Shatpath Brahman 1 2 — पृष्ठ 291–300
शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - १-२ - मोतीलाल शास्त्री · पृष्ठ 291–300
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१६२८- अग्नि का रहस्य- पूर्ण दौत्यक शतपथब्राह्मण २ खण्ड २६ - होसारं विश्ववेदसम् ' का समन्वय 33 ३० - ' होता यो विश्ववेदसम् ' रूप का काल्प-निक स्वरूपोपबृ ंहण " " १३०५ ३१ - यज्ञकर्म में मानुष- कल्पनाओं का प्रचण्ड विरोध, एवं संशोधन का बहिष्कार ३२- अत्यन्त महत्त्वपूर्ण - यशक 19 के प्रति-१३०६ वायुविशोधन- परा भ्रान्त कल्पना ३३ -- मानुषकल्पना से अनुप्राणित द्रव्यों का योग, और आज के ये काल्पनिक यज्ञ १६३४ -- परम्परानुगता पद्धतियों के अनुसरण 22 के लिए प्रचण्ड श्रादेश, और फलोप 39 संहार १६३५- ' धाय्या ' नामकी सामिधेनी ऋचाओं से अनुप्राणिता विशेषता का स्पष्टीकरण १३०६ ३६ - दर्शपूर्ण मासानुगता अपेक्षिता काम्येष्टि, और सामिधेनी ऋचाएँ 93 ३७ -- त्रिरावृत्ति पूर्वक - सामिधेनी - अमुक ऋचाओं का अनुवचन ३८ - दर्रा पूर्णमास, और १५ - सामिधेनी ऋचाएँ,, ३१ - श्रध्वरवन्त त्रिच का स्वरूप- समन्वय " ४० - अध्वरसम्पत्ति प्राप्ति का संस्मरण " ४१ - अध्वर्यु के द्वारा इद्ध यज्ञाग्नि ४२ - होता के द्वारा समिद्ध यज्ञाग्नि १६४३ - दिव्यतेजोयुक्त यज्ञाग्नि, और सामिधे-न्यनुवचनकर्म्म का निष्कर्षार्थ समन्वय चतुर्थ अध्याय में प्रथम, एवं तृतीयप्रपाठक में तृतीय-ब्राह्मण - उपरत सामिधेनी - ब्राह्मणानुगत द्वितीय -ब्राह्मण अत्र -उपरत 19 " चतुर्थ अध्याय में द्वितीय एवं तृतीय- प्रपाठक में चतुर्थ " ब्राह्मण – उपक्रान्त सामिधेनी - ब्राह्मणानुगत - तृतीय - ब्राह्मण अत्र - उपक्रान्त ३ १६४४ - मन्त्रशक्ति के द्वारा आहनीवाग्नि में प्रतिष्ठित दिव्याग्नि के प्रमुख कर्त्तव्य का संस्मरस १३०७ १६३ १६४५ - मानुषात्मा के साथ दिव्यप्राण का सम्बन्ध विधाता आहवनीयस्थ-दिव्याग्नि १३०७
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१६४६ - आहवनीयाग्नि में प्रतिष्ठित दिव्याग्नि का अत्यन्त दुरूह कर्म्म ४७ - निगदानुवचन के द्वारा दिव्याग्नि में प्रेरणाचल का अाधान, और निग-दानुवचन की प्रमुख उपपत्ति ४८ -- वाङमय वीर्य्यं का लौकिक चमत्कार ४ — अग्निर्वाग्भूत्वा - मुखं और आग्नेय वागवी प्राविशत्, ५०- ' नात्मानमवसादयेत् ' रूप महान् श्रादेश ५१ - धर्मशास्त्र का सदा शुभवाणी के अनुगमन के लिए प्रचण्ड - श्रादेश " ५२ - स्वशक्ति का स्वरूप- बोधाभाव, और शक्तिमान् का भी तत्प्रयुक्त असा-मर्थ्य ५३ - भगवान् मारुति के उदाहरण के द्वारा वस्तुस्वरूप का समन्वय ५४ - वाक के द्वारा यशोकीन ५५ स्ववीर्य्य जागरूकता से अनुप्राणित-निगदानुवचनकर्म्म ५६ - प्राणदेवताओं का चातुर्वर्ण्य ५७ – अग्निदेव, और ब्राह्मणवर्ण ५८ - इन्द्रदेव, और क्षत्रियवर्ण ५६ - विश्वेदेव, और वैश्यवर्ण ६० — पूषन् - देव, और शुद्रवर्ण ६१- ब्रह्मवीर्य्यप्रवत्त ' क - ब्राह्मवर्ण ६२ - वर्णत्रयी की प्रतिष्ठा, और प्रथमवर्ण " ६२ - ब्रह्म वीर्यात्मक ब्राह्मण अग्नि का होतृस्व 39 ६४ - कर्म्मापेक्षया ब्राह्मणाग्नि का भारतत्त्व ६५ - पार्थिव हव्य के वहनकर्म्म से आधि-दैविक - प्राणदेवताओं का भरण, और अग्नि का भारतत्त्व १६६६ - वैश्वानराग्निप्राणरूपेण पार्थिव-प्रजा का भरण, और अग्नि का भारतत्त्व विषयसूची १३०७ " १३०८ 31 27 " " " 39 " 11 १६६७ - भरणकर्मात्मक- ' भारत ' नाम का समन्वय ६८ - भूपिण्डानुगता त्रैलोक्य - व्यवस्था का संस्मरण ६६ - त्रैलोक्य के शत्रसोन पात् - देवता ७० - भौमत्रिलोकी के मानवदेवता ७१ - भूपिण्डानुगत - पृथिवीलोक के शास्ता-शव सोन पात्- ' भारत ' अग्नि और ' भारतवर्ष ७२ - वामदेव, एवं श्रङ्कार के माध्यम से भारतीय प्रजा के लिए भरण - पोषणा-७३ - दौष्यन्ति - भरतानुगत ' भारत ' नाम का यशोनामपरकत्व ७४ - ' भारत ' अभिधा का एकमात्र प्रमुख कारण ' भारत ' नामक शवसनोपात्-अग्निदेव ७५ निगदानुवचोपपत्ति - समन्वय १३०८ " " 22 17 37 99 इति - निगदानुवचनकम्मोंपपत्तिः अथ प्रार्पेयानुवचनोपपत्तिः ७६ - होता के द्वारा ग्रार्षेय मन्त्र का उह १३०६ ७७ - श्रार्षेययचनोपपत्ति से अनुगत. अग्रिम पूर्वाधार - ब्राह्मण अथ - निवित्पाठः ७८ होता के द्वारा निवित्पाठ ७६ - अग्निदेव की अनुग्रह - प्राप्ति से अनु प्राणित- निवित्पाठ ८० - प्राकृतिक नित्ययज्ञ का संस्मरण १६८१- भौम- मनुष्यविध - देवताओं के द्वारा अरणिमन्थन से सर्वप्रथम स्वर्ग में यज्ञाग्नि का आविष्कार “ देवेद्धः ” का समन्वय १६४ और 37 17 37
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शतपथब्राह्मना २ खण्ड न्याय का संस्मरण १६८२ - श्रद्धादेव मनु के द्वारा भारतवर्ष में यज्ञाग्नि का अनुमगन, और मन्त्रिद्धः का समन्वय ८३ - ऋषियों से उपस्तुत यज्ञाग्निदेव, और ' ऋषिष्टुतः ' का समन्वय ८४ - विद्वान् ब्राह्मणों से अनुमत यज्ञाग्नि देव, और ' विप्रानुमदितः ' का सम-न्वय ८५- ' कविशस्तः ' का स्वरूप- समन्वय ८६ - यज्ञकर्मानुगता - शस्त्र स्तोत्र ग्रह - कर्म-त्रयीका संस्मरण ८७– ऋगनुगत - शस्त्रकर्म्म - सामानुगत - स्तोत्रकर्म्म - यजुरनुगत - ग्रहकर्म्म १०- ग्रहकर्म का पारिभाषिक समन्वय, और गर्म की स्वरूपस्थिति ६१ - गर्भ के अवयवों का स्वरूप - विन्यास, और शस्त्रकर्म्म ६२ - गर्भप्रसूति, और स्तोत्रकर्म्म ६३ - यशानुबन्धिनी - प्रजननकर्मत्रयी १३.६ " " " " १३१० १७०३ - अग्नि का ' घृतवाहनत्त्व ' ४- ' घृतवाहनः ' का समन्वय ५ - सर्वयज्ञ सञ्चालक- श्रग्निदेव ६ - ' अग्निरु वै यज्ञः ' ७- अग्नि के द्वारा यज्ञों का प्रणयन ८ - रसाग्नि - रूप- अमृताग्नि, और चिते-निधेय - भाव E- भूताग्नि - रूप मर्त्याग्नि, और चित्य-भाव १० - रसाग्नि की अवसानभूमि, और रसतम साम ११- रस्तमसामात्मक - रथन्तरसाम १२ - ' रसतमं ' - ह वै तद्यन्तरित्या चढते-परोक्षम् ' १३- • तं वा॒ एतं रसं सन्तं ‘ रथ ' इत्या-चक्षते ' १४- ' रस ' की रथ - रूपता १३१० 27 " 2 " 1 १३११ " 1 " " " " १४ - श्रग्निकी रथावस्था और , ' रथी ' 21 ६४ - श्राहुतिरूप ' ग्रह ', और उपादानद्रव्य ६५ - ऋग्वेदी होता के द्वारा शंसनरूप शस्त्रकर्म्म ६६ - यजुर्वेदी अध्वर्यु के द्वारा ग्रहकर्म " " ६७ - सामवेदी उद्गाता के द्वारा स्तोत्रकर्म्म, ६८ अग्नि, और ' कविशस्तः ' ६६ - पार्थिवमण्डलाध्यक्ष ६६- पार्थिव - महिलामण्डल में व्याप्त होतृ-कम्र्माध्यक्ष प्राणाग्नि की उत्तरोत्तर सुतीभाव में परिणति, और तद-नुबन्धी ' ब्रह्मसंशितः ' का समम्वय १७०० - उदकरूप घृत, किंवा धृतरूप उदक १७०१ -- श्रग्निर्वा इतो वृष्टिमुदीरयति २ - श्राज्यमा झनुगत - नीरक्षीर विवेक-" का समन्वय १६ - यज्ञ विनाशक असुर प्राणविशेषों का राक्षसव १७ होता अग्नि का पारिभाषिक ' तू ' भाव १८ - अग्नि के द्वारा असुर राक्षस- निरसन १६- देवपात्रात्मक " २०- वत्रट्काररूप मयत्व, २६५ वषट्कार, और अग्निदेव " 9 धारपात्र का वाङ -२१ - आस्पात्ररूप ‘ आस्य ' पात्र २२- आस्यपात्रात्मक अग्नि देव २३ - सौररश्मिगत प्राणदेवताओं के द्वारा पार्थिवरसों का पान २४ - चमसानुगत - सोमपान का संस्मरण १७२५ - अग्नि का ' पानपात्रत्त्व ' समन्वय " " " " " 39 13
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विषयसूची १७२६ सम्बत्सरचक्रात्मक रथ के नेमि, श्रग्नि की प्रतिष्ठा का संस्मरण १३ और धारा १३११ १७३५ - श्राध्यात्मिक अग्नि - महिमा 93 २७ - नेमिरूप - श्रग्निदेव का संस्मरण २८ - सम्वत्सरत्र्याप्ति का यशोवर्णन इति - विनित्पाठः अथ -- देवतावाहनोपपत्तिः 39 १७२६ - सामिवेनियों से प्राणाग्नि का समिन्धन १३१२ ३० - व्यष्टि - समष्टि - रूप उभयात्मक गुण का यशोवर्णन, एवं यशोवीर्य का अग्नि में प्रधान ३१ - आह्नानकर्म की संक्षिप्ता उपपत्ति का समन्वय ३२ - ' महिमानमावह ' पद की महत्त्वपूर्ण व्याख्या ३३- वषट्कारमण्डलरूप - महिमामण्डल १७१४ - वाङ मय - भौतिक - पिण्डों के गर्म में " ३६- शब्द विन्यास के माध्यम से शरीराग्नि-के बलाबल का अनुमान ३७- अग्नि, और ' जातवेद ' ३८- परिचय भावात्मक जात - वेदत्त्व ३ - वाक - प्राण - चक्षु - रूप आदित्य और अग्नित्रयी श्रग्निवायु-. ४८ - वाक् प्राण - चक्षु - रूप से अग्नि का जातवेदत्त्व ४१ - ( क ) आध्यात्मिक अग्नि के जातवेदत्त्व का समन्वय ४१ - ( ख ) अनुवचनकर्मानुगत उत्थान भाव ४२ – याज्याकर्मानुगत भूप्रतिष्ठाभाव १७४३ - याज्या का पृथिवी के साथ निदानभाव, और देवता वाहनोपपत्ति का उपराम इति - देवतावाहनोपपत्तिः चतुर्थ अध्याय में द्वितीय एवं तृतीय - प्रपाठक में चतुर्थ- ब्राह्मण - उपरत सामिधेनी - ब्राह्मणानुगत - तृतीय - ब्राह्मण अत्र - उपरत ३ १६६
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शतपथब्राह्मण २ खण्ड चतुर्थ - अध्याय में तृतीय एवं तृतीय- प्रपाठक में " पञ्चम- ब्राह्मण - अत्र - उपक्रान्त सामिधेनी -- ब्राह्मणानुगत-- चतुर्थ - ब्राह्मण अत्र उपक्रान्त ४ अथ - शान्तिकम्पपत्तिः १७४४ - साधिधेन्यनुवचन — श्रार्षेय - प्रवरण-निगदानुबचन निवित्पाठ, तथा देवा-वाहन के द्वारा वैध आहवनीय अग्नि की निरतिशयरूपेण समिद्धा लौ-किकता एवं अनाक्रमणीयता का संस्मरण ४५- श्रनवघृष्य- श्रनवमृष्य - दिव्याग्नि ४६ - सामिधेनी ऋचाओं से अनुप्राणित-श्राध्यात्मिक पर्व -समिन्धन का क्रमिक समन्वय १३१३ ४७- ' प्र वो वाजा ', और ' प्राण ' का समिन्धन " ४८ - ' अग्न श्रायाहि ', और ' अपान ' का समिन्धन ४६ - ' बृहच्छोचा यविष्ठ्य ० ' और ' उड़ान ' का समिन्धन ५० – ‘ स नः पृथुश्रवाय्यम् ० ' और ' श्रोत्रे-' न्द्रिय ' का समिन्धन ५१ ' इडैन्यो नमस्यः ’ - और ' वागिन्द्रिय ' का समिन्धन १७५२ - ' अश्वो न देव वाहनः ', श्रौर- ' प्रज्ञान ' नामक ' सर्वेन्द्रियमन ' का समिन्धन 33 १७५३ - ' श्रग्ने ] दीद्यन्तं ', का समन्धिन और - ' चक्षुरिन्द्रय ' ५४ - ' अग्नि दूतं वृणीमहे ', और व्यानात्मक ' मध्यप्रारण ' का समिन्धन ५५- व्यानप्राणात्मक मध्यप्राण का भुति-वचनों के द्वारा यशोवर्णन ५६ - व्यानोर्ध्व स्थित प्राण के प्राण, श्रौर उदान - रूप दो महिमा विवत्त ५७ – व्यानाधः स्थित अपान के समान, और पान नामक दो महिमा - विव ५८ - ' शोचिष्केशस्तमीमहे: ' इत्यादि सामि-घेनी - ऋचा के द्वारा ' परोत्तेन्द्रिय ' का समिन्धन " १३१४ 37 ५६ - शिश्नोदर - परायण, कामभोगासक्त- मानव १३१५ " ६० - कामप्रतिबन्धनदशानुगत - सन्ताप १२१४ 19 ६१ - ' शोचिष्केश ' शब्द का समन्वय ६२ - ' समिद्धो अग्न आहुत: ' इत्यादि मन्त्र के द्वारा वाङ्मय ( मूल - प्रन्थिस्थ-प्राण ) का समिन्धन १७६३ - ' आजुहोता दुवस्यत ' इत्यादि मन्त्र से ' सर्वाङ्गशरीर ' का समिन्धन 13 " १६७
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विषयसूची का स्वरूप- समन्वय १७६४ – समिन्धन भावना के द्वारा होता के सर्वात शरीर का व्यष्टि -समष्टिरूप से समिन्धन ६५ - श्रग्निवत् प्रज्ज्वलित होता १३१५ 19 ६६ - अपमान कर्ता के प्रति अभिचार - प्रयोग 97 १७६७ – समिन्धनकर्मानुगत श्रभिचारकम्प १७६८ - होता के तिरस्कार का निषेध १७६६- इत्थंभूत - महान् - स्तुत्य - नमस्य- अग्नि-देवता के लिए, एवं श्रग्निरहस्य वित् ऐसे ब्राह्मणश्रेष्ठ के लिए हमारी अनेक नमः - उक्तियाँ चतुर्थ - अध्याय में तृतीय एवं तृतीय - प्रपाठक में " पाँचवाँ - ब्राह्मण - उपरत सामिधेनी - ब्राह्मणानुगत - चतुर्थ - ब्राह्मण अत्र- उपरत ४ इति - प्रथमकाण्डे - तृतीय - चतुर्थाध्याये वाह्मणचतुष्टयात्मकं - सामिधेनी - ब्राह्मणमुपरतम् इति - सामिधेन्यनुवचनकर्म्म - उपरतम् १८ १६८
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श्रीः थ - शतपथब्राह्मण - हिन्दी - विज्ञानभाष्ये - प्रथमकाण्डे चतुर्थाध्याये द्विब्राह्मणात्मकं - श्राघारब्राह्मणम् १ ९ -२० पूर्वात्तराघारकर्म क्रमप्राप्त १६ - २० वें कर्म के विज्ञानभाष्य की “ विषयस्मारकसूची ” ( पृष्ठसं ० १३१७ से १३६६ पृ ० पर्य्यन्त ) २- मूलब्राह्मणों का अक्षरार्थ- समन्वया-१ - प्रथम काण्डान्तन्तर्गत - चतुर्थाध्ययानुगत-द्वि ब्राह्मणात्मक श्राघारब्राह्मण ( मूल ) १३१७ त्मक अनुवाद १३- सूत्रानुगत पद्धतिसंग्रह चतुर्थ अध्याय में चतुर्थ, एवं तृतीयप्रपाठक में षष्ठ- ब्राह्मण - अत्र - उपक्रान्त द्विब्राह्मणानुगत - प्रथम - आघारब्राह्मण अत्र - उपक्रान्त १ वैज्ञानिक विवेचना १-- पूर्वाधारकम्मपत्तिः १६६ १३२५ १२३६
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४ - सामिधेन्यनुवचनकर्म्म का संस्मरण ५ होता के द्वारा चाहनीय इव श्रग्नि का समिन्धन ६ – समिद्धाग्नि की अलौकिकता ७- श्राहुतिलक्षण यज्ञकर्म्म, और देव-प्राणानुबन्धी ग्रन्थिबन्धन - सम्बन्ध 27 ८ - श्राहुतिद्रव्य में प्रविष्ट यजमान का मनःप्राणवाङमय आत्मा - यावद्वित्तं तावदात्मा ' का संस्मरण १० - यजमानात्मा का आहुति - माध्यम से दिव्याग्नि के साथ ग्रन्थिबन्धन सम्बन्ध ११ - आहुतिकर्म्मनिबन्धना दिव्यलोकावाप्ति का समन्वय १२ - अलौकिक दिव्याग्नि का श्राधान १३ - देवप्राण से समन्वित, श्राहवनीयाग्नि, और सामिवेन्यनुवचनकर्म्म १४ - द्य लोकस्थ देवदेवताओं की भोग्या-यजमानप्रदत्ता आहुति १५ - सिंहावलोकनात्मक- पूर्वकर्म का संस्मरण, और ब्राह्मणश्रुति १६- देवाहुति - ग्रहणयोग्य - ( दिव्यभावापश्न ) आहवनीयाग्नि १७- श्रावापदेवता नामक प्रधानदेवता का इष्टिदेवतात्व १८ - प्रधानदेवतायाग से पूर्वभावी पूर्वाधार, और उत्तराधार कम् १६- मन: स्वरूप- समर्पक पुर्वाधारकर्म २०- वाक्स्वरूप समर्पक उत्तराधारकर्म्म विषयसूची १३४२ २१ - चतुर्विंशत्यक्षरा गायत्री - सम्पत् से युक्त चतुर्विंशस्तोमावच्छिन्न पृथिवीलोक 17 २२ - चतुश्चत्वारिंशदक्षरा - त्रिष्टुपू- सम्पत् से युक्त चतुश्चत्वारिंशत् स्तोमा- 77 वच्छिन्न अन्तरिक्ष लोक " " " 27 13 23 17 " " " 30 २३- अष्टाचत्त्वारिंशदक्षरा जगती- सम्पत् से युक्त श्रष्टचत्वारिंशस्तोमावच्छिन्न लोक १४४२ २४ - भूपृष्ठानुगत पारावातपृष्ठान्त महिमा विवर्त्त १३४३ २५ - शाक्कर सामानुता त्रैलोक्यरूपा अमृत-लक्षएा - बाकू - शुक्रानुगता - द्यु लोकात्मिका वाङ्मयी ( भूकेन्द्रतः उपक्रान्ता, पारावतपृष्ठान्ता ) पृथिवी, और पार्थिव जगत् का तृतीयविवर्त्त ' ( ३ ) २६ - त्रयस्त्रिंशत् - श्रहर्गणात्मक - द्युलोक, द्वाविंश - अहर्गणात्मक अन्तरिक्षलोक, एवं एकादश- अहर्गणात्मक - पृथिवी-लोक - समष्टिरूपा भूकेन्द्रतः श्राप्यपृष्ठा-न्ता त्रास्त्रिशदर्गणाधिपर्यन्त - व्या-प्ता, त्रैलोक्यरूपा, अमृतलक्षणा - श्रापः शुक्रानुगता, अन्तरिक्षलोकात्मिका-श्रापोमयी - पृथिवी और पार्थिवजगत् का द्वितीय विवर्त्त ( २ ) २७- एकविंश- अहर्गणात्मक द्युलोक, पञ्च-दश - अहर्गणात्मक अन्तरिक्षलोक, एवं त्रिवृत् - अहर्गणात्मक पृथिवीलोक - सम-ष्टिरूपा, भूकेन्द्रत: आग्नेयपृष्ठान्ता-एकविंश - हर्गण । वधिपर्यन्त - व्याप्ता, त्रैलोक्यरूपा, अमृतलक्षणा- श्रग्नि: -शुक्रानुगता - द्य लोकानुगता पृथिवी-लोकात्मिका श्रग्निमयी- ( श्रग्नि - सोम-मयी ) - पृथिवी, और पार्थिवजगत् का प्रथम - विवर्त्त ( १ ) २८- अष्टाचत्त्वारिंशत्- स्तोमावच्छिन्ना - वाङ् मयी ' विश्वम्भरा- पृथिवी ' २६- त्रयस्त्रिंशत्स्तोमावच्छिन्ना - श्रापोमयी-' सागराम्बरा- पृथिवी ' ३०- एकविंशस्तोभावच्छिन्ना ' प्रदिति - पृथिवी ' -अग्निमयी-11 १७०
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शतपथब्राह्मण २ खण्ड ३१ - त्रैलोक्यात्मिका - अदिति पृथिवी, और पृथिवलोक ३२ - त्रैलोक्यात्मिका - सागराम्बरा- पृथिवी, और ' अन्तरिक्षलोक ' ३३- त्रैलोक्यात्मिका ' विश्वम्भरा - पृथिवी ', और ' द्य लोक ' ३४- त्रैलोक्य- त्रिलोकी रूपा --- नवलोकात्मिका पृथिवी, और तद्वितानाघारभूत भूपि -ण्ड का केन्द्र ३५ - भूकेन्द्रावच्छिन्न भूपिण्डरूप पारिभा-षिक- ' भू: ' शब्द ३६- त्रैलोक्य- त्रिलोकीरूप - महिमा - मण्डल, और पारिभाषिक- ' पृथिवी ' - शब्द १३४३ " " " " ३७ - महिमा - पृथिवी का नवलोकात्मक विस्तार 39 ३८ - पार्थिव नवलौकात्मक विवर्त्त - परिलेख: १३४४ ३६ – वाङ ्ममयी - पृथिवी, और शाकरसाम " ४० - श्रापोमयी - पृथिवी, और वैरूपसाम ४१ - श्रग्निमयी - पृथिवी, और रथन्तरसाम ४२ - रथन्तरसामानुगत श्रदितिलक्षण- प्रथम पार्थिव विवत ' का संस्मरण ४३ - अग्निशुक्र- निबन्धन त्रिविध - युग्मस्तोम " ४४ - युग्मस्तोमत्रयी से अनुप्राणिता देवत्रयी,, ४५ - देवत्रयी के अवान्तर विभूतिभाव ४६- श्राहवनीयाग्निसमिन्धन कम्र्मानुप्राणित देवदेवता ४७ - यज्ञिय - देवताओं की प्राणात्मकता ४८ - मन, और प्राण तत्त्वात्मिका मूल प्रतिष्ठा का संस्मरण ४६ - मनोमय - वाक् - रूप - पात्र ( बषट्कारपात्र ) और तत्र प्राण की श्रापूर्य्यमाणता ५० - मनोवाङमय पात्र का वयोनाधत्त्व ५१ - वयोनाघरूप छन्दस्तत्व " ५३ - वय- वयोनाधात्मक ' वयुनम् ' '५४ –यजमान का यज्ञसम्बन्धानुगामी - मनः-प्राणवाङमय प्रात्मा ५५- भूकेन्द्रस्थ- हृद्य - अन्तर्यामी - अनिरुक्त प्रजापति ५६ - पार्थिवजगत् की मूलप्रतिष्ठा रूप प्रजा-पति ५७ -प्राण - वाग्गर्भित - मनोमय — अनिरुक्त-प्रजापति ५८ - मनोवागगर्भित - प्राणमय उद्गीथप्रजापति ५ - मनःप्राणगर्भित - वाङ् मय - सर्वप्रनापति ६० - प्रजापति के त्रिविध महिमा - वित्त ६१ - भूकेन्द्रानुगत प्रजापति की प्राण - वाक-कलाओं का उन्मुग्धत्त्व, एवं मनः-कला का उद्द्बुद्धत्त्व ६२ - हृत्प्रतिष्टं मनः " ,, 29 " " " } " " ५२ - प्राणरूप देवतत्त्व की ' वयोरूपता ' 22 ६३ - तन्मे मनः शिवसंकल्पमस्तु ६४ - हृम्पृष्ठत: -- सप्तदशस्तोम - पर्यन्त-आग्नेयप्राण का प्राधान्य ६५ - सप्तदश - अहर्गण की प्रमुखता ६६ - त्रयस्त्रिशदहर्गणात्मक - सागराम्बरालक्षण पार्थिवविवर्त्त के १६-१६ - अहर्गणात्मक दो अवान्तर विवर्त्त ६७ - हृत्पृष्ठतः साम्राज्य १६ - पर्यन्त अग्नि का ६८ - १८ से २७ पर्यन्त भास्वरसोम का प्रभुत्त्व ६६-२७ से ३३ पर्य्यन्त दिकसोम का प्रभुत्त्व ७० - सप्तदशस्थान, ७१ - सप्तदशस्थान का पारिभाषिक श्राहव-नीयत्व समन्वय और श्रग्नि - सोम का १३४४ 27 १३४५ " " 21 १७१
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७२ - दाह्या सोमाहुति से प्रज्जलित दाहक अग्नि की २१ स्तोमपर्यन्त व्याप्ति ७३ - एकविंशानुगता श्रग्नि - सोम - व्याप्ति का पारिभाषिक - समन्वय ७४ - सप्तदशपर्य्यन्त प्राजापत्या प्राणकला का प्राधान्य ७५- प्राणप्रधान उद्गीथप्रजापति का पारि भाषिक समन्वय ७६ - हृत्पृष्ठत: - २१ पर्य्यन्त व्याप्त- रथन्तर-साम - सीमावच्छिन्न मण्डल में ' वागग्नि ' का प्राधान्य ७७ - मन, और प्राण की उन्मुग्धता, तथा वाक्कला का उद्बुद्धत्त्व ७८ - मनः - प्राण - गर्भित - वाङ्मय - सर्व प्रजापति के पारिभाषिक स्वरूप का समन्वय ७६ - यज्ञपरिधि, और रथन्तर सामसीमा ८० - यज्ञोपक्रमस्थान, और भूकेन्द्र ८१ - भूकेन्द्रावच्छिन्न - प्राण - वाग्ग [ गर्भित - मनो-मय अनिरुक्तप्रजापति ८२ - रथन्तरलक्षण – परिध्यवच्छिन्न- मनः-प्राणगर्भित वाङमय - सर्व प्रजापति ८३ - उभयमध्यस्थ- आग्नेय - सौम्य प्राणोभय-मूर्ति - मनोवाग् गर्भित -- यशात्मक - उद्-गीथ प्रजापति ८४ - पार्थिवी आहुति से मनोवाक् के द्वारा प्राणात्मक - देवों का सन्तर्पण ८५ - भूकेन्द्र र श्रनिरुक्तभाव ८६ - यज्ञमण्डलकेन्द्र, और उद्गीथभाव ८७- ( क ) - यज्ञपरिधि, और सर्वभाव 29 ८७- ( ख ) -- भूकेन्द्र और मनोमय प्रजापति ८८ - यज्ञमण्डल, और प्राणमय - प्रजापति " ८६ - यज्ञपरिधि, और वाङमय प्रजापति " ६०- एकविंशस्तोमावच्छिन्न - रथन्तरं साम ( १ ) ६१- सातदश स्तोमावच्छिन्न – मण्डलं -हृदयम् ( २ ) 13 विषयसूची १३४५ " " " " 13 27 ६२ - भूकेन्द्र: ( ३ ) ६३- मनःप्राणगर्भितः - वाङमयः -- ' सर्वप्रजा-पति: ( १ ) ६४ - मनोवाग्गर्भितः प्राणमयः - ' उद्गीथ-प्रजापति: ' ( २ ) ६५ - प्राणवाग्गर्भितः - मनोमयः -- श्रनिरुक्त-प्रजापतिः ( ३ ) ६६ - सर्वप्रजापतिर्वाङमय: - वाक् ( १ ) १३४५ 39 93 " १३४६ ६७- उद्गीथप्रजापतिः - प्राणमयः - प्राण: ( २ ) 12 ६८ - श्रनिरुक्त प्रजापतिः -- मनोमय: - मनः ( ३ ) 15 ६६ - हृदयावच्छिन्न - मनः श्रनिरुक्तम् ( १ ) " १०० - मध्यावच्छिन्नः - प्राण: -निरुक्तानिरुक्तः ( २ ) " 1 १०१ - परिध्यवच्छिन्ना वाक् निरुक्ता ( ३, 19 १०२ - मनः प्राणवाङ मया: यज्ञिया- देवाः १०३ - पार्थिवयज्ञः - प्राकृतिक: - नित्यः १०४ - नित्य- देवयज्ञ की विधा पर वितत मानुष - वैधयज्ञ १०५ - प्राजापत्या सम्पत् से श्रनुप्राणिता यज्ञ-सम्पत् १०६ - देवयजनत: पूर्व अपेक्षिता मनः प्राण-वाङ्मयी - सम्पत्ति १०७ - यज्ञ का रहस्यपूर्ण स्वरूप निष्कर्ष १०८ - श्रधिदैवत, एवं अध्यात्मयज्ञ का मनः-प्राणवाङमयत्व १०६ - अधिभूत- वैध मानुषयज्ञ की मनःप्राण-वाक् सम्पत्ति - सम्पादन का प्रश्न, श्रौर तत्समाधानान्वेषण- प्रयास ११० - विशेष - वैज्ञानिक प्रक्रिया के द्वारा अधिभूत में मन: - प्राण - वाग भावों का समावेश १११- यजमानात्मा का भूतयज्ञातिशय के माध्यम से दिव्ययज्ञानुगत अन्तर्थ्याम-सम्बन्ध ११२ - कर्तव्यद्वयी, ओर यज्ञस्वरूप की संसिद्धि १७२ 33 " " " 27 31 13 १३४७