Shatpath Brahman 1 2 — पृष्ठ 1251–1260

शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - १-२ - मोतीलाल शास्त्री · पृष्ठ 1251–1260

पृष्ठ 1251

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प्रयाजब्राह्मण गतार्थ बन रहा है । इसके अतिरिक्त यदि एवंवित यजमान से स्वाभाविक मानुषभाव कोई द्वारा असत्कर्म्म भी हो जाता है, तो भी वह यज्ञसीमा से बाहिर नहीं होता । क्योंकि अपने आज्यरूप से उसकी यजसीमानुगति अक्षुण है । इसी भाव का - प्रासङ्किक फल का - अपने शब्दों में अभिनय करती हुई श्रुति कहती है ) -यदि उस यजमान के दूर चले जाने पर ऋत्त्विक यजन करता है, अथवा समीप रहने पर यजन करता है, करे, कोई अन्तर नहीं होता कोई हानि नहीं होती । अपितु जिस प्रकार यजमान के समीप रहने पर ( सान्निध्य से ऋत्विक के द्वारा यजमान के लिए यज्ञ कर्म्म ) इष्ट - इष्टजनक-सफल - बनता है, एवमेय एवंवित - ( आज्यरहस्यवित् ) उस यजमान के विदूर रहने पर भी ऋत्त्विक - द्वारा कृत वह यज्ञ इष्ट ही बन जाता है । साथ ही भले ही वह ) स्वाभाविक मानुषदोषवश ) ' अनेक त्रुटियाँ करता है ( करे ), परन्तु निश्यचयेन ( त्रुटि करता हुआ भी ) वह यज्ञसीमा से बाहिर नहीं जाता, जो कि श्राज्य के इस प्राजापत्यानुगत स्वस्वरूप को जानता है || २१ || इति - परिशिष्टप्रश्नोत्तरविमर्शः ---अध्याय में पहिला, चौथे प्रपाठक षे छठा ब्राह्मण ( १६ || ) ( १ | ४ | ६ | ) चतुर्थ पाठक समाप्त ३ त्रित्राह्मणात्मक प्रयाजब्राह्मण में क्रमप्राप्त तृतीय ब्राह्मण समाप्त ३ ( मूलानुवाद समाप्त ) त्रिब्राह्मणात्मक ' प्रयाजब्राह्वाण ' समाप्त, क्रमप्राप्त – २२-२३ - २४ ब्राह्मण समाप्त श्रतत्सद्ब्रह्मणे नमः १६३

पृष्ठ 1252

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( ४ ) - सूत्रानुगत पद्धतिसंग्रहः-सन्दर्भसङ्गतिः-श्रीः --त्रिब्राह्मणात्मक प्रयाजब्राह्मण से पहिले ' स्रुगबाह्मण ' का स्थान है । उसमें १ - त्रुगादापन कर्म्म, २- श्राश्रावण- प्रत्याश्रावणकर्म्म, इन दो कम्मों की इतिकर्तव्यता का निरूपण हुआ है । तदनन्तर प्रकृत के त्रिब्राह्मणात्मक प्रयाजब्राह्मण में प्रयाजकर्म्म की सोपपत्तिक इतिकर्त्तव्यता का विश्लेषण हुआ है । इस दृष्टि से १- गोदापन, २ - प्रा ० प्र ०, ३ - प्रयाज, इन तीनों को हम पृथक पृथक तीन कर्म्म मान सकते हैं । वस्तुस्थिति वास्तव में ऐसी है कि, स्रुगादापन, और श्र ० प्र ०, इन दोनों कम्मों का भी प्रयाजकर्म में हीं श्रन्तर्भाव मानना चाहिए | क्योंकि ' अग्निर्होता वेत्त्वग्नेत्रम् ' इत्यादि नवव्याहृत्यात्मक निगदमन्त्रपाठात्मक होतृकृत स्त्रगादापन-कर्म्म के घृतवतीमध्वर्यो! स्रुचमास्यस्व ' इन पाँचवी व्याहृति के ' घृतवतीम् ' इस पदोच्चारण के साथ ही व जुहू - उपमृत् का ग्रहण कर लेता है । होता के ' घृतवतीम् ' पदोच्चारण के साथ अध्वय्यु का जुहूपभृत् - ग्रहण करना हीं वस्तुतः ‘ स्रुगादापन ' कर्म्म है । ' जुहूपभृत् ' सुकू हैं । इनका समन्त्रक ग्रहण ही ' स्रुगादापन ' है । ७ ' स्रुगादापन ( जुहूपभृत् ग्रहण ) होता है समिद्वाग्नि में श्राज्याहुति देने के लिए, जिस हु कर्म्म को प्रयानकर्म्म कहा गया है । श्राज्याहुति के प्रदान में अध्वर्यु, श्राग्नीघ्र, होता, इन ऋत्विजों की पारस्परिक मन्त्रप्रयोग से संवित् होती है । यज्ञस्वरूप को अव्ययच्छेदरूप से वितत करने वाला, अव्यवच्छिन्न, अप्रस्तुत वागव्यापारहित मन्त्रव्याहृति का प्रयोग ही संवित् है । इस संवित्कर्म्म के साधक ' श्र श्रावय ' - अस्तु श्रौषट्, ‘ यज ’ - ये यजामहे ’ - ‘ वौषट् ' ये पाँच निगढ़मन्त्र, किंवा एक ही निगदमन्त्र की पाँच व्याहृतियाँ हैं । इन पाँचों व्याहृतियों के द्वारा यज्ञकर्म्म में ऐकमत्य ( संविदाना: ) बन कर ही श्राज्याहुतिरूप प्रयानकर्म्म की इतिकर्तव्यता पूरी की जाती है । ऐकमत्यभावात्मिका संवित् की प्राप्ति का साधक मन्त्र का उच्चारण ही ‘ आधावण - प्रत्याश्रावण ' कर्म है, जिसका तात्पर्य्यार्थ यही है कि, निकट भविष्य में ही जिस श्राज्याहुति से प्रयाजकर्म्म होने वाला है, उसके लिए य - लोकस्थ प्राणदेवता यहाँ श्रा जायँ, एवं श्राज्याहुति का ग्रहण कर प्रयाजकर्म को सफल बनावें । 3 इस प्रकार सुगादापनवत् यह श्र श्रावण - प्रत्याश्रावण कर्म्म भी कोई स्वतन्त्र कर्म नहीं है, अपितु यह भी प्रयाजकर्म्म का ही परम्परया पूरक बना हुआ है । क्योंकि श्रा ० प्र ० कर्म से सम्बन्ध रखने वाले निगदमन्त्र की ' यज ' व्याहृति का ' समिधो यज ' इस रूप से प्रयाज के लिए, एवं ' यजामहे - समिद्धो श्रग्न श्राज्यस्य व्यन्तु ' इस रूप से प्रयाज के लिए, ' वौषट् ' का श्राज्याहुति के लिए ही विनियोग हुआ है । इससे स्पष्ट है कि, श्र ० प्र ० कर्म्म प्रयाज का ही साधक है । इसी आधार पर हम कह सकते हैं कि, पूर्वब्राह्मण में • विहित स्रुगादापन, श्र ० प्र ०, दोनों कोई स्वतन्त्र कर्म नहीं है, अपितु दोनों प्रयाजकर्म के स्वरूपसम्पादक बनते हुए प्रयाजाङ्ग बन कर प्रयाजकर्म में ही अन्तर्भूत हैं । अतएव यह स्वीकार करने में भी अब कोई १६४

पृष्ठ 1253

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प्रयाजब्राहाण आपत्ति नहीं उठाई जा सकती कि, पूर्वपठित स्रुगादापन ब्राह्मण का भी त्रिब्राह्मणात्मक प्रकृत प्रयाजब्राह्मण में ही अन्तर्भाव है । फलतः यह कहना भी मुसङ्गत माना जा सकता है कि, प्रयाजब्राह्मण त्रित्राह्मणात्मक की नही है, अपितु स्वकर्म्माङ्गभूत व गादापन समन्वय से यह चतुर्ब्राह्मणात्मक ही है । उक्त स्थिति को सामने रखते हुए यह भी निःसंकोच कहा जा सकता है कि, कात्यायन श्रौतसूत्र के-' अग्निर्होतेति स्रुगादापनम् ' * – ३ | २ | १६ इत्यादि सूत्र से आरम्भ कर ' सर्वान्वोत्तमेनोपायित्त्वात् ' ० - ३ | ३ | ६ | इत्यादि सूत्रय्यन्त १८ सूत्रों में प्रयाजकर्म की इतिकर्तव्यता का ही विश्लेषण हुआ है । यही कारण है कि, पूर्व के गादावन ब्राह्मणभाष्य में हमने सूत्रानुगत जिस पद्धति -संग्रह का दिग्दर्शन कराया है, उसे जान बूझ कर पूरा छोड़ दिया है- ( देखिए सू १० स ० पृ ० सं ० १२७ -१२८ ) । वहीं जिन दो सूत्रों से इति-कर्त्तव्यता का दिग्दर्शन कराया गया है, उसका वस्तुतः प्रयाजकर्म से ही तम्बन्ध है । अतएव उचित है कि, प्रयाजब्राह्मण के मूलानुवाद के अनन्तर क्रमप्राप्त सूत्रानुगत पद्धतिसंग्रह नामक प्रकृत परिच्छेद में उस उक्त सूत्रद्वयात्मक पद्धतिसंग्रह का संग्रह करते हुए ही यहाँ सूत्रानुगत इतिकर्त्तव्यता का सामूहिकरूप से विश्लेषण * किया जाय । इस सन्दर्भसङ्गति को लक्ष्य बना कर ही पाठक निम्नलिखित प्रयाजावृत् ( सूत्रानुगता प्रयाजकर्म्म-पद्धति ) का समन्वय करेंगे, यही आरम्भिक निवेदन है । ' सवै प्रवरायाश्रावयति ० ' ( शत ० ११५ | १ ) से प्रारम्भ कर ' अथाग्निमीक्षमाणो जपति ० ' ( शत • १५।२६ । ) यहाँ तक २६ कण्डिकाओं में ( २६ कण्डिकात्मक ' होतृप्रवरब्राह्मण ' नामक ब्राह्मण में ) ' होतृ-वरण ' कर्म्म का सोपपत्तिक - निरूपण हुआ है, जिसका प्रस्तुत शतपथभाष्य के पञ्चम वर्ष के - ६१ वें पृष्ठ से आरम्भ कर ११० वें पृष्ठ पर्यन्त ५० पृष्ठों में सोपपतित प्रतिपादन हुआ है । सूत्रक्रमानुसार - ' निधायेध्मसन्न -हनान् ० ' - का ० श्र ० ३ २/३ - इस सूत्र से आरम्भ कर - ' सम्मृष्ठा उपविशतः ३ | २ | १५ | इस सूत्र पर्य्यन्त १३ सूत्रों में होतृवरणक की इतिकर्तव्यता का विश्लेषण हुआ है - ( देखिए पृ ० सं ० ८१ से ८४ पन्त ) । होतृवरण कम्र्मेतिकर्त्तव्यता- विश्लेषक उक्त त्रयोदशसूत्र - सन्दर्भात्मक सूत्रप्रकरण के अन्तिम ' सन्मृष्टा उपविशतः ’ इस सूत्र को प्रकरणसङ्गतिसंग्राहक मान कर ही हमें प्रयाजकम्र्मेतिकर्तव्यता प्रतिपादक १६ सूत्र सन्दर्भात्मिक सूत्रप्रकरण का समन्वय करना है । गादापन - श्राश्रावण, नामक दो कम्मों को अपना अङ्गकर्म बनाने वाले प्रयाजकर्म से पहिले वाद ऋत्विजोंनें विहित पद्धति के अनुसार यथानुसार वरणकर्म का अनुगमन कर लिया है । वरणकर्मानन्तर त होता अपनी प्राणाग्नि - सम्पत् को मनो - याकू से युक्त करने के लिए मनोरूप अध्वर्यु के, तथा वागूरूप आग्नीध्र के अंशप्रदेश का स्पर्श करता है । स्पर्शकर्मानन्तर -X ‘ षण्मोवींरंहसस्पान्तु ं ' * - " प्रयाध्वर्यु चाग्नी च सम्मृशति ( होता ) । मनो वाऽश्रध्वर्युः, वाग्घोता । तन्मनश्चैवैतद्वाचं च सन्दधति " - शत ० १५ १।२१ । + इस सम्बन्ध में यह स्मरण रखना चाहिए कि, स्पर्शकर्मानन्तर होताके द्वारा प्रयुक्त स्वस्त्ययनजप की इतिकर्त्तव्यता का कात्यायन श्रौतसूत्र में उल्लेख नहीं हुआ है, जब कि स्वयं शतपथ में वह विहित है । ' मोवीं-रंहतस्पान्तु ० ं से श्रारम्भ कर ' येन पथा हव्यमावो वहानि ' यहां तक की होतृकर्तृक इतिकर्तव्यता सूत्र में क्यों उद्धत नहीं हुई? इस प्रश्न का उत्तर अज्ञात है । श्रुतिविहित होने से अनुगमन इसका अवश्य ही किया जाता है । १६५

पृष्ठ 1254

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शतपथमाध्य इत्यादि लक्षण ' स्वस्त्ययनजप ' कर्म्म करता है ( १०८ पृ ० ) । स्वस्त्ययन जपक समाप्त्यनन्तर ' होदन ' नामक स्वस्थान की और लौट कर समन्त्रक तृणनिरसन करता हुआ यथास्थान बैठ जाता है - ( १०६ १० ) । बैठने के अनन्तर देवस्तुति करता है ( ११० पृ ० ) । इधर होता तो अपनी यह इतिकर्तव्यता पूरी करता है, उधर होता के द्वारा स्वांस- प्रदेश से स्पृष्ट अध्वर्यु श्राग्नी, दोनों स्पर्शानन्तर - अपने अपने स्थानों में बैठ जाते हैं । इसप्रकार अवान्तर कर्म संग्रहात्मक वरणकर्म्म समाप्त किया जाता है, जिस का ' सम्मृष्य उपवि-शत: ' इस ( ३।२।१५ ) इस सूत्र से उपसंहार हुआ है । अनन्तर क्या होता है? दूसरे शब्दों में वरणकर्म्मा-नम्तर ऋत्विक लोग प्रकृत पूर्णमासेष्टिकर्म्म के किस अवान्तर क्रत्वर्थ कर्म का अनुगम करते हैं?, इसी प्रश्न का समाधान करता हुआ - प्रयाजकर्मेतिकर्त्तव्यात्मक निम्न लिखित सूत्रानुगत पद्धतिसंग्रह प्रकरण पद्धति-प्रेमियों के सम्मुख उपस्थित होरहा है । वरणकर्म्मानन्तर ऋतुदेवताओं का यजन होता है । यही ऋतुयजन ' प्रयाजकर्म्म ' कहलाया है । प्रयाजकर्म्म विति श्राज्याहुति के ग्रहण के लिए प्राणदेवतओं का अग्नि के द्वारा इस यज्ञ में सम्बन्ध अपेक्षित है । तदर्थ ही होता के द्वारा वरणकर्म्मानन्तर स्रुगादापनकम्भ, एवं अन्य ऋत्विक सहयोग दे श्राश्रावण – प्रत्याश्रावण-कर्म्मविहित है । इतिकर्तव्यता का प्रकार यह है कि, -' होतृषदन ' नामक स्वस्थान पर बैठकर आहवनीयाग्नि की ओर दृष्टिपात करता हुआ होता - ' विश्वेदेवा शास्त न मा यथेह ० ' इत्यादि वरणकर्म्माङ्गभूत मन्त्रजप करने के अनन्तर उपांशु - उच्चस्वर की नियत मर्यादा से निम्न लिखित स्रुगादापननिगद का पाठ करता है -" ओम् अग्निर्होता वेत्त्वग्नेर्होत्रं वेत्तु पावित्रं साधु ते यजमानदेवता ( इत्युच्चैः ), योऽग्नि होतारमवृथाः ( इत्युपांशु ), घृतत्रतीमध्वर्यो त्रुचमास्यस्व देवयुत्रं विश्ववारा मीडामहै देवाँ २ || ईडे न्यान् - नमस्याम नमस्यान् यजाम यज्ञियान् " ( इत्युच्चैः ) । शत ० १।५।३।१-३ । - । जिस समय होता उक्त मन्त्र का पाठ करता है, और उस के मुख से - मन्त्र का ' घृतवतीम् ' पद निकलता है, उसी समय पदोच्चारण के अव्यवहितोत्तरकाल में ही स्वस्थान में स्थित अध्वर्यु ' जुहू - उपभृत नामक स्रुचों का ग्रहण करता है । यही इस का समन्त्रक ' स्रुगादापन ' ( लुगादान ) कर्म है । प्रयाजकर्म्म समन्त्रक है, गादापन तदङ्ग है, तत्सन्निहित में विहित है, अतएव प्रयानों में विहित गादापन अग्निर्होता ० इत्यादि मन्त्रोच्चारण पूर्वक ही होना न्यायप्राप्त है । हाँ, जहाँ प्रयाजाभाव है, वहाँ तूष्णीं ही सुकू का आदान होता है । इसी विशेषता का, साथ ही समन्त्रक त्रुगादापन का स्पष्टीकरण करते हुए सूत्रकार ने कहा है-( १ ) * श्रग्नितिति व गादापनं प्रयाजेषु सन्निधेः ” । ( ३ । २ । १६ । ) । * * * इसप्रकार होता के ' घृतवतीम् ' पदोच्चारण करने के अव्यवहितोत्तरकाल में अध्वर्यु - जुहू - उपभृत्-लेकर हविष्यों से पूर्व, एवं अग्निपरिधियों से पश्चिम की ओर नियत ' सञ्चर ' नामक मार्ग से अपने वामपाद को आगे करता हुआ वेदि के दक्षिण पार्श्व में आहवनीय के समीप बने हुए ' यजति ' स्थान में पहुँचता है । वहाँ १६६

पृष्ठ 1255

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प्रयाजब्राह्मण पहुँच कर ईशानाभिमुख खड़ा होकर आग्नीध नानक ऋत्विक्. को लक्ष्य बना कर कहता है— ' श्र श्रावय ' । उत्तर में स्वस्थान में स्थित श्राग्नीघ्र अध्वर्यु को लक्ष्य बनाकर कहता है - ' अस्तु श्रौषट् ' । अनन्तर तत्रैव ईशानाभिमुख खड़ा हुआ अध्वर्यु - होता को लक्ष्य बनाकर कहता है - ' समिधो यज ' | ' समिधो यज ' रूप से होता के प्रति प्रध कर इधर श्रध्वर्यु ' तो जुहू को उपभृत् पर से पूर्व की ओर - श्राहवनीयाग्नि की और उतार कर आहुति के लिए सन्नद्ध होता है, उधर होता श्रध्वर्यु से प्रेषित होकर समिद्द ेवताक निम्न लिखित याज्या-मन्त्र का स्वस्थान से उच्चारण करता है-' ओये ३ यजामहे ( १ ) समिधः समिधो अग्न आज्यस्य व्यन्तु ३ बौ ३ षट् ' इति । होता के उक्त याज्यामन्त्रोच्चारण की अन्तिम ' वौ ३ षट् ' इस व्याहृति के साथ वह श्रध्वर्यु - जुहू स्थित श्राज्य के तृतीयांश की श्राहवनीयाग्नि के अतिशय रूप से प्रज्वलित भाग में ( समिद्धत मे ) जुहू से श्राहुति दे देता है । यही प्रथम प्रयाजकर्म्म है । इसी कम से शेष चारों प्रयाजों की आहुति होती है । इसप्रकार यथा-क्रम पञ्च प्रयाओं का समिद्धम अग्नि में अनुष्ठान होता है । अन्तर केवल यही है कि, प्रथम प्रयाज में होता के प्रति वसन्तऋतुरूप समिद्देदेवता का जैसे ' समिधो यज ' इत्यादि -- रूप से नाम ग्रहण होता है, वैसे ग्रीष्म-वर्षा - शरत् - हेमन्त ऋतुरूप तनूनपात् इट - वर्हि - स्वाहा - नामक शेष चार प्रयाजों में होने वाले प्रध में नामोच्चारण कर केवल ' यज ' ' यज ' रूप से ही होता के प्रति प्रेष होता है । इसके साथ ही यह भी स्मरण रखना चाहिए कि, जिस समय होता ' ये यजामहे समिध: ' इत्यादि बोल चुकता है, अव्यवहित क्षण में हीं यजमान निम्न लिखित त्यागमन्त्र बोलता है-" इति समिद्भ्यो न मम । एको मम, एका तस्य यमहं द्व ेष्मि । ( यदि न द्विष्यात् तदा तु ) योऽस्मान् द्व ेष्टि, यञ्च वयं द्विष्मः ( इत्येव ब्रूयात् ) । त्विषिमान् भूयासम् " इति । तात्पर्य यह निकला कि, उधर होता याज्यामन्त्र बोल चुकता है, उसके मुख से ' वौ ३ घट ' निकलता है, इधर यजमान उक्त त्यागमन्त्र बोलना आरम्भ कर देता है । होता के वषट्कार के पश्चात्, यजमान के त्यागमन्त्र के बोलते समय ही अध्वर्यु आहुति देता है । इधर श्रध्वर्यु ' होता के ' वौषट् ' उच्चारणानन्तर अग्नि में आहुति देता है, उधर होता याज्यामन्त्रोच्चारणाव्यवहितोत्तरकाल में स्त्रशान्त्यर्थं निम्न लिखित मन्त्रोचारण करता हुआ अपने हृदयस्थान का स्पर्श करता है, यही क्रम शेष चारों प्रयाजों में समझना चाहिए-" वषट्कार! मा म आयुः प्रमोषीर्वागोजः सहौजो नयि— प्राणापानौ पातम् " ( इति होता पठति याज्यानन्तरम् ) इति ॥ नामग्रहणानुगत - वसन्तरूप समित् - नामक प्रथम प्रयाजकर्म की इसी इतिकर्तव्यता का स्पष्टीकरण करते हुए सूत्रकार कहते हैं— १६७

पृष्ठ 1256

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शतपथ भाष्य ( २ ) - घृतवतीमित्युक्त चावादाय, अतिक्रम्य, आश्राव्य, आह-' समिधो यजे ' ति । पञ्चप्रयानान्त्समिद्वतमे ( जुहुयान् ) " || ( | २ | १७ ) ( ३ ) - ' यज यजेति शेषम् ” ( ३।२।१८ ) । अत्र पञ्च प्रयाजों से सम्बन्ध रखने वाली कुछ एक उन विशेषताओं का सूत्रकार दिग्दर्शन करा रहे हैं, जिनका ब्राह्मण भाग में स्पष्टीकरण हुआ है । जिस पूर्वोक्त स्थान पर खड़ा होकर अध्वर्यु ' प्रयाजक ( हुतिकर्म्म ) करता है, उसे उसी स्थान पर खड़े रहना चाहिए | अविचाली भाव से ही प्रयाजाहुति देनी चाहिये । अथवा इसी सम्बन्ध में एक दूसरा पक्ष यह भी है कि, प्रतिप्रयान याग में ग्राहवनीय के सम्मुख पूर्व पूर्वस्थान से अतिक्रमण कर आगे आगे बढ़ते हुए श्राहुति देनी चाहिए | इसप्रकार यद्यपि सुत्रकार ने दोनों पक्ष उद्धृत कर दिये हैं । तथापि श्रुति के - ' तदु यथा न कुर्यात् । यत्रैव तिष्ठन् प्रयाजेभ्य श्राश्रावयेत्, तत ८ व नापक्रामेत् ' ( शत ० १ | ५ | ४/७ ) इस सिद्धान्त के अनुसार अनाक्रमणात्मक प्रथम पक्ष ही सिद्धान्त पक्ष समझना चाहिए । बसन्त-- ग्रीष्म- वर्षारूप - समित्, तनुनपात्, बर्हि, इन तीन प्रयाजों के लिए तो जुहू में पहिले से ध्रुवा-द्वारा चतुर्वार गृहीत श्राज्य की ही आहुति देनी चाहिए । परन्तु शरत् - रूप चौथे ' बर्हि ' नामक प्रयाज का अनुष्ठान करने से पहिले जुहू में उपभृत् से श्राज्य ग्रहण और करना चाहिए । क्योंकि धवा से उपमृत् में अष्टौ कृत्वः ( आठ बार करके ) जो श्राज्य ग्रहण होता है, उस गृहीत श्राज्य की मात्रा में से श्रद्ध भाग तो अनुयाजों के लिए विहित माना गया है, एवं श्रद्ध ' मात्रा का प्रयाजकर्म्म के लिए आदेश हुआ है । अतएव जुहू में उपभृत् से प्रयाजकर्म्मार्थ श्राधे श्राज्य का ही ग्रहण करना चाहिए । इस सम्बन्ध में यह भी ध्यान रखना चाहिए कि, प्राज्यग्रहण करते समय कहीं जुहू का उपभृत् से स्पर्श न हो जाय । श्रनवमृशन् ( दोनों का स्पर्श न करते हुए, दोनों को पृथक् रखते हुए ) ही चतुर्थ प्रयाज में प्राज्यग्रहण विहित है, जिसकी उपपत्ति मलानुवाद में बतलाई जा चुकी है । अत्र इस आज्यसमानयन - कर्म्म के सम्बन्ध में एक प्रासङ्गिक प्रश्न उपस्थित होता हैं । प्रकृत पूर्णमा-सेष्टि ' प्रकृतियाग ' है । एवं इसके आधार पर वितत श्राग्रायणादि अन्य इष्टियाँ ' विकृतियाग ' है । ' प्रकृतिवद्वि-कृतिः कर्त्तव्या ' इस मीमांसा - सिद्धान्तानुसार कुछ प्रातिश्विक विशेष इतिकर्त्तव्यताओं को छोड़कर इन विकृति-भूता इष्टियों में प्रकृतिवत् ही अनुगमन किया गया है । उदाहरण के लिए प्रसङ्गोपात्त प्रयाजकर्म्म को ही लीजिए | जिसप्रकार प्रयाजकर्म्मप्रकृतिभूता प्रकृत की पूर्णमासेष्टि विहित है, एवमेव विकृतिभूता अन्य इष्टियों में भी प्रयाजक संगृहीत माना गया है । हाँ दोनों प्रयाजों की संख्या में अवश्य ही विभेद है । प्रकृति - इष्टि ( पूर्णमासेष्टि ) में जहाँ पाँच प्रयान विहित हैं, वहाँ अन्य विकृति - इष्टियों में ११ प्रयाज माने गए हैं । किसी विकृति में प्रयाज हैं, तो किसी में ११ प्रयाज हैं । विकृति इष्टियों से सम्बन्ध रखने वाले इस प्रयाज, साथ ही प्रयाजसंख्यानुरूप ही अनुयाग संख्यावृद्धि के आधार पर ही श्राज्यसमानयन कम्र्म्म के सम्बन्ध में यह प्रासक्तिक प्रश्न उपस्थित होता है कि, जहाँ प्रयाजानुयाजवृद्धि है, वहाँ श्राज्यसमानयन की क्या व्यवस्था होगी? | १६८

पृष्ठ 1257

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प्रयाजब्राह्मण प्रश्न का तात्पर्य स्पष्ट है । आदेश यह है कि, चौथे प्रयान में ही श्राज्य ग्रहण करना चाहिए । जहाँ ६, अथवा ११ प्रयाजानुयाज हैं, वहाँ, आरम्भ के तीन प्रयाज- कम्र्मानन्तर चौथे में ग्रहण कर लिया जयगा, और यहांतक तो ' चतुर्थे समानयति ' आदेश का यथावत् [ पञ्चप्रयाजयपक्षवत् ] पालन होजायगा | परन्तु पक्ष में ५ प्रयाज ११ पक्ष में ७ प्रयान, शेष रह जाते हैं । चतुर्थ प्रयाज में गृहीत श्राज्यमात्रा से ही शेष ५, अथवा ७ प्रयाजों की इतिकर्त्तव्या पूर्ति असम्भव है । तदर्थ पुनः प्राज्यग्रहण आवश्यक रूप से अपेक्षित है । ऐसी स्थिति में यदि ' चतुर्था नन्तर अपेक्षा वश आगे के प्रयानों में आज्यग्रहण किया जाता है, तो चतुर्थे समा-नयति ' नियम का व्याघात होता है । यदि इस नियम की रक्षा के लिए आगे ग्रहण नहीं किया जाता, इति तो कर्त्तव्यता पूरी नहीं होती । इसी प्रासङ्गिक विप्रतिपत्ति का निराकरण करते हुए सूत्रकार कहते हैं कि— प्रयाजवृद्धि - पक्ष में भी चतुर्थ चतुर्थ की प्रवृत्ति कर लेनी चाहिए । तात्पर्य सूत्रकार का यही है कि, मान लीजिए किसी विकृति- इष्टि में १ प्रयाज हैं । वहाँ यह व्यवस्था होगी कि, आरम्भ के १, २, ३, प्रयाजों की इतिकर्त्तव्यता तो पूर्वग्रहीत जुहूस्थित श्राज्य से पञ्चप्रयाज-- पक्षवत् पूरी कर दी जायगी । ४ थे प्रयाज में भी पञ्चप्रयाजपक्षवत् श्राज्यग्रहण कर ' चतुर्थे समानयति ' का पालन कर लिया जायगा । इस चतुर्थप्रयाजोपक्रम में गृहीत श्राज्य से ४, ५, ६, इन तीन प्रयानों की इतिकर्तव्यता पूरी हो जायगी । अत्र ७, ८, ६, इन तीन प्रयाजों के लिए श्राज्य की अपेक्षा होगी । इसके लिए सातवें प्रयाओपक्रम में । ६ ठे प्रयाज की समाप्ति के अनन्तर ] दुबारा श्राज्य ग्रहण होगा, जो कि-- ' चतुर्थाच्चतुर्थे ' भाव से चौथा ही पड़ेगा । चौथे प्रयाज से सातवाँ प्रयाज चौथा पड़ेगा, अतएव सातवें वे आज्य समानयन करते से ' चतुर्थे समानयति ' नियम का भी पालन हो-जायगा, इतिकर्तव्यता भी पूरी ही जायगी । यही ' चतुर्थात् चतुर्थे ' नियम एकादश प्रयाज पक्ष में काम देगा । | ११ प्रयाज पक्ष में प्रारम्भके १, २, ३, की इतिकर्त्तव्यता पूर्व गृहीत श्राज्य से गतार्थ है । ४ थे में पञ्चप्रयाज पक्षवत् श्रज्य ग्रहण है । इस चौथे से चौथा सातवाँ से चौथा १० बा हैं । अतः यहाँ सप्तम, और दशन में आज्यग्रहण से ' चतुर्थे समानयति ' का पालन होजायगा । इसप्रकार नव प्रयाज पक्ष में ' चतुर्थाच्चतुर्थे ' ( सप्तमे ) ' रूप से पञ्चप्रयाज- पक्षापेक्षया एक बार अधिक आाज्य ग्रहण होगा । एवं एकादश प्रयाज पक्ष मैं- ' चतुर्थाच्चतुर्थे'- ( मप्तमे ), पुनश्चतुर्थात् ( सप्तमात् ) चतुर्थे ( दशमे ), रूप से पञ्चप्रयाजापेक्षया दो बार अधिक श्राज्य ग्रहण होगा । यही व्यवस्था नवैकादशानुयाजों में मान्य होगी, जिस प्रासङ्गिक व्यवस्था का निम्न लिखित तालिका से स्पष्टीकरण हो रहा है -प्रकृति- इष्टि: --१ – वसन्तयागात्मकः — प्रथम प्रयाजः - गृहीता ज्येन । हुतिः २ - ग्रीष्मयागात्मकः - द्वितीयप्रयाज: -पञ्चप्रयाजाः - २ ३ - प्रावृड्यागात्मकः - तृतीयप्रयाज: -४- शरद्यायागात्मकः - चतुर्थप्रयाबः -५ - हेमन्तयागात्मकः - पञ्चमप्रयाजः -" " " " L २६६

पृष्ठ 1258

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शतपथभाष्य विकृति - इष्टि: -( नवप्रया जात्मिका ) १ – गृहीता ज्येनाहुतिः २– ३– " 1 ( १ ) - ४ - चतुर्थे समानयति ( २ ) – ५ – गृहीताज्येन । हुतिः ( ३ ) –६– " ( ४ ) – ७ - चतुर्थाच्चतुर्थे समानयति = --गृहीता ज्येनाहुतिः " विकृति- इष्टिः-( एकादशप्रभाजात्मिका ) ११ – गृहीताज्येनाहुतिः " ( १ ) - ४ - चतुर्थे समानयति ( २ ) – ५ – गृहीता ज्येनाहुति: ( ३ ) –६– " " ( १ ) - ( ) – ७ – चतुर्थाच्चतुर्थे समानयति ( २ ) ----- - गृहीताज्येनाहुतिः ( ३ ) ---- 99 ( ४ ) - - - १० – चतुर्थाच्चतुर्थे समानर्यात ११ – गृहीताज्येनाहुतिः प्रयाकर्म से सम्बन्ध रखने वाली सभी विशेषताओं का स्पष्टीकरण करा दिया गया । अब इस सम्बन्ध में केवल आहुति - विशेषता और शेष रह जाती है । ग्राहुति कैसे देनी चाहिए १, आहुति देते समय जुहू - उपभृत् का सम्बन्ध कैसा रहना चाहिए? इसी प्रश्न का समाधान करते हुए सूत्रकार कहते हैं कि, अध्वर्यु को चाहिए कि, उपभृत् के ऊपर रक्खी हुई जुहू को उपभृत् को मुखभाग की ओर से सावधानी से उतार उसे जुहू को प्राचीमुख रहता हुआ प्रथमाहुति प्रदान करे । प्रथम आहुति के अनन्तर उसी पद्धति से उपभृत् के ऊपर जुहू रख दे । अनन्तर उसी पूर्वक्रम से उपभृत् से उतार कर द्वितीयाहुतिप्रदान करे । इस प्रकार पाँचों प्रयानाहुतियों में ही जुहू को उपभृत् र रख रख कर उतार उतार कर आहुति - कर्मेतिकर्त्तव्यता पूरी करे । केवल प्रयाजकर्म्म में हीं यह अध्यूहन, अपहरणकर्म्म आवश्यक हो, यह बात नही है । अपितु होममात्र में इसी नियम को व्याप्ति समझनी चाहिए, एवमेव सर्वहोम मे श्राहुति देनी चाहिए । निम्न लिखित सूत्र प्रयाजकर्म से सम्बन्ध रखने वालीं इन्हीं विशेषताओं का स्पष्टीकरण कर रहें हैं—– ( ४ ) — “ ध्र वस्तिष्ठन् ' ( २।२।१६ ) । ( ५ ) - ' पूर्वं पूर्वं वाऽभिक्रामन् " ( २ । २ । २० ) । ( ६ ) – “ उपभृतो जुह्वामानयति, अनवमृशन् चतुर्थम् " ( ३।२।२१ ) । ( ७ ) – “ एव प्रवृद्धौ ” ( ३।२।२२ ) । ( 5 ) — " अनुयाजेषु च " ( ३।२।२३ ) । ( E ) – “ उत्तरां जुहूमध्युह्य, प्राचीमवहृत्य जुहोति ” ( ३।२।२४ ) ( १० ) – “ एवं सर्वत्र ” ( ३।२।२५ ) । इति — काव्ययन श्रौतसूत्रे तृतीयाध्यये द्वितीया कण्डिका समाप्ता १७०

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शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - १-२ - मोतीलाल शास्त्री, पृष्ठ 1259 का मूल पृष्ठ
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प्रायनत्राह्मण जिस प्रकार ' एवं सर्वत्र ' ( ३।२।२५ ) सुत्रादेशानुसार जुहू - उपभृत् का अध्यूहन होममात्र में समानरूप से विहित है, एवमेव जुहू - उपभृत् का नाभिदध्न प्रदेश में धारण भी होममात्र के लिए ही विहित समझना चाहिए | तात्पर्य्य कहने का यही है कि, आहुति के लिए गृहीत उपभृत् युक्त - प्राज्यपरिपूर्ण जुहू को नाभिसमानप्रदेश में हीं रखना चाहिए । एवं होममात्र में इसी नियम का अनुगमन करना चाहिए । जिस समय होता ' ये यजामहे समिधः समिधो अग्न श्राज्ययस्य व्यन्तु वौषट् ' इत्यादि याज्या बोल चुकता है, अनन्तर ही होता त्यागमन्त्र का उच्चारण करता है, यह पूर्व में कहा जाचुका है । यजमानकृत यही कर्म्म ' प्रयाजानुमन्त्रण ' कम्मं कहलाया है । सूत्रकार कहते हैं कि, प्रथम प्रयाजनुमन्त्रण में ' एको मम, एका तस्य योऽस्मान् द्वेष्टि, यञ्च वयं द्विष्मः ' इस वाक्य का समावेश करना चाहिए । एवमेव श्रागे के शेष चार प्रयाजकम्मों से सम्बन्ध रखने वाले तीन प्रयाजानुमन्त्रण - मन्त्रों में ( २-३-४ में ) क्रमशः यथासंख्य--' द्वौ मम तस्य त्रयो मम - तिस्रस्तस्य चत्वारो मम चतस्रस्तस्य ० ' इस रूप से मिथुन - युग्म - भावों का समावेश करना चाहिए | सर्वान्त के पाँचवें प्रयाजानुमन्त्रण में ( युग्मोत्तर के स्थान में - पञ्च मम -- न तस्य किञ्चन योऽस्मान् द्वेष्टि ० ' इत्यादिरूप से ) ' न तस्य किञ्चन ' इस वाक्य का सन्निवेश करना चाहिए । इसके अतिरिक्त पाँचों प्रयाबो से सम्बन्फ रखने वाले यजमानकर्तृके पांचों प्रयाजानुमन्त्रण - मन्त्रों के अन्त में क्रमशः त्विधिमान् श्रपचितिमान्, यशस्वी, ब्रह्मवर्चसी, अन्नादः, ( भयासम् ) इन व्याहृतियों का सम्बन्ध श्रौर कर देना चाहिए । जुहूपमृत् - धारणानुगत नियमविशेष का, तथा प्रयाजानुमन्त्रण - मन्त्रों से सम्बन्ध रखने वाली इसी विशेषता का स्पष्टीकरण करते हुए सूत्रकार कहते हैं— ( ११ ) - " नाभिदेशे धारणम् ” ( ३।३।१ ) । ( १२ ) — " प्रयाजानुमन्त्रण -- " मेको ममैका तस्य योऽस्मान् द्वेष्टि यश्च वयं द्विष्मः " इति " । ( ३/३ ( २ ) । ( १३ ) – “ एवं मिथुनैर्यथासख्यम् ” ( ३।३।३ ) । ( १४ ) – न तस्य चिनेति पञ्चमे " ( ३।३।४ ) । ( १५ ) - " त्विषिमान्, पचितिमान्, यशस्वी, ब्रह्मवर्चसी, श्रनादः " इति च ( ३।३।५ ) । पञ्च प्रयाजकर्म की इतिकर्तव्यता जिन याज्यामन्त्रों से सम्पन्न होती है, उनके उच्चारण के अनन्तर यजमान अपनी ओर से प्रयाजसंख्यानुसार मन्त्रोच्चारण करता है । यजमानकृत यही कर्म्म प्रयाजानुमन्त्रण कहलाया है । इस कर्म्म के सम्बन्ध में पूर्व के १३ वें सूत्र के द्वारा यह सिद्धान्त स्थापित किया गया है कि, पांचों प्रयाजानुमन्त्रण - मन्त्रों में से प्रारम्भ के चार मन्त्रों में क्रमशः १ ) - ‘ एक: -- एका:, ' - ( २ ) - ' द्वौ द्वे, ' -( ३ ) – ‘ त्रयः – तिस्रः, ’ - ( ४ ) - ' चत्वारः -- चतस्रः ' – इन चार मिथुन भावों का समावेश होता है । पाँचवें श्रनुमन्त्रण में केवल ' पञ्च मम न तस्य किञ्चन योऽस्मान् द्वेष्टि ' इत्यादि का समावेश होता है । तात्पर्य यही है कि, चार मन्त्र मिथुनसम्पत्ति से युक्त हैं, पांचवां मिथुनभाव से वञ्चित है । जिस प्रकार नवैकादश प्रयाजपक्ष में श्राज्यसमानयन की विप्रतिपति हुई थी, एवमेव नवैकादश- प्रयाजपक्ष में यजमानकर्तृक * — अध्युह्य — श्रध्यूहनं - उपभृत उपरि निधानम् । श्रवहृत्य — श्रवहरणं — उत्तारणम् । १७१

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शतपथभाष्य प्राजानुमन्त्रण - मन्त्रों से सम्बन्ध रखने वाले उक्त मिथुन भावों के सम्बन्ध में भी वही विप्रतिपति उपस्थित हो रही है । जिसप्रकार नवैकादश -- प्रयाजानुयाजपक्ष में वृद्धिक्रमानुसार श्राज्यग्रहण द्वि- त्रिरावृत कर लिया जाता है, क्या तत्पज्ञानुगत प्रयाजानुमन्त्रण - मन्त्रों में भी उक्त मिथुनभावों का पुनरावर्त्तन होगा? इसी प्रासङ्गिक विप्रतिपति का निराकरण करते हुए सूत्रकार कहते हैं कि-श्रागन्तुक प्रयाओं का चतुर्थ - पञ्चम प्रयाज से जो धर्म्म प्राप्त है, उसी धर्म के साथ सम्बन्ध समझना चाहिए | क्योंकि श्रागन्तुक प्रयाओं का चतुर्थ - पञ्चम प्रयाज के धर्म से ही विधान हुआ है । सूत्र का तात्पर्य्यार्थ स्पष्ट है । मान लीजिए, विकृति में प्रयाज हैं । इन ६ प्रयाजों में ४ था प्रयाज ' चतुर्थात् चतुर्थे ' न्याय से प्रथम प्रयान बन रहा है, पाँ प्रयान उसी ' चतुर्थात् चतुर्थे ' से चतुर्थ बन रहा है, शेत्र ८०१ प्रयाज ' चतुर्थात् -- पञ्चम ' न्याय से पञ्चम प्रयाज बन रहा है । ऐसी स्थिति में १, २, ३, प्रारम्भ के इन तीन प्रयाजानुमन्त्रण - मन्त्रों में तो प्रकृतिवत् पञ्चप्रया अपक्षयत् ) ' एक: -- एका, ' -- ' द्वौ द्वे, ' ' त्रयः-तिस्र ' - इन मिथुनों का समावेश होगा ही । आगे के ४, ५, ६, इन तीन प्रयाजानुमन्त्रण - मन्त्रों में भी इन्हीं तीनों मिथुनभावों का समावेश होगा क्योंकि मानों प्रयाज चौथा है, तदपेक्षया ४-५-६ ठे प्रथाज १,२,३, प्रथाज है, ज्यां क्योंकि चौथा प्रयाज है । अतश्व तत्प्रयाजानुमन्त्रण मन्त्र में ' चस्वारः चतस्रः ' का समावेश होगा । ८६, इन दो प्रयाजानुमन्त्रणमन्त्रों में- ' पश्च मम न तस्य किञ्चन ० ' इत्यादि का समावेश होगा यदि एकादशप्रथाजपक्ष है, तो आरम्भ के १,२,३, प्रयाजों में मध्य के ४,५,६, प्रयाश में, अन्त के ७,८,६, प्रयानों में पञ्चप्रयाजानुगत श्रारम्भ के १, २, ३, प्रयाजानुमन्त्रवत् तीनों युग्मों का सम्बन्ध होगा । क्योंकि ४ था प्रबाज १ है, तदपेक्षया ५-६, दोनों २, ३ रे प्रयाज हैं । सप्तम प्रयान कौ १० पेक्षा १ है, तदपेक्षया ८, ६, दोनों २-३ रे हैं । १० वीं प्रयाज सप्तमापेक्षया चौथा है, ११ व प्रयाज ] पाँचवाँ है । इसप्रकार ' चतुर्थपञ्चमाम्याम् ' न्याय से नवैकादशप्रयाजानुगत प्रयाजानुमन्त्रण मन्त्रों में भी पञ्चप्रया जानुमन्त्रणमन्त्रवत् मिथुनसम्पत्ति की अनुरूपता का समावेश हो जाता है । निम्न लिखित तालिका से उक्त सम्बन्ध - क्रम का भलीभाँति स्पष्टकरण हो जाता है--पञ्चप्रया जपक्ष - प्रयाजानुमन्त्रण मन्त्राः इत्थम् -( १ ) – ' एको मम, एका तस्य योऽस्मान् ० ' । ( २ ) — ' द्वौ मम, द्वे तस्य - योऽस्मान् ० ' । ( ३ ) – ' त्रयो मम, तिस्रस्तस्य -- योऽस्मान् ० ' । ( ४ ) – ' चत्वारो मम चतस्त्रस्तस्य - योऽस्मान् ० ' । ( ५ ) - ' पञ्च मम, न तस्य किञ्चन - योऽस्मान् ० ' । १७२