Shatpath Brahman 1 2 — पृष्ठ 171–180

शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - १-२ - मोतीलाल शास्त्री · पृष्ठ 171–180

पृष्ठ 171

शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - १-२ - मोतीलाल शास्त्री, पृष्ठ 171 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

शपथब्राह्मण २ खण्ड ५४५ - मानवसमाज की रक्षा, और तत्सम्मता आजकी प्रचण्डा हिंसा ५४६ - यज्ञियपशुहिंसानुगत आक्षेप की प्रात्यन्तिकी निरर्थकता " ५४७ - माँस, और अप्राकृतिक भोजनाभिनिवेश ५४८ - उदरपूर्तिसंसाधिका औषधि वनस्पतियाँ ५४६- मात्र, और माँस की मात्रा ५५० - शरीरानुगत असृक् माँसादि धातुओं के लिए अपेक्षित सृक - माँसादि ५५१- श्रोषधि - वनस्पतियों में भुक्तक मांसादि-मात्राएँ ५५२ - मुवर्ण ताम्र - रजत- लोहादि धातुद्रव्यों का मानवीय अन्नत्व ५५३ - माँसान की प्राकृतिकता का समर्थन ५५४ - पशुशरीर, और रक्तमय विन्दमान पिण्ड की माँसात्मिका भ्रान्ति का निराकरण ५५५ - विशेषप्राणात्मक मसितत्त्व ७४३ ५७२- मांसाशन का प्राकृतिकत्त्व ५७३ - ' न मांसमश्नीयात् ' ५७४ - ' पञ्च पञ्च नखा भक्ष्याः ' ५७५ - तैत्तिरीयवचन का संस्मरण ७४५ " " " " " ५७६ - विधिवचनानुगति से अनर्थ का उद्भव ५७७ - विशेषविधि का अनुगमन 29 " ७४४ " " " 3 " ५७७ - प्रकृतिसिद्धा मांसाशनप्रवृत्ति का निरोध, किन्तु यज्ञकर्म्मणि पशुप्राशन का विधान " " ५७ - ' न मांसमश्नीयात् ' का संस्मरण " ५७६ – कलिवर्ज्य -- पशुप्राशसनादि 23 ५८० - ' कलिवर्ज्य ' का रहस्य " ५८१ - जनमेजयात्-- जनमेजयान्तम् - यज्ञ की प्रक्रान्ति ५८२ - पञ्चपश्चात्मक चितियज्ञ, और पश्वा-लम्भन के सम्बन्ध में भगवान् याज्ञ--वल्क्य ५८३ - यज्ञविद्या की विलुप्ति ५८४ - वर्त्तमानयुगानुगता उपासना " 99 " 99 ५८५ - वर्त्तमान युग, और यज्ञकर्म का उपहास,, ५५६ - ' पुरीष ', और ' माँस ' ५५७ - मत्स्य, और पुरीषप्राण ५५८ - माँस, मत्स्य - भेद का कारण " ५८६ - यज्ञकर्म के प्रति महती विडम्बना " ५५- मांस - मच्छी - व्यवहार 22 ५६० - पुरीषात्मक माँसप्राण, और माष ( उर्द ) " 1 ५८७ - युगमाहात्म्यवित् ऋषि ७४६ ५६१- मांसभक्षण की प्राकृतिकता ५८८ - कलियुग, और पशुवपावञ्चित स्मात्तं यज्ञ " ५६२ - मांसाशी का मांस निषिद्ध 21 ५६३ - एतदु पर मन्नाद्यं, यन्मांसम् 21 ५६४- अन्नमु पशोर्मा सम् ५६५ - माँसाशन की व्यावहारिकता ५६६ - माँसाशन करने वाले प्रान्त, और माँस की परमन्नाद्यता का समन्वय ५६७- ' प्रवृत्तिरेषा भूतानाम् ' और माँसाशन ५६८ - पशुमांसभक्षण के निरोधस्थल ५६६ - पुरीषात्मक मसाँसे बुद्धि का व्याघात ५७० - माँस पारित्याग की श्रेयम्करता ५७१ - मांसग्रहण का अनौचित्य 33 " " " 22 ५८६ - श्रौत वितानयज्ञ में अनिवार्य्यरूपेण अपेक्षिता पशुपा और पश्वालम्भन ५६० - यज्ञिय पशुवध, और हिंसादोष ५६१ - सम्पूर्ण कम्मों का दोष - संस्पृष्टत्त्व ५६२ - धूमेनाग्निरिवावृताः ५६३ - धर्माधर्म्म, हिंसा - अहिंसा आदि का अतीन्द्रियत्त्व ५६५ - श्रीशङ्करभगवत्पाद, और सूत्रभाष्य 23 ५६४- पुराणपुरुषवचनसंस्मरण " ७४५ ५६६ - यज्ञानुगत पश्वालम्भन II 19 39 " " " 29 ७४७

पृष्ठ 172

शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - १-२ - मोतीलाल शास्त्री, पृष्ठ 172 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

विपयसूची ५६७- पश्वालम्भनसम्बन्धी प्राकृतिक नित्ययज्ञ संस्मरण, और का विज्ञानोपराम पश्वालम्भन ७४७ रासायनिक सम्मिश्रण से अनुगता विशेष-प्रक्रिया, और यज्ञ ५६६ - प्रकृति - पुरुष समन्वयात्मक प्रथम यज्ञ ६०० तत्तु समन्वयात् ६०१ - समन्वयात्मक यज्ञेश् वरप्रजापति ६०२- अग्निप्रधान पोडशकल पुरुषप्रजापति ६०३ - सोमप्रधाना पञ्चकलोपेता प्रकृति ६०४ - प्रजोत्पत्ति और समन्वितरूप ६०५ - योषा वृषात्मक - दाम्पत्य, और प्रजासर्ग " 3 ६०६ - रयिप्राणात्मक - मिथुन भाव, और दाम्पत्य 13 ६०७ विश्वसृष्टि का अधिष्ठाता पाप " ६०८ - द्यावापृथिव्य पाङ ह्लयज्ञ का संस्मरण ६०१ पृथिवी का अतिष्ठावा देवता ६१० - द्युलोक का प्रतिष्ठावा देवता ६११ - श्रतिष्ठावात्मक अधिष्ठाता प्रजापति ६१२ - उभय लोक के प्रजापति ६१३ रोदसी विश्व के खष्टा प्रजापति ६१४ -- यज्ञ के द्वारा प्रजापति का विस्तंसन ६१५ त्मक विवस्त भाग से पदार्थों का स्वरूप - निर्माण ६१६ सिनप्रक्रिया का नैरन्तर्य ६१७ - विसनमूलक पारस्परिक बनिनिसर्ग ६१८ श्रादान विसर्गाभाव ६१६- नित्यवहनिरूपिक क्षुति ६२० - विसस्त भाग की श्राग्नरूपता ६२१- विसरत के पूरक भाग नी सोमरूपता ६२२ श्रग्नौ सोमाहुति:, और यज्ञ ६२२ - बहुत सोम की ऊर्फ रूप में परिणति ६२४ अर्क की श्रमि ६२५ उर्फ तामिव्यक्ति " ६२६- प्राणत: अनाकर्षण ६२७ प्राणी का श्रन्योऽन्यपरिग्रह, और यशस्वरूपसंसिद्धि ६२८ - याला की वागुरूपता ६२१ - बाकू के द्वारा प्राथ का पोषना ६३०- प्राण के द्वारा मन का पोषण ६३१-- भुक्तान्न की प्राणाग्नि में आहुति ६३२ गति पर अन्न की चिति ६३३ - रस - मल के कमिक शिकल से बाबू-चिति के द्वारा मन का पोषण ६३४ चिति और मन ६३५ सोर्माचति, और ' चित्त ' ६३६ ' अन्नमयं हि सोम्य मनः ' ६३७ और वित्त का वितिक्रम ६३८ वाचश्चितस्योत्तरोत्तरको यः ' ६३६ पदार्थों का अग्नि - सोम - मयत्व -४० परस्यरूपसंसिद्धि के द्वारभूत अग्नि, और सोम " 91 31 " ७.८ 27 33 ६४१ त सोम की विविध जातियों ६४२- सोममेदेन श्रग्नियश के विभिन्न प्रकार ६४३ - व्रीहियवादि रूप ओषधिसोम और हविर्यज्ञ ६४४ - श्रग्निहोत्र ---- दर्शपूर्ण मास - चातुर्मास्य-इष्टियों का हविर्यज्ञत्त्व ६४. पशुवया सोमात्मक पशुबन्धयज्ञ ६४६ - पशुक्रा, और पश्वालम्भन ६४७- राजासोम, धीर राजसूयप ६४८ वाजसोम, और वाजपेयश ६४६ -- पञ्चपशु, और ग्रहसोमात्मक चयन यज्ञ ६५० -- चयनयज्ञ का सर्वोत्कृष्टत्त्व ६५१.नामृतत्वस्य तु श्राशास्ति श्रुते चयनात् ६५२ - द्यावापृथिव्य पञ्चविधपशु ७४८ " 27 29 19 " 29 39 ::: " ७४६ " II ४४

पृष्ठ 173

शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - १-२ - मोतीलाल शास्त्री, पृष्ठ 173 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

शतपथब्राह्मण २ खण्ड ६५३ - द्यावापृथिव्य रसों से पशुओं के स्वरूप-की अभिव्यक्ति ६५४ - सर्वश्रेष्ठ, एवं सर्वप्रधान पुरुषपशु * [ १ ] -पुरुपपशुः * ७४८ 13 ६५५ - श्रग्नि, वायु, इन्द्र, रूपा प्राणाग्नित्रयी ७४६ ६५६ - प्राणाग्नित्रयी, और वैश्वानर " 1 ६५७ - वैश्वानरतत्त्व, और पुरुष पशु II ६५८-- ' पुरि शेते तस्मात् पुरुषः ' ६५६ -- वैश्वानरपुरुष के त्रैलोक्य - व्यापक स्वरूप के सम्बन्ध में श्रौत - सन्दर्भ ६६० - वैश्वानरपशु का अग्निप्रधानत्व, अतएव वृषामूर्त्तित्त्व " 1 ६६१ - वैश्वानरात्मक - प्राणपुरुष से समन्वित प्राणी मानवपुरुष 39 ६६२ - प्राकृतिक पुरुषपशु की प्रतिकृति, और पुरुषपशु ( मानव ) ६६३ - विराट् की सन्निहित प्रतिकृति मानव नामक ६६४- अग्निमय पुरुष, और अर्थशक्ति ६६५ - ( क ) वायुमय पुरुष, और क्रियाशक्ति " " " 1 ६७१ -- वैश्वानर- तैजस - प्राज्ञमूर्ति पुरुष - पशु ६७२ - पुरुषपशुसमर्थक श्रौतवचन ७५० इति- पुरुषपशुस्वरूपदिग्ददर्शनम् 9 [ २ ] श्रश्नपशुः ६७३ – श्रापोमय सौर तेज, और प्रश्वपशु ६७४ - भूपिण्डानुगत सौर सावित्रतेज ६७५ श्रर्णवसमुद्र में संश्लिष्ट प्रतिफलित सौर तेज और अश्वपशु " ६७६ -- श्रप्तत्त्वाभिमानी वरुणदेवता ६७७ -- अश्व का वारुणपशुत्व ६७८ – वारुणत्त्वे सति अश्व का सौर्य्यपशुत्व ६७६- शुद्धवारुणपशु और महिष ६८० - इन्द्र, और वरुण का परस्पर विरोध ६८१- अश्वमाहिष्य - न्याय ६८२ - ग्रान्तरिक्ष्यअपूतत्त्वरूप श्रश्वात्मा "? ६८३ - प्रतिष्ठया वञ्चित श्वपशु " " ६६५ ( ख ) श्रादित्यमय पुरुष, और ज्ञानशक्ति ६८४ - श्रश्वपशु का विकम्पन " 3 ६६५ - ( ग ) पुरुषो वै प्रजापतेर्नेदिष्ठम् ७५० " " " " " " 1 " " 99 " 19 11 ६६५ ( घ ) पुरुषसुक्तानुगत पुरुषपशु ६६५– ( ङ ) त्रिवृत्स्थानीय अग्नि, और प्रथमा साहसी ६६५ -- ( च ) पञ्चदशस्थानीय वायु और द्वितीय साइली 33 ६६५ - ( छ ) एकविंशस्थानीय श्रादित्य, श्रीर तृतीया सा " ६६६ - अग्नेयी साहस्री, और वैश्वानरपुरुष ६६७ - वायव्या साहस्री, और हिरण्यगर्भपुरुष ६६८ -- आदित्या साहस्री, और सर्वज्ञपुरुष ६६६ - दशकल विराट्पुरुष ६७० - ईश्वरप्रजापतिरूप विराट् पुरुष ७५० 1 19 " II " " ६८५. सूर्यरश्मिमण्डल, और केन्द्र ६८६ केन्द्रविन्दुरूप अक्ष ( धुरा ) ६८७ - पार्थिव अक्ष का दिग्दर्शन ६८८- पार्थिव श्रक्ष, और भूपिण्ड का स्वाक्षप-रिभ्रण ६८६ -- स्वाक्षपरिभ्रमणमूला दैनन्दिनगति ६६० - सूर्य्यबिम्वस्थ- माठर -कपिलादि का परि-वर्त्तन, और सूर्य का अक्षपरिभ्रमण ६६१ – सौरक्षत्ररुद्र का एकाकी भाव ६६२ - सौर - अनन्त - विट्रुद्र ६६३ – क्षत्ररुद्र, और विटूरुद्र - सम्पत्ति, एवं यजुःश्रुति ६६४ – सूर्य्याक्ष के विस्रं ंसन से उत्पन्न अप्तत्त्व " " ६६५ — सौर अप्तत्त्व का मरीचित्त्व ४५ " " " " " " " " "

पृष्ठ 174

शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - १-२ - मोतीलाल शास्त्री, पृष्ठ 174 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

विषयसूची ६६६ - रुद्राग्नि के प्रभु रूप मरीचिपानी ६६७ - सौर तेजोगर्भित अ भाग से अश्वपशु I ७५० ७२१ - प्रापोमय - परमेष्टी, और गोपशु ७५२ ७२२ -- विकासस्थानात्मक सूर्य की स्वरूप निपचि " ७२३ - ठोमलोकात्मक परमेष्ठी " ६६८ - वैषां हेड ईमहे " ७२४ - विष्णु, श्रौर सोम ६६६ - सौर तेज की रुद्रनिबन्धना प्रखरता 33 ७२५ - प्रजापति के प्राणभाग से गोतत्त्व की प्रसूति ७५३ 99 " " 99 ७५१ ७०० - सौर श्वपशु का वीर्य्यवत्तमत्त्व ७०१ - श्रगूगर्भित रौद्र, और विद्युत् ७०२ - पोमयी विद्य त् ७०३- यदेतदा विद्योतते विद्युत् ७०४ - विद्युत, और इन्द्र ७०५- सौरी इन्द्रविद्य त् का प्रतिमान श्रश्वपशु ७०६ - श्रापोमय अश्व पशु की भूपिएड से सूय्य-पय्यन्त व्याप्ति ७०७ - उषाकाल, और अश्वोपक्रमविन्दु ७०८ - कृपाकपायी, और उपहार भिन्दु ७०६ - उषारूप अश्व का मस्तकस्थान ७१० - श्रश्वपरिज्ञानात्मक वेदज्ञान ७११ - वाजिरूप सूर्य्य का घनत्र ७१२ - प्राणात्मक पशु से निष्पन्न - प्राणी अश्व ' पशु ७१३ - अश्वपशुसमर्थक श्रोतवचन 11 29 26 ७२६ - गोतत्त्वात्मभूत सौम्य पाण ७२७ - गोतत्त्वशरीरभूत अग्नि ७२८ - श्रमृत की नाभि आग्नेयी गौ ७२६ - सहस्रधा विभक्त गौतत्त्व ७३० - वासवी रौद्री - आदित्या गौ ७३१ - कामगवीरूपा कामधेनु गौ ७३२ - त्रिधा विभक्त गोतत्त्व " 19 " " " " 27 71 ७३३ - कामगधी की सर्वव्याप्ति ७२४ - सत्यानुगता कामगवी ,, ७३५ - शुभ ब्रूयात् आदेश " " ७३६ - मुक समय, और कामगवी का उपभोग ७३७ तथा हैव स्यात् ७३८ - लोका लोकपय्यन्त व्याप्त गोतत्त्व ७३६ - विष्णुदेवताओं की गांरों, और उनके लम्बलम्बायमान सींग ७४० – गावो भूरिशृङ्ग । अयास: इति - अश्वपशुस्वरूपदिग्दर्शनम् ७४१ – सद्रमाता, वसुकन्या, श्रादित्य भगिनी गोका २ -- * --* [ ३ ] -गोपशुः ७१४ - गोतत्त्व का प्रभवस्थान आपोमय परमेष्ठी ७५१ ७१५ - विकासस्थान सूर्य्य ७१६ - व्याप्तिस्थान त्रैलोक्य ७१७- भूतप्रतिष्टात्मक गौतत्व ७१८ - सोममयी गौ, और सोमलोक ७१६ - सोमवंशी पारमेष्ठ्य विष्णु ७२० - गौपशु का तृतीयव " पारिभाषिकसमन्वय ७४२ - ' स्वसादित्यानाम् ' का रहस्यात्मक समन्वय ', ७४३- ' मातारुद्राणाम् ' का समन्वय 27 ७४४ - दुहिता वसूनाम् ' का समन्वय ७५४ ७४५ — गौतत्त्व के द्वारा वेदतत्त्व की अभिव्यक्ति का रहस्यात्मक दिग्दर्शन ७४६ - गोप्राण, और गोपशु की अभिन्नता ७४७ - गोसेवा से वेदतत्त्व - परिज्ञान ७४८८ - सत्यकाम की गोसेवा, और तद्द्वारा ब्रह्म-दर्शन ७४६ - गोधन की उपेक्षा, और भारतधैभव को ७५२ सुपुति ४६ 66 " " " 17 37 " 7 32 " " 19 19 " "

पृष्ठ 175

शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - १-२ - मोतीलाल शास्त्री, पृष्ठ 175 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

शतपथब्राह्मण २ खण्ड ७५० - प्राणगौ, और प्राणीगौ की अभिन्नता का सूचक ऋङ मन्त्र ७५१ - सोमरस, और गोमाता के स्तन ७५२ - तत्र गव्यं तु जीवनीयं रसायनम् ७५३ - गोपशुसमर्थक- श्रौतबचन ७७३ - जवि का सहचरण २७५४७७४ - विपशु के समर्थक श्रोत बचन इति -- गौपशुस्वरूपनिदर्शनम् * ( ४ ) - विपशुः ७५४ – श्रान्तरिक्ष्य - ऋतप्रधान अप्तत्त्व, और पशु ( ड़ ) ७५५ – वृष्टि का मूलप्रभव दिक्सोम ७५६ - पञ्चाग्निविद्या का नामसंस्मरण, और सौम्या वृष्टि ७५७ ऋत - सत्यात्मक उभयविध सोम ७५८ - चन्द्रमा और सौर प्रकाश ७५६- इत्था चन्द्रमसो गृहे ७६० - दिक् - परिस्र त - सोम, और पर्जन्य ७६१ - पर्जन्य, और वृष्टि ७६२ - तस्या- प्राहुतेर्वर्षं सम्भवति ७६३ – दिग्व्यापक ऋतात्मक दिक्सोम ७६४ - निरायतन - दिक्सोम का तत्त्व ७६५ - दिक्सोम, और श्रोत्रेन्द्रिय ७६६ - दिक्सोमात्मक - अविः - प्राण ७६७- हरितवर्णाभिव्यञ्जक- श्रविः - प्राण ७६८ - हरियाली, और अवि: - प्राण ७६६- तस्या रूपेणेमे वृक्षा हरिता हरितस्रजन ७७० - उपांशुग्रहानुगत जपशु ७५५ ७५५ " " " " " 19 " ७५६ " " " " " " 1 " ७५६ 27 इति - यविपशुस्वरूपदिग्दर्शनम् ४ ( ५ ) -जपशुः ७७५ – पार्थिव - ग्रजपशु ७७६ - अग्निप्रधान अजपशु ७७७ – पार्थिवाक्षि का विस्रंसन ७७७ - उच्छिष्ठ पार्थिवाक्ष भाग के द्वारा जपशु की अभिव्यक्ति ७७८ - प्राणात्मक अजपशु, और प्राणी - विध जपशु ७७- पार्थिवी - ओषधि - वनस्पतियों से समतुलित-पार्थिव - पशु 19 ७८० - क्षीण - श्रोषधि वनस्पति रूप अन्न ७८१ - पशु की क्षीणान्नता ७८२ – अधिकरूपेण व्यवहार्य पशु ७८३ - जपशु का अजधम्म ७८४ - नित्यब्रह्म से अनुगत विकृत कारण का महामहिमत्त्व ७८५ – ' न कर्म्मणा वर्द्धते, नोकनीयान् ७८६ – सम्वत्सरप्रजापति से अनुगत त्रिश्वानुगत प्रसवक ७८७ - प्रजापति के वाग्भाव से अजपशु की स्वरूपाभिव्यक्ति ७८८ - वात्मिका पृथिवी और कपाल " ७८६ - कपालभुक्त आग्नेयरस ७७१ - अन्तर्य्यामग्रहानुगत विशु " " ७७२ - उपांश्बन्तर्य्याम का सहचरण " } देवसृष्ट ७६० - ब्रह्मौदनात्मिका आग्नेयी रसत्रयी, और ७५७ " " " " " " " " 9 " " 3 " " " " " 23

पृष्ठ 176

शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - १-२ - मोतीलाल शास्त्री, पृष्ठ 176 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

७६१ - भूकपाल में संश्लिष्ट प्रवर्ग्य रूप वाङ-मय अग्निरस, और तद्द्वारा श्रम की स्वरूपाभिव्यक्ति विषयसूची ८१७ - प्रजापति का शैथिल्य ८१८ क्षतिपूर्त्यर्थ प्रजापति के द्वारा पञ्चपशुओं का आलम्मन ७५७ 19 ८१ ९ - पश्वालम्भनमूलक भैषज्ययज्ञ इति - अजपशुस्वरूपदिग्दर्शनम् ७२- अजपशुसमर्थक - श्रौतवचन ५ ७५८ ८२० - पारिस्परिक आलम्भन ८२१ - अग्नि मूर्ति सम्वत्सरप्रजापति ८२२ - प्रजापति के अमृत मर्त्य - रूप ८२३- भूताग्नि की भूतरूपता ७५६ " " 7 13 19 " 79 ८२४ - प्राणाग्नि का देवत्त्व ७६३ - पञ्चपशुओं में इतर यच्चयावत् पशुचों का अन्तर्भाव ७६४ - सर्व पशु - रूप पञ्चपशु ७६५ - एतावन्तो वै सर्वे पशव: ७६६- प्राणपशु, और प्राणीपशु ७६७ – द्यावापृथिव्य पञ्चपशु ७६८- स्तौम्यत्रिलोकी की देवतात्रयी ७६६ - त्रैलोक्यानुगता सन्धिद्वयी ८०० - सम्वत्सराग्निमूला पाँच चितियाँ ८०१ - पञ्च चितिक अग्नि का विस्रसंन ८०२ - पार्थिवी - उषारूप योनि ८०३ - सम्वत्सराग्निरूप रेतस् ८०४ - अग्निरेतस से कुमारोत्पत्ति ८०५ - कुमाराग्नि का स्वरूप- निर्वचन ८०६ - कुमाराग्नि के अष्टविध महिमामय निवर्त्त ' ८०७ - श्रष्टमूर्ति शिव का संस्मरण ८०८ - नवमसंख्यानुगत कुमाराग्नि ७५८ " " " 23 " 77 " 77 " ,, " " ८२५ - पञ्चपशुओं का भूत - प्राणमयत्व ८२६ - ऋतुरूपा भूतचिति ८२७ मजा अस्थि - स्नाव- मेद मांस- रूपा मर्त्या चितियाँ ८२८- पञ्च प्राणचितियाँ ८२६ - भूत, और प्राण - चितियों का पार्थक्य ८३०-- प्राणवित्र सन, और पशुमरण ८३१ - भौतिक - शेषभूत शवभाग ८३२ - भूतभाग का चयन ८३३ - पश्वालम्भन के द्वारा देवदेवताओं की जीवनसा ८३४- प्राकृतिक- पश्वालम्भन का रहस्यात्मक समन्वय ८३५ - पिता - पुत्र आदि शब्दों का सापेक्षत्त्व ८३६ - प्रजापति शब्द का प्रजासापेक्षत्व ८३७ श्रात्मा - प्राण- पशु - समष्टिः- प्रजापतिः ८३८ - भोक्ता - भोन्यसाधन - भोग्य - समष्टि और प्रजापति " " " 19 39 11 " ७६० 39 ८०६ कुमाराग्नि की रुद्ररूपता ८१० रुद्र का पशुपतित्त्व ८११ - कुमाराग्नि, और चित्राग्नि ८२ - सम्वत्सराग्नि का अन्तिम उदर्क पाशुकाग्नि 32 ८१३ - पशुकाग्नि मे स्वस्वरूपावलोकन ८४१ - भोग्यदृष्टि का अवलम्ब पशुभाव ८४२ - चित्राग्नि की पञ्चपशुरूप में परिणति 19 11 ८३६ - प्रजापतिस्त्वेवेदं सर्व, यदिदं किञ्च ८४० - आत्मनिर्भरता से वञ्चित पशुभाव " 3 39 29 ८१४- ' अपश्यत् तस्मात् पशवः ' " 1 ८४३ - पञ्चपशुओं का भोग्यत्त्व ८१५- पशुद्वारा सम्वत्सरप्रजापति का संस्कार ८४४ - पशुपतिरूप आत्मभाव ८१६ - पशुनिर्माण, और प्रबाति का विस्रसंन " " " " ४५- पाशरूप - प्राणमाव r5

पृष्ठ 177

शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - १-२ - मोतीलाल शास्त्री, पृष्ठ 177 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

शपपथब्राह्मण २ खण्ड ८४६ - पशु रूप - वाग्भाव ८४७ - प्रतिपदार्थ में तथ्यत्रयी का समन्वय ८४८ - विश्वा जातानि परिता बभूव ८४६ - अन्नाद, और न शब्दों का निर्वचना-त्मक स्वरूप- समन्वय ८० - प्राणोत्थानस्थान की उक्थरूपता ८५१ - उक्थ, और दाग्नि ८२ अर्क, और अग्निरश्मियाँ ८५३ - शीति, और पशुरूप अन्न ८५४ - श्रशीति से अनुप्राणित उक्थ ८५५ - शीति और महदुक्थ ८५६ - अशीतिभिर्हि महदुक्थमाख्यायते ८५७ श्रात्मा मद्ददुक्थम् ८५८ -- उक्, और श्रात्मा ८५ -- थम्, और अन्न ८६०-- प्रकार उकार - मकार अनुबन्धी- आत्मा का स्वरूप- समन्वय ८६१ -- उक्थभावों के विभिन्न निदर्शन ८६२ - आत्मा की वाक्कला, और पशुभाग ८६३ -- ' श्व ' इन्द्र ८६४ - नेन्द्रादते पवते धाम किञ्चन ८६५ -- शुन इन्द्रात्मक अमृताकाशं ८६६ - एतस्मादात्मन श्राकाशः सम्भूतः ८६७ – इन्द्र, और इन्द्रपत्नी ८६८ -- वाक् की पञ्चभूतरूप में परिणति ८६६ - वाचीमा विश्वा भुवनान्यर्पिता ८७०-- विश्व, और विश्वज्योति ८७१-- पशुरूप अन्न, और विश्वज्योति ८७२ - पशुसोम की आहुति और अन्नादाग्नि का प्रज्ज्वलन ८७३ - गर्भस्थ प्रजापति का संस्मरण ८७४ - क्षरकूट का सन्धाता कूटस्थ अक्षर ८७५ ( क ) -- विपरिणामी - क्षरभाव ८७५ ( ख ) -- क्षरः सर्वाणि भूतानि ७६० 22 31 " " ७६१ " " ८७६ - क्षरात्मक - पशुभाव ८७७ -- पदार्थमात्र का पशुत्व ८७८ - पशुसामान्य के स्वरूप समर्थक कतिपय वचन ८७६ - यज्ञसंसाधक पशु ८८० - यज्ञार्थ पशु का आलम्भन, और ' स्वा-दिष्ट ' भाव ७६२ 11 ७६३ " " ८८१ - मनस्तुष्ट्यर्थं अपहृत पशु, और ' मदिष्टभाव ' " " ८८२ - इन्द्रियलोलुपता, और मदिष्टता " " " " ८८३ - महर्षिताण्ड्य के सूत्र " ८८४ - स्वादिष्टा वै देवेषु पशव आसन्, मदिष्टा 29 " 37 ": असुरेषु ५- अपेक्षित सोम, और विभिन्न यज्ञों का संस्मरण ६- पश्वालम्भन की शास्त्रीयता का तत्व -पूर्ण - समन्वय - प्रयास ८८७ - पशुवपा की सापेक्षता - बना स्थित प्राणदेवता " 1 - मुष्टयाघात, और श्रालम्भन ८६० - एमेदस्तु वपा वसा ८६१ - सोममय स्निग्धतन्तु, श्रौर वपा " " ८ ९ २ - मेद, और मेध 27 ८६३ - मेदो वै मेधः 33 ८६४ - पशुर्वै मेघः " ७६२ " " " " " " " " " " " " " " " " " II ८६५ - मेधो वा श्राज्यम् ८६६ - यज्ञस्वरूपानुगता मेघग्रहण -- ब्यवस्था ८६७ - श्रीहियव में श्रन्तमुक्क पञ्चपशुओं का मेधद्रव्य - पुरुषमेधसे अश्व की प्रसूति ८६ ९ - श्रश्व के मेध से गौ की प्रसूति ६००- गौ के मेध से अवि की प्रसूति ६०१ - अवि के मेध से ज की प्रसूति ६०२ - पञ्चपशुरूप श्रपशु ६०३ - श्रजपशु की सर्वपशुरूपता " ७६५ "

पृष्ठ 178

शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - १-२ - मोतीलाल शास्त्री, पृष्ठ 178 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

६०४ - यज्ञकर्म की प्रारम्भिक अवस्था, श्रौर तव का परीक्षण ६०५- परीक्षाफलरूप - पुरोडाशद्रव्य का अन्वे-विषयसूची ७६५ पण, एवं पुरोडाशरूप पशु का हवि-" यज्ञ में विधान ६०६ - पुरुष का प्राणवियोग, और पूतिभाष ६०७ - पुरुषमेध की सत्वर - उत्कान्ति ६०५ - मेघ के द्वारा दोष परिमार्जन 27 ७६६ "? ६०६ - पशुओं की मेघोत्कान्ति और पशुमांस का पूतिभाव 29 १६- किंपुरुष, श्रीर पुरुषपशु ६१७ - गौरपशु, और अश्वपशु १८- गवयपशु, श्रौर गौपशु ६१६ - उष्ट्रपशु, और अविपशु २०- शरभपशु, और जपशु ६२१- पञ्चविध - उपपशु ६२२ - श्रासुरभाववद्ध क - श्रामिषतत्त्व २३- श्रवैध, और वैध - मांस ६२४- तस्मादेतेषां पशूनां नाशितव्यम् ६२५ पक्रान्तमेधा ते पशवः ७६६ 33 33 " 17 " " " ६१० - अनमेध का स्थिरत्व ६११ - पशु की प्रयुक्ततमता ६१२- पशूनां प्रयुक्त तमः यदजः ६१३ - प्रकृतियज्ञात्मक दर्शपूर्णमाम ६१४ - मौलिक प्रतिष्ठात्मक हविर्यज्ञ ६१५ - उत्क्रान्तमेधा पञ्चपशु " ६२६ - पशु, और पुरोडाश " " } ६२७ - यज्ञ की पाहता ६२८ - यशसम्मत पशु की गतार्थता ६२६- पुरोडाशानुगता पञ्चपशु - - समन्विता - पशु-सम्पत्ति का समन्वय ६३० - ' यदा पिष्टान्यथ लोमानि ' ६३१ - बतोपायन - कर्मानुगत विकल्प इति - प्रथमकाण्डे - द्वितीयाध्याये - तृतीयं ब्राह्मणम् द्वितीय - प्रपाठके च प्रथमं ब्राह्मणम् " " ७६७ इति पात्रीनिर्णेजनम् - पुरोडाशमीमांसया - समन्वितम् १२ इति-- हविर्ब्राह्मणाध्यायः प्रथमः , “

पृष्ठ 179

शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - १-२ - मोतीलाल शास्त्री, पृष्ठ 179 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

श्रीः यथ - के दिवाह्मणाध्यायः अथ - शतपथब्राह्मण - हिन्दी - विज्ञान भाष्ये - प्रथमकाण्डे द्वितीयाध्याये - चतुर्थं ब्राह्मणम् द्वितोयप्रपाठके च द्वितीयं ब्राह्मणम् * १३ - वेदिकाकरणम् -- वे दिस्वरूपसम्पादनञ्च तत्रादौ स्तम्बयजुर्हरणं, ' भू'- विशोधनञ्च नामक क्रमप्राप्त १३ वें कर्म्म के विज्ञानभाष्य की ' विषयस्मारकसूची ' ( पृष्ठ सं ० ७६८ से ८४२ ) १- प्रथमकाण्डान्तर्गत --- द्वितीयध्यायानुगत-चतुर्थ ब्राह्मण, एवं द्वितीय प्रपाठकानुगत द्वितीय त्राह्मण - ( मूल ) ७६८ २ - मूल ब्राह्मण का अक्षरार्थसमन्वयात्मक-श्रनुवाद ७७१ ३ - सूत्रानुगत - पद्धति - संग्रह ४ - विज्ञान भाथ्योपक्रम ७७७ ७८६ ५- ब्राह्मणग्रन्थोक्त विशेष प्रकरण, एवं सामान्य विज्ञानभावों का अनुगमन ६- पुनरुक्तिमूला आर्षशैली का समादर ७ - वेदनिर्माण का मूलाधार प्राकृतिक यज्ञ " ८- हविर्यज्ञ की प्रतिष्ठाभूमि, और भूपिण्ड 27 ६- ज्योतिष्टोमयज्ञ की प्रतिष्ठाभूमि, और महिमापृथिवी " ७८ ९ 31 * भूल से ग्रन्थ में १३ बीं क्रमसंख्या के स्थान में १२ वीं संख्या लगगई है । पाठक संशोधन कर लेंगे । ५१

पृष्ठ 180

शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - १-२ - मोतीलाल शास्त्री, पृष्ठ 180 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

१०- भूपियस्था औषधि वनस्पतियाँ और हविर्यज्ञ का आहुतिद्रव्य ११ मानयों के द्वारा वैध रविश का वितान १२- भूपिगड की चर - अचर विभूतियों का भोक्ता यजमान का भोकारमा १३ - यावती- वेदस्तावती पृथिवी, और भूपिण्ड का वेदिच्व १४ -- भूमि के लिए सतत स्पर्धाशील देवता, और असुर १५- गर्भस्थ आग्नेय - प्रजापति और अक्षभाव १६- भूपिएडानुगत श्रग्निकीलक, और भूपिण्ड का स्वस्थाने परिभ्रमण, तथा तद्द्वारा महोरात्र का आविर्भाव १७- प्रमापति की धुररूपता १८- देवमय सौरमण्डल ११ - सुरमय पार्थिवभाग २०- देवदूत अनि २१- असुरदूत सरदा २२ सर्व कृपया शिष्ये, और पुत्र २२ -- वृत्रासुर का भूपिण्ड पर साम्राज्य २४ - पविरोधी असुरभाव २५- सुरविरोध की स्वरूर - परिभाषा २६- देवदेवताओं की विकासभूमि २७-- वारुणवृत्रासुर का स्थान विषयसूची 95 € 11 " " " P 19 II 79 33 २८ - बुद्धिवद्धक - सौर इन्द्रप्राण २६-- वल तद्ध ' क- श्राप्य - वरुणप्राण ३० -- असुर शब्दार्थ निर्वाचन ३१ -- आपोमय प्राण, श्रौर बल की स्वरूप-परिभाषा ३२- पारमेष्ठीमण्डल, और आप्यप्राण ३३ देवापेचयात्रिति असुर ३४- शरीरस्थानुगत आसुर और देवभाव 37 ३५ - विज्ञान, और देवता ३६ -- पल और असुर ३७ - विज्ञानोपासक आत्मनिष्ठ ब्राह्मण ३८. श्रासुरचम्मों का स्वरूप - चित्रण २ ९ - इन्द्र और विरोचन का संस्मरा ४० श्राज का भारतवर्ष, और आसुरभावानुगति ४१ -- सुख और आनन्द का पार्थक्य ४२-- प्राच्य खादशों का आत्यन्तिक परिक्ष ४३ - घिवचनों की उपेक्षा ४४ स्रञ्जित शुभालों का प्राचुर्य्य ४५ - विज्ञान और भूतल की प्रतिद्वन्द्विता ४६ देवल की अभिभूति ३७- सत्यविज्ञान का अभिभव ४८ - श्रसुर बुद्धि - मानवों का अतिमान ४६ श्री महलक्ष्मी, और तदुपासक ५० श्रागमशास्त्रोक्त लक्ष्मी का वाइन ५१ लक्ष्मी का एडवनृत्य और मानव की पशु रूप में परियति ५२ - कुल पुरोहित का श्रात्यन्तिक पतन ५३- देवीविभृति और प्रासुरविभूति का प्रच एड संघर्ष ५४ - देवासुर संग्राम की परम्परा ४५ देवस्वरूप का संस्मरणा '५६ --सौरमण्डलानुगत श्वेतद्वीप ५७ - पुराणानुगत श्वेतद्वीप ५८ श्दीपनिवासी सत्यनारायण ५१ इन्द्र का महान् विजय, और उन का -सपत्नभाव ६० - न त्वं युयुत्से ' का संस्मरण ६१ देवासुराख्यान का संस्मरण " ६२ - मघवा इन्द्र, और सनातन विजय " ६३ - मरुत्वान इन्द्र, और असुर के साथ स्पर्द्धा ६- इन्द्र और ७६० ७ ९ १ " " 17 19 " ७६.२ 31 71 37 ,, 29 " ७६३ 17 " II