Shatpath Brahman 1 2 — पृष्ठ 201–210

शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - १-२ - मोतीलाल शास्त्री · पृष्ठ 201–210

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शतपथब्राह्मण २ खण्ड ३४६ - ध्रुव की ध्रुवता, एवं ध्रुवशब्द - व्यवहार ८६५ का पारिभाषिक समन्वय " 3 ३५० – कदम्ब के चारों और परिभ्रममाण ध्रुव ३५१ - सप्तर्षिक्रम के सन्निवेश का संस्मरण ३५२ -- लघुसप्तक, और ऋक्षपत्नी ३५३ -- लघु - नक्षत्र सप्तक, और मन्त्रश्रुति का सस्मरण ३५४ - लघुसप्तर्षि ( ऋक्षपत्नी ) -परिचायक-परिलेख ३५५- ध्रुवपरिभ्रमणात्मक - बृहत् -- सप्तर्षि--परिलेख ३५६ -- ध्रुवपरिभ्रमण - निबन्धन - मेरुपरिवर्त्त'न ३५७ -- ब्रह्मनिवासस्थानानुगता मेरुबिन्दु ३५८-- मेहमूला - त्रिलोकी का संस्मरण ३५६ - निरक्षवृत्तानुगता ' लङ्का ' ३६० -- प्रथममध्य।हरेखा का उपक्रमस्थान ३६१ -- लङ्का, और सीलोन के अभेदव्यवहार की महती भ्रान्ति ३६२ -- सीलोन, और सिंहलद्वीप ३६३ - लङ्काद्वीप का सिंहलद्वीपात्मक सीलोन से सर्वथा पार्थक्य " ३६४ - लङ्क ।-- कोलम्बो - मद्रास -- उज्जैन - सिद्धपुर-कुरुक्षेत्र आदि देशों का स्पर्श करने वाली प्रथम मध्याह्नरेखात्मिका भूमध्यरेखा 39 ३६५ -- निरक्षदेशतः उज्जैन का परिमाण " ३६६--७६ अंशान्तरानुगता भारतीय- मध्य रेखा ३६७ - निरक्षतः उपक्रान्त मेरुपर्यन्त व्याप्त प्रदेश, और ६० अंश ३६८--२४-४२-२४ - भेद से ६० अंशात्मक प्रदेश का ब्रह्मा के द्वारा त्रिधा विभाजन " ३६६--२४ श्रंश, और मेरुमूला त्रिलोकी का पृथिवीलोक 93 ३७०-४२ अंश, और मेरुमूला त्रिलोकी का अन्तरिक्षलोक " } " " 23 27 ३७१-- २४ अंश, और मेरुमूला त्रिलोकी का द्युलोक ८६७ ३०२ -- आधिदैविक- त्रिलोकी " " ३७३ - श्रात्मगतित्रिलोकी ३७४-- श्राधिभौतिकी मेरुत्रिलोकी ३७४- मेरुम्ला- देवत्रिलोकी - परिलेख " 19 GEG * - २ - प्राङ मेरु ( पामीर ) मूला- देवत्रिलोकी * ३७५ - ' प्राङ मेरु ' का संस्मरण ३७६- प्राङ मेरुमूला त्रिलोकी का संस्मरण ३७७- एशियायी त्रिलोकी ३७८ - प्राङ मेरु - प्राग्मेरु - और पामीर ३७६ - विशद उच्च पठार, और पामीर ३८० - महाभूप्रदेशों का केन्द्रभूत पामीर ३८१ - पामीरतः दक्षिण भारतवर्ष ८६६ ३८२ - पामीरतः उत्तर - चीन " ३८३ - पामीरतः उत्तर- रूस " " " ८६७ ३८८४ - पामीरतः पश्चिम- तातार ३८५ - पामीरतः दक्षिण - पश्चिम अफगानिस्थान ३८६ - भौगोलिक - एशियाम्लण्ड, और पामीर ३८७ - पौराणिक त्रैलोक्य का मूलाधार-भूतप्राङ ्ममेरु ३८८ - मेरु, और प्राक्, तथा प्राङ मेरु ३८६ - मेरु, और उपमेरु ३६० - इलावृतवर्षावच्छिन्न मेरु ८६६ " " 9 " " " " " 37 " 19 23 19 " " " " " " ३६१ - तुरुष्करराज्य- समीपवर्ती - प्राग्मेद ३६२ - सर्वोच्चभाव का संग्राहक - ' मेरु ' शब्द " " 22 " ३६३ - श्रत्युच्चतर, और तारतर ३६४ - तारतर- तातार, और टारटरी ३६५- पामीरवाचक तारतर शब्द, और तुरुष्क ( तुर्किस्तान ) राज्य ३६६ - तारतर - तातार - और तातारी ३६७ - सीमाप्रकरण का संस्मरण ३६८- सुमेरुच्चांश ककुरु ३६- निरक्षदेशतः ६० अंशानुगत पामीर " " ६०० 29 33 33 ७३

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विषयसूची ४२५ - स्वर्गप्रदेश, और स्वर्गाध्यक्षेन्द्र का संस्मरण ६०१ ६०० " ४२६ - अग्निलोकात्मक भारतवर्ष ४२७- इन्द्रलोकात्मक - स्वर्ग प्रदेश 93 ४२८ - ऐरावतवर्ष, और इन्द्रलोक 19 " ४२६- मनुष्य मरुत् - देव- मेदभिन्न तीनों लोकों की त्रिविधा प्रजा " ४०० - प्राग्मेरु से पूर्ववाहिनी सीतानदी ४०१ - सीता, और चीनी भाषा की ह्राङ्हु ' ४०२ - ह्वाङह्य -याङ मी मेकाङ्ग - रूपेण त्रिधा-रात्मिका सीतानदी ४०३ - प्राग्मेरसे उत्तरवाहिनी भद्रानदी ४०४ - भद्रा, सोमा, और भद्रसोमानदी 39 ४०५ - श्रोवी - लीता इलीसा - रूपेण त्रिधारात्मका भद्र सोमानदी ४०६ - प्रागूमेरुतः पश्चिमवाहिनी यतुनदी ४०७ - यक्षु - चक्षु और एक्सस् ४०८ - प्राग्मेरु से दक्षिणवाहिनी - भारत -भाग्य-विधात्री अलकनन्दा ४०६ - पुराणानुगत चतुर्गङ्गम् ४१. - दक्षिणवाहिनी - अलकनन्दा की सात शाखाएँ एवं तन्मूलक ' सप्तगङ्गम् ' का संस्मरणम् सरस्वती, विष्णुपाताली, ४११ - वसोर्धारा, गरुडगङ्गाएँ, और अलकनन्दा ४१२ - भगवती - भागीरथी- त्रिपथगा ४१३ - हरिद्वार का ब्रह्म कुण्ड, और त्रिपथगा का भूतल से संस्पर्श ४१४ – स्वर्गश्री का उपहास 29 37 39 ६०१ 31 " " ४३० - अक्षांशानुपात से भौमत्रैलोक्य का स्वरूप समन्वय ४३१ - उच्छिन्नप्राया- त्रैलोक्य - व्यवस्था ४३२ - दायविभागानुगत खण्ड - प्राजापत्य-भारत की खण्ड - खण्डरूप में परिणति, और हमारा भावुकतापूर्ण निःसीम दुर्भाग्य " ४३३ - सुलेमान - हिन्दूकुश - किरथरकर - नाम की पर्वतत्रयी, और तदनुबन्धिनी हिन्दुस्ताना-नुगता सीमा ६०२ ४३४ - भारत, और हिन्दुस्थान - शब्दों की व्यापकता, और व्याप्यता 33 ४३५ - भारतीय सीमानुगता महती भ्रान्ति, और सिन्धुनद ४३६ - भ्रान्तिनिराकरण प्रयास ४३७–६० अंशात्मक वर्ष, और भारतवर्ष का वास्तविक स्वरूप 20 ४१५. - भौम - भुवनकोश का पृथिवीलोक 13 ४३८-६० अंशात्मक भारतवर्ष ४१६ - भारताग्नि, और भारतवर्ष ४१७ - मर्त्यलोक - मानुघलोक -भूलोक ४१८- इरावती, और शिवालक " ४३६-६० अंशात्मक - केतुमालवर्ष ४०--६० अंशात्मक - भद्राश्ववर्ष ४४१-६० अंशात्मक कुरुवर्ष 37 27 # 1 " " " 1 " ४१६ - इरावती, और रावी ४२० - श्रग्नि लोक, और भारतवर्ष ४२१ - राणावत, और अन्तरिक्ष लोक ४२२ - विद्याधर - सिद्ध - गन्धर्वादि - तिर्य्यग् जातियाँ, और अन्तरिक्ष ४२३ - वैभ्राजवन, चैत्ररथ वन आदि बिहार-भूमियाँ ४२४- वायुलोकात्मक अन्तरिक्षलोक " " ४४२ - स्वपरिभाषानुगता भारतसीमा 39 ४४३-- रक्तसमुद्र ( रेड्सी ) का संस्मरण " 3 39 ४४४ - महीसागर का भारिभाषिक- ' मही ' शब्द, और मही - लोकात्मक भारतवर्ष 23 99 ४४५ -लोकत्रयी का संस्मरण ४४६ - स्वत्वाधिकार की उपेक्षा " 2 ४४७- लक्षीभूत - भारतवर्ष " " 22 ४४८ - महीसागर, श्रौर मे डिड्रे नि येन्सी १०३ ७४

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४४६ - स्वेज नहर से अनुगत भूप्रदेश ४५० -- वणिक्तन्त्रों की संघर्षस्थली स्वेनकनाल ४५१ -- नीलनदी का सङ्गम, और महीसागर ४५२ --अबीसीनिया, और हब्स नामक पर्वत, और हतभाग्य- अबीसीनिया ४५३ -- भारतवर्ष की पश्चिमसीमा का दिग्दर्शन 93 ४५४-४५ श्रंशतः पूर्व पीतसमुद्र ( यलोसी ) " " ४५५ - फारमूसाद्वीपोपलक्षित- प्रशान्त महासागर, और भारतवर्ष की पूर्वी सीमा का दिग्-दर्शन " " ४५६ - दक्षिणसीमानुगत - दक्षिणसमुद्र ४५७- उत्तर सीमानुगत- तुरुष्क देश शतपथब्राह्मण २ खण्ड ६०३ " " " " " " ६०४ " 33 " " ८७०- भारतवर्ष, और भद्राश्ववर्ष से अनुगत द्विवर्षात्मक दृश्य गोलाद्ध ' ४७१ - कुरुवर्ष, और केतुमालवर्ष से अनुगत द्विवर्षात्मक अदृश्य गोलाई ' ४७२ - देवप्रजा का दायाद, और उत्तरी दृश्य-गोलाई ४७३ - असुर प्रजा का दायाद, और दक्षिणी-गोलार्द्ध ४७४ - भारतीय भुवनकोशानुगत ६० अंशात्मक भारतवर्ष ४७५ - अरब -- मयसोपोटेमिया - जूड़िया -एशियामा इनर - ईरान - अफगानिस्तान-तिब्बत- तुर्किस्तान - चीन - - मँगोलिया-श्याम-- -- वम्र्मा -- अनाम - - कम्बोड़िया-आदि को समष्टिरूप ६० अंशात्मक-वास्तविक अखण्ड - भारतवर्ष, और तत्सम्वन्ध में मनुवचन का संस्मरण ४७६ – श्रा हिमवत - आ च कुम्भार्य्या: -सिन्धुवैतरणी नदी । सूर्य-स्योदयनं पुरः- यावद्वा कृष्णमृगो चरति, तावद्ब्रह्मवर्चसम् ४७७ - श्रावर्त्त की सीमा सिन्धुनद ४७८ - ऐन्द्रब्राह्मण, और श्रावर्त्त ४७६- वारुणब्राह्मण, रायण ४८० - ऋज्राश्वऋषि, और सर्वश्री महाभाग जरथुस्त्र ४८१ - विवाहानुगत कलह, और श्रार्य्यावर्त्त ', तथा श्रायणरूपेण भारत का द्विधा-विभाजन ४८२ - पूर्वी भारतवर्ष, और श्राव ६०४ ६०५ " " 19 39 " " 39 19 19 23 19 ४५८ - चतु: सीम भारतवर्ष के देश और देशा-वयों का संस्मरण ४५६ - दृश्यगोलार्द्ध का परिक्रमण ४६०-- प्रस्तानोपलक्षित रेडसी से एशियाखण्ड का उपक्रम ४६१- अलास्का नामक ( श्रमेरिका के उत्तर ) भूभाग पर एशियाखण्ड का विराम " 2 ४६२ - एशिया का श्रारम्भस्थान - स्थान ४६३ - वर्मा - चीन- श्याम श्रनाम कम्बोडिया आदि पूर्वानुगत प्रान्त, और अखण्ड भारत ४६४ - तिब्बत- तुर्किस्तान - रूस- मँगोलिया - आदि उत्तरानुगत प्रान्त ४६५ -- भारतवर्ष की पश्चिमसीमा का पारिभा-विक - समन्वव ४६६ -- दृश्य - उत्तरी गोलार्द्ध ' का स्वरूप- समन्वय " ४६७ -- अदृश्य - गोलाद्ध, तथा दृश्यगोलाद्धों के क्षेत्रफलों का विस्तार " ४६८ - विश्वखानुपात से उभयगोलाद्धों का साम्य ४६६ - भूप्रदेशापेक्षया उभयगोलाद्ध की प्रदेशानुगता विषमता " ४८८३ - पश्चिमी भारतवर्ष, और श्रायण I ४८४ - इन्द्रसत्ता से अधिकृत वि " 1 ७५

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विषयसूची ४८५ - वरुणसत्ता से अधिकृत श्रारण ६०६ ४८६ - श्राय्र्य्यायण, और ईरान ४८७ - पूर्वस्थान, और श्राय्यांवर्त्त ४८ - पारस्थान, और चाय्र्याण ४८ - पारस्थान, और पारसी ४६० - पारस्थान की पारिभाषिकी सीमा, और विसंवाद - समन्वय " ४ ९१– वैदिकी- पश्चिमवाहिनी - ' सरयू ' नदी ४६२ - सरयूनदी का पारिभाषिक - प्रवाह ४६३ - ' इण्डिया ' नाम - समन्वय ४६४ - पूर्व - पश्चिम भारत की ' श्रार्य्य ' श्रभिधा का पारिभाषिक समन्वय, और तत्सम्बन्ध में कश्रुति ४६५ -- पुराणानुगत सीमाप्रसङ्गों का पारिभाषिक संस्मरण ४६६ - भारतवर्ष के द्वीपों, तथा उपद्वीपों का संस्मरण ४६७- भारतीय नाम, और वर्तमान नामों का नैगमक - साम्य - प्रदर्शन ४६८-- भारतीयोपद्वीप संघ की वत्तं माना प्रतीच्या श्रभिधा ४६६ - भारतीयोषद्वीपपरिलेख ५०० - भारतीय भुवनकोश का परिचयात्मक-समन्वय एवं दायविभागमूल क - प्रकृत-ख्यान ५०१ - प्रासाहित्य का विज्ञानदृष्टि से श्रव-लोकन ५०२ - पुराण साहित्य का सर्वमूद्ध न्यत्त्व ५०३ - पुराणों के प्रति उपेक्षा से भारतीय--सांस्कृतिक निधि का अपलाप, और हमारी ' शता ' ५०४-- पाद्मभुवन कोशोपराम इति - पाद्मभुवनकोश: -ब्राह्मः 23 " 17 ६०७ " " ४६८ ६०६ 99 II 31 ५०५ - देवत्रिलोकी से श्रनुगत पाद्मभुवनकोश ६० ९ ५०६ - भूपिण्डनिवासी मानुषदेवता, और मानुष असुर ५०७ - देवत्रिलोकी पर अधिकार कामुक श्रासुर-मानव, और देवप्रजा की भावुकतापूर्णा उदासीनता ५०८ - रज्जु से असुरों के द्वारा भू का परिमाणात्मक नियन्त्रण ५०६ - देवप्रजा का सहसा उद्बोधन, एवं भू-विभाग में विप्रतिपत्ति ५१० -- देवत्रैलोक्यरूपा यज्ञभूमि, और देवयजन-भूमि का संग्रह ५११-- पद्मभुवन कोश की यज्ञभुवन कोश । तमकता ५१२- शुम्भ निशुम्भ का दिग्दर्शन ५.१३ - ' यूयं प्रयात पातालम् ' ५१४- ' शेषाः पातालमाथयो ' ५१५- वज्राङ्गद के वेश्यापुत्र तारक के द्वारा देवप्रजा का उत्पीड़न ५१६- पार्वतीनन्दन स्कन्द के द्वारा श्रसुरबल का विनाश ५१७ - सुप्रसिद्ध त्रिपुरासुर, और भयानक देवा-सुरसंग्राम ५१८ - त्रिपुर । ख्यान का संस्मरण ५१६- स्वर्गस्थ -देवताओं, तथा पातालस्थ - श्रसुरौ की पुरनिर्माणासक्ति ५२० - उपसद्धोम, और देवपुर ५.२१ - मयासुर वंशजों के द्वारा त्रिपुर - निर्माण-पद्धति का श्राविष्कार ५२२ - मय सोपोत्तम, श्रीर मयसोपोटेमिया, तथा मयासुर ५२३ - मयराष्ट्र, और मेरठ ५२४ -- तारकासुर का महान् शौय्यं ५२५ - विद्युन्माली- तारकाक्ष - अम्बुबाच - नाम के तारकपुत्र " " III 21 " " " ६११ " " " " " " ७६

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शतपथब्राह्मण २ खण्ड ५२६ - सुवर्ण रजत- लौहमय- तीन पुरों का रहस्यात्मक निर्माण ५२७ -- त्रिपुरी, श्रौर त्रिपुरासुर ५२८ -- त्रिपुरी, और आज की ट्रिपुली ५२६ - त्रिपुरवध, और त्रिपुरारि - महादेव ५३० देवपुरियों का संस्मरण: श्रति और ब्राह्मण-५३१ -- महाबलवान् वराहासुर का संस्मरण ५३२ - देवेन्द्र के द्वारा भारतीय प्रजा की भरण-पोषण व्यवस्था का स्वर्गीय चित्रण ५३३ --भारतराष्ट्रपति देवेन्द्र ५३४ - भूतचिन्ताओ से उन्मुक्ता भारतीय प्रजा 17 ५३५ - भारतीय अन्नकोश, और तद्विभागाध्यक्ष " " ५३६ - वसोर्द्धारा, और सञ्चित अन्नकोश " 3 ५३७ – श्रोङ्कार, और अन्न का संरक्षण ५३८ -- वराहासुर के द्वारा अन्नापहरण ५३६ - विष्णु, श्रौर इन्द्र के द्वारा वराहासुर का विनाश, और अन्न का पुनरावर्त्तन ५४० - वराहासुर की भोजन सामग्री, और ऋङ ् ममन्त्र ५४१ - पणियों की गाएँ, और बलासुर ५४२ - बलाराति इन्द्र के द्वारा बलासुरवध ५४३ - विजयाभिनन्दन- महोत्सव, एवं श्रभिगर-प्रतिगर ५४४ ऋग्वेदकालीन द्वादशविध देवासुर-संग्रामों का नाम - संस्मरण ५४५- ताराहरणोपाख्यान, और भारत पर भीषण आक्रमण ५४६- देवासुर- दाया विभागानुगत -- श्राधिदैविक चरित्र का उपराम १२ 17 II * देवासुरदाय विभागाख्याना-" नुगत - प्राध्यात्मिक - समन्वय ५४७ - यथा - अण्डे, तथा पिण्डे, और आधि-दैविक - ब्रह्माण्ड ५४८ - प्राध्यात्मिक पिण्ड असुरत्रिलोकी ६१५ " " ५४६ -- अध्यात्मानुगता देवत्रिलोकी, और ६१३ " " ५५० - पञ्चाग्निविद्यानुगत अप्तत्त्व, और 19 अध्यात्मसंस्था 33 " ५५१ - श्रप्तत्त्व का प्राधान्य, और प्रजोत्पत्ति ५५२ - भृगु, और श्रङ्गिरामय अपतत्त्व का पारिभाषिक - समन्वय ५५३ - श्राप्यप्राण - प्रधान असुर ५५४ - आासुरभावप्रधान शुक्र शोणित ५५५ - अध्यात्मसंस्था पर असुरों का अधिकार ५५६ – ' अद्भ्यः पृथिवी ' - सिद्धान्त का संस्मरण ५५८ - देवविकासभूमिरूप सूर्य्य ५५६ - बुद्धि के द्वारा देवदेवताओं की अध्यात्म-संस्था में प्रतिष्ठा ५६० - बुद्धि की प्रतिष्ठा भूमि मन 27 ३५७ -- श्रासुरप्राणमयी पृथिवी " " " " " " " " ६१४ " 17 ५६१- षोडशवर्षात्मिका आयु और मन की ,, ६१६ अपरिपक्कता ५६२ - परिपक्वमन, और सौरी बुद्धि " ५६३ - मानव, श्रौर ' बालक ’ ५६४ - बालक, और ' मन ' " ५६५ – बालस्वभाव का स्वरूप - विश्लेषण 19 17 " ५६६ - ताड़न, और लालन ५६७- मधुरशासनानुगत बालक ५६८ -- बालावस्था, और बौद्धिक व्यापार की शिथिलता ६१५ | ५६६ – वृत्रासुर, श्रौर मनोमय चन्द्रमा ७७ ५७० - श्रज्ञानान्धकाररूप वृत्रासुर " " } " }

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५७१- असुरों का प्रभुत्त्व यज्ञ ५७२ - विष्णुदेवता के द्वारा श्राध्यात्मिक की प्रवृत्ति, और असुरपराभत्र ५७३- ' सर्वे देवा उपासते ' का संस्मरण ५७४- ' अन्नमयं हि सोम्य! मनः ' विषयसूची १६ | ५८८ - भूपिण्ड के स्वरूपनिर्माण का तात्त्विक स्वरूप - दिग्दर्शन 99 ५८६ - नाप्यप्राणात्मक श्रसुर, और भूपिण्ड 19 ५६० - वायु के संयोग से अपतत्त्व की आठ-श्रवस्थाओं में परिणति, और भूपिण्ड का स्वरूप निर्माण ५६१ - बलाधायक - बलप्रवत ' क- श्राप्य प्राण ६१७ 19 ५.७५. - श्रशनायासूत्र, और अन्नागमन 99 ५७६ -- यशात्मक विष्णुदेव " 29 ५७८ - मानवबुद्धि में विवेक का जागरण, श्रीर असुरपराभव 91 ५६४ - सत्याग्नि की प्रतिष्ठा " ५६५ - काल्वालीकृता पृथिवी ५७७ - वैष्णवयज्ञ का उदर्क श्रसुरत्व ५६२ - सत्यात्मक अग्नि ५६३- भूपिण्ड, और सत्यात्मक हृदयभाव का ६१६ ५७- श्राध्यात्मिक देवासुर - दाय विभागानुबन्धी तथ्य का उपराम . ५८० - देवत्रिलोकी, तथा श्रसुरत्रिलोकी स्वरूप - परिलेखः— 37 ५६६- श्रसुराधिपत्ययुक्ता पृथित्री ५६.७ श्रस्माकमेवेदं खलु भुवनम् ' इत्यादि वचन का पारिभाषिक समन्वय * देवासुरदायविभागाख्यानुगत, ६८- गुणदोषात्मक विश्वसर्ग आधिदैविकचरित्र का समन्वय ५८१ - सूचोकटाहृन्यायानुगत प्राधिभौतिक, तथा श्राध्यात्मिक चरित्र का उपराम एवं श्राधिदैविक चरित्र का उपक्रम ५८२ - सृष्टि का आरम्भकाल, और देवासुर-अधिकार - मीमांसा ५८२ - सृष्टि का आरम्भकाल, और भूपिण्ड पर केवल श्रसुरप्राण का साम्राज्य 25 ५४ - सुराधिकार से श्रधिकृत श्रयज्ञिय-भूखण्ड ५८५ - विष्णु के द्वारा भूपिण्ड के श्रमुक प्रदेश का यज्ञियत्त्व, और तत्प्रदेश का वेदित्त्व 99 ५८६ – देवताओं के द्वारा निर्विघ्न यशवितान, और सम्वत्सररूपेण तत्सनातनता 25 ५८७- श्राधिदैविक - चरित्र के भूपिण्ड, गायत्री, त्रिष्टुप् जगती, विष्णु, और देवता नामक ज्ञातव्य तत्त्व " ५६६- तमोमूला सृष्टि ६०० - महादोषात्मक तमोभाव ६०१ - देवीसम्पत्ति, और गुणविभूति ६०२ - श्रासुरीसम्पत्ति, और दोषविभूति ६१६६०३ - गुण - दोष की प्रतिस्पर्द्धा ६०४ - गुणभाव का काचित्क विजय ६०५ - दोषभाव का सर्वत्र साम्राज्य ६०६ -- देवासुरसग्राम का स्वरूप ६०७ - स्वयम्भू की " " ,, " " " " 97 " " 19 11 ६२० 11 37 गुणविभूति और ऋषि " ६०८ - परमेष्ठी की " और पितर " ६०६ - सूर्य की 39 और देवदेवता 39 ६१० - चन्द्रमा की और गन्धर्व 19 ६११ - भूपिण्ड की " " और मानव 29 ६१२ –स्वयम्भू की श्रासुरी विभूति, और बल 39 29 ६१३ - परमेष्ठी की और श्रनिरुक्ततम " ६१४ - सूर्य की और नमुचि 19 ६१५ - चन्द्रमा की 19 श्रौर वृत्र " " ६१६ - भूपिएड की " और सैंहिकेय 19 45

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शतपथब्राह्मण २ खण्ड " " " ६४६- श्रग्निरु वै यज्ञः ६४७- एष हि यज्ञस्य सुक्रतुर्यदग्निः ६४८ - श्रग्निर्वै योनिर्यज्ञस्य ६४६ - आहुतिहिं यज्ञः ६५० - अग्नी सोमाहुतिर्यज्ञ: ६५१ -- यज्ञ के पारिभाषिक अर्थों का समन्वय १२२ " " " " " ६५२ - दाहक तत्त्व, और अग्नि ६५३ - दायतत्त्व, और सोम ६५४ - सूयते इति सोमः ६५५ - सोम शब्द का व्यापकार्थ " " " " " " ६५.६ -- इध्म - वृत - तैलादि की सोमरूपता 99 २१ ५७ यत्तदन्नमेष स विष्णुर्देवता " " " ६५८ - सोमो वैष्णवो राजा " ६१७ – ज्योतिम्र्म्मय देवदेवता १८- तमोमय श्रसुर ६१६ - ज्योतिस्तत्त्व के पाँच महिमा - विव ६२० -- परमेष्ठी, श्रौर सत्त्वगुणक महान ६२१ -- परमेष्ठी, और रजोगुणक महान् ६२२ -- परमेष्ठी, और तमोगुणक महान् ५२३- अनिरुक्त तमोरूप श्रसुरप्राण ६२४-- त्रिगुणात्मिका प्रकृति का स्वरूप समन्वय ६२५- गुणात्मक महानात्मा ६२६ - महानात्मविवन्त त्रयो- स्वरूप परिलेखः 23 ( पृ ० स ० ६२० - ६२१ के मध्य में ) ६२७ – स्वज्योतिर्म्मय सूर्य्यनारायण ६२८ - सौरमण्डल में श्रसुरप्रवेश - निषद्ध ६२६ - मेघानुगत नमुचि नामक असुर प्राण ६३० - सौर इन्द्र के द्वारा नमुचि का शिरश्छेद, और जलवर्षण ६३१-- प्रसुरविनाश, और सुख - शान्ति ६३२ - परमेष्ठी से समतुलिता नान्द्री स्थिति ६३३- भूतप्रधान भूपिण्ड ६३४- श्रावरण की पराकाष्ठा, और भूपिण्ड ६३५ - प्रकाश का आत्यन्तिक पराभव, और भूपिएड ६३६ - असुरसाम्राज्यकाल का संस्मरण, और ब्राह्मणश्रति का समन्वय " " ६३७- असुरों के अधिकार से युक्त भुवन ६३८- देवासुरभाव- समन्वय - परिलेखः ६३६ - वामान विष्णु का साहाय्य ६४० - सौरदेवताओं का भूपिण्ड में आगमन 19 ६४१– देवप्राणात्मक - भूप्रदेश की यज्ञरूपता " ६४२- छन्दोऽवच्छिन्न विष्णु की व्याप्ति, और देवाधिकृत भूपिण्ड ६४३ - यज्ञो वै विष्णुः ६४४ - विष्णुवै यशः " " ६५६ - यो वै विष्णुः सोमः सः ६६० - श्रग्नि- सोम - मय - यज्ञमूर्ति विष्णु ६६ ९ - हिरण्यगभ नामक धामनिधि का श्रवि-र्भाव 21 ६६२ - हिरण्यगर्भः समवना ६६३ - सूर्य्यो हवा अग्निहोत्रम् " ६६४ - भूतज्योति मंत्र सौर यज्ञ " ६६५ - श्वेतद्वीपनिवासी सत्यनारायण भगवान् ६६६ - सौर अग्नि की सत्यरूपता ६६७ - श्रापोमय परमेष्ठी के गर्भ में प्रतिष्ठित सत्यनारायण विष्णु ६६८- ' याश्चा वस्तादुपतिष्ठन्त श्राप: ' " 1 A " " " " " " ६२३ 17 " ६६६ - नारदप्राण का स्वरूप- समन्वय " २२ ६७० - नार, अयन, और नारायण " ६७१ - स यः स विष्णुर्यशः सः " ६७२- स यः स यज्ञ:, असौ स श्रादित्यः ६७३ - चित्रं देवानामुदगात् " ६४५ - श्रग्निर्वै यज्ञमुखम् ७६ ६७४ - सत्यसंहिता वै देवाः ६७५ – देबदिक् - प्राची ६७६ - ' ते प्राञ्चं विष्णुं निपाद्य ' का पारि-भाषिक समन्वय 21 " 2

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६७७-- गतिशून्य यज्ञतस्व ६७८ -- यज्ञमूर्ति सूर्य का स्थिरत्त्व ६७६ - देवगति से श्रनुगत यज्ञविष्णु ६८० - यशविष्णु का छन्दों से वेष्टन ६८१ - अग्नीषोमात्मक यज्ञमूर्ति विष्णु ६८२ - दिक् - चतुष्टयी से अनुप्राणित यज्ञाग्नि की चार अवस्थाएँ 93 विषयसूची ६२३ 93 99 " 23 11 I I ७०७ - ' चतुर्द्धा विहितो छ वा श्र श्रग्निरास ' इत्यादि श्रुति का समन्वय ७०८ - चतुर्द्धा विभक्त अग्निपरिलेख " " ७०६ - प्रकृत देवासुराख्यान, श्रौर तृतीय श्रम-दाग्नि " २० - सौर - यज्ञमूर्ति अन्नदाग्नि की विष्णुरूपता ७११ - तृतीय अन्नादाग्नि की अवान्तर चार अवस्थाओं का संस्मरण ६२५ ७१२ - श्राहवनीयाग्नि, गार्हपत्याग्नि, दक्षिणाग्नि-पाशुकाग्नि - भेदेन अन्नादाग्नि के चार महिमामय - विवर्त्त 37 ६८३ - ब्रह्माग्नि, अङ्गिरोऽग्नि, चार महिमा - विवत ' श्रनादाग्नि, पाशुकाग्नि, भेदेन मौलिक अग्नि के ६८४ - श्रग्नि की यजुः पुरुषरूपता ६८५ - यजुरग्नि की " वागरूपता ७१३ - अनुष्टुप्छन्दस्क सौर सावित्राग्नि ६८६ - अग्नेर्वागेवोपनियत् का संस्मरण ६८७ - सार्वया जुषाग्नि का संस्मरण 91 ७१४ - अन्नाग्नि का प्रजापतित्त्व " 1 ७१५ - श्रृङ्गीभूत प्रजापत्यग्नि 11 19 19 ६ - यजुरग्नि से परमेष्ठी का जन्म ६८६ - ऋक् समुद्र, और महोकथ ६६० - सामसमुद्र, और महावत ६६१ - यजु:, और पुरुष " ७१६-- श्रङ्गात्मिका श्रग्नित्रयी " ७१७ - पृथिव्यनुगत - गार्हपत्याग्नि 27 " " ७१८ - अन्तरिक्षानुगत - दक्षिणाग्नि 19 29 ७१६. - दुर्वाद्यनुगत -पाशुकाग्नि 12 ६६२ - श्रनादिनिधना नित्या वाक 29 ७२० त्रैलोक्यव्यापक आहवनीयाग्नि " ६६३ -- द्वितीय - श्रङ्गिरोऽग्नि 11 ६६४- सुब्रह्माग्निरूप ताग्नि 33 ६६५ - सौराग्निरूप अन्नादान 11 ७२१ - प्राजापत्य - अनुष्टु पुछन्द का इतर छन्दों की प्रतिष्ठा भूमिव ७२२ -- अनुष्टुप् छन्द का पारिभाषिक - समन्वय 39 ६६६ - अथर्ववेदमूर्ति - पारमेष्ठ्य निरोऽग्नि " 2 ७२३ - देवप्रतिष्ठारूप अनुष्टुप्छन्द ६६७ - तृतीय श्रनादाग्नि ६६८ - श्रन्नादानभाव, और अन्नादाग्नि ६६६ -- यज्ञाग्नि - छन्दस्याग्नि - सत्याग्नि ७०० - अन्नादाग्नि की अभिव्यक्ति का समन्वय ७०१ - अनादाग्नि, और श्रविरोऽग्नि का रहस्यात्मक पारिभाषिक तारतम्य ७०२ - चतुर्थ- पाशुकाग्नि ७०३ - प्रवर्ग्यरूप - पाशुकाग्नि ७०४ - स्वप्रतिष्ठा से वञ्चित पाशुकाग्नि ७०५ - पश्चविध पाशुकाग्नि ७०६ - भीम - श्रग्नि का पाशुकाग्निमयत्त्व 13 ७२४ -- अनुष्टुप् हि छन्दसां योनिः ६२६ 11 19 ७२५– प्रजापतिर्वा अनुष्ट पू 29 11 ७२६ – ज्येष्ठं वा अनुष्टुप् " " 39 ७२७ - परमं वा एतच्छन्दो यदनुष्ट प् " " ७२८ -- श्रन्तो वा श्रमुष्टुप् छन्दसाम् " " ७२६ - विश्वेदेवा श्रनुष्ट प् - समभरन् " 23 ७३० - अनुष्टुभो वै प्रजापतिः " " 3 " " ७३१ - प्रजापत्याग्निरूप श्राहवनीयाग्नि ७३२- अग्नि पुरस्तात् समाधाय - तेनार्चन्तः " श्राम्यन्तश्चेरुः ' इत्यादि ब्राह्मणसन्दर्भ का समन्वय " ८०

पृष्ठ 209

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७३३ - गाईपत्याग्नि का स्वरूप संस्मरण ७३ ९ - सुर्योपग्रहरूप भपिण्ड शतपथब्राह्मण २ खण्ड ७३५ - सौर - अन्नादाग्नि का प्रवर्ग्यरूप मपिण्ड ७३६ - गृहपति पार्थिवाग्नि ७३७ - - हा वै गार्हपत्याः, श्रौर गार्हपत्याग्नि ७३८ - पश्चिमादिक, और श्रद्ध रात्रि ७३६- श्रद्ध ' रात्रि, और गाईपत्यानि ७४० - त्रिष्ट पळुन्दा गार्हपत्याग्नि ७४१- पश्चिमानुगत -- त्रिष्ट, पूछन्दस्क - पार्थिवाग्नि का स्वरूप- समन्वय ७४२ - पार्थिव वागग्नि का श्रमिराव ६२६ ७६२ - जागत पाशुक- श्रग्नि ६२ = " " ७६३ - पशवो वै जगती 29 99 ७६४ - आगता वै पशव: 31 ७६५ - पशुभाव की अन्नरूपता " " ७६६ - भौग्यात्मक निरायतनभाव " 19 " ७६७ - यज्ञाग्निरूप त्रेताग्नि का संस्मरण ७६८ - श्राज्य- इध्म - बर्हि - हवि आदि का पाशुका-ग्निमयस्व ७६६ - पृथिवी की पूर्वबिन्दु, और सौराग्नि ७७० - पश्चिम बिन्दु, और गार्हपत्य ७४३ - श्रादित्याग्नि, ७७१ - दक्षिण त्रिन्दु, और अपणाग्नि और श्रङ्गिरोऽग्नि का ७७२ – उत्तरचिन्दु, और पाशुकानि " } ७७३- भूपिण्ड, और वेदि श्रागमन - गमन, और मन्त्रश्रुति ७४४ - तृतीय दक्षिणाग्नि का संस्मरण ७४५ - श्रपण ग्निरूप । दक्षिणाग्नि ७४६ - तिर्य्यग्भावापन्न - दक्षिणादिक् में व्यान्त-अग्नि, और दक्षिणाग्नि ७४७ - दक्षिणस्था आग्नेयी श्रोषधियाँ ७४८ - दक्षिणस्थ श्रग्नि का गायत्रीछन्द से वेष्टन " ७४६ - हविः परिपाककर्त्ता - अग्नि 11 ७५० -- मकरवृत्तात्मक - गायत्री छन्द, श्रीर दक्षि-नि ७५१ - चतुर्थ - पाशुकाग्नि का संस्मरण ७५२ - भूपृष्ठ से संलग्न पाशुकाग्नि ७५.३ – संकर भावापन्न - पाशुकाग्नि ७५४ - यावापृथिव्य - पाशुकाग्नि 11 ७७४- परिलेख के द्वारा वेदि का स्वरूप-समन्वय ७७५ - वैधयज्ञवेदिपरिलेखः ७७६- श्रग्निहोत्रशालाप रिलेखः " ७७७ - दर्शपूर्णमासविहारपट्ट्परिलेख: II " " " ७५ - विशुद्ध श्रग्नि से पृथगभूत पाशुकाग्नि ६२८ ७५७ - पश्चिमानुगत- गाईपत्याग्नि ७७८ - विष्णुयज्ञ का मणीत्त्व, और यज्ञस्वरूप का वितान ७७६ - एनेन ( विष्णुना ) इमां सर्वा समविन्दन्त ' का समन्वय ७८० - वेदि शब्द का निर्चचनात्मक समन्वय ७८१ - देवाधिकारस्थापन - समन्वय ७८२ - ' यावती ने वेदिस्तावती पृथिवी ' का पारिभाषिक - समन्वय ७८३- श्रसुरनिवासजिज्ञासा, श्रौर तत्समाधान-समन्वय " 19 I ६३० ६३१ 19 10 " 9 ६३२ 19 ७६४ - श्रदितिरूपा दिव्या पृथिवी " " ,, ७८५ - दितिरूपा श्रसुरी पृथिवी 19 29 ७८६ - अदितिभाग पर देवप्रजा का अधिकार 19 " " ७५६ - पूर्वानुगत- साबित्राग्नि ७५८ - दक्षिणानुगत - श्रपणाग्नि ७६० - जगतीछन्द से वन्दित उत्तरानुगत पाशु-कान " ७५६ – उत्तरानुगत - पाशुकाग्नि ७६१ – कर्कवृत्तात्मक जगतीछन्द ७८७ - दितिभाग पर असुर प्रजा का अधिकार ७८८ - चतुर्द्धा विहित श्रग्नि से अनुप्राणित आख्यान के रहस्यात्मक समन्वय का उपराम ८१

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७- द्वितिदिति पृथिवी - परिलेख ७६० - अनुष्टुप् छन्द के सम्बन्ध में एक महती विप्रतिपत्ति और तन्निराकरण प्रयास ७६१- श्रनुष्ट पछन्दोमूला छन्दस्त्रयी विषयसूची ६३३५१५ - संकोच भावात्मक म्लानभाव ६३४ 11 93 ८१६ - हृद्ग्रन्थिप्रवृत्ति, एवं श्रात्मविकास का तिरोभाव ८२७ - सोमा विष्णु का म्लानभाव = १८ - सूर्य्य केन्द्रस्थ विष्णुदेवता ६३५ ७६२ - प्रादेश मितो वे प्राणः ७६३ - वामन, और प्रदेशभाव " ७६४ - वामनोवा विष्णुरास 27 ८१६ - मूलविष्णु का रहस्यात्मक स्वरूप ८२० विष्णु का " " 17 " 1 ७६५ --स का समन्वय ७६६ - अग्निपुरोगाः सर्वे देवाः प्रीयन्ताम् ७६७ - प्राणोदानरूप ७६८ - वाग्व्यापाररूप श्रम व्यापार ७६६- तेनार्चन्तः श्राम्यन्तश्चेरुः का पारिभाषिक समन्वय ८०० - याशिकचल का स्वरूप - दिग्दर्शन ८०१ - फलश्रुति का अर्थ - समन्वय ८०२ - विष्णुदेवता की ' म्लान ' अवस्था का रहस्यात्मक - समन्वय ८०३ - श्रोषधिमूलों में प्रविष्ट विष्णुदेवता ८०४ यङ्गलमिता भूमिका निखनन, और विष्णुप्राय की उपलब्धि ८०५ - बक्ष्मीभूत विष्णुप्राण ८०६ - पाची- श्रादि यात्रिकों के व्यङ्ग लाभिनिवेश का निराकरण ८०७ - ' त्र्यङ्गला वेदिः स्यात् ' का वैज्ञानिक-समन्वय ८०८ - विष्णुदेवता के म्लानत्व का विचार-प्रसङ्ग ८०६ - श्रागतिधर्मा विष्णु नामक अक्षरतस्व का संस्मरण ८- गतिधर्म्मा इन्द्राक्षर का संस्मरण ८११ स्थितिधर्मा ब्रह्माक्षर का ८१२- स्थितिगर्भित गतिरूप श्रभ्यक्षर का 29 ८१३- स्थितिगर्भित श्रागतिरूप सोमा क्षर का " ८१४ - संकोच धर्मावच्छिन्न सोम " 3 33 ८२१ - प्राप्तुमशक्स विष्णु की ग्लानरूपता = २२ - दिकूत्रयी, तथा छन्दस्त्रयी से परिवेष्टित विष्णु = २३ - म्लान विष्णु का ओषधिमूलों में गमन ८२४ - यज्ञात्मक - सोररस के पान से पुष्पिता-पल्लविता श्रोषधियाँ ८२५- सौम्या - ( वैष्णवी ) श्रोषधियाँ = २६ - श्रोषधिपति सौम्य - चन्द्रमा " 37 ८२७ - श्रोषधियों का आत्मदृष्ट्या पोषक अग्नि ६३६ ८२८- सौरी- ऊष्मा, और ओषधियों का परिपाक " 27 17 " 3 31 17 91 " ८२६ - धत्त - रूपा श्रोषधियाँ ८३०- म्लान भाव, और साक्षादुरूप से प्राप्तुमक्य " 1 ८३१ - श्रोषधिमूल से संलग्न भूपृष्ठभाग ८३२ ( क ) - ओषधिनिर्माण - प्रक्रिया में विष्णु-देवता के दर्शन ८३२ ( ख ) - विष्णु की लरूप- परिभाषा ८३३ - दैनंदिनयज्ञात्मक हर्यश ८८३४ - बीजवपन, और श्रोषधि - निर्माणोपक्रम ". ८३५ यमवायु और औषधियों के जीवनीयरस पर आक्रमण ८३६ - यमवायु के श्राघात के निरोधक पार्श्वद्वय, और बीज का रक्षात्मक स्वरूप ८८३७– चीज का भूगर्भ में प्रवेश, और अङ्क रो-द्गम ३८- गर्भानुगत म्त, और तदनुगता बीजा-त्मिका हृदयशक्ति ८३६ - हृदयशक्ति की बह्मेन्द्र विष्णुरूपता 33 39 ". " " 99 17 27 " ८२