Shatpath Brahman 1 2 — पृष्ठ 161–170

शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - १-२ - मोतीलाल शास्त्री · पृष्ठ 161–170

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शतपथब्राह्मण २ खण्ड २० - ब्राहृताग्नि, उद्ध ताग्नि, प्रहृताग्नि, विहृताग्नि, भेदेन चतुर्द्धा विभक्त अग्नि ७१० २१- अधिलोक - श्रधिदैव - अधियज्ञ - अधियाज्ञिक दैव - भेद से चतुसंस्थानानुगत अग्नि ७११ २२- अग्निचतुष्टयी से सम्पन्न प्रविवी - अन्तरिक्ष-द्यौः - श्रापः नामकी लोकचतुष्टयी २३ - अधिलोकानुगता अग्निसम्पत्ति २४ - अधिदैवानुगता श्रग्निसम्पत्ति श्रार्त्तवाग्निस्वरूपदिग्दर्शनम् २ ४३ - उत्तरदिगनुगत अग्नि का यावत्त्व ४४- ओषधि - वनस्पति- परिपाक - कर्त्ता श्रार्च-वाग्नि ४५ - श्रार्त्तवाग्नि, और श्रपणाग्नि ७१२ ४६ -धर्मावाग्नि ४७ ऋत का स्वरूपलक्षण २५- अधियज्ञानुगता अग्निसम्पत्ति २६ - अधियाज्ञिकदैवानुगता श्रग्निसम्पत्ति २७ - शुक्राग्नि का प्राकृत - संस्मरण २८ - रसाग्नि का संस्मरण " " 99 ४८ - ऋताग्नि, और ऋतसोम ७१३ " " २६ -वाग्नि का " ,, २६ - छन्दस्याग्नि का " " ३० - सावित्राग्नि का 22 * ० रसाग्निस्वरूप दिग्दर्शनम् १ ३१- दधि घृत - मधु - रसत्रयात्मक - स्तौम्य त्रैलोक्ये व्यापक प्रथमाग्निरूप रसतम - रसाग्नि ३२ - रसाग्नि- निबन्धना गायत्र सम्पत्ति ३३ - गायत्री के द्वारा सोमापहरण ३४ - रसाग्निरूप हव्यवाडग्नि ३५ - मानवीय वचन का समन्वय ७१३ 39 " " ४ ९. - श्रग्नि- सोम का उद्द्याभ, निग्राम ५० - ऋतुमती, और प्रजोत्पत्ति ५१ - ऋताग्निसोम के द्वारा घड़ऋतु का स्वरूपा-विर्भाव ५२ - ऋतुदेवताओं का संस्मरण ५३ - ऋतु की अवस्थात्रयी, और सवनत्रयी ५४– पञ्चत्त ", और पञ्चप्रयाज २५ - श्रार्त्तवाग्नि का स्वरूपेतिवृत्त * छन्दस्याग्निस्वरूपदिग्दर्शनम् ३ ५६ - वस्तुस्वरूपसमर्पक- श्रायतन ५७ - श्रायतनरूप, वयोनाध 23 ५८ - अन्नात्मक वय, और वयोनाथ ३६ - ' शेषे वनेषु मातृषु ' इत्यादि मन्त्र का सम्मरण ३७ - प्राणदेवताओं का सम्बन्ध -- विधाता-साग्नि २६ - अग्निदूंत वृणीमहे ३६ - उभयंऽएतदग्निर्देवातां होता च, दूतश्च ४० - सत्य का वैज्ञानिक लक्षण ४२ - सत्यलक्षणानुगत - सत्याग्नि ४२ - ' श्रग्ने नय सुपथा राये ' का संस्मरण # * * " ३३ ५६ - वयोना, और छन्द ६० - छन्दोऽग्निरूप वागग्नि ६१- त्राग्परिमाणं छन्दः ६२ – श्रग्नेर्वागेवोपनिषत् ६३ - मा प्रमा-- प्रतिमा स्त्रीवि-- नामकी - छन्द-चतुष्टयी ६४ - पार्थिव गायत्री छन्द ६५ - ग्रान्तरिक्ष्य - त्रिष्टुप् छन्द ६६ - दिव्य - जगतीछन्द ६ ७ – गायत्री छन्दस्क आदित्य

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६८ - त्रिष्टुप्छन्दस्क- वायु ६६ - जगतीछन्दस्क - प्रादित्य ७० - श्रापोमय प्रात्त्यादेवता ७१ - देवप्रतिष्ठा रूपा छन्दश्चतुष्टयी ७२ – ' अश्वो न देववाहन: ' और छन्दस्याग्नि का स्वरूप - विराम सावित्राग्निस्वरूपदिग्दर्शनम् ४ ७३ - सौर प्राणाग्निरूप सावित्राग्नि ७४ - सूर्य्यकेन्द्रात्रद्ध सत्यतत्त्व ७५ - सौरदेवताओं के द्वारा सावित्राग्नि की याराधना ७६ श्रग्निरूपरसाग्नि ७७ - वायुरूपात वाग्नि वाग्निम्प भुवनपति अग्नि ८१ न्दस्याग्रूप भूतनांपति अग्नि ७८ - श्रायतन रूप - छन्दस्याग्नि ७६ - रसाग्निरूप भूपति अग्नि ८० -८२ - सुप्रसिद्ध अग्निभ्रातरः ८३ - शुक्राग्निचतुष्टयी ८४ वरूप प्रथम - अग्नि ८५ प्रयाजरूप द्वितीय अग्नि ८६ अनुरूप तृतीय - अग्नि ८७ - सावित्राग्निरूप चतुर्थ श्रग्नि ८ ' चतुर्दा विहितो छ वा अग्निरास ' का समन्वय पार्थिव अग्नि का पथ की ओर गमन, एवं मन्त्रश्र ति ६० - सावित्राग्नि का भूपथ की ओर आगमन ६१- सौर सावित्राग्नि का साय २- पेड मे प्रत्याहत सावित्राग्नि ६३ - सावित्राग्नि का अभिगेऽग्नि से सम्प-रिष्यन विषयी ७१४ " ७१५ ६४ सइचरभावानुगत अङ्गिरोऽग्नि का हव्य वाहनस्व ६५ - सौर- प्रतिफलित सावित्रानि की आदित्या निरूपता ६६ अङ्गिरा और आदित्य का स्वर्गगमन ६७- अङ्गिरा, और आदित्य की स्पर्द्धा ६८ - सावित्रानिरूप आदित्यारिन का स्प में विजय ६ स्पर्दारहस्य प्रतिपादक यति वचनों का संस्मरण १०० -- आदित्याग्निरूप सम्वत्सराग्नि का एक-विंशरूप स्वर्ग में गमन १०१ आदित्याग्नि में अक्षरा का समन्वय १०२ ७१६ 23 I, " " रा के द्वारा आदित्याग्नि में हविद्रव्य का समपण १०३ -- ' तान् अङ्गिरसो याजयाञ्चक्र: ' ०४ - देवमण्डल में हविः प्रापक एकमात्र दिव्य-श्रादित्याग्नि १०५ श्रश्वाग्निरूप साबित्राग्नि १०६ अश्व और तस्वरूपसम्पादिका तत्वत्रयी १०७ -- ' हव्यवाट ' रूप सावित्राग्नि १०८ सम्वत्सरानि में आहुति १०६-- अङ्गिरोऽग्नि, और सम्वत्सराग्नि का सम्परिष्वङ्ग ११० पार्थिव - रोऽग्नि की हन्यत्राहरूपता " १११- आहुति सम्बन्धी कतिपय प्रश्न और तत्समाधाता श्राप्त्या विज्ञान 13 ११२ आहुतियाक दिव्याग्नि १२३ तिमापक की दिव्यमावापा ११४ -- देवता का देवता के साथ ही सम्बन्ध ११५ - - दिव्याग्निसंघाता अग्न्याधानक ११६ अधिकारसमर्पक श्रन्याधानक ११७ न्य लोकाभिमुख अग्नि की अदि व्यता और विज्ञातीयता ७१६ " " " " " " " " 33 " ३४

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शतपथब्राह्मण २ खण्ड ११८ होतृप्रवरणकर्म्म में अनुपयुक्त - पार्थैिव-११६ - ऋतभावापन्न अन्तरिक्ष्य अग्नि १२० - ताग्नि की हो तृपद से वियुक्ति . १२१ - सीमाभावनिबन्धन तृतीय छन्दस्याग्नि, और होतृकर्म में तदनधिकार 19 १२२ - चतुर्विध अग्नियों का द्युलोक की ओर गमन १२३ - सम्वत्सराग्नि के सम्बन्ध से वञ्चिता अग्नित्रयी १२४ - प्रतिफलित- सौर सावित्राग्नि १२५ - उभयाग्नि का स्वर्ग की और गमन " " १२६ -- वयं पूत्रम् वयं पूर्वम् रूपा प्रतिस्पर्द्धा 22 १२७ - अग्नित्रयी का आत्मसमर्पणात्मक मरण " " १२८ - पोमय सगुद्र में ग्रग्नित्री का विलयन " १२६-- सत्यभूपिण्ड का ऋतधर्म्मा आप से परिष्टन " १३० -- उत्क्रान्त अङ्गिरोऽग्नि, वायव्य ऋताग्नि, एवं छन्दस्याग्नि का पार्थिव अव समुद्र में विलयन १३१ - सावित्राग्नि, और पारमेष्ठ्य समुद्र १३२ - चतुर्विध श्रग्नियों का ऊर्ध्वगमन ७१८ 99 " 1 ७१६ १४४ - प्रतिष्ठारक्षण, और कम्पन १४५ - सावित्राग्नि के विभिन्न दो स्वरूप १४६ - गमनानुगत सावित्राग्नि की अग्नि-प्रधानता | १४७ - आगमनानुगत सावित्राग्नि को इन्द्र-प्रधानता १८ - अग्निगर्भा पृथिवी १४६ - इन्द्रगर्भिणी द्यौः १५० - सावित्राग्नि से अनुप्राणित मेध्य श्व १५१ - श्रतियज्ञात्मक अश्वमेध १५२ - न्नि, और इन्द्र का अान्तरिक्ष्य अर्णव समुद्र में सहसमन्वय १५३ - अग्निप्रधान पार्थिवदेवता १५४ - इन्द्रप्रधान द्य देवता १५५ - अग्निः सर्वादेवता II I 39 १३३ - मर्त्यभावापन्ना अग्नित्रयी १३४ - अमृतभावापन्न दिव्याग्नि १३५ - दिव्याग्नि, और अमृतभाव १३६ - स भीषा निलिल्ये १३७ - सोऽपः प्राविशत् " " " 33 १३८ - प्रतिफलित ग्रादित्याग्नि का प्राणदपानत् व्यापार के द्वारा द्यलोक की ओर गमन ७२० १३६ - आदित्याग्नि की वीचिरूप में परिणति " " १४० - आदित्याग्नि की प्रार्त्तवसमुद्र में व्याप्ति " १४१ - वीचि - और कम्पन १४२ - ' स भीषा निलिल्ये ' १४३ - किञ्चिच्चलनात्मक भय १५६ - इन्द्रः सर्वादेवताः १५७ - श्राग्नत्रयी का अध्ययरूप मरण १५८ - सौरदेवताओं के द्वारा अग्नि का अन्वेषण १५६ - बलकृतिधर्म्मा इन्द्र १६० -- सहोरूप ऐन्द्रबल १६१ -- ऐन्द्रबलानुगत पलायित अग्नि का पुनरा-गमन १६२ - वियुक्त का पुन: संग्रह, और सामाजिक अनुवन्ध १३३ -- ' अनुविद्य ' का पारिभाषिक समन्वय १६४ - आहुतिकर्म्म के द्वारा देवसम्बन्ध १६५-- होतृप्रवरणकर्म्म का रहस्यार्थ १६६-- प्रकृतियज्ञ में अग्नि का होतृत्त्वेन वरण १६७ -- मानवयज्ञ, और अग्निमूर्त्ति मानव होता १६८ - दिव्याग्निमय दिव्यदेवताओं का सम्बन्ध १६६-- श्रन्नपरिपाककर्त्ता पार्थिव अग्नि १७० - वरण कर्म मेंअनुपयुक्त अग्नि 23 | १७१ -- श्रान्तरिक्ष्य वायव्याग्नि, और विद्युत् १७२ - प्रोजबल का सञ्चार, और वायव्याग्नि ३५

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१०२ नक्षत्र का वास्तविवस्वरूप १७४ - न क्षरति, और नक्षत्र भाव १७५ - मस्त् और रुद्रतव , १७६ समीरा और बात १७७ स्पधम्म भौतिक वायु १७८ इतिपूरक भैषज्ययज्ञ " विषयसूची ७२१ २०३ - अग्निसम्बन्ध से वञ्चित शेष पानियों की दोषपूर्णता ७२३ 13 २०४ अग्नि का ' निष्ठीवन ', और दूषित पानी २०५ - असु भवाः प्राप्याः ' " " " २०६ - देवैराप्ताः- इति श्राप्त्याः " २०७ काम्यभाव और आया " " १७६.-- वात श्रावात मेघनम् २०८ त्रिमा सौरदिव्यप्राण 19 II १८० - वतिवायु का जनक मरुद्वायु 93 २०६ - त्रित्वानुगत देवकार्य्य " " वायव्यप्रवाह १६१ - मरुद्वायु की सात अवस्थाएँ १८२ -- एकोनपञ्चाशत् [ ४६. ] मरुद्गण १८३ मरुतो रुद्रपुसः १८४ - श्राकाशसञ्चरणशील विविध दिगनुगत १८५ - वायव्य संघर्ष, और नक्षत्रभङ्ग १८६ तारा भन का स्वरूप - दिग्दर्शन १८७ - धिष्ण्या - सञ्चरण का १८८ - उल्मुकपात का १८६ - वज्रप्रहार का १६० - वायव्यभूकम्प की स्वरूपदिशा १६१ घानानुगत श्रीर १६२ - मघा नक्षत्रानुगत आकाशमण्डल, ताराभङ्ग १६२ याव्यानि के विभिन्न काव्यों का संस्मरण " १६३ - क्योनाधमात्रानुगत छन्दस्यान " १६४ - छन्द की प्राकारमात्रता १६५ - छन्दस्याग्नि का होतृवरण कर्म से पलायन १६६ - शेपभूत सौर अग्नि और दीत्रक 39 १६७ सहोचल के द्वारा तदन्वेषण एवं तद्द्वारा यज्ञस्वरूप की संसिद्धि ७२३ १६८ प्रतिफलित सीर अग्नि का अप में प्रवेश १६६ - सौम्य अन्नरस की प्रतिष्ठा २०० - अन्नरस के द्वारा अग्नि का प्रज्ज्वलन २०१ - अन्न का अभाव, और तरुण का आक्रमण " २०२ - अध्या मोदाहरण के द्वारा स्थिति का ७२२ 21 २१० - आत्मसृष्टि और मनोमय अव्यय २११ देवसृष्टि और प्राणमय अक्षर " " 19 २१२ - भूतसृष्टि, और वह मय दर " २१३ - आत्म - देवता - भुत - त्रयी 23 २१४- अव्यय - अ - क्षर त्रवी -" 33 २१५ - पञ्चपर्वा विश्व २१६ प्रजापति की आत्म 29 21 39 13 २१७ यक्षस्वरूप समन्वय " " " २१८ अन्यांनी का संस्मरण 93 39 33 33 99 २१६ - देवता २२० वे देवा: " 23 २२१ परिलेख के द्वारा त्रिसत्य का समन्वय ७२४ २२२ देवप्राण के विविध महिमा विवस ' --17 " 3 २२३ त्रित्व की समन्वितावस्था और देवता " " २२४ - - त्रिः सत्याग्नि, श्रीरत्याग्नि 19 २२५ श्राप्याग्नि के तीन रूप 39 २२६ -- अग्नि से अनुगत ' एकता ' आप्त्या " " " " 9 स्पष्टीकरणा 39 २२७ - वायु से अनुगत ' द्विता ' या २२८ - श्रादित्य से अनुगत ' त्रिता ' आप्त्या २२६ - देवतात्रयी का एकत्त्व २३० - एक आत्या के तीन महिमा - विवर्त्ता ' २३१ - सम्वत्सरानुगतावनी २२२- नमुना- एकता आल्या २३३ - वायुप्रमुखरुद्राणां द्विता त्या २३४ इन्द्रमुखादित्यानां त्रि - आया २३५ -- इन्द्रदेवता का ज्येष्ठत्त्व, और श्रेष्ठत्त्व २३६ - त्रितश्रात्या देवता का प्रधानत्त्व 29 13 " " " " " ३६

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शतपथब्राह्मण २ बगडा २३७ -- इन्द्रसहचारी त्रिताप्या ७२४ २३८- त्रिताप्राप्त्या की बलवत्ता ७२५ २३६- त्रिता प्राप्त्या के द्वारा विश्वरूप त्वाष्ट्र असुर का वध " " २४० - श्राप्याग्न्यनुगता अवस्थाद्वयी २४१-- इन्द्रसद्दचारी शुद्र- श्राया 91 २४२ - वरुणा महचारी मलिन श्राया २४३ - अन्नभुक्ता रस - मल - द्वयी २४४-- वारुणप्रपतत्त्व का मलप्रतिष्ठाव २ - ५-- अपानप्राण का आघात, और स्वेदविनि-गनम २४६ - हवियुक्त श्राप्याग्नि से परित्यक्त कफ-लाला मूत्रादि मलीमस पदार्थ, और तत्समन्वित वारुण मलीमस श्रात्या २४७ -- सौर - पोमय - अग्नि की ' त्या ' रूपता " २४८ - दिव्य आत्या का स्वर्गगमन 22 २४ ९ - आप्त्या का बलपूर्वक श्राकर्षण " " " " २६३ - क्षत्रबलोपेत इन्द्र एवं ब्रह्मबलोपेत आप्याग्नि २६४-- इतः प्रदानाय ते उपजीवन्ति २६५ -- ज्ञानशक्तियुक्त ब्रह्म ( ब्राह्मण ), और आप्याग्नि २६६ - क्रियाशाक्तियुक्त क्षेत्र ( क्षत्रिय ), और दिव्येन्द्र २६७- ज्ञान, और क्रिया का सम्बन्ध २६८ - ज्ञानजन्या भवेदिच्छा २६६ - इच्छाजन्यं क्रतुर्भवेत् ( इच्छाजनन्या कृतिर्भवेत् ) २७० - ऋतु जन्यं भवेत्कर्म्म ( कृतिजन्यं भवेत्कर्म्म ) २७१ - तदेतत्कृतमुच्यते २७२ - ऋतु, और कर्म की स्वरूप - परिभाषा २७४ - स एव क्रतुः २७५ - हृत्सु ह्ययं क्रतुर्मनोजवः प्रविष्टः " 9 २५० - ' वो मामकामं नयन्ति ' का समन्वय २५१-- ऐन्द्रबल प्रयोगानुगत त्या " २५२ - रसयुक्त देवानुगामी श्राप्या २५३ -- मलयुक्त वरुग्णानुगामी आया 22 त्या त्रयी " २५४ - अवस्थात्रयी से अनुप्राणिता २५५ - प्राकृतिक नित्य प्राणदेवताओं में ब्राह्मण-व २५६ - अग्नि की ब्राह्मणवर्णता, पणं तत् समर्थक श्रौत वचन २५७ -- ब्राह्मणवर्ण का वास्तविक स्वरूप २५८- एष हि देव ेभ्यो हव्यं भरति २५६- ब्राह्मणमूर्ति ' भारत ' नामक अग्निदेवता, और ' भारत ' अभिधा २६०- भरतनामक प्रात्याग्नि का इन्द्रसहचारित्व " २६१-- प्राकृतिक प्राण देवताओं में क्षत्रियवर्णा-त्मक इन्द्रदेवता ७२६ " " 19 " " २७६ - क्षत्रेन्द्र, और ब्रह्म प्राप्त्या का सहसमन्वय, और तद्द्द्वारा वृत्रवध २७७ - ब्राह्मणपुरोहित, और क्षत्रियराजन्य २७८ - ब्रह्म - क्षत्र स्वरूप - विश्लेषिका शातपथी-श्रुति २७६ - आत्या का इन्द्र के साथ विचरण २८० - श्रपप्रणयन कर्म का संस्मरण २८१ - मानवीय वचन, और अप का प्राथम्य २८२ - अद्भिर्वा इदं सर्वमाप्तम् २८३ - अपां प्रपत्त्वम्, और गोपथ ति २८४ - ब्रह्मगर्भितं सुब्रह्म, और तत्समन्वय के द्वारा सर्गप्रवृति २८५ श्राकारभाव, और वष्टा देवता २८६ - त्वष्टाप्राण के द्वारा शुक्र की विविधाकार में परिणति २८७ - त्वष्टा वै रेतः सिक्त ं विकिरोति 39 २६२ - इन्द्रप्राणकृतात्मा मानव का क्षत्रियत्त्व " " २८८ - त्वष्टा रूपाणि पिंशतु ३७ ७२६ 19 " 39 " " 20 " ७२८ 17 21. 23 " " " "

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२८६ त्वष्टा प्राण की विश्वरूप में परिणति २६० श्राप्यप्राणरूपा असुरता, और वाष्ट्र-विश्वरूप २६१- प्रान्तरि मलयुक्त श्रायाप्राण का असुरत्त्व २६२ -- उभयविव श्राप्त्या का संस्मरण २१.३ मूर्ति ब्राह्मणत्व विषयसूची ७२८ ३१६ अप्तत्व की सर्वजगद्व्यापकता 17 विश्वरूप का आसुर ७२६. २ ९ ४ -- देवदेवताओं का द्वेषी प्रामुख्या २ ९ ५ प्रकाश सौग्देवता २६६ प्रकाश विरोधी तत्व २७-आक्रमण देवदेवताओं पर ज २६८ - सोमरूप हविद्रव्य की आहुति और तद्बलोपेत देवताओं के द्वारा असुर-पराभव २६६ - ज्योतिषा विमो ३०० -- शश्वद्ध त्रित एव जघान २०१ धकारणभूत हविर्चल ३०२ का मुख्य प्रवर्त्तक ३०३ - वैदिकदृष्टि, और जडदृष्टि का अपलाप ३०४- सर्वव्यापक अव्ययरूप विदेश ३०५ - व्यापक चैतन्यवाद का समन्वय २०६ हिंसात्मक कम् ३०७ - हिंसा दोष से इन्द्र की प्रतिमुक्ति ३०८ - श्राया का आपोमय ससङ्गभाव 33 ३०६ - सङ्गभावात्मक प्रापया का हिंसादोष से सम्परिष्वङ्ग ३१० - श्रद्धारसात्मक आध्यादेवता ३११- श्रद्धा वा आप:, और आपोमय प्राप्त्या " ३१२ - मेच्या वा आप:, और ग्राभ्या श्रापः, ३१३ - विश्वरूप त्वाष्ट्रवध के निमित्त आल्या-देवता ३१४ - हिंसाकर्मानुगत धर्मशास्त्रीय निर्णय ३१५ - मस्तकत्रयात्मक त्वाष्ट्र विश्वरूप " ३१७ - विश्व के उपादान कारणों का पारिभाषिक संस्मरण ३१८ विश्वपादभूतत्वाष्ट्र और तन्निबन्धना -वाक श्राप: - अग्निमयी - शुकत्रयी ३१६ - ' बाचीमा विश्वा भुवनान्यर्पिता ३२० - पाटकौशिकी विश्वप्रजा ७३० ३२१ - मन: प्राणवाङमयी सम्भति, और असम्भति ' " ३२२- वाष्ट्र की त्रिशीर्षता का दिग्दर्शन ३२३- श्रापोमय - पारमेष्ठ्य - शुक्रतत्त्व ३२४- शुकात्मक- ' महान् श्रीर उसकी अद स्थात्रयी 1 ३२५ विदार योनिरूप - महान् ३२६- प्राप्य वायव्य - सौम्य जीवाधिष्ठाता विशी-माथापत्र महान् ३२७- पार्थिव श्राकृतिभाव, और महान् ३२८ - चान्द्र प्रकृतिभाव, और महान् " २२६- सौर अकुतिभाव और महान् 37 31 13 33 31 " ७३. ३८ २२० विशीर्षता का अनुगमत्मिक समन्वय २३१ - सत्त्वरजस्तमोगुणान्वित महान, श्रीर त्रिशीर्षस्व ३१२ - ' त्रिशीर्षाणं त्वाम् ' का पारिभाषिक समन्वय ३३३- ' लाट विश्वरूपं जपान ' का समम्यय ३३४ - वरुणप्रधान श्राप्यातत्त्व ३३५ - हिंसादोष की अन्वर्थना, और श्राप्या ३३६ - दूषित भाग का श्राप्त्या में अर्पण ३२७ आया और हिंसाजनित दोष २३८ - मलभाग, और श्रान्तरिक्ष्य श्राप्या ३२ ९ श्रायादेवताओं के लिए निनयन कम् 13 ३४० इविद्रव्य के द्वारा दोषनिराकरण २४१ में समर्थ देवदेवता, और इवि-" ३४२ - ऋत्विजों के ग्रात्मा का यज्ञ में समावेश 39 ३४३ पज्ञफलस्वाधिकारार्थ दक्षिणा का विधान 17 29 93 19 17 39 11 ७३१ " " " " "

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शतपथब्राह्मण २ खण्ड ३४४ - दक्षिणा द्रव्य की यज्ञानुबन्धिनी उपयोगिता ७३१ | २६८ - श्रग्नितत्त्वानुगत - वागिन्द्रिय ३४५ - हविः सम्पादनानुगत हिंसाकर्म्म, एवं तन्निवर्त्तके दक्षिणद्रव्य ३४५ - दक्षिणादान के द्वारा यज्ञदोषनिवृत्ति ३४७ - श्रान्त्योपाख्यान की अध्यात्माधिभूताधि-दैत्रत भावत्रयी का समन्वय " ३४८ - अधिदैवतमण्डलानुगत आप्त्याविज्ञान का स्वरूप - विराम II ७३२ * आध्यात्मिक प्राप्त्याविज्ञान * ३४६- तेज अप् - अन्न का त्रिवृत्करण ३५०- श्रात्मप्रपञ्च, में अन्तर्भाव एवं भूतप्रपञ्च का त्रितत्वों ३५१ - षोडशकल - चिदात्मा का संस्मरण ३५२ - पारमेष्ठ्य महानात्मा - रूप योनिर्भाव ३५३ - त्रिविधा जीवसृष्टि, और महान् ३५४ - नवतीर्नवविध ( ६६ ) असुर ३५५ - सप्तविंशति ( २७ ) गन्धर्व ३५६ - अष्टविध ( ८ ) पितर ३५७ - त्रयीविद्या के साथ अप में प्रवेश ३५८ - यजुर्त्ति त्रयीब्रह्म ३५६ - द्वादशसंख्या में विभक्त ऋषिप्राणों का अपतत्त्व में अन्तर्भाव ३६० - ठेजःकलाः, और अन्नकला का प्तत्त्व में अन्तर्भाव ३६१ - ' अद्भ्यः पृथिवी ' ३६२ - ' तत्सर्वमप्सु प्रतिष्ठितम् ' ३६३ - महानात्मा की महत्ता का पारिभाषिक-समन्वय ३६४ - विश्वप्रजापति की गर्भरूपता, और तद्-योनिरूप महान् की महत्ता ३६५ - शारीरिक - द्र त धातुओं का अप्तत्व में अन्तर्भाव ३६६ - शरीराध्यक्ष प्राण का प्रप्तस्व में अन्तर्भाव ३६७ - अङ्गिरा की अवस्थात्रयी " " 21 77 39 " " " ३६६ - वायुतत्त्वानुगत -- प्राणेन्द्रिय ३७० - श्रादित्यतत्त्वानुगत - चतुरिन्द्रिय ७३३ 27 " " ३७१- भृगु की विरलावस्थारूप सोमतत्त्व ३७२ - सोमतत्त्व की अवस्थाद्वयी " ३७३ - भास्वर सोमात्मक- इन्द्रसोम ३७४ - दिक्मोमात्मक - ब्रह्मणस्पतिसोम ३७५ - दिक्सोमानुगत - श्रोत्रेन्द्रिय ३७६ -- भाम्वरसोमानुगत इन्द्रियमन ३७७-- षोडशी आत्मा ऋषि पितर - गन्धर्ग सुर पञ्चेन्द्रिय- शरीरानुगत तरल द्रव्य आदि का प्रपतत्त्व में अन्तर्भाव ७ ३७८-- त्र्यात्मकत्वात्तु भूयस्त्वात् ३७६ -- सूत्रानुगत शारीरिक भाष्य का निदर्शन ३८० - भैरतत्त्व की तेजोरूपता ३८१ - विज्ञानात्मा, तत्सहकृत त्रयस्त्रिंशद्द ेव-देवताओं का तेजस्तत्त्व में अन्तर्भाव ३८२ - विज्ञानबुद्धि का अधिष्ठाता तेजःपदार्थ ३८३- तृतीया अन्नकला का दिग्दर्शन ३८४ - शरीरानुगत स्थूलधातु, प्रज्ञानमन, आदि का अन्नकला में अन्तर्भाव ३८५ - वाङमय तेजस्तत्त्व " " 3 " " 99 " " 73 " 23 " " " ३८६ - मनोमय अन्नतत्व " " ३८७ - प्राणमय अप्तत्त्व 23 ३८८ - मनः प्राणवाङ मय श्रात्मा का संस्मरण " " ३८६ - पोमय शरीर " " " } ३६० - प्राणाग्नि का शरीरपुर में सतत जागरण " ३६१ - प्राध्यात्मिकी गुहात्रयी 23 ३६२ -- अग्निमयी त्रिवृता पृथिवी, और बस्तिगुहा 22 ३६३ - पार्थिवाग्नि, और अपन " ३६४ -- वायुमय पञ्चदश अन्तरिक्ष, और उदरगुहा ३६६-- एकविंश आदित्य और उरोगुहा " " ३६५ -- प्रान्तरिक्ष्याग्नि, और व्यान ७३३ ३६७-- इन्द्रप्राण का अधिष्ठातृत्त्व ३६. 22 " 29

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३६८- अशन, और एकता प्राध्या ३६६ --- यान, और द्विता आपल्या ४०० -- प्रात, और त्रिता श्रास्या विषयसूची III 99 39 संस्मरण " ४०१ - विश्वरूपत्वाष्ट्र की आपोमयता का ४०२ - मैथुनी सृष्टि, और श्रापोमयत्व 99 ४०३ --विश्वबन्धन त्रिमोक, श्रीर त्रिताप्या ४०४ - आपत्याग्निनय प्रज्ञानमन, और श्रध्या-त्मिक श्राप्यादेवता का समन्वय प्रवृत्ति ४०५ - मानव की यज्ञिया, और अयज्ञिया " प्रवृत्ति ४०६ - विज्ञानानुगतित्त्व और यज्ञिया ४०७ - श्रेष्ठतम यज्ञकर्म्म 29 ४०८ यज्ञार्थकर्म्म की श्रवन्धनता * -अधिभूतसम्बन्धी - श्राप्याविज्ञान--ऐतिसासिक प्राप्त्या देवता-४२८ - भौमस्वर्गनिवासी भौमदेवता ४२६. - भौम ब्रह्मा के द्वारा अत्रैव अधिदेवतवत्-व्यवस्था 33 ४३० - इन्द्र के प्रतिनिधि शबसोनपात् ४३१ - भूलोकात्मक भारत के अधिष्ठाता अग्नि 27 ७३४ | ४३२ – मनुष्यविध - अग्निदेव, और पार्थिवप्रजा ४०६-- सौर इन्द्रमय - विज्ञान ( बुद्धि ) ४१० - पार्थिवेन्द्रं मय- प्रज्ञान ( मन ) ४११ - प्रज्ञात्मक सोम प्राणात्मक इन्द्र ४०२ - इन्द्रप्राण की असङ्गता ४१३ - सोम की ससङ्गता ४१४ - पृथिवी और प्रज्ञान का सान्निध्य ४१५ - सूर्य्यं, और विज्ञान का विदूरत्व ४१६ - मनोमूलक यज्ञियकर्म्म , ४१७ -- प्रज्ञामूला श्रासक्ति, और प्रज्ञापराध ४१८ -- प्रज्ञापराधमूलक यशियकर्म ४१६ - यज्ञकर्म के द्वारा ज्ञानाग्नि का प्रज्ज्वलन ४२० - ज्ञानाग्नि के द्वारा असुर परभाव ४२१ - प्रज्ञान के द्वारा ही आसुरभाव का विनाश 17 ४२२ -- मन एव मनुष्याणां कारणं बन्धमोक्षयोः 99 ४२३ - बन्धनमूलक प्रज्ञाभाग ४२४ -- मोक्षमूलक - प्राण भाग ४२५- प्रज्ञान रूप असुर पराभव श्राप्या देवता के द्वारा ४२६ - मानसिक काम - विक्षेप, और आवरण ४२७ - आध्यात्मिक श्राप्याचरित्र का उपराम ७१५ " 1 17 29 39 " " 23 23 का तद्द्वारा भरण - पोषण ४३३- त्वष्टा के पुत्र त्रिशीर्ष - क्ष - विश्वरूप का भारत पर आक्रमण 31 ४३४ - भारताग्निरूप श्राध्या के सहयोग से भौभदेवेन्द्र के द्वारा त्वाष्ट्र का पराभव ४३५ - श्रात्याविज्ञान का उपराम इति श्राप्याविज्ञानमुपरतम् * * अथ - पश्वालम्भनविज्ञानम् ( पृष्ठसं ० ७३६ से ७४७ ) " ४३१ - पशुसम्पत्ति से समन्वित यशक " ४३७ - दर्शपूर्णमासेष्टि में अपेक्षित पशु ४३८ - विज्ञानदृष्टि की विलुप्ति, एवं विद्वानों का शुष्कवा बकलह ४३६ - सनातन धर्मावलम्बी - श्रार्य्यसमाजी - तथा सम्प्रदायवादी विद्वान्, भिन्नवेश ७३६ ७३६ " 1 और इनका ७३७ ४४० श्राराध्य वैदिकसाहित्य, एवं तदुपक्षा से राष्ट्रीय संघठनोच्छेदक कलइ " ४४१ – वैदिकतत्त्वस्वाध्याय का अभाव, और 37 विविध विसंवाद ४४२ - शास्त्रसिद्ध भी विषयों में अभिनिवेश-कलक - कुतर्कवाद ४४३ - पश्वालम्भन, और तत्सम्बन्धी विज्ञानो-पक्रम 33 ४०

पृष्ठ 169

शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - १-२ - मोतीलाल शास्त्री, पृष्ठ 169 का मूल पृष्ठ
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शतपथब्राह्मण २ खण्ड ४४४ - मानवसर्ग, और पशुसर्ग का समतुलन ७३७ ४४५ - चेतन भावानुगत मानव और पशु ". ४४६ - पशुवध की मानवता " 3 ४४७ -'मा हिंस्यात् सर्वाभूवानि ' मूला हिंसाबुद्धि ” ४४८ - अभ्युपगमवादात्मक पशुवध ४४६ - पशुहिंसा की प्रवृत्ति के विरोध का न धिकार ४५० - श्राद्ध, यज्ञादि, और पशुवध ४५१ - पशुवध का अभिनिवेश, और तद्द्द्वारा हिंसा का विरोध ४५२ – हेत्वाभास के द्वारा पशुवध का समर्थन, एवं तनिस्सारव ४५३ - मानवता, एवं शास्त्रदृष्ट्या उभयथा पशुवध का विरोध " " ४५४ - पशुवधसमर्थक वचनों की प्रक्षिप्तता ४५५ - पश्वालम्भन के सम्बन्ध में आज के निर्णायकों का आपातरमणीय निर्णय ४५६ – चारु - वाक्, और चाक ४५७ - शास्त्र का उदात्त सिद्धान्त ४५८ - उदात्त सिद्धान्त का अपवाद ४५६ - ' मा हिंस्यात् ' रूप अहिंसावाद के अप-वादक्षेत्र ४६० - हेतुता, अवसर, प्रसङ्ग उपोद्घात, काक्य, निर्वाहकै क्य - मूला मीमांसा -शास्त्रसम्मता षोढा सङ्गति 23 ४६१ - हिंसा, और हिंसा के सम्बन्ध में ४६२ - हिंसा हिसा की लौकिक - स्वरूप - मीमांसा ४६३ - हिंसाजनित प्रत्यवाय, एयं अहिंसानुगत अभ्युदय ४६४- पापकारणमूला हिंसा ४६५ - पुण्यकारणमूला हिसा ४६६ - हिंसा के द्वारा आत्मपतन ४६७ - अहिंसा के द्वारा श्रात्मोत्थान ४६८ - सर्वसामान्य की मान्यता का विपर्य्यय ७३८ " " 99 22 " ४६६ - हिंसा के द्वारा पुण्यप्राप्ति ४७० - हिंसा के द्वारा पापावाप्ति ४७१ - विचित्र विसंवाद, और हिंसा - हिंसा ४७२ - शब्दप्रमाण के द्वारा ही पाप - पुण्य का सम्मावित - निर्णय ४७३- हिंसा, और अहिंसा से अनुगत पाप-पुण्य कम्मों का एकमात्र निर्णायक-शब्दात्मक - शास्त्र ४७४ - कर्त्तव्य, और कर्त्तव्य का एकमात्र निर्णायक शास्त्रादेश ४७५ - हरिवंशपुराणोक्त भीष्म का श्रद्धात्मक श्राख्यान, एवं भीष्म की शास्त्रनिष्ठा ४७६- शास्त्र निष्ठा का अनुगमन, एवं श्रीकुमा-रिल भट्ट का गिरिशिखा से पतन ४७७ - शास्त्रैकशरणता की अनुगति ४७८ - वृद्धव्यवहारमूलक लौकिक - शब्दप्रमाण, और तन्निबन्धन लौकिकव्यवहार ४७६ - नान्यः पन्था विद्यते श्रयनाय ४८०- भगवान् व्यास के द्वारा शास्त्रीय हिंसा-अहिंसा - भाव के सम्बन्ध में शब्दात्मक निर्णय ४८१ - ' शुद्धमिति चेन्न, शब्दात् ' ४८२ - यज्ञकर्मानुगता पशुहिंसा ४८३ - हिंसाभावापन्न अध्वरक ४८४ - विधिवचन का अपवाद ४८५ - ' अग्निषोमीयं पशुमा लेमत ' ७३६ " 21 91 " 99 ४८६ - याज्ञवल्क्यस्मृति, और धर्म्म का स्वरूप-लक्षण ४८७- स्मा - धर्मलक्षण का संस्मरण ४८८ - ' घर्ममूलमिदं स्मृतम् ' ४८६ - ' स्वस्य च प्रियमात्मनः ' से श्रनुगता वर्त्तमान युगानुगता महती भ्रान्ति का निराकरण ४६० - अन्तरात्मा की कृत्रिमेच्छा, तथा वास्त-विकेच्छा का पार्थक्य ४१

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शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - १-२ - मोतीलाल शास्त्री, पृष्ठ 170 का मूल पृष्ठ
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विषयसूची ४६१- अनृतसंहित- पशुधर्मा मानवों की सह-५२. शरीररथ का उत्पथगमन जेच्छा. और मानवीय वचन का संस्मरण ४४१५२१- मनोऽनुगता दया का आदि अनू ४६२ - मांस - मद्यादि की सहज प्रवृत्ति ४६३ - ' निवृत्तिस्तु महाफला ' का समन्वय ४६४- प्रज्ञानमन, और विज्ञानबुद्धि की स्पर्धा ४६५ श्रुतधर्मानुगत सीम्यान, सत्यधर्म्मा-नुगत श्राग्नेयबुद्धि ४६६ - विचाली भाव ४६७ - अविचाली सत्यमाव ४६८ - ऋत और सामान्ये सामान्यामाव ४६६ - ऋत की अमृतरूपता का समन्वय ५०० - प्राणमनोमूर्ति, श्रतएव अव्ययात्मा प्राण - अमन-५०१ - मन का उनदानभूत चान्द्र सोम ५०२ - अमरिम प्रथमजा तस्य ५०६ - अनृतसंहिता वै मनुष्याः ५०४ - ऋतात्मक - श्रनृत - असत्य - मन, और तत्र सौरसत्य - विज्ञान का समावेश ५०४- सोरतत्व की सत्यरूपता ५०६ - सोरतत्त्व का विज्ञानमयत्व ५०७ चित्रं देवानामुदगात् ५०८ -- सत्याग्निमय सूर्यनाराण ५०६ - सत्यसंहिता वै देवाः ५१० - मनोमूर्ति प्रज्ञानात्मा, और बाह्यात्मा ५११- बुद्धिमय - विज्ञानात्मा और अन्तरात्मा ५१२ क्षेत्रका संस्मरणा " " कारुण्य, मन के अध " 3 ५२२ विज्ञान की निर्बलता, और प्रज्ञान का " " ,, " 3 " 23 III II 29 प्राबल्य ५२३ - मनोविजय, और मानव की असत्कम्मों में प्रवृद्धि ५२४ - स्वस्थदशा की बुभुक्षा, और विज्ञान-सहता - मानसेच्छा ५२५ - मन की कृत्रिमेच्छा का निदर्शन 33 ५२६- कत व्याकत व्यविवेकशालिनी बुद्धि ५. २७ - हठात् निर्णय, और मन का स्वातन्त्र्य ५२८ - अर्जुन का क्षात्रधर्म्म, और युद्धप्रवृत्ति ५२६'न योत्स्ये ' का संस्मरण ५३० - बुद्धियोगाश्रय, और युद्धारम्भ ५११ विजयभूति श्री की अवाप्ति और हिंसात्मक युद्धक ३२- ' दया ' का दयनीय स्वरूप , ५३३ - सम्यक संकल्प का स्वरूप - निदर्शन ५३४- सम्यक संकल्प काम, और बुद्धियोग स्वस्य च प्रियमात्मनः ' का ४३५ ( क ) स्वस्य च वैज्ञानिकस्वरूप समन्वय ७४२ " " ५३५ ( ख ) मानसिक - स्वातन्त्र्य की अनर्थपरम्परा ७४३ " ५३६ - ' स्वस्य ' का वास्तविक अभिप्राय " " ५३७ ' मनमाया ' और स्पस्य च ' " 19 ५३८- शास्त्रीयवचन और मन का स्वातन्त्र्य " " ५१२ शास्त्रस्वाध्यायादि से अनुगत विज्ञानचल 17 ५३६ - ऐहलोकिक दृष्टिकोण " " " 27 ५४० - जीवधारीवर्ग और मनुष्य " 3 ५१४- सिद्धावस्थापन प्रशानमन ५१५ - साध्यभावानुगता विज्ञान बुद्धि ५१६ - तप्रधान मन का निम्नगामित्त्व ५१७ विज्ञानशासन से पृथगभूत त मन का श्रसत्यपथानुवर्त्तित्त्व " } ५१८ ऋतमूलक श्रनृतभाव, और श्रापतन ५१६ विज्ञानसारथि और हमन " 93 ४२ ५४१- मानवसमाज की स्वस्थता और विश्वशान्ति ५४२ - शरीरचिकित्सा और प्राणी वथ ५४३ - वर्तमान चिकित्सापद्धति और , पशुप्राणोत्पीड़नानुगत इओन ५४४ - वैशनिकी हिंसा की अहिंसारूपता 39