Shatpath Brahman 1 2 — पृष्ठ 1261–1265

शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - १-२ - मोतीलाल शास्त्री · पृष्ठ 1261–1265

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प्रयाजब्राह्मण नत्रप्रयाजपत्रे - इत्थम् - * १ – ' एको मम ० ' २ - ' द्वौ मम ० ' ३ – ' त्रयो मम ० ' एकादशप्रय जपते- इत्यम् १ - ' एको मम. ' २ - ' द्वौ मम ० ' ३ – ' त्रयो मम ० ' ( १ ) ४ – ' एको मम ० ' ( १ ) ४ – ' एको मम ० ' ( २ ) ५ – द्वौ ' मम ० ' ( २ ) ५ – ' द्वौ मम ० ' ( ३ ) ६ – त्रयो मम ० ' ( ३ ) ६ – ' त्रयो मम ० ' ( ४ ) ७ – ' चत्त्वारो मम ० " ( १ ) ( ४ ) ७ – ' एको मम ' ( २ ) —८ – ' द्वौ मम ० ' ( ) ८ - ' पञ्च मम ० ' ६- १ श्च मम ० ' ( ३ ) --६ – ' त्रयो मम ० ' ( ४ ) - - १० - ' चत्त्वारो मम ० ' ( ५ ) - - ११ – ' पञ्च मम ० ' 2833 उक्त क्रमानुसार चतुर्थ – पञ्चम - प्राजधम्मों का आगन्तुक की अनुरूपता प्राप्त करना एक पक्ष है । अब प्रयाजों से सम्बन्ध मानते हुए अनुमन्त्रणसम्पत्ति चतुर्थ, पञ्चम प्रयाज नहीं, अपितु प्रथम, चतुर्थं इसी प्रयाज सम्पत्ति के सम्बन्ध में एक दूसरा प्रकार बतलाया जाता है । भी मिथुनसम्पत्ति की अनुरूपता प्राप्त की जासकती से आगन्तुक प्रयाओं में जो धर्म्म प्राप्त है, उस के द्वारा जो बहुदेवत्य प्रयाज होगा, उस के साथ प्रथम प्रयाज है । प्रथम प्रयाज बहुदेवत्य है, श्रतएव श्रागन्तुक प्रयानों में अतएव आगन्तुक प्रयाज में जो प्रयाज एकदेवत्य के धर्म का सम्बन्ध होगा! चतुर्थ प्रयाज एकदेवत्य है, होगा । होगा, उस के साथ चतुर्थ प्रयाज के धर्म का सम्बन्ध अब इसी सम्बन्ध में एक तीसरा पक्ष बतलाया ' चतुर्थे समानयति ' इस श्रौत श्रादेशानुसार श्राज्यसमानयन जाता है, जो कि सूत्रकार की दृष्टि में सिद्धान्त पक्ष है । न्याय का समाश्रय ठीक बन जाता है । किन्तु प्रयाजानुमन्त्रण कर्म में नवैकादश प्रयाजपक्ष में ' चतुर्थाच्चतुर्थे ' - मन्त्रों के सम्बन्ध में वैसा कोई श्रौत विधान नहीं १७३

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शतपथभाष्य है । श्रपितु यहाँ तो ' श्रागन्तूनामन्तेऽभिनिवेशः ( समावेशः ) – पू ० मी ० ५२ १६ – इस मीमांसा - सिद्धान्ता-नुसार श्रागन्तुक ६-७-८-६, १०-११ - प्रयाजों का सम्बन्ध अन्तिम ( पञ्चम ) प्रयाजधर्म से ही नाप्राप्त है । अतएव उचित यही है कि नवप्रयाजपक्ष हो, अथवा तो एकादशप्रयाजपक्ष । उभयत्र प्रारम्भ के ४ प्रयाजानु-मन्त्रणमन्त्रों में पञ्चप्रयाजपक्षवत् चारों युग्मों का समावेश कर आगे के शेष मन्त्रों में पञ्च पञ्च का ही समावेश करना चाहिए । निम्न लिखित सूत्र अनुमन्त्रणसम्बन्धी उक्त तीनों पक्षों का दिग्दर्शन कराते हुए अन्तिम पक्ष को ही सिद्धान्त पक्ष मान रहे हैं-प्रथमपक्षः ( १६ ) – ' श्रागन्तूनां चतुर्थ - पञ्चमाम्यां स्थानात् ” । ( ३।३।६ ) । १७ ) – ' प्रथम - चतुर्थाभ्यां बा यथालिङ्गम् ” । ( ३।३।७ ) द्वितीयपक्षः सिद्धान्तपक्ष: ( १८ ) – ' सर्वान्वा - उत्तमेन ( पञ्चमेन ), उपायित्त्वात् ' ( ३ | ३ | ८ ) । पञ्च प्रयाजों में से प्रथम प्रयाज की इतिकर्त्तव्यता श्रारम्भ में बतलाई जा चुकी है । प्रकृत में इन पाँचों प्रयाजों से सम्बन्ध रखने वाले श्राश्रावण - प्रत्याभावणादि व्याहृतिमन्त्रों का होतृकर्तृक याज्यामन्त्रों का, तथा-यजमानकर्तृक प्रयाजानुभन्त्रणमन्त्रों का एकत्र संग्रह कर दिया जाता है, जिनका पूर्वप्रतिपादिता प्रथमप्रयाजे-तिकर्तव्यता के साथ समान समन्वय कर लेना चाहिए-२- द्वितीयः प्रयाजः -श्रध्वर्यु राह- श्राग्नीध्रं प्रति — ' ओ श्रावय ' इति । श्राग्नीध्र श्राह - श्रध्वर्युं प्रति — अस्तु श्रौषट् ' इति । अध्वर्यु राह — होतारं प्रति — ' यज ' इति । ४ ततश्च होता पठति — ये * यजामहे - तनूनपादन श्रज्यस्य वे ३ तु वौ षट् ' । पाटानन्तरश्च होता -- ' वषट्कार मा म श्रायुः प्रमोषीर्वागोजः सहौजो यजमानश्च श्रध्वर्युव मयि प्राणापानौ पातम् ' इति पठन - श्रात्मानमालभ्य उपस्पृशति ॥ - ' इदं तनूनपाते न मम । द्वौ मम, द्वे तस्यं योऽस्मान् द्वेष्टि यं च वयं द्विष्मः, अपचितिमान् भूयासम्, इति पठति । - ' यजमानोक्तमन्त्र पाठकाले, होतुर्याज्या मन्त्रपटितवौघडन्ते समिद्धाग्नी जुहोति । सैषा द्वितीयप्रयाजेतिकर्त्तव्यता * । ** शतपथब्राह्मण में द्वितीय प्रयाज के सम्बन्ध में यद्यपि ' श्रथ तनूनपातं यजति ' ( शत ० ११५ | ३ | १० इत्यादि रूप से केवल ' तनूनपात् ' का ही विधान हुआ है । तथापि शाखान्तर से सम्बन्ध रखने वालीं पद्धतियों के अनुसार इस सम्बन्ध में विशेषता रखने वाली विशेषता का भी तदनुसार ही अनुगमन करना आवश्यक माना गया है! राजन्यात्रिबधयश्ववसिष्ठवैश्य शुनकानां कण्वकश्यपसकृतीनां नाराशंसो द्वितीयः प्रयाजः, तन्पादन्ये-१७४

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प्रयाजब्राह्मया ३- तृतीय: प्रयज: -अध्वर्यु ' राह- श्राग्नीघ्र प्रति - ' श्र श्रात्रय ' इति । श्राग्नीध श्राह श्रध्वर्युं प्रति - ' अस्तु श्रौषट् ' इति । राह - होतारं प्रति — ' यज ' इति । ततश्च — होता पठति — ‘ ये यजामहे - इडो अग्न आज्यस्य व्यन्तु वौषट् ' पाठानन्तरञ्च- होता — वषटकार मा म श्रायुः प्रमोर्षीर्वागोजः सहौजो मयि प्राणापानौ पातम् ' इति पटन्नात्मानमालभ्योपस्पृशति । यजमानश्च --- -- ' इद मिड्भ्यो न मम । त्रयो मम, तिस्रस्तस्य योऽस्मान् द्वेष्टि, यञ्च वय द्विष्मः - यशस्वी भूयासम् ' इति पठति । श्रध्वर्युश्च -तृतीयप्रयाजेतिकर्त्तव्यता । -- यजमानोक्लमन्त्रपाठकाले, होतुर्याज्यामन्त्रपटितवौषडन्ते समिद्धाग्नौ जुहोति । सैषा ४---- चतुर्थः प्रयाज'-श्रध्वर्यु राज्यं समानयति । श्राज्यसमानयनानन्तरं — श्रध्वर्यु ' राह- श्राग्नी प्रति — ' श्र श्रावय ' इति । बान् ' ( का ० भ ० ३१३८ सू ० वृ ० - ' वसिष्ठशुनकानां नाराशंसः, श्रत्रीणां चैके ' ( का ० श्र ० १६।६ ८६ ) इत्यादि कात्यायन के सिद्धान्तानुसार — " नराशंसो श्रम श्राज्यस्य वेत्त्विति द्वितीयो वसिष्ठशुनकानां बिभ्रयश्व नां - कण्वसङ्कृतीकां - राजन्यानां प्रजाकामानाञ्च " ( साङ्खा ० श्र ० १७ ३ ) इत्यादि साङ्खायन के सिद्धान्ता-नुसार, - “ तान्येतान्येकादशाप्रीसूक्तानि । तेषां वासिष्ठ - श्रात्रेयं - ब्रायश्वं - गार्त्समद - मिति नाराशंसवन्ति, मैधा-तिथं - दैर्घतमसं - प्रषिक- मित्युभयवन्ति, अतोऽन्यानि तनूनपात्वन्ति ” ( या ० नि ० ८ | ३७ | ) इत्यादि निरुक्तसिद्धा-न्तानुसार, — ‘ नराशंसो द्वितीयः प्रयानो वसिष्ठशुन कानां, तनूनपादितरेषां गोत्राणाम् ' ( आपस्तम्ब औ ० सू ० १ ) इत्त्यादि श्रापस्तम्ब के सिद्धान्तानुसार, तनूनपात् - प्रयाज के सम्बन्ध में विकल्प पक्ष का अनुगमन श्रावश्यक होरह । है | भगवान् श्राश्वलायन ने तो इस सम्बन्ध में और भी विशेषताओं का स्पष्टीकरण किया है ( देखिए, श्रा ० श्र ० ३ २ १ ) । प्रकृत में वक्तव्य केवल यही है कि, यदि यजमान का उक्त वसिष्ठ- शुनक - श्रत्रि - श्रादि गोत्र है, तो उस के याज्यामन्त्र में - ' नराशंसो अन्न श्राज्यस्य वेतु वौषट् ' इसप्रकार तनूनपात् के स्थान में ' नरांशस ' का समावेश होगा | साथ ही प्रयाजानुमन्त्रण - मन्त्र में भी — ' इदं तनूनपाते न मम ' के स्थान में— ' इडं नराशंसाय, न मम ' का सन्निवेश होगा । १७५

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शतपथभाष्य श्राग्नीध्र आह - अध्वमुळे ं प्रति — ' अस्तु श्रौषट् ' इति । अध्वर्यु राह- होतारं प्रति — ' यज ' इति । ततश्च - होता पठति ——— ये यजामहे - बर्हिरग्न श्राग्यस्य वेतु बौषट् ' । पाठानन्तरञ्च - होता —— ' वषट् कार मा म श्रायुः प्रमोषीर्वागोज: सहौजो मयि प्राणापानौ पातम् ' इति पठन्नात्मानमालभ्योपस्पृशति । यजमानश्च-- ' इदं बहिंपे न मम । चत्त्वारो मम चतस्रस्तस्य योऽस्मान् द्वेष्टि, यञ्च वयं द्विष्मः । ब्रह्मवर्चसी भूयासम् ' इति पठति । श्रध्वर्युश्च ———— यजमानोत मन्त्रपाठकाले, होतुर्याज्यामन्त्रपठितवौषडन्ते समिद्धाग्नौ जुहोति | सैया चतुर्थप्रयाजेतिकर्त्तव्यता । ५- पञ्चमप्रयाजः इस प्रयाज के सम्बन्ध में विशेष इतिकर्तव्यताओं का अनुगमन करना पड़ता है, जैसा कि मूलानुवाद में स्पष्ट किया जाचुका है । चतुर्थ प्रयाज कर्म के अनन्तर आग्नीध्र को लक्ष्य बनाकर अध्वर्यु कहता है- ' श्रो श्रावय ' । प्रत्युत्तर में अध्वर्यु को लक्ष्य बनाता हुआ आग्नीध कहता है - ' अस्तु औषट् ' । अनन्तर अध्वर्यु होता को लक्ष्य बनाता हुआ कहता है – ' यज ' । होता उत्तर में निम्न लिखित - याज्यामन्त्र का उच्चारण करता है— “ ये यजामहे -बाहाग्नि, स्वाहा सोमं स्वाहाग्नि, स्वाहा सोमं श्रग्नीषोमो, स्वादाग्नी पोमो, स्वाहा देवा आज्यपा जुपारणा अग्न आज्यस्य व्यन्तु वौषट् ” इति । होता के उक्त याज्यामन्त्र पाठोत्तर यजमान निन्न लिखित प्रयाजानुमन्त्रणमन्त्र का पाठ करता है— इदभग्नये, सोमाय, अग्नये, सोमाय, अग्नीषोमाभ्यां अग्नीषोमाभ्यां देवेभ्य श्राज्यपेभ्य, अग्नये स्विष्टकृते, न मम । पच मम, न तस्य किश्चन योऽस्मान् द्वेष्टि, यश्न वयं द्विष्मः । श्रन्नादो भूयासम् ” इति । जिस समय होता के मुख से उक्त याज्यामन्त्र की अन्तिम ' वौषट् ' इस व्याहृति का उच्चारण होता है, और यजमान उक्त प्रयाजानुमन्त्रणमन्त्रपाठ श्राम्भ करता है, श्रध्वर्यु जुहू स्थित श्राज्य की समिद्ध अग्नि में आज्याहुति दे देता है | यही पाँचवें प्रयाज की इतिकर्तव्यता का स्पष्टोकरण है । " अग्निहोंतेति स्रु गादापनं प्रयाजेषु, सन्निधेः— १– ( ३।२।१६ ) इस सूत्र से आरम्भ कर - ' सर्वान् वोत्तमेनोपायित्त्वात् " १८ ( ३३८ ) इस सूत्र पर्थ्यन्त १८ सूत्रों से इसी प्रयाजकर्मेतिकर्तव्यता का स्पष्टीकरण हुआ है । इस कर्म के अनन्तर आज्या-भिघारकर्मी विहित है, जिस का सोपपत्तिक निरूपण अगले ब्राह्मण में होने वाला है । इति — सूत्रानुगतपद्धतिसंग्रहः १७६

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श्रीः इति - शतपथब्राह्मणविज्ञानभाष्ये प्रथमंकाण्डे द्वितीय: -खण्डः २ [ क्रमानुगता पृष्ठसंख्या १५४२ ]