Shatpath Brahman 1 2 — पृष्ठ 321–330
शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - १-२ - मोतीलाल शास्त्री · पृष्ठ 321–330
पृष्ठ 321
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
शतपथब्राह्मण २ खण्ड १३ - केनापि देवेन हृदिस्थितेन यथा नियुक्तो-S म्म, तथा करोमि १४ - आत्मसमपणात्मक भक्तियोग का पावन संस्मरण १५ - श्रन्तयमी की उपेक्षा से समन्वित स्वक्लातिमानी मूढमानव १६- श्रतिमानानुगत श्रवश्यंभावी प्रज्ञापराध १७ - लौकिक कम्र्मानुगता आंशिक सफलता से महान् व्यामोहन १८- प्राकृतिक दिव्यकम्मों के सम्बन्ध में सफलता का अभाव और मिथ्याभिमान १६ - भावना के द्वारा स्वाभिमान ( अति-मान ) का निराकरण, एवं देवानुग्रह-प्राप्ति २० - ' अग्निरिदं होता वेत्तु ' का रहस्या-त्मक समन्वय २१ – ' वेत्त - प्रावित्रम् ' मन्त्रभाग का संस्मरण २२- अनुष्ठेय कर्म्म की अभीष्टा सफलता २३- दीत्रकम्यनन्तर अपेक्षित द्वितीय लक्ष्य २४- रूप पावनम् के उत्तरदायित्व से समन्वित प्राणाग्निदेव २५ - निन्द्य श्रसत्प्राणों का दिव्यप्राणसीमा से बहिष्कार २६ - पुण्यातिशयजनक यज्ञ तपो - दान- रूपा श्र े ष्ठतमा - कपत्रयी २७- पुण्यप्रवर्तिका इष्ट आपून दत्तरूपा श्रष्ठ - कमंत्री २८ सजातीय पवित्रकम्मों के अनुग्राहक दिपप्राण देवता २१- इष्टकामधुक् ( यथेच्छ फल प्रदाता ) श्रेष्ठतम यशकम्मं श्रौर की निरति-शया पवित्रता २०- अग्नि और सोम के रासायनिक-" सम्मिश्रण से अभिव्यक्त पावन - यज्ञ कम् * I " १४२० " 17 31 " १६३ ३१- अग्निदेव की लोकप्रसिद्धा पवित्रता ३२- दूषित मलिन अशुचि भाषों के विना शक अग्निदेव ३३ ( क ) अध्यात्मसंस्था, और प्रज्ज्वक्षित त स्थ - श्रग्निदेव ३३ ( ख ) - ' परमया जुत्या बल्बलीति ' ३४- अग्नि प्रज्ज्वलनानुगत शारीरिक पावित्र्य ३५ - श्रग्नि का उत्क्रमण, और वरुण का प्रभुत्व स्थापन ३६ याद शवशरीर का पूतिगन्धस्व २७ दाहक अग्नि के साथ दात सोम का अन्तर्य्याम सम्बन्ध और तनिबन्धन अग्नि प्रज्ज्वलन ३८- पवित्रधर्म का मूलप्रवर्तक पारमेष्ठघ ' अम्मा ' रूप दाह्य ' सोम ' २ ९- ' पवित्रं ते विततं ब्रह्मणस्पते! " का संस्मरण ४०- पवित्र अग्नि 1 और पवित्रतम सोम ४१ – उभयविध पवित्रतत्रत्व - समन्वयात्मक-यज्ञपुरुष ४२ - यज्ञ की सर्वाधिका पवित्रता, एवं तन्निबन्धन श्रेष्ठतमत्त्व ४३ - प्रकर्षेण श्रवति, और पवित्र ४४ - रक्षाकर्मानुगत ' प्रावित्र ' शब्द ४५ - पवित्रतमत्व, और प्रावित्र शब्द ४६ श्रग्नीषोमात्मिका पवित्रता ४७ - रक्षात्मक धर्म का समन्वय ४८ - श्राध्यात्मिक संस्था का रक्षक - श्रादान-विसर्गक्रियात्मक यज्ञ ५० प्राधिदैविक संस्था का अनुग्राहक - पार-मेष्ठ्य सोमा हुत्यात्मक यज्ञ ५१ सर्वरक्षक नियन्धष्ठतमा रक्षा, और तत्प्रत ' अष्टतम - यज्ञक ५२ - ' यशो वै श्रष्टतमं कम्मं का संस्मरण १४२० " 1 23 १४२१ 19 " 1 " " " " " 29 " 19 31
पृष्ठ 322
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
५२ प्रकृष्टरवाधम्र्म्म, और ' प्रावित्र ' शब्द -समन्वय ५४ - प्राणाग्निदेव का साक्षित्व, और तनि बन्धन हौत्रकर्म्म, तथा यज्ञकर्म ५५- ' साधु ते यजमान! देवता ' मन्त्रभाग का संस्मरण ५६ शक की निर्मितानुगति ५७ - यज्ञकर्म की सफलता के प्रवत ' क अग्निदेव ५८ - श्रष्टतम अग्निदेव का अनुग्रहात्मक सहयोग, और तन्निबन्धना अभीष्ट-फलसिद्धि ५६ - समर्थ - योग्य - मानवश्रेष्ठों का सहयोग, और लौकिक कम्मों की सरलता ६० लोक का संस्मरण ६१- कर्मनिष्ठा को प्रेरणाचलप्रधान, और मन्त्रप्रयोग ६२ - श्रात्मविश्वास, और कम्मंसफलता का अन्यतमद्वार ६२ मृतवतीमध्य चमास्यस्व मन्त्र-भाग का संस्मरण ६४ - अग्निदेव का यज्ञसीमा में प्रवेशात्मक अनुग्रह ६५- भावानानुगत निगद्मन्त्र ६६ - समागत- अग्निदेव की परिचय ६७ - अग्निदेव की परितृप्ति से अनुप्राणित ज्याहुति ६- अभ्ययुकृत- आहुतिक ६६ होता के द्वारा अध्ययु को प्रेरणाल प्रदान और अग्निदेव का अविष्य ७० - यजमानस्थानीया - जुहू ७१ - यजमान शत्रुस्थानीय उपभृत् ७२ सापाच ७३- श्रायरूप उपभृत्पात्र पी ७४ - ' जुहूपभृताबास्यस्व ' का निषेध, और तत्कारण - समन्वय यज्ञप्रक्रियाओं में ७५- भावानात्मिका भावना का प्राधान्य ७६ - भावनाओं के अभिव्यक नैदानिक भौतिक यज्ञिय - द्रभ्य 37 ७७ आहाय्यपविधा से अनुप्राणिता उपास्य कल्पना का समन्वय ७८ श्राहार्थ्यारोपविधा से श्रनुगत- जुहू, और उपभृत् की क्रमश: अत्ता श्राद्य-रूपता का नैदानिक - समन्वय ७६ - भावना के माध्यम से वस्तुतत्त्व का समन्वय ८० - एकवचानान्त - प्रयोग का स्वारस्व ८१'ये वर्त्मनि रिचमा ततः सत्यं " समीहते ' का संस्मरण १४२३ ८२ - ' तस्मादेकामिवैन्याह ' का तात्विक समन्वय ८३- ' देवयुवां विश्ववाराम् ' मन्त्र का संस्मरण ८४- के रहस्यात्मक पारिभाषिक फलि तार्थ का समन्वय । होतृकर्तृक - निगदपाठ के द्वारा प्राणा-ग्नि का यशमण्डल में समावेश 31 ८६ - वित्तानुगता आत्मा का समन्वय ८७- प्रागार के साथ प्राणदेवताओं का ग्रन्थिबन्धन रूप अन्तर्य्याम - सम्बन्ध, " " रूप पारिभाषिक धर्म्म, - ' देवयुग ' और प्राणाग्नि ८- सर्वत्र - चिदात्मव्याप्ति, और ऋषिदृष्टि ६० - ज्योतिम्र्म्मय - देवताओं का पावन संस्मरण ६१ - ज्योतिर्विक्स की महिमा विवस त्रयी १२- त्रिविध ज्योतिर्मानों से अनुप्राणित सीन लोक 21 11 37 १६४
पृष्ठ 323
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
६३ - पार्थिव प्राणाग्निरूप वैश्वानर ६४- वैश्वानररूप- विराट पुरुष ६५ - वैश्वानरानुगत - सुप्रसिद्ध पाँच पशुओं का नाम दिग्दर्शन ६६- पार्थिव अग्नि की कृष्णरूपता, और ' कृष्णोऽस्याखरेष्टः ' का संस्मरण ६७ - कृष्णमृगाग्नि की सहयोगिनी रूपज्योति ६८ - श्रान्तरिक्ष्य - देवताओं का संस्मरण EE - सौर - ज्योति म्र्म्म - दिव्यदेवता १०० - दिव्य -सौर- देवता, और तन्निबन्धना विद्या समुच्चिता यज्ञ - सपो- दान - लक्षणा श्र े ष्ठ - कर्मत्रयी १०१ - श्रान्तरिक्ष्य चन्द्रदेवता, और तन्नि-बन्धना विद्यानिरपेक्षा - दष्ट श्रापूर्त - दत्त-लक्षणा सत्कर्म्मत्रयी १०२ - पार्थिव भूतदेवता, और तन्निबन्धन-गृह्य - सामयाचारिक लौकिक ( स्मात ) सत्कर्म १०३ - पार्थिव - ज्योतिर्भाग, और तन्निबन्धवान-मानवसर्ग १०४ - श्रान्तरिक्ष्य - ज्योतिर्भाग, और तन्त्र-बन्धन - पितृसर्ग १०५- दिव्य ज्योति र्भाग, और तन्निबन्धन-देव १०६ - प्रजासर्गत्रयी, और श्रग्निदेव १०७ - ज्योतिः सर्गत्रयी, १०८ - लोक - सर्गत्रयी, 99 १०६ -द्य लोकावच्छिन्न सौर - देव - देवता, और उनका यज्ञियस्व ११० - अन्तरित लोक वच्छिन्न - चान्द्र पितर-देवता, और उनका नमस्यत्त्व १११- पार्थिवल्लोकावच्छिन्न श्राग्नेय ब्राह्मण-देवता, और उनका ' इडेन्यत्त्व ' ब्राह्मण २ खण्ड १४२३ | ११२- ( क ) - “ पितरोवाक्य मिच्छन्ति ', और नमस्कार १४२४ 29 " " 17 13 13 " 3 " १२२४ १६५ सेतुष्ट पितर देवता ११२ - ( ख ) ' नमस्य - पितर ' ११३ - त्राग् विकृतिरूप भूतमय मनुष्य, और तत् प्रसन्नता का अन्यतम साधन - तत्-स्तुतिकर्म ११४- यशः ख्यापनात्मिका लोकैषणा से रख-लितमना मानव ११५ - ' ईडेन्य ' मानव ११६ - ' ईडामहै - इडेन्यान् नमस्याम - नमस्यान्-यजाम यज्ञियान् ' इत्यादि - निगढ़मन्त्रार्थ-समन्वय ११७ - तालिका के माध्यम से वस्तुस्थिति का स्पष्टीकरण ११८ - दृष्टयन्तर निबन्धना देवत्रयी ११६ - आधिदैविक - सगुण- इष्ट देवता १२० - श्राधिभौतिक - सगुण - मनुष्यदेवता १२१ - स्तुतिभावात्मक आत्मसमर्पण, उपास्य देवता की सन्तुष्टि और १२२ - नमस्कारमात्र से सन्तुष्ट होजाने वाले पूज्य श्रष्ठ मानव १२३ - यज्ञ से तुष्ट होने वाले यज्ञिय - दिव्य-देवता १२४ - त्रिविध संस्थानों का संस्मरण, और तत्स्वरूप- समन्वय ९ २५ --यजनीय प्राण देवताओं से अनुप्राषित-महत्त्वपूर्ण यज्ञात्मक - साधन १२६ - त्रैलोक्यविभूति का संसाधक - यज्ञकम्मं १२७ - यज्ञिय, और यशिय भावों का सम-तुलनात्मक संस्मरण १२८ - यशिय- ' मानव ', और यज्ञिय ' किंपुरुष " 27 १२ - श्रश्व – गौ- - अवि -- अन - नामक -- यज्ञिय-पशुवर्ग 37 १४२४ 29 १४२५ " 3 " 97 १४२५ "
पृष्ठ 324
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
विषयसूची १३०- गौर - गवय- उष्ट्र - शरभ - नामक - अयज्ञिय-पशुव १३१ - बङ्गा बगधा - चेरपादा नाम की यशिया-प्रजा - त्रबी १४२५ १३२ - ' प्रजा ह तिस्रो प्रत्यायमीयुः ' का संस्मरण 13 १३३ - श्रयज्ञिया- माषादि ( उर्व आदि ) औषधियाँ " १३- ' जायमानो वै जायते सर्वाभ्यो एताभ्यो एब देवताभ्यः ' इत्यादि निगमवचन का संस्मरणात्मक समन्वय १३५ - यज्ञ का इष्टफल जनकस्व - समन्वय " " 23 १३६ - यज्ञ का महतो महीयान् श्र ेष्ठतम कर्मत्व १४२६ १३७ – यज्ञ का समादर, और सर्वसिद्धि १३८ - यज्ञ का तिरस्कार, और सर्वविनष्टि १३६ - यज्ञपद्धति से अनुगत प्राधिभौतिक कर्म्म, और तद्द्वारा यज्ञातिशय की अभि-व्यक्ति १४० - यज्ञकर्म्मसमष्टि, और यज्ञातिशय की सर्वाङ्गीता १४१ - यज्ञातिशयरूप देवात्मा का संस्मरण १४२ - नव ( १ ) -व्याहृत्यात्मक त्र गादापनकर्म के तात्त्विक समन्वय का सिंहावलोकन १४३ - पाञ्चभौतिक शरीर, और उसके ऊर्ध्व-सौर, श्रवाञ्च पार्थिव - प्राण का संस्मरण १४४ - अर्करूप अवान्तर - साकञ्जप्राण १४५ - सन्त- शीर्षण्य - प्राणों का नाम संस्मरण १४६ - बह्यग्रन्थ्यनुगत प्रतिष्ठाप्राण १४७ - उपस्थानुगत - प्राण १४८ - अवान्तर नव ( ६ ) - प्राणां का स्वरूप-समन्वय १४६ - नवप्राणसम्पत्ति का संग्राहक व गादापनकम्म इति - त्रुगादापन कम्र्म्मोपपत्तिः १ " " 1 11 77 " २- अथ - श्राश्रावण- प्रत्याश्रावण-कम्मोपपत्तिः 31 १५०- गादापनकर्मानन्तर भावी कर्म का सम्भरण १५१ - श्रध्वर्यु के द्वारा श्राश्रावण प्रत्या-श्रावणकम्म का अनुगमन १५२ - मुप्रसिद्धा - यज्ञानुबन्धिनी - पाँच ऋतुएँ १५३ - हेमन्त, और शिशिर का अभिन्नत्व, एवं पञ्चर्त्तु - स्वरूप - समन्वय १५४ - पञ्चर्च - समष्टिरूप सम्वत्सर १५५ - सम्वत्सर रूप - यज्ञ १५६ - यज्ञ के द्वारा प्रजापति से चराचर - सर्ग का निर्माण १५७ - प्रजास्वरूप निर्माण में अग्नि - सोममयी साम्वत्सरिकी यज्ञमात्रा का प्रतिक्षण-विस्त ं सन १५८ - ' यज्ञ की सौरमण्डलस्थ - दिव्य देवनाओं से अपकान्ति ' का रहस्यात्मक समन्वय १५६ - नियत भावानुबन्धिनी - यज्ञापक्रान्ति १६० - नियतभावानुबन्धिनी यज्ञाप्रक्रान्ति ,, १६१ - यज्ञ की स्वरूप- सम्पत्ति का सस्मरण " " 17 19 29 17 1 1 १६२ - भूपिण्ड की परिधि का विच्छेद, और सौरयज्ञ का अग्रगमन १६३ - सौरप्रकाश विच्छेदानुगत - सैंहिकेय छाया-मय- ' राहु ', १६४ - यज्ञ की नियतापक्रान्ति का तास्विक स्वरूप समन्वय १६५ - यज्ञानुगता नियतापक्रान्ति, और नि-बन्धन ' ब्रह्मोदन ' १६६ - पार्थिव पदार्थों के उत्पादनकर्म से संस्पृष्ठ ब्रह्मौदनात्मक यज्ञ " 71 " 1 11 " " 19 EE
पृष्ठ 325
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
शतपथब्राह्मण २ खण्ड १६७ - नियतापक्रान्त यज्ञ से सम्वत्सर की स्व-रूप - निष्पत्ति १६८ - श्वस्वरूपात्मक सम्वत्सरयज्ञ १६६ - अश्वात्मक - यज्ञ से श्रसंस्पृष्ट - प्रकृत-श्राश्रवण प्रत्याश्रावण - कर्म- निबन्धन-आख्यान १७० - श्रनियतापक्रान्तिरूप यज्ञ, और तन्नि-अन्घन श्राख्यान १७१ - नियतापक्रान्त - पुनर्गत- स्थिर ब्रह्मौदन-लक्षण ( सूर्य्य - स्वभोग्यलक्षण ) सम्वत्स-यज्ञ से यशमात्रा का विसन १७२ - तापोत्सर्ग के द्वारा वित्रसन का साक्षा-त्कार १७३ - वित्रस्ता - यज्ञमात्रा रूप प्रवर्ग्यभाग १७४ - ' उच्छिष्टात्-- जज्ञिरे सर्वम् ' १४२७ ,, १४२५ " इत्यादि " आथर्वण वचन का संस्मरण १७५ - तत्तद्विशेषभावोत्पत्ति में तत्तत् - समय-विशेषों से अनुप्राणित प्रवर्ग्यात्मक-सौरज्ञ, और तद्रूपा यज्ञानुगता नियता- प्रकान्ति १७६ - प्रकृताख्यानानुगत प्रवर्ग्यभाव १७७ - विस्वस्त - भाग के पूरक - अन्न अन्नादा-त्मक - श्रादान - विसर्ग - निधन - सहन-यज्ञक्रम के पारिभाषिक तथ्य का स्वरूप-समन्वय १७८- सौरदेवताओं के स्वरूप - रक्षक यज्ञ की प्रवर्ग्य के द्वारा १८० - प्रदाता का ही भोक्त, व १८१ - ( रक्षक का ही भक्षकत्व ) १८२ - ' यो मा ददाति स इ देवमावत् ' का संस्मरण १८३ - प्राणाग्निरूप होता पक्रान्ति १७६ - अपक्रान्त - यज्ञ का पुनरावर्त्तन १८४ - आदित्य प्राण रूप - उद्गाता " " 1 " " " " " 31 १८५ - चान्द्र सोमरूप ब्रह्मा १८६ - नित्य - ऋत्विजों के प्रयास से ( यश-कर्म से ) दिव्ययश का पृथिवी से सूर्य के प्रति पुनरावर्त्तन १८७ अपक्रान्त यज्ञ का पुनरावर्तन, और प्रकृत - आख्यान १८८ - प्राकृतिक - नित्य यज्ञानुबन्धी- गमनागमन-भाव, और प्रकृत - आख्यान १८६ - वैधयज्ञ की आधारभूमि नित्ययज्ञ १६० - देवाननुविधा वै मनुष्याः १६.१ - यद्वै देवा कुवंस्तत् करवाणि १६२ - ' श्रो श्रावय ' रूप श्राश्रावणकम्म, और पकान्त - दिव्य - यज्ञ का वैधयज्ञ में तद्-द्वारा समावेश १६३ - ' ओश्रावय ' का तात्पर्य्यार्थ - समन्वय १६४ – ' अस्तु श्रौषट् ' रूप- प्रत्याश्रावणक का तत्वार्थ समन्वय १६५ अपक्रान्ता यज्ञसम्पत्ति का संग्राहक प्रक्रान्त श्र ० प्र ० कर्म्म ' १६६ - दिव्ययज्ञचलानुगति के माध्यम से ही वैधयज्ञ का साफल्य १६७ - ऋत्विजों की भावना से अनुगत दिव्ययज्ञ १६८ - यजमान के समावेश से अनुप्राणित-' आ ० प्र ० कर्म्म ' १६६ - सम्वत्सर प्रजापत्यवयव - भूत - तद्रस परिपुष्ट अग्न्यादि देवताओं के द्वारा ही कर्मेति कर्त्तव्यता का स्वरूप- सम्पादन २०० - ' ते नोपावृत्त ' न - रेतसाभूतेन ऋत्वि जः - सम्प्रदायं चरिन्ति ' इत्यादि अति-वचन- समन्वय, और श्र ० प्र ० कम्र्म्म ' २०१ - ऋत्विजों का भावनात्मक मानस - जगत्, और तत्र का समावेश कान्ता - दिव्या यज्ञसम्पत् १४२८ " 6 " " " " १४२६ " " " " 39 १६७
पृष्ठ 326
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
२०२- भावनात्मक यज्ञवितान की संसिद्धि के विषयसूची लिए ऋत्विजों का पारम्परिक संविदानभाव १४२६ २०३ - मनोवाक - रूपा यज्ञवर्त्तनी का पारिभा पिक - स्पष्टीकरण २०४ - ऋत्विग् भावनानुगता मन्त्रवाक् २०५ - मध्यस्थ- गर्भीभूत - प्राण २०६ - यज्ञ का मौलिक स्वरूपात्मक प्राणतत्त्व २०७ - वाकतत्व की पारिभाषिकी मौलिकता का संस्मरण * ०८ - ' वाक् ' शब्द के रहस्यात्मक - प्राण - मनो-गर्भित पारिभाषिक-निर्वचन का समन्वय, और तन्निबन्धना मौलिकता २०६ - मनः प्राण- वाक त्रयी का संग्राहक ' वाक ' शब्द २१० - मनोगर्भित प्राणात्मक यज्ञ २११ - प्राणव्यापार का ग्रालम्वन भूतभाव २ २ - भूताधारणैव प्रारण की बलप्रयोग में सफलता २१३- भूलोक से पृष्ठ पर्यन्त - अभिव्याप्त वाङमय भूतयज्ञ २१४ - लौकिकी मर्त्यावाक् २१५ - मर्त्यवाक् के द्वारा लोकव्यवद्वार का सञ्चालन २१६ - अलौकिकी बाक २१७ - शास्त्रीय कर्म की सञ्चालिका - दिव्या - वाक् २१८ - मर्त्या लौकिकी - वाक से ममतुलिता व्यञ्जनात्मिका अनुष्टुप् - वाक् २१६- श्रमृता श्रलौकिकी वाक से समतुलिता उदात्त अनुदात्तादि स्वरात्मिका बृहती-वाक २२३ - देवाह्वानलक्षणा - श्रश्रावयेत्यादिरूपा दिव्यावाक से अपक्रान्तयज्ञ का पुनरावर्तन १४३० २२४ - प्राकृतिक नित्य यज्ञ के १७ अवयव 19 २२५ - ' अग्निरु वै यज्ञः ' का संस्मरण 23 " " २२६ - यज्ञाग्नि के सुप्रसिद्ध त्रिवृत् पञ्चदश-एकविंश - ( ६-१५-२१ ) रूप तीन-विक्रम २२७ - त्रिवृत्स्तोमात्मक - पार्थिव प्रथम विक्रम २२८- पञ्चदशस्तोमात्मक - प्रान्तरिक्ष्य द्वितीय विक्रम २२६- एकविंश- स्तोमात्मक - दिव्य तृतीय- विक्रम २३० - एकविंशस्थ आदित्य २३१ - सप्तदशस्तोमानुगत मौलिक स्वरूप ,, " " 21 29 II 19 99 " 77 २३२- मतदशावयवो का अविच्छेदात्मक १४३१ एकरूपात्मक समन्वय २३३ - मतदशावयवानुगत अविच्छिन- सन्तनन-भाव- निबन्धन - यज्ञाग्नि का अपेक्षित संग्रह २३४ - इतस्ततः दृष्टिपातनिरोधपूर्वक अप्रस्तुत-वाक् संयमानुगत मन्त्र वाङमय श्राश्रावण-प्रत्याभावण - कम् की अविच्छिन्ना सप्त-दशाबयव- सम्पत्ति २३- ऋत्विजों की अविच्छिन्ना सम्प्रदान-प्रवृत्ति, धौर सप्तदशावयव - द्रिव्ययज्ञ की परिपूर्णता २३६- भगवान् साम्ब सदाशिव के लिए अपेक्षिता अविच्छिन्ना जलधारा २३७- अभिषेकात्मक- पूर्णपात्र का संस्मरण 93 २२० - यज्ञस्वरूप प्रतिष्ठात्मक वागभाव १४३० २३८ - यज्ञकोश परिपूरिका २२१ - वाक् - हि - यज्ञः " २२२ - वाक् - उ - रेतः 39 सप्तदशमात्राश्र का अविच्छिन्न रूपेण श्रनुगमन, और फलितार्थ का समन्वय " " " 39 37 १६८
पृष्ठ 327
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
शतपथब्राह्मा २ खराड २३६. - ब्राह्मणानुगता ८ ( श्रष्टमी ) कण्डिका से १५ - ( पन्द्रहवीं ) कण्डिका - पर्य्यन्त सन्दर्भ से अनुगत वाक्संयमानुगत-सम्प्रदानकर्म्म, वाकसंयम का प्रासङ्गिक-निरूपण, तथा अप्रस्तुत - त्राग्निबन्धन-दोष स्वरूपोद्घाटन नामक तीन विषयों का स्पष्टीकरण २४. - अपेक्षिता अवधानता की व्याप्ति का दिग्दर्शन २४१- लौकिक - कर्गानुगता अविच्छिन्नता, और तनिबन्धना - सफलता का समन्वय २४२ - प्रज्ञापराध, तथा मनोऽनुगत चाञ्चल्य के माध्यम से संकल्पिता - कर्म्मप्रवृत्ति में अन्यान्य संकल्पों का अनुधावन, और तद्रूप ब्यवधानदोष २४३ - व्यवच्छेदमूला असफलता, और निराशा में निमग्न मानव २४४ - लक्ष्य की अनन्यानुगति, और सफल-मानव २४५ - अव्यवच्छेदमूला - पारस्परिक सम्प्रदाना-त्मक - ऐकमत्य - भावनिबन्धना - ( संविदाना ) अनन्यमनस्कता का कर्म्मसिद्धि में अन्यतमद्वारत्व २४६ - ' एवमेव यज्ञो भर्त्तव्यः ' आदेश का समन्वय २४७- श्राश्रावण -- प्रत्याश्रावण - कम्र्मानुबन्धी-निगद मन्त्र की पाँच व्याहृतियाँ २४८ - शब्दात्मिका वाक् के चार विवर्त्त ', और ऐतरेयश्रुति २४६ - ' तुरीयं वाचो मनुष्या वदन्ति ' का सम-न्वय २५० - निगद मन्त्र, और व्याहृतिभाव २५१ - दिव्ययज्ञ का अग्निमयत्वं १४३१ " " " १४३२ 33 " " " " 2 " " } II २५३ - पञ्च व्याहृतात्मक - निगदमन्त्र के सम्बन्ध में महत्त्वपूर्ण प्रश्न, और उसका त्रिधा स्वरूप - विश्लेषण २५४ - आध्यात्मिक-- यज्ञानुगता दृष्टि, और प्रश्नसमन्त्रय ( १ ) २५५ - श्रधिदैवत - लक्षण- सर्वहुत - यज्ञ " २५६ - विश्वजनक - यश का रञ्चावयवत्त्व- समन्वय २५७ - श्राधिदैविक विश्वयज्ञ के सुप्रसिद्ध पाँच पर्वो का नाम संस्मरण २५८- पञ्चावयव श्राधिभौतिक यज्ञ २५६ - अध्यात्मसंस्था के आत्मा -- शरीर-इन्द्रियवर्ग - रूप तीन प्रमुख पर्व २६०- मूलाधाररूप आत्मभाव, और तद्रू ' ब्रह्ममत्य ' तत्त्व २६१ - ब्रह्मसत्यात्मा के श्रव्यक्तादिभतात्म-पर्यन्त पाँच पर्व २६२ - शरीरात्मक ' भूतसत्य ' तत्त्व २६३ - भूतसत्य के आकाशादि मृदन्त पाँच पर्व | २६४ - इन्द्रियवर्गात्मक - ' देवसत्य ' तत्त्व २६५ - बाकू - प्राण - चक्षुः - श्रोत्र मनोरूप ( देवस-व्य के ) पाँच अवयवय २६६ - दैवत - भौतिक - श्रात्मिक —यशत्रयी की ( प्रत्येक की ) पश्चावयवयता का पारि-भाषिक समन्वय २६७ - आश्रावण- प्रत्याश्रावणानुगता अपेक्षिता पश्चावयवता २६८ - द्वितीया दृष्टि से प्रश्न समन्वयोप-क्रम ( २ ) २६६ - पार्थिवी स्तौम्या त्रिलोकी के त्रिवृदादि त्रयस्त्रिशान्त पाँच विवत १४३२ 11 " १४३३ ,, 21 " 1 " " 1 17 93 " } २७० - पञ्चस्तोमानुगत पचविध प्राणदेवता 23 २५२ - दिव्याग्नि का वाङ5. मयत्त्व , २७१ - पञ्चव्याहृत्यात्मक प्रश्न 13 ΡΕΣ
पृष्ठ 328
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
विषयसूची २७२- तृतीय- दृष्टिकोण --- निबन्धन- ( ३ ) -समन्वय २७३- भूकेन्द्रतः भृमहिमा - पर्यन्त वात के अवान्तर ३३ महिमा - ' वक्त ' २७४ - ' त्रयस्त्रिशत्तन्तवो यं वितत्निरे ' का संस्मरण २७५ - अहर्गणात्मक तन्तुदेवताओं का संस्मर २७६ - वाक्तन्त्रका घटकार लक्षगा घटकार, और तदनुबन्धी सहस्र - गौतत्त्व २७७ - वाक् –ष्ट्काररूप वषट्कार २७८ - वौषट् - रूप - वघट्कार २७६ - वघटकारगर्भितः पाङक्तभावनिबन्धना-यज्ञसम्पत्, और पाँच - व्याहृतियों के ग्रहण की अन्वर्थना २८० - ' ओश्रावय ', और त्रिवृत्स्तोम ( ६ ) का संग्रह २८१ - ' अस्तु श्रौषट् ', और पञ्चदशस्तोम-( १५ ) का संग्रह २८२ - ' यज ', और सप्तदशस्तोम ( १६ ) का संग्रह २८३- ' ये यजामहे ', और एकविंशस्तोम ( २१ ) का स्वरूप संग्रह २८४ - ‘ वौषट् ’, और सप्तविंशस्तोम ( २७ ) का स्वरूप संग्रह २८५ - ' समष्टि ', और त्रयस्त्रिंश ( ३३ ) -स्तोम का स्वरूप - संग्रह २८६ – पाक्त - यज्ञ से उत्पन्न पशुसर्ग की पाङ ता २८७ - प्राक्तसोमयाग से अनुप्राणिता ऋतु-रूपा - पाहता २८ - वैध मानुषयज्ञ की पाङ ्मक्कता २८६ - सर्व साधक - यज्ञप्रजापति का संस्मरण २६० - ' प्रजापतिस्त्वेवेदं सर्व - यटिटं किञ्च ' निगम का संस्मरण | २६१ - प्रजापति के त्रिविध - महिमा - विवत २४३३ १४३४ 19 19 " " " १४३४ 39 27 33 का सिंसावलोकनात्मक - संस्मरण २६.२ - मृश्यमावानु बन्धी पिण्ड २६३ – दृश्यभावानुबन्धी - मण्डल २६ - पिएडकेन्द्रावच्छिन्न -- श्रनिरुक्तप्रजापति २६५- महिमाकेन्द्रावच्छिन -- उद्गीथप्रजापति २६६ - उद्यचमावानुगत सर्व प्रजापति २६७ - ' चतुस्त्रिंश: प्रजापतिः ' २६८ - सप्तदश संख्या नुगति, और तद्द्द्वारा-निदान माध्यम से - ' उद्गीथप्रजापति ' नामक सप्तदशप्रजापति की श्रग्नियज्ञ-सम्पत् का परिग्रहण २६६ - सत्रहवाँ - पारिभाषिक अहर्गण ३०० - नवाहयज्ञ की उपक्रमभूमि, और १७ अहर्गण ३०१ - श्वेतद्वीपनिवासी सत्यनारायण विष्णु भगवान् का संस्मरण ३८२ – नवाहयज्ञ का अहर्गणात्मक - स्वरूप-समन्वय ३०३ - यज्ञात्मक -विष्णु का सत्यधर्म का ३०४ - ' तत् - यत् - स्वत्यम् असौ स आदित्यः ' संस्ारण ३०५ - उपासकों की व्रतचर्य्या ३०६–१७-२१-२५ - अहर्गणत्रयी, और ब्रह्म-विष्णु - इन्द्र- विष्टप- का संस्मरण ३०७ - अग्नियज्ञमण्डलसीमानुगत - सप्तदश-अहर्गण, और ' सप्तदशो वै प्रजापतिः ' ( यज्ञप्रजापति ) ३०८- ( क ) श्रश्रावयेत्यादि पञ्च - व्याहृतियों के सत्रह - अक्षर, और तद्द्द्वारा सप्तदश-यज्ञ - प्रजापति का संग्रह ३०८ - ख ( ) ' श्रो - श्रा - व - य ' - इति चतुर्भिः ३०६ - ‘ अ— स्तु — श्रौषट् - इति चतुर्भिः ३१० - ' य - ब ' – इति - द्वाभ्याम् 29 " " 97 " १४३५ " ,, २००
पृष्ठ 329
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
शतपथनाह्मा २ बराड ३११ - ' ये - य - जा - म - हे ' इति पञ्चभि: १४३५ ३२४ - वैदिक यज्ञकम्मों की पारलौकिक-३१२ - ' चौ — घट ं ज्ञति - द्वाभ्याम् ३१३ - तस्मै यज्ञात्मने नमः अत्र - प्रक्रान्त - ब्राह्मणस्य १० करडका - उपरता ग्रथ - आश्रावण- प्रत्याश्रावण -कर्म्मनिबन्धनं - रहस्यपूर्ण " वृष्टिविज्ञानम् " ३१४- सप्तदशस्तोमात्मक-- आहवनीय प्रदेश-रूप ब्रह्मविष्टप् ३१५ - नाचिकेत- श्राग्नेय - स्वर्ग ३१६ - नचिकेता के यमानुगत प्रश्न का समा धानरूप सप्तदशस्थ स्वर्ग्याग्नि ३१७ - स्वर्गप्रापक - सोमयाग से स्वर्गगामी देवात्मा का स्वर्गगमन, और स्वर्गस्व-रूप - परिचय ३१८- पञ्चावयवा - सप्तदशकलात्मिका स्वग्यग्नि-लक्षणा प्राजापत्या सम्पत्ति का संस्मरण ३१६ - परोक्ष फलाकर्षण | पेक्षया प्रत्यक्ष फल-कामुक मानवीय मन ३२० - प्रत्यक्षफलानुगता चाबुद्धि " 19 १४३५ 22 फलसाधकता - पूर्विका योग - क्षेम - नित्र-न्धना ऐहलौकिक- फलसाधकता का समन्वय ३२५ - प्रत्यक्षफलानुगत -ज्योतिष्चक, एवं भुवनकोशात्मक- द्विविध - विवत्त ' ३२६ - यच्चयावत् - भौगोलिक - कामनाएँ, और अनुकूल भावनिबन्धना वर्षा ३२७ - ' निकामे निकामे नः पर्जन्यो वर्षतु ' का सस्मरण ३२८ - योषधि - वनस्पति - रूपा पार्थिवी - सम्पत्ति की अधिष्ठात्री वर्षा ३२६ - समस्ता ऐहलौकिक कामनाओं का, तथा पार्थिवी भौगोलिक कामनाओं का केन्द्रीकरणात्मक अन्नचल ३३० - अत्र चल की मूल प्रतिष्ठात्मिका खगो-या वर्षा ३३१ - प्रकृति का प्रत्यक्षात्मक प्रथम अनुग्रह-' वर्षा ' ३३२ - पार्थिव - ओषधि वनस्पति - जल - पशु-द्रव्य - सम्पत्तिरूप द्वितीयानुग्रह ३३३ प्रथमानुग्रह ( बर्षात्मक ) के आधार पर ही द्वितीयानुग्रह की प्रतिष्ठा ३३४ - शास्त्रीय - वैदिक यज्ञादि कम्मों के सम्बन्ध में फलदृष्ट्या अज्ञजनों की महती - भ्रान्ति, एवं उसका श्रमूलचूड़ निराकरण प्रयास १४३६ || ३१५- प्राणात्मक- परोक्षातिशय - संसाधन पूर्वक मानवीया अपे-23 ३२१ - आधिभौतिक - साध्य, एवं माधनों से समन्वित ' कर्मकाण्ड ' ३२२ - परोक्षफलानुगत ज्ञानयोग, और भक्तियोग ३२३ - परोक्ष फलसंसाधक - यज्ञ की प्रत्यक्ष-फलसाधकता का प्रामङ्गिक - संस्मरण " प्राकृतिक रहस्यपूर्ण - वैज्ञानिक - शिक्षण-पूर्वक- आधिभौतिकी -- समस्ता - प्रत्यक्ष-कामनाओं का भी पूरक - भारतीय - यश-काण्ड, और तदुपेक्षा से भारतवैभव का सर्वनाश ३३६ - यज्ञकर्म के सुप्रसिद्ध ' इष्टकामधुक ' २०१ ( अभीष्ट फलप्रद ) विशेषण अन्वर्थता १४
पृष्ठ 330
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
विषयसूची ३३७- पुरोवात - अभ्र - विद्युत् -- स्तनयित्नु- चतु-टी का एकत्र समन्वय, और ' वर्षा -कम्मं ' की प्रवृत्ति ३३८ - ' पुरोवात ', और ' पुरवाई हवा ' ३३६- प्रत्यक्षदृष्ट धूम - ज्योतिः सलिल मरुत्-( बाष्प अग्नि - अप - वातवायु ) की समष्टिरूप - ' अभ्र ', और बद्दल १४३७ ३४० - विद्युत्, और प्रत्यक्षदृष्ट चाकचिक्य 17 ३४१ - स्तनयित्नु, और गर्जन- तज्र्ज्जन ३४२ - प्रथम सञ्चारी- पुरोवात ३४३ - ऋतभावापन्न - अभ्रखण्डों का एकत्र संघात ३४४ - भ्रघनता से समुत्पन्न - वाय्वग्नि--जलीय घर्षणानुगत विद्युत् प्रवाह ३४५ - तदनु - गर्जन भावाभिव्यक्ति ३४६ – ' तड़ तड़ ' रूपा प्रतिध्वनि, और वर्षा का आरम्भ ३४७ - ' श्रोश्रावय ' रूपा - प्रथमा - व्याहृति, और ' पुरोवात ' का श्राविर्भाव ३४८ - ' अस्तु श्रौषट् ' रूपा द्वितीया - व्याहृति, श्रौर - ‘ अभ्भ्रसंघात ' ३४६ - ' यज ' रूपा तृतीया व्याहृति, और विद्युत् प्रवाह ३५०- ' ये यजामहे ' रूपा चतुर्थी - व्याहृति, और स्तनयित्नु की अभिव्यक्ति ३५१ - ' वोट ' रूपा पञ्चमी - व्याहृति, श्रीर वर्षा का आरम्भ ३५२ - भारतीय - वैदिक - विज्ञानानुबन्धिनी एक महती - विप्रतिपत्ति ३५३ - रहस्यपूर्णा दुरधिगम्या-- विलुप्तप्राया वैज्ञानिकी - वैदिकी - परिभाषाएँ, और विज्ञान की दुरूदता ३५४ - परिभाषाज्ञान से संस्पृष्ट - वैदिक-तत्त्ववाद की समस्यात्मिका जटिलता १४३६ 21 33 " " " " 33 13 99 ३५५ - परोक्षप्रिय ऋषियों की साङ्केतिकी-परोक्षा भाषा, और तद्द रधिगम्यता ३५६ - एकत्र विषयप्रतिपादानाभावरूपा-द्वितीया - महती - समस्या, और तन्नि-बन्धना दुरूहूता ३५७ - समस्ता वेदराशि के मन्थन से अनु-प्राणिता समस्या निराकृति ३५८ - प्रक्रान्ता प्रतिज्ञाता - वृष्टिविद्या, श्रीर तदनुबन्धिनी पारिभाषिकी जटिलता ३५६ - प्रक्रान्त ब्राह्मण की परिमित - शब्दात्मिका १८ वीं कण्डिकारूपा एक कण्डिका, और तदनुप्राणिता वृष्टिविद्या की दुरू-हता ३६० - वृष्टिविद्यानुगत-- वैदिक - स्थल - विशेषों का समाश्रय ३६१ - वृष्टिविज्ञान निबन्धन प्रस्तुत प्रकरण के माध्यम से तत्स्वरूपविश्लेषण के सम्बन्ध में किञ्चिदिव निवेदन का दुस्साहस ३६२ - दृष्टिविद्यानिबन्धन एक ही तत्त्ववाद, और उसका अनेक दृष्टियों से समन्वय ३६३ - ' छान्दोग्योपनिषत् ' - से सम्बन्ध रखने वाला- ' पञ्चाग्निविद्यानुगत ' दृष्टिकोण, और तन्धिना वृष्टिविद्या ३६४ - वृष्टिविद्यानिबन्धन द्वितीय दृष्टिकोण का संस्मरण १४३७ " 39 11 " " ३६५ - श्राकाशात् वायुम् " ३६६ - वायुर्भूत्वा धूमो भवति ३६७ - धूमो भूत्वा श्रभ्रं भवति ३६८ - श्रभ्रं भूत्त्वा - मेघो भवति 13 ३६६ - मेघो भूत्त्वा प्रवर्षति 19 ३७० - लोकस्थ - श्रद्धातत्व की सोम के द्वारा वृष्टिरूप में परिणति २०२ १४३८ " 72 " 29