Shatpath Brahman 1 2 — पृष्ठ 111–120

शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - १-२ - मोतीलाल शास्त्री · पृष्ठ 111–120

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शतपथब्राह्मण २ ख गुड है, एवमेव सूर्य अपने अयनवृत्त के आधार पोमय पारमेष्ठ्य महान् के चारों ओर परिक्रममा लगा रहा है । चान्द्री परिक्रमा जैसे मासात्मिका है, पार्थिवी - परिक्रमा जैसे वर्षात्मिका है, एवमेत्र सौरी परिक्रमा पञ्चविंशति-सहस्रवर्षात्मिका मानी गई है । इस परिक्रमात्रयी का नाम ही है-- ' दर्शपूर्णमास ' नामकी सुप्रसिद्धा नित्यसिद्धा वह यज्ञप्रक्रिया, जिसके आधारपर ही मानवकृत-- वैध-- उस दर्शपूर्णपासयज्ञ की इतिकर्त्तव्यता का शतपथ के प्रथमकाण्ड में सोपपत्तिक निरूपण हुआ जिस के प्रवराश्रावणकर्म के प्रसङ्ग से ही यह परिभ्रमण --चर्चा उपक्रान्त होपड़ी है एक विशेष तथ्य के समन्वय के लिए ही । सूर्य्य -- चन्द्र - भू -- के परिभ्रमणरूप दर्शपूर्णमास से ही पारमेष्ठ्य महान् में, किंवा तद्रूपा महत्-प्रकृति में क्रमशः अहंकृति, प्रकृति, आकृति नाम की प्रथमा प्रकृतित्रयी, एवं सत्त्व - रज- स्तमो नाम की द्वितीया -- गुणत्रयी, रूपेण षट् विवर्त्त अभिव्यक्त होजाते हैं । ज्ञानशक्तियुक्त • कालात्मक - सूर्य्य के परिभ्रमण से महान् में ‘ अहङ्कृति ' नामक प्रकृतिभाव, एवं ' सत्त्वगुण ' नामक गुणभाव अभिव्यक्त होता है | क्रियाशक्तियुक्त - दिगात्मक - चन्द्रमा के परिभ्रमण से महान् में ' प्रकृति ' नामक प्रकृतिभाव, एवं ' रजोगुण ' नामक गुणभाव प्रस्फुटित होता है । एवं अर्थशक्तियुक्त - देशात्मक - भूपिण्ड के भ्रमण से ' आकृति ' नामक प्रकृतिभाव, एवं-- ' तमोगुण ' नामक गुणभाव प्रकट होता है । यों परिक्रमा त्रयीरूपा दर्शपूर्णमासात्मिका यज्ञप्रक्रिया से महत्प्रकृति - षड्भावापन्ना बन जाती है । और यही मानव के महत्प्रकृतिमूलक समस्त स्वरूप का सक्षिप्ततम वह चिरन्तन इतिवृत्त है, जिसे प्रात्यन्तिकरूपेण विस्मृत कर देने के दुष्परिणामस्वरूप ही आज के दिग्देश-कालश्मुिग्ध -- मानव के लिए भारतीया तत्त्वमूला गोत्र - वर्ण जाति - व्यवस्था सर्वथैव मीमांस्या ही प्रमाणित हो रही है । भारतीय - प्राकृतिक -- विज्ञान मानव को जन्मत: ही जिन तीन ऋणों से अधमर्ण ( ऋणी - कर्जदार ) मानता आरहा है, वे ही तीनों ऋण क्रमशः ऋषिऋण, पितृऋण, देवऋण, इन नामों से सुप्रसिद्ध हैं, जिन का सुविशद-- वैज्ञानिक -- विवेचन स्वयं शतपथभाष्य में हीं द्वितीयकाण्ड में-- ' त्रिभिर्वा ऋणाञ्जायते ० ' इत्यादि रूपेण स्वतन्त्ररूप से होने वाला है । प्रकृत में यही वक्तव्य है कि, तीनों ऋण क्रमशः --ज्ञान- क्रिया--अर्थ- प्रधान ऋपिप्राण, देवप्राण, पितृप्रारण, इन त्रिविध प्राणों से ही अनुप्राणित हैं, जिस अनुप्राणन के वैज्ञानिक -- स्वरूप विश्लेषण का अवसर नहीं है । ज्ञ नात्मिका सौरी - बुद्धि का ज्ञानप्रधान ऋषिप्राण से प्रधान सम्बन्ध है, क्रियात्मक - चान्द्र - मन का क्रियाप्रधान देवप्राण से प्रधान सम्बन्ध है, एवं अर्थात्मक भूपिण्ड का अर्थप्रधान - पितृप्राण से प्रमुख सम्बन्ध है । क - भू निष्कर्ष यही है कि, ऋषिप्राण, अहङ्कृतिभाव, सत्त्वगुण, ज्ञानशक्ति, कालात्मक सूर्य्य, सौरी बुद्धि, ये सब विवर्त्त ' एक ( प्रथम ) धरातल पर प्रतिष्ठित हैं । देवप्राण, प्रकृतिभाव, रजोगुण, क्रियाशक्ति, दिगात्मक चन्द्रमा, और चान्द्र -- मन, ये सच विवर्त्त एक ( द्वितीय ) धरातल पर प्रतिष्ठित हैं । एवमेव -- पितृप्राण, आकृतिभाव, तमोगुण, अर्थशक्ति, देशात्मक भूपिण्ड, और भौम- पार्थिव शरीर, ये सब विव-- एक ( तृतीय ) धरातल पर प्रतिष्ठित हैं । सौरी - बुद्धि से अनुप्राणित प्रथम- धरातल का ज्ञानानुगत ऋषिप्राण ही मानव के बुद्धि -- निबन्धन--गोत्रभाव की प्रतिष्ठा भूमि माना गया है । चान्द्र --मन से अनुप्राणित द्वितीय - धरातल का क्रियानुगत देवप्राण ही मानव के मनो -- निबन्धन - वर्णभाव का आलम्बन माना गया है । एवं पार्थिव - भौम - शरीर से अनुगत तृतीय -- धरातल का अर्थानुगत पितृप्राण ही मानव के शरीर -- निवन्धन - जातिभाव का अनुग्राहक माना गया १११

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१ १- कालात्मक: सूर्य: -२ – श्रृङकृतिभावः || ३- सत्त्वगुणः ४- ऋषिप्राणः ५ - ज्ञानशक्तिः ६ - गोत्रसृष्टिः मानवीया बुद्धिः ७-कालानुगता १ किचिदिव श्रावेदन ३ २ १ -- देशात्मकः - भूपिण्डः २- टिगात्मक: - चन्द्रमाः २ - प्रकृतिभावः २-- श्राकृतिभावः ३- रजोगुणः ३- तमोगुणः ४- देवप्राणः ४ -- पितृप्राण: ५ - क्रियाशक्तिः ५ शक्तिः ६ -- वर्ण सृष्टिः ६ -- जातिसृष्टि: मानवीयं मनः मानवीयं शरीरम् ७-७-दिगनुगतम् २ देशानुगतम् ११२ है । यों मानव की पारमेष्ठया - महत्प्रकृति से श्रनुगत श्रहंकृति - प्रकृति- श्राकृति - भाव ही क्रमशः ऋषि देव - पितृ-प्राणत्रयी से श्रनुगत होते हुए गोत्र - वर्ण जाति -त्रयी की मूल प्रतिष्ठाभूमि प्रमाणित होरहे हैं । यहाँ हम एक संग्रहात्मिका तालिका उद्धत कर रहे हैं, जिसके माध्यम से त्रिगुणात्मिका - त्रिप्रकृतिभावसन्विता, श्रतएव षड्भावनिबन्धना - पारमेष्ट्या महत्- प्रकृति से अनुगत ऋषि - देव- पितृ - प्राण- निबन्धन - प्राकृतिक-- विस्तार का सर्वात्मना नहीं, तो अंशतः तो अवश्य ही अनुमान लगाया जासकता है, जिस के यथावत् पारिभाषिक-समन्वय - बोध से पराः परावत बने रह जाने के कारण ही आज बड़े बड़े प्रज्ञाशील - राष्ट्रीय मानश्रेष्ठ भी मारतीय - गोत्र - वर्ण - जाति-- मेद - निबन्धना प्रकृतिसिद्धा वास्तविक स्थिति से विमुख ही बनते जारहे हैं, जिस बैमुख्य के कारण ही भारतीय मानव का उत्तरदायित्त्वपूर्ण पूर्वनिर्दिष्ट - श्रात्मबुद्धिस्वरूप । भिव्यक्तित्त्वमूलक बास्तविक व्यक्तित्व स्मृतिगर्भ में हीं विलीन होगया है । दिग्देशकालातीतः - सर्वातीतः - सर्वव्यापकः - चिदात्मा-" आत्मा " ( मानवीयः )

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शतपथब्राह्मण २ खण्ड वर्णत्र्यत्रस्थामूलक चातुर्वर्ण्य, तथा जातिव्यवस्था, दोनों के सम्बन्ध में ही आज का नवीन भारत निरतिशयरूपेण श्राक्रुष्ट ही बना हुआ है पूर्वोक्त उत्तरदायित्त्व --शून्य - मनःशरीरनिबन्धन -- व्यक्तित्त्व— विमोहनात्मक उस अधिकार -- शब्द मूलक संघर्ष के कारण ही, जो संघर्ष विगत अनेक शताब्दियों से प्रक्रान्त है । अधिकारव्यामोहन के कारण ही भारतीय - वर्णव्यवस्था के प्रति आज का मानब प्रचण्ड - विद्रोही बन गया है, जिस विद्रोह का प्रायश्चित्तरूपेण समादर ही किया जायगा । किन्तु एतावता ही वर्णों को काल्पनिक तो कदापि नहीं माना जासकता, नैत्र जातियों को ही मानवीय कल्पनामात्र पर विश्रान्त किया जासकता, जैसा कि आजकल माना, और बलपूर्वक मनवाया जारहा है । एक सत्र से बड़ी भ्रान्ति तो यही है कि, आज वर्ण, और जाति, दोनों शब्दों को पर्य्याय मान लिया गया है । एवं यही भ्रान्ति प्रमुखरूपेण वर्ण, और जाति के प्रति आक्रोशोत्पत्ति का कारण बनी हुई है । ब्राह्मण - क्षत्रिय - वैश्य - शूद्र - ये जातियाँ नहीं हैं, अपितु ये तो ' वर्ण ' हैं, जोकि प्रकृत्या - जन्मना चार ही भागों में विभक्त हैं, एवं जिन इन प्रकृतिसिद्ध ईश्वरकृत चारों वर्णों का केवल मानवसग में हीं समावेश नहीं है । अपितु विश्व के चर - अचर - जड़ - चेतन - यच्चयावत् प्राणियों - पदार्थों - ओषधि - वनस्पतियों - लता - गुल्मों-धातूपधातुओं, आदि आदि में सर्वत्र चातुर्वर्ण्य - विद्यमान है, जिसका सुविशद - वैज्ञानिक समन्वय - गीताभूमिका-कर्म्मयोग - परीक्षानुगत - ‘ वर्णाश्रमव्यवस्थाविज्ञान ' नामक स्वतन्त्र निबन्ध में किया जा चुका है । जहाँ चार ही हैं, वहाँ जातियाँ चतुरशीतिज़द ( ८४ लाख ) मानीं गई हैं- प्रकृति के पितृ-प्राणनिबन्धन महिमामय विस्तार के कारण, जोकि भारतीय बालकद्ध प्रज्ञा मे - ' चौरासी लाख योनियाँ ' नाम से प्रसिद्ध हैं । इन चौरासी लाख में मानवयोनिरूपा ' मानवजाति ' एक ही जाती है, जिस योनिम्मूला-जाति का पूर्वोक्ता महत्प्रकृति के सर्वान्त के पार्थिव - निबन्धन - स्थूलशरीर से ही प्रमुख – सम्बन्ध - माना गया है, जैसाकि - " आकृतिग्रहरणा जातिः " इत्यादिरूपेण सुप्रसिद्ध है । सचमुच ही तो शरीराकृतिमूला- मानव--योनिर्निबन्धना ' मानवजाति ' तो सम्पूर्ण विश्व में एक ही तो है । कौन इसमें भेद मान रहा है? | शरीरानु-बन्धेन - श्राहारनिद्रादि - शारीरिक धम्र्मों से सभी मानव एक धरातल पर ही तो प्रतिष्ठित हैं । इस तथ्य से पराङमुख होकर जो महानुभाव - चातुर्वर्ण्य के सम्बन्ध में यह तर्काभास उठाते हैं- " ब्राह्मण, और क्षत्रिय-वैश्य - शूद्रादि की आकृति जब समान है, तो फिर जाति भेद कैसा ", उनके इस तर्कामास का सर्वथा ही तो मूलोच्छेद हो जाता है उस समय, जब कि पदार्थमात्र में व्याप्त प्रकृतिसिद्ध ब्राह्मण - क्षत्रिय - आदि भेदनिबन्धन चातुवर्ण्य का, एवं प्रकृतिमूलक - मानत्रसामान्य में एक रूपेण - व्याप्त - जातिर्जातं ' च सामान्यम् ' निबन्धन -- जातिभाव का ' मानवजाति ' रूपेण पार्थक्य समझ लिया जाता है । भारतीय - ऋषिने कदापि ' जाति ' को कोई प्रमुख प्रश्रय नहीं दिया है । अपितु अमुक - सीमापर्य्यन्त प्रकृतिनिबन्धन चातुर्वण्य का ही समादर किया है, जिसका अन्ततोगत्वा विश्राम हुआ है ऋषि के द्वारा ऋषिप्राणनिबन्धन – श्रहङ कृतिमूलक - उस ' गोत्रभाव ' पर ही, जिसके सम्बन्ध में ' गोत्रं नोऽभिबर्द्धन्ताम् ' ग्रह मङ्गलाशी: प्रसिद्धा है । वंशानुगति निबन्धना गोत्रमुला - परम्परा का उत्कृष्टत्त्व ही वह वास्तविक्री अधिकार-मर्य्यादा है, जिस का प्रमुखरूपेण भारतीय - शास्त्रीय व्यवहार, तथा लौकिक व्यवहार में समादर हुआ है । एवं प्रस्तुत प्रवरणब्राह्मण के द्वारा इसी तथ्य का अनेक दृष्टियों से स्वरूप - समन्वय हुआ है, इत्यलं -प्रासङ्गिकेन - प्रवरानुगत- अधिकार - शब्द - निबन्धन- संस्मरणेन । ( २१ ) - १२ ११३

पृष्ठ 114

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श्रीः [ २२ ] - स्रु गादापनानुगत - आश्रावण - प्रत्याश्रावण - कर्म्म- प्रसङ्गतः कतिपय ग्रामुष्मिक, ऐहिक - फलानुबन्धी-" वैज्ञानिक - सन्दर्भों का संस्मरण " १३ गादापनानुगत- ' आश्रावण - प्रत्या श्रावण ' - नामक क्रमप्राप्त बाईसवें ( २२ ) प्रमुख कर्म्म की इतिकर्त्तव्यता के प्रसङ्ग से भी अनेक वैज्ञानिक तथ्यों का प्रासङ्गिक स्वरूप - समन्वय प्रयास हुआ है, जिनमें से श्रत्र उदाहरणरूपेण एक दो वैज्ञानिक तथ्यों का संस्मरण ही पर्याप्त होगा । मुष्मिक परोक्षफल के अनुगामी श्रदृष्ट - प्रेमियों के अनुरञ्जन के लिए, एवं ऐहिक - प्रत्यक्षफल के अनुवर्त्मा भूतवादियों की तुष्टि के लिए वे ही उदाहरण अत्र क्रमशः उपस्थित होरहे हैं । ( क ) - स्रुगादापन कर्म्म --निबन्धन - प्राणानुगत- अदृष्ट - भाव का संस्मरण-' स्वस्त्ययन जपकर्म्म ' के अनन्तर ' होता ' नामक ऋत्विक् के द्वारा होने वाला अमुक - निगद-मन्त्रात्मक - पाठ ही ' स्रुगादापन कर्म कहलाया है, जिसकी अन्यान्या उपपत्तियों में से प्रधान उपपत्ति है-' मानुषभावनिबन्धन- प्रज्ञापराध का उपशम ' । प्राणप्रधान देवदेवतात्रों के यजनात्मक सङ्गमन से सम्बन्ध रखने वाला दिव्यप्राणात्मक ' यज्ञकर्म ' अपने आधारभूत श्रदृष्ट-- प्राण के अनुबन्ध से प्रधानरूपेण ' अदृष्टभाव ' प्रधान ही कर्म है । आकाश - वायु - तेज - जल- मृत् नामक पञ्चपञ्चीकृत, अतएव ' महाभूत ' नाम से प्रसिद्ध, अतएव च प्रत्यक्षदृष्ट भूतों से अनुगता शब्द - स्पर्श - रूप - रस - गन्ध - नाम की पञ्चतन्मात्राओं से सर्वथैव असंस्पृष्ट, अतएव अधामच्छद - सुसूक्ष्मतम पञ्चमहाभूताधार - तत्त्वविशेष ही ' प्राण ' है । प्रज्ञानमन से समन्वित पञ्चेन्द्रियवर्ग उह्नीं भूतभौतिक विषयों का प्रत्यज्ञानभव कर सकता है, जिनका शब्द - स्पर्शादि पञ्चतन्मात्राओं से सम्बन्ध रहता है । ' प्राण ' तत्त्व क्योंकि पञ्चतन्मात्राओं से संस्पृष्ट- अतीत है । अतएव प्रज्ञानमनः- सम्परिष्वक्त कोई भी इन्द्रिय उसका साक्षात्कार नहीं कर सकती । इस ' इन्द्रियातीतत्त्व ' धर्म्म के कारण ही ' प्राण ' को ' अदृष्ट ' - ' परोक्ष ' ' इन्द्रियातीत आदि अभिधानों से समन्वित माना गया है । क्योंकि ' यज्ञ ' शब्द प्राणरूप देवदेवताओं के यजन - सङ्गतिकरण - दानात्मक भावों से ही अनुप्राणित है, अतएव प्राणदेवप्रधान यज्ञकर्म को श्रवश्यमेव प्रमुखरूपेण ' श्रदृष्टफलजनक ' ही माना जायगा । * - ' यज ' - देवपूजा - सङ्गतिकरण - दानेषु ( पाणिनीय - धातुपाठे ) । ११४

पृष्ठ 115

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शतपथब्राह्मण २ खराड प्राणनिबन्धना ऋदृष्टता ही वह ' परोक्षता ' है, जिसके आधार पर ही — ' परोक्ष प्रिया इत्र हि देषाः, प्रत्यक्षद्विषः ' ( अर्थात्- प्राणदेवता परोक्ष से ही अनुगत रहते हैं, एवं प्रत्यक्ष से शत्रुता ही रखते हैं ) यह श्रौत - निगमवचन व्यवस्थित हुआ है । श्रात्मानुगत ' प्राण ' जहाँ शाश्वततत्त्व है, अमृततत्त्व है, अजरभाव है, वहाँ विश्वानुगत ' वाङमय भूत ' परिवर्तनशील है, मर्त्यभाव है, नीर्णभावानुगत है । प्राण ही भूत की प्रतिष्ठा है । प्राण ही वह अक्षरात्मक कूटस्थ - अविच्छिन्न सूत्र है, जिसके आधार पर प्रतिष्ठित रहने वाले क्षरकूटस्थ - भूतभौतिक- परमाणु संघातभाव में परिणत होते हुए अमुक अवधि पर्यन्त स्वस्वरूप से अभि-व्यक्त होते रहते हैं । जत्रतक कूटस्थ अक्षरप्राण - क्षरकूट की प्रतिष्ठा बना रहता है, तभीतक भूतभौतिक पदार्थों की स्वरूपाभिव्यक्ति है । प्राणसम्बन्ध के विच्छिन्न होते ही तदाधार पर प्रतिष्ठित भूतपिण्ड विशकलित होजाते हैं, बिखर जाते हैं । यही इनका श्रव्यक्तभाव है, जिसे स्थूल भाषा में ' विनाश ' कहा गया है । स्वस्वरूपेण अपने क्षरण - धर्म से भूतभाव अव्यक्त भावानुगत ही बना रहता है, जो प्राणाधारदशा में जहाँ व्यक्तभावापन्न है, वहाँ प्राणवियोगदशा में वही पुनः अव्यक्तभावापन्न है । यों आरम्भक्षणे -- अव्यक्त, -- व्यक्त, मध्यक्षणे पुनः तृतीयक्षणे -- अव्यक्त, यही मर्त्य मृतों का सम्पूर्णं जीवने तिवृत्त - स्वारम्य बना हुआ है । भूतभौतिक पदार्थों में सापेक्षभाव - निबन्धना जो बलवत्ता प्रतीत होरही है, वह वस्तुतः ' प्राणशक्ति ' की ही महिमा है । प्राणचल ही भूत का वास्तविक वल है । जिस दिन धारावाहिक बलान्वित प्राणबन्धन शिथिल होजाता है, उसी दिन भूतबल विलीन होजाता है । प्राण क्योंकि पूर्व - कथनानुसार परोक्षधर्म्मा है । इसलिए भी भारतीय आदर्शपद्धति में प्रत्यक्षापेक्षया परोक्षभावों को ही प्रधानता दी गई है । इसी दृष्टि से भारतीय समस्त विधि - विधान वाङ्मयी घोषणा से, तदनुप्राणिता प्रदर्शन- प्रचार परम्पराओं से तटस्थवत् बने रह कर ही प्रवृत्त हुए हैं, होने चाहिएँ, जैसाकि पूर्व के संस्मरण में भी आत्रेयी वाक् के अनुबन्ध से स्पष्ट किया जाचुका है ( देखिए पृ ० सं ० २० ९ ) । भारतीय आर्ष- मानव प्रत्यक्ष दृष्ट की अपेक्षा परोक्ष - अदृष्ट को ही क्यों प्रमुखता प्रदान करता है?, प्रश्न का भी प्राणनिबन्धन यही प्रासङ्गिक समाधान है, जिस इत्यंभूता प्राणा-नुगता परोक्षता से अनुगत यज्ञकर्म भी परोक्ष - श्रदृष्ट भावों से ही समन्वित हो रहा है । इत्थंभूत श्रदृष्टभावापन्न-यज्ञकर्म में दृष्टभावप्रधान - लोकाभिमुख - सेन्द्रिय - मानव के द्वारा ज्ञातरूपेणैव त्रुटि होजाना स्वाभाविक ही है । और अनृतसंहित - मानव के द्वारा होने वाली त्रुटि से दिव्यप्राणातिशयरूप - यज्ञकर्म का दोषपूर्ण बन जाना भी स्वत: सिद्ध ही है, जोकि दोषपूर्ण यज्ञ यज्ञकर्त्ता यजमान के लिए इष्टसाधकता के स्थान में अनिष्ट का ही जनक बन जाता है । इसप्रकार के प्रचण्ड - दोष की निवृत्ति के लिए, दूसरे शब्दों में यजमान - ऋत्विग्गण- आदि मानवों के द्वारा अज्ञातरूपेणैव होपड़ने वाले श्रदृष्टदोषात्मक प्रतिबन्धक के उपशम के लिए जो वैज्ञानिक कर्म्म व्यवस्थित हुआ है, उसीका नाम है— ' सुगादापनकर्म्म ', जिसके इत्थंभूत प्राणात्मक - परोक्ष - अतिशय - का ही तत् - कर्म्म-प्रसङ्गतः विस्तार से स्वरूप - विश्लेषण हुआ है । प्रज्ञापराधजनित दोष के परिमार्जन से अनुप्राणित गादापन निगद पाठात्मक व गादापन - कम्मं के द्वारा एक अन्य यज्ञानुबन्धी- आवश्यक तथ्य का भी संग्रह होरहा है, और वही इस कर्म्म का दूसरा वैज्ञानिक-* - श्रव्यक्तादीनि भृतानि, व्यक्तमध्यानि भारत! । व्यक्त निधनान्येव तत्र का परिदेवना ॥ - गीतायाम् ११५

पृष्ठ 116

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किञ्चिदिव श्रावेदन समन्वय है, जिसका यज्ञातिशयरूप श्रदृष्टभावापन्न - ' दैवात्मा ' से ही सम्बन्ध माना गया है । जिसप्रकार प्रकृति-सिद्ध सौर- सम्वत्सर - रूप - अग्नीषोमात्मक- नित्ययज्ञ से अनुप्राणित दाम्पत्य- भावानुबन्धी- आग्नेय- रजोभाव, तथा सौम्य - शुक्रभाव के - रासायनिक सम्मिश्रण से गर्मानुगत पूर्व ' भूतात्मा ' ( देहाभिमानी - जीवात्मा ) की अभि-व्यक्ति होती है, ठीक उसी प्रकार इस मनुष्य - यजमान के अग्नीषोमात्मक - वैध -- यज्ञ से यजमान के भूतात्मा के साथ ग्रन्थिवन्धन -- सम्बन्ध करता हुआ एक अपूर्व - नवीन - यज्ञातिशयरूप -- ' यज्ञात्मा ' अभिव्यक्त होपड़ता है, एवं इसी का पारिभाषिक नाम रक्खा गया है - ' दैवात्मा ', जो श्रद्धासूत्र के द्वारा यजमान के भूतात्मा से अर्कमाध्यमेन - सम्बन्ध रखता हुन्ना सप्तदशस्थानीय - त्रिणाचिकेत नामक ' स्वर्ग ' में प्रतिष्ठित होजाता है । जब यज्ञकर्त्ता यजमान का भूतात्मानुगत ऐहिक आयुःकाल सर्वात्मना मुक्त होजाता है, तो तदनन्तर दैवात्माकर्षण से यह भूतात्मा तत्स्वर्गप्रदेश में हीं चला जाता है । अवश्य ही श्रदृष्टभावापन्न प्राणात्मक यज्ञ से अभिव्यक्त दैवात्मा भी हमारी भूतदृष्टि से दृष्ट है, एवं सप्तदशस्थानरूप स्वर्ग भी प्राणप्रधान बनता हुआ दृष्ट ही है । किन्तु विज्ञानदृष्ट्या यह सभी कुछ दृष्ट ही बना हुआ है । मानवीय - वैध - यज्ञ उस प्रकृतिसिद्ध ईश्वरीय यज्ञ की ही प्रतिकृति, किंवा प्रतिरूप, अथवा तो प्रतिमान है । तव ईश्वरीय प्रजासर्ग में जो जो भाव -अङ्ग - प्रत्यङ्ग- समाविष्ट रहते हैं, इस मानवीय -वैध - यज्ञ में भी उन उन सभी भाव - श्रङ्गादि का समावेश अनिवार्य्यं वन जाता है । गादापन कर्म के द्वारा यज्ञातिशयरूप दैवात्मा के दिव्यशरीर में अवान्तर - नवविध आध्यात्मिक प्राणों का ही श्राधान किया जाता है संख्यासम्पदनुगत - निदानभाव के माध्यम से ही, जिस इस नवप्राणाधानकर्म्म का भी श्रदृष्ट - प्राणनिबन्धनत्त्वेन परोक्ष भाव से ही सम्बन्ध माना जायगा । संख्यासम्पदनुगत -- निदान भाव के स्वरूप- विश्लेषण का श्रत्र अवसर नहीं है । सन्दर्भ - सङ्गति के लिए इस सम्बन्ध में यही निवेदन पर्याप्त मान लिया जायगा कि, वैदिक विज्ञान के प्राय: - सभी अनुबन्ध संख्या-नुगत - निदानभात्रों के माध्यम से ही व्यवस्थित हुए हैं छन्दोभावानुबन्धेन । वस्तुओं का बहिःसीमात्मक-- बाह्य--मण्डल ही तद्वस्तु का ' छन्द ' माना गया है, जिसका अक्षरानुगता संख्याओं से ही प्रधान - सम्बन्ध रहता है । अमुक - अक्षरान्वित -- अमुक छन्द से श्रनुगता श्रमुक - वस्तुसम्पत्ति के संग्रह के लिए तच्छन्दोऽनुगत संख्याभाव को भी ऋषि ने प्रमुखता प्रदान की है । स्रुगादापनकर्मानुगत ' निगद्मन्त्र ' में क्योंकि ६ ( नव ) व्याहृतियां हैं, अतएव इस निगदपाट को नवभावात्मक ही माना गया है । * स्रुगादापन कर्म्मनिबन्धना ह - व्याहृतियाँ निम्नलिखितरूपेण सुप्रसिद्ध हैं— १ - अग्निर्होता २ - वेचग्नेर्होत्रम् ३ - वेत्तु प्रावित्रम् ५ - घृतवतीमध्वर्यो! स्रुचमास्यम्ब ६ - वयुवं विश्श्वाराम् ७ ईडाम है देवाँ ३ ॥ ईडेन्यान् ४- साधु ते यजमान! देवता ८- नमस्याम नमस्यान् - यजाम यज्ञियान् इति - स्र ुगादापन निगद्पाठः- नव ( ६ ) व्याहृत्यात्मकः ) ११६

पृष्ठ 117

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शतपथब्राह्मण २ खण्ड एक से आरम्भ कर सहस्र - लक्ष -- अयुत - परम परार्ध्यादि संख्या- विस्तार - क्रम पर्य्यन्त ऋषि ने संख्या-सम्पदनुगता यज्ञसम्पत्तियों का पदे पदे स्वरूप - त्रिश्लेषण किया है, जोकि संख्यासम्पदनुबन्धी - नैदानिक - रहस्य स्वतन्त्र अध्ययन का ही विषय माना जायगा । कहीं एक - दो - चार छ - आठ - श्रादि युग्म संख्याओं के माध्यम से * यज्ञसम्पत्ति - परम्पराओं का समतुलन हुआ है, तो कहीं एक-- तीन- पाँच सात -- नव -- आदि - श्रयुग्म- संख्याओं से संख्यासम्पत् का संग्रह किया गया है । प्रकृत में निवेदनीय यही है कि, स्रुगादापन - निगदमन्त्र में क्योंकि व्याहृतियाँ हैं । अतएव इनसे संख्यासम्पत्-- के माध्यम से नवविध - उन प्राणों का भी निदानभावेन ग्रहण होजाता है, जोकि नवविध ग्रङ्गप्राण सन्त- शीर्षण्यप्राण, द्विविध श्रवाञ्चप्राणरूप से नौ संख्याओं से सम-न्वित माने गए हैं । इसप्रकार स्रुगादापन कर्म्म के द्वारा अदृष्ट - प्राणसंग्रह तथा नवविध अङ्गप्राणाधान, रूप दो महान् लक्ष्य सम्पन्न होजाते हैं, एवं प्रस्तुत प्रथम वैज्ञानिक प्रसङ्ग का यही संक्षिप्ततम स्वरूप-संस्मरण है । ( ख ) - श्रावण - प्रत्याश्रावण - निबन्धन - परोक्ष - दिव्यभाव का संस्मरण – स्रुगादापनकर्म्म के अनन्तर तद्ब्राह्मण ( ' स्रुगादापनब्राह्मण ' ) में ही आगे चलकर - ' आश्रावण-प्रत्याश्रावणकर्म्म ' की इतिकर्त्तव्यता का स्वरूप समन्वय हुआ है, जिसते अनुप्राणित दिव्य प्राणनिबन्धन, अतएव परोक्षभावात्मक ही वैज्ञानिक तथ्य के सम्बन्ध में भी किञ्चिदिव संस्मरण कर लेना प्रासङ्गिक नहीं माना जायगा । इस सम्बन्ध में एक आधिदैविक - वैज्ञानिक आख्यान का अनुगमन करती हुई श्रुति कहती है कि— “ एकबार यज्ञ देवमण्डल से अपक्रान्त होगया, विदूर होगया । बिना यज्ञ के क्योंकि देव-देवताओं की स्वरूप - रक्षा असम्भव थी, अतएव देवदेवताओं ने अपक्रान्त यज्ञ का उपलालन-भाषा में इसप्रकार आमन्त्रण किया कि - - ' हे यज्ञ! आप हमारी सुनिए!, एवं हमारी ओर पुनः श्रनुगत होजा ३ ए! । यज्ञदेवता देवदेवताओं के तथाभूत आमन्त्रण पर देवदेवताओं की ओर परावर्तित होगए । पुनरागत इस यज्ञ से देवदेवताओंनें अपना यजनकर्म्म सम्पन्न किया । इसी यज्ञात्मक यजन के प्रभाव ' वे ' देवदेवता ' रूपेण सुरक्षित बने रह गए " । * -- एकं वा इदं विबभूव सर्वम् द्वन्द्व ं पात्राण्युदाहरति चतुष्टयं वा इदं सर्वम् षड् वा ऋतवः सम्बत्सरस्य अष्टाक्षरा वै गायत्री —इत्यादि - युग्मसंख्योदाहरण ११७ ÷ एका च मे, तिस्रश्च मे, पञ्च च मे, सप्त च मे, नव च मे, — इत्यादि - श्रयुग्म संख्योदाहरण

पृष्ठ 118

शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - १-२ - मोतीलाल शास्त्री, पृष्ठ 118 का मूल पृष्ठ
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किञ्चिदिव श्राबेदन उक्त श्राधिदैविक- श्राख्यान का निष्कर्षार्थ यही है कि, सोरसम्वत्सर- यशमण्डल से यज्ञाग्नि प्रवृक्त होकर कृष्णमृगरूप में परिणत होकर भूपिण्ड की वस्तु बन जाया करता है, जिस इस रहस्य - - पूर्ण - यज्ञाप-क्रमण का पूर्वप्रकाशित- प्रथमखण्ड में हविः पेषणकर्म्म ' प्रसङ्गतः कृष्णमृगचर्म्म के वैज्ञानिक तथ्य का समन्वय करते हुए विस्तार से निरूपण किया जाचुका है - ( देखिए प्रथम काण्डानुगत - प्रथमखण्ड की पृष्ठ सं ०.६५ से ५२२ पृष्ठ पर्य्यन्त ) | सीरसम्बत्सर मण्डलात्मक दिव्ययज्ञ में अग्नि होता हैं, वायु श्रध्वर्यु हैं, श्रादित्य उद्गाता है, चन्द्रमा ब्रह्मा है, एवं स्वयं सम्वत्सर प्रजापति यज्ञकर्त्ता यजमान हैं । इन चारों ऋत्विजों के शस्त्र - स्तोत्र - ग्रह-- ब्राह्म नामक चारों कर्मों के संविदानात्मक ऐकमत्य से, एकीभाव से, एकतानतानुगता-अविच्छिन्ना कर्म्मधारा से ही पार्थिव - कृष्णमृगरूप - यज्ञ पुनः स्त्र- लोकात्मक - सौर - देवमण्डल में त्रित-संचित होजाता है | यो प्राकृतिक- प्राणदेवताओं के ' श्रामन्त्रणरूप - संविदानकर्म्म ' से ही अप्रक्रान्त यज्ञ पुनः देवमण्डलानुगत बन जाता है । और इसी संविदानात्मक आमन्त्रणकर्म की याज्ञिकी अभिधा है ‘ श्रश्रावरण - प्रत्याश्रावणकर्म्म ' । यज्ञकर्ता मनुष्य - यजमान का वह आधिदैविक - सौरसम्वत्सरानुगत - सप्तदश- स्तोमस्थ - दिव्ययज्ञ इसके पार्थिव - भौतिक- जन्मानुबन्ध से ही मानो पलायित है, जिस दिव्यभाव - पलायन से ही इसके भूतात्मा को यहाँ जन्म लेना पड़ा है । आज यज्ञ के द्वार । यह उसी दिव्यभाव का अपने भूतात्मा में पुनः सन्धान करना चाहता है । श्रतएव इसे भी अपने ऋत्विजों के सहयोग से सविदानरूपा उसी एकतानता का अनुगमन करना पड़ेगा, जैसी कि एकतानता दिव्यदेवताओं से श्रनुगत रहती है । एवं श्राश्रावण - प्रत्याश्रावण - कर्म्म का यही प्रमुख लक्ष्य है । अपक्रान्ता - वह यज्ञसम्पत्ति, जिसका प्रधान क्षेत्र त्रिणाचिकेतरूप - सप्तदशस्तोम-माना गया है - यज्ञकर्त्ता की ओर अनुगत होजाय, यही इस कर्म्म का फलितार्थ है । प्रस्तुत कर्म्म में ' श्रो श्रात्रय ' - ' अस्तु श्रष्ट ' ' यज '. ' ये यजामहे ' ' यज ' ' वौषट् ये पाँच व्याहृतियाँ हैं, एवं अक्षर हैं सत्रह । पाँच ( ५ ), और सत्रह ( १७ ) इन द्विधा विभक्ता - संख्याओं का भी इस कर्म के माध्यम से एक विशेष अतिशय माना गया है । सर्वप्रथम अध्वर्यु होता के प्रति श्र श्रावय ' इस व्याहृति का उच्चारण करता है, जिसका यही स्वारस्य है कि, ' हे होत! आप इस यज्ञकर्त्ता यजमान को, एवं इसके इस भूतयज्ञ को दिव्यदेवताओं के लिए सुना दें | इस प्रथमा व्याहृति के अनन्तर होता ' अस्तु श्रौषट्ं इस द्वितीया व्याहृति का उच्चारण करता है, जिसका तात्पर्य्यार्थ यही है कि, –'देवदेवतार्थोनें यज्ञ को सुन लिया है ' - अर्थात् ' देवदेवता यज्ञ के श्रभिमुख होगए हैं ' । इसीप्रकार संविदानभाव से ही ' यज ' ( आगत देवताओं का यजन करो ' ), - ' ये यजामहे ' ( ' समागत देवदेवताओं का यजन किया जारहा है ' ) - इन तृतीया - चतुर्थी - व्याहृतियों के श्रनन्तर ' वौषट् ' रूपा पञ्चमी व्याहृति के साथ ही आहुति दे दी जाती है, एवं पञ्चव्याहृत्यात्मक - इसी कम्र्म्मविशेष का नाम है- ' आश्रावण - प्रत्याश्रावरण ' कर्म्म, जिसके द्वारा वैध - यज्ञ में अदृष्ट - दिव्य - पाङ तयज्ञ की पाङका सम्पत्ति ' ( पञ्चावयवसम्पत्ति ) का आधान होजाता है पांच व्याहृतियाँ के द्वारा, एवं श्रदृष्टा परोक्षभावापन्ना - स्वर्गसम्पत्तिरूपा - सप्तदश-स्तोमसम्पत्ति का प्रधान होजाता है पञ्च व्याहृतियों के सत्रह अक्षरों के द्वारा । यों श्राश्रावाण -- प्रत्याश्रावण -कर्म्म भी सुगादापनकर्म्मवत् इस वैध - यज्ञ में परोक्ष - दिव्यमावों का ही श्राधानकर्ता प्रमाणित होरहा है । विश्वस्वरूप – सम्पादक प्राकृतिक यज्ञ पाङक्त ( पञ्चावयव ) ही कहलाया है, जिस पाङता का विशद वैज्ञानिक - स्वरूप प्रथम - खण्ड में किया जाचुका है । अनुगमभावनिबन्धना इस पाङ लता का उस ' सर्वहुत-११८

पृष्ठ 119

शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - १-२ - मोतीलाल शास्त्री, पृष्ठ 119 का मूल पृष्ठ
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शतपथब्राह्मण २ खण्ड यज्ञ ' से भी सम्बन्ध माना गया है, जिसका पञ्चपर्वा प्रकृति के साथ तादात्म्य प्रसिद्ध है । एवं प्रकृति के पञ्चविध - प्राकृत - प्राणों के पञ्चीकरणात्मक - सर्वाहुतिरूप - समन्वय से ही जिस - ' सर्व हुतयज्ञ ' की स्वरूपाभि-व्यक्ति हुई है । स्वायम्भुव ब- - ' पारमेष्ठ्य - सौर- चान्द्र - पार्थिव - भेदभिन्न पञ्चविध - पञ्चावयव - विश्वात्मक महान् यज्ञ ही वह ' सर्वहुतयज्ञ ' है, जिसके आधार पर ही अत्यान्य व्यष्टियज्ञ श्राविर्भूत हैं । श्रो श्रावयादि पाँचों व्याहृतियों से सर्वहुतयज्ञ निबन्धना - इस पाङका - यज्ञसम्पत्ति का अवश्यमेव संग्रह गतार्थं बन जाता है । पार्थिव - ' सप्तदशस्तोम ' ही वह श्राहवनीयकुण्ड है, जिसमें स्वर्ग्याग्नि प्रतिष्ठित माना गया है, एवं जिसके सम्बन्ध मे महाभाग नचिकेता ने महान् देव यमराज से प्रश्न किया है । पञ्चव्याहृति के अक्षर सत्रह होजाते हैं । अतएव इस संख्या सम्पत्ति से स्वर्गसम्पति का भी इस वैधयज्ञ में प्रधान गतार्थ बन जाता है । इसी आधार पर यज्ञात्मरूप प्रजापति - ' सप्तदशो वै प्रजापतिः ' रूपेण उपस्तुत है । इसी तथ्य के माध्यम से याज्ञिक - सम्प्रदाय में यह सूक्ति प्रचलित है कि-चतुर्भिश्च चतुर्भिश्च द्वाभ्यां पञ्चभिरेव च । हूयते च पुनर्द्वाभ्यां तस्मै यज्ञात्मने नमः ॥ 1- श्राव ( १ ) -" श्रो-- चतुर्भिश्च १ २ ३ I ( २ ) “ झ - स्तु--श्रा- -षट " - चतुर्भिश्च १ २ ३ I " य-( ३ ) --- द्वाभ्याम् १ २ - य - - जा-- म- --हे " ( ४ ) -- पश्चभिरेव च १ २ ३ ४ ५ ( ५ ) -" चौ– – षट् ” - हूयते च पुनर्द्वाभ्याम् १ २ " तस्मै - यज्ञात्मने - सप्तदशप्रजापतये नमः " ( ग ) - श्र श्रावाण - प्रत्याश्रावण - कम्र्मानुगत - प्रत्यक्षभावापन्न - दृष्टफल का संस्मरण— मन्त्रब्राह्मणात्मक- वेदशास्त्र के यज्ञकर्म्म - प्रधान ' विधि ' रूप ' ब्राह्मण ' भाग से अनुप्राणिता ज्ञान-विज्ञानात्मिका - सृष्टि विद्या निबन्धना - जिन अमुक - परिभाषाओं का पूर्व के सन्दर्भों के माध्यम से अबतक संस्मरण किया गया है, वे सभी संस्मरण ' प्राण ' - प्रधान बनते हुए प्राणनिबन्धना परोक्षभावात्मिका उस ११६

पृष्ठ 120

शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - १-२ - मोतीलाल शास्त्री, पृष्ठ 120 का मूल पृष्ठ
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किञ्चिदिव श्रावेदन अदृष्ट स्थिति के, किंवा उस परोक्ष- अदृष्ट फल के ही समर्थक प्रमाणित होरहे हैं, जिन इत्थंभूत - श्रदृष्ट-परोक्ष - संस्मरणों के द्वारा उस भूतत्रादी - प्रत्यक्षफलवादी - दिग्देशकालोपयोगितावादी - वर्तमानवादी - का कदापि श्रनुरञ्जन सम्भव नहीं है, जिसने अपने मानवीय स्वरूप का सम्पूर्ण - इतिवृत्त प्रकृतिनिबन्धन ' वर्त्त-मान ' पर ही परिसमा'त मान रखा है । इसी स्थिति का ओर भी अधिक स्पष्टीकरण अपेक्षित हो, तो आज के प्रावाहिक - युग में विशेष रूप से प्रचलित - ' यथार्थ ' शब्द को लक्ष्यारूढ बना लेना हीं पर्याप्त होगा । भावुक मानवों की दृष्टि में आदर्श, और यथार्थ, दोनों जहाँ विभिन्नवर्त्मा हैं, वहाँ नैष्ठिक - आर्य - मानवश्रष्ठों की निष्ठादृष्टि में जो श्रादर्श है, वही यथार्थ है । एवं आदर्श की सीमा से बहिष्कृता - मनोऽनुगता - मान्यता से उपकल्पित ' काल्पनिक--यथार्थ ' तो सर्वथैव ' श्रयथार्थ ' ही बना रह जाता है । भूतभौतिक -- प्रपञ्च को यदि ' यथार्थ ' मान लिया जाता है, तो तदाधारभूत भौलिक - प्राणपञ्चक को ही ' आदर्श ' का स्थान दिया नासकेगा । प्राणपञ्चकरूप आदर्श की मनोऽनुगता कल्पना के आधार पर ही क्योंकि बलचिति के द्वारा भूतात्मक व्यक्त - यज्ञ - भावों का चया होता है । अतएव कहा जासकता है कि - " श्रव्यक्तावस्थापन - प्राणात्मक - आदर्श का व्यक्तावस्था-पन भौतिकरूप ही ' यथार्थ ' की स्वरूप - परिभाषा है " । यो आदर्श ही यथाथ रूप में परिणत होरहा है स्वयं उपनिषदोंनें भी ' यथार्थ ' रूप ' याथातथ्य ' की यही स्वरूप- परिभाषा की है । स्वायम्भुव त्रयी-रूप - ब्रह्मप्राण, तथा पारमेष्ठ्य - अथर्वरूप सुब्रह्मप्रारण, इन दोनों मौलिक प्राणों को ' प्रश्नोपनिपत् ' ने क्रमशः ' प्राण ' और ' रयि ' यह संज्ञा रक्खी है, एवं दोनों के रासायनिक - सम्मिश्रणात्मक - दाम्पत्य से ही तदुपनिषत्ने सम्पूर्ण - भूत - भौतिक -- प्रपञ्च की यथार्था स्वरूपाभिव्यक्ति मानी है | ब्रह्मप्रारूप ब्रह्माग्नि में सुबारविरूप सुब्रह्मसोम की आहुति होने से प्राणमूला - भूततू ना - सृष्टि अभिव्यक्त हुई है, और यही आदर्श-मूला यथार्थभावनिबन्धना ब्रह्म - सुब्रह्मात्मिका - शुक्रभावानुगता सृष्टि का यथार्थ स्वरूप --दिग्दर्शन है, जिसका निम्नलिखित ईषोपनिषद्वचन से स्पष्टीकरण हुआ है-स पर्य्यगाच्छुक्रम कायमत्रणमस्नाविरं शुद्धमपापविद्धम् । कविर्म्मनीषी परिभूः स्वयम्भूः- याथातथ्यतोऽर्थान् -- व्यदधात् शाश्वतीम्य: - समाभ्यः । - ईशोपनिषदि स्वयम्भूः - याथातथ्यतः - श्रर्थान् -- शाश्वतीभ्यः - समाभ्यः ' वाक्यसन्दर्भ का ऋजुतम यही अक्षरार्थ है कि - अव्यक्त - प्राणमूर्ति, अतएव मूलप्रतिष्ठात्मक - ' मूल- आदर्श ' रूप स्वयम्भू प्रजापति ही यथार्थरूप से अर्थात्मक - भूत - भौतिक - प्रपञ्चात्मक - विश्व का सदा के लिए निर्माता बना हुआ है " । यों आदर्श ही ययार्थ बना हुआ है, जिस इस श्रौपनिषद - अर्थ को सर्वात्मना समर्थन प्राप्त है ऋक्संहिता के सर्वान्त के उस सुप्रसिद्ध मन्त्रभागानुगत श्रमुक वाक्य विशेष को, जिस अमुक वाक्य के ' घाता यथापूर्वमकल्पयत ' स्वरूप से सभी वेदवित् सुपरिचित हैं । ' धाता ' स्वयम्भू - ब्रह्म हैं, जो श्रादर्शमूर्ति हैं, एवं यथापूर्व - व्यवस्थित-विश्व ही ' यथार्थ ' है, जिसकी आधारभूमि ' आदर्श रूप ' स्वयम्भू ही बने हुए हैं । ' प्राणो यज्ञेन कल्पताम् ’ १२०