Shatpath Brahman 1 2 — पृष्ठ 191–200

शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - १-२ - मोतीलाल शास्त्री · पृष्ठ 191–200

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शतपथब्राह्मण २ ख एड ६०७ - ' व्रजं गच्छ गोष्ठानम् ' का तात्विकस्वरूप-८३५ ६३ - परमेष्ठी के वारुणमण्डल, और सोम-मण्डल रूप दो मेद ६३६ - उभयलोक के माध्यम से तथ्य का समन्यय ८३६ „ समन्वय ६०८ वर्षतु ते यो ' का समन्वय " ६०६ भू प्रदेश पर प्रोक्षणकर्म 11 ६१० - प्रोक्षणकर्म्य का रहस्यात्मक समन्वय ८३६ ६४० - ऐन्द्रवायुमय आपोलोक, तथा वरुण-मय आपोलोक का समन्वय " ६११ लावरोधक नमुचि - असुर ६१२- पुरोपात मेघविद्युत् स्तनयित्नु का समन्वय, और दृष्टि ६१३ - सोम की श्रद्धारूप में परिणति ६ ४ - श्रद्धा की पर्जन्यरूप में परिणति " ६१५ - पर्जन्य की वृष्टिरूप में परिणति " ६१६ - द्य लोकानुगता वर्षा, और प्रोक्षणकर्म " } ६१७ - क्षत - विक्षत - सन्धाता प्रोक्षणकर्म ६१८ - तस्मादाह - वर्षतु ते द्यौः ' का वैज्ञानिक-समन्वय तिभाग का निदानात्मक असुर ६१६ उकर का निदानात्मक गोधानस्व ६२० लोकालोकस्थान का स्वरूप - दिग्दर्शन ६२१- आत्मद्दननरूप महापाप ६२२- ये के चात्मनो जनाः " ६२३ - अभिचारकर्म्म, और तदपवाद ६२४- असुर का लोकचतुष्टयी से पराभव ६२५- ' तमतो मा मौक ' १२६- अतिविरोधा ६२७ तिविरोध का निराकरण ६२८ - वातव्याधि का प्रवर्तक वारुणवायु ६२६ - व्याधिनिवर्त्तके शित्रवायु ६३० - वारुणवायु, और रोगप्रवृत्ति ६३१ - ऐन्द्रवायु, और रोगनिवृत्ति ६३२ - पुगेवात, और ऐन्द्रवायु ६३३ – नमुचिप्राण का स्वरूप - दिग्दर्शन ६३४ विद्या का संस्मरणा ६३५ - पारमेष्ठय तत्त्वत्रयी 11 " " " ६४१ - ऐन्द्रलोकात्मक देवलोक ६४२ - वारुणलोकात्मक असुरलोक ६४३ - मास्यरसोम का दिव्यलोकत्व ६४४- दिसोम का असुरलोकव ६४५ - पञ्चविंशति श्रदुर्गा के विभिन्न तात्त्विक नामों का संस्मरण ६४६ ' अप गम्भन्सीद ' का समन्वय ६४७ ज्योतिम्मय वेन से अनुगत दर्भ का -संस्मरण ६४८- दिक्सीम का स्वरूप - समन्वय ८३७ ६४६ रूपात्मक वैष्णवयश " } 39 99 19 " " } ८३८ ६५० मास्वरसोम त्मक श्रम दिव्य लोक ६५१ – ' पृथिव्यन्तरिक्षंद्यौर्दिशः ' का तात्त्विक स्वरूप- समन्वय ६५२ - स्तोमा मुगल- लोकसंस्मरण का परिक्षेल के द्वारा समन्वय ६५३- वज्रप्रहार के द्वारा अमुरों का पञ्चम लोक में प्रक्षेप ६५४ - द्वितीय प्रद्दारकम् का तात्त्विक स्वरूप-समन्वय ६५५- ' श्वररु ' नामक सुप्रसिद्ध असुरप्राण के वैज्ञानिक स्वरूप का समन्यय 17 17 ८४० " " " " 39 ६५६ - श्रररु, औरर मन्त्रश्रुति 19 31 " " ६३६ तत्त्वत्रय के चार धिक्त ' ८३१ ६३७ साम्बसदा शिववायु 29 ६३ ६५७ - द्रप्सरूप असुर ६५८ - पृष्टिबिन्दु की असुररूपता ( श्रतएव तद हसनीयता ) ६५६ - प्रकाश, और ताप का देवत्व, श्रतएव तत्सदनीयत्व ६६० - वृष्टिजल की असह्यता

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६६१- ' द्रप्स ' शब्द का रहस्यात्मक पारिभाषिक-समन्वय ६६२ - हृदयत्रिन्दु, और पृषट्विन्दु ६६३ - स्तोक चिन्दु, और द्रान्सबिन्दु ६६४ - चिन्दु चतुष्टयी का तात्विक स्वरूप- समन्वय " ६६५ - यज्ञकर्म में अपेक्षिता श्रवधानता 17 ६६६- दैवात्मस्वरूप- सम्पादक यज्ञकर्म ६६७ - मानुषात्मा के साथ देवात्मा का अन्त-यम - सम्बन्ध, और दिव्यभावापत्र यज्ञक ६६८- यत् किञ्चित् असावधानी से इष्टसाधक भी यज्ञ के द्वारा महान् अनिष्ट की सम्भावना ६६६ - ब्राह्मणग्रन्थ- श्रौतसूत्र एवं गृह्यसूत्रानुगता-चिरन्तना पद्धतियों के समाश्रय से ही यज्ञ की इष्टसाधकता विषयसूची ८४२ " 11 ८४३ | ६७० - श्रभ्युदयसाधक यज्ञकर्म का वितान ६७ ९ -महर्षि तित्तिरि का एक प्रश्न ६७२ - महर्षि तित्तिरि के पूर्वपद्यात्मक विचार, और आज का बुद्धिवादी सुधारक ६७३- भूविशोधन के सम्बन्ध में श्रवधानता-त्मक प्रचण्ड - आदेश ६७४ - कुतर्कवादी की श्रापत्ति ६७५ - श्रापत्ति का निराकरण ३७६ - मानवप्रज्ञा की महत्त्व - हीनता ६७७- प्राणव्यापारात्मक दिव्य श्रदृष्ट कर्म्मात्मक यज्ञ ६७८ - शब्दे कप्रामाणिकता, और यज्ञकर्म्म ६७६ - अध्वर्यु के द्वारा भूविशोधन " ६८० वेदिखननप्रकारोपक्रान्ति इति - शतपथब्राह्मण - हिन्दी विज्ञानभाष्ये प्रथमकाण्डे द्वितीयाध्याये चतुर्थं ब्राह्मणम् द्वितीयप्रपाठके च द्वितीयं ब्राह्मणम् इति - वेदिकाकरणम् - वेदिस्वरूपसम्पादनंच तत्रादौ स्तम्बयजुर्हरणं, भू - विशोधनंच - १३ - * --८

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श्रीः अथ - शतपथब्राह्मण - हिन्दी - विज्ञानभाष्ये - प्रथमकाण्डे -द्वितीयाध्याये - पञ्चमं ब्राह्मणम् द्वितीय - प्रपाठके च तृतीयं ब्राह्मणम् १४ - वेदिपरिग्रहात्मकं - वेदिसम्पादनम् नामक क्रमप्राप्त १४ वें कर्म्म के विज्ञानभाष्य की ' विषय स्मारकसूची ' ( पृष्ठ सं ० ८४४ से ६५८ पर्य्यन्त ) १- प्रथमकाण्डान्तर्गत- द्वितीयाध्यायानुगत-तृतीय ब्राह्मण ( मूल ) पञ्चमब्राह्मण, एवं द्वितीयप्रपाठकानुगत-२- मूल ब्राहाण का अक्षरार्थसमन्वयात्मक-अनुबाद १३ - विज्ञान माष्योपक्रम ८४४ ८४८ ८६१ * देवासुरदाय विभागाख्यानरहस्य ४ - वेदिपरिग्रहाणात्मक पद्धतिप्रकरण का उपराम ५- वैदिक इतिहास - मर्य्यादानुगत किञ्चिदिव निवेदनीय ६ - त्रिसहस्र वर्षावधि, और ज्ञान - विज्ञाना-त्मिका वैदिक- परिभाषाओं की विलुप्ति 23 ७- तत्त्वात्मक वेद की पौरुषेयता, एवं-शब्दात्मक वेदशास्त्र की पौरुषेयता " ८६१ 19 ८ - रहम्यपूर्णा विज्ञानभाषा, स्तुतिभाषा, इति-हासभाषा, और वेदार्थसमन्वय ६ - विज्ञान - स्तुति- इतिहास - रूपा ज्ञातव्यत्रयी, और वेदशास्त्र १० - ज्ञान कर्म्म -उपासनारूप कर्त्तव्यत्रयी, और वेदशस्त्र ११ - तत्त्वमीमांसात्मक विज्ञानप्रधान मूलवेद-शास्त्र का ज्ञातव्यस्व समन्वय १२ - तूलषेदशास्त्रात्मक कर्त्तव्य वेदशास्त्र की मूलप्रतिष्ठा, और ज्ञातव्य वेदशास्त्र १३ - मूल वेदकाण्ड, और तूलवेदकाण्ड का स्वरूप समन्वय १४ - आचारनिष्ठात्मिका कर्त्तव्यनिष्ठा, और तत्प्रतिपादक - ' कर्त्तव्यवेद ' ६५

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१५ - मन्त्र और ब्राह्मणात्मक ज्ञातव्य तथा-कर्तव्य भावापन कास्न वेदशास्त्र का तात्विक स्वरूप समन्वय १६ - वैदिक -- इतिहास के सम्बन्ध में आपात-रमणीय प्रश्न १७ - ' सर्वं वेदात् प्रसिद्धयति ' का संस्मरण १८- देवासुरदाय विभागाख्यान के माध्यम से एक ऐतिहासिक तथ्य का दिग्दर्शन - प्रयास 73 १६- मताम् | अस्वा चाप्यवधार्यताम्!! 33 २० वैदिक इतिहास के लेखन की अद्भुत शैली और साधारण मानवों की भ्रान्ति २१- वैदिक शब्दों के रहस्यात्मक समन्वय २२- मान बुद्धिवादी वेदप्रेमी, और उन का निष्कैवल्य - अध्यात्मवादाभिनिवेश २३ निष्केवल्य आधिदैविक - चरित्रों के अमि निवेश से अभिनिविष्ट आज के कतिपय वेदव्याख्याता २४- मानवचरित्रात्मक इतिहास के सम्बन्ध में भारतीय विद्वानों की महतो भ्रान्ति २५ - सर्वथा ऋजुभावापान भी वेद का अस माधेय- प्रश्नावलिव २६ - प्रोक्षणब्राह्मणानुगत आख्यान के माध्यम से निश्चित सिद्धान्त का स्पष्टीकरणा २७- अष्टविध आख्यानों में से विशेष त्र्यात्मक श्राख्यान का संस्मरण २८- इति श्रधिदेवतम् २६ - इति नु - अध्यात्मम् ३० - इति नु अधिभूतम् ३१- चयन यशानुगत इसका चितिकरण और इतिहास का समन्वय ३२ - चरित्रत्रयानुगता व्याख्यान भाषा २३ भाषाशैली की आत्यन्तिक दुरूता ३४- चरित्रप्रयत्मक वैदिक आख्यान ३५ विरुद्ध भाषानुगत विषयसूची ८६२ ८६३ " " II ८६४ २६- पौराणिक आख्यानों के सम्बन्ध में अश जनीं की महती भ्रान्ति ३७ - विज्ञान प्रधान वेदशास्त्र ३८ - इतिहासप्रधान पुराणशास्त्र ३६- पुराणाख्यानानुगत गुहानिहित - विज्ञान-तव ४० - पौराणिक गयाख्यान का संस्मरण ४१ - अगस्त्याख्यान का वैज्ञानिक स्वरूप-दिग्दर्शन ४२ - पुराण के द्वारा मानवचरित्र की मध्य-स्यता और विज्ञान का प्रतिपादन ४२ - पुराणशास्त्र के प्रति ज्ञजनों के आक्षेपं, और कथावाचकों की कृपा का दुष्परिणाम ४४- पौराणिक महत्त्वपूर्ण तत्त्ववाद का साई -शिक - दिग्दर्शन ८६५ ४५ - कथाव्पा से व्यासगद्दी से को कलङ्कित करने वाले श्राज के ये कथावाचक ४६. पुराणस्पर्श में भी अनधिकृत धान के ये लोकवञ्चक कथावाचक ४७ – कथावाचकों के पुराणकथाओं के सम्बन्ध में अनर्गल प्रलाप ८ भीमस्वर्ग और देवयवस्थाका संस्मरण 1 ४६ - प्रजा की श्रद्धा का उत्तरोत्तर अभि-भव और अनमिश कथावाचकों की कृपा के कुफल ५० सक पुरावालोचनोपराम ५१ वैदिक आख्यानों से अनुगत अानुषविक मानवचरित्र ५२ - विशेष शब्द, और इतिहासाभिव्यक्ति ५३ – ' श्रौक्ष्णैश्चर्म्मभिः ' और इतिहास ५४'तंत्र्यङ्गलेऽन्यविन्दन् ' और इतिवृत्त ५५ - के वयं ततः स्याम ' और इतिहास ५६ श्राधिभौतिक ( ऐतिहासिक ) चरित्र का समथन ८६४ 19 " 1 " " ६६

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शतपथब्राह्मण २ खराड ५७ - प्राध्यात्मिक चरित्र के समर्थक कपिपय ८६५ वाक्यों का समर्थक * * K * आख्यानानुगत - श्राधिदैविक रहस्य ( ऐतिहासिक - रहस्य 22 ५८ - दायविभाग, र ऐतिहासिक दृष्टिकोण = ६६ ५.६ -- भौमत्रिलोकी, और इतिहास 49 ६० - मनुष्यदेवताओं के द्वारा वैधयज्ञों का सम्पादन ६१- भौम - असुरत्रिलोकी, और असुरों के आक्रमण ६२ - भौम मानव - चन्द्रमा के द्वारा असुरबल 23 " को प्रोत्साहन, एवं देवबल का अभिभव ८६७ ६३ - सूर्य्यसदनात्मक विज्ञानभवन, और देवबल " " ६४ -- इन्द्राजु'न - मैत्रीप्रसङ्ग, और इतिहास ६८- तक्षक - इन्द्र - मैत्री,, ६६ - युधिष्टिर का स्वर्गगमन ६७-- भौमस्वर्ग, और देवव्यस्था का संस्मरण " ६८ -- मय - वृत्र - नमुचि - त्रल - तार - तूर - विद्युन्माली-किलात - श्राकुली- श्रादि ग्रसुरजातियाँ, और ऐतिहासिक दृष्टिकोण ६६ - सुसभ्या ' मय ' नाम की सुरजाति ७० - शिल्प, तथा ज्योतिष में पारङ्गत मयासर-जाति 31 ७१ - वर्त्तमान ज्योतिष, और वराहमिहिर ७२ - वराहमिहिर, और मयासुर ७३ - मय के द्वारा नवीन चन्द्रमा का निर्माण " ७४ - इजिप्त प्रान्त का प्रचण्ड अग्नि - विस्फो-टन, और भूगर्भ में तद्विलयन ७५ - ईश्वरीय सृष्टि के साथ प्रतिस्पर्द्धा के भीषण परिणाम ७६ – ईश्वर निष्ठाशून्य - ज्ञानवञ्चित विशुद्ध भूता-त्मक विज्ञान के द्वारा अन्ततोगत्वा सर्वनाश " " " " 22 29 ७७ - वर्तमान भूतविज्ञान, और सर्वनाशो-पक्रम ७८ - श्रासुरशास्त्र, और वर्त्तमान ज्योतिष ७६ - बब - बालव आदि आसुरीभाषा के शब्द ८० - श्रवकड्ड चक्रात्मिका मयासुरभाषा, और ' होडाचक्र ' ८१ - वर्त्तमान जन्मकुण्डलियों का विपरीत-भाव, और श्रमुरधर्मं " ८२ - सूर्य्यपरिभ्रमण, और भूपिण्ड स्थिरत्वा-नुगता श्रासुरीदृष्टि, तथा वर्त्तमान ज्योतिःशास्त्र " " ८३ - वेदाङ्गज्योतिष का संस्मरण ८४ -- इष्टकाचितिसन्धान, और वेदाङ्गज्योतिष ८५ - वेदाङ्गज्योतिष से अनुगता ग्रहसंस्था का प्रकृतिसिद्धक्रम ८६ - भूपिण्ड, और सूर्य की स्थिति का समतुलन ८७- परमेष्ठी के चारों ओर सूर्य का परिभ्रमण ८६८ 11 " " 21 " 19 19 II - सूर्य के चारों ओर भूपिण्ड का परिभ्रमण " -सूर्यका आपेक्षिक स्थिरत्त्व, एवं तत्-सम्बन्ध में श्रुतिवचन ८६६ ६० - भचक्र का विचालित्त्व, और श्रासुरी दृष्टि " ६१ - फलितज्योतिष का समन्वय, और स्थिर-चर - विमर्श ६२ - वैदिक विज्ञानदृष्टि, और भूः, तथा सूर्य्य-दोनों का चरत्त्व ६३ - मयासुरजाति की विद्वत्ता का संस्मरण II ६४ - मयासुर के द्वारा पाण्डवसभाभवन का निर्माण और तन्मूलक महाभारतसमर ६५ - पृथिवीलोकानुगता मानवविधा देवासुर-व्यवस्था का संस्मरण ६६ - अष्टविध देवताओं का सिंहावलोकनात्मक संस्मरण | ६७ - भूपिण्डानुगत उत्तरीगोलार्द्ध ', और देवता ६७ 29 27 ८७० 27 " "

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६८- दक्षिण गोलार्द्ध ', और असुर ६६- शान्तिप्रिय देवता १०० - दुष्ट बुद्धि असुर १०२ - भौगोलिक - व्यवस्था का उपक्रम १०२ - आर्यावत्त, और पूर्व - पश्चिम समुद्र १०३ - श्रर्थ्य और दस्यु १०४ - पश्चिम समुद्र, और महीसागर विषय सूची " " " 1 " १२७ - भारतीय सीमाप्रसङ्ग के सम्बन्ध में भारतीय दृष्टिकोण का स्पष्टीकरण १२८-- पाद्मभुवनकोश का स्वरूप संस्मरण १२६- पुराणशास्त्र के प्रति कृतज्ञता र्पय १३० - पुराण के १८ विषयों में से ' भुवनकोश ' ( भूगोल ) का संस्मरण १३१ - ब्राह्मपुराणानुगत पाद्मभुवनकोश की स्मृति १३२ - भूगोलविद्यानुगत - प्रथम सप्तक " ८७२ " " १०६ - रक्त समुद्र, और रेड्सी १०५ - महीसागर, और मेडि नियेन्सी 33 27 १३३-" द्वितीय सप्तक " " 2 १३४--तृतीय सप्तक १०८ - निरक्षवृत्तानुगत लङ्काद्वीप १३५ - सप्तद्वीपा वसुमती से अनुप्राणित सात ८७३ १०७ - पीतसमुद्र, और यलोसी १०६ - सिंहल, और सीलोन ११० - सीलोन से अनुग़ता लङ्का भ्रान्ति १११ - देशान्तर के माध्यम से शङ्कानिवृत्ति ११२ - दक्षिण समुद्र, और भारत की दक्षिण सीमा 33 ११३ - पूर्व समुद्रानुगता पूर्वमीमा ११४ - पश्चिमसमुद्रानुगता पश्चिमसीमा ११५ पश्चिमसमुद्र, और शर्बतीर्थ ११६ -- भारताग्नि की सत्ता, और भारतवर्ष ११७-- भारतीय सीमा की विस्मृति १ ९८- भारतीय विद्वानों की सुषुप्ति, और व्यर्थ का वाक्कलह ११६ -- विद्वानों का वाक्कलह रूप पौरुषेय पौक--विवाद १२० - सीमास्वरूप का बोधाभाव १२१ - पाश्चात्य विद्वानों की स्वार्थदृष्टि १२२ - भारतीय विद्वानों की सुषुप्ति १२३ - स्वतन्त्र विचारश्रवण में भी असमर्थ भारतीय विद्वद्गण १२४ - दक्षिणा - प्रलोभनानुगत समन्वय, श्रीर व्यर्थ का वादविवाद १२५ - वेद की अपौरुषेयता की मान्यता, और वेदार्थ - निज्ञासा १२६ - राजनैतिक - स्वार्थलिप्स प्रतीच्य विद्वानों से किञ्चिदिव निवेदन द्वीपों का नाम स्मरण १३६ - सप्तसमुद्रों से युक्त सप्त महाद्वीप १२७ -- काञ्चनीभूमि, और लोकालोक १३८ -तम, और अण्डकटाह " " 13 ८७१ " ६८ १३६ - महापृथिवी, और द्वीप - समुद्रादि १४० -- मण्डलरूपा महापृथिवी के सात समुद्रों अपरिचित लार्डमेकाले महोदय की महती भ्रान्ति, और तन्निराकरण " १४१ - सौरब्रह्माण्ड की सीमा, और भूपद्म " १४२ - पार्थिवपुष्करद्वीप में प्रतिष्ठित सौर-हिरण्यगर्भ - ब्रह्मा १४३ - पुराणोक्त सप्तद्वीप - स्वरूप - दिग्दर्शन १४४-- सप्त - समुद्रों का नाम संस्मरण १४५ - सप्त वायुस्तरों का नाम संस्मरण १४६ - सप्त - लोकों का नाम संस्मरण १४७- सप्त पातालों का नाम संस्मरण १४८ - ' पाताल लोका: - पृथिवी - पुटानि ' १४६ - पोमय तीन पुर १५० अग्निमय तीन पुर १५१ --- केन्द्रीय ब्राह्मपुट १५१ - मेरुरूप स्कम्भ १५३ - भूगर्भस्थ प्रजापति १५४- हृदयरूप भौमप्रजापति " 33 III " } " " 33 27 " 23

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१५५ -- शेषनाग का फगा, और भूपिण्ड १५६- क्रान्तिमण्डलपृष्ठीय केन्द्रभूत कदम्ब १५७ - सुमेरु और कुमेरु का संस्मरण शतपथब्राह्मण २ खण्ड १५८ - सप्न श्रावरण नामक नरकों का नाम दिगदर्शन १५६ - नरकलोकात्मक सात आवरणलोकों के नक्षत्रमेदानुचन्धी २८ अवान्तर नामों का दिग्दर्शन " " १६० - पुराणप्रसिद्ध ८४ नरक, और नक्षत्र-कक्षात्रयी १६१ - ' अपि च सप्त ' से श्रनुगत सप्त नरक १६२ - सुर्य्यलोकात्मक नरक १६३ - सप्त - श्राकाश नामक स्वर्गों का नाम १६४ - सप्तदेवानुगत सप्त - स्वर्ग १६५- अनावृतभावात्मक स्वर्ग की ' आकाश ' की श्रभिधा का समन्वय १६६ - कुलगिरि, शाखागिरि, यदि अष्टविध प्रमुख पर्वत - विभाग " " १६७ - महेन्द्र - मलयादि सप्तविध कुलपर्वत १६८ - पाद्मभुवनकोशानुगता नदियों का संस्मरण 39 १६६ - भारतवर्ष की विविध नदियों का नाम सस्मरण १७० - त्रिसहस्रवार्षिकी दासता, और स्वराष्ट्रीय-गौरव की विस्मृति १७१ - समुद्र - सागर - उपसागर - सर - पल्लव- श्रादि का संस्मरण " १७२ - अरण्य - उपवन - आराम - वाटिका - निष्कुट-यादि का संस्मरण १७३ - विविध श्राकरों ( खानों ) का संस्मरण १७४ - पुरी- पत्तन - महानगर - नगर - ग्राम - खरवट-उपनिवेश - देश - पुर - आदि का संस्मरण " " १७५ - पुर और पुरी आदि नामों का पारि--भाषिक समन्वय १७६- मत्स्य कुमुद्माल्य आदि मध्यदेश ८७५ " " ८७६ " 22 " ८७७ " ८७६ " १७७ - वाहीक - कालतोयद यदि उदीच्यदेश १७८ - ग्रन्ध - वामकुङ्क - श्रादि प्राच्यदेश १७६- पूर्णं- केरल - गोलांगूल आदि दाक्षिणात्य-जनपद १८० - लोल - ताल कर आदि अपरान्तजनपद १८१ - मलज - कर्कश श्रादि विन्ध्यवासी जनपद १८२ - कुरु तुङ्गण- आदि पर्वताश्रयी जनपद ECO 33 " " " " 1 " पाद्मभुवनकोशस्वरूपदिग्दर्शनम् ( पृ ० सं ० ८१ से ६०६ पृ ० पर्यन्त ) १८३ - भूगोल विद्या, और पौराणिक भुवनकोश ८५१ १८४ - पुरातन स्थिति का संस्मरण " १८५ - अभिजित् - नक्षत्ररूप ध्रुवालक - पुरातन-काल १८६ - भूपद्म की कर्णिका, और सुमेरु १ १८७ -सुमेरुकज्ञानुगता चन्द्र - सूर्य - कक्षाओं का संस्मरण १८८- पुराणदृष्टय । चन्द्रमा का सूर्य्य से ऊर्ध्व-स्थितत्त्व १८६- पुराणानुगत ज्योतिष्चक्रात्मक - खगोल, और तन्मूलाधारभूत मेरु १६० - पुराण की रहस्यपूर्ण परिभाषाएँ १६१ - उत्तरध्र वप्रदेदशात्मक - सुमेरु प्रदेश १६२ -- वत्तु Ö लभूपिण्ड का खस्वस्तिकबिन्दु १६३ – खस्वस्तिक, और उत्तरध्रुव १६४ - श्रध: स्वस्तिक, और दक्षिणध्रुव १६५ -- खस्व स्तक, और सुमेरु १६६ - अधःस्वस्तिक, और कुमेरु १६७ -- सुमैरु - कुमेरु - रूप भूपिण्ड १६८ - विष्वखाधार पर भूपिएड के दृश्य-दृश्य - रूपेण दो विभाग १६-- उत्तर - गोलाद्ध ', और विष्वदखा २०० -- दक्षिण गोलाद्ध ', और विष्वद्रेख । 23 29 " 2 " " 27 5 " ८८२ " 23 ६६

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२०१-- पौराणिक - भूगोल की अध्ययनाध्यापन-परम्परा की विलुप्ति, और हमारी कठि-नता, तथा श्रज्ञता २०२ - पाश्चात्यों की मध्यरेखा ग्रीन्वीच २०३ - भारतीयों की मध्यरेखा - उजैन २०४ - भूगोल शिक्षणानुगत - पारिभाषिक अस्सी-पूर्वी देशान्तर " " २०५ -- भूमध्यरेखानुगत ३६० ध्रुवप्रोतवृत्त " " २०६ - मेरु प्रोतवृत्तात्मक वप्रोतवृत्त २०७ - प्रथममध्याह्नरेखा, एवं भूमध्यरेखा २०८ - भूमध्येरेखा, एवं विष्वद्वृत्त २०६ - उत्तरी गोलाद्ध का ( दृश्यक्षितिज का ) भूभाग २१० - दक्षिणी गोलाद्ध का ( ग्रहश्यक्षितिज का ) भूभाग ( पाश्चात्य भूगोलविद्यानुगत ) २११ -- क्षेत्रकलानुगत गोलाइन्टिग् २१२ - श्रर्वस्तानादि पूर्वी रूसान्त भूभाग, और एशिया- प्रदेश २१३ - उपद्वीपात्मक एशियायी - खएड २१४- भारतीय उपद्वीपसंघ की प्रतीच्या अभिवा २१५ - पारचायों की मूगोल व्यवस्था की आधार भूमि- राज्यशासनपद्धति " २१६ - राज्य सीमा की वृद्धि, तथा हास के अनु-पात से प्रतीच्य भगोल -व्यवस्थाओं में सामयिक परिवर्त्तन २१७-- प्रतीच्यदेशाभिमता स्थिरा भगोल-व्यवस्था २१८ - भारतीय - भूगोल व्यवस्था की प्राकृतिकता, एवं कल्पान्त - स्थिरता २१६-- प्रजापतिप्रदत्त भारतीय दायभाग, एवं तत्समर्थक भारतीय प्राच्यसाहित्य २२०- भारतवर्ष की वर्त्तमान स्वरूप- इयत्ता, और महान् श्राश्चर्य्य 31 " " " 27 21 विषयसूची " 21 31 " २२१-- प्रतीच्य - राजनैतिकों की तर्काभास परम्परा, एवं तन्मूलच्छेद ३२२२ - वञ्चकों की प्रतारण का सम्यक् निराकरणा २२३ - राज्यशासनानुगता देशविभागव्यवस्था 37 २२४- ' शासनकृत विभागात्मक एक प्रकार 93 २२५ -- परिवर्तनशीला - भौगोलिक व्यवस्था, और राज्यशासन २२६ - वर्मा, और भारत का पार्थक्य २२७ -- गन्धार, और भारत का पार्थक्य २२८ - पश्चिम भारतवर्ष, और अफगानिस्तान " २२६-- भारतवर्ष की अत्यल्पता, और ' हिन्दु-स्तान ' नाममात्र में संकोच २३० - गणितानुगता - भूगोलव्यवस्था २३१ - गणितानुगता मान्या व्यवस्था २३२- प्रकृतिसिद्ध गणितानुगत भारतवर्ष २२३ - दिग्देशकाल का महान् व्यामोहन २३४ - प्रगतिशीला के मामयिक उद्गार २२५ श्रन्न - वस्त्र की चिन्ता के चीत्कार से संत्रस्त प्रगतिशील भारतीय मानव २३६ - उदरचिन्ता की महामारी से संत्रस्त-भारतराष्ट्र २३७ - रोग का वास्तिविक निदान २३८ - ज्ञानशक्तिबल से वञ्चित भारतराष्ट्र की पशुरूपता २३६ - उच्छिष्टज्ञानरूप प्रवभाग, र पशु-सृष्टि का सन्तोष २४० - स्त्रशिक्षा - संस्कृति शून्या - पशु - वृत्ति, और भारतीय प्रज्ञा का निरतिशय - पारतन्त्र्य 13 २४१- भोक्त भाव की स्वरूपनिष्पत्ति, एवं ग्रात्म-बलाराधन २४२- श्रात्मबलानुगता स्वसंस्कृति, स्वसाहित्य, एवं स्वसम्यता २४३ - स्वविभूतियों के तिरस्कार से भारतराष्ट्र का सुनिश्चित सर्वनाश ८८४ 19 19 " ८८५ " 33 " 29 " " 19 21 ८८६ " " 19.

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शतपथब्राह्मण २ खण्ड २४४ -- राष्ट्र का मौलिक प्रारूप - मौलिक साहित्य ८८६ २४५ - स्वतन्त्रता, और परतन्त्रता की स्वरूप-परिभाषा २४६ -- ' भारतीयत्त्व ' की अक्षुण्णता, तदनुबन्धिनी प्रगति का समादर २४७ - राष्ट्र के जीयनीय स्रोत २४८ - भारतीय साहित्य की सर्वरूपता 29 और २४६ -- वर्त्तमान भावुक - प्रगतिशीलों का प्रश्ना-भास, और स्वतः ही तत्समाधान " २५० - श्राजके भारतवर्ष का स्वरूप - दिग्दर्श-नोपक्रम २५१- सभ्यता, वर्णश्रम, लोकविभाग आदि के प्रथम - प्रवर्त्तक- भगवान् प्रजापति २५२ - भपिण्ड की - ' कमल ' रूप में मान्यता २५३ - भरूप पद्म के चार पत्र २५४ - प्रत्येक पत्र ६० अंशात्मक " ८५७ 23 २६५ - चतुद्दल कमल की अष्टदल कमलरूप में परिणति २६६ - ब्राह्मभुवनकोशानुगत अष्टदलकमल २६७ - विष्वद्धरातल, और मेरुदण्ड का परिमाण २६८ - भारतवर्ष, किंपुरुषवर्ष, और हरिवर्ष २६६ - रम्यकवर्ष, हिरण्मयवर्ष, और कुरुव २७० - पूर्वस्थित भद्राश्ववर्ष २७१ - पश्चिस्थित - केतुमालवर्ष २७२- मेरुप्रदेशानुगत इलावृतवर्ष २०३ - नववर्षात्मक भवनकोश २७४ - सर्वेषामेव वर्षाणां मेरुरुत्तरतः स्थितः २७५ - ‘ उत्तरत: -स्थितः ' का पारिभाषिक - समन्वय २७६- ऊर्ध्व - उत्तर - ऊँचा - केन्द्र " " २७७ - अधः - दक्षिण -नीचा परिधि " २७८ - नवसहस्रो जनात्मक इलावृतवर्ष 11 " " 99 २७६ - पूर्वानुगत चैत्ररथ नामक महावन 11 " " २५५ - श्रापो वै पुष्करपर्णम् और भूपद्म,, २५६ - पद्ममुलक भूगोल, और पाद्मभुवन-कोश " २५.७ – मेरुस्थित - हिरण्यशृङ्गपर्वत पर प्रतिष्ठित प्रजापति २५८ - स्वर्गीय श्रीबालगङ्गाधर तिलक की मान्यता के सम्बन्ध में नीरक्षीरविवेक २५६ - श्राय्र्यप्रतिष्ठा भूमिरूप- सुमेरु २६० - ' सुमेरु स्थान से आय्यों का आगमन ' इस श्रंश का प्रतिवाद २६१ - सुमेरु के आधार पर उपकल्पित- उत्तर-दक्षिण - पूर्व - पश्चिम में ६०-६० अ ंशा-त्मक चार भूखण्ड २६२ - पद्मपुराण के कतिपय वचन, और पाद्म-भुवन २६३ - सूय्य सिद्धान्तानुगत - भूगोलाध्याय, और तन्निबन्धना भूगोल व्यवस्था का संस्मरण २१४- पत्रात्मक चार खण्ड, और चार ' वर्ष ' २८० - अरुणोदय- नामक महासर २८२ - दक्षिणानुगत- गन्धमादन पर्वत २८२ - मानससर नामक महासर २८३ - गन्धमादन, और नन्दनवन २८४- पश्चिमानुगत - गै भ्राजवन नामक महावन 31 २८५ - सितोद - नामक महासर " २८६ - असितोद, और शीतोद " " III २८७ - उत्तरानुगत - सवित्रवन नामक महावन २८८ - महाभद्र नामक महान सर २८६ – पार्थिवस्वर्ग का स्वरूप - दिग्दर्शन २६० - मेरु की दक्षिण सीमा से अनुगता हिम-वान्- हेमकूट- निषेध - नामकी पर्वतत्रयी " " २६१ - उत्तर सीमानुगत -- नील - श्वेत - शृङ्गवान् -नाम की पर्वतत्रयी २६२ - पादपर्वतों से अनुगत कुलपर्वत " " २६३ - शाखाशैलों का संस्मरण ७१ " " " " 27 , ८६० " " 97

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२६४ - नवविध वर्षपर्वतों का नाम संस्मरण, एवं तत्सम्बन्ध में वचन २६५ -- श्रृष्टदलकमलात्मक - पद्मभुवनकोश - परि-लेख ( ८८, ६० के मध्य में ) २६६ - मेरुस्वर्ग की सीमा के सम्पादक चार विष्कम्भ पर्वत २६.७ - कदम्ब जम्बु- विप्पल - बट नामक सुप्रसिद्ध चार भौमस्वर्गीय - वृक्ष, एवं ' केतुवृक्ष का संस्मरण २६८ - स्वर्गपरिचायिका केतुवृक्षचतुष्टयी 29 २६– दक्षिणस्थ - गन्धमादन पर्व पर प्रतिष्ठित केतुरूप जम्बुवृक्ष, और ' जम्बुद्वीप ' ३०० - भारतवर्ष, और जम्बुद्वीरानुगत- भरत-३०१ - जम्बु, और जम्बुनद ३०२ - जम्बुनद, विषयसूची ३२० -- सौवीररूप इन्द्रराष्ट्र, और न्यूसाइवीरिया = ६३ ३२१ - इन्द्रप्रदेश, और अपराजितादिक ३२२ - ब्रह्मप्रजापति की कान्तिमती सभा ३२३ - बाराष्ट्र - प्राग्ज्यौतिष ३२४ - मद्रगिरि - चन्द्रगिरि के मध्य में निवास करने वाले भौम विष्णु ८६१ ३२५ – सुमेरु मध्यस्था ब्रह्मपुरी ३२६ - ब्रह्मा, और विष्णु की विराट्उपाधि 33 ३२७- राजा, और सम्राट् उपाधि " 19 24 :::: :) 11 ३२८ - असुरद्वेषी भौम - विष्णु ३२- श्रन्नापहरणकर्ता वराहासुर ३३० -- असुरों के अमुरत्व का पारिभाषिक-स्वरूप- समन्वय ३३१ - असुरत्रिलोकी, तथा देवेत्रिलोकी का संस्मरण " " रूप - दिग्दर्शन स्वरूप -और जाम्बुनदमुत्र 11 ( १ ) - मेरुत्रिलोकी का ३०३ - सुमेरु की पारिभाषिकी सुवर्णरूपता " ३३२ - मेरुाबन्दु का संस्मरण ३०४ - अचला - मेरुबिन्दु " 2 ३३३ - मेरुप्रदेश का परिवर्तन ८६४ " " ३०५ - जाम्बुदसुवर्ण का यशोवर्णन 21 ३३४ -- पार्थिवपरिभ्रमणमार्ग " ३०६ - के सरपर्वतों का संस्मरण ३३५ - क्रान्तिवृतीय पृष्ठी केन्द्र की कदम्ब - रूपता " 1 ३०७ - अष्टविधमर्यादापर्वत 31 19 ३०८ - प्रशान्त महासागरात्मक - पूर्व समुद्र " " " ३०६ - पश्चिमसमुद्र ( मेडिट्र नियेन्सी ) ३१० - पञ्चचतुष्टयी रूप २० केसरपर्वतों से श्रनुप्राणित परिलेख ३११- देवयुग, और नीतितन्त्र की प्रमुखता ३१२ - देवयुग, और राजतन्त्र का गौणत्त्व ३१३ – नीतितन्त्र के सञ्चालक लोकपाल ३१४-- राजतन्त्र के सञ्चालक स्वयम्भू- मनु ३१५ -- श्रापोविभागाध्यक्ष मौम - वरुण ३१६ श्रोषधिविभागाध्यक्ष - भौम चन्द्रमा ३१७- समितिरूपाविचारसभा -३१८ – सम्राट, और स्वाराट् - उपाधियाँ ३१६ - सुधर्मा नाम की इन्द्रसभा " 1 F? " 31 ३ ३३६ – ' नाक ' नाम से प्रसिद्ध विष्णुपद ३३७ - विष्वद्वृत्तीय- पृष्ठीकेन्द्र की ध्रुषरूपता ३३८ - उत्तराग्निस्थान की सुमेरुरूपता ३३– दक्षिणाग्निस्थान की कुमेरुरूपता ३४० - मेरुप्रदेश की स्थिरता अस्थिरता का श्राधारभूत स्थिर - चर - ध्रुव ३४१ -- देशत्यागानुगता मेरुचिन्दु ३४२ - हंसनक्षत्र, और अधः स्वस्थित ३४३ - अभिविन्नक्षत्र, और खस्वस्थिक ३४४ - अभिजित् कीघ्र वरूपता 13 ६४ 19 17 " 19 31 ३४५-- विश्वकर्म्मनक्षत्र, और आज का ध्रुव 29 21 ३४६- श्रमय, और ध्रुव 91 ३ ८७ – निस्वकारप्राणबिन्दु, और ध्रुव 19 ३४८ - ध्रुवपरिचायक नक्षत्र की ध्रुव - रूपता 33