिण्ड अन्य प्रकाश से प्रकाशित रहते हैं, उहें परिभाषानुसार ' चन्द्रमा ' कहा जाता है । पार्थिवोपग्रहभूत सोमपिण्ड क्योंकि अन्यज्योति से ( # सूर्य्यज्योति से ) प्रकाशित है, अतएव इसे ' चन्द्रमा ' कहा गया है | इसे ही ' परज्योति ' माना गया है । शनि के आठ उपग्रह, बृहस्पति के चार उपग्रह एवं मङ्गल के दो उपग्रह भी इसी परज्योतिर्भाव से ' चन्द्रमा ' कहलाए हैं । तीसरी रूपज्योति है । इसे हम परज्योति का ही दूसरा रूप कह सकते हैं । वीतत्त्व की घनता से जहाँ सौरज्योति को चाकचिक्यभाव में परिणत होने का अवसर मिल जाता हैं, वहाँ प्रकाशरश्मियों का उदय होजाता है । परन्तु मृद्भाव की अधिकता से रश्मिसम्बन्ध होने पर भी जिस से अन्य वस्तुओं को प्रकाशित करने योग्य रश्मियों का प्रसार नहीं होना, श्रपितु जो अपने स्वरूपमात्र का परिचायक बनती है, ऐसी परज्योति को ही रूपज्योति कहा जाता है । यही परिभाषानुसार ' पृथिवी ' नाम से व्यवहृत हुई है । अथवा यों कह-लीजिए कि, ज्योतिर्भाव ही स्वयं ' रूप प्रकाश ' भेद से दो भागों में विभक्त है । जिन पिण्डों के साथ सूर्य्य की इन दोनों ज्योतियों का सम्बन्ध होता है, वे परज्योति कहलाते हैं । एवं जिनके साथ केवल रूप का सम्बन्ध होता है, उन्हें रूपज्योति कहा जाता है । चौथा विभाग ' ज्योति ' का है । वायु, चन्द्रलोकस्थ गन्धर्वप्राण अविध सौम्यजीव, ये सत्र अज्योति हैं । पारदर्शकता प्रतिबन्धक ' अत्रिप्रारण ' के प्रभाव से इनमें रूप - प्रकाशानुगता रश्मियों का प्रति-फलन नहीं होता । अतएव न तो इनका रूपप्रत्यक्ष ही होता, न चन्द्रमा की भांति इनसे रश्मि - प्रसारजनित प्रकाश ही । शनि आदि ज्योतिर्मय ग्रह सूर्य से ही उत्पन्न हैं, परन्तु ये स्वज्योति नहीं हैं, अपितु चन्द्रभावत् परज्योति हैं । इस ज्योतिरभाव का एकमात्र कारगा सूर्य्यसम्बन्ध - विच्युति ही है । सूर्य में अजस्ररूप से सोम-धारा आहुत होती रहती है । अतएव सूर्य्य स्वज्योतिम्य बन रहा है । इससे वियुक्त शनि आदि उस सम्बन्ध-विच्छेद से ही स्वज्योतिः - सम्पत्ति से वञ्चित हो रहे हैं । जो महत्त्व सूर्य्य की दृष्टि से शनि आदि का है, वही महत्त्व पृथिवी का है । पृथिवी भी एकदृष्टि से परज्योति ही है, और इसका मुख्य कारण मृद्भाग की प्रधानता ही है । ऐसी दशा में केवल ज्योति के प्रभाव से ही इसे ग्रहमर्थ्यादा से पृथक् करते हुए उक्त प्रसङ्गति की आशङ्का नहीं की जासकती । - " देवस्य त्वा सवितुः प्रसवेऽश्विनोर्बाहुभ्यां पुष्णो हस्ताभ्याम् ' [ यजुः सं ० ] इत्यादि मन्त्र में स्वाती के अभिप्राय से ही ' सवितुः ' पद उद्धत हुआ । * " अत्राह गोरमन्यत नाम स्वण्डुरपीच्यम् । इत्था चन्द्रमसो गृहे । " [ ऋकसं ० ] तरणिकरणसङ्गादेष पानीयपिण्डेो दिनकरदिशि चञ्चच्चन्द्रिकाभिश्चकास्ते ” [ ज्येा ० ] १२६३

पृष्ठ 1026

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चतुर्थ अध्याय सामिधेनीब्राह्मण शतपथब्राह्मण उक्त ग्रहोपग्रभाव में से प्रकृत में हमें पाठकों का ध्यान केवल सूर्य, तथा पृथिवी ( भूपिण्ड ) की ओर ही श्राकर्षित करना है । जबतक अग्निपञ्चात्मक सूर्य से पृथिवो का उदय नहीं हुआ था, तबतक सूर्य्य एक विशाल अलातचक्ररूप में परिणत रहता हुआ उस स्थान पर्यन्त व्याप्त था, जहाँ कि आज पृथिवी की अन्तिम परिधि है । सूर्य्य जिसे किद्य लोक कहा जाता है, उस समय उसी की व्याप्ति थी । उस समय पृथिवी अन्तरिक्ष ( सूर्ख, तथा पृथिवी के मध्य का प्रदेश ) द्यौ ( सूर्य ) इसप्रकार का त्रैलोक्य विभाग न था । आज जो द्युलोक ( तदुपलक्षित सूर्य्य ) हमारे भूलोक से ५ कोटि क्रोश विदूरस्थान पर स्थित है, जिस युलोक को आज छून तो दूर रहा, प्रत्यक्ष भी साक्षाद् रूप से ( सावित्ररूप से ) नही किया जासकता, वह द्युलोक भूनिर्माण से पहिले ( जिस स्थान पर आज भूलोक की अन्तिम परिधि है ) इस भूलोकपर्यन्त व्याप्त था । उस समय यदि हम होते, तो द्युलोक हाथ से छूया जासकता था । इसी पूर्वस्थिति का श्रुति ने –'उनमृश्या हैव द्युरास ' इन शब्दों में अभिनय किया है || २२ || जिस अर्थ का पूर्व में हमने अपने शब्दों में स्पष्टीकरण करते हुए यह बतलाया है कि, काल पाकर सूर्य्य से भूभाव ब्रनृक्त हुग्रा, फलतः त्रैलोक्य का विभाजन हुआ, और उस समय अन्य ग्रहों के प्रवग्यभाव से द्य लोक इस भूलोक से विदूर होगया, श्रुति अपने शब्दों में उसी भाव का स्पष्टीकरण कर रही है । प्रश्न यह है कि, किसने इस अग्निपुञ्ज को प्रवृक्त किया? । इस प्रश्न का उत्तर इसके अतिरिक्त और क्या होसकता है, कि. - सूर्य्य - केन्द्रस्थ काममय प्रजापति की कामना से यज्ञकामुक बने हुए सौर प्राणदेवताओं ने ही यह लोकवितान किया । तत्त्वतः भी यही उत्तर समीचीन प्रतीत होता हैं । सौर- अग्निपुञ्ज अपने गतिवैषम्य से ही तो ग्रहों का जनक बना है । यह गतितत्त्व प्रागुकला से सम्बन्ध रखता है । प्राजापत्य मन जहाँ ज्ञानप्रधान है, प्राजा-पत्या बाक् जहाँ अर्थप्रधाना है, वहाँ मध्यस्थ प्राजापत्य प्रारण क्रियागवान माना गया है । क्रिया ही गतिभाग है । इस हृद्या प्राजापत्यगति का रूप से बाह्य वितान होता है, एवं इस गति का आगे जाकर अध्निपुञ्जस्थ आग्नेय - प्राणदेवताओं से योग होता है । इसी देवगति ( प्राणगति ) से लोक - विभाजन है । इस लोक - विभाजन - प्रकिया में हृद्य प्रजापति का मौलिक सहयोग बतलाया गया है । यहाँ प्रजापति ' आलम्बन, निमित्त, उपादान भेद से त्रिसंस्थ माना गया है । अव्ययदृया वही आलम्बन है, अक्षरा वही निमित्त है, एवं तरदृष्ट्या वही उगदान है । अक्षर ही क्योंकि सृष्टि का निमित्त है, तब कह सकते हैं कि, यहाँ हृद्य अक्षरप्रजापति ही इस लोकसृष्टि का प्रधान प्रवर्तक है । यह हृद्याक्षर ब्रह्मालक्षणा स्थिति, इन्द्रलक्षणा गति, तथा विष्णुलक्षणा आगति, इन तीन गतियों से युक्त है । सर्वतोदिग्गति स्थिति है, अग्गति गति है, परागगति गति है । इसप्रकार अक्षरात्मिका स्थिति-आगति - गति- तीनों तत्त्वत्तः ' गति ' ही बन रही हैं । त्र्यक्षरमूर्ति प्रजापति अपने इसी त्र्यक्षरानुगत - गतित्र-यरूप गतिभाव से सोमगर्भित अग्न्यक्षर के आधार पर लोकबितान में समर्थ हुए हैं । जिस गतिविच्छेद से भूलोक प्रवृक्त हुआ है, उस देवगति में ( अग्न्यात्मिका प्राणगति में ) स्थितिरूपा गति भी है । अपानद्रूपा गति भी है, एवं प्राणद्रूपा गति भी है । इसी रहस्य को लक्ष्य में रखकर श्रुति ने कहा है कि - " तानेतैरेव त्रिभिरक्षरैर्ग्रनयम् ” । देवताओं ने स्वप्रसिष्ठारूप हृद्य - प्रजापति के ब्रह्मा - विष्णु- इन्द्राक्षर से सम्बन्ध रखने वाली स्थिति - गति - गति - रूपा गतियों से ही लोकनिर्माण किया । १२६४

पृष्ठ 1027

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चतुथ अध्याय सामिधेनीब्राह्मण प्रथमकाण्ड प्राय: श्रुति के सभी पदों का समन्वय होगया । अत्र ' वीतये ' पर अवशिष्ट है । श्रुति ने ' बीतये ' इन तीन अक्षरों से लोकवितान करना बतलाते हुए एक दूसरे ' अन्न अन्नाद विज्ञान ' का भी स्पष्टीकरण किया है । लोकवितान हुआ, सौर- देवताओंने तीन अक्षरों से ( त्र्यक्षरानुगता गतित्रयरूपा गति से ) त्रैलोक्य का निर्माण किया | परन्तु प्रश्न यह है कि देवताओंने यह महारम्भ प्रयास किया क्यों?, किस प्रयोजन को लक्ष्य में रखकर देवताओंनें लोकनिर्माण किया? | [ ति का ' वीतये ' पद इसी प्रश्न की उपपत्ति चतला रहा है । ' वीतये ' का शब्दार्थ है - ' खाने के लिए ' । ' इतः प्रदाना ह्ये ते ' देवा उपजीवन्ति ' ) के अनुसार पार्थिव रस ही सौर - देवप्राणों की जीवनयात्रा का कारण माने गए हैं । सौरप्रजापति ग्रहनिर्माण में जहाँ अपने शरीरपर्वों को विस्रस्त ( खर्च ) करते रहते हैं, वहाँ वे इनके रसों का आदान करते हुए उस बिस्रस्त भाग की क्षतिपूर्ति भी किया करते हैं । यही पारस्परिक अन्न अन्नादभाव है, जिसका अन्यत्र विस्तार से स्पष्टीकरण हुआ । है । यदि भूलोक न बनता, तो यहाँ से द्युलोक में गायत्र अग्नि के द्वारा पार्थिव रसों का गमन न होता । फलतः द्य लोकस्थ प्राणदेवताओं का विलसन तो होजाता । किन्तु वित्रस्त भाग की क्षतिपूर्ति नहीं होती । हम देख रहे हैं कि, विस्रसन के साथ साथ क्षतिपूर्ति भी होरही है । इस पारस्परिक आदान- विसर्गात्मक अन्नयज्ञ से ही दोनों का स्वरूप सुरक्षित है । देवताओं की यह अन्नादान-प्रक्रिया ' बी - त - ये ' इन तीन अक्षरों से उपलक्षित ' पृथिवी अन्तरिक्ष- द्यौ ' इन तीनों लोकों के रसों से समान रूप से सम्बद्ध है । इसप्रकार ' वीतये ' यह त्र्यक्षर पढ जहाँ प्रजापति की गतित्रयी के द्वारा लोकत्रयी-निर्माण का रहस्य स्पष्ट कर रहा है, वहाँ यही पद लोकत्रय निर्माण की आवश्यकता का भी रहस्योद्घाटन कर रहा है । अवश्य ही इस रहस्यार्थ को गर्भ में रखने वाले अग्न आयाहि वीतये ' इस मन्त्रभाग के अनुबच्चन से यज्ञकर्त्ता यजमान के निवास के लिए लोकसम्पत्ति भी ' वरीय ' होजाती है, एवं अन्नसम्पत्ति भी ' विपुल ' होजाती है । हम भी इस मन्त्रपद के रहस्यार्थ के उपसंहार से लोकाध्यक्ष, तथा अन्नाध्यक्ष उस दिव्याग्नि-देवता से यही प्रार्थना करते हैं कि, हमारे इस भारतलोक के, तथा भारतीय - भोगसम्पत्ति के भारतीयों को अनन्य भोक्ता बनाने का अनुग्रह करते हुए अपने भारत नाम को चरितार्थ कर हमें ' अग्ने! महाँ असि ब्राह्मण भारत ' यह कहने का अवसर प्रदान करें ॥ २३ ॥

मन्त्र का मध्यभाग है ' गुणानो हव्यदातये ' यह । देवताओंने लोकान्न - सम्पत्तियाँ प्राप्त कर त्रैलोक्योपलक्षित सम्वत्सरमण्डल में अपना स्वतन्त्र साम्राज्य स्थापित कर लिया । क्यों?, जानते हैं आप? देवताओंने पहिले आत्म - समर्पण किया, सर्वस्व लिटान किया, तत्र कहीं उन्हें यह वैभव मिला । देवता हमारी भाँति अकर्मण्य नहीं, अपितु ' यजमान ' हैं, यज्ञकर्म के अनन्य अनुगामी हैं । हम भी इस सम्पत्ति के तभी भोका बन सकते हैं, जब यजमान बनें अग्निवितान करें, हव्यदाता बने, कर्मठ बनें, ऋषिप्रदिप सर्वसाधक यज्ञकर्म का अनुगमन करें । जो यजमान ऐसे यजमान हैं, वे ही उक्त सम्पत्ति के भोक्ता चन सकते हैं । अन्यथा तो सत्र अन्यथा ही है ।

X - ' श्रहमस्मि प्रथमजा ऋतस्य, पूर्व देवेभ्यो अमृतस्य नाम ।

यो मा ददाति स ह देव मावत् अहमन्नमन्नमदन्तममि ॥

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चतुर्थ अध्याय सामिधेनीब्राह्मया शतपथब्राह्मण मन्त्र का अन्तिम भाग है- ' नि होता सत्सि बर्हिषि ' यह । अग्नि ' होता ' है, वह ' बाई ' पर प्रतिष्ठित है, एवं बर्हि से निदानेन वहाँ ' भूलोक ' ही अभिप्रेत है, जैसा कि पूर्व में समष्टिरूप से मन्त्रार्थ करते हुए सोपत्तिक बतलाया जा चुका है । इस सामिधेनी का ' बर्हि ' पद इस भूलोक का ही अनुगामी है । अतः इसके अनुवचन से यज्ञकर्त्ता यजमान पार्थिव भागधेय का ही अनन्य भोक्ता बन जाता है, और यही द्वितीय मन्त्रों की संक्षिप्त उपपत्ति है, जिसका ब्राह्मण की २२, २३, २४, इन तीन कण्डिकात्रों में स्पष्टीकरण हुआ है || २४ || ' अग्न आ याहि ० ' के अनन्तर वह होता क्रमप्राप्त तीसरी ( प्रावृत्यानुसार पाँचवीं ) निम्नलिखित सामिधेनी ऋचा का अनुवचन करता है -( ३ ) - ' ओम् -- तं त्वा समिद्भिरङ्गिरो घतेन वर्द्धयामसि । बृहच्छोचा यविष्ठ्य - प्रोम् ' इति ( ५ ) । ' प्र वो बाजा अभिद्यय ' इत्यादि प्रथम मन्त्र त्रैलोक्य - व्यापक सम्वत्सराग्नि का समष्टिरूप से संग्राहक है | मन्त्रगत ' बाजा ' पद त्रिवृत्स्तोमोपलक्षित भूलोक का, मन्त्रीपात ' घृताच्या ' पद पञ्चदशस्तोमो -पलक्षित ' अन्तरिक्ष ' का, एवं मन्त्रगत ' अभिनव ' पद एकत्रिंशस्तोमात्मक द्युलोक का संग्राहक बन रहा है । इसप्रकार प्रथम मन्त्र से ममट्यात्मक सम्वत्सर अग्नि का ही समिन्धन हुआ है । इस से आगे के— ' अग्न आयाहि वीतये ० ' - ' त त्या समिद्भिरङ्गिरः ० ' - ' स नः प्रथुश्रवाय्यम ' इन तीन मन्त्रों से क्रमशः पृथिवी अन्तरिक्ष, द्यौ, इन तीनों लोकों में प्रतिष्ठित तीनों अग्निपर्वों का समिन्धन हुआ है । ' अग्न आयाहि ॰ ं का ' बर्हि ' पद पार्थिवाग्निपर्व का ' तं त्वा समिद्भि ० ' का ' घृतेन ' पद आन्तरिक्ष्याग्नि का, एवं ‘ स नः पृन श्रवाय्यं ' का ' प्रभु ' पढ दिव्याग्निपर्व का संग्राहक बन रहा है । इसप्रकार इस मन्त्रचतुष्टयी से समष्टि, व्यष्टिरूप से उभयथा अग्निदेव का समिन्धन होजाता है, इस सङ्गति को लक्ष्य में रखकर ही इस मन्त्रचष्टयी के अर्थ का समन्वय करना चाहिए । ' अग्न आयाहि ० ' से दिव्यलोकस्थ सावित्राग्निरूप दिव्य अग्नि का इस भूलोकोपलक्षित यज्ञाग्नि में आह्वान किया गया । यहाँ आते ही यह पृथिवी की वस्तु जनता हुआ ' आङ्गिरा ' पद का अधिकारी बन गया । ' इत एत उदारुहन ' इत्यादि मन्त्रवर्णन के अनुसार पार्थिव अग्नि ही अङ्गिरा कहलाया है । इसीलिए श्रुति ने इसे ( आगमन के अनन्तर ) ' अङ्गिरा ' नाम से व्यवहृत किया है । अग्नि की ही भृगु, तथा अङ्गिरारूप से दो अवस्था मानी गई है । आगमनदशा में बही भृगु कहलाया है, एवं गमनदशा में बही आङ्गिरा कहलाया है । प्रज्ज्वलित अग्नि में जो अग्निज्वाला है, वह साक्षात भृगु है । अग्नि की अवस्थान्तर भार्गव सोम के जलने का ही नाम ज्वाला है । एवं जिस अङ्गिरा-पिण्ड से यह ज्ज्वाला निकल रही है, वह अङ्गिरोऽग्निमय है, जैसा कि – ' अर्चिपि भृगुः सम्बभूव, अङ्गारेभ्यो अङ्गिराः सम्बभूव । अथ यदङ्गारा अवशान्ताः पुनरुद्दीष्यन्त, अथ बृहस्परिभवत ' इत्यादि ब्राह्मणश्रति से स्पष्ट है । यही है कि, तेजः - स्नेह - तत्त्वों के सम्मिश्रण का ही नाम वस्तुस्वरूप है । तेज अङ्गिरा है, स्नेह भृगु, है । अग्नि - यम - आदिन्य- मेद से ' अङ्गिरा ' भी तीन अवस्थाओं में परिणत रहता है । १२६६

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चतुर्थ अध्याय सामिधेनीब्राह्मण प्रथमकाण्ड एवं आपः - वायुः- सोम - रूप से भृगु भी तीन अवस्थाओं में परिणत रहता है स्नेहलक्षणा भृगुत्रयी परिधि से हृदय की ओर क्रमश: ( संकुचित होती हुई ) श्राती रहती है, एवं तेजोलक्षणा श्रङ्किरात्रयी हृदय ने परिधि की ओर क्रमशः ( विकसित होती हुई ) जाती रहती है । अङ्गिरात्रयी का अन्तिम विकास परिधि-सीमा पर पहुँचते ही अर्वाङ मुख बनकर भृगुत्रयीरूप में परिणत होजाता है । एवमेव भृगुत्रयी का अन्तिम संकोच हृदयसीमा पर पहुँचते ही सहावस्थानाभावप्रवत्त के संघर्ष में परिणत होकर पराङ मुख बनता या रात्रीरूप में परिणत होजाता है । यहाँ से इस अङ्गिरात्री के अह्नों का * ऊर्ध्व की ओर रमन होने लगता है, अतएव इसे ' अङ्गिरा ' कहा जाता है । अथवा अङ्गस के सम्बन्ध से भी इस पार्थिव अग्नि को ' अङ्गिरा ' कहना कन्वर्थ बनता हैं । अग्नि ही ग्रह्नों का स्वरूपरक्षक रम है । इस ग्रङ्गिरोग्नि के ‘ भूत - प्राण ' भेद से दो विवर्त्त हैं । प्रत्यक्षदृष्ट अङ्गाराग्नि भूतलक्षण अङ्गिरो-ऽग्नि है । एवं इस भूताङ्गिरोऽग्नि में प्रतिष्ठारूप से प्रतिष्ठित अङ्गिराप्राण प्राणलक्ष अङ्गिरोऽग्नि है । प्राण को ही विज्ञानभाषा में ' ऋषि ' कहा गया है । जतक भूत में प्राण प्रतिष्ठित रहता है, तभीतक भूत की स्व-रूप - रक्षा होती रहती है । साथ ही जबतक इस प्राण के साथ बाह्य अन्नसम्पत्ति का सम्बन्ध बना रहता है, तभीतक यह प्राण भूतरक्षा - कर्म में सफल रहता है । अङ्गिराप्राण के परीक्षक, अतएव तत्समय की मर्यादा के अनुसार ' अङ्गिरा ' इस यशोनाम से प्रसिद्ध महर्षियोंने अपने वैध यज्ञो में समिधा-धान ( काष्ठाधान ) से इसी का समिन्धन किया है । इसप्रकार दोनों दृष्टियों से – “ समिद्भिर्ह्येत-मङ्गिरम - ऐन्धत " यह वाक्य चरितार्थ होरहा है । " घृतेन बद्ध यामसि " का घृतपद ' घृताच्या ' की भाँति समिन्धनकर्म्मका अनन्य उपालक बनता हुआ ' सामिवेनी ' पद बन रहा है । घृत ही अग्नि का अपना वीर्य्य है । इस पद से समिद्ध अग्नि में इसी वीर्य्य का प्राधान होरहा है || २५ || त्रैलोक्यात्मक सम्वत्सर में व्याप्त होने से यही ' बहन ' है, सर्वत्र अपने ताप से विद्यमान है । साथ ही हमारा यह ग्राहवनीवाग्नि भी सामिधेनियों से समिद्ध होकर महान् बनता हुआ प्रतिशयरूप से प्रज्ज्वलित होरहा है । अवश्य ही आज यह अग्नि यजमान के शत्रुओं के भी शोक का के अभिचार - कर्म में स्पष्ट किया गया है । ' यत्रिष्ठ्य ' यह इस अग्नि कारण बन गया है, जैसाकि आगे का प्रातिविक नाम है । सम्व-के प्रभाव से यह दिव्याग्निसदा त्सराग्नि का पारमेष्ठ्य अमृतसोम से नित्य सम्बन्ध है । इसी अजस्र सोमाहुति समानरूप से प्रज्ज्वलित रहता हुया अजर - अमर तथा नित्ययुवा बना रहता है । ' यत्रिष्ट्य ' से अग्नि के इसी रूप का स्पष्टीकरण हुआ है । क्योंकि प्रकृत ऋचा में ' घृतेन ' पढ है, अतएव “ घृतमन्तरिक्षस्य ” के अनुसार यह ऋचा अन्तरिक्ष- लोकसम्पत्ति की ही संग्राहिका बन रही है । इसप्रकार प्रकृत ऋचा निम्न-लिखित रूप से समिद्ध अग्नि की समिद्ध - प्रक्रिया का इतिहास बतलाती हुई इसके स्वरूप का ही स्पष्टीकरण कर रही है— * -: - ' तस्मादङ्गिरसोऽधीयान ऊर्ध्वस्तिष्ठति ' ( गो ० ना ० पू ० १।६ । ) । : ( देखिये - सा ० छा ० ब्रा ० ३ । २ । १० ) । १२६७

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चतुर्थ अध्याय सापिधेनीबाझरण शतपथब्राह्मण " हे पार्थिव अङ्गिरोडन े ! अङ्गिराप्राण के द्वारा पार्थिवद्रव्यरूप समित से तथा अन्तरिक्ष्य घृत से आप नमिद्ध हैं । इसी समिबन्धनकम्मं से आप त्रैलोक्य में बृहद्रूप से तपते हुए नित्य तरुण बन रहे हैं " " हे आहवनीयस्थ समिद्ध अग्ने! अध्यय्यु नामक ऋत्विक् काष्ठ, तथा घृताधान से आपके स्वरूप की प्रवृद्ध कर रहा है । है नित्यतरुण अग्ने! आप इस समिन्धन-कर्म से महान बनते हुए प्रदीप्त बनिए " । क्योंकि इस ऋचा से अन्तरिक्ष- लोकसम्पत्ति का संग्रह हुआ है, अतएव यह स्वरूपतः अग्निमयी नती हुई भी अनिरुक्ता है । अन्तरिक्षलोक का ग्राकाशत्त्वेन निर्वाचन नहीं किया जामकता | यही अन्तरिक्ष की थानरुक्तता है । इसप्रकार ऋचा के * ' घृतेन ' पद की भाँति ' अनिरुक्त ' भाव भी अनिरुक्त अन्तरिक्ष का संग्राहक बन रहा है । एवं यही तृतीय मन्त्रादों की सक्षिप्त उपपत्ति है ॥ २६ ॥

" तं त्वा समिद्धिः ० " के अनन्तर होता क्रमप्राप्त चौथी ( प्रावृत्ति के अनुसार ६ ठी ) निम्नलिखित सामिधेनी ऋचा का अनुवचन करता है -( ४ ) - ' ओम् स नः पृथुश्रवाय्यमच्छा दव विवाससि । बृहदग्ने सुवीर्य्यम् - ओम् ” इति ( ६ ) वैदिक - परिभाषानुसार ' इयं - अयं इदं ' शब्द पृथिबीलोक के, ' एषः ' शब्द अन्तरिक्षलोक का, तथा ' असौं - अद्ः ' इत्यादि शब्द या लोक से सम्बद्ध हैं । ब्राह्मणश्रति में पटित ' अ ' शब्द उसी पारिभाषिक ' द्युलोक ' की ओर हमारा ध्यान याकर्षित कर रहा है । दद्य लोक, एवं तत्रस्थ दिव्याग्नि, दोनों पृथिव्य-न्तरिक्ष की अपेक्षा ' पृथु ( विस्तीर्ण ) ' है, साथ ही स्तुत्य प्राणदेवताओं के निवास से ' श्रवणीय ' भी है । कौन इस सर्वसुखैकसाधक द्युलोक, तथा दिव्याग्नि की गाथाएँ सुनना नहीं चाहता? । ग्रग्नि के इस पृथुश्रवा-रूप से कहा यही जाता है कि, यह हमारे यज्ञ में समिद्ध होकर यजमान को भी उस श्रवाथ्य दिव्यलोक का पात्र बनावे | द्युलोक जहाँ श्रवाय्य है, वहाँ बीर्य्यशाली - वीर्य्यप्रवर्तक देवताओं के निवास से सुवीर्य भी बन है । साथ ही अपने लोक ( लोक ) के बृहत्साम से ' बृहन् ' भी । प्रस्तुत ऋचा द्युलोक की ही अनुग्राहि-का बन रही है, जिसके संग्राहक ' पृथु ' ' देवाः ' ' बृहत् ' इत्यादि पद चन रहे हैं । ' अग्न आयाहि ० ' इत्यादि ऋचा ' बर्हिष्मती ' है, ' तं वा समिद्धि ऋचा ' वृद्धिमती ' है, एवं प्रकृत - ' स नः पृथुश्रवाय्यम ' - ' नृतेन ' पद, तथा अनिरुक्तभाव के अतिरिक्त ' बर्द्धयामसि ', तथा ' बृहत् ' पद भी इसी ग्रन्त-रिक्षलोक के संग्राहक वन रहे हैं । कारण यही है कि, यह अन्तरिक्ष पृथिवी की अपेक्षा उत्तरोत्तर वरीयान् तथा बृहत् है । १२६८