Shatpath Brahman 1 2 — पृष्ठ 301–310

शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - १-२ - मोतीलाल शास्त्री · पृष्ठ 301–310

पृष्ठ 301

शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - १-२ - मोतीलाल शास्त्री, पृष्ठ 301 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

शतपथब्राह्मण २ खरड ११३ - श्राहवनीयाग्नि में मनः प्राणवाक्सम्पत्ति के अधिष्ठाता होता, तथा श्रध्वर्यु, और प्रथमकर्त्तव्य की स्वरूप- निष्पत्ति १३४७ ११४ - आधिभौतिक यज्ञातिशय के साथ यज-मान के अध्यात्म का समन्वयरूप द्वितीय कर्त्तव्य, एवं अध्वय्यु - होता - उद्-गाता ब्रह्मा नाम की ऋत्विक् चतुष्टयी से तत्स्वरूप - निष्पत्ति ११५ - पद्यात्मिका ऋक् -- वाक् के सम्पादक होता, और उनका ' शंसनात्मक ' शस्त्रकर्म्म, एवं क्षेत्रकर्म्म ११६ - शस्त्रकर्मात्मक होत्रकर्म्म ११७ - गद्यात्मका यजुर्वाक् के सम्पादक-अध्वर्यु ', और उनका ' थाज्यात्मक ' प्रहकर्म्म, एवं आध्वर्य्यवक ११८ - गेयात्मिका सामवाक् के सम्पादक उद्गाता, और उनका स्तोत्रकर्म्म, एवं श्रद्गात्रकर्म्म ११६ - शस्त्र प्रहस्तोत्र - रूप हौत्र - आध्वर्व्यव-श्रद्गात्र कम्मों का समन्वय एवं तद्वारा आधिभौतिक - यज्ञ में ' वाक् ' पर्व का संस्थापन १२० - त्रैविद्य ब्रह्मा का ब्राह्मव्यापार, और तद्वारा अधिभूतयज्ञ में मनःसम्पत्ति का संस्थापन १२१ – श्रध्वय्यु कृत - याज्याकर्म्म से अधिभूत-यज्ञ में प्राणपर्व का संस्थापन १२२ - ब्राह्मकर्म्मणा ब्रह्मा- मनस्तत्वसम्पादकः १२३ - याज्याकर्म्मणा - अध्वय्यु: -- प्राणतत्त्व-सम्पादकः १२४ - स्तोत्र कर्म्मणा - उद्गाता - सामवाक्तत्त्व-सम्पादकः १२५. - प्रहकर्म्मणा -- अध्वर्यु: - यजुर्वाकूतत्त्व-सम्पादकः " " " " " " १२६ - शस्त्रकर्म्मणा --होता --- ऋग्वाक्तत्त्व-सम्पादकः १२७ - पूर्वोत्तराधारकर्म से पूर्वभावी होता के द्वारा सामिधेन्यनुवन्न - कर्म्म १२८ - आधारब्राह्मणोपक्रमश्रुति का संस्मरण १२६ - ' समिद्ध - देवभ्यो- जुवाम ' १३० - सिंहावलोकनानुगत रहस्यात्मक सङ्केत " १३१ - होतृकर्तृक - सामिधेनीकम्र्मानुगत प्राणा-धानक १३२ - श्रध्वर्यु के द्वारा स्रुवपात्र से पूर्वाधार-७ कर्म का सम्पादन, और यज्ञ में मन: -सम्पत्ति का आधान १३३ - स्त्रकपात्रद्वयी से उत्तराधारकर्म्म का सम्पा दन, और यज्ञ में वाक् सम्पत्ति का श्राधान १३४ - मन: पर्व का संग्राहक पूर्वाधारक १३५ - वाक्पर्व का संग्राहक उत्तराघारकर्म्म १३६- केन्द्रावच्छिन- मनःपर्व का पूर्वभा वित्त्व, और तदनुबन्धी पूर्वाधारकर्म्म १३७ - परिध्यवच्छिन्न - वाक् पर्व का उत्तरभावित्व, और तदनुबन्धी- उत्तराघारकरर्म्म १३८ - ' अग्नि ' समैन्धिषत ' - इति प्राण संग्रह: -सामिधेन्यनुवचनकर्म्मणण १३६ - ' मनसे चैव ' इति मनः संग्रहः -पूर्वाधार-कर्म्मणा १४० - ' वाचे च ' इति वाक संग्रह: - उत्तराधार-कर्मणा १४१ - उपांशुभावानुगत पूर्वाधारक १४२ - उच्चारणानुगत - उत्तरक १४३ - हृदयावच्छिन्न मनस्तन्त्र की अनिरुक्तता, एवं श्रव्यक्तता १४४ - मन के उपांशुभाव का समन्वय १४५ - मनोऽनुगत पूर्वाधारकम्मं की उपांशु-रूपता का समन्वय १३४७ " " " N " " " " 31 १३४८ " १७३

पृष्ठ 302

शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - १-२ - मोतीलाल शास्त्री, पृष्ठ 302 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

विषयसूची १४६ राम का परिधिस्था - उत्तरभा विनी वाकू की निरुक्तता, एवं व्यक्त-रूपता १४७ पञ्चमहाभूतरूपेवा की अभिव्यक्ति और माव १४८ - निरुक्ता वाग्देवी १४६ यागनुगत उत्तराधारक की नियता का समन्वय १५० - उभयाघार, और तद्द्वारा अधिमीतिक-यज्ञ के मनोत्राक - पर्वों का सन्तर्पण १५१ - देवतृप्ति का साधन आहुति प्राप्ति १५२ प्रतिप्राप्ति का साधन मनीवाकूप सन्तर्पय १५३ - सन्तर्पक आधारद्वयानुष्ठानक १५४ काममय विश्व और तत्र ममवेत स्त्री-पुरुष का युग्म " १५५ - काममयी स्त्री और तन्मय पुरुष १५६ पुरुष और स्त्रीतन्त्र का समन्वय पुरुषतन्त्र, १५७- कामनामय पुरुषरूप मनस्तन्त्र १५८ - स्त्रीरूप वातन्त्र १५१ - मनोरूप पुरुष, और वृषाभाव १६० यागरूपा स्त्री और दोपाभाव १६१ - मन संकल्परूप से वाद के प्रति-धनुधावन १६२ - वृषा का योग के प्रति अनुधावन १६३ - पुष का स्त्री के प्रति अनुधावन १६४ कमनामयत्वेन यात्रा कल्वेन अनुभावकत्वेन च हृदयानि मन का वृषाप्राणात्मक पुरुषत्व- समन्वय १६५ - कामनानुगतत्वेन परिवा का योषा प्राणात्मक - स्त्रीत्व समन्यय १६६-पात्र का पुरुषस्त्र - समन्वय १६७ - स्रु कुपात्रद्वयी का स्त्रीत्व- समम्बय १६८- गनुगत या मय - वीरूप - उत्तरापार १३४८ १३४१ " " १६६ - प्रागागर्भित मनोमय श्रनिरुक्त भावापन्न हय - बजापति १७० - ' पराञ्चि खानि व्यनृणत् स्वयम्भूः ' १०१ वास्थातीत अभाव १७२ वाग्विवर्ती का प्रत्यक्ष - अभिनय और निधन- स्वाहाकार १७३- प्रत्यदृष्ट-- पाञ्चभौतिक अर्थ - जगत् और उस की वाङ्मयता १७४- मनः प्राण गर्मिङ वाकमय सर्वलक्षण-" निरुक्तप्रजापति, और निरुक्का वाक १७५ सर्वालम्बनाममय - मन १७६- तूष्णींभाव, और उत्तराधारकर्म्म का समन्वय १७७ - मन्त्रोच्चारण, और उत्तराधारक का समन्वय १७८ - ' प्रत्यतिष्ठद्दशाङ्गलम् ', और प्रदेश-मित प्राय की हृदय में प्रतिष्ठा १७६- स्थिर भावात्मक अनिलजापति के आधार पर अनुमता इन्द्राविष्णु की आपकी प्रतिस्प १३४६ " " 1 " " १८० - प्रतिस्पर्द्धा से वाकसाइली का ऊर्ध्व - वितान 39 १६१ श्रासीन रूपे कृतं पूर्णभार का समन्वय १३५० १८२ - उत्तिष्ठन् रूपेण कृत उत्तराधार का समन्वय " १८८३ यशात्मिका वाक्सासी की व्याप्ति और तदनु रथन्तरसाम १८४ - सानिका श्रेधा वितान १८२- रसात्मक वा १८६ - यन्तरसाम समन्वय नका उपवितान का पारिभाषिक स्वरूप १८७२ में नियुक्त मनोवागूरूप दो अश्व १६८- अपरिमितभावापन्न काममय समुद्र १८६ - ' मनो वै बृहत् ' १६० ' मनो वे समुद्र ' " १६१- ' अनन्तं मनः ' १७४ " १३५१ " " " 17 19

पृष्ठ 303

शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - १-२ - मोतीलाल शास्त्री, पृष्ठ 303 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

शतपथब्राह्मण २ खण्ड १६२ - मन के आनन्त्य का नारिभाषिक समन्वय १३५१ | ११५ - उत्तरादिक्, और श्राग्नेय- देवदेवता १३५१ १६.३ - दिग्देशकालानवच्छिन - श्रपरिमित मन- २१६ - दक्षिणा दिक, और सौम्य - पितृदेवता 37 रतन्त्र १६४ - दिग्देशकाल परिच्छिन्न परिमित वाक्तन्त्र १६५ श्रर्थात्मिका सीमिता वाक २६६- शब्दात्मिका सीमिता वाक १६७ - मनोमय श्रश्व का बृहद्भाव १६८८-- वाङमय श्रश्व का लघुत्त्व १ ९ ६ - बृहत् - लघु - भावानुगत पूर्वोत्तराधारों का समन्वय २०० - विषमाकार अश्वों से रथ का वहन, श्रर भयप्रवृत्ति २०१- मनोरूष, बाग्रूप अश्वों के परिमाण-समतुलन का प्रयास २०२ - पूर्वाधार, और उत्तराघार - से अनुगता श्राहुतिदी के तारतम्य से उभयाश्व के आकारों का समतुलन, श्रौर विप्र-विपत्ति का निराकरण २०३ - श्राहवनीयाग्नि का उत्तरभूप्रदेश, और पूर्वाधारका सम्पादन २०४ - श्राहवनीयाग्नि का दक्षिण भूप्रदेश, और उत्तराचार का सम्पादन २०५ - भावना भय मन का देवप्राणप्रतिष्ठात्त्व २०६ - वासनामिका वाक् का पितृप्राण प्रतिष्ठात्त्व १०७- पितरो वाक्यमिच्छन्ति ' 17 २०८ - ' भावमिच्छन्ति देवता: ' २०६ - मनोऽनुगत देवप्राण का श्रग्निमत्त्व २१० - बागमुक्त पितृप्राण का सोममयत्त्व २११ - यशमण्डल के पूर्वाद्ध ' में अग्नि का प्राधान्य २१२- यशमण्डल के उत्तरार्द्ध ' में सोम का समन्वय २१३ - पूर्वाधार के पूर्वभावत्त्व का समन्वय २१४-- उत्तराधार के उत्तर भावित्व का समन्वय 97 " " 1 13 37 " 19 17 39 91 19 " २१७ – उभयविध श्राधारकर्म से अग्नी-षोमात्मक- पूर्ण - यज्ञमण्डल का संग्रह २१८ - भौम मानुष - देवताओं के पुरातन इति-वृत्त से अनुप्राणित पूर्वोत्तराघार- कम्म की ऐतिहासिकी कारणता का समन्वय २१- प्राकृतिक नित्य - यज्ञ के संरक्षक दक्षिण-दिशि प्रतिष्ठित प्राणात्मक इन्द्रदेवता २२० - दक्षिणायन - उत्तरायण का स्वरूप संस्मरण २२१ - इन्द्र का संरक्षण, और यश की निर्विघ्न-समाप्ति २२२ - प्राक्प्रवणा वेद और देवभाव, तथा असुर - निराकर बा २२३- उदक्प्रवणा वेदि, और मानुषभाव २२४ - ' उच्छितमिव हि वीर्य्यम् ' २२५ - लोकदृष्टि, और उच्छ्रितभाव २२६- सैनिक - ( सिपाही ) की तननरूपा शरीर-यष्टि, और प्राकृतिक स्थिति का संस्मरण २२७- श्रालस्यनिमग्न शयालु मानवों के प्राणात्मक बी की मूर्च्छा २२८ - निरालस- उत्तिष्ठन् पुरुषार्थी - मानवों की प्राणात्मिका वीर्य्य - सम्पत्ति से श्रन्तर्य्याम-सम्बन्ध २२६ - हृद्यावच्छिन्न- ऊर्ध्व- श्रधः- वितत नाड़ियां, श्रौर ऋजुभाव २३० - ऋजुभावानुबन्धी- रक्तसञ्चार, नाड़ियों की वोवता श्रर २३१ - मेरुदण्ड का ' खस्वस्तिक ' की श्रोर ऋजु-भाव से लम्बन, एवं शरीरयष्टि का सन्तनन २३२ - शरीरयष्टि का वीर्य्यप्रवत्तक - सन्तनन २३३ - सैनिकानुगत - रक्षाकर्म्म, और सैनिक की शरीरयष्टि का ऋजु-भाव में सन्तनन १३५२ " 11 19 " " " "? " १३५३ 19 १७५

पृष्ठ 304

शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - १-२ - मोतीलाल शास्त्री, पृष्ठ 304 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

विषयसूची १३५३ " 39 " " " " 17 23 " 3 23 " 29 १३५४ " " " II २५५ - समानक्षेत्राश्रयत्वरूप - समानश्व समन्वय, और मनोवाक् का संस्मरण २५६ - मन की अनद्धारूपता २५७ - वाक की श्रद्धारूपता का १ २५८ - मनो- वागनुगता विभिन्नता का तात्त्विक समन्वय २५६ - ' तस्मादिदं मनश्च वाक्च समान-मेव सन्नानेव ' इत्यादि श्रति सन्दर्भ का पारिभाषिक - वैज्ञानिक समन्वय २६० - श्राधारद्वयी से अनुगता उपपत्तियों का समन्वयात्मक - संस्मरण २६१ - प्रति वस्तु से अनुगत मूल, और तूलभाव २६२ - मूल भावनिबन्धन- ' हृदय ' २६३ - तूलभावनिबन्धन- ' शिरः ' २६४ – पूर्वाघारात्मक - मनोमय - हृदयात्मक - मूल-भाव का समन्वय २६५ – उत्तर घारात्मक वाङमय- शिरोऽनुगत-तूलभाव का समन्वय २६६ - यज्ञपुरुष के मूलभाव का स्वरूप - सम्पा-दन, और मनोऽनुगत पूर्वाधारक २६७ - यज्ञपुरुष के तूलभाव का स्वरूप सम्पा-दन, और वागनुगत उत्तराधारक २६८ - तूष्णींभाव का समन्वय २६६ - उच्चारणभावानुगता उपपत्ति २७० - पूर्वोत्तराघारकर्म्मयी की विशेषताओं का पारिभाषिक रहस्य- संस्मरण, और आघारकर्म्मोपपत्ति का विराम इति - आघारकर्म्मोपपत्तिः १ २३४ - वीर्य्यसापेक्ष - रक्षाकर्म २३५ - उच्छितभावानुबन्धिनी वीर्य्यरक्षा २३६- ' तस्माद्दक्षिण तस्तिष्ठन्नाधारयति ' इत्यादि मन्दर्भ का रहस्यात्म - प्रकृति-सिद्ध - समन्वय २३७- एकविध श्राहवनीयाग्नि २३८ - तदनुगता आधारहुति का द्वित्व २३६ - आहुतिद्वयी का समान प्रदेशव २४० - आहवनीयाग्नित्वेन उभय - हृतिक का समानत्त्व समन्वय २४१ - आहुति स्थान -भेद निबन्धन- नानाभाव-का समन्वय २४२ - समानानुगतत्त्व एवं नानात्वानुगति का पारिभाषिक समन्वय, एवं आघारकर्म्म-द्वयी २४३ – मन, और वाक् के समानत्त्व की मीमांसा २४४ - मन की प्रारूप में परिणति, और बलमात्रा का यत्किञ्चित् उद्र ेक २४५ - बलमात्रा का पूर्णोद्र ेक, और मनोमय प्राण की वागूरूप में परिगाति २४६ - हृदयावच्छिन्न व्यात्मक अनिरुक्त प्रजा-पति का संस्मरण २४७ - मानसप्रत्यय, और परावागनुता- उपां-शुवाक २४८ - शब्दविध प्रत्यय का संस्मरण २४६ - मानसव्यापारानुगता उपांशुवाक् २५० - वाग्व्यापार की आधारभूमि मानस-ज्ञान २५१ - ज्ञानीय प्रज्ञेन्द्र के द्वारा वर्णविभागा-नुगता अर्थनिष्पत्ति २५२ - मन से वञ्चिता श्राग्लायाक २५३ - स्वलितवागूरूपा - निरर्थक वाक् २५४ - विशुद्ध - मानस - व्यापार, शुवाक् और उपां-" १७६

पृष्ठ 305

शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - १-२ - मोतीलाल शास्त्री, पृष्ठ 305 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

शतपथमा झरण २ खण्ड अथ - अग्निमम्मार्ज्जनकम्र्मोपपत्तिः २८३ - यज्ञस्वरूपात्मक श्रग्निदेव की अवस्था-२७१ – पूर्वाघारकर्म्मानम्तर ' श्राग्नीघ्र ' नामक ऋत्विक् के द्वारा प्रग्निसम्मार्ज्जन-कर्म्म, और तदुपपत्युपक्रम २७२ - ' समानमेव सन्नानेव ' सिद्धान्त का संस्मरण २७३ - वाग्गर्भिता मनःसम्पत्ति की उभया-त्मकता २७४ - लोकानुगत प्रश्वयुग्म, १३५५ " " " किंवा वृषभ-युग्म से अनुप्राणिता स्थिति का संस्मरण " २७५ - रथधुर के साथ बन्धनपूर्वक अश्वयुग्म का बन्धन २७६ - रथधुर का योग, और पूर्वाधारक २७७ - चर्म्मपाश से ग्रीवाबन्धन, और अग्नि-सम्मार्जन २७८ - मनोवाग्रूप - उभयाश्व का संग्रह, और रथधुर के साथ तद्योग २७६- परिभ्रमणानुगत श्रग्नि सम्माज्जन २८० - इध्मसन्नहन नामक तृणमूह के द्वारा अग्निप्रज्ज्वलनात्मक अग्नि - सम्मार्जन-कर्म २८१ न्धनानुगत । - श्रनुरूपसम्पत्ति का संग्रह, और तदनुगत- परिभ्रमण २८२ - त्रिस्त्रिवार ( नववार ) विहित नि सम्मार्ज्जन - क 11 " 37 13 " " त्रयी का पारिभाषिक समन्वय २८४- अग्निदेव का सर्वदेवतामयत्त्व २८५ -- सर्वात्मक श्रग्नि, और ताण्डयति २८६ - अग्निनिबन्धन - त्रिवृद्भाव और नव-संख्या का संस्मरण २८७ - त्रिवृदग्नि से अनुप्राणित सम्माज्जैन-कर्म्म का त्रिवृद्भावापन्नत्व २८८ - तूष्णीं श्राहवनीय अग्नि का त्रिवार सम्मार्जन, और तदुपपत्ति १३५५ 31 " " 11 २८६ - उभयकर्मानुगत रथ का सज्जीभूतत्त्व १३५६ २६० - कशात्रातात्मिका प्रेरणा, और रथ का गत्या रूढस्व २६१- पुनः- सम्मार्ज्जनात्मक काघात २६२ - पूर्व, और उत्तराधार के मध्य में विहित - अग्नि सम्मार्जन २६३ - धुरयोग, और पूर्वाधार २६४ - चर्म्मपाशबन्धन, और अग्नि सम्मार्जन २६५ - कक्षाघात, और श्राहवनीयसम्मार्ज्जन २६६ – मन, और वाक् की विभन्नता का सम्पादक अग्निसम्मार्ज्जनक २६७ - मनोऽनुगत बिभिन्न पूर्वाधार २६८- बागनुगत विभिन्न उत्तराषार २६६ - मध्यस्थ - अग्निसम्मान कर्म्म, और सम्मान कम्पस का विराम पूर्वाधारकम् अत्र उपरत चतुर्थ - अध्याय में चतुर्थ, एवं तृतीय - प्रपाठक में षष्ठ - ब्राह्मण - अत्र उपरत तृतीयप्रपाठकश्चात्रो परतः 33 31 " " " " 39 १७७

पृष्ठ 306

शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - १-२ - मोतीलाल शास्त्री, पृष्ठ 306 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

विषयसूची द्विब्राह्मणानुगत - प्रथम आधारब्राह्मरम अत्र- उपरत १ चतुर्थ - प्रपाठक अत्र - उपक्रान्त ४ चतुर्थ अध्याय में पत्रम, एवं चतुर्थ प्रपाठक में प्रथमब्राह्मण - अत्र - उपक्रान्त द्विब्राह्मणानुगत - द्वितीय - आघारब्राह्मण अत्र - उपक्रान्त II ३ - उत्तराघारकम्मैतिकर्तव्यतोपपत्तिः ३०० - दक्षिणतः उत्तरदिश्यनुगत ऋताग्नि ३०१ - उत्तरतः - दक्षिण दिश्यनुगत श्रुतसोम १३५७ | ३०८ - ऋत - तत्त्वों का समन्वयात्मक - ' त्र्यावि-३०२ - ऋतुद्वयी का समन्वय, एवं ऋतु का जन्म " ३०३ - ऋतुसमष्टि, और सम्वत्सर की अभि-व्यक्ति ३०४ - गतिशून्य अग्नि, और सोम ३०५ - सदागतिधर्म्मा प्राणवायु का संस्मरण ३०६ - गत्यात्मक प्राणवायु और जुर्वेद ३०७ - यजुम्मूर्त्ति वायु के द्वारा अग्नि - सोम-समन्वय - पूर्वक - सम्वत्सर का प्राकट्य " 9 19 33 29 १७८ ज्यकर्म ३०६ - वायुरूप ऋत्त्विक्, और उनका आवि ज्यधर्म ३१० - वायु नामक प्राकृत अध्वर्यु, और उनका यजुरनुगत याज्याकर्म्म ३११ - उत्तराघारकर्म्म का विज्यकत्त्व ३१२ – यजुर्वेदी - अध्वर्यु नामक ऋत्विक, और उनका प्राविज्यकर्म ३१३ - देववर्गापेक्षया मानव का अवरश्र णित्व १३

पृष्ठ 307

शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - १-२ - मोतीलाल शास्त्री, पृष्ठ 307 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

शतपथब्राह्मण २ खण्ड ३१४ - दिव्य ऋताग्नि का संयोजक दिव्यभाव १३५७ २१५ - मानुष- ऋत्विक् की धृष्टता ३३३ - यज्ञातिक्रमण, प्रदर्शन श्रौर तदुपशमन - प्रकार-" १३५८ ३१६ - धृष्टता क्षमापनोपाय - प्रदर्शन " ३३४ – उत्तरभाग का सौरज्योतिर्मयत्त्व 13 ३१७ - श्रास्वियुक से पूर्व अध्वर्यु के द्वारा देवताओं के लिए नमः, और पितरों के लिए स्वधा का समर्पण, एवं तद् द्वारा अपराध का उपशमन ३१८ - पृष्टता निवृत्यनुगत उद्देश्य की पूर्ति, और तत्साधक - अञ्जलिनिधान " १३५८ ३१६ - श्राग्नेयप्राणात्मिका देवता ३२० - सौम्यप्राणात्मक पितर ३२१ - नमोभावात्मक श्राग्नेयदेवता, और ' नमो देवेभ्यः ' 33 ३२२ -स्वधाभावात्मक- सौम्य पितर, और 23 ३३५ - दक्षिणभाग का श्रासुरप्राण- निबन्धन छायामयस्व ३३६ - छायामय- श्रासुरभाव की निवृत्ति का समन्वय ३३७ - यज्ञसाधक छायामय प्रदेश ३३८८ - वसुभाव का संस्थापन ३३६. - छायामय आसुरभाव की प्रात्यन्तिक निवृत्ति, और ' विष्णोः स्थानमसि ' का संस्मरण ३४० - यज्ञसान्निध्य में समुपस्थिति ३४१ - इन्द्र के रक्षणकर्म्म से सुरक्षित दक्षिण स्थान ३४२ - ' इत इन्द्रो वीर्य्यम कृणोत् ' का समन्वय ' स्वधा - पितृभ्यः ३२३- ' ऋताग्नये नमः ' रूप किष्कर्ष ३२४ - ' ऋत सोमाय नमः ' रूप निष्कर्ष ३२५ - ' तद्द वेभ्यश्चैवै तत्पितृभ्यश्चाविज्यं करिष्यत् नि ते ' श्रुति का समन्वय ३२६ - मन्त्रशक्ति से समन्वित दिव्यभावापन्न-श्राज्य, और तत्र ' अस्कन्न ' रूपा भावना ३२७ - ज्ञानुगता विछिन्ना धारा का संरक्ष-णोपाय ३२८ - भूमिष्ठ आज्य से शत्रुपक्ष की समृद्धि, और तन्निरोधक प्रस्कन्नभाव ३२६ – ' यद् यज्ञस्यातिरिक्त तद्भ्रातृ-व्यम् ' रूप महत्त्वपूर्ण - निगम-वचन ३३० - श्रविकम्पित श्राज्य, श्रौर अस्कन्न -आज्य, एवं तदनुगता श्राज्यरक्षा ३३१ पशिय - नियत - सञ्चरमार्ग, और तद्द्वारा ऋत्विजों का गमनागमन ३३२ - दक्षिण माग का श्रयज्ञियत्त्व " 1 " ३४३ - श्राहुति प्रदानवेला ,, ३४४ - श्राहवनीयाग्नि की स्तुति ३४५ - ' तन्द्रो हव्यं वदसि ' " ३४६ - दिवेषु राजसि ’ 23 " ३४७ - ‘ अवतां द्यावापृथिवी ', और रक्षणक ३४८ - स्विष्टकृद्देवता का सन्तर्पण " ३४६ - इन्द्र के साम्राज्य का विस्तार " " " १७६ 31 39 39 १३५६ " " 29 35 " " 99 " 23 " ) " " ३५० - यज्ञपति इन्द्र की तुष्टि, और यज्ञसंसिद्धि ३५१ – कायाग्नियुक्त - श्राध्यात्मिक वायु ३५२ - ' वायुः खात् शब्दस्तत् ' इत्यादि " 19 12 प्रातिशाख्य - सिद्धान्त का संस्मरण ३५३ - वाक्तत्त्व, और तन्निबन्धन बायु ३५४ - केवल वायव्यावाक, और अविच्छिन्न-धारात्मका पशुवाणी ३५५ - मानुषीवाक् से अनुप्राणिता वाणी में वर्ण शब्द पद वाक्यादि - रूपा विभक्तियों का समन्वय ३५६ - विभक्तिभावात्मक - विभक्तिकरण - लक्षण व्याकरण, और तत्प्रवर्तक ज्ञानमूर्ति प्राज्ञेन्द्र " 23 १३६०

पृष्ठ 308

शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - १-२ - मोतीलाल शास्त्री, पृष्ठ 308 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

विषयसूची ३५७- ( क ) व्याकरणतत्त्व के प्रवतक इन्द्रदेवता १३६० ३७५ - ' ते तदुभे ज्योतिषी सङ्गच्छेते ' का ३५७ - ( ख ) वाङमय इन्द्र ३५७ - ( ग ) अधिदैवतानुगत वाङमय आकाश, 19 और इन्द्र 29 ३५८८ - इन्द्रकृता बलप्रन्थि, और वाङमय पचमहाभूत की सृष्टि ३५६ - ' इन्द्रो वागित्याहु: ' श्रुति का समन्वय ३६० यज्ञपुरुष का मलस्थानीय हृदयभाव, और पूर्वाधार " 39 19 ३६१ - तूलस्थानीय शिरोभात्र, और उत्तर घार ३६२ - साङ्क तिक - चतुषपर्वा श्रात्मा " ३६३ - यज्ञपुरुष की पूर्णता का स्वरूप- सम्पादन शिरःस्थानीय- उत्तराधार ३६४ - चार मर्त्य - प्राणों से मध्यान का स्वरूप-निर्माण ३६५ - दधिमन्थनोत्थ श्राज्यस्थानीय भागात्मक- ' श्री ' तत्त्व " " 19 सार-३६६ - श्रीभागात्मक शिरोभाग, और समञ्जन-क की द्वितीया उपपत्ति का समन्वय ३६७ - जुहू उपभृत् आदि के समञ्जनकर्म के सम्बन्ध में एक प्रासङ्गिक प्रश्न, और तत्समाधान ३६८ - वापात्र का नैदानिकरूप यजमान ३६६ - उपचत् का नैदानिकरूप शत्रु 19 " 1 " 1 39 " ३७० - समञ्जनकर्म का पारिभाषिक – समन्वय १३६१ ३७१ - ( क ) श्रात्मस्थानीय - त्र वापात्र 22 ३७१ - ( ख ) जुहू स्थित श्राज्यशेषांश, श्रौर शिरोभाग 19 ३७२- प्राकृतिक - आधिदैविक- जुहू - उपभृत् श्रु वा श्रादि यज्ञपात्रों का संस्मरण, एवं तत्समतुलित वैधयज्ञ के पात्र ३७३ – अन्तरिक्ष की आाज्य से परिपूर्णता 93 " " ३७४ - श्राज्यरस से देवज्योतियों का समिन्धन " १८० समन्वय ३७६- तस्मादेवं समनक्ति, और समञ्जनक ३७८-- पूर्वाधार तथा उत्तराघार के सम्बन्ध में ( आख्यानभाषा में ) एक महत्वपूर्णा-- वैज्ञानिकी-उपपत्ति का समन्वयोपक्रम ३७६- श्रहंभदात्मिका श्रेष्ठता के लिए मन, और वाक में विवाद ३८० - वाकू की तर्कपरम्परा, और मन का पराभव १३६१ ३८१ - मन की तर्कपरम्परा, और वाक् कापराभव ३८२ - प्रजापति का मन के प्रति पक्षपात " ३८३ - वाक् का प्रजापति के प्रति श्राक्रोश ३८४ - वाक् का प्रजापति के लिए हविद्रव्य-वहन निषेध ३८५ - मन के स्वाभाविक स्वरूप का विश्ले-षण, और आख्यान ३८६ नाद -- ति - स्वरात्मक सन्दर्भ का संस्मरण ३८७ प्रजापति के निर्णय का वैज्ञानिक-समन्वय ३८८ - शब्दजाल से आत्मतुष्टि का अभाव, और वाक् का पराभव ३८ ९ - नेति नेति रूपा - शब्दातीता -- मौलिक-उपनिषत् ३६० - सबल, एवं सार्थक कर्म्म की स्वरूप-परिभाषा ३६१ - उपांशुभावानुगत कर्म की वीर्य्यवत्ता ३६२ - शब्दात्मक - उद्घोष, और कर्म का निर्वीर्य्यत्त्व ३६३ - कम्र्म्मसिद्धि का अन्यतम द्वार उपांशु-भाव 17 19 " " १३६२ " " } " " "

पृष्ठ 309

शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - १-२ - मोतीलाल शास्त्री, पृष्ठ 309 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

शतपथब्राह्मा २ खराड ३६४ - मनोऽनुगत पूर्वाधार में वाक् का प्रवेश निषिद्ध ३६५ - प्राजापत्य - ( श्रात्मनिष्ठा से समन्वित ) १३६३ कर्मों की उपांशुरूपता का रहस्यात्मक समन्वय ३६६ - प्रजापति के लिए वाक का श्रहव्य-वाटव ३६७ - प्रजापति के निर्णय से वाक का गर्भपात ( अभिमानपतन ) ३६८ - श्रपमानिता - आवेशाविष्टा - वाक् के अतिमानात्मक उद्गार ३६६ - वाक के अपमान का परिणाम ४००- धामच्छुद - अत्रिप्राण, और तमोमलक-भूत - भौतिक धामहृदसर्ग ४०१ - आत्रेयी - वाक्, और आत्रेय - धामच्छद-सग ४०२ – वाक के अत्रिरूप - गर्भ की बहिर्म्मण्डला-नुगता गति ४०३ - अधामच्छद प्रजापति - रूप श्रात्मदेवता ४०४ - अर्थात्मिका धामच्छदा वाक् " " " " " 21 " " " " ४०५ - तम, और अत्रि ४०६ - श्रत्रिलक्षण तमोभाग का समावेश, और भूतसर्ग की प्रवृत्ति १०७ - ऋतुमती स्त्री की विज्ञानसिद्धा अत्रिप्राण निबन्धना श्यता ४०८ - चेतनभूत, और प्रचेवन भूत अस्पृ-४०६ - अर्थमात्रानिबन्धन - तमोभाव से श्रात्मा के सहज विकास की श्रभिभूति, किंवा अवरोध ४१० - बाकू के अपमान का पारिभाविक-स्वरूप- समन्वय ४११- अपमानलक्षणा श्रर्थगरिमा ४१२ - अर्थगरिमात्मिका तमोवृति से सम-—न्विता वाक का प्रजापति - सम्बन्ध से पार्थक्य ४१३ - श्राख्यान रहस्य का उपराम, और उत्तराधारक की परिसमाप्ति इति - उत्तराधार कम्र्मोपपत्तिः चतुर्थ - अध्याय में पञ्चम, तथा चतुर्थ- प्रपाठक में प्रथम - ब्राह्मण - उपरत चतुर्थोऽध्यायश्चात्र - उपरतः ४ == * == १८१ १३

पृष्ठ 310

शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - १-२ - मोतीलाल शास्त्री, पृष्ठ 310 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

विषयसूची द्विब्राह्मणानुगत - द्वितीय - आघारब्राह्मण अत्र - उपरत २ इति द्विब्राह्मणात्मकं माघारब्राह्मणमुपरतम् इति- पूर्वोत्तराधारकर्म्म १६- २० १८२