Shatpath Brahman 1 2 — पृष्ठ 401–410

शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - १-२ - मोतीलाल शास्त्री · पृष्ठ 401–410

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द्वितीयाध्याय शतपथब्राह्मगा द्वितीयब्राह्मण हैं । ये ही दोनों ( आपः ओषधि ) परस्पर मिल जाते हैं । ' सम्मधुमती ' इत्यादि से रसवती आपः रसवती श्रोषधियों से मिले ' यही कहा गया है ॥ २ ॥

अनन्त - - " संघांति “ जनयत्यै त्वे " ति " ( का ० श्र ० सू ० २२५१४ ) के अनुसार अध्वर्यु – “ जनयत्यै त्वा संयोमि " ( ०१।०२ ) यह मन्त्र बोलता हुआ पिष्टपुरोडाश को सिक्त उपसर्जनी आपः से मिलाता है । जिसप्रकार यह प्रजा यजमान की ' श्री ' के लिए, एवं ' अनादि ' के लिए अनुगत हो, इसीप्रकार से अध्वर्यु ' उपसर्जनी आप को पुरोडाश के साथ मिलाता है, इस पिष्ट पुरोडाश का श्रपग्णाग्नि में अधिश्रयण करता हुआ ही अध्वर्यु ' उपसर्जनी आप मिलता है, जिस अधिश्रित पुरोडाश अग्नि के साथ युक्त होकर नवीन ( आहुतिद्रव्य ) रूप से उत्पन्न हो, तदनुरूप ही यहाँ संयंत्रन ( सम्मिश्रण ) कर्म किया जाता है । तात्पर्य यही है कि, नवीन प्रजनन के लिए यहाँ उपसर्जनी का पुरोडाश के साथ मेल कराया जाता है । इसी प्रजननभात्र को दृढ करने के लिए “ जनयत्यै त्वा संयोमि " इस मन्त्र का प्रयोग किया जाता है ॥ ३ ॥

मिश्रणानन्तर- अध्वर्यु यदि प्रकृतेष्टि में दो भाग होते हैं, तो " समं विभज्यासंहरि-यन्नालभत " इदमग्ने ” “ रिदमग्निषोमयो " रिति ' ( का ० श्र ० सू ० २२५११५ ) के अनुसार उदकयुक्त पिष्टपुरोडाश को दो भागों में विभक्त करता है । पौर्णमासेष्टि में दो ही हत्रि होते हैं । ( यह पौर्णमासेष्टि है, इसमें अग्नि- अग्निपोम भेद से दो देवता प्रधान हैं ) । अतः आहुति-द्रव्यरूप हवि को दो भागों में हीं विभक्त करना उचित है यही तात्पर्य है । इसप्रकार संयुत पिष्ट-द्रव्य को समान पिण्ड बनाने के अनन्तर आगे जाकर जिस समय इन विभक्त दोनों हवियों को परस्पर न मिलानेवाला ही उस समय ( अर्थात् एक बार विभक्त किए बाद पुन: इस विभक्त द्रव्य-को न मिलाने का निश्चय होजाने के अनन्तर ) अध्वर्यु - ' इदमग्ने, इदमग्नीषोमयोः ' दोनों मन्त्र क्रमशः बोलता हुआ उसी क्रम से दोनों दक्षिणस्थ उत्तरस्थ पिण्डों का स्पर्श करता है । हहिणकाल में ऋत्विग्गण हविर्द्धानशकट से देवताभेद के अनुसार पृथक् पृथक् कर के हो हविर्प्रहण करते हैं, पृथक् पृथक् गृहीत हविद्रव्य को एकसाथ कूटते हैं । पुनः एकसाथ ही उसे पीसते हैं । श्राज ( संपन्न होने के अनन्तर ) पुनः उसे दो पिण्डों में विभक्त कर पृथक् भावापन्न बनाते हैं । इसी पृथग्भाव को दृढ़मूल बनाने के लिए पूर्वोक भिन्न भिन्न मन्त्रों से - पृथक् पृथक् दोनों पिण्डों का स्पर्श करता है । अभिमर्शनानन्तर ( एक ही समय में ) यह ( अध्य ) पुरोडाश को श्रपण ग्नि । पर रखता है, एवं वह ( ब्रह्म ( ) आज्यनिर्वाप करता है । अर्थात अधिश्रयण - आज्यनिर्वाण, दोनों कर्म्म ६६५

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द्वितीय अध्याय प्रथमकाण्ड द्वितीयब्राह्मण एकसाथ होते हैं । वस्तुस्तु यहाँ - ' एप ' से अध्वर्यु का ही ग्रहण करना चाहिए, एवं ' माँ ' से श्राग्नीध का ही ग्रहण करना चाहिए । ब्रह्मा तो यज्ञ का निरीक्षकमात्र है । अध्यका सह-चारी आग्नीध्र ही है । यही अर्थ सायणभाष्य - सम्मत है || ४ || इसप्रकार पूर्वकथनानुसार अधिश्रयण, और श्रज्यनिर्वाप, एकसाथ कर देते हैं । सो जिस लिए कि ये दोनों कर्म्म एक साथ करते हैं, उसकी उपपत्ति ( विज्ञान ) बतलाते हैं । आधा यज्ञरूप आत्मा ( यज्ञात्मक शरीर ) का यह आधा भाग है, जोकि ' आज्य ' है । बह ( पुरो-भाग इस यज्ञ में ' हविद्रव्या ' होता है । सो जो वह ( श्रज्य ) आधा भाग है इसी , एवं दृष्टि से पूर्वोक्त डाश ) आधा भाग है, उन दोनों को ( एक साथ ) अग्नि से सम्बद्ध करें परस्पर , समन्धित हो-दोनों कर्म्म एकसाथ किए जाते हैं । ऐसा करने से इस यज्ञ का शरीर जाता है || ५ || इसके अनन्तर - - ' इषे वे त्याज्यमधिश्रयत्यन्यः ' ( का ० श्री ० २५।१७ ) के अनुसार हुआ गाईपत्यखर के आग्नीध्र ' इषे वा अधिश्रयामि ' ( अजुः सं ० ११२२ ) यह मन्त्र बोलता रखता है । वृष्टि के लिए ही मध्य में दक्षिण की ओर स्थित अग्नि पर श्राज्यस्थाली ( घृतपात्री ) स्थित घृत जब उष्ण हो आग्नीध ने कहा है, जो कि उसने ' दुषे चा ' कहा है । ( आज्यस्याली को ठंढा करता है । जाता है, तो ) आग्नीध ' ऊर्जे वा उद्याम़यामि ' यह मन्त्र बोलता हुआ घृत, उसी को लक्ष्य में बरमने के अनन्तर बरसे हुए पानी से जो ' उकू ' नाम का रस उत्पन्न होता है रखकर - ' ऊर्जेच्चा ' यह कहा गया है ॥ ६ ॥

रजो– ' इतिकर्त्तव्यता ' के समन्वय के लिए प्रकृत में यह और समझ लेना चाहिए नहीं कि होती , है, दोप, प्रसव पीड़ा, एां अन्य किसी विशेष कारणवश यज्ञ में यदि यजमान - पत्नी उपस्थित में हीं आज्या-तो ऐसी अवस्था में आहवनीय में श्रपण करने वाले यजमान को आहवनीयाग्नि धिश्रयण - कर्म्म करना चाहिए । यदि पत्नी साथ है, तो श्राहवनीय में श्रपण होने पर भी कात्यायन गाईपत्य में ही आज्याधिश्रयण करना चाहिए । इसी व्यवस्था का निरूपण करते हुए महर्षि कहते हैं-" पत्नीकस्य आहवनीये तच्छाषिणः " ( २ । ५१८ ) । ध्यान रहे- ' अपत्नीकस्य ' का अर्थ पत्नी की यज्ञ में अनुपस्थिति मात्र ही है । कारा कर्काचार्य्यं के मतानुसार विद्यमानपत्नीक यजमान का तो यज्ञ में सर्वथा अनधिकार ही है । ६६६

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द्वितीय अध्याय शतपथब्राह्मण द्वितीयब्राह्मण आज्याधिश्रयणानन्तर- ‘ धर्मोऽसीति पुराडाशौ युगपत् । का ० श्र ० २।५।१६ ) के अनु-सार ' धर्मोऽसि विश्वायुः ' ( ११२२ ) यह मन्त्र बोलता हुआ आग्नीध, एवं अध्वर्यु एकसाथ आग्नेय, एवं अग्निपोमीय पुरोडाश को अग्नि पर रखते हैं । अर्थात् उपर्युक्त मन्त्र बोलता हुआ तो आग्नेय पुरोडाश रखता है, एवं आग्नीध्र ( साथ साथ ही ) अग्नीपोमीय पुरोडाश रखना है । जिसप्रकार सोमयज्ञ में ' धर्म ' को प्रवृत्त करें, वैसे ही इस इषि में धम्र्मतुल्य पुरोडाश का विभक्त करते हैं । ' विश्वायुः ' कहता हुआ अश्व ' पुरोडाश में आयु ही प्रतिष्ठित करता है || ७ || अचिवर्जनानन्तर -- ' ' उरुप्रथा इति प्रथयति यावत् कपालमनतिपृथुम् ” ( का ० श्रौ ० सू ० २।५ । २० ) के अनुसार पूर्वोक्त क्रम से विभक्त आग्नेय, अग्नीपोमीय पुरोडाशों का अध्वर्यु और आग्नीध्र-' उरुप्रथा उरु प्रथस्व उरु ते यज्ञपतिः प्रथताम् ' ( ११२२ ) यह मन्त्र बोलते हुए स्त्र स्व पुरोडाश को कपाल में फैलाते हैं । कात्यायनने – ' अनतिपृथुम् ' कहा है । तात्पर्य इसका यही है कि-' तन्न सत्रा पृथु ं कुर्य्यात् अश्वशकमात्रं कुर्य्यादित्यु हैक आहुः ' ( श ० १२२ | २ || १० ) इस श्रौत-सिद्धान्त के अनुसार अश्वशफ के परिणाम से ही पुरोडाश के प्रथन का आदेश दे । यजमान यज्ञपति है । उसी के लिए ' उरु प्रथताम् ' यह आशी माँगते हैं ॥ = ॥ " पूर्वोक – ' प्रनतिप्रथुम् ' भाव को लक्ष्य में रखकर ही श्रुति कहती है - उस पुरोडाश को एकसाथ ही पृथुन करदे । यदि ऋत्त्विक पुरोडाश का सर्वथा प्रथन करदेगा, तो वह ( दिव्ययज्ञ में ) मानुष ( कर्म्म ) करेगा । वह यज्ञ की व्यृद्धि ( सम्पत्तिनाश ) है, जो कि मानुषभात्र है | हम अपने दिव्य यज्ञ में ) व्यृद्धि न कर बैठें, इसलिए एकसाथ विना अवधानता के मनमाने परिणाम से पुरोडाश को नहीं फैलाना चाहिए ॥ ॥ फिर कितना फैलाना चाहिए?, इस विषय में कितने हीं ( तैत्तिरीय ) आचायों का मत है कि घोड़े के के परिणाम से उसे फैलाना चाहिए । इस पूर्व मत का निराकरण करती हुई शतपथश्रुति कहती है कि – ' घोड़े का खुर इतना बड़ा है ' यह कौन जान सकता है । अर्थात श्वशफ की इयत्ता का यथावत् ज्ञान होना कठिन है । इसलिए ऋत्त्विक को चाहिए कि, वह अपने विचार से पुरोडाशको से अधिक फैला न समझ वहीं तक फैलादे ॥ १ ॥

अनन्तर – ' अग्निष्ट इत्यद्भिरभिमृशति सकृत् - त्रिर्चा ” ( का ० श्र ० शश २१ ) के अनु-सार त्रिभक्त स्त्र स्त्र पुराडाश का अध्वर्यु, और आग्नीध्र सोदक हस्त से पुरोडश का चारों ओर मे एकचार, अथवा तीन बार स्पर्श करते हैं । सो जो कि ऋत्विग्गण इसे कूटते हुए, पीस हुए जो ६६७

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द्वितीयअध्याय प्रथमत्रगढ़ द्वितीयब्राह्मण इसका भाग क्षीण कर देते हैं, विशीर्ण कर देते हैं, ( पानी शान्ति है ) अतः शान्तिरूप इन पानियों से इस ( क्षीणभाग ) का पुनः संधान ही करते हैं । इसी प्रयोजन के लिए ' अभिमर्शन ' करते हैं || ११ || अभिमर्शन क्यों किया जाता है?, इसकी उपपत्ति बतलादी गई । अत्र वृत ( पद्धति ) बतलाते हैं-वह अध्वर्यु, और ऋत्विक ' अग्निष्टं त्वचं माहिंसीत ' ( १।२२ ) यह मन्त्र बोलता हुआ पुरोडाश के चारों और जल का सम्बन्ध करते हैं । आगे जाकर यह ऋत्विक् इस पुरोडाश को चारों ओर से अग्नि में तपावेगा । उसी अवस्था को लक्ष्य में रखकर कहते हैं - ' हे पुरोडाश! आपकी त्वचा को अग्नि न जलाडाले ॥ १२ ॥

अभिमर्शनानन्तर — ' पर्य्यग्निं करोत्यन्तरिक्षं रक्षोऽन्तरिता अरातय इति सहाज्यम् ' ( का ० श्र ० २२५/१२ ) के अनुसार ( गाईपत्याग्नि में से प्रज्वलित अङ्गार लाकर ) श्रध्वर्यु -" अन्तरिक्षं रक्षोऽन्तरिता अरातयः " यह मन्त्र बोलता हुआ पुरोडाश के चारों ओर उसे फिराता हुआ पुरोडाश को अग्नि से वेष्टित करता है । ऐसा करता हुआ अध्वर्यु - अग्नि से अच्छिद्र ही पुरोडाशका ग्रहण करता है । नाष्ट्रा और राक्षस इसका स्पर्श न करलें, अग्नि राक्षसों का अप-हन्ता है । इसलिए इसे पर्य्यग्नि करते हैं ॥ १३ ॥

पर्य्यग्निकरणानन्तर दग्धाङ्गार को गार्हपत्य में प्रक्षिप्त कर अप - उपस्पर्श कर - ' देवस्य त्वेति श्रपणम् ' ( का श्रौ ० २ | ५ | २३ ) के अनुसार - ' देवस्त्वा सविता श्रपयतु वर्षिष्ठेऽधिना के ' ( १।२२ ) यह मन्त्र बोलता हुआ अध्वर्यु क्रमशः प्रथम - द्वितीय पुरोडाश का परिपाक करता है । इस ( दिव्यान्नस्वरूप ) पुराडाश का श्रपयिता मनुष्य नहीं है । वह श्रपयिता तो देव है । सविता-देव ही इसका परिपाक करते हैं । वृद्धतम स्वर्ग में सवितादेवता तुम्हारा परिपाक करें, इससे पुरो-डाश को देवत्रा ( देवाधीन - दिव्यसम्पत् ) बनाते हैं । श्रपणानन्तर- ' मामेरित्यालभते ' ( का ० श्र ० सू ० २ | ५ | २४ | ) के अनुसार यह परिपक्क हुआ कि नहीं, यह जानने के लिए पुरोडाश का स्पर्श करता है । श्रपणानन्तर स्पर्श क्यों किया जाता है?, इसकी उपपत्ति बतला दी गई । अत्र पद्धति बत-लाते || १४ || वह अध्वर्यु – ' मार्भा संविकथा: ' ( ११२३ ) यह मन्त्र बोलता हुआ पक पुरोडाश का स्पर्श करता है । श्रमानुषरूप आप को ( पुरोडाश को ) मैं मनुष्य छूता हूँ, इस से आप मत डरिए, मत कम्पित हो, यही मन्त्रार्थ है ॥ १५ ॥

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द्वितीयाध्याय शतपथब्राह्मण द्वितीयब्राह्मण अभिमर्शनानन्धर – ‘ अतमेरुरिति श्रुतावभिवासयति भस्मना वेदेनोपवेषेण वा ' ( का ० श्र ० २२५/२५ ) के अनुसार अव त पुरोडाश को साङ्गार भस्म से आच्छादित करदेता है । ऊपर से राक्षस असुर इसे न देखलें, नग्न की भाँति चौरादि से मुषित की भाँति यह न रक्खा रहे, इसलिए आच्छादित करते हैं ॥ १६ ॥

पुरोडाशको छादित क्यों किया जाता है?, इसकी उपपत्ति बतलाड़ी गई । अत्र पद्धति बतलाते हैं-वह अध्वर्यु ' - " अतमेरुर्य्यज्ञोऽतमेरुजमानस्य प्रजा भूयात् " ( ११२३ ) यह मन्त्र बोलता हुआ पुरोडाश को साङ्गार भस्म से आच्छादित करता है । पुरोडाश के साथ साथ ही यज्ञ, और यजमान भी आच्छादित न होजाय, इसलिए ' अतमेरु ' इत्यादि रूप से आच्छादित करता है || १७ || श्रभिवासनानन्तर— “ पात्र्यंगुलिप्रक्षालनपात्रेभ्यो निनयत्यभितप्य प्रत्यगसंस्यन्दमानं ' त्रिताय त्वे ' ति प्रतिमन्त्रम् ' ( का ० श्री ० मू ० २५ २६ ) के अनुसार पात्रीनिर्णेजनकर्म्म करने हैं । अंगुलिप्रक्षालित जल को छापा देवता के लिए डालते हैं । सो जिसलिए कि, श्राप्त्यों के निनयन करते हैं, उसकी उपपत्ति ( आगे के ब्राह्मण में ) बतलाने हैं ॥ १८ ॥

प्रथमकाण्डान्तर्गत द्वितीयाध्याय का द्वितीय ब्राह्मण एवं प्रथमप्रपाठक का छठा ब्राह्मण यहाँ उपरत प्रथम- प्रपाठक समाप्त ( भाष्य ) - आहुति के लिए पुरोडाश सम्पादन करता है । तदर्थं कृष्ण मृगचर्म पर प्रतिष्ठित पाषाणमयी हत् ( सिल ) पर उपल ( लोढी ) से हविद्रव्य का पेपण होचुका । साथ ही पिष्ट हवि ' महीनां पयो s सि ' इस श्रनिरुक्त यजुर्मन्त्र से श्रज्यनिर्वाप कर लिया गया है । अत्र आज्ययुक्त इस पिष्टद्रव्य का परिपाक कर इसे पिण्डरूप में परिणत कर आहुति के योग्य बनाना है । प्रकृत ब्राह्मण में इमी विषय का निरूपण है । पिष्टद्रव्य को पिण्डरूप में परिणत करने के लिए ' याज्या ' कम्र्म का अधिष्ठाता वदर्भयुक्त पात्री में पिष्टद्रव्य को प्रतिष्ठित कर ' देवस्य त्वा- ' इत्यादि मन्त्र बोलता हुआ संवापक करता है । १।१।१ ब्राह्मण के अनुसार मनुष्य असत्यसंहित होता हुआ सत्यसंहित ( सत्यानुयायी ) देवताओं से विभिन्नधर्म्मा है । देवप्राण ही देवप्राण के साथ सम्बन्ध कर सकता है । इसी दिव्यभाव की प्राप्ति के लिए अध्वर्यु ' को ' देवस्य त्वा सवितुः ' यह कह कर ही संवापकर्म्म करना पड़ता है । ६६६.

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द्वितीय अध्याय प्रथम कागड द्वितीयाह्मण लोकमदानुसार ' सजातीय ' को ' वन्धु ' कहा जाता है । सजातीय से प्रकृत में ' सगोत्री ' ही अभिप्रेत समझना चाहिए । शुक्र में चान्द्रसोन प्रतिष्ठित रहता है । चन्द्रमा में रेत, श्रद्धा, यश, ये तीन तत्त्वप्रतिष्ठित रहते हैं । शुक्रगत चान्द्र भद्धारस ही सगोत्रियों को अपने सूत्र ( श्रद्धासूत्र ) से बद्ध रखता है । आशौच की प्रतिष्ठा स्वरूप इसी श्रद्धा सूत्र से सगोत्री परस्पर बद्ध रहते हैं । अतः इसी श्रद्धाबन्धन के कारण इहें ' बन्धु ' ( बन्धनात् - बन्धुः ) कहा जाता है । बन्धु श्रद्धा के द्वारा सम्यक् रूप से बन्धनयुक्त रहता है, अतएव इसे ' सम्बन्धी ' भी कहा जाता है । हरिहण करते समय ' देवस्य वा सवितुः ० ' इत्यादि मन्त्र का प्रयोग किया जाता है । वहाँ विस्तार से इस मन्त्र का वैज्ञानिक अर्थ बतला दिया गया है । प्रकृत में उसी मन्त्र से आज अध्वर्यु संवापकर्म्म करता है । वह, श्रीर प्रकृतमन्त्र, दोनों एक दूसरे के क्यु हैं । सम्बन्धी है जो तात्पर्थ उस का था, वही तात्पर्य इस मन्त्र का है । ' यस ' शब्द विप्रकृष्टार्थ का सूचक है । इस प्रकृत यन्त्र का यही हिसकालिक मन्त्र है — यही निष्कर्ष है ॥१ ॥

पिष्ठद्रस्य का पात्री में संवाप करके ( पानी में पिष्टद्रव्य डालकर ) अध्य ' वेदि के मध्यभाग में बैठ जाता है । उधर ग्रागीभ नाम का ऋत्विक् " समाप ओषधीभिः " इत्यादि मन्त्र बोलता हुआ पिटद्रव्य में ' उपसर्जनी ' डालता है । मिन्न भिन्न कम्मों के लिए यज्ञ में भिन्न मित्र पानी नियत रहते हैं । वे प्रोक्षणी मयन्ती-स्रवन्ती - उपसर्जनी इत्यादि भिन्न भिन्न नामों से प्रसिद्ध हैं । वह पानी - जो औषधियां में प्रविष्ट होकर उहें रसयुक्त बनाता है- ' उपसर्जनी ' नाम से प्रसिद्ध है । बिना रसरूप पानी के समन्वय के श्रधियों का परिपाक नहीं होमकता आपको ध्यान रखना चाहिए कि, जब जी की धानी बनाई जाती है, तो पहिले जौ को पानी में भिगो दिया जाता है । यदि मकान बनाते समय पानी का अधिक प्रयोग किया जाता है, तो मकान अधिक दृढ होजाता है | पानी के सम्बन्ध से अग्नि श्रीजिष्ट, चलिष्ठ बनता हुआ उस वस्तु में अधिक दृढ़ता से प्रतिष्ठित हो जाता है । रोटी के परिपाक के लिए पहिले चूर्ण ( चुन ) को पानी से समन्वित करना पड़ता है अग्नि को अन्तम सम्बन्ध से पकड़ने की शक्ति एकमात्र पानी में ही है स्वयं अग्नि भी तो पानी ही है । पृथिवी से सूर्य की ओर जाने वाला पानी हीं ' अग्नि ', किंवा अङ्गिरा कहलाता है, एवं सूर्य से पृथिवी की ओर जाने वाला पानी ही ' पानी ' कहलाता है । अङ्गिरा भी पानी है, भृगु भी पानी है । ' आपो भृग्वङ्गिरो रूपमापो भृग्वङ्गिरोमयम ' यह सिद्धान्त सर्वविदित है । अङ्गिरा की प्रतिष्ठा भृगु है, तो भृगु की श्राश्रयभूमि अङ्गिरा है । यदि किमी पदार्थ में आप ग्रग्नितत्त्व प्रतिष्ठित करना चाहते हैं, तो पहिले वहां आपको पानी का ही सम्बन्ध कराना पड़ेगा । अयस्कार ( लुहार ) लीहलण्ड ( छीणी वगैरह ) में अग्नि प्रतिष्ठित कर उसे दृढ़ करना चाहता है । परन्तु इस दृढ़ता के लिए उसे बार बार उस लोहखण्ड को पानी में डुबोना पड़ता है । उसे अग्नि का प्रवेश कराकर लोहे को तरल बनाना है । इस अग्निप्रवेश के लिए पानी का सम्बन्ध कराना नितान्त अपेक्षित होजाता है । यही अवस्था अध्यात्म-यज्ञ की है । वैश्वानर ( जाठराग्नि - श्रपणाग्नि ) भुक्तान्न का परिपाक करने के लिये तत्रतक सर्वथा असमर्थ है, जपतक की पानी का उसके साथ सम्बन्ध न करा दिया जाय अन्नाहुति के साथ ही पानी की आहुति देना भी परम आवश्यक है । बिना इस के जाठराग्नि अन्न में प्रतिष्ठित नहीं होसकता । दूसरे शब्दों में बिना पानी के जाटराग्नि अन्न के परिपाक में कभी समर्थ नहीं होसकता ।

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द्वितीय अध्याय शतपथब्राह्मण द्वितीयब्राह्मणप्र " अग्निर्वा इतो वृष्टिमुदीरयति मरुतः सुप्रान्नयन्ति " इस श्रौत सिद्धान्त के अनुसार अङ्गिरा-वहाँ जाकर वायु में प्रतिष्ठित होजाता है । अग्नि के द्वारा भूपिण्डस्थ पानी अन्तरिक्ष में चला जाता है । यही ग्रीष्मकाल है । ग्रीष्म ऋतु में भूमण्डल पर पानी का प्रभाव रहता है । कारण यहाँ पार्थिव पानी उपयुक्त सिद्धान्त के अनुसार अन्तरिक्षस्थ वायुधरातल पर प्रतिष्ठित रहता है । अग्नितत्त्व पानी के सम्बन्ध से तीव्र हो जाता है । यही कारण है कि, अन्तरिक्षस्थ वायुगत पानी के सम्बन्ध से ग्रीष्म में सौर रश्मियाँ प्रतिप्रवर बनती हुई ग्रीष्म ऋतु की जननी बन जातीं हैं । स्नानोत्तर शारीराग्नि अधिक प्रज्ज्वलित होजाता है, यह सर्वानुभूत विषय है । इसीलिए अग्नियज्ञ ( दैनिक भोजन ) के सम्बन्ध में - हाथ, पैर, इन्द्रियों आदि के साथ जल के सम्बन्ध कराने का आदेश है । ' प्राणाग्नि ' को प्रज्ज्वलित करने के लिए ही भोजन के आद्यन्त में आचमन का विधान है । भौतिक जगत् में भी आप इस स्थिति का साक्षात्कार कर सकते हैं । एञ्जिन में जबतक पानी नहीं डाला जाता, तबतक तत्रस्थ ग्रग्नि कभी बाष्परूप में परिणत नहीं होसकता । असीम भार का वहन करना अग्नि का सामर्थ्य अवश्य है, परन्तु अग्नि में यह सामर्थ्य पानी से ही आता है । ओषधि – वनस्प— तियों का सौरतेज से, एवं भूगर्भस्थ अग्नि से परिपाक तत्रतक सर्वथा असम्भव है, जत्रतक कि उनके साथ पानी का सम्बन्ध न करा दिया जाय । इसप्रकार उक्त कुछ एक उद्धरणों से यह भलीभाँति सिद्ध होजाता है कि, पानी हीं अग्नि की प्रतिष्ठा है । शरीरबल अग्निसत्ता पर ही प्रतिष्ठित है, यह ठीक है । परन्तु अग्नि की सत्ता पानी पर ही प्रतिष्ठित है, अतएव बलवान को अग्निमान् न कहकर - " पानीदार " ही कहा जाता है । आज अध्वर्यु को पिष्टद्रव्य में परिपाक - क्रिया के द्वारा अग्नि प्रतिष्ठित करना है । बिना पानी के अग्नि प्रतिष्ठित हो नहीं सकता । अतएव श्रपणकर्म से पहिले उपसर्जनी नाम के पानी का पिष्टद्रव्य के साथ सम्बन्ध कराया जाता है । निम्नलिखित मन्त्र से उपयुक्त कर्म किया जाता है— " समाप ओषधीभिः, समोषधयो रसेन । सं रेवतीर्जगतीभिः पृच्यन्ताम् । सम्मधुमती मधुमतीभिः पृच्यन्ताम् । ” - यजुः स ० ११२१ | उपसर्जनी नामके पानी ( पिठुरूप ओषधियों के साथ भलीभाँति मिलें, एवं साथ ही ( पिष्ट ) ओषधियाँ रसरूप उपसर्जनी पानियोंके साथ भलीभाँति संगत हों । रेवतीं नामसे प्रसिद्ध पानी जगती नाम से प्रसिद्ध ओषधियों के साथ सम्यक् प्रकार से एकीभूत हों, मधुमती पानी मधुमती ( मधुररसवती ) ओपधियों के साथ मिलें ” मन्त्रका यही अक्षरार्थ है । पानीको मिलाने की आवश्यकता क्यो हुई?, इसकी उपपत्ति पूर्व में बतलादीं गई । अत्र केवल रस, रेवती, मधुमती, इन शब्दों के अर्थोका विचार करना है | पानी को ओषधियों का " रस " बतलाया जाता है । प्रत्येक वस्तु की स्वरूपस्थिति के लिए रस, और शुक्र, नाम के दो तत्त्व अपेक्षित होते हैं । रस, और शुक्र के समन्वयसे ही पदार्थ का स्वरूप बनता है । रस तरल द्रव्य है, शुक्र घन द्रव्य है । रसतत्त्व सोमप्रधान है, शुक्रतत्त्व अग्निप्रधान है । सौम्य रस योषाप्राणमय है, आग्नेय शुक्र वृषाप्राणमय है । योषावृषात्मक रस - शुक्र के मिथुन से ही विश्व के सम्पूर्ण पदार्थों का स्वरूप बना हुआ है । प्रत्येक वस्तु में आत्मा - पिण्ड, ये दो भाग उपलब्ध होते हैं । श्रात्मा ७७१

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द्वितीय अध्याय प्रथनकाण्ड द्वितीयत्राह्मण पिण्ड का सञ्चालक है, एवं पिण्ड दमा का आयतन है । आत्मभाग रम है, पिण्डभाग शुक्र है । रम भाग तरल होने से ' अवस्था ' नाम से व्यवहृत होता है, पिण्डभाग - ' अस्थिमत् ' कहलाता है । अनस्थिमत ( त्रिना हड्डीबाले ) रसरूप आत्माने अस्थिमत् ( हड्डीवाले शुक्रभाव से सम्पन्न ) पिण्ड को अपने ऊपर प्रतिष्ठित कर रखा है, इसी आधार पर वेदपुरुष कहते है -को ददर्श प्रथमं जायमानमस्थन्वन्तं यदनस्था बिभर्ति । भूम्या असुरसृगात्मा कस्वित्को विद्वासमुपगात्प्रष्टुमेतत् ॥ ऋ ० १।१६४ | ४ | रस ही तत्तत् पदार्थ का आत्मा है, इसी आधार पर - " रसो वै सः " - " गावानु वै र सस्तावानात्मा " ( शतपथ ७ कां ० ) यह कहा जाता है । इसी रस शुक्र को याज्ञिक परिभाषा में " आज्य - पृष्ठ- कहा जाता है । श्राज्य- श्रात्मा है, पृष्ट पिण्ड है । रसरूप आज्य, एवं शुक रूप पृष्ठ से ही वस्तु का स्वरूप निष्पन्न होता है । औषधियों में भी वे ही दो तत्व प्रतिष्ठित हैं । अग्नि इन औषधियों का शुक्र है, पानी ( तद्गत ( सोम ) रस है । यही रस इनका जीवन है । सोमरूर इस जीवनप्रद रसभाग के कारण ही पानी को अमर-कारने जीवन शब्द से व्यवहृत किया है । रससे ओषधियों का आत्मा बनता है, अग्नि से पिण्ड ' बनता है । दूसरे शब्दों में रस इनका श्राज्यभाग है, शुक्राग्नि पृष्ठभाग है । रस के बिना इनका जीवन असम्भव है । इसी विज्ञान को लक्ष्य में रखकर प्रकृत में पानी को ओषधियों का रस ( आत्मा ) कहा है । " आपो हो तासां रसः " का तात्पर्य " आपो ह्य तासामात्मा " यही है । अबतक के भाग्य मन्दर्भों में यत्रतत्र प्रासङ्गिक - रूपेण निर्दिष्टा ब्रह्मविज्ञानसम्बन्धिनी गुह निहिता परिभाषाओं से परिचय प्राप्त करने वाले विज्ञ पाठको को यह भलीभांति विदित होगया होगा कि, ईश्वरशरीर-संस्था के स्वयम्भू - परमेष्ठी मय्य - पृथिवी चन्द्रमा - ये पाँच पर्व हैं । इह्रीं पाँच पर्वों के कारण ' षोडशीपुरुष ' नाम से प्रसिद्ध व्ययेश्वर अश्वत्थमूर्ति की एक शाखामूर्ति, पूर्वोक्क पञ्चपर्वा विश्व पञ्चपुण्डीरा - प्राजापत्य-बल्शा ' नाम से प्रसिद्ध है । साथ ही यह भी सुविदित ही होगा कि, स्वयम्भू प्राणमय है, परमेष्ठी श्रापोमय है, सूर्ख वाङमय है, पृथिवी अन्नादमयी है, एवं चन्द्रमा अन्नमय है । ये पाँचों ही स्वतन्त्र प्रजापति हैं । इन पाँचों में परमेष्ठो - सूर्य - पृथिवी चन्द्रमा- इन चारों समहिम पिण्डों को अपने महिमामण्डल में प्रतिष्ठित रखने वाले यादिप्रजापति स्वयम्भू - ' आभूप्रजापति ' नाम से प्रसिद्ध हैं । एवं शेष चारों इह्रीं के प्रतिमान बनते हुए, ' प्रतिमाप्रजापति ' नाम से ( ब्राह्मणग्रन्थों में ) प्रसिद्ध होरहे हैं | प्रत्येक प्रजापति ' आत्मा, पद- पुनःषद ' भेद से त्रिसंस्थ है । वस्तुकेन्द्र आत्मा है, वस्तुषिड ( जो कि विज्ञानजगत् में स्पृश्यपिण्ड नाम से प्रसिद्ध है ) पढ है । नहीं क्योंकि आत्मा प्रपन्न होता है, अतएव प्रपन्नो भवति आत्मा यत्र ' इस व्युत्पत्ति से इसे ' पढ़ ' कहा जाता है । पिण्ड से बाहिर निकल कर बड़ी दूर पर्यन्त अपना मण्डल बनाने वाला महिमामण्डल ही ' पुनः पद ' कहलाता है । श्रात्मगर्भित बिण्ड अग्नीषोमात्मक है । इससे यह भी सिद्ध होजाता है कि, महिमा, किंवा विभूति - स्वरूप पुनःपत्र में भी ये ही दोनों तत्त्व ( प्राणात्मक ) प्रतिष्ठित हैं । पुन पद की आधारभूमि केन्द्रस्थ वही मनः-६७२

पृष्ठ 409

शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - १-२ - मोतीलाल शास्त्री, पृष्ठ 409 का मूल पृष्ठ
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द्वितीयव्याय शतपथत्राह्मण द्वितीयब्राह्मण प्राणगर्भित वाङमय आत्मा है । हृदयस्थ, अतएव ' अनिरुक्त ' नाम से प्रसिद्ध मनःप्राणवाङमय प्रजापति ही पुन: पद में व्याप्त होता हुआ ' सर्वप्रजापति ' नाम से प्रसिद्ध हो रहा है । हृदय की अपेक्षा से वही अणोरणीयान है, एवं पुनः पद की अपेक्षा से वही महतो महीयान् है । सर्व प्रजापति केवाग् भाग ' से ही पुन: पद ' चपट्कार ' नाम से प्रांसद्ध है । प्रसङ्गागत वषट्कार क । स्वरूप भी जान लेना सामयिक ही होगा । मन ज्ञानशक्तिधन है, प्राण क्रियाशक्तिधन है, एवं वाक्तत्त्व अर्थशक्तिघना हैं, यह पूर्वप्र१.रखों में अनेक बार बतलाया जाचुका है । मनःप्राणवागूरूप ज्ञान - क्रिया- अर्थ की समष्टि ही आत्मप्रजापति है । विश्व के समष्टयात्मक, व्यष्टयात्मक, दोनों प्रकार के पदार्थ ज्ञान - किया- अर्थ -मय हैं । प्रत्यक्षदृष्ट क्षरप्रधान भूतभाग ' अर्थ है । तद्वाचक पद के साथ नित्य सम्बद्ध होने के कारण यह अर्थ –'अर्थ ' शब्द से व्यवहृत न होकर ' पदार्थ ' शब्द से व्यवहृत होता है । प्रत्येक पदार्थ अक्षरप्रधान प्राणभाग से नित्य श्राक्रान्त रहता हुआ क्रियामय है । अवस्था परिवत्तन की आधारभूमिस्वरूपण क्रिया ' जड़ ' ( निरिन्द्रिय पदार्थ ), एवं ' चेतन ' ( सेन्द्रिय पदार्थ ) भेदभिन्न सभी पदार्थों में देखी जाती है । संसार में ऐसा कोई भी पदार्थ नही है, जो किसी न किसी क्रिया से नित्य आक्रान्त न हो । ' न हि कश्चित् क्षणमपि जातु तिष्ठत्यकर्म्मकृत् ' यह प्रतिहत सिद्धान्त है । साथ ही यह भी एक निश्चित सिद्धान्त है कि, बिना ज्ञान के कोई क्रिया नहीं होसकती । क्रियातत्त्व नास्ति - अस्ति नास्ति ( अव्यक्त व्यक्त - अव्यक्त ) मेद से त्रिण होता हुआ क्षणिक है, नास्तिसार है । ऐसी अवस्था में क्षणिक क्रिया की प्रतिष्ठा तबतक सर्वथा असम्भव है, जबतक कि उसका आधार कोई ग्रक्षण निष्क्रिय धरातल न मान लिया जाय । वही निष्क्रिय धरातल अव्यय - प्रधान मनोमूर्ति [ श्वोवसीयस्मनोमूर्ति ] ज्ञानतत्त्व है । इसप्रकार प्रत्येक पदार्थ में ज्ञान ( श्वोवसीयस् नाम से प्रसिद्ध अव्ययमन ), क्रिया ( अक्षरप्राण ), एवं अर्थ ( क्षर प्रधाना वाक् ) की सत्ता सिद्ध होजाती है । एक एक व्यक्ति मनःप्राणवाङ -मय प्रजापति की अभिव्यक्ति है । आत्मप्रजापति की अभिव्यक्ति ही तत्तत् पदार्थ का व्यक्तीभाव है | व्यक्ती-भाव ही ' व्यक्ति ' ( पढ़ार्थ ) की प्रतिष्ठा है । एक एक व्यक्ति ( उपाधिदृष्टया ) एक एक प्रजापति है । इसी प्राजापत्य विज्ञान को लक्ष्य में रखकर श्रुति कहती है— " प्रजापते न त्वदेतान्यन्यो विश्वा जातानि परिताबभूव । यत् कामास्ते जुहुमस्तन्नो वर्ग स्याम पतयो रयीणाम् । प्रजापतिस्त्वेवेदं सर्व यदिदं किञ्च इत्यादि ॥ " प्रजापतिरूप आत्मा केवल साक्षी है । सृष्टि करना अक्षरप्रधान देवताओं का ही कार्य है । इसी आधार पर ' देवेभ्यश्च जगत् सर्व चरं स्थास्वनुपूर्वशः ' ( मनुःस्मृति: ) यह कहा जाता है । सृष्टि के अधि-ष्ठाता देवताओं में से ब्रह्मा, विष्णु, इन्द्र, ( पुराणपरिभाषानुसार शिव ) ही सृष्टि के सञ्चालक हैं । ब्रह्मतत्र ज्ञानप्रधान है, विष्णुतत्त्व अर्थप्रधान है, एवं इन्द्रतत्त्व क्रियाप्रधान है । क्रिया, एवं अर्थ ( भूतसङ्घ ) की प्रतिष्ठा ज्ञान है । जबतक हमारे क्रियार्थमय शरीर में ज्ञान - ( चेतना ) - सत्ता ६७३

पृष्ठ 410

शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - १-२ - मोतीलाल शास्त्री, पृष्ठ 410 का मूल पृष्ठ
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द्वितीय अध्याय प्रथमकाण्ड द्वितीयत्राझगा प्रतिष्ठित रहती है, तभीतक क्रिया ( क ), एवं अर्थ ( भूतसङ्घ ) स्वस्वरूप में सुरक्षित रहते हैं । ज्ञान [ ज्ञानवन चैतन्य - किंवा श्रात्मा ] के उत्क्रान्त होजाने पर शरीरकर्म्म, और सम्पूर्ण भूत विशकलित होजाते हैं । इसी आधार पर ज्ञानघन ब्रह्म के लिए - ' ब्रह्म वै सर्वस्व प्रतिष्ठा ' यह कहा जाता है । इस ब्रह्मकला पर आत्मा के ज्ञानघन मनोभाग का अनुग्रह है । क्रिया गतितत्त्व है । गतितत्त्व माज्ञात् इन्द्र है । वलकृति एकमात्र इन्द्र का ही धर्म्म है । इसी आधार पर - ' या च का च बलकृतिरिन्द्रकम्मैव नत् ' [ या ० निरुक्त ] यह कहा जाता है । सदागतिधर्म्मा वायु इन्द्रतत्त्व से अविनाभूत है । ' यो वै त्रायुः, स इन्द्रः, य इन्द्रः स वायुः ' [ शत ० ४ | १ | ३ | १६ ] के अनुसार दोनों अभिन्न हैं । इसी आधार पर हम इन्द्र को क्रिया का अधिष्टाता मान सकते हैं । पञ्चकोशविद्या के अनुसार पाञ्चभौतिक शरीर वाङमयकोश है । वाक्तत्त्व ही उत्तरोत्तर होने वाली चलग्रन्थियों के कारण क्रमशः आकाश, वायु, तेज, जल, मृत्, इन पांच भूतों में परिणत होरहा है । पञ्चभूतसमष्टि ही वाग्ब्रह्म है । महर्षि तित्तिरिने इसे ही ' अन्नब्रह्म ' माना है । पाञ्चभौतिक शरीर इह्रीं पाँचों भृतों को लेकर जीवित है, स्वस्वरूप में प्रतिष्टित हैं । जौ, गेहूँ, आदि ओषधि वनस्पतियाँ मिट्टी हैं । पानी हमारा अन्न है । पानी ही तो योषधियों का रस है, जैसाकि पूर्व में बतलाया जानुका है । न केवल औषध L अन्न हमें तृप्त कर सकती, न पानी । अपितु दोनों के समन्वय से ही हमारी पूर्ण तृप्ति होती है । इसी विज्ञान की लक्ष्य में रखकर श्रुति कहती है-' तस्मादोपयः केवल्यः खादिता न धिन्वन्ति, ओषधय उ हाषो रसः । तमा-दापः पीता केवल्यो न धिन्वन्ति यदेवोभय्यः संसृष्टा भवन्ति - - अथैव धिन्वन्ति ' । - शन ३२६ | १ | ७ | श्वासप्रश्वास का अधिष्ठाता वायु हमारा अन्न है । इसीप्रकार तेज [ प्रकाश ] भी हमारा अन्न है । याज्ञवल्क्य के कथनानुसार पुरुष ' पञ्च ज्योति ' है । आत्मसत्ता के लिए सूर्य, चन्द्र, अग्नि ( दीपक आदि ), बाकू ( शब्द ) आत्मा, इन पांच ज्योतियों में से किसी एक न एक ज्योति का मिलना परम आवश्यक हैं । दुर्भाग्यवश यदि पाँचों का ही प्रभाव हो जाता है, तो आत्मा तम से आवृत होता हुआ शरीर से उत्क्रान्त होजाता है । आकाशगुणक शब्द भी हमारा अन्न है । निस्तब्ध शून्य प्रदेश में भी मनसनाहट रहती है । ऐसा कोई प्रदेश नहीं, जहाँ ग्रात्मा शब्दात्मक व्याकाशान्न मे रहित होजाय । इसप्रकार पाँचों अन्न हमारे ' वि ' ( श्राहुति ) द्रव्य हैं । जबतक हृदय में विष्णुदेवता प्रतिष्टित रहते हैं, तभीतक अन्नब्रह्म ( अर्थप्रधान-शरीर ) सुरक्षित रहता है । अन्नदान के द्वारा ही ग्रागतिधर्म्मा, दूसरे शब्दों में आदान के अधिष्ठाता विष्णुदेवता पालक कहलाते हैं । अतएव विष्णु की ' हविर्वान ' अन्नकोश ) का देवता माना जाता है । ' वं हि हविर्धानम् ' ( श ० ३१५.१३ / १५ ) यह निगम प्रसिद्ध ही है । इसी आधार पर हम विष्णु को अन्तरूप अर्थशक्ति का अधिष्ठाता मान सकते है । ब्रह्मा, विष्णु, इन्द्र, तीनों देवता क्रमशः मनोमय, अर्थमय, क्रियामय हैं । तीनों का समुच्चय ही एक एक मूर्त्ति ( मूर्त'द्रव्य - पदार्थ ) है । ' एका मूर्त्तिस्त्रयो देवा ब्रह्मविष्णुमहेश्वराः ' यह प्रसिद्ध है । ६५४