Shatpath Brahman 1 2 — पृष्ठ 141–150
शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - १-२ - मोतीलाल शास्त्री · पृष्ठ 141–150
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शतपथब्राह्मण २ खण्ड ३६८ - एक तप, और विभिन्न तीन ग्रंथों के सम्बन्ध में समस्यात्मक महान् प्रश्न ३६६- पुरुषभावानुत्रन्धेन तीन अर्थों की स्वीकृति " ३७० - प्रकृतिभावानुबन्धेन तीन अर्थों का निषेध " " ३७१ - ' एकं वा इदं वि बभूव सर्वम् ' मूलक-' एतद्वैतत् ' रूप - पुरुषात्मानुगत -तवाद ३७२ - ब्रह्म के महिमामय विवत्त की अभिन्ना-थकता ३७३- ' सर्वे सर्वार्थवाचका: ' का संस्मरण ३७४ - प्रकृत्यनुबन्धी सर्वथा विभिन्न सन्तापार्थक-' तपः ' शब्द ३७५ - ऐश्वर्य्यार्थक - ' तपः ' शब्द ३७६ – दाहार्थक - ' तपः ' शब्द ३७७ - तपः शब्द के चिरन्तन शब्दार्थेतिहास -का उपक्रम ३७८ - तपः शब्देतिहासानुबन्ध से प्रकृति के सर्वथा विभिन्न तीन संस्थानों का स्वरू-पान्वेषण प्रयास ३७६ - विश्वेश्वर - पुरुषात्मप्रजापति का महिमा -मय प्राकृत- विश्व ३८० - गुणभर्ती के पञ्चीकरण से समन्वित पञ्च-पर्वा विश्व ३८१ - पञ्चपर्वा -- पाङक्त - पञ्चात्मक - विश्व का संस्मरण ३८२ - श्वेताश्वर महर्षि के द्वारा पञ्चपर्वा प्राकृत विश्व का स्वरूप- समन्वय ६४५ 13 " 1 ,, " 9 " " " " " ३८३ - परोरजात्मक ऋषिप्राण ६४६ ३८४ - रजः प्रवर्त्तक - पितृप्राण " " ३८५ - रजोभावात्मक देवप्राण ३८६ - रजस्तमोऽनुगत पशुप्राण " " " " ३८७ - तमः प्रधान भतप्राण ३८८ - ऋषिप्राणमूर्ति स्वयम्भु ३८ - पितृप्राणमूत्तिं परमेष्टी " " " " ३६० – देवप्राणमूर्ति सूर्य्य ३६१-१शुप्राणमूर्ति चन्द्रमा ३६२ - भूतप्राणमयी- पृथिवी ३६३ – पञ्चभावात्मिका --- पञ्चप्राणोम्मिलक्षणा-विश्वोपादानभूता दर - प्रकृति के पञ्चधा-विभक्त महिमामय विवर्त्त ३६४ - ' विश्व ' की संक्षिप्ततमा रूपरेखा ३६५ – तपस्त्रयी के मौलिक स्वरूप का अन्वेष-णात्मक प्रयासोपक्रम ३६ रे - ब्रह्माक्षरानुगता ऋषिप्राणमयी प्रकृति 33 ३६७ - विष्वक्षरानुगता पितृप्राणमयी प्रकृति ३६८- इन्द्राक्षराक्षरानुगता देवप्राणमयी प्रकृति " " ३६६ - सोमाक्षरानुगता पशुप्राणमयी प्रकृति " ४०० - अग्न्यक्षरानुगता भूतप्राणमयी प्रकृति ४०१ - परोरजामूर्त्तिः स्वयम्भूः ४०२ - रजोऽधिष्ठाता परमेष्ठी " " ४०३ - रजोऽभिगतः - सूर्य्यः " " ४०४ — रजोमूर्त्तिः - चन्द्रमाः ४०५ - मूच्छितरजोमूर्त्तिः - भूपिण्डः ४०६ - ' प्रहितां संयोगः ' एवं ' प्रयुतां संयोगः ' रूप आदान- विसर्ग व्यापार के पारिभा-षिक स्वरूप का संस्मरण ४०७ - त्रिश्वपर्वों को प्राणमात्राओं, तथा भूत-मात्रानों का पारम्परिक श्रादान - विसर्ग ४०८ - प्राण, तथा भूत - निबन्धन प्रदान विसर्ग के तारतम्य से ही विश्वपदार्थों के स्व-रूप में विभिन्नता का उदय ४०६ - प्राकृत - पदार्थों की स्वरूपस्थिति से अनु-प्राणित श्रदान- विसर्गात्मक चङक्रमण, तथा षड्भावविकारों का समन्वय ४१० - विश्वपदार्थो का समष्टि व्यष्टि - रूपेण विस्र ंसनात्मक - त्यागतपस्यारूप उत्सर्ग, एवं तन्निबन्धन ' स्व ' भाग का दान ६४६ " " 19 " " " " " " ६४७ 39 " " १३
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४११ - समष्टि व्यष्टि रूपेण त्यागधर्म्मानुगत यच्च-यावत् पदार्थों की ' तपोधर्मा तपस्वी - ' अभिधा का समन्वय ४१२- आदान - सापेक्षा विसर्गात्मिका तपश्चर्या से ही विश्व के तपस्वियों की स्वरूप-स्थिति ४१३ एवं ददाति रूप विसर्ग उत्सर्ग - त्याग एव निबन्धन नित्यसापेक्ष श्रदान - मण-संग्रह भाव ४१४- पारस्परिक अपेक्षानुबन्धी प्रकृतिसिद्ध ' अन्नान्नादसम्बन्ध ' ४१५- अन्नानुगत ' भोग ' तत्व का पारिभाषिक-समन्वय ४१६- नसीम और भौग्य ४१७ अन्नाद- अग्नि और भोला , ४१८ - सर्वमिदमन्त्रम् सर्वमिदमन्नादः ४१६- श्रता चैव, श्रायञ्च ४२० - ' श्रहमस्मि प्रथमजा ' का संस्मरणा ४२१ ' अम् अश्रदन्तमपि शरिभा धिक - समन्वय ४२२ प्रत्येक प्राकृत पदार्थ की अन्नरूपता, तथा श्रन्नादता का समन्वय ४२३ विसर्गानुबन्धी रिस अग्नि ४२४- श्रादानानुबन्धी भार्गव सोम ४३५ - संकोचधर्म्मा भार्गव सोम, श्रौर स्नेहतत्त्व ४२६ – विकासधर्म्मा आङ्गिरस अग्नि, श्रीर तेज-स्तत्व विषयसूची ४३२ - श्रादानगर्भित विसर्ग की तपोरूपता का समन्वय ६४७ रूपता का समन्वय ६४८ ६४७ " 3 " 21 31 " } ६४८ ४२७- नेहगुणक भार्गव मोम तथा तेजोमुखक आङ्गिरस अग्नि की पारस्परिकी सापेक्षता " ४२८ - त्याग की संग्रहमूलकता ४२६ - संग्रह की त्यागमल कता ४२० स्थान - को उद्देश्य बनाने वाले संग्रह की डी संग्राहकता ४३१ - यागशून्य संग्रह के द्वारा उत्तरोत्तर जड़ता की प्रवृत्ति 37 ४३३ - भृगुगर्भित श्राङ्गिरस तत्त्व की ही तपो-४३४- भगवान् वाक्य के वैज्ञानिक - तो-लक्षण का संस्मरण ४३५ - तपः शब्द की लोकानुबन्धिनी स्वरूप-स्थिति के किचिदिव निदर्शन का उपराम ४३६ तपः शब्द के सत्तासिद्ध वैज्ञानिक स्वरूप का उपक्रम ४३७ - पञ्चपर्वा प्राकृति विश्व के गर्भ में प्रविष्ट ' श्रात्मप्रतिष्ठात्मक ' पोडशी प्रजापति का संस्मरण ४३८- पोडशी प्रजापति की विश्वचर विश्वात्मा-विश्वेश्वर - नाम की श्रमिधाओं का समन्वय ४३६ - पञ्चपर्वात्मक- विश्व की समष्टि से अनु-प्राणित- एक विश्वेश्वर ४४० - व्यष्टयात्मक पञ्चधा विभक्त विश्वावयवों के विभिन्न पाँच उपेश्वर ४४१ - पञ्चधा, और त्रीणि त्रीणि का रहस्यात्मक पारिभाषिक स्वरूप समन्वय ४४२ - तदेव शुक्रं --तद्ब्रह्म - तदेवामृतमुच्यते-मूलक- त्रीणि ज्योतींषि सचठे स षोडशी ' रूप मन्त्रमाग ४४३ - पञ्चकलाव्ययरूप प्रापति, और ' अमृतम् ' " " ६४८ 33 ४४४- पञ्चकलाच ररूप प्रजापति, और ' ब्रह्म ' ६४ ९. ४४५ - पञ्चकल - श्रात्मक्षररूप प्रजापति और ' शुकम् ' ४४६ - श्रमृताव्ययानुगता मनोधना- ज्ञानज्योति ४४७ - ब्रह्माक्षरानुगता प्राणघना कर्म्मज्योति ४४- शुकरानुगता वाग्वना भूतज्योति ४४ ९- त्रिज्योतियों से कृतरूप विश्वात्मा के पाँच तथा तीन विवतों का संस्मरण " *
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शतपथब्राह्मण २ खण्ड ४५० - विश्वात्मा के पाँच, अर्थात् तीन ही प्रमुख पर्व ४५१ - विश्वानुबन्धिनी पञ्च- त्रिपर्व - भावानुगता महती समस्या का निराकरण प्रयास 11 ४५२ - भारतीय सांस्कृतिक जगत् से अनुप्राणित-त्रिमूर्ति, और ब्रह्मा - विष्णु - महेश " } ४५३ - सर्वस्वात्मक पुराणशास्त्र, और तन्निबन्धन सांस्कृतिक - आयोजन " ४५४ - स्मृतिशास्त्र, और तन्निबन्धन सांस्कृतिक आचार ४५५ - श्रुतिशास्त्र, और तन्निबन्धना भारतीया-मूल संस्कृति ४५६ - श्रात्मपर्वानुगत - सांस्कृतिकपर्व,, ४५७ - बुद्धिपर्वानुगत- सांस्कृतिक उत्सव " ४५८ - मन: पर्वानुगत - सांस्कृतिक - सम्मेलन ४५६ - शरीरपर्वानुगत - सांस्कृतिक - समारोह " ४६० - त्रिमूर्ति - भावानुबन्धी पौराणिक - त्रिदेवता-वाद एवं श्रुतिशास्त्रानुत्रन्धी पञ्च-देवतावाद ४६१ - प्रासङ्गिकी विरोधभावना का उत्पात, एवं तन्निराकरण ४६२ - वैदिक पञ्चदेवतावाद के साथ पौराणिक त्रिदेवतावाद का निर्विरोध सहसमन्वय ४६३ - अवलोकनात्मक - ' आलोक '. और ज्योतिर्भाव ६४६ " 1 13 " " " ४६४- अवलोकन के माध्यम नेत्र, एवं ज्योति-स्तत्त्व की नेत्रसंज्ञा का समन्वय ४६५ - सत्य ऋत - नेत्र ( सत्य ऋत - ज्योति से समन्त्रित सत्यस्य - सत्य - मूर्ति - सत्यात्मक-स्वायम्भुव - ब्रह्मा ४६६ - पारमेष्ठ्य विष्णु की द्विनेत्रता का पारि -भाषिक - स्वरूप - दिग्दर्शन ४६७ – सूर्य्य - चन्द्र - पार्थिवाग्निमूर्ति, त्रिज्योतिर्मय भगवान् महेश्वर की ' त्रिनेत्र ' अभिधा का स्वरूप - दिग्दर्शन 22 " " " ६५० १५ ४६८- मनोमय- अमृताव्ययात्मक- ज्ञानज्योतिर्भाव से अनुग्रहीत स्वायम्भुव - ब्रह्मा, एवं इनकी - ' चित्पति ' ( ज्ञान - पति ) अभिधा का समन्वय ४६६ - प्राणमय -ब्रह्माक्षरात्मक- कम्ज्योतिर्भाव अनुग्रहीत पारमेष्ठ्य विष्णु, एवं इनकी ' कर्म्मपति ' ( प्राणपति ) अभिधा का समन्वय ४७० - वाढ मय शुक्रक्षरात्मक भूतज्योतिर्भाव से नुगृहीत त्रिमूर्ति भूतपति महेश्वर, एवं इनकी ' भूतपति ' ( पशुपति - वाक्पति ) अभिधा का स्वरूप समन्य ४७१ - पुराणशास्त्र के रहस्यपूर्ण त्रिवता का स्वरूप - समन्वय ४७२ - सूर्य्य, और स्वज्योतिर्भाव ४७३ - चन्द्रमा, और परज्योतिर्भाव ४७४- पृथिवी, और रूपज्योतिर्भाव ४७५ - पञ्चपर्वात्मक विश्व का तीन प्रमुख पर्वों पर विश्राम, एवं परिलेख के द्वारा तत्-स्वरूप समन्वय ४७६ - त्रिमूर्ति के आधार पर प्रतिष्ठित ' तपः ' शब्द के प्रतिज्ञात सन्ताप - ऐश्वर्य्य- दाह-रूप त्रिविध महिमा विवर्त्तो का समन्वय-प्रयास ४७७ - परोरजामूर्ति - चित्पति- स्वायम्भुव - ब्रह्मा, और उसका ज्ञानमय तप ४७८ - ज्ञानमय तप की ' सन्तापरूपता ' ४७६ - ' सन्ताप ' शब्द का लोकप्रचलित-शोकसन्तापात्मक अर्थ ४८० - तत्त्वदृष्टया शोक से एकान्ततः संस्पृष्ट ' सन्ताप ' शब्द ४८१ - क्रियाप्रधान तप से अभिन्न प्राणात्मक तप के आधारभूत ज्ञान शक्तिप्रधान स्वायम्भुव तप की परिभाषिकी सन्ताप-रूपता का दिग्दर्शन ६५० " " " " " " " " " " " ६५१ "
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४८२ - ' श्रान्तस्य तप्तस्य सन्तप्तस्य ' इत्यादि श्रति से अनुप्राणित ' सन्ताप ' रूप ज्ञानीय - तप ४८३ श्रुति के प्रभूल सारिक अर्थ का समन्वय 23 ४८ - रूप से अनुगत ' ताप ' ४८ कीमावालक ' सम् ' उपसर्ग से समन्वित ताप की ' सन्ताप ' रूप में परिगति ४८६ - अव्ययात्मक चिदात्मा की ' सम् ' भावा-पन्ना ' समब्रह्मता ' ४८७ - आत्मसाम्यसूचक ' सम् ' शब्द एवं तदनुप्राणित संस्कृति संस्कृत संस्कार-श्रादि पारिभाषिक शब्दों का संस्मरण ४८८ - समब्रह्माभिन्न स्वायम्भुव तप की ' सम् ' भावान्विता ' सन्तापरूपता का समन्वय " " ४८६ - ' ऋषिप्राण ', और सन्तापात्मक तप की मौलिक उपनिषत् ४६ ० – सद्घन अतएव ' असत् ' नाम से प्रसिद्ध विश्वमूलभूत ऋषिप्राण, और सन्तापा-त्मक तप ४६१ ( क ) - ऋक् साम रूप - वयोनाघात्मक छन्द से छन्दित स्वायम्भुव स्वायम्भुव - - ब्रह्म ब्रह्म- - निःश्वसित वेदात्मक यजुः प्राण का स्वरूप- समन्वय " ४१ ( ख ) -ह्मा का ज्ञानीय - तप और ऋषिप सेमिना ४६१ ( ग ) स्वायम्भुव परमाकाशात्मक महिमाकाश ४६२ - परमे व्योमन्रूप महिमाकाश में परि-व्याप्तऋषिप्रधान ज्ञानीय तप की अभिव्याप्ति और तद्रूप तपोलोक का संम्मरण ४६३ - सत्य ऋत - सूत्रानुगत सर्वत्र व्याप्त सन्ता-पार्थक तपः शब्द के संक्षिप्त चिरन्तर-इतिवृत्त का उपराम विषयसूची ६५१ ६५२ ४६४ लोकाधिष्ठाता पोडशीप्रजापति का पञ्च भौतिक सप्तवितस्ति काय, और उस की सात वितस्तियों ४६५ - गायत्र प्राण समतुलित चतुरशीति श्रङ्ग -लिमित मानय एवं तत्परिमाणयुक्त ही ईश्वर ४१६ - सुप्रसिद्ध पञ्चभाविक विश्वयवों से श्रनुगत भूलोक भुवर्लोक - स्वर्लोक - मह-लॉक - अनलोक - तपोलोक - सत्यलोक - नामक सात लोक, और सतलोक व्याहृतियाँ ४६७ - षष्ठ तपोलोक, और तदभिन्न ब्राह्मतप ४६८ सर्वप्रतिष्ठारूप - ज्ञानीयतपोरूप ब्राझतप से वञ्चित अन्यान्य यच्चयावत् तपोभावों की व्यर्थता ६५२ ६५२ ४६६ - क्रमप्राप्त ऐश्वर्य्यार्थक द्वितीय ' तपः ' शब्द का माङ्गलिक संस्मरण ५०० - सन्तापात्मक स्वायम्भुव ऋषितप की कर्तृस्वशक्ति के सम्बन्ध में प्रश्न 21 ५०१ - सन्तापात्मक पतप से सर्वप्रथम समु भूत अप्तस्व ५०२ - प्राणात्मिका ऋतधर्म्मानुगता श्रापः ५०३ - स्वायम्भुव तप का द्रवण, और आपः ५०४ - वेदवेदात्मक सुवेद ५०५ सुवेदात्मक अथर्ववेद 33 ६५३ " ५०६ - स्वयम्भु झा के ललाटप्रदेश पर स्वेदी-स्पति और सत्सम्बन्ध में गोपयति का संस्मरण ५०७ सोऽपोऽसृजत याच एव लोकात् का पारिभाषिक समन्वय ५०८ - ( क ) - श्रापः - वाः वारि आदि शब्दों का निर्वचनात्मक समन्वय ५०८ - ( ख ) - आपोमय द्वितीय विश्वविवर्त्त की ' परमेशी ' अभिधा का संस्मरण 27
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शतपथब्राहाण २ खण्ड ५०६ श्राप्तिधर्म्मा - मैथुनी सृष्टि प्रवत्त ' के पितर-प्राण, और तन्मूलभूत ऋषिप्राण ५१० - ' ऋषिभ्यः पितरो जाता: ' इत्यादि मनु-वचन का संस्मरण ५११ - विश्व समृद्धि के महान् प्रभव ऐश्वर्य्य-मूर्तिपोमय परमेष्ठी ५१२ - ऐश्वर्य्यभाव- निबन्धना ' सम्पत्ति ' की स्वरूप पारिभाषा ५१३ - लोकसम्पत्ति के सम्बन्ध में प्रश्न ५१४ - लोकेश्वर्य की स्वरूप - दिशा से परिचिति का उपक्रम ५१५ - शब्द सम्पत्ति, एवं तद्वाच्या अर्थसम्पत्ति " " ५१६- उभय सम्पत्तिसमन्वयात्मक - पद ( शब्द ) अर्थ ( वस्तु ) रूप - ' पदार्थ ' ६५३ ५१७ - ' पदार्थ ' के द्वारा शब्दार्थसम्पत्ति का संग्रह " " ५१८ - प्रकृतिसिद्ध ईश्वरीय पदार्थों का नाम-संस्मरण " " ५१ ९ - समष्टि व्यष्टि - रूपेण शब्दार्थ- सम्पत्ति की श्रभिव्याप्ति 29 " 1 ५२० - शब्दात्मिका सम्पत्ति की अधिष्ठातृ देवता ' श्रीः ' " " ५२१ - अर्थात्मिका सम्पत्ति की अधिष्ठातृ-देवता - ' लक्ष्मी: ' ५२३- आपोमय पारमेष्ठ्य मण्डल, और श्रीः, ५३१ - लक्ष्मी, और लोकलक्ष्मी ५३२ - श्रीविहीना लक्ष्मी के द्वारा जड़ता की अभिव्यक्ति ५३३ - ऐश्वर्य्यरूपिणी सम्पत्ति के स्वरूप - दिग्-दर्शन का उपराम ५३४ - पारमेष्ठथमण्डलानुगता शब्दधारात्मिका सरस्वती - धारा, और तदभिन्ना श्रङ्गि-राधारा ५३५ - अर्थधारात्मका आम्भृणीधारा श्रीर तदभिन्ना भृगुधारा ५३६ - तेजोभाव, और अङ्गिरा | ५३७ - श्रङ्गिरा, और सरस्वती ५३८ - संकोच भाव, और भृगु ५३६ - भृगु और अम्भृणी ५४०- उभयसम्पत्तियों का गोपथ ति के द्वारा संस्मरण ५४१- भार्गव सोम - श्राङ्गिरस अग्नि ५४२ - उभयतन के सम्मिश्रण से अभिव्यक्त-' यज्ञतत्त्व ' ५४३- भार्गवाङ्गिरस - तपोरूप यज्ञ, एवं उसका क्रियाशक्तिप्रधान ब्रह्माक्षरात्मा से अवि-नाभाव " ५४४ – ' यज्ञ ', ६५४ " " 33 और ' कर्म्म ' शब्द की प्रभिन्नार्थं -कता का समन्वय ५४५ - ' श्रेष्ठतमाय कर्म्मणे ', और ' यज्ञो वै श्रेष्ठतमं कर्म्म ' ५४६ - भृग्वङ्गिरोमूर्ति श्रापोमय परमेष्ठी की ६५४ 77 " " 19 19 " " ६५५ " 12 39 तथा लक्ष्मी: ५२४ - शब्दैश्वर्य्य, और श्री: ५२५ - श्रर्थैश्यं, और लक्ष्मी: ५२६ - सरस्वती रूपिणी ' श्रीः ' 33 33 ५२७ - आम्भृणीरूपिणी ' लक्ष्मीः ' " " ५४७ - विष्णु के द्वारा ही भार्गवाङ्गिरस यज्ञ की ५२८ - ऐश्वर्य्यं का वास्तविकस्वरूप, और श्री-रूपिणी सरस्वती 23 प्रवृत्ति ५४८ - ' यज्ञो वै विष्णुः ' और ' विष्णुर्वै यज्ञः ' का समन्वय ५४६- श्री, और लक्ष्मी नाम की विष्णुपत्नियाँ ५२६- सारस्वत क्षेत्र, और ऐश्वर्य्य ५३० - मौलिक - तात्त्विक ऐश्वर्य्य, एवं भूतसम्प-तिरूपिणी लक्ष्मीः " ५५० - श्रङ्गिरसतत्त्व, और ' श्री: ' 39 39 १७
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५५१- भार्गवतत्त्व, और ' लक्ष्मी: ' ५५२ - लोकैर्य्यसंसाधक यज्ञात्मक कर्म्म ५५३- पारमेष्ठ्य भार्गवारिस तप और तद्-द्वारा लोकवैभव - प्राप्ति ५५४ - बिष्ठ - तप की स्वरूप - परिभाषा भू एवं चन्द्र- गर्मित सौर मण्डल रूप ५५६ - दाहक गुण से समन्वित माहेश्वर की स्वरूप परिभाषा ५५७ - अग्निरूप रुद्र की दाहकता ५५८ - रुद्रात्मक सौर तप ५५६. - दाहार्थक तृतीय तप का स्वरूपेतिवृत्त ५६० – सन्तापार्थक तप, और ब्राह्मतप ५६१ - तपोलोकानुगत ब्राह्म तप ५६२ - ऐश्वर्य्यार्थक तप, वैष्णवप ६५५ 23 " " 13 ५७ तप: कालादजायत ' इत्यादि अथर्वधति का पारिभाषिक समन्वय ५८० - अध्यात्मसंस्था का विश्व ५८१ - आध्यात्मिक विश्व के कारण सूक्ष्म स्थूल-विवर्त्त ५८२ - कारणशरीर और विज्ञान बुद्धि ५८३- सूक्ष्मशरीर और शानमन ५८४ - स्थूलशरीर और भौतिकशरीर ५८५- ब्राह्म - कारणशरीर ५८६ - वैष्णव - सूक्ष्मशरीर ५८. रौद्र - स्थूलशरीर -५८६ पञ्चवितिक भौतिकशरीर ५६२ शान्तरुद्रिय और शतरुद्रिणन्न ६५६ 99 93 " " 33 11 19 " 11 " ४६२ - ऐश्वर्या और प ५६० - बुद्धितन्त्र, और सन्तापार्थक ब्राह्मतप " ५६३- भार्गवाङ्गिरस तप, और ऐश्वर्य " ५६१ - मनस्तन्त्र, और ऐश्वर्य्यार्थ वैष्णवतप " " 11 ५६४ दाहार्थक तप और रौद्रप ५६५ - अग्निप्रधान तप ५६६ विश्व के तीन प्रमुख संस्थान ५६७ त्रिसंस्थानों के प्रमुख अधिपति ब्रह्मा-विष्णु - महेश ५६८ - श्रात्मब्रह्म के अमृत ब्रह्म - शुक्र -- नामक तीन प्रमुख महिमा - विवर्त?? ५६६- महिमानिव श्री से सम्बद्धा देवताश्रयी ५६० - श्रात्मशक्तित्रयी, और देवतात्रयी ५७१ - ज्ञानात्मक तप, और ब्राह्मतप ५७२ कम्मरमक तप और वैष्यतप ५७३ अर्थात्मक तप और रौद्रतप ७४ - मन्त्र तपोभाव ५६२ - शरीरतन्त्र, और दाहार्थक रौद्रतप ६५६ ५६३ - प्राकृतिक श्राध्यात्मिक विश्व " " " " 99 93 की दृष्टि में विभक्त तीन ५७५ - अथर्वमन्त्रों के माध्यम से तपस्त्रयी के तीन विभिन्न विवर्त्ती का स्वरूप समन्वय ५७६ समाहितम् और तपोभाव ५७७ - समभवत् और तपोभाव ५७८ - श्रजायत और तपोभाव " ५६.४ - श्राध्यात्मिक विश्व में प्रतिष्ठित त्रिविध-प्राणाग्निविवस ' ५६.५ - अग्निजनित संघर्ष, जनसंघर्ष और तद्द्वारा बुत्पत्ति ५६६ - ब्रह्माग्निजनित ब्राह्मतप से उत्पन्न श्रप:, और स्वेदतत्त्व ५६७ - शीर्षस्थानीय स्वायम्भुव ललाट - प्रदेश, और ब्राह्मप ५६८ विष्वग्निजनित वैष्णवतार से उत्पन्न आपः, और श्रद्धातस्व ५६६ आपोमयी श्रद्धा और अम्म -६०० यतोयात्मिका भगवती माद्रवी ( मागीरथी ), और वैष्णव- श्रम्भः ६०१ रुद्राग्निनिद्रतप से समुत्पन्न आपः और मरीचितत्त्व 19 " ६५७ " ६०२ - मरीचि, और यामुनेय ( यमुनाजल ) "
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शतपथब्राह्मण २ खण्ड ६०३ शीतप्रकृतिक गाङ्ग ेय - पारमेष्ठय श्रम्भो-रूप सलिल ६०४ - श्रग्निप्रकृतिक यामुनेय - सौर- मरीचिरू.प--श्रापः ६०५ - बौद्धिक ब्राह्मतप ६०६ - मानसिक वैष्णावतप ६०७ - शारीरिक - रौद्रतप ६०८ - तप से उत्पन्न श्राप:, और ' श्रश्र तत्त्व ' ६०६ - ' श्र संक्षरितमासीत् ' ६१० - बौद्धिक तप से उत्पन्न श्रश्र और परि-श्रमाश्र ६११- ललाटानुगत स्वेटकना, और परिश्रमाभु 37 ६१२ - मानसिक तप से उत्पन्न - श्रश्र और ' श्रमाश्र ६१३ - प्रेमाश्र का पारिभाषिक समन्वय ६१४ - शोकाश्र का स्वरूप परिचय ६१५ - उभयाश्र श्रों की स्थिति का बिश्घया ६१६- शारीरिक तप से उत्पन्न अन्न, सेवा स्वरूप ६५७ ६२४ - भारतराष्ट्र की ऐश्वय्य - विहीनता का नम्न चित्रण ६२५ - गैद्रतप की मूल प्रतिष्ठा - ऐश्वय्य संसाधक भार्गवारिस वैष्णवतप ६२६ - सर्वप्रतिष्ठारूप - ज्ञानाग्निमय- स्वायम्भुव-ब्राह्मतष, और ब्रह्मवर्चस्वी - ' ब्राह्मण ' " ६२७ - ‘ श्रा ब्रह्मन् ब्राह्मणो ब्रह्मवर्चमी जायताम् ' माङ्गलिक - संस्मरण ६२८- परिलेख - माध्यम से त्रिविध तपः - स्वरूप का समन्वय प्रयास ६५,७ " ६५८ " " इति- तपः ' स्वरूप - दिग्दर्शनम् 37 और 23 ६१७ - से वात्मिका श्रापः, और स्वेदधारा ६१८ - तपः शब्द की त्रिधा व्याप्ति के चिरन्तनेति-वृत्त का उपराम ६१६ - सांस्कृतिक- भारतीय मानव की दृष्टि से ' तपः ' का तात्त्विक स्वरूप ६२० - वर्त्तमान युगानुबन्धी काल्पनिक श्रममात्रा-नुबन्धी तपोभावों की प्रात्यन्तिक निर थकता ६२१- परिश्रमवचित केवल श्रम से श्रनुगत भाव, और शोकसन्ताष ६२२ - श्रीविहीना लक्ष्मी, और विशुद्ध श्रमरूप दाहार्थक -- तप ६२३ - ऐश्वर्य्य - विरोधी- शोकप्रवर्त्तक श्राज की श्रमात्मिका दाहार्थसमन्विता तपः परम्परा १६ ६२६ - ब्रह्मात्मिका ईश सत्ता से समाक्रान्त पदार्थ ६५६ ६३० - ' नित्यं विज्ञानमानन्दं ब्रह्म ' रूप ब्रह्मतत्त्व " ६३१ - प्र चेतनदृष्टि का मूलो - छेद, और ब्रह्म की सर्वव्यापकता ६३२ - व्यवहारदृष्टि -- मूलक चेतन, और अचेतन रूप - भेदव्यवहार ६३३ - परमार्थदृष्टि, और चेतनव्यवहार की व्यापकता ६३४ - ज्ञान - क्रिया- श्रर्थ- त्रयी की सर्वव्यापकता, एवं तदनुबन्धी व्यापक चिदात्मा 93 ६३५ - ' चेतनत्व ' की सर्वव्याप्ति 23 ६३६ - नित्यसिद्ध चैतन्यबाद, और दृपत्, तथा उपल का चेतनस्व - समन्वय ६३७ - दृषत् और उपल का संज्ञात्मक - चेतनत्त्व--सम्बन्ध ६३८ - पाषाणमय दृषदुपल युग्म, और प्रबभावा-नुगता पृथिवी 6 ६३६- कृष्णमृगचर्म्म, और पृथिवी की त्वचा " ६४० - ' श्रदित्यास्त्वक- वेत्तु ' का समन्वय ६४१ - प्राकप्रवणावेदि, और यज्ञ - सम्पत्ति ६४२ - द्यलोकरूपा स्कम्भनी 37 " " " " " " 33
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६४३ - दिवस्कम्भनीरसि ' का समन्वय ६४४ द्यावापृथिवी रूपा घट्टिका ( चक्की ), श्रीर और पेपणव्यापार ६४५ – वायुः सञ्चार, और पेणकर्म्म ६४६ - वेध यज्ञ की पुरुषरूपता ६४७ - दुपलद्वयी, और यज्ञपुरुष के हन् ६०८- शम्या, और यज्ञपुरुष की जिह्वा ६४६ - ' जिह्वया हि वदति ' का समन्वय ६५० - हिंसाकर्म, और यज्ञे ति कर्त्तव्यता ६५१ - प्राणवियोगात्मक हिंसाकर्म्म की तात्विकी स्वरूप परिभाषा ६५.२ - प्राणतत्त्व की समष्टि यष्टिरूपा व्यापकता ६५.३ – पृथिवी - अन्तरिक्ष - द्य रसत्रयी से समुत्पन्न पदार्थ विषयसूची ६५८ ६५४ - पदार्थों की स्वरूपप्रतिष्ठा का पारिना-घिक समन्वय ६६० " 23 ६५६ 11 ६६० ६५५ - पार्थिवप्राण, और पानतत्त्व ६५६- श्रान्तरिक्ष्यप्राण, और व्यानतत्त्व ६५. - दिव्यप्राण, और प्राणतत्त्व ६५८- अपान, और समान | ६५६ - प्राण, और उदान ६६० - स्थिरभावापन्न व्यानप्राण ६६१ - व्यान का पारिभाषिक स्वरूप, और औपनिषदवचन ६६२ - ' प्राणाय स्वा ' इत्यादि मन्त्र से अनु-प्राणित पञ्च प्राणात्मिका स्थिति का तात्त्विक स्वरूप- समन्वय एवं प्रक्रान्त ब्राह्मणोपराम इति - प्रथमकाण्डे द्वितीयाध्याये प्रथमं ब्राह्मणम् इति- प्रथमप्रपाठके – पञ्चमं ब्राह्मणम् इति - - उपवेषम्पादनं, अग्नौ कपालोपधानेन हविः परिपाकंच : १० " " 2 " 11 23 13 २०
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श्रीः अथ - शतपथब्राह्मण - हिन्दी - विज्ञान भाष्ये - प्रथमकाण्डे द्वितीयाध्याये - द्वितीयं ब्राह्मणम् प्रथमप्रपाठके च षष्ठं ब्राह्मणम् ११– “ पिष्टेनोदकमिश्रितेन - पुरोडाशसम्पादनम् ” नामक क्रमप्राप्त ११ वें कर्म्म के विज्ञानभाष्य की ' विषयस्मारकसूची ' ( पृष्टसं ० ६६१ से ७०३ पर्य्यन्त ) १ - प्रथमकाण्डान्तर्गत - द्वितीयाध्यायानुगत १० -- ' देवस्य त्वा सवितु: ' मूला सत्यान्विता द्वितीय ब्राह्मण, तथा प्रथमप्रपाठकानुगत-देबभावना, और संवापकर्म्म, षष्ठ - ब्राह्मण ( मूल ) ६६१ ११ - सजातीय, और ' बन्धुभाव ' ६६६ ६७० २- मूलब्राह्मण का अक्षरार्थसमन्वयात्मक-अनुवाद ६६३ १२ - सगोत्र, और सजातीय " " ३-- विज्ञानभाष्योपक्रम ६६६ १३- शुक्रस्थ चान्द्रसोम " ४ - आहुतिप्रदानार्थ पुरोडाश का सम्पादन " १४- रेतः - श्रद्धा - यश: रूप त्रिविध चान्द्रतत्त्व ५ -- हविद्रव्य का पेषण 33 १५ - गोत्र सूत्र प्रवर्त्तक- चान्द्र - श्रद्धानसूत्र 17 ६ - पिष्टद्रव्य में श्राज्यनिर्वाप " १६- शोचप्रतिष्ठात्मक श्रद्धानसूत्र 27 ७- प्राहुतियोग्य पुरोडाश " ८ - याज्याकर्माधिष्ठाता श्रध्वर्यु के द्वारा ' संवापक ' का सम्पादन - सत्यसंहितदेवता से विभिन्नधर्मा श्रनृत-संहित - मानव १७- श्रद्धाबन्धनानुगत ' बन्धुभाव ' " १८- ' बन्धु ' - श्रौर - ' सम्बन्धी ' " " " 1 १६ -- ' देवस्य त्वा ' इत्यादि मन्त्रार्थसमन्वय 97 " २०- विप्रकृष्टार्थसूचक- ' मौ ' शब्द २१
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२१- ( क ) ' समाप श्रोषधीमिः ' मन्त्रद्वारा पिय में उपसर्जनी ( एतनामक अप् ) का समावेश २१- महानुगत कम्मभेद से अनुपाणित विभिन्न जल २२- प्रोक्षणी आप २३- मदयन्ती श्रापः २४ सवन्ती श्राप २५ उपसर्जनी आप २६ - रसात्मक अपत्य वा समावेश एवं धोका ऊर्ध्व प्ररोहण २७ - यव के धान ( जौ की धानी ), और अप का सङ्गमन २८ - अग्नि की अन्तर्यामसम्बन्ध से प्रतिष्ठा का कारण सलिलतत्त्व २१ अग्नि की अनुरूपता ३० - अङ्गिरा और अपतस्व ३१ मृगु और अपतत्व विषयसूची ६७० " 39 और आचमन ४३ - भौतिक जगत् के आधार पर वस्तुस्थिति का स्वरूप समन्वय ४४- सौर तेज, और भूगर्भस्थ अग्नि के स्वरूप की आधारभूमि अपतत्त्व ४५ – चलत्रान् की अचूरूपता का समन्वय " " ४६ - पुरोडाशानुगत - श्रपणकर्म्म ४७ - श्रपणकर्मानुगत अग्नि की स्वरूप-प्रतिष्ठा के लिए अपेक्षित ' उपसर्शनी ' आप का संगमन ४८ - ' उपसर्जनी ' कर्मानुगत यजुर्ष्मन्त्र- तात्प-यर्थ - समन्वय ४१ - पतवानुबन्धी रस - रेवती - मधुमती शब्दों का संस्मरण ५० वस्तु की स्वरूपस्थिति के लिए अनिवा रूपेण अपेक्षित रस, और शुक नाम की तस्यद्वयी 37 ६७१ 19 ३२ - ' आपो भृग्वङ्गिरोरूपम् ' ३३ - श्रङ्गिरा की प्रतिष्ठा मृगुतत्त्व " ५१ ( क ) - तरलावस्थात्मक रक्तस्व 19 ५१ ( ख ) - घनावस्थात्मक - शुक्रतत्त्व ३४ - भृगु की प्रतिष्ठा श्रङ्गिरातत्त्व ३५ श्रग्नि की प्रतिष्ठा के लिए अनिवारूपेण केदित ' अपूतत्त्व ' ३६ - उदाहरण के द्वारा वस्तुस्थितिका समन्वय ३७ -- अप के द्वारा जाठराग्नि की स्वरूपरक्षा ३८ - भूपिण्डस्थ पानी का अङ्गिरा के द्वारा अन्तरिक्ष में ( ऊर्ध्वं ) प्ररोहण ३६ ) अन्तिरगत पानी की वायुधरातल पर प्रतिष्ठा ३६- ( श्रीष्म, धीर बलमात्रा का अ प्ररोदन ४०- प्रीष्म और प्रखरतमा सौररश्मियाँ ४१ - इन्द्रियो जक अपूपर्श ४२- प्राणाग्नि का अप के द्वारा प्रज्वलन, ६७१ ५२ सोमप्रधान रतस्य ५३ - अग्निप्रधान शुकतत्त्व ५४ योपाप्राणात्मक रसतय ५५ नृपाप्राणात्मक - शुक्रव ५६ – योषावृषात्मक - रस- शुक्र का मिथुन भाव, और मैथुनष्टि ५७ प्रतिवस्तु अनुगत श्रात्मभाव, और पिण्डभाव ५८ - पिएड सञ्चालक श्रात्मभाव ५६ श्रात्मायतन रूप पिण्डभाव ६० - रसानुबन्धी श्रात्मभाव ६१ - शुक्रानुबन्धी- पिएडभाव ६२ - रतव और अनस्थातस्य ६२ शुकतत्त्व मतस्व, और अस्थिमा अस्थिमान्तत्त्व नुसत्य २२ 31 II 21 " " 27 ६७२ 93 37 39 " " 17