Shatpath Brahman 1 2 — पृष्ठ 101–110

शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - १-२ - मोतीलाल शास्त्री · पृष्ठ 101–110

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शतपथब्राहागा २ खण्ड उक्त आख्यान के द्वारा प्रस्तुत प्रक्रान्त - यज्ञकर्म के सम्बन्ध में एक विशेष प्रश्न का समाधान करती हुई आगे जाकर शतपथी श्रुति कहती है कि - " क्योंकि वाक् ने - प्रजापति से तटस्थता ग्रहण करली थी । श्रतएव यज्ञानुष्ठानों में साक्षात् - प्रजापति के लिए आहुतिद्रव्य - प्रदानादि जो भी कर्म किए जाते हैं, वे उपांशु, अर्थात् -- तूष्णीं भाव से ही अनुप्राणित रहते हैं । क्योंकि - " अहव्यवाढि बाकू प्रजापतये -- आसीत् ” । उक्त श्राख्यान के माध्यम से ऋषि मानवीय उन कम्र्मों के सम्बन्ध में एक विशेष - शिक्षा प्रदान करं रहे हैं, जिन कर्म्मविशेष ) का आभ्यन्तरा मानसी - श्रात्मनिष्ठा से सम्बन्ध - माना गया है । लोक - सामान्य से अनुप्राणित लौकिक सामान्यकर्म्म ' प्राकृतिककर्म्म ' कहलाएँ हैं, जिनसे तात्कालिक - लोकव्यवहारों का स्वरूप-समन्वय होता रहता हैं, एवं ऐसे सामान्य कम्मों में हों ' वाणी ' का समन्वय रहा करता है, जिस वाक् - समन्वय का अर्थ है — वागत्र्यवहार, घोषणा, और आज के शब्दों में प्रदर्शन ( जिसका रूप माना जारहा है--पचलिसीटी ), जो कि आज के सत्तातन्त्र की प्राणप्रतिष्ठा ही बहुआ है । वाणी के द्वारा प्रदर्शन वैसे बाह्य कर्मों का ही हुआ करता है, जिनके आधार में प्राजापत्या आत्मप्रतिष्ठा प्रतिष्ठित नहीं रहती, नैव जिनका श्रात्मानुगत - दृढतम - मानस - सङ्कल्पों से ही कोई साक्षात् सम्बन्ध रहता । श्रपितु प्रावाहिकी जलधारा की भाँति-प्रतिक्षण- बदलते रहने वाले तात्कालिक - बाह्य- स्वार्थी बाह्य कम्र्मों के स्वरूपानुपात से वाङमय तथाभूत प्रदर्शन भी क्षण क्षण में हीं बदलते रहते हैं । ठीक इसके विपरीत आत्मप्रतिष्ठात्मक - - श्रतएव ' प्राजापत्य ' नाम से प्रसिद्ध - श्राभ्यन्तर-मानससंकल्पात्मक -- कर्म्म सदैब तूष्णीं भाव के ही अनुगामी बने रहते हैं । अर्थात् आत्मबलोपेत-नैष्ठिक -- मानस सङ्कल्प, एवं तन्निबन्धन -- तथ्यपूर्ण कर्म्म, दोनों हीं वाणी के उद्घोष, एवं प्रदर्शन से सर्वथा संस्पृष्ट ही बने रहते हैं । इत्थंभूत संकल्पों के, तथा कम्मों के कर्त्ता नैष्ठिक - श्रार्ष मानवश्रेष्ठों की रहस्यानुगता तपोमयी संकल्पनिष्ठा, एवं कर्म्मनिष्ठा को बाह्यजगत् कदापि नहीं जान सकता । बाह्यजगत् तथाविध कर्मों के महान् फलों से ही समन्वित होता है । इसी आधार पर पुराणपुरुष भगवान् बादरायण ने कहा है कि — ‘ महापुरुषों के आत्मानुगत - सत्यसङ्कल्प को, एवं तदनुगत आत्मनिष्ठा -- समन्त्रित--कर्माध्यवसाय को कोई भी नहीं जानता, जान सकता । अपितु उनके कर्म्म के महान सुपरिमाणों से ही सर्वसाधारण -- तद्भोगानुगति से परिचित हुआ करते हैं " ( महाभारत ) । उक्त तथ्य के आधार पर ही परोक्षप्रिया इव हि देवा: - प्रत्यक्ष द्विपः - इस सुप्रसिद्ध निगमवचन का आविर्भाव हुआ है ऋषिप्रज्ञा के द्वारा । अव्यक्तप्राणप्रधान - मनोवाग् गर्भित - आधिदैविक - देवताओं के प्राणनिबन्धन कर्म्मकलाप जैसे सूक्ष्मजगत् में सूक्ष्मरूपेणैव प्रक्रान्त रहते हैं, वे प्राणदेवता जैसे अव्यक्तभावा-पन्न -- प्राणधर्म्म के अनुबन्ध से व्यक्त - भौतिक- मर्त्य - जगत् से परोक्ष बने रहते हुए प्रत्यक्ष के लिए शत्रुवत् ही प्रमाणित होते रहते हैं, ठीक वही स्थिति - देवोपम उन भूदेव - विद्वान् -- ब्राह्मणों की है, जो लोक -- जन -- समाज के-कलकलनिनाद से यथासम्भव श्रात्मपरित्राण करते हुए, युगधर्म्म - निबन्धन - लोकसामान्य की दिगदेशकालानुबन्धिनी प्रत्यक्षप्रभावमूला -- भावुकतापूर्णा -- प्रदर्शन प्रवृत्ति से, तन्निबन्धना लोकख्याति से अपने आपको सर्वथैव असंस्पृष्ट बनाए रखते हुए गुहानिहितवृत्यनुबन्धिनी ऐकान्तिकी निष्ठा से परोक्षरूपेणैव अपने तत्त्वचिन्तनाचार में प्रवृत्त रहते हैं, एवं प्रत्यक्ष से शत्रुता ही रखते हैं । ऐसे प्रणम्य -- एकान्तनिष्ठ -- -- भूदेवी की इत्थंभूता नैष्टि की १०१

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किञ्चिदिव श्राबेदन प्रज्ञा ने विनिःसृता कृतियों से ही बाह्य समाज अंशतः परिचित हुआ करता है । " देवता परोक्षप्रिय होते हैं, एवं प्रत्यक्ष के शत्रु " एतदक्षरार्थात्मक पूर्ववचन का यों आधिदैविक देवदेवताओं के साथ, एवं आधि-भौतिक -- भूदेवों के साथ, दोनों के साथ सम्बन्ध हो रहा है । ' प्रदर्शन की प्रवृत्ति ही मानव केन्द्रस्था- श्रात्मनिष्ठा के सहज आत्मबल की शत्रु है ' यही उक्त सन्दर्भ का निष्कर्घार्थ है, जिस का भगवान याज्ञवल्क्यने- ' मन, और वाक के अहंभद्रत्त्वमूलक पूर्वाख्यान ' के माध्यम से ही स्पष्टीकरण किया है । वैय्यक्तिक - पारिवारिक सामाजिक, अथवा तो राष्ट्रीय - भेदभिन्न यच्चयावत् कर्मकलापों की पूर्ण सफलता का यही प्राथमिक मौलिक रहस्य है कि, कदापि तत्तत्कर्मानुबन्धी न तो मानव -- संकल्पों की घोषणा की जाय, एवं न तत्तत् संकल्पानुगत - तत्तत् कम्मोंके अनुष्ठान काल में उन की वाणी के द्वारा ही घोषणा - ( प्रदर्शन- पत्र लिसोटी ) की जाय । अपितु सत्यसंकल्प, और तदनुगत अध्यवसायात्मक नैष्ठिककर्म्म, दोनों ही प्रक्रम सर्वथा तूष्णीं ही स्वस्वरूपानुगतिपूर्वक स्त्ररूपसम्पादनाभिमुख बनते रहें । यही सफलता का प्रमुख द्वार है । जो व्यक्ति, जो परिवार, जो समाज, अथवा तो जो राष्ट्र दिग्देशकालानुबन्धी-प्रत्यक्षभाव से भावुकतावश प्रभावित होता हुआ अपने मानस संकल्पों की वाणी के द्वारा उच्चघोषणा आरम्भ कर देता है, ऐसे निर्बल - संकल्प से अनुगत निर्बल ही कर्म्माभास की भी सिद्धि से पूर्व ही घोषणाएँ आरम्भ कर देता है, ऐसे व्यक्ति - परिवार समाज, एवं राष्ट्र के सत्यसंकल्प भी मिथ्या हो जाया करते हैं, एवं कर्म्म भी सिद्धि-सफलता से वञ्चित ही बने रह जाते है । और दुर्भाग्यवश हमारे आज के भारतीय व्यक्तित्व, परिवारत्व, समाजत्त्व, और राष्ट्रत्व नामक चारों ही ' त्त्व ' भात्र ( स्वरूपधर्म्म ) अपने प्रत्येक संकल्प, तथा संकल्पानुगत प्रत्येक कम्र्म की अभिव्यक्ति-स्वरूप - सिद्धि से पूर्व ही सर्वत्र - दिग् दिगन्त में - " हमारे ऐसे संकल्प हैं, हमनें अबतक यह कर लिया है, आगामी अमुक वर्षों की अवधि में हम अमुक समस्या का समाधान कर लेंगे, अमुक योजना के द्वारा हमारे अमुक स्वप्न पूर्ण होजाएँगे " इसप्रकार की तुमुल घोषणाएँ एवं स्वाप्निक - संकल्पों के काल्पनिक -- प्रदर्शन परिव्याप्त कर देते हैं, जबकि अन्य नैष्ठिक राष्ट्रों के प्रचार संकल्प, तथा कर्माध्यवसाय तत्संसिद्धि के अनन्तर ही बोधगम्य बना करते हैं, सो भी क्याचिलरूपेणैव । सहज भाषानुसार - संकल्प, और कर्म्म से भी पूर्व उच्चघोषणा की आतुरता, प्रदर्शनपरम्पराओं के प्रचार - प्रसार की व्यग्रता के दुष्परिणाम स्वरूप ही तो आज भारतराष्ट्र का वह अनिरुक्त - श्रात्मप्रजापति पराङमुख बन गया है इस के संकल्पों, तथा कम्र्मों से, जो अनिरुक्त - प्रजापति अपने आत्मानुवन्धी प्राजापत्यचल का योगदान तभी करता है संकल्प, तथा तदनुगत कर्म के प्रति, जबकि मानव अपने संकल्प, तथा कर्म्म को श्रनिरुक्त भावानुगत हो बनाए रहता है । क्योंकि प्राजापत्यकम् की स्वरूप- सम्पत्ति का एकमात्र प्रमुख द्वार वाक् से असंसृष्टा अनिरुक्तता ही, उपांशुरूपता ही, तूष्णोंभाव ही माना गया है, जैसाकि आख्यानोपसंहार में स्पष्ट किया जाचुका है । यहीं प्रस्तुत - मनो - वाग्भावों के पारिभाषिक स्वरूप का संक्षिप्ततम संस्मरण - विराम है । * ( ख ) - प्रजापति से पराभूता आत्रेयी वाक् की अस्पृश्यता का संस्मरण— ' मनोबाक् की श्रंभद्रमूला प्रतिद्वन्द्विता में प्रजापति के द्वारा अत्रमा निता वाग्देवी के ' गर्भ ' का पतन हो गया ', यह पूर्व संस्मरण में निवेदन किया जाचुका है । इसी प्रसन के माध्यम से आगे चल

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शतपथ ब्राह्मण २ एड कर श्रुति वाक् के उस ' अत्रेय ' स्वरूप का भी संस्मरण करा रही है, जिसके सम्बन्ध से श्रात्मप्रजापति से वञ्चिता, परित्यक्का वाक् त्रिरूप में परिणत होजाती है । परिणाम इस ' त्रि ' का यही होता है कि, आत्म— धर्म से ( निरुक्त -- प्राजापत्य- धर्म्म से ) बहिष्कृता श्रात्रेयी वाक् श्रात्मधर्मानुगत अभिव्यक्त - क्षेत्रों के लिए स्पृश्या ही बन जाती है । श्रुति ऋतुमती स्त्री के उदाहरण के माध्यम से ही तत्त्वमूला उस अस्पृश्यता के वैज्ञानिक स्वरूप का विश्लेषण किया है, जिस तत्त्वमूला अस्पृश्यता को भावुकतावश आज के मानव ने घृणामूला मान लिया है । एवं इस भ्रान्तिपूर्णा मान्यता के कारण ही स्पृश्यता और अस्पृश्यता को लेकर आज राष्ट्र की उच्च-प्रज्ञाओं में भी वैसा श्रापातरमणीय संघर्ष प्रक्रान्त होपड़ा है, जिसके परिणामस्वरूप तत्त्वमूला अस्पृश्यता के स्थान में घृणामूना अस्पृश्यता ही परोक्षरूपेण अनुदिन प्रवृद्धा होती जारही है । मानवप्रज्ञा तात्त्विकी प्रकृतिसिद्धा स्थितियों के साथ युगधर्मानुबन्धी प्रवाह में प्रवाहित होती हुई प्रतिद्वन्द्विता कर बैठती है, तो प्रकृतिसिद्व तथ्थ प्रतिक्रिया के रूप में प्रचण्डवेग से प्रतिद्वन्द्वी को लक्ष्यच्युत ही बना दिया करते हैं । अवश्य ही कुछ समय से तत्त्वमूला अस्पृश्यता ने घृणामूला अस्पृश्यता का स्थान ग्रहण कर लिया है, जो कि घृणासूला अस्पृश्यता भारतीय - मानवधर्म्म के क्षेत्र से, तदनुबन्धिनी मानवता आत्मानुवन्धी विशाल प्राङ्गण से सर्वचैत्र बहिष्कृता ही मानी गई है । एतावता ही तत्त्वमूला अस्पृश्यता को कदापि उपेक्षणीय नहीं माना जासकता । आज का भूतविज्ञानवादी भी ग्रमुक - प्रशुचि - भावापन्न भावों - पदार्थों-मानवों के संस्पर्श को तत्त्वदृष्ट्या न सही, कीटाणुदृष्टया तो अवश्य ही सांक्रामिक मान रहा है, और घृणामि--श्रिता - अस्पृश्यता से अनुगत भी । जबकि भारतीय मानवधर्म्म के क्षेत्र में - " यस्मान्नोद्विजते लोकः, लोकान्नोद्विजते च यः ” ( गीता ) के अनुसार तो ' घृणा ' - ' उद्वेग ' आदि शब्दों का प्रवेश भी निषिद्ध ही माना गया है । ऋतुमती के उदाहरण से श्रु तिने हमें तत्त्वमूला -- प्रकृतिसिद्धा उस अस्पृश्यता के मौलिक रहस्य से ही परिचित कराया है, जिस का ' देवसमीकरणभाव ' के माध्यम से ही तत्त्वार्थ समन्वय हुआ है । श्रात्मरूप-ज्ञानीय - सत्त्वगुण की प्रधानता संसृष्टिमूला -- तमोगुण प्रधाना-- भूतभौतिकी - धामच्छदा सृष्टि की प्रतिबन्धिका ही मानी गई है वैदिक - विज्ञान के क्षेत्र में । आत्मानुगत सत्त्वगुण की अभिभूति का अर्थ है -- श्रात्मसत्त्व के साक्षात् — अनुग्रह से वञ्चित ' वाक् ' तस्व । आत्मभाव ही तो ' वाक् ' का ' गर्भ ' ( केन्द्र - महत्त्व ) है | जब वह पूर्वाख्यान के अनुसार गिर जाता है, अर्थात् आत्मसत्व के साक्षात् अनुग्रह से अाकाशभूतात्मिका वाक् वञ्चित होजाती है, तभी इस में तमोगुणान्वित -- संसृष्टिलक्षण - सृष्टिधर्मानुगत - प्रजनन धम्म अभिव्यक्त होगता है । वाङ्मय धामच्छद प्राण अपने ही तनोगुण से पारदर्शकता का प्रतिबन्धक बनता हुआ, वाक् को ' आत्रेयी ' बनाता हुआ इसे सृष्टिकर्म में प्रवृत्त करता है । ऋतुमती स्त्री के शोणित में प्रतिष्ठित तमो-गुण बहुल - वागत्रिरूप मलीमस - भाव ही अभिव्यक्त रहता है, और यही काल प्रजजनकर्मानुगत गर्भाधान की पूर्व भूमिका माना गया है । क्योंकि वाङमय धामच्छद - मलीमस-- श्रत्रिप्राण आत्मबिरोधी है, अतएव एक प्राणाभिव्यक्ति कालरूपा दिनचतुष्टयी- पर्यन्त यात्रेयी - योषित् ' अस्पृश्या ' मानी गई है, जिस के स्पर्शं से श्रुतिने ' पापवासना ' की अभिव्यक्ति मानी है । तत्त्वमूला अस्पृश्यता का यही वह ज्ज्वलन्त उदाहरण है, जिसके ' १०३

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किञ्चिदिव- आवेदन वैज्ञानिक समन्वय के अनन्तर किसी भी चिकितुट् -- प्रज्ञाशील को तो कोई भी सन्देह नहीं रह जाता, एवं जिस इस वैज्ञानिक उदाहरण का " तस्मादपि आत्रेय्या योषिता - एनस्त्री " इत्यादि श्रुतिसन्दर्भ से स्पष्टीकरण प्रयास हुआ है । ( ग ) उच्छ्रितभावानुबन्धी तथ्य का प्रासङ्गिक -- संस्मरण-७ वेदशास्त्रानुगता अमुक - शब्दावली की चहिरङ्गा - अनुशीलनवृत्ति के आधार पर अपनी कल्पना -मात्र के माध्यम से वैदिकयुगानुगता - वैदिकी -- सभ्यता का उष्ट्रप्रत्यङ्ग ( उटपटांग ) चित्रण करते रहने में परमकुशल प्रतीच्य विद्वानों की मान्यता को ही ' वेदवाक्य ' मान बैठने वाले गतानुगतिक - भारतीय भी वेद के सम्बन्ध में विचित्र विचित्र - प्रकार की कल्पनाओं को प्रश्रय देते देखे, एवं सुने गए हैं, जिस का निष्कर्ष यही है कि, वैदिकयुग तो एक वैसा ' ग्रामीणयुग ' था, जिसमें सभ्यतायुगानुगत आज के वैज्ञानिक -- नियमोयनियमों का तो संस्मरण भी नहीं था । " अग्नि में घृत - पिष्टतण्डुल आदि डालकर अग्नि को प्रसन्न करना ही उनका यज्ञकर्म्म था, तत्रिमित्त - पशुबलि - जैसे नृशंसक ही उन के उदरपोषण का प्रधान साधन था ” -इत्यादिरूपेण ऐसी ऐसी विचित्र - विचित्र कल्पनाएँ वेदशास्त्र के सम्बन्ध में, एवं तत्संसिद्ध सृष्टिविज्ञान स्वरूप-विश्लेषणक यज्ञकर्म के सम्बन्ध सुनी जा रहीं हैं, जिन के आधार पर यही मान लेना पड़ता है कि, सचमुच ही हम भारतीय आततायी वर्गों की आक्रमणपरम्परा से अपना स्वरूप - बोध एकान्ततः ही विस्मृत कर बैठे हैं | स्वयं अपने घर की मौलिकता देखने की दृष्टि ही हम से छिन गई है । अतएव अन्धत्रधिररूपेण सुदीर्घ समय से हमारी आँखें, और हमारे कान प्रतीच्य - जगत् के वे राजनीतिकुशल - विद्वान् ही बनते आ रहे हैं, जो बल-पूर्व यहाँ के सर्वस्त्र को ही श्रवैज्ञानिक, सभ्यता -परपूर्ण, एवं वहाँ के सर्वस्व को ही सर्वधैव वैज्ञानिक, एवं सभ्यता - पूर्णं घोषित करते रहते हैं । एक सामान्य सा श्रङ्गकर्म है । सामान्य से कर्म के अनुबन्ध से पड़ेगा कि, सचमुच हमने अपनी ' पूर्वाधारोत्तराधारकर्म्म ' नामक यज्ञियकर्म प्रधानभूत यज्ञकर्म का इसके प्रसङ्ग से भी यज़कम्म - स्वरूप- विश्लेषक ऋषि ने ' चैठने उठने ' जैसे भी जो तात्त्विक शिक्षा हमें प्रदान की है, उसे देखते हुए तो यही कहना दृष्टि, और श्रुति को परायत्त बना कर अपनी मौलिकता को सर्वथा दी विस्मृत कर लिया है । पूर्वाधार जहाँ बैठे बैठे किया जाता शरीयष्टि - निबन्धन - प्राण की स्वरूप स्थिति के है, वहाँ उत्तराधार खड़े होकर माध्यम से ऋषि ने इस प्रश्न किया जाता है । ऐसा क्यों?, की जो स्वरूप - मीमांसा की है, होजाती है । क्या यज्ञक ऐसा उसे देख - सुन कर क्षणमात्र के लिए हमारी दासानुदास प्रज्ञा सहसा स्तच्च ही महत्त्वपूर्ण कर्म्म है?, क्या वेदशास्त्र के महारम्भ वैज्ञानिक तथ्यों के द्वारा हमारे वैय्यक्तिक - पारिवारिक - सामाजिक-तथा राष्ट्रीय उत्कर्षो के इत्थंभूत प्रासङ्गिक सूत्रों का भी स्वरूपत्रोध हमें प्राप्त होता रहता है? । श्राश्चर्य्य! महान् आश्चर्य्य!! आज के सुसभ्ययुग में जब किसी सैनिक के शरीर को हम सीधा तना हुआ खड़ा देखते हैं, तो अन्त-जंगत् में प्रश्न खड़ा होजाता है कि, क्या उस वैदिक युग में भी हमारे भारतराष्ट्र के कर्मठ सैनिक श्रादि इसी प्रकार सीधे तन - कर - सशक्ता मुद्रा में सदैव सज्जीभूत रहते थे? । प्रस्तुत - उत्तराधारक इसी प्रश्न का ' अस्ति ' रूप मे हमारे सामने समाधान प्रस्तुत कर रहा है, जिसका प्रमुख सूत्र है - उच्छ्रितमित्र हि वीर्य्यम् ' । १०४

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शतपथब्राह्मण २ खराड उदाहरण भी ' सेना ' के अनुबन्ध से ही सम्बन्ध रख रहा है । दक्षिण की ओर से असुर और राक्षस जब आक्रमण करते थे, तो अपनी सुप्रसिद्धा मारुति सेना के साथ देवेन्द्र हरिवाहन ही सजीभूत होकर उनको पराभूत करते रहते थे । दक्षिणदिगनुगत उत्तराघारकर्म्म उसी का नैदानिक स्वरूप है । सेना से युक्त इन्द्र सर्वथा तन कर सज्जीभूत होकर प्राणवनी- मुद्रा से ही दुष्टबुद्धि असुरों का साम्मुख्य करते रहते थे, अतएव इस यज्ञकर्म्म में भी उस प्राणवती मुद्रा में तन कर खड़े होते हुए ही उत्तराघारकर्म्म सम्पन्न होता है । सीधे - तन कर खड़े होने से मानव के शरीर में वीर्य्य की अभिव्यक्ति कैसे और क्यों होजाती है १, इस प्रश्न का विशद - समन्वय तो तद्भाष्य में ही देखना चाहिए । प्रकृत में सन्दर्भ - सङ्गतिमात्र के लिए यही जान ना पर्याप्त होगा कि, ' मानव ' के चित्याग्निरूप- पाञ्चभौतिक शरीर का स्वरूप -- निर्माण जिस मौलिक - प्राण के छन्दोमय - धरातल - पर होता है, वह मौलिक प्राण - ' सप्तर्षिप्राण ' नाम से प्रसिद्ध है, जिसके ' ४-२-१ ’ ये तीन संस्था - विभाग माने गए हैं, जो क्रमश: ' चत्त्वार आत्मा, द्वौ पक्षौ पुच्छं प्रतिष्ठा ' नाम से प्रसिद्ध हैं । न केवल मानव ही, अपितु प्राणिमात्र, किंवा चर - अचर यच्चयावत् - भूतभौतिक चित्य - पदार्थों का मूलाधार-भूत सप्तप्राणमूर्ति यही वह छन्दोमय सूक्ष्म आकार है, जिसमें भूतचिति होजाने से ही तत्स्वरूप की भूतरूप में अभिव्यक्ति होजाती है । ‘ चत्त्वार - आत्मा ' रूपा प्राणचतुष्टयी से मानव का मध्याङ्ग बनता है, जिसे ' घड़ ' कहा जाता है । वाम-हस्त - वाम चरण, दोनों का युग्म एक पक्षप्राण से, एवं दक्षिणहस्त चरणरूप युग्म एक पक्षप्राण से सम्पन्न होता है । शेषभूत - पुच्छ प्रतिष्ठाप्राण से त्रिकास्थिमूल की स्वरूपाभिव्यक्ति होती है । त्रिकास्थिगत - पुछ प्रतिष्ठा-प्राण ही मानव के, किवा प्राणिमात्र के उस मेरुदण्ड की मूल प्रतिष्ठा है, जिस मेरुदण्ड का स्वरूप खगोलीय-विष्वद्वृत्त से ही सम्पन्न हुआ करता है । वस्तुस्थिति तो वास्तत्र मे यह है कि, द्यावापृथिव्य - सौर - पार्थिव - सम्वत्सर-द्वयी की समष्टिरूप महान् ' सम्वत्सर ' ही वह महान् ' सुपर्ण ' है, जिसके चत्वार श्रात्मा आदि सन्तावयव हैं । महासुपर्णरूप उस आधिदैविक सौर - सम्वत्सर से ही पार्थिव प्रजा का स्वरूप निर्माण हुआ है । उसका विश्ववृत्त ही प्राणियों का मध्यस्थ मेरुदण्ड बनता है, जिसे लोकभाषा में - ' रीढ की हड्डी ' कहा गया है । यह अस्थि त्रिकास्थि से उपक्रान्त होकर अर्वा चिल - ऊर्ध्वचमस नामक पारिभाषिक- शिरः कपाल - पर्य्यन्त अभिव्याप्त है । इस मेरुदण्ड का सन्तनन ही शरीर को सीधा तना हुआ रखता है, जोकि सन्तनन मेरुदण्डोपसंहारात्मक त्रिकास्थिप्राण से ही अनुप्राणित है । प्रकृतिसिद्ध वार्द्धक्य ही त्रिकास्थिगत पुच्छ प्रतिष्ठाप्राण को मूच्छित कर दिया करता है, जिसके कारण ही वार्द्धक्य में मेरुदण्ड वक्रित होजाता है । तदतिरिक्त पक्षाघातादि रोगविशेष के कारण, एवं प्रचण्डतम- शारीरिक - मानसिक बौद्धिक श्रम - परिश्रमानुगत सत्त्र के कारण भी तत्प्राण असमय में भी मूर्च्छित होजाता है, फलतः शरीरयष्टि अवनता होजाती है । इसी प्रतिष्ठाप्राण के कारण क्योंकि शरीर-यष्टि ऋजुभावेन सन्तता रहती है, अतएव प्राणात्मक इस सन्तननधर्म्म को श्रु तिने ' उच्छ्रितमिव हि वीर्य्यम्-भवति ' रूपेण - ' वीर्य्यम ' उपाधि से समन्वित माना है । श्रुति का ' वीर्य्य ' शब्द भी अपना एक विशेष महत्त्व रख रहा है । वैज्ञानिकी - परिभाषाओं से अनुप्राणित शब्दों के पारिभाषिक चिरन्तन- इतिवृत्तों की बोधपरम्परा के विलुप्तप्राय होजाने से आज सभी शब्द ' सभी घान पसेरी ' न्याय को चरितार्थ कर रहे हैं । और इसीलिए आज उत्साह - पराक्रम - बल - वीर्य्य - साइस श्रादि शब्द समानार्थक ही मान लिए जारहे हैं, जबकि विज्ञानदृष्ट्या ये सभी शब्द विभिन्न विभिन्न अर्थों के ही स्वरूप - संग्राहक बने हुए हैं | उदाहरण के लिए बल - वीर्य्य - पराक्रम, इन तीन शब्दों को ही लक्ष्य बनाइए । अवश्य ही मानवीय भूतात्मा की दृष्टि से इन तीनों हीं शब्दों को आत्मानुबन्धी माना जासकता है, एवं इस १०५

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किञ्चिदिव श्रावेदन आत्मसाम्यदृष्ट्या तीनों को परस्पर पर्य्याय भी मान लिया जासकता है एक दूसरे का । किन्तु आत्मानुगत 4 कलाभेद की दृष्टि से तो तीनों को सर्वथा विभिन्नार्थक ही माना जायगा । ' स वा एष आत्मा वाङ्मयः, प्राणमयः, मनोमयः ' इत्यादि बृहदारण्यक अति के अनुसार मानव का भूतात्मा ' मनः प्राण वाङ्मय ' बना रहता हुआ ' ज्ञान - किया - अर्थ ' शक्तित्रयी की समरूप है ज्ञानशक्ति युक्त मन के साथ ही पराक्रम का सम्बन्ध है, क्रियाशक्ति - युक्त प्राण के साथ ही वीर्य्य का सम्बन्ध है, एवं अर्थशक्ति युक्ता वाक् के साथ ही बल का सम्बन्ध है. क्या तात्पर्य्यं । तात्पर्य्यार्थ समन्यय के लिए हमें तीन विभिन्न उदाहरणों का ही अनुगमन करना पढ़ेगा । तभी स्थिति का पारिभाषिक समन्वय सम्भव बन सकेगा । मानव, सिंह, और गज, इन तीनों को लक्ष्य बनाइए । तीनों में हीं यद्यपि मनःप्राणवाङमय भूतात्मा प्रतिष्ठित है । किन्तु तीनों में क्रमशः मनः-प्राण - वाक् · रूपा - ज्ञान - क्रिया- अर्थ - शक्तियों की क्रमशः प्रधानता है । अर्थात् यात्मक भी मानव मनः - प्रधान बनता हुआ ज्ञानशक्ति प्रधान है । व्यात्मक भी सिंह प्राण - प्रधान वनता हुआ क्रियाशक्ति प्रचान है । एवं त्र्यात्मक भी मत्तगजराज वाक्प्रधान बनता हुआ अर्थशक्ति प्रधान है । मनःप्रधान - मानव आत्म-प्रधान है, प्राणप्रधान सिंह प्राणप्रधान है, एवं वाक्प्रधान गजराज शरीरप्रधान है । पर के आक्रमण से सम्बन्ध रखने वाला आत्म - निवन्धन ज्ञानबल दी ' पराक्रम ' है, जो कि मानव में विशेषरूपेण अभिव्यक्त है । प्राणनिधन - क्रियाचल ही वीर्य्य ' है, जो कि सिंह में विशेषरूपेण प्रस्फुटित है एवं वाग्निन्धन प्रथमल ही बल है, जो कि गजराज में विशेषरूपेण चीयमान है यो मानव - सिंह - गज, तीनों में क्रमशः पराक्रम-वीर्य्य - बल, तीन बल विभक्त देखे आसकते हैं । शारीरिक बल हो बल है, जिसका उदाहरण शरीरधर्म्मा वह गजराज ही बना हुआ है, जो यदि सिंह पर अपना भार रखदे तो सिंह सर्वथैव पिस्दावस्था में परिणत होजाय । किन्तु शारीरिक बल रूप - ' बल ' की अपेक्षा क्योंकि प्राणत्रलरूप ' वीर्य्य ' विशेषरूपेण अतिशय रखता है । अतएव शरीरतः बलवान् भी गजराज को बीशाली सिंह परास्त कर दिया करता है और मानव है । यह तो सिंह के गर्जन श्रवण मात्र से ही विकम्पित हो पड़ता है । किन्तु परानुगत- आक्रमण - धर्मात्मक- पराक्रमरूप मनोबल के द्वारा ऐसा विकम्पित भी मानव कौशलपूर्वक बीर्य्यशाली सिंह को भी पञ्जरबद्ध कर देता है, एवं बलशाली गजराज को भी अपना वाहन बना लेता है और वही आत्मबलामिव्यक्तित्व - निबचना व श्रेष्ठता है, जिसके आधार पर अन्य प्राणियों के समतुलन में भगवान् व्यास को कहना पड़ा कि - ' न हि मानुपात श्रेष्ठतर हि किञ्चिन ' । निवेदन निष्क यही है कि निकास्थिगत पुच्छ्प्रतिष्ठात्मक धर्म क्योंकि ' प्राणप्रधान ' है, प्रागा के साथ ही क्योंकि ' वीर्य्य ' नामक बल विशेष का सम्बन्ध है, यह प्राणनिबन्धन वीर्य्य ही मानव की शरीरयष्टि को भावेन क्योंकि उन्द्रितभाव में परिणत रखता है, और यह सम्तननधर्म ही अव्यवसायनिष्ठ मानव की कम्मसकलता का क्योंकि अन्यतम आधार है, इही सम्पूर्ण तथ्यों को अपने पारिभाषिक- गभीरतम - अर्थ से अभि-व्यक्त करता हुआ श्रुतिका ' तिमि हि भीम ' यह वचन वैदिकसाहित्य के अत्यन्त उपादेय - युगानु बन्धी महत्त्व की ओर ही हमारा ध्यान आकर्षित कर रहा है, इसी संस्मरण के साथ १६ - २० - कर्मानुबन्धी- यह प्रकार निदर्शनात्मक संस्मरण ] उपरत होरहा है । ( १६ - २० ) - १०-११-१०६

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श्रीः [ २१ ] – ' प्रवरणकर्म्म ' - प्रसङ्गतः युगधर्मनिबन्धन -- ' अधिकार ' - शब्दानुगत किञ्चिदिव - संस्मरण १२ पूर्वोत्तराघारकर्म्मी के अनन्तर क्रमप्राप्त उस ' प्रवरणकर्म ' का स्थान श्राता है, जिसमें वार्षेयप्रवरण, दिव्याग्निवरण, श्रार्षेयवरण, अग्नि - ब्राह्मणानुग्रहप्राप्ति, मानुषहोतृवरण, स्वस्त्ययनजप, भेदेन अनेक श्रावान्तर क्रत्त्वर्थ -- कम्मों की वैज्ञानिकी उपपत्ति का पारिभाषिक - समन्वय - प्रयास हुआ है । उनमें से विस्तारभिया अत्र संस्मरणरूपेण ' अधिकार ' शब्द - माध्यमेन किञ्चिदिव निवेदन कर दिया जाता है । प्रवरणकर्म्म का फलितार्थ है वह - - ' यज्ञ । धिकार - समर्पण ', जिस ' अधिकार ' शब्द को लेकर आज के समाजवादी मानवश्रेष्ठ ने भारतीय विभक्त -- अधिकार भाव के विरुद्ध सर्वथैव प्रतिद्वन्द्विता स्थापित कर रक्खी है । प्रवरणकर्मानुबन्ध से उस ' अधिकार ' शब्द के माध्यम से ही हमें सर्वप्रथम दो शब्द निवेदन कर देने हैं । ' अधिकार ' शब्द जब मानव के कामार्थभोगप्रधान --पनः शरीररूप - प्राकृतभाग से ही अनुगत बना रहता है, तब तो यही ' अधिकार ' व्यक्तिस्त्रविमोहन का कारण बनता हुआ लोक - वित्तादि- एषणाओं की लिप्सा-लालसा के माध्यम से मानव के सर्वानाश का ही कारण बन जाता है । एवं ठीक इसके विपरीत यही ' अधिकार ' शब्द जब मानव के मोक्षधर्म्मप्रधान - श्रात्म- बुद्धिरूप - पौरुषभाग से अनुगत बन जाता है, तो उस दशा में यह अधिकार ' अधिकार ' न रह कर महान् - ' उत्तरदायित्त्व ' के रूप में ही परिणत होजाता है । और उत्तरदायित्वपूर्ण आत्मबुद्धिनिबन्धन- पुरुषभावानुवन्धी ऐसा अधिकार व्यक्तित्त्वत्रिमोहन से असंम्पृष्ट रहता हुआ, अतएव तद्नुगत मानवश्रेष्ठ को लोकैषणा- वित्तणादि वञ्चनाओं से पराःपरावत रखता हुआ, मानव के आत्मस्वरूपाभिव्यक्तित्त्वरूप उस महान् नैष्ठिक व्यक्तित्व का ही पोषक बन जाता है, आत्मबुद्धि-निबन्धन जो मानवीय महान् व्यक्तित्त्व आत्मसाम्य से अनुगत रहता हुग्रा विश्वमानवीय व्यापक व्यक्तित्त्व से सर्वथैव भिन्न प्रमाणित होजाता है । आत्म- बुद्धि के नियन्त्रण से नियन्त्रित मनः - शरीरात्मक - प्राकृतभाव से समन्वित भारतीय मानव की प्रकृतिसिद्धा प्रकृतिभेदभिन्ना अधिकारव्यवस्था का मूलाधार लोकैषणा- वित्तैषणानुगत- मनः - शरीरनिबन्धन--व्यक्तित्वविमोहरूप अधिकार न हो कर सर्वेषणा विनिर्मुक्त - श्रात्मबुद्धिनिबन्धन- श्रात्मस्वरूपाभिव्यक्तित्त्वरूप वह महान् ' उत्तरदायित्त्व ' ही है, जिस उत्तरदायित्त्वपूर्ण इत्थंभूत आत्मबुद्धिनिबन्धन - अधिकार भेद के आधार पर ही ऋषिप्रज्ञा के द्वारा प्रकृतिसिद्ध - विभक्त - वर्णभेद के माध्यम से तत्तत् -- विभक्त - ज्ञान -- कर्म्म - अर्थ - भावों का विभाजन हुआ है, जिस इसप्रकार के उत्तरदायित्त्वपूर्ण, प्रकृतिसिद्ध, विभक्त -- अधिकार भेद को सर्वथैव सदा ही विज्ञानसम्मतत्त्वेन शाश्वतीभ्यः सामाभ्यः, अर्थात् सदा सदा के लिए ही उपयोगी ही माना जायगा । १०७

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किञ्चिदिव श्राबेदन अवश्य ही अज्ञानतावश अमुक समय से भारतीय वर्णमानवोंने ' ' अधिकार ' शब्द की उत्तरदायि-त्वपूर्ण तथाविधा विज्ञानसिद्धा व्यवस्था की उपेक्षा कर लोक - वितैषणासक्ति के द्वारा मनःशरीरानुगत व्यक्ति -त्त्वविमोहनरूप प्राकृतिक-- उस ' अधिकार ' को ही अपना लक्ष्य बना लिया है, जिस उत्तरदाय यत्त्वशून्य, श्रतएव सर्वविनाशक ऐसे अधिकार के कारण ही अनुक समय से ' अधिकार ' शब्द को लेकर सभी भारतीयों में परस्पर आक्रोशात्मिका अनर्थकारिणी श्रहमहमिका ही उपक्रान्त होपड़ी है । व्यक्तित्त्वविमोहनात्मक ऐमी अधिकार लिप्सा से सर्वप्रथम पतन हुआ ब्राह्मण का, तदनन्तर क्षत्रिय का, आगे चलकर वैश्य का, एवं आज शूद्र महाभाग ही विशेषरूपेण इसी विमोहनात्मिका कामार्थप्रधाना मनःशरीर - निबन्धना अधिकार लिप्सा के उस भीषण - दुस्तर पक्ङ्क में निमग्न होते जारहे हैं, जिस पक में इनकी वैश्य - क्षत्रिय - ब्राह्मण नाम की पूर्वपरम्परा-त्रयी सर्वथैव निमज्जित होती हुई एक प्रकार से अपना बाह्य परिचयाक - वर्णस्वरूप ही विस्मृत कर बैठी है । यही अवस्था, किंवा दुरवस्था भाबुकतानुगत उस नारीसमाज की है, जो आज अधिकार लिसु--तथाविध - व्यक्तित्व-- विमोहनानुगत मानवमहाभागों को सर्वनाशकारिणी - प्रेरणा से काल्पनिकी अधिकार घोषणा में निमग्न रहता हुआ अपने सहज सौम्य - वात्सल्यपूर्ण मातृत्त्व जैसे महतोमहीयान् सर्वाराध्य पद को ही विकम्पित करता जारहा है । भारतीय वर्णप्रजा में हीं यह संघर्ष हो, यह बात नहीं है । श्रपितु साङक्रामिकी बनपदविध्वंसिनी - महामारी ( प्लेग ) की भांति यह ' अधिकारलिप्स । ' व्यक्तित्त्वविमोहनात्मक अधिकार लिप्सु छोटे - बड़े-श्रात्राल - वृद्ध - वनिता - श्रादि सभी वर्गों में उसप्रकार वैसा सङक्रमण कर बैठी है, जिसके कारण ही सभी अहर्निश ' इमारा अधिकार -- हमारा अधिकार ' का चीत्कार करते हुए स्वोत्तरदायित्त्वपूर्ण कत्त व्यष्ठिा से सर्वथैव परा-मुख प्रमाणित होते हुए अधिकार लिप्सानुगत कामार्थभोगों की ओर ही अन्धवधिर - रूपेण अनुधावन करते जारहे हैं । घोषणाएँ प्रतिक्षा होरहीं हैं मानवता, मानवधर्म्म, समानता, विश्वबन्धुत्त्व - श्रादि आदि लोकोत्तर आकर्षक शब्दों की । किन्तु प्रत्येक घोषणा के मूल में दृढतमरूपेण पुष्पित -- पन्नवित होती जारही है व्यक्ति-स्व - विमोहनमूला वैय्यक्ति की अधिकारवासना | कैसा है यह आज का भारतीय जनजीवन प्रवाह, जिससे प्रत्येक व्यक्ति अपनी अपनी ज्ञान - कर्म - निष्ठा से एकान्ततः पराङमुख बना रहता हुआ केवल ' अधिकार ' --' अधिकार ' का ही चीत्कार करता जारहा है, जिस इस कर्म्मण्य- भावानुवन्धी ज्ञान सम्पत्ति वञ्चित आधि--कारिक चीत्कार का कहाँ श्रवसान होगा?, प्रश्न सचमुच ही उत्तरोत्तर असमाधेय ही प्रमाणित होता बारहा है । उक्त -- ' अधिकार चीत्कार ' को लेकर ही आज वेदशास्त्र के अध्ययनाध्यापन, तथा यज्ञकर्मानुगति के सम्बन्ध में भी अनेक प्रकार के विसंवाद अभिव्यक्ति होपड़े हैं तथाविध अधिकार लिप्सु वर्ग की ओर से ही, जिस तथाभूत श्राक्रोश का आधारसूत्र है - स्त्री - शूद्रों - नाधीयाताम् ', यह सुप्रसिद्ध शास्त्रीय - पूर्ण परीक्षित-वैज्ञानिक सिद्धान्त । ईश्वरीय सृष्टि में जब सभी समान हैं, तो यह पक्षपात क्यों?, एकमात्र इसी तर्क के आधार पर अधिकारवादियों का तथाभूत आक्रोश उपजीवित है, जिस इस तर्काभासरूप तर्क का इसलिए इस प्राकृत-जगत् में यत्किञ्चित् भी तो महत्त्व नहीं है कि, विघमवर्त्तनानुगत । प्रकृति से सञ्चालित द्वन्द्वात्मक -- भौतिक- विश्व की जीवनधारा त्रिगुणभावापन्ना बनी रहती हुई सर्वथा विभिन्न वतन परम्पराओं से ही सञ्चालित रहती है, जिस इस महान् वैज्ञानिक-- प्राकृतिक -- तथ्य के विश्लेषण का अत्र अवसर नहीं है । १०८

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शपपथब्राह्मण २ खगड़ अधिकार किसी को न तो दिया ही जासकता, न किसी का अधिकार अपहृत ही किया जासकता । हाँ, जो जिसमें प्रकृत्यैव अनधिकृत है, वह यदि बलपूर्वक उस ओर प्रवृत्त होना चाहता है, तो उसके सहजसिद्ध प्राकृत - स्वरूप के संरक्षण की माङ्गलिक - कामना से ही उसे अनधिकृत तथ्यों से रोक दिया जाता है । यदि वह नहीं रुकता, तो अनधिकृत में तो उसे सफलता नहीं हीं मिलती । प्रनृत्यनुगत अधिकृत स्वरूप वह और खो बैठता है । एवं एकमात्र इसी आधार पर भारतीया -- अधिकारमर्य्यादा, किंवा उत्तरदायित्त्वव्यवस्था व्यवस्थित हुई है, जिसकी प्राकृतिक - काल्पनिक साम्य के आवेश में ग्राकर आज हम सर्वथैव उपेक्षा करते जारहे हैं । स्त्री, और शूद्रवत् वैसे ब्राह्मण - क्षत्रिय-- वैश्य - वन्धु भी तो शास्त्र के द्वारा वेदस्वाध्याय में सर्वथा अनधिकृत ही घोषित हुए हैं, जो कभी वेदशास्त्र के अध्ययन - सम्पर्क में आए ही नहीं, अपितु जो जन्म से ही अन्यान्य-- लौकिक-- अनुबन्धों में ही आसक्त - व्यासक्त -- बने रहते हैं । संस्कारशून्य ऐसे द्विजाति को ही शास्त्र ' द्विज ' न कह कर निन्दा के रूप से - ' द्विजबन्धु ' उपाधि से समलङ्कृत किया है । एवं संस्कारशून्य ऐसा त्रैवर्णिक भी जब वेदस्वाध्याय, एवं यज्ञादि कर्म्म में अयोग्यतावश अनधिकृत है, तो स्त्री - शूद्र -- से अनुगता अनधिकृतता के सम्बन्ध में तो इसलिए प्रश्न ही नहीं उठता कि, इनका प्रकृतिसिद्ध मूलप्राण अत्रि, और पूषा नामक उस पार्थिव - प्राणद्वयी से ही अनुप्राणित है, जिसके तमोगुणबहुल सृष्टयनुत्रन्धी - स्वरूप के विश्लेषण का अवसर नहीं हैं, एवं जिसके लिए तो स्वतन्त्र - अध्ययन ही अपेक्षित माना जायगा । स्त्री - शूद्र - द्विजबन्धु नामक वर्ग भी वेदसिद्ध महान् फल से वञ्चित न रह जायँ, इसीलिए तो परम-कारुणिक भगवान् बादरायण के द्वारा ' पुराणशास्त्र ' का आविर्भाव हुआ है, जिसके रहस्यपूर्ण आख्यानो --पाख्यानों की गभीरार्थता का किञ्चिदिव संस्मरण आवेदन के आरम्भ में ही किया जाचुका है । वेद, श्रौर वेदसिद्ध जटिलतम विज्ञान- स्तुति - इतिवृत्त - ज्ञान- कम्मे - उपास्ति ' - जैसे अत्यन्त दुरधिगम्य - ज्ञातव्य -- कर्त्त व्या-त्मक - विषय - घटक से सुविभूषित वेदशास्त्र जैसे गम्भीर शास्त्र के अधिकार की बात तो जाने दीजिए । हम तो समझते हैं, आज तो पुराणशास्त्र के तत्त्वसमन्वय की भी क्षमता स्त्री - शूद्र - द्विजबन्धुवर्ग में तो क्या, विद्या का गर्व रखने वाले विद्वानों को भी एक बार तो शङ्कातङ्कितनानस ही प्रमाणित कर देगी । ऐसा है ज्ञान--शैथिल्य का आज का युग, और उस युग का वैसा है वह ' अधिकार घोषणापत्र ', जिसकी यातयामता में कुछ भी तो सन्देह नहीं किया जासकता । जिसप्रकार केवल आन्दोलनों के लिए प्रतिक्षण ं विलक्षण-विलक्षणा - साजसज्जाश्रों - प्रदर्शनों - घोषणाओं से समलङ्कृत - सुविभूषित श्राविर्भूत होते रहने वाले आज के भावु-कतापर्ण श्रान्दोलन ' आन्दोलन ' मात्र पर ही अपनी जीवनलीला समाप्त करते रहते हैं । ठीक वही अवस्था उत्तरदायित्त्वशून्य, अतएव नितान्त ' भावुकतापूर्ण ' उस ' अधिकार घोषणा ' की हो रही है, जो ' अधिकार घोषणा ' कालान्तर में ‘ अधिकारघोषणा ' मात्र पर ही विश्राम ग्रहण करती जाती है साङ क्रामिकी व्याधि की भाँति आगे की ' घोषणा ' मात्र को जन्म देती हुई ही । और यों अधिकार लिप्सु मानव का, एवं मानवी का समस्त जीवन केवल इस घोषणाओं के आविर्भाव - तिरोभाव में हीं परिसमाप्त होजाता है, उत्तरदायित्त्व पूर्णा अधिकारमेदभिन्ना-नियता -- ज्ञान - कर्मानुगति से पराः परावत ही बना रहता हुआ । -- स्त्री - शूद्र - द्विजवन्धूनां त्रयी न श्रुतिगोचरा । १०६

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किञ्चिदिव श्राबेदन प्रस्तुत ' प्रवरणत्राह्मण ' ' श्राय प्रवरा ' के माध्यम से ऋषिवंश - परम्परा का स्पष्टीकरण करता हुश्श्रा यज्ञाधिकार - निबन्धन उस महान् उत्तरदायित्त्व का ही वैज्ञानिक स्पष्टीकरण कर रहा है, जिस का ' गोत्रभाव ' से ही सम्बन्ध माना गया है, एवं जिस गोत्रभाव का परिचायक - नैदानिक चिह्न ही ' प्रवर ' नाम से प्रसिद्ध हुआ है । तत्सम्बन्ध से ही तद्ब्राह्मण - ' प्रवरब्राह्मण ' कहलाया है । मन्त्रब्राह्मणात्मक वेदशास्त्र के अध्ययनाध्यापन में, तथा विधिसिद्ध - दिव्यभावापन्न - यज्ञकम्मों में उत्तरदायित्वपूर्ण -- अधिकार की दृष्टि से अधिकृत द्विजाति -- यजमान ही तो यज्ञकर्म के लिए दीक्षा ग्रहण कर सकता है, एवं तथाविध अधिकारी -द्विजाति ही दक्षिणा - द्रव्यमाध्यमेन - यज्ञकर्म्म का होता - --उद्गाना-- ब्रह्मा -- आदि भेदभिन्न श्रात्रिज्यकर्म में अधिकार ग्रहण कर सकता है । अमुक यजमान के अमुक यज्ञकर्म के लिए अमुक ब्राह्मण अपनी ऋषिगोत्र - मर्य्यादानुबन्धिनी -- वंशमर्यादा से अधिकृत है, इस तथ्य के समन्वय से सम्बन्ध रखने वाला कर्म्मविशेष ही ' श्रावण ' कर्म्म है । मानव की अध्यात्मसंस्था में हमनें श्रात्मा, बुद्धि, मन, शरीर, ये चार पर्व बतलाए हैं । इन में तुरीय- श्रात्मा तो दिग्देशकालातीत -- तत्र है । अतएव वह गोत्र वर्ण जाति -आदि -- भावों से अतीत है, जैसाकि --- ‘ अगोत्रमवर्णम् ' इत्यादि औपनिषद -- सन्दर्भ से स्पष्ट हैं । शेष रह जाते हैं -- बुद्धि, मन, शरीर, नामक तीन पर्व, जिनका क्रमशः प्रकृति के सूर्य्य - चन्द्रमा पृथिवी नामक उन सुप्रसिद्ध तीन पर्वों के साथ ही क्रमिक सम्बन्ध है, जो तीनों प्राकृत - पर्व क्रमशः काल--ल - दिक्- देश भावों से अनुप्राणित हैं, जैसाकि पूर्व में भी यत्र तत्र स्पष्ट किया जाचुका है । कालात्मक -- काल साक्षी - सूर्य्यं ही बुद्धि का प्रवर्तक है, दिगात्मक - दिक् साक्षी - चन्द्रमा ही मन का आरम्भक है, एवं देशात्मक - देशसाक्षी - भूपिण्ड ( पृथिवी ) ही शरीर का उपादान है । यों मानव के बुद्धि--मनः -- शरीर - रूप तीनों विभिन्न धम्म - प्राकृतपर्व काल -- दिक् -- देश - धर्मानुगत -- सूर्य - चन्द्र - भू - पिण्ड से ही अनुप्राणित हैं । अतएव श्रात्मदृष्टया नहीं मानव अप्राकृत, ' दिग्देशकालातित लोकातीत मानव ' है, वहाँ बुद्धि -- मन - शरीर -- दृष्टि से वही लोकानुगत - प्राकृत- मानव ' दिग्देशकालानुगामी - लोकमानव ' है । प्राकृतिक-मानव के प्रकृतिसिद्ध ये तीनों बुद्धयादि पर्व जिस महती प्रकृति से अनुगृहीत हैं, उसे ही - ' महत्प्रकृति ' कहा गया है, जिसके कि सुप्रसिद्ध बडूविवर्तों की ओर ही एक विशेष दृष्टिकोण के समन्वय के लिए उदाहरण--प्रेमियों का ध्यान आकर्षित किया जारहा है । महत्प्रकृति के आधार पर ही क्योंकि श्रात्मपुरुष नामक चिदात्मा गर्भ धारण महत्प्रकृतिरूप इस महान को चिदात्मा की योनि ( गर्भभूमि ) कहा गया है, जिसके करते हैं, श्रतएव इस माध्यम से ही प्राप्य -वायव्य - सौम्य -- रूपा त्रिविधा - जीवसृष्टि की अभिव्यक्ति हुई है । महत्प्रकृतिरूप ' महान ' वह पारमेष्ठ्य श्रापोमय -- तत्त्व है, जो श्राप: - तत्त्व घन- तरल - विरल - मेद से आप: - वायुः सोमः - इन तीन रूपों में विभक्त रहता है । क्योंकि पारमेष्ठ्य - महान् का भार्गव श्राप्यरूप त्रिर्भावापन्न है, अतएव जीवसर्ग आप्यजीव, वाय - यजीव, सौम्यजीव, मेद से तीन ही प्रमुख श्रेणियों में विभक्त रहता है । जीवत्री का श्रभिव्यञ्जक, चिदात्मा को स्वगर्भ में प्रतिष्ठित रखनेवाला ' महान ' ' महत्प्रकृतितत्त्व ' वह महतो महीयान् ग्रह है, जिसके चारों ओर सूर्य्य - चन्द्रमा - भूपिण्ड - स्व स्व - अयन - दक्ष -- क्रान्ति -- नामक वृत्तों पर परिक्रमा लगाया करते हैं । जिसप्रकार चन्द्रमा अपने दक्षवृत्त के आधार पर भूपिण्ड के चारों ओर परिभ्रममाण है, स्वाक्ष पर परिभ्रणशील भूपिण्ड अपने क्रान्तिवृत्त के श्राधारपर सूर्य्य के चारों ओर परिक्रममाण