Shatpath Brahman 1 2 — पृष्ठ 331–340
शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - १-२ - मोतीलाल शास्त्री · पृष्ठ 331–340
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शतपथब्राह्मण २ खण्ड ३७१ - द्युलोकस्थ खगोलीय तत्त्वविशेष का वृष्टिजनकत्त्व ३७२ - दोनों दृष्टिकोणों से विभिन्न एक तीसरे दृष्टिकोण का दिग्दर्शन ३७३ - सावित्राग्नि का अजस्ररूपेण द्युलोकात् भूलोक की ओर श्रागमन ३७४- पार्थिवान का अजस्र रूपेण भूलोकात् द्युलोक की ओर गमन ३७५- ' श्रादित्यानामयनम् ' नामक यज्ञ का संस्मरण १४३८ " " १४३६ " ३७६- ' अङ्गिरसामयनम् ' नामक यज्ञ का संस्मरण ३७७ - प्रतिफलित आदित्याग्नि की अश्वरूप में परिणत ३७८ - श्रादित्य, और अति की प्रतिस्पर्द्धा ३७६- श्रङ्गिरोऽग्नि के द्युलोकगमन का संस्मरण, और तन्निबन्धना श्रथर्व श्रति ३८०- भूपृष्ठ पर व्याप्ता बलमात्रा की ' बाष्प ' रूप में परिणति ३८१ - बाष्पावस्थापन्ना पार्थिवी जलमात्रा का लोकानुगामी अङ्गिरोऽग्नि में समा-बेश ३८८२ - विरोऽग्नि से अन्तरिक्ष में परित्यक्ता बाष्परूपा पार्थिवो जल मात्रा का श्रान्तरिक्ष्य मरुद्वायु- धरातल में गर्भा-धान ३८३ - पार्थिवी जलमात्रा का गर्भधारण ३८४ - सौर - रश्मियों की तीव्रता, और निदाघ-काल ३८५ - ग्रीष्मावसान रूप निदाघकालावसान, और सौर- रश्मियों की निम्नभावानु -गति 29 ३८६ - रश्मियों का निम्नानुगतित्त्व, श्रौर मरुधरातल - गर्भस्था जलमात्रा का भूपिण्ड पर पतन ३८७ - वर्षा जलोत्पत्ति का क्रमिक स्वरूप-समन्वय लोक में पार्थिव अग्नि के द्वारा प्रचण्ड - जलवर्षण ३८६ - भूलोक में आन्तरिक्ष्य - पर्जन्य के द्वारा प्रचण्ड - जलवर्षण ३६० - उभयलो कानुगता द्यावापृथिव्या समाना ३६१ - अग्निर्वा इतो वृष्टिमुदीरयति " ३६२ - मरुतः सृष्टां नयन्ति " ३६ ३ - यदा -- खल्व सावादित्यो यङ रश्मिभिः पर्यावर्त्तते श्रथ वर्धति ३६४ - भूमिं पर्जन्या जिन्वन्ति ३६५ दिवं जिन्वन्त्यग्नयः ३६६ – एक विभिन्न दृष्टिकोण का संस्मरण, और तत्समन्वय प्रयास ३६७ - श्राहवनीयाग्नि में प्रदत्ता आहुति ३६८ श्राहुति का श्रादित्याग्नि में गमन ३६६ - प्राहुतिग्राहक - श्रादित्यदेवता के द्वारा प्रतिदान में जलवर्षण ४०० - अग्नी प्रास्ताहुति: सम्यक - श्रादित्य-मुपतिष्ठते ४०१ - श्रादित्याज्जायते -दृष्टि: ४०२ - वृष्टेरन्नम् ४०३ - ततः प्रजा: ४०४- पञ्चम - प्रासङ्गिक दृष्टिकोण का स्मरण, और तत्समन्वय प्रयास ४०५ - श्रन्नाद्भवन्ति भूतानि I ° E 17 19 " " " १४४० 37 " " " 3 ) " 1 39 29 " " " " " ४०६ - पर्जन्यादन्नसम्भवः " ४०७ - यज्ञाद्भवति पर्जन्य: " " २०३
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४०८ -- यज्ञः कर्म्मसमुद्भवः ४०६ -- कर्म ब्रह्मोद्भवं विद्धि ४ ९०-- ब्रह्माक्षरसमुद्भवम् ४११ - तस्मात् सर्वगतं ब्रह्म-- नित्यं यज्ञ - प्रति--ष्टितम् ४१२ - दृष्टिकोण भेदभिन्ना विवेचनशैली ४१३ वस्तुगत्या सभी दृष्टिकोणों का सम्भा--वित समन्वय ४१४ -- प्रथम - दृष्टिकोण, और प्रक्रान्त ब्राह्मण-श्रुति - प्रकरण ४१५ - प्रथम दृष्टिकोण के माध्यम से ही वृष्टिविद्या का स्वरूप- समन्वय प्रयास ४१६-- छान्दोग्यश्रुति का वैज्ञानिक समन्वयो -पक्रम ४१७ - महाभाग श्वेतकेतु की महत्त्वपूर्णा--जिज्ञासाएँ ', एवं तत्समाधान के लिए उनका कुरुपाञ्चालों की विद्वत्परिषत् से प्रश्न ४१८ - जबिलि के द्वारा श्वेतकेतु से क्रमप्राप्त ' वेत्थ यथा पञ्चम्यामाहुतावापः- पुरुष--वचसो भवन्ति ', इत्यादिरूप - पञ्चम-प्रश्न ४१६ -- समाधान में असमर्थ श्वेतकेतु और जैत्रिलि के द्वारा ही प्रश्न का समाधान ४२०-- ' तदन्तरप्रतिपत्तौ रहति - सम्परिष्वक्त: -प्रश्ननिरूपणाभ्याम् ' रूप वैय्यासकि-सूत्र का संस्मरण, स्वरूपोपक्रम और पञ्चाग्निविद्या-४२१ -- अवरोहक्रम, और प्रप्तन्त्र से पुरुषो-उत्पत्ति ४२२ -- आरोहक्रम, और अपनत्व का पुनर्ग--मन विषयसूची १४४० " " ४२३ ( क ) जीवावरोहणवत् जीवारोहण में भी अप्तत्त्व का गमन, और श्रुस्वर्थ-समन्त्रय " " ४३३ - ( ख ) ' ता एव हा पपत्तेः ' का संस्मरण ४२४ - जीवात्मा - भूतसूक्ष्मैः सम्परिष्वक्तः -- एव लोकान्तरे गच्छति, इति निष्कर्षः ४२५ पञ्चाग्निविद्यात्मक अग्निकर्म से अनुप्रा-ति - पुरुष सर्ग " ४२६- वैध- अग्निहोत्रानुगत 99 " १४४१ " 33 " 37 " अग्नि - समिध-अङ्गार- विस्कुलिङ्ग- हषिद्रव्य -- इ यादि-भौतिक साधन ४२७- अन्नान्नाद - लक्षणा सोमाग्निद्वयी ४२८ - प्राकृतिक नित्य अग्निहोत्र की संसाधिका तत्वद्वव ४२ - बृहतीमध्यस्थ - सावित्राग्निमय - बृहद्भानु ( सूर्य्य ) १४ २ ४३० - सावित्राग्नि की अजा अन्नादानेच्छा ४३१ - विभ्राट् सूर्य की बृहती बुभुक्षा का शमन करने वाला बिभ्राडभावापन्न महदन्न, और तटाहुति ४३२ - महादान्नाहुति का महतो महीयान् प्रभाव, और सृष्टिनिर्माण प्रक्रियाओं में सतत स्वमात्राओं का अर्पण करते रहने वाले भी सूर्य की स्वशरीर- निबन्धना अक्षुण्णत । " ४३३ - महामहिम पारमेष्ठ्य मण्डल का भार्गव - स्नेहगुगणक - महान् अन ४३४ - पारमेष्ठ्य ग्रन्त्र सोम, और ' ब्रह्मणस्पति ' ४३५ - पारमेष्ठ्य - सोम का मौलिक स्वरूपात्मक-अवलक्षण - श्रद्धातत्त्व ४३६- श्रद्धात्मिका सोमाहुति से सावित्राग्नि-मूर्ति सूर्य का प्रचण्डरूपेण प्रज्ज्वलन ४३७ - सौरप्राणाग्नि रूप अग्नितत्व ४३८- सूर्य्यपिण्डात्मक भूतपिण्ड, और अङ्गार ४३६ - सूर्यतः प्रवर्ग्यरूपे सर्वतः प्रसारि धूम्रलोहित हरित श्रादि अग्निपुञ्ज, और विस्फुलिङ्ग ४४० - श्रस्मदादि चराचर प्राणिवर्गात्मक ' समिध: ' 70 "
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४४१ - पारमेष्ठ्य सोमात्मक - हविद्रव्य ४४२ - ' तस्माद्व - सूर्योऽग्निहोत्रम शतपथब्राह्मण २ खण्ड ४४३ - सूर्याग्निहोत्र के स्वरूप संसाधक - परि-१४४२ ग्रह - साधनों की अग्नि सोमात्मिका " तत्वद्वयी पर विश्रान्ति ४४४ - आधिदैविकी - सौरसंस्था ४४५ श्रधिभौतिकी - पार्थिव संस्था ४४६ - आध्यात्मिकी- पुरुषसंस्था ४४७- ( क ) दैवत - श्रात्मिकरूपा संस्थानुगता दो विधाएँ ४४७- ( ख ) -भौतिकसंस्थानुगता एक विधा ४४८ - ( क ) – दाम्पत्यभावनिबन्धन पुनः प्रजनन-73 " 97 13 धर्म से अनुप्राणित दैवत । त्मिक संस्थाद्वयी " ४४८ - ( ख, - पुन: प्रजननधर्म से वञ्चिता प्राधिभौ-तिकी संस्था, और तन्निबन्धना एकैव-विधा " ४४६ - दैवत - प्रात्मिक - भौतिक - नामको संस्थ! -त्रयी के पञ्चविध अवयवयज्ञों का पञ्चाग्निविद्या के माध्यम से समन्वय ४५० - पञ्चावयव द्यावापृथिव्ययज्ञ के प्राण-लक्षणयज्ञ, एवं प्राणीलक्षणयज्ञ - भेद से दो महिमा - विव ४५१ - प्राणलक्षणयज्ञ की पृथिवी - श्रन्तरिक्षं-द्यौः नामकी पर्वत्रयी ४५२ - प्राणीलक्षणयज्ञ की वृषा ( पुरुष ) - योषा ( स्त्री ) नामकी पर्वद्वयी ४५.३ - द्युलोकाधिष्ठाता - ग्रह: - कालीन दृश्य - श्रद्ध-काशानुगत सौर- श्राग्नेय - प्राण- निबन्धना वृषात्मिका पुरुषसृष्टि ४५४ - भूलोकधिष्ठाता - रात्रिकालीन -- अदृश्य-श्रर्द्धाकाशानुगत चान्द्र- सौम्य प्राण-निबन्धना योषात्मिका स्त्री - सृष्टि ४५५ - लक्षण पिता, पृथिवीरूपिणी माता, और प्राण यज्ञ की अभिव्यक्ति १४४३ 37 19 " ४५६ - रसानुगत पुरुष, तथा पार्थिवरसानु -गता स्त्री और प्राणीयज्ञ की अभिव्यक्ति ४५७ पृथिवी की प्रतिकृतिभूता योषा मंत्री ४३८ का प्रतिकृतिरूप वृषा- पुरुष ४५६ - प्राणीविध - यज्ञ की भी द्यावापृथिवी-रूपता का समन्वय ४६०-- द्यावापृथिव्यनुगत आध्यात्मिकयज्ञ, तथा आधिदैविक - यज्ञ की अवान्तर - पाँच-संस्थाएँ एवं पञ्चग्निविद्या के द्वारा तत् स्पष्टीकरणोपक्रम ४६१- “ द्यु -- अन्तरिक्ष - पृथिवी - पुरुष - योषा " ( स्त्री ) नाम की पाँच पृथक् - पृथक्-विधाएँ एवं तदनुप्राणिता पञ्चाग्नि-विद्या ४६२ - प्रथमाद्य विद्या का समन्वय प्रयास ४६३ - द्य लोकात्मक अग्नि ४६४- श्रादित्यरूप - समित् ४६३ - रश्मिरूप- धूम ४६६ - त्र्ग्रहः कालरूप श्रर्चि ४६७- चन्द्रमारूप - अङ्गार ४६८ - नक्षत्ररूप - विस्फुलिङ्ग ४६६ - द्य लोकग्नि में ' श्रद्धा ' रूप हविद्रव्य की आहुति ४७० - श्रद्धा की आहुति से ' सोम ' नामक अवान्तर तत्त्व की अभिव्यक्ति ४७१- सोमोत्पादक - द्य यज्ञ ४७२ - द्य लोकात्मक - लोक ४७३ - सौरप्राणाग्निरूप - लोकी ४७४ - सूर्य्यपिण्डात्मक भूताग्नि ४७५ - महिमामय- देवाग्नि ४७६ - लोक, और लोकी का श्रभेद ४७७ - ' सौ वाव लोको गोतम! अग्निः २०५ ४७८ - पारिभाषिक अग्नि का स्वरूप समन्वय ४७६ - ' धूम ' का पारिभाषिक अर्थसमन्वय
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विषयसूची ४८० अर्थ की तत्त्वात्मिका स्वरूप परिभाषा १४४५ ४८१ - चन्द्रमा की आदित्य त्मक - स्पष्टीकरण ४८२ - चान्द्रमस - श्राप्य प्राण का रहस्या ४८३ अग्नि और तद्गणात्मक यमु ४८४- वायु 99 ४८५ - श्रादित्य, " रुद्र श्रादित्य नक्षत्र ४८६ ( क ) -चन्द्रमा " — ४८६ - ( ख ) -नक्षत्रों की पारिभाषिकी विस्कु लिंगता का समन्वय ४८७ - दिव्य - अग्नि में श्रद्धा की आहुति देने वाले देवता का पारिभाषिक स्पष्टीकरण ४-८- चान्द्रमनीतानुगत श्रद्धावस्त्र, और श्रद्धालु मानव ४८६ मनोमयी श्रद्धा का ति प्राणप्रतिष्ठाख ४६० - शुक्र - रेत का मानवप्राणप्रतियात्म ४६१ - य - वपट्कार का देवप्राणप्रतिष्ठास्व ४६२- बद्धा, पितर, और तत्रिन्धन अदा रमक - श्राद्ध कम्म ४६३ - श्रद्धा का पूर्वरूपात्मक श्रपतत्त्व ४६५ - श्रद्धा का उत्तररूपात्मक - सोमतत्त्व ४६६ तस्मिन मातरिश्वा दधाति का संस्मरण ४६७- भृगुलढ़ा लेतस्य एवं अनिरा लोभाव की अनुरूपता ४६.७ - तेजोभावान्वित - श्रद्धातत्व ४ ९८- ' तेन एव श्रद्धा ' ४६६ - परमेष्ठी से युक्ता श्रपनयी श्रद्धा की ' श्रद्धा ' -रूपता ५०० - सूर्याग्नि में हुता श्रद्धा की ( श्रादित्या-ग्नि, तथा श्रद्धारस के समन्वय से पूर्वस्वरूपमद्दन के द्वारा ) सोमरूप में परिणति ५०१ - श्रयप्रण की सीमा से श्रनुगत - श्रद्धा-तत्त्व ५०२ प्राप्य 33 ५०३ " 11 33 17 " " 77 99 27 की सीमा से बहिष्कृत - सोम पर्यात्मक प्रथमपर्व और पञ्चाग्निवि धानुगत प्रथम- दिव्ययज्ञ की स्वरूप-विश्व छान्दोग्य - ति का ( १ ) -संस्मरण ५०५ श्राध्यामिक - द्वितीय ( २ ) यशपर्व से अनुपातअन्तरिक्ष लोक ५०६ - अन्तरिक्ष के अधिष्ठाता वायुदेवता ५०७ - सोमतत्त्वानुयोगी, एवं वृत्रतत्त्व - प्रति-योगी प्राप्यप्राणानुगत वायुविशेष, और उस का वृष्टिकर्मानुगतत्त्व ५०८ - श्रान्तिरिक्ष्य सोमसहयोगी विशेष वायु-रूप - ' पर्जन्य ' ५०६ प्राप्य का सह सम्बन्धी पर्जन्य-नामक अन्तरिक्ष्य वायु, और पर्जन्यो वा श्रग्निः ' वचन का समन्वय ५१० वर्षा के आगमन से पूर्वतः सञ्चारी-माम्बसदा शिवात्मक वायु की पर्जन्य-रूपता ५११ - कन्दन - पर्जन्य वायु ५१२- अष्टमूर्ति शिवतत्वानुगता परिभाषा से अनुप्राणित ' भव ' तत्त्व, और रूप-५ ९ ३ - सर्वप्रपञ्च का प्रभव, और ' भव ' नाम-समन्वय ५१४ - पर्जन्याद्धीदं सर्वं भवति ' का संस्मरण ५१५ - वैज्ञानिक - भाव से संस्पृष्ट- पर्जन्य-शब्दार्थ के सम्बन्ध में किञ्चिदिव सामयिक आवेदन, और वेदव्याख्याता ५१६ पर्जन्य के भौतिक स्वरूप का दिग्दर्शन
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शतपथब्राह्मण २ खण्ड ५१७ पर्जन्याग्निभूतवायु श्रान्तरिक्ष - अप् तत्त्व - अग्निसम्बन्धेनोत्पन्न - बाष्प [ धूम ] -आदि की समन्वितावस्थारूप ' अ ' १४४६ ५१८ - श्रभ्रोपकरणों में ' बाष्प ' उपकरण की प्रधानता ५१६ - तद्वादन्याय, और अभ्र की धूमात्मकता २४४७ ५.२० - [ तरूपेण अन्तरिक्ष में व्याप्त बा " ५२१ - पर्जन्यानुगत -- समिध - स्थानीय-भौतिकवायु ( मान्सून ) के व्यापार से ऋतात्मक बाष्प का घनीभाव ५२२ - घनीभूत बाष्पपुञ्जात्मक ' अभ्र ' ५२३ की उत्तरावस्था, और ' मेघ ' ५२४ - श्रान्तरिक्ष्य ज्योतिर्भाव और विद्युत् ५२५ - पर्जन्याग्नि का और का अनिर्माण विद्युत् ५२६ - वज्ररूप अङ्गार ५२७ – गर्ज्जुन- तर्ज्जन रूप विस्कुलिंग ५२६- पाग्नि में सोमाहुति ५२६ - पर्जन्याग्नि, तथा सोम के रासायनिक-सम्मिश्रण से ' वृष्टि ' का प्रादुर्भाव ५३० - आधिदैविक - यज्ञ की द्वितीया विधा का पारिभाषिक स्वरूप- समन्वय ३१ श्रान्तरि ( २ ), श्रीर सास्वरूप-विश्लेषक - श्रुतिवचन का संस्मरण ५३२ पिण्डात्मिका पृथिवी का भूमिस्व ५.३३ - मण्डलात्मिका पृथिवी का पृथिवीत्त्व ५३४- ' अग्नियोनियज्ञस्य ५३५ - प्राणाग्निरूप देवाग्नि ५३६ - प्राणाग्नियज्ञ, और सम्वत्सर - मण्डल-रूप समित ५३७ - वागग्निरूप - सम्बत्सर, और तदभिन्न-भूताग्नि ५३८ - परमाकाश - पुराणाकाश - शरीराकाश-दद्दाकाश- मेदभिन्ना अाकाशचतुष्टयी " " 1 " 0 " " । ५३६ - स्वायम्भुव - परमे व्योमन् 1 और परमाकाश १४४७ ५४० - सौर- बृहन्मण्डल, और पुराणाकाश " 1 ४४१ पार्थिक श्रवसमुद्रावच्छिन- आकाश, और पुराणाकाश ५४२- श्राध्यात्मिकी काशी ५.४३ - पुराणाकाशस्थ सम्वत्सर मण्डल ५४४- श्रग्नि काल - - वयीनाथ- मेदेन सम्वत्सर के तीन महिमा - विवर्त्त ५४५- ' व्योमा हि सम्बत्सरः ' का पारिभाषिक समन्वय ५४६ - पार्थिवाकाश, और भूतयज्ञ का ' धूम ' तत्व ५४७- पार्थिव यज्ञाग्नि 1 और अच ५४८ अवान्तर दिशाएँ, और बिस्फलिंग ५४ ९ - पार्थिव अग्नि में ' दृष्टि ' की आहुति ५५० उमय - समय से ' अन्न ' का आविर्भाव ५५१- अभिभौतिक - आर्थिक - यज्ञ की एक-विधा का स्वरूप - मम्वय ५५२ छान्दोग्य ति के द्वारा प्रक्रान्त तृतीय-यश - ( पार्थिवयश ) का स्वरूप स्पष्टी करण ( ३ ) ५५३- द्विविध आधिभौतिक यश और विधाधिभौतिक यज्ञ एक-५५४- क्रमप्राप्त श्राध्यात्मिकश का संस्मरण ५५५ - वृषा लक्षण - पुरुषयज्ञविवर्त ५५६ श्राध्यात्मिक यज्ञ का पुरुषभाव, और ' अग्नि ' ५५७ - आध्यात्मिक - षडङ्ग - वैश्वानर- श्रग्नि की पुरुषरूपता ५५८ - प्राणापान से समन्वित आध्यात्मिक-वैश्वानराग्नि ५५- प्राण - पान- व्यानत्रयी के पारि भाषिक स्वरूप का समन्वय " " १४४८ 37 " 11 " १४४६ " २०७
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५६० - विश्वत्रयी की अधिष्ठात्री नरत्रयी, और ' वैश्वानर ' शब्द का तारिक स्वरूप- समन्वय ५६१ वैश्वानर - शब्द के निर्वाचन का श्रुति-वचन - माध्यम से समन्वय ५६२ वैश्वानरान की ' पुरुष ' श्रामचा का अतिवचन के द्वारा समर्थन ५६३ वा मय - भूताग्निरूपयाग्न ५६४ - पुरुषाग्नि, और समित् विश्यची १८५२ 39 ५६५ - ध्वन्यात्मक शब्द, श्रीर 31 और अङ्गार ५६६ चतुर्मा ५६७- छत्रभाव और विलिंग ५६८- पुरुषानि में वर्षा - विकार भूत - अन्न-लक्षण विद्रव्य की आहुति ५६६. - भुक्तान्न की तोरूप में परिणति ५.७० वृषाया और समर्थक छान्दोग्य ', वचन ( ४ ] ५७१ ध्यात्मिक यज्ञ की द्वितीया - विधा और तदनुप्राणित- ' योषायज्ञ ' ५०२ पाका पुरुषसँग प्रतिष्ठास्त्र ५७३ योषा का स्त्री प्रतिस् ५७४- अग्निधान वृपाप्राण और तनि बन्धन - पुरुष ५७५ सोमप्रधान योगाभागा और तत्रि-बन्धना -स्त्री ५७६- आग्नेय वृषात्मक - पुरुष और दृश्य-श्रद्ध ' अण्डकटाह ( अर्द्धांकाश ) ५७७- सौम्यायोपात्मिकास्त्री और अदृश्य श्रद्ध - अण्डकटाह ५.७८ योषाणात्मिका स्त्री का वर्ण आग्नेय - शांति और उसका दोषा यज्ञ - प्रतिहारव ५७६ - रेसोरूप आहुति का ग्राहक शोणितरू-योधाग्नि, और अग्नि 39 17 " ५८० योष - अग्नि का उसे उपस्थ, और समित् १४५० ५८१ - उपस्थ समित् के संयोग से उत्पन्न योषा -ग्निजनित संक्षोभ, और ' धूम ' ५.८२ - रक्तवर्णात्मक कन्दल योनिर्भाव, और अचि ४८३ इत्यंभूत योषाग्नि में रेतोद्रव्यात्मक हविद्रस्य की आहुति और ' गर्भ ' का स्वरूप- सम्पादन ५८४ पत्मक पम - आध्यात्मिक यश का स्वरूप- विश्लेषक - पञ्चम · छान्दोग्य वचन ( ५ ) ५८५ पञ्चाग्निविद्यानिबन्धन स्वरूप निष्कर्ष, और ' इति तु पञ्चम्यामाहुतात्रापः पुरुषाचसो भवन्ति ' का तात्त्विक-समन्वय प्रयास ४६ पञ्जानियत का तालिका के माध्यम से स्वरूप - विश्लेषण ५८- चौ: - आदित्य और श्रद्धा ५८० अन्तरिक्षम वायुः खर मोम ५८८ - पृथ्वी अग्निः और वृष्टिः ५८६ - वृषा - वैश्वानरः - और अन्नम् ५६ • योपा - मालिक और रेतः ५६. १ - पञ्चाग्निविद्यानिबन्धन - पर्जन्याग्नि से युत द्वितीय यज्ञपर्व, और तन्निबन्धनवर्षण-कर्म्म ५६२ - ' अग्निर्वा इतो वृष्टिमुदीरयति ' अति से विरुद्धा पञ्चाग्निभूति ५६.३- श्रीतसिद्धान्तों के पारस्परिक विरोध में मीमांसाशास्त्र की सम्मति और सभी वचनों की प्रामाणिकता ५६४ - तत्वदृष्टि - सम्मता विज्ञानदृष्टि के माध्य से श्रौतवचनों के विरोधाभासों का मिराकरबा 37 12 II २०८
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शतपथब्राह्मण २ खण्ड ५६५ सृष्टिकमारम्भानुगता विज्ञानदृष्टि, और पर्जन्ययज्ञानुगत - वृष्टिसिद्धान्त की प्रामाणिकता का समन्वय १४५१ ५६६ -स्थितिक मानुगता- विज्ञान दृष्टि, और-' अग्निर्वा • ' इत्यादि तृतीय दृष्टिकोण का निर्विरोध सयन्वय ५६७ - ऐतरेय- श्रारण्यकानुगता - रेतसः सृष्टि रूपा सृष्टि का संस्मरण, और तन्नि-बन्धन - वृष्टिकर्म ५६८ - प्रजापते रेतो देवाः ५.६६ - देवानां तो वर्षम् ६०० - वर्षस्य रेत श्रोषधयः १४५२ ६०१ - श्रोषधीनां रेतः श्रन्नम् 29 ६०२ - अन्नस्थ रेतो रेतः ६०३ - रेतसो रेतः प्रजाः 91 29 ६०४ - प्रजानां रेतो हृदयम् 17 ६०५ - हृदयस्य रेतो मनः 11 ६०६ - मनसो रेतो वाक ६०७ - वाचो रेतः कर्म ६०८ - तदिदं कर्म्म- कृतमयं पुरुषो ब्रह्मणो लोकः ६०६ - विभिन्न- निमित्त उपदानादि कारणो का सह - समन्वय, और तनिबन्धन वर्षण -कम्प वृष्टिविद्यानुगत - मूलसूत्र ६१० - श्रग्निर्वा इतो वृष्टिमुदीर-यति ' -- इति श्रग्निः-- सत्यम्-पार्थिवाग्निः ( १ ) ६११ - ' वायु वृष्ट्या ईशे ' इति वायुः - वायव्याग्निः ( २ ) सत्यम् - व " 1 11 १४५२ " ६१२ - ' आदित्याज्जायते इति - आदित्यः सावित्राग्निः ( ३ ) वृष्टिः -सत्यम्-१४ ६१३ - ' पार्जन्यं वर्षामु यजते ' इति-पर्ज्जन्यः -ऋतम्- आप्याग्निः ( ४ ) ६१४ - ' सोमाहुतेर्वर्ष ', सम्भवति ' इति - सोमः ऋतम् - चान्द्र-सोमः- ( ५ ) समदधात्'-६१५ - रश्मिभिर्वर्षं इति - रश्मयः - सत्यम् - प्राणा-ग्निः ( ६ ) ६१६ - ' पुरोवातं ससृजिरे ' इति -पुरोवातः ऋतम् - वातवायुः ( भूतवायुः ) ( ७ ) ६१७ - ' अभ्राद्वृष्टिः ' इति श्रभ्रम्-ऋतसत्यम् - ज्योतिरग्निः ( ८ ) ६१८ - ' वृष्टिर्वै याज्या विद्य देव'-9 इति विद्युत् ऋतसत्यम्-ज्योतिरग्निः ( ६ ) ६१६ - स्तनयित्नुर्घोषोऽन्वसृज्यत ' इति - स्तनयित्नुः - सत्यम्-शब्दाग्निः ( १० ) ६२० - श्रस्यवामीसूक्तानुगता मन्त्रत्रयी से अनुप्राणिता दृष्टिविद्या ६२१ - कृष्णयजुः संहिता की कारीरीष्टि, श्रीर तन्निबन्धना दृष्टिविद्या २०६
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६२२ - प्रकीर्णभावेन यत्र - तत्र स्थल- विशेत्रों विषयसूची अनुप्राणिता वृष्टि - विद्या का संस्मरण १४५३ ६२३- वैदिक - विद्याओं की महती जटिलता ६२४ - रहस्य - निगद - गाथा कुरुया-यदि पारिभाषिक ग्रन्थों की विलुप्ति, और वैदिक-तत्रसमन्वय की दुरूहता 19 ६२५ - विद्वानों का चिरन्तन सामूहिक प्रयास, और जटिलता का आंशिक निराकरण ६२६ - हमारे ये अव्यवस्थित प्रकरण ६२७ - विस्मृतप्राया विद्याओं के प्रति ध्याना कर्षण मात्र प्रयोजन, और हमारे ये अस्तव्यस्त प्रयासामास ६२८ - पृष्टिविद्यानुगता मन्त्रत्रयी की समुप-स्थिति ६२६ - ' सप्तार्द्ध'गर्भा ० ' इत्यादि प्रथममन्त्र ६३० - ' कृष्णं नियानं ० ' इत्यादि द्वितीयमन्त्र ६३१ - ' समानमेतत् ' ० इत्यादि तृतीयमन्त्र ( मन्त्रार्थ - - समन्वयोपक्रम ) ६३२ - पार्थिव जलामात्राएँ ६३३ - अतिरोऽग्नि के द्वारा पार्थिवी बल-मात्राओं की वाष्परूप में परिणति, श्रीर दूध्वंगमन ६३४ - वृष्टि का प्रथम निमित्त पार्थिवाग्नि ६३५ - द्वितीय - निमित्त वायु ६३६ - ऊर्ध्व - प्रक्षिप्त पार्थिवी जलमात्रा की गुरुत्वाकर्षण से मुक्ति, एवं तद्-बाब्यावस्था ६३७ - जलमात्रा के ऊर्ध्वगमन का श्रन्यतम ६३८ - सन्तविध सूर्य्यनाडियों से समन्वित प्रेरक- बाध्यवायु श्रान्तरिक्ष्य - महापथ 11 ६३६ - नाडीमार्ग के द्वारा ही सौर पार्थिव-पदार्थों का गमनागमन ६४०- गमनागमन का प्रधान निमित वाय-वायु ६४१ - तृतीय निमित्त - सूर्यरश्मियाँ ६४२ - सूर्यसंस्थानुगत श्राददानधर्म्मा - विभिन्न १२ प्राण और द्वादशादित्य - समष्टि-रूप सूर्य ६४३ – सर्वरसादानत्व - धर्म, श्रीर आदित्य " ६४४ - प्राणमेव श्रग्ने गदत्त ६४५ - रूपमेव वायोगदत्त " 1 १४५४ " P ,, १४५४ 11 " ST ६४६ - चित्तमेव पुरुषस्यादत्त ६४७ - चतुरेव पशूनामाटत ६४८ - भामेव चन्द्रमसमादत्त ६४ ९ - तत् यत् श्रादत्त, तस्मादादित्यः ६५० - नाडीरूप - रश्मियों का भूतसंभग्नव ६५१ - आगमन धम्र्म्मा सौरतेज, श्रौर सावित्री ६५२- प्रतिफलन धर्भेण गमनधर्म्मा सौरतेन, श्री गायत्री ६५.३ - रश्म्यनुगता अपेक्षा, और ' श्रादित्या-जायते वृष्टि: ' का समन्वय ६५४ - पार्थिवाग्न्यनुगता . अपेक्षा, और ' श्रग्निर्वा इतो वृष्टिमुदीरयति ' श्रुति का समन्वय ६५. ५ - श्रन्तरानुगत वायु की अपेक्षा, और ' वायुर्वै दृष्टया ईशे ' श्रुति का समन्वय ६५६ - नाही - सूर्य्यरश्मि ) - एवं श्राग्नेय - प्राण-समन्वित - वायु से सम्बद्ध - दृष्टिविज्ञान, श्रौर तन्निबन्धन- “ नाड्यो वायुसंयो-गादारोहणम् । नोदनापीडनात्-संयुक्त - संयोगाय ” इत्यादि दारां-निक दृष्टिकोण का समन्वय ६५७ - नाडयो - वायुसंयोगात् -- श्रारोहित - पार्थिव २१. बल का संस्मरण १४५.५. " " 1 99 " 11 21 19 " 33 " 1 21
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६५८ - वृष्टिविद्यानिबन्धना -यमन --स्थिति--वर्षण - रूपा श्रनुबन्धत्रयी ६५६ - गमानाधिकरणात्मिका वृष्टिविद्या ६६०- गर्भाधानकालात्मक - गमनाधिकरण ६६१ - स्थित्यधिकरणात्मिका दृष्टिविद्या ६६२ - दो हदकालात्मक स्थित्यधिकरण ६६३ - वर्षणाधिकारात्मिका वृष्टिविद्या ६६४ - ( क ) प्रसवकालात्मक वर्षाधिकरण शतपथब्राह्मण २ खण्ड ६६४ ( ख ) पार्थिवाग्निरश्मियों का ऊर्ध्वगमन ६६५ - रश्मि सम्बन्धेन पार्थिव जलमात्रा का जसरूपेया ऊर्ध्वगमन ६६६ - द्युलोक से अजस्ररूपेण रसवर्षण ६६७ - अहरर्ह्यज्ञात्मक - उभयक्षतिपूरक -- मैत्र-ज्ययज्ञ ६६८- ऋतुमर्ति सम्वत्सर प्रजापति की विशेष भावापन्ना ' वर्षाऋतु ' का संस्मरण ६६६ वर्षाऋतु से श्रनुगता गर्भ - दोहद - प्रसव-भावत्रयी ६७० - चतुर्मासात्मक प्रीष्मकाल, और तन्नि-बन्धन गर्म काल ६७१ चतुर्मासात्मक प्रीष्मकाल, और तनि-बन्धन- दोहद काल ६७२ - चतुर्मासात्मक वर्षाकाल, और तनि-बन्धन - प्रसवकाल ६७३ - मार्गशीर्षतः फाल्गुन- पर्यन्त पार्थिवी-बलमात्रा का द्युलोक में गर्भाधान ६७४ - चैत्रतः श्राघाट- पर्यन्त- गर्भस्था बल-मात्रा का दोहदरूप पोषण ६७५- भावणतः कार्त्तिक- पय्यन्त पुष्टा जलमात्रा की प्रसूति ६७६ - [ श्चिक राशि में भुक्त ज्येष्ठानक्षत्र, और मार्गशीर्षानुगता श्रमावास्या ६७७ - मूल नक्षत्र के उत्तरा ' में सूर्य्यं का भोग, और गर्भकाल का उपक्रम १४५५ 93 " 19 " 3 19 १४५६ " 11 21 " 31 " " " 39 " ६७८ - श्रार्द्रानक्षत्र - भुक्त- सूर्य्य, काल का उपक्रम और प्रसव-१४५६ ६७६- मूलादि - भरण्यन्त १२ नक्षत्रों का चान्द्रोम सहयोगित्त्व, और गर्भो -जकत्व ६८० - श्रार्द्रादि - विशाखान्त ११ नक्षत्रों का सौर- अग्नि सहयोगित्व, और प्रसवप्र-वर्त्तकत्व ६८१ - गर्भ को मूलप्रतिष्ठारूप चान्द्रचार ६८२ - प्रसव की मूलप्रतिष्ठारूप सूर्य्यचार ६८३ - बलमात्रा की ६ मास पञ्चदशदिवस-पर्यन्ता - गर्भस्थिति का तात्विक स्वरूप-समन्वय ६८४ - ' सप्तागर्भा ' का संस्मरण ६- अह में गर्भाधान, तो रात्रि में वृष्टि ६८६ - रात्रि में गर्भाधान, तो श्रहः में दृष्टि ६८७ - वृष्टि विद्यानिबन्धना कतिपय विशेष-ताओं का संस्मरण ६८८ - शीतवायु- श्वेतप्रभ्र-- विद्युत् - गर्जन--आदि गर्भाधान के परिचयात्मक चिह्न ६८६ – गर्भपातक - निरोधक -- शनैश्चर, तथा मङ्गल ग्रह ६६०- करकापात का कारण समन्वय ६६१ - गर्भाधान भाव - गर्भपात गर्भनिरोध - श्रादि निमित्त समन्विता चामत्कारिकी वृष्टि-विद्या, और विधि के अटल - विधान ६६२ - मन्त्र का पारिभाषिक तत्त्वार्थ-समन्वय प्रयास ६६३ - वेदस्रष्टा चतुम्मुख भगवान् ब्रह्मा के तत्त्वात्मक- चार मुख, एवं चारों से वेद-लोक देव - धर्म्मरूपा --सर्गचतुष्टयी की प्रवृत्ति ६६.४ - विष्णु के परमपद का संस्मरण, और और तनिबन्धना मन्त्र ति 99 " १४५७ 11 39 " २११
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विषयसूची ६६५ - ध्रुवप्रदेश, और नाकस्थ विष्णुमण्डल १४५७ ६६.६ - प्रयनवृत्तिनिबन्धना - वपरिक्रमा १४५८ ६६.७ - विष्ववृत्तीय पृष्ठी केन्द्रात्मक व का संस्मरण " 9 ६६.८ क्रान्तिवृत्तीय - पृष्टीकेन्द्रात्मक कदम्व का संस्मरण ६६.६ - विश्ववृत्त और क्रान्तिवृत्तानुगत २४ अंशात्मक अन्तर ७०० - ध्रुव, और कदम्बानुगत २४ अंशात्मक अन्तर ७०१ - कदम्बमूर्ति- नाकस्थ विष्णु ७०२ - विष्णु प्रदेशात्मक उत्तराकाश की अंशा--त्मिका पारिभाषिक व्याप्ति ७०३ - चन्द्रमा के सहयोग से जलमात्रा का गर्भाधान ७०४ - सूय्य के सहयोग से जलमात्रा का वर्षगा ७०५ - चन्द्रमानुगता एक अहोरात्रात्मिका गर्भाधानावधि का संस्मरण ७०६ - सूर्य्यानुगता प्रसवावधि से अनुगत त्रयोदश अहोरात्र ७०७ – मन्त्रोपात्त - ‘ मनसा ', शब्द, और चन्द्र चारानुगत गर्भाधान ७०८ - मन्त्रोपात्त - ' घीतिभिः ' शब्द, और सूय्यंचारानुगत प्रसव ७०६ - ' विपश्चितः ' का रहस्यात्मक - पारिभा-षिक अर्थसमन्वय ७१० - ' कृष्णं नियानं हरयः सुपर्णा: ० ' इत्यादि क्रमप्राप्त - ऋङ मन्त्र का संस्मरण " 21 33 " 39 " " II १४५६ " ७१६- ' कृष्णं - नियानम् ' भाषिक अर्थसमन्वय वाक्य का पारि ७१७ - ' हरयः - सुपर्णा: ' से अनुप्राणिता सुप-चित ७१८ - सुपर्ण - के तात्त्विकेतिवृत्त का संस्मरण ७१६ - ' पो वसाना दिवमुत्पतन्ति ' इत्यादि-मन्त्रभागार्थ - समन्वय ७२०- भार्गवी - ऋततत्त्वत्रयी का संस्मरण ७२१- ' ऋतमेव परमेष्ठी ' ७२२ – घनावस्थापन्न अप्तत्त्व, श्रौर श्रासुर-वरुणप्राण ७२३ - तरलावस्थापन्न - वायुतत्त्व, और सोम-रक्षक - गन्धर्वप्राण ७२४ - विरलावस्थापन्न सोमतत्त्व, और सौम्य पितर प्राण ७२५ - उत्तरस्थान का विष्णुपदत्त्व ७२६-वारुणव " ७२७-22 की ऋतसदनता ७२८- ' वरुणस्योत्तम्भनमसि ' इत्यादि यजुः-श्रुति का संस्मरण ७२६ - वर्षाजल से काल्वालीकृत भूतल ७३० - मन्त्रत्रयी के तत्त्वार्थ का उपराम ७३१ - श्रत्यर्थानुगामी पुराणशास्त्र, और तन्निबन्धना वृष्टिविद्या का पुराण-७३२ - बुद्धिगम्या, रहस्यपूर्णा- परिभाषानुगता-गमीरतमा श्रतिभाषा से अनुप्राणिता तैत्तिरीय - सम्मता वृष्टिविद्या का मलात्मक वचन - माध्यम से संस्मरण १४५६ १४६० " " 39 " 77 19 19 " " १४६१ " " ७१२- शुक्ल भावापन्न - उत्तरायण प्रासङ्गिक संस्मरण १४६२ ७१२ - कृष्णभावापन्न - दक्षिणायन 11 ७३३ - उक्त तैसिरीव-- श्रुति - सन्दर्भानुगता ७१३ - कृष्णमागं - निबन्धन पार्थिव - मृग्याग्नि 33 कारीरीष्टि, और वृष्टि १४६३ 23 ७१४ - शुक्लमार्ग - निबन्धन सौर- सावित्राग्नि ७१५- उत्तरानुगत - इन्द्रदेवता 27 २१२ ७२४ - प्राच्यङ्गमन्त्रव्याख्यानथति का वृष्टि-निबन्धन मूलसूत्र 17