Shatpath Brahman 1 2 — पृष्ठ 131–140
शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - १-२ - मोतीलाल शास्त्री · पृष्ठ 131–140
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श्रीः शतपथब्राह्मण - हिन्दी - विज्ञानभाष्यान्तर्गत - प्रथमकाण्डानुगत प्रस्तुत - ' द्वितीय खण्ड ' ( २ ) - में समाविष्ट प्रमुख - याज्ञिक - कम्र्मों की सूची १०- उपवेपसम्पादनम्, अग्नौ कपालोपधानेन हविः परिपाकञ्च पृ ० सं ०६११ से ६६० पर्य्यन्त ११ - पिष्टेनोदकमिश्रितेन पुरोडाशसम्पादनम् ६६१ से ७०३ पर्य्यन्त १२ - पात्रीनिर्णेजनम् - पुरोडाशमीमांसया - समन्वितम् ७०४ से ७६७ पर्य्यन्त १३- वेदिकाकरणम् - वेदिस्वरूपसम्पादनम् - तंत्र -- स्तम्बयजुर्हरणम् - भूविशोधनश्च १४- ४- वेदिपरिग्रहः १५ - द्रव्यसंस्काराः ७६८ से ८४३ पर्य्यन्त ८४४ से ६५८ पर्यन्त ६५६ से १०३६ पर्य्यन्त १६- श्राज्यग्रहणम् १०३७ से १०७६ पर्य्यन्त १७- इध्मानुगतः - कर्म्मसंग्रहः १०७७ से ११३४ पर्य्यन्त १८- सामिधेन्यनुवचनम् १ ९ ३५ से १३१६ पर्य्यन्त १६- पूर्वाधार कम्र्मेतिकर्त्तव्यता १३१७ से १३५६ पर्य्यन्त २०- उत्तराघारकम्र्मेतिकर्त्तव्यता १३५७ से १३६६ पर्य्यन्त २१- प्रवरणकर्मेतिकर्त्तव्यता १३६७ से १४०४ पर्य्यन्त २२ - त्र गादापनं - श्राश्रावणं प्रत्याश्रावणञ्च १४०५ से १४७४ पर्य्यन्त 3 २३- प्रयाजब्राह्मणम् इति - द्वितीयखण्डानुगता - प्रधान कर्म्मविषय सूची हविर्यज्ञानुगता - उपरता १४७५ से १५४२ पर्य्यन्त - * C
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श्रीः अथ - शतपथब्राह्मण - हिन्दी - विज्ञानभाष्ये द्वितीयोऽध्यायः अथ - शतपथब्राह्मण - हिन्दी - विज्ञान भाष्ये - प्रथमकाण्डे द्वितीयाध्याये - प्रथमं ब्राह्मणम् प्रथमप्रपाठके च पञ्चमं ब्राह्मणम् १० – “ उपवेषसम्पादनं, अग्नौ कपालोपधानेन हविः परिपाकञ्च " नामक क्रमप्राप्त १० वें कर्म्म के विज्ञानभाष्य की ' विषयस्मारकसूची ' ( पृष्ठसं - ६१० से ६६० पर्य्यन्त ) १- प्रथम काण्डान्तर्गत द्वितीय - श्रध्यायानुगत-प्रथमनाहारण, तथा प्रथम प्रपाठकानुगत-पञ्चम - ब्राह्मण ( मूल ) ६१३ २- मूलाक्षण का अक्षरार्थसमन्वयात्मक-अनुवाद ( मूलानुवाद ) ६१६ ३ - विज्ञान माष्योपक्रम ६२५ ४ - आध्यात्मिकयज्ञ का संस्मरण ५ - यज्ञकम्मों का अध्यात्मयज्ञ के साथ समतुलन ६ - सनातनशास्त्र के मौलिक, और यौगिक-विवर्त ७ - ब्रह्मात्मक मौलिकभाव, एवं यज्ञात्मक यौगिक - भाव ४
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शतपथब्राह्मण २ खण्ड ८- ब्रह्मात्मक आधारतत्त्व, एवं यज्ञात्मक आधेयतत्त्व ६२५ ६ - वर्तमान भौतिक विज्ञान के सुप्रसिद्ध फिजिक्स, तथा केमेष्ट्री - विभाग, और ब्रह्म, तथा यज्ञ १०- तत्त्वानुगत रामायनिक - संमिश्रण, एवं तद्द्द्वारा अपूर्वभावोदय " ११ - योग, और याग- सम्बन्ध की विभिन्नता दिग्दर्शन १२ - अन्तर्य्यामात्मक - ग्रन्थिबन्धन - सम्बन्ध " १३ - पूर्वस्वरूपानुगत लौकिक - उदाहरण का समन्वय १४ - योग, और यज्ञानुगत पार्थक्य १५ - यज्ञसम्बन्ध के द्वारा ही क्षरमाध्यम से विश्वस्वरूप की अभिव्यक्ति १६ - विश्वानुगता ' द्विनियति ' और ' दुनिया-दुरङ्गी ' लोकसूक्ति का समन्वय " " १७ - याग से उत्पन्न विश्व के सम्बन्ध में एक महत्त्वपूर्ण प्रश्न " " १८ - संस्मरणीया तेजः, और स्नेह -- द्वयी १६ - अङ्गिरा, और भृगु २० – अग्नि, और सोम, २१ - विकास, और संकोच २२ - गति, और स्थिति २३ - विनाश, और सर्ज्जन २४ - यज्ञ, और विश्वजीवन २५ - यज्ञ के द्वारा ही विश्वस्वरूप की अभि-व्यक्ति का तात्त्विक समन्वय २६ - ' यज्ञ ' के मौलिक स्वरूप लक्षण का संस्मरण २७ - प्राणलक्षण - श्राधिदैविक - यज्ञ २८ - प्राणीलक्षण - प्राध्यात्मिक यज्ञ २६ - भूतलक्षण - आधिभौतिक - यज्ञ ३० - मनुष्ययज्ञात्मक वैधयज्ञ " " " 129" ३१ - प्राणलक्षण - आधिदैविक यज्ञ के वैज्ञानिक-स्वरूप का उपक्रम ३२ - ‘ पाङ ्मक्तो वै यज्ञः ’ श्रुति का संस्मरण ३३ - अनुगमति से अनुप्राणित यज्ञ की पञ्चा-वयवलता ३४ - सर्वहुतयज्ञात्मक -मह्मयज्ञ ३५ - महायज्ञ के विश्व पर्वात्मक पाँच अवयव, और यज्ञ की पाङक्तता का समन्वय ३६ - सम्वत्सरयज्ञ के अग्निहोत्रादि पाँच त्रयवों का संस्मरण ३७ - सुप्रसिद्ध - पाकयज्ञ - हविर्यज्ञादि भेद निबन्धना यज्ञ की पाक्तता ३८ - यज्ञमूलक ग्रग्नि का पञ्चचितिकत्व-समन्वय ३६ - अध्यात्मयज्ञ के पाँच अवयवों का दिग्दर्शन ४० - यच्चयावत् - यज्ञों की पाङ ता " " ६२६ II " 7 ६२७ ४१ - सम्वत्सरयज्ञानुगता पाङ ता ४२- सम्वत्सरयज्ञ के स्वरूप निर्माता बृहतीछन्दो-S नुगत - ' क्रान्तिवृत्त ' का स्वरूप - दिग्दर्शन ४३ - ' सम्वत्सर प्रजापति ' का संस्मरण ४४- प्राजापत्या अन्नअन्नाद सम्पत्ति -स्वरूप- समन्वय के सुप्रसिद्ध - पाँच - महिमा-की ' सोमयज्ञरूपता ' का ४८ - प्राकृतिक सम्वत्सरयज्ञ के हविर्यज्ञ - सोम-यज्ञ - नामक दो महिमा - विवर्त्त ६२६ ४५ - यज्ञानुगत - दाह्य, दाहकभाव " ४६ - श्रग्नितत्त्व विवर्त्त 17 ४७- सम्वत्सरयज्ञ " " ४६ - प्रतिष्ठा लक्षण - पार्थिवयज्ञ 29 ५० - वितानयज्ञात्मक सम्वत्सरयज्ञ ५१ - सौर प्राणाग्नि, और ग्राहवनीय " ५ ५२ - पार्थिव पानाग्नि, और गहपत्य ५३- श्रान्तरिक्ष्य - ऋताग्नि, और दक्षिणाग्नि " " " " 1 " " 99 29 " " " " " 21 29 " "
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५४ श्रोषधि - वनस्पति - रूप विद्रव्य ५५ - हविर्यज्ञ की संक्षिप्ततमा रूपरेखा ५६ भूपिडात्मक गाईपस्थ -५७ - त्रिवृत्सोम, और गार्हपत्य ५८ - गार्हपत्य और पृथिवीलोक ५६ - पञ्चदशस्तीम, श्री नक्षत्राग्नि ६० - श्रान्तरिक्ष्य - धिष्ण्याग्नि, और दक्षिणाग्नि ६१ - सोमाहुति और सम्वत्सरयज्ञ ६२ श्रग्नि - सोमात्मक यह से विश्व का सञ्चालन ६३ - लोक- प्रजा - धर्म - भेद- प्रवर्तक सम्वत्सरयज्ञ " " ६४ ६४ - पड़ यज्ञ, और प्रजापति " ६५ यश के द्वारा प्रजापति की इष्टसाधनता, एवं प्राप्तकामता विषयसूची ६२७ ७८ - वैश्वानरो यतते सूर्येण ६२६ 93 ७६ - वैश्वानरयज्ञ की सम्वत्सरात्मकता 91 " " ८०- सम्वत्सरयज्ञ, और गवामयन ८१ - पुरुषपशु का उपादानभूत सम्बत्सर ८२ याधारभूता महावेदि ६२८ ८२ प्राणीलक्षण- पुरुषयज्ञ 19 " " ६६ - प्राणीलक्षण अध्यात्मयज्ञ का स्वरूपोपक्रम " ६७ - शुक्र शोणितानुगता विभिन्न भावमयी आश्चर्यमयी प्रवासृष्टि ६८. श्राध्यात्मिक यज्ञ से अनुप्राणित विभिन्न आश्चयों का संस्मरण 11 ६६ - यज्ञ की विभिन्न विधाओं का नाम समन्वय " ७० - ज्योतिष्टोमापरपययक संस्मरण ७१ यज्ञस्वरूप लक्षणसमन्वय - सम्वत्सरमेश का ७२ - योतिष्टोमात्मक सम्वत्सर यह की सात अवान्तर संस्थाएँ ७२ अन्नादाग्नि के सप्तमद्दिमा - विवस ' ( सप्त-चित्तियाँ ), एवं तन्निबन्धन सप्तविध मोमान ७४ - प्राण अपान- व्यान भेदभिन्न आध्यात्मिक-त्रेताग्नि ७ ' प्राण ' तत्व की स्वरूप लक्षणात्मिका परिभाषा ७६ तीन विश्व और उनके तीन नर ७७ - विश्वनर, और वैश्वानर 31 ६२६ " सम्वत्सरयज्ञ से समतुलन का प्राणलक्षण ८४ - गवामयन - यज्ञानुवन्धी सम्वत्सर यज्ञ के स्वरूप से अनुप्राणित गवामयन स्वरूपो पक्रम ८५ - सम्वत्सरचक्र का केन्द्र, और बृहतीछन्द ८६ - वृहतीछन्द और विश्वद्वृत ८७ - बृहतीछन्दोऽनुगत उभयगोलाद्ध ' ८ - दक्षिणगोल, और उत्तरगोल ८. अष्टाचत्वारिंशत् अंशात्मक मण्डल की सम्वत्सररूपता ६०- प्रदेशमुक्त सोमसमन्वित प्राणाग्नि की सम्वत्सररूपता ६१- पार्थिवाग्नि का त्सरणरूप छद्मगमन, और ' सम्वत्सर ' शब्द का तास्विक स्वरूप निर्वाचन ६२ - सूर्य्यानुगत भूपिण्ड का परिभ्रमण १३- भूपरिभ्रमणानुबंध से ' सम्वत्सर ' शब्द के रहस्यात्मक द्वितीय निर्वचनार्थ का समन्वय ६४ - सम्वत्सराग्नि का भोगात्मक काल ६५ - तस्वात्मक सम्वत्सर के साथ कालात्मक सम्वत्सर का समतुलन प्रयास ६६- सीरम एडलानुगत सम्बत्सरयज्ञ, और तद-नुबन्धिनी मनोतात्रयी ६७ - मनोताप्रसङ्गानुगत अग्नि के विभिन्न महिमा विवस का संस्मरण एवं ' देव-मनोता ' अग्नि का मनोवारब - समय " ६३० " 1 77
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शतपथब्राहाण २ बराड ६३१ " " " " 1 " " " 99 १२५ - सौरतेज, और सुवर्णं १२६ - पवित्रतम सौर तेज १२७ - मेरुदण्डनिर्म्मापक विष्वद्वृत्त २ - पूर्णेन्द्ररूप ईश्वर १२६ - द्धन्द्ररूप जीव ( मानव ) १३० - अद्ध'खगोलानुगत मानवीय पशु भाग ( फँस लियाँ ) 21 १३१ - खगोलीय २४ अंश, और तत्समतुलित २४ पशु विभाग ६३२ " " 21 22 " १३२ - विश्वरूप मेरु का केन्द्रात्मक मनस्तत्त्व ६३२ ६८ - विश्वपदार्थानुगत ज्योति - भूत - श्रात्म-तत्त्वत्रयी, और ज्योतिः, गौः, आयुः, नाम की मनोतात्रयी ६६ - रूप पर स्व - भेदभिन्ना ज्योतिस्त्रयी १०० - ‘ योऽसावादित्ये पुरुषः- सोऽहम् ' १०१ – स्वज्योतिर्म्मय सूर्य्यपिण्ड १०२ - पानीय पिण्डात्मक चन्द्रमा १०३ - सूर्य्यज्योति से प्रकाशित चन्द्रमा १ ९ ०४ - रूपज्योति का अधिष्ठाता त्वष्टाप्राण १०५ - चान्द्रज्योति, और रूपज्योति १०६ - पार्थिवपदार्थ, और परज्योति १०७ - ' पृथिवी ', और रूपज्योति १०८ - ' चन्द्रमा ', और परज्योति १०६ -'सूर्य्य ', और स्वज्योति ११० - सूर्य्यानुगता मनोतात्रयी का नामसंस्मरण 23 १११ -- ज्योतिर्म्मय - मनोता, और ज्योतिर्भाव ११२ - गौर्म्मय - मनोता, और भूतभाग ११३ - आयुर्म्मय मनोता, और आत्मभाग ११४ - ज्योतिष्टोम गोष्टोम - श्रायुष्टोम की स्वरूप-निष्पत्ति का दिग्दर्शन ११५ - सम्वत्सर की त्र्यात्मकता ११६ - सत्तात्रयात्मक सम्वत्सरयज्ञ ११७- शरीररचना वैचित्य का प्रवर्त्तके गवाम-यनसत्त्र ११८ - गवामयननानुगता श्राहुति परम्परा का तारतम्य, और शरीरवैचित्र्य 33 ११६ - गोरूपधरा पृथिवी, तदयन, और गवामयन " 3 १२० - अनस्थिमती- श्राज्याहुति से उत्पन्न अस्थि-मती प्रजा से श्रनुप्राणित अनतिप्रश्ना-त्मक एक प्रश्न " १२१ - हिरण्यशकल, और ग्राज्य १२२ - आज्य, और शुक्र १२३ - हिरण्यशकल, और अस्थिभाव १२४ - पार्थिवरसगर्भ में प्रविष्ट सौरतेज 21 " " " १३३ - मनोधरातल पर प्रतिष्ठित विज्ञानघन " II ६३२ 22 " " सू १३४-३६० - अहोरात्रात्मक गवामयन सत्त्र " १३५ - गवामयनसत्त्रानुगत - प्रायणीय, आरम्भ -णीय, अभिप्लव, पृष्ठय, • हाव्रत, उदय नी, आदि ग्रहणों का नामसंस्मरण 17 १३६ - अहर्गणानुगत अभिप्लव में भुक्त ज्योति-ष्टोमादि षट्स्तोम ६३३ १३७ - प्रति पृष्ठयाह से समन्वित घडविध त्रिवृदादि युग्यस्तोम " १३८ - भिलव, और पृष्ठ्य - भावों का संख्या-त्मक परिगणन १३६- श्रभिजिदहः, और त्रयः स्वर - सामानः १४० - पृष्ठयाभि'लव का परिवर्तन १४१ - गवामयन और विश्वजिदहः १४२ - गवामयन, और दशरात्र पृष्ट्यषडह १४३ - गवामयन, और छन्दोमात्र्यहः १४४ - गवामयन, और महाव्रतमहः १४५ - गवामयन, और उदनीयातिरात्र १४६ - गवामयनसत्त्र से अनुप्राणित सम्वत्सरयज्ञ के प्रायणीयादि ३६० अहर्गणों का तालिकारूपेण संकलन ६३४ 33 " " " " " " " " " " " 23 19 १४७ - क्षुद्रसुपर्णात्मिक जीवात्मा " " १४८ - सम्वत्सरात्मक - महासुपर्ण ७ "
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विषयसूची १४६ - सम्वत्सरसुपर्ण से श्रनुगता आत्मा - पक्ष-पुच्छ समन्विता सप्तचिति १५० - विष्वदुष्टत्तानुगत सम्बत्सरीय श्रात्मभाव १५१ - तत्सम्बन्ध में एक महान् प्रश्न, और छन्दोविज्ञान के माध्यम से तत्समाधान-प्रयास १५२ - विष्वद्वृत्तात्मक बृहतीछन्द १५३ - विष्वदनुगता छन्दः सम्पत्ति, और नवाक्षर बृहतीछन्द 39 १५४ - विष्वत् का दक्षिणपक्ष, और गायत्री -उष्णिक् - श्रनुष्टुपृछन्दस्त्रयी " १५५ - विष्वत् का उत्तरपक्ष, श्रौर पङक्ति-त्रिष्टुप् जगती- छन्दस्त्रयी 22 १५६ - चतुष्पदा गायत्री षडक्षरा १५७ - बृहतीछन्द की सर्वव्यापकता १५८ - बृहतीछन्द की खगोलानुगता सर्वव्याप्ति से अनुपाणिता अक्षरसंख्या - समतुलना-त्मिका तालिका १५६ - सम्वत्सर- प्रतिष्ठात्मक बृहतीछन्द ६३५. " " 1 " " " ६३६ 19 १६० - बृहदुभावापन्न बृहतीछन्द के विभिन्न 31 नैगमिक अर्थों का संस्मरण १६ ९ - आधिदैविक - साम्वत्सरिक - यज्ञपुरुष का मेरुदण्डात्मक बृहतीछन्द " " १६२ - विष्बत्केन्द्रत्वस्थ भगवान् सूर्यनारायण 17 १६३ - विष्वद्वृत्तानुगत भूपिण्ड १६४ - ' क्रान्ति ' शब्दार्थ समन्वय १७० - भूतप्रधान पार्थिव श्रग्नि १७१ - श्रन्नाहुति के द्वारा पार्थिवभूताग्नि से पाञ्चभौतिक वाङमय शरीर का स्वरूप-निर्माण १७२- श्रान्तरिक्ष्य वायु की प्राणानुगति का समन्वय १७३ - दिव्य आदित्य की मनोऽनुगति का समन्वय १७४ - वाङ यी पृथिवी, श्रौर शरीर १७५ - प्राणमय आन्तरिक्ष, और प्राण १७६ - मनोमय द्युलोक, और मन १७७ - मनः प्राणवाङमयी पृथिव्यन्तिरक्ष-द्युलोकानुगता श्रग्नि वायु श्रादित्या-न्विता अध्यात्मसंस्था का स्वरूप-समन्वय १७८ - विष्वद्वृत्तानुगत - सौर, चन्द्र, पार्थिव-सम्वत्सर - स्वरूप का गतार्थत्व १७ ९ - सम्वत्सरत्रिलोकी से श्रनुप्राणित लोक, और लोकी १८० - भूतात्मिका पृथिवी, अपानाग्निरूपदेवता १८१ - भूतात्मक श्रन्तरिक्ष, व्यानाग्निरूपदेवता 11 १८२ - भूतात्मक दिव्यलोक, प्राणाग्निरूपदेवता " १८३ - मूलग्रन्थि, और पार्थिव पान " " ६३७ 33 " " " " " " " " " ६३६ १८४ - हृदयग्रन्थि, श्रौर श्रान्तरिक्ष्य व्यान " " १८५ बह्मन्थि, और दिव्य प्राण 19 II १८६ - प्राणाग्नि, और स्पृत्प्राण १६५ - ' क्रान्ति ' पतन, और कान्तिसम्पात " १८७ - स्मृत्प्राण की महाजनरूपता " " १६६ - विषुवद् - विषुवञ्च तत् १६७ - शरत् सम्पात, और वसन्तसम्पात १६८ - सम्वत्सरानुगत सूर्य - पृथिवी अन्तरिक्ष-नामक लोकत्रयी १६६ - पार्थिवाग्नि- आन्तरिक्ष्यवायु, दिव्यादित्य-त्रयी के भोग से अनुगत सम्वत्सर-प्रजापति " 11 ८ १८८ - स्पृत्प्राण के द्वारा ही पुरुष के पुरुषार्थ की प्रवृत्ति " १८६ - पार्थिव अपानप्राण की हृदयस्थ - विज्ञान रूप-सूर्य की परिक्रमा १६० - पार्थिवाग्नि की वागरूपता १६१ - वाक्तत्त्व का श्रारम्भ, और आरम्भ -णीयेष्टि ६३६ 17
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शतपथबाह्मण २ खण्ड १६२ - भौतिकप्रपञ्च का उपक्रमस्थान १६३ - स्पृत्प्राण का प्रयन और प्रायणीयेष्टि १६४ - भूतानुगत ' आरम्भ ' भाव १६५ - प्राणानुगत- ' प्रयाण ' भाव १६६ - प्राणगत्यात्मक प्रयागभाव १६७ - पानगत्यात्मक प्रारम्भभाव १६८ - प्रायणीय, और आरम्भणीय के अनन्तर -भावी अभिप्लवस्तोम, तथा पृष्ठ्य-स्तोम " १६६ - रुधिरगति, और अभिप्लव २००- रक्तसञ्चारसीमा, एवं पृष्ठय २०१ - हृदय से आरम्भ कर अङ्ग लिपर्य्यन्त विभक्तरूपेण चार शरीरखण्ड २०२- प्रत्येक खण्डानुगता प्रातः - माध्यन्दिन-सायंसवनात्मिका सवनत्रयी " २०३ - पारम्परिक सवनग्रन्थि से अनुप्राणित-बन्धन २०४ - खण्डचतुष्टयी के समन्वय से एक पृष्ठ्य की स्वरूप निष्पत्ति २०५ -गायत्री - त्रिष्टुप् - जगती -- विराट् - पक्ति-नामक पाँच छन्दों की समष्टि से पञ्चा-ङ्गलिका स्वरूप - निर्माण " २-६ - गायत्र्यादि पङ क्त्यन्त छन्दों के अक्षर-परिमाण माध्यम से कनिष्ठिकादि श्रङ्ग-ष्ठान्त पश्चाङ्ग लियों का पारिमाणात्मक समतुलन २०७ - त्रिष्टुप् छन्दोऽनुगत इन्द्रदेवता २०८ - इन्द्रानुगत अमृतप्रधान भूतात्मा " " २०६ - त्रिष्टुप् और अमृतभावामिका अनामिका " " २१० - श्रनामिका के द्वारा दिव्यकम्मों का सम्पादन १११ - अनया वै भेषजं क्रियते " २१२ - विराट्, और तत्प्रसूता मध्यमा २१३ - जगती, और तत्प्रसूता तर्जनी २१४- असुरप्राणप्रधाना कलहप्रवर्तिका तर्जनी ६३८ २१५ - दिव्यकर्म में तर्जनी का संस्पर्श ६३६ " " " " 1 19 २१६ पंक्ति, और तत्प्रसूत श्रङ्ग ुष्ठ २१७ श्रभिप्लव, और पृष्ठय - भेद - निबन्धन शरीर रचना - वैचित्र्य | २१८ - शिरोभागानुगत चार कपाल २१६ - पूर्व कपालद्वयी २००- पश्चिमकपालद्वयी २२१ - अवान्तरकपालखण्ड, और तत्प्रत्यक्षो-पाय- प्रदर्शन २२० - शिरोभागानुगत आठ कपाल २२३ - अष्टकपालानुगत मस्तिष्क, और ' पुरो-डाश ' २२४ - अर्वाश्चिल - ऊर्ध्वबुघ्न - भावात्मक आश्च-म्य आध्यात्मिक - चमस २२५ - पुरोडाश की आहुति से देवप्राणों की जीवन - रक्षा २२६- श्राधिदैविक यज्ञ के सुगुप्त रहस्यों के परिज्ञाता - महर्षि " " ६३६ | २२७ - अधिदैवत, और अध्यात्म - यज्ञ के समतु-जन माध्यम से प्राधिभौतिक- वैध - यज्ञ के ग्रष्टाकपाल - पुरोडाश का वैज्ञानिक-स्वरूप - समन्वय, एवं प्रक्रान्त ब्राह्मण की १-२ कण्डिका - द्वयी का उपराम " २२८ - श्रन्नपरिपाककर्त्ता - ' श्रामात् ' नामक श्रग्नि " , I २२ - शवपरिपाककर्त्ता - ' क्रव्यात् ' नामक अग्नि 99 २३० - हविर्वहनकर्ता ' हव्यवाट ' अग्नि 27 २३१ - एक ही अग्नि के तीन महिमा - विवर्त्त २३२ - छन्दोभेद के द्वारा अग्निमेद " " २३३ - निष्कैवल्य - संग्राह्य - दिव्य भावापन हव्यवाट श्रग्नि २३४ - श्रग्निप्रधान भूपिण्ड २३५- वारुणाग्नि - प्रवर्ग्याग्नि - ब्रह्मौदनाग्निभेदेन पार्थिवाग्नि की अवस्थात्रयी " " " " " II ६४० 19 " "
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' नामक जलीय-२३६ - भूपिण्डनिर्माता - ' श्राप्त्या II अग्नि और वारुणाग्नि २३७ - असुरभावापन्न बारुणाग्नि ३३८ - श्रामाशयानुबन्धी ' आमात् ’ - रूपता विषयसूची २६१- ज्योतिर्म्मय - दिव्यप्राण का अवरोधक -दिति-मण्डलस्थ सहरक्षा नामक - श्रासुर- श्रग्नि २६२- असुरदूत - पार्थित्र- वारुणाग्नि वारुणाग्नि की 21 प्राणाग्नि २३६ - प्रवर्ग्यरूप भूताग्नि का पिएडस्थ-के द्वारा मलरूपेण प्रक्षेप का भक्षक-२४० - भूत - भौतिक - मलात्मक पदार्थों 19 कव्यादग्नि 11 क्रव्यादग्नि २४१ - शवान्नभक्षक - प्रवर्ग्यभक्षक - दिव्याग्नि २४२ - विशुद्ध - प्राणात्मक माङ्गलिक हव्यवाट् २४३- अमृतसोमरसानुबन्धी देवानुगत नामक पार्थिव श्रग्नि 21 २४४ - ब्रह्मौदनाग्निरूप दिव्यप्राणाग्नि - अग्न, तथा २४५ - यज्ञानुगत - संग्राह्य - दिव्य सन्दर्भ - निष्कर्ष 21 , २४६ – ' सहरक्षा ' नामक असुर अग्नि २४७ - शुद्ध अग्नि की दिव्यात्मकता भौम-२४८- असुरदूत - सहरक्षा नामक मलानुगत अग्नि २४६ - भस्मलिप्त श्रङ्गाराग्नि की श्रमुर - रूपता 37 २५० - शुद्ध - अग्नि, और देवयाट ( 1 २५१ - पुरोडाशसङ्गमन कर्त्ता दिव्याग्नि SP २५२ - भूपिण्डेन सह सक्रान्त सावित्रतेज २५३ - सूचीमुख - पृथिव्यनुगत सावित्रतेज सौर- तेज " २५.४ - प्रतिफल न भावान्वित सावित्र २५५ श्रदितिमण्डलगर्भित देवदूताग्नि २५६ - मन्त्रश्रुति के द्वारा तयशोगान से सम-२५७ - ज्योतिर्म्मय - प्राणाग्निमण्डलाकार तुलित तमोमय अग्निमण्डल २५८ - तमोमय अग्निमण्डल की ' दिति ' रूपता २५- भूभामय पार्थिव तमोभाव " ६४१ 31 २६३ - पृथिव्यनुगत अदिति - दिति भाव ' 19 २६४ - यज्ञस्वरूपसम्पादक- ज्योतिर्म्मय दिव्याग्नि २६५. - यज्ञस्वरूपविघातक - तमोमय - भूताग्नि २६६ - भस्मनिराकारण पूर्वक अङ्गारों का विशुद्धी-करण, एवं तद्द्वैज्ञानिक तथ्य का समन्वय २६७- भूपृष्ठ संलग्न श्रृङ्गार की सुरभावानुगति २६८ - वातशून्य प्रदेश की असुररूपता 31 २६६ - अधोभागानुगत अग्नि का ज्वालागहित्य २७८ - वरुणदैवत्यम् " २७१ - सुरप्राणाधिष्ठाता वरुणदेवता २७२ - निवातस्थान, और वरुणदेवता २७२ - अधोभागानुगत भस्मसम्बन्ध के निरा-करण में काठिन्य २७४ - यजुर्मन्त्रविद्युत् से पूत मध्यम कपाल के द्वारा अधोऽवस्थित अङ्गारानुगत असुर का निराकरण २७५ - यजुः की साक्षात् दिव्याग्निरूपता २७६ - ब्रह्म - देव - भुत - पशु - भेदनिबन्धना श्रग्नि-विवत्त ' चतुष्टयी " २७८ - यजुरनुगत- ' सार्वयाजुषाग्नि ' २७७ - वेदाग्निरूप ब्रह्माग्नि २७६- स्वायम्भुव - यजुरग्नि २८०- सौर- देवाग्नि २६०- ग्रहणाविद्य । नुगतमैंहिकेय राहु २८१ - पाकिभूताग्नि २८२ - प्रवर्ग्यरूप- पाशुकाग्नि २८३ - शब्दमय - यजुम्मन्त्र २८४ - श्रर्थमय - यजुर्राग्न | २८५ - शब्दार्थ का अभेदसम्बन्ध २८६ - यजुरग्निमय यजुर्मन्द्र के द्वारा असुरा-सङ्कजनित भय की निवृत्ति ६४१ 27 37 13 " 93 ६४२ " " 27 39 " 39 22 " " 11 "
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शतपथब्राह्मण २ खण्ड २८७ - विश्वपदार्थों की घन - तरल -- विरलरूपा ३११ - ज्ञानशक्तियुक्त ब्रह्मवीर्य्य ६४२ अवस्थात्रयी ६४२ ३१२ - क्रियाशक्तियुत क्षत्रवीर्य्य 23 २८८ - वनावस्थात्मिका निचिड़ावस्था 93 ३१३ - क्रियाशक्तिसम्पन्न कर्म्मठ, तथा ज्ञान-२८६ - मुप्रसिद्धा तरलावस्था 23 २६० - विरलावस्थात्मिका बाष्पावस्था 39 शक्तिसम्पन्न ज्ञाननिष्ठ मानव के लिए ' असम्भव ' शब्द का असम्भवत्त्व ६४३ २६१ - वाष्पावस्थात्मिका धूमावस्था 39 ३१४ - ज्ञान - कर्म्म - शून्य पुरुष का पुरुषाभासत्त्व " " २६२ - उदाहरणमाध्यम से श्रवस्थात्रयी का ३१५ - विडवीर्य्यनुगता अर्थशक्ति स्वरूप- समन्वय 33 ३१६ – पूषाप्राणानुगता पशुशक्ति २६३ - सोमगर्भित अग्नि की वस्तुरूपता 19 " " २६४ - घनाग्निमय पृथिवी - लोक २६५ - तरलाग्निमय - अन्तरिक्षलोक २६६ - विरला ग्निमय - द्य लोक २६७ - घनावस्थापन्न यच्चयावद् पिण्डात्मक-भूतभौतिक पदार्थों की पारिभाषिक-' पृथिवी ' रूपता २६८ - तरलावस्थापन्न यच्चयावत् पदार्थों की पारिभाषिकी वायुरूपता २६६ – विरलावस्थापन्न यच्चयावत् पदार्थों की पारिभाषिकी श्रादित्यरूपता ३०० - तत्तत् पदार्थों की प्राणावस्था का समन्वय ३०१ - घनावस्थानुगता ध्रुवावस्था ३०२ - तर लावस्थानुगता धर्भावस्था ३०३ - विरलावस्थानुगता धरुणावस्था ३०४ - सर्वप्रतिष्ठारूप ' ध्रुव ' तत्त्व ३०५ - ' ध्रुव ', और ' पृथिवी ' की आशिक-पर्य्यायता " ३०६ - दिव्ययज्ञानुगत आसुरप्राणाक्रमण ३०७ - असुराक्रमण निरोध के लिए अपेक्षिता वात्मिका प्रतिष्ठा ३०८ - ' घ्र वमसि ' मन्त्रानुगतं प्रतिष्टाचल के माध्यम से कपालोपधान " " ३०६ - पशु - श्रनुचर- प्रजा - स्त्री - द्रव्य - भूमि - भेद-निबन्धन अन्तर्वहिर्वित्त ३१० - श्रेष्ठतम ब्रह्मवीर्य्य, और क्षत्रवीर्य्य 19 " " " " " " " " " 99 " ११ ३१७ ज्ञान - कर्म्माश्रित - विट् - शूद्र की सार्थकता " ३१८ - ज्ञान - कर्माश्रय से वञ्चित अर्थ - पशु - भाव की प्रात्यन्तिक निरर्थकता ३१६ - सर्वतोऽधिक महतो महीयान् ' भूमा ' तत्त्व ३२० - ज्ञान - कर्मानुगत ऐच्छिक - अनुयायियों की उपलब्धि, एवं भूमाभाव 29 ३२१- भूमाभाव, और ' सजाताः ' ३२२ - ब्रह्म - क्षत्र - वीर्य्यसम्पत्ति की सफलता की प्रेरिका सजातसम्पत्ति, और भूमाभाव " ३२३- ' ब्रह्मवनित्त्वा क्षत्रवनित्त्वा सजातवनित्त्वा ' इत्यादि यजुर्म्मन्त्र का रहस्यार्थ - समन्वयो-पराम ३२४ - द्यावापृथिवी का साक्षात्कार ३२५ - मध्यस्थ - अन्तरिक्ष का प्रत्यक्ष ३२६ - ‘ अद्धा ' भावानुगत त्रैलोक्य ३२७ - चतुर्थ लोक की इन्द्रियातीतता, किन्तु शब्दप्रमाणगम्यता ३२८ - ' अस्ति न ता ' का स्वारस्य ३२६ - ' विश्वाभ्यस्त्वा श्रशाभ्यः ' इत्यादि यजु-मन्त्रार्थ - समन्वय ३३० - विश्व - आशाओं की श्रद्धा रूपता ३३१ - साहित्य के प्रत्येक शब्द से अनु-प्राणित पिनद्ध - सुगुप्त - रहस्यार्थ " " ३३२- ' भृगूणामङ्गिरसां तपसा तप्यध्वम् ' अत्य-नुगत भृगु श्रङ्गिरा - तपो नामक रहस्यमय शब्द " " " " " " " " " " " " " " " " " " "
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३३३ - प्रासङ्गिकरूपेण ' तपः ' शब्द के रहस्या-त्मक निगूढार्थ का संस्मरणोपक्रम ३३४ - जगन्मिथ्यावादाभिनिविष्ट विद्वानों की दृष्टि में ' तप ' शब्द का निष्ठा शून्य--मान्यतात्मक अथ ३३५ - प्रचलित मान्यता का लोकसंग्रह - दृष्ट्या समादर, किन्तु.....? ३३६ - व्यापकार्थ को स्वगर्भ में भुक्त रखने वाले ' तपः ' शब्द का सीमाबन्धनात्मक नौ-चित्य 23 ३३७ - कायक्लेशानुवर्ती - श्रालोमभ्यः -- श्रान खाग्रेभ्यः दुःखार्त्त तपोऽनुरक्त विद्वानों से ‘ तपः ' शब्द के सम्बन्ध में श्रुति-सम्मत कतिपय प्रश्न " ३३८ - महर्षि तित्तिरि के द्वारा ' तपः ' शब्द का श्रव्याप्ति - श्रतिव्याप्ति - दोषरहित श्रषि -रोधी लक्षण का संस्मरण ३३६- ब्रह्मौदनात्मक स्वात्मभाग का दान, और ' तप ' ३४० - श्राधिदैविक - श्राधिभौतिक-- श्राध्यात्मिक-तत्त्वसंग्राहक व्यापार की तपोरूपता 29 ३४१ - श्रात्मसमर्पणात्मक व्यापार की तपोरूपता ३४२ - प्राण चसर्जन के द्वारा रिक्तस्थानानुगति, और तपोभाव ३४३ - रिक्तस्थान का पूरक तपोरूप व्यापार ३४४ - प्राणपातानुगता लोकसम्पत्ति, और तपश्चर्या विषयसूची 13 93 " ३४५ - श्रात्मसमर्पणरूप तप से वञ्चित लाभ की तत्वत: श्रलाभरूपता ३४६ - छल छिद्रादि श्रासुरी - मायाओं के माध्यम से प्राप्त सम्पत् का शान्ति प्रवर्त्तकस्व " ३४७ - प्राणदानात्मक तप के द्वारा ही वस्तु-प्राप्ति का समन्वया 12 " ३४८ - ' बलि ' रूप ' दान ', और ' बलिदान ' तथा तदनुगता प्राप्ति ३४६ - प्रजापति की सहज - सृष्टिकामना ३५० - सृष्टिकामनानुगत आत्मार्पणरूप सहन तप " ३५.१ - तपोऽनुगता प्राणाहुति " " ३५२ - तप की वास्तविक स्वरूप - परिभाषा ३५३ - वाक - श्रोत्र - हस्त - पाद - आदि का व्यापार, और तप का सामान्य स्वरूप ३५४ - भृगु और श्रङ्गिरा का सर्वश्रेष्ठ तप ३५५ - सौम्य भृगु, और ग्राग्नेय श्रङ्गिरा ३५६ - अग्निचयन के द्वारा शरीर निम्न ३५.७ - शारीरिक तप, और अङ्गिरा ३५८ - मानसिक तप और भृगु ३५६ - भृग्वङ्गिरा के पार्थक्य से अनुप्राणित तप ३६० – समन्वयात्मक - मृग्वङ्गिरोमय तप की पूर्णता " } ३६१ - तेजिष्ठतप की स्वरूप- परिभाषा ३६२ - मनोयोगपूर्वक शरीरद्वारा क्रियमाण तप की श्रव्यर्था तपोरूपता ३६३ - ' भृगूणामङ्गिरसां तपसा तप्यध्वम् ' का संस्मरण तपः- स्वरूप दिग्दर्शनम् ( पृ ० सं ० ६४५ से ६५८ पर्यन्त ) ३६४ - वर्त्तमानयुग के प्रत्यक्षप्रभाव से समाक-बिता भावुक प्रजा, और उसकी लोकघो-षणा से अनुगत त्याग - तपस्या - बलिदान-आदि शब्द ६४५ ३६५– काल्पनिक - भावुकतापूर्ण त्याग - तपस्या-बलिदानादि - शब्दनिबन्धन महान् व्या-मोहन ३६६ - व्यामोहन परित्राणोपाय - चिन्तनोकम ३६७ - पाणिनीय धानुपाठ से अनुप्राणित ' तप ' धातु के सन्ताप - ऐश्वर्य्य, तथा दाह - रूप त्रिविध समन्वय प्रकार I II " 2 "