Shatpath Brahman 1 2 — पृष्ठ 391–400
शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - १-२ - मोतीलाल शास्त्री · पृष्ठ 391–400
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द्वितीयाध्याय शतपथब्राह्मण प्रथमत्राह्मण और यही है शब्दसृष्टि की मूलाधिष्ठात्री । तथैव स्वायम्भुव - ' स्थिति ' तत्त्व का ( वागात्मक -- ' जू ' तत्त्व का ) पारमेष्ठ्यरूप ही है -- संकोच बर्मा - ' स्नेहभाव ', इसी का नाम है- ' भृगु ', यही है ' आम्भृणी ', और यही है - अर्थसृष्टि की अधिष्ठात्री । तदित्थं उभयसम्पत्तियों से समन्वित, तेज: -- नेह - प्राणात्मक - अङ्गिरा - भृगुमय-इसी पारमेष्ठ्य - ' अप् ' तत्त्व का नाम है -- ' ऐश्वर्य ', जिसके चना विश्व का ऐश्वर्य क्षणमात्र भी प्रतिष्ठित नहीं रह सकता । अप्तत्व की इसी उभयधर्म्मता का विस्पष्ट शब्दों में दिग्दर्शन कराते हुए ऋषि ने
कहा है-पो भृग्वङ्गिरूप, मापो भृग्वङ्गिरोमयम् ।
अन्तत्रयं । वेदा भृगूनङ्गिरसः श्रिताः ॥
– गोपथब्राह्मणे स्वायम्भुव ब्रह्म का तप मनरूवेन ज्ञानमय था, तो पारमेष्ट्य विष्णु का तप प्राणत्त्वेन क्रियामय है, कर्ममय है । भार्गव सोम, आङ्गिरस अग्नि, दोनों के तपोमूलक सम्मिश्रण का नाम हीं ' यज्ञ ' की मौलिक-स्वरूप - परिभाषा है | यह भार्गवाङ्गिरस --तपीरूप यज्ञ क्रियाशक्तिप्रधान ब्रह्माक्षरात्मा से अनुप्राणित है । अतएव यज्ञ, और कर्म्म अभिन्नार्थक मान लिए गए हैं, जैसाकि - ' श्रेष्ठतमाय कर्म्मणे ' ( यजुः १०१ ) के व्याख्या-भूत- ' यज्ञो वै श्रेष्ठतमं कर्म्म ' ( शत ० ) इत्यादि ब्राह्मणवचन से स्पष्ट है । भृग्वङ्गिरोमूर्ति आपोमय परमेष्ठी ही ' विष्णु ' हैं | ये ही भागवाङ्गिरस --यज्ञ के प्रवर्त्तक हैं । अतएव - ' यज्ञो व विष्णुः - ' विष्णुर्वै यज्ञः ' इत्यादि निगम भी निर्विरोध समन्वित हैं । श्री, और लक्ष्मी, दोनों यज्ञमूर्ति इसी विष्णु की पत्नियाँ मानी गई हैं पुराणशास्त्र में | श्री को वक्षस्थलस्थिता बतलाया गया है, एवं लक्ष्मी को अर्द्धांगिनी माना गया है, जैसाकि अमुक महाभारतीय - प्रसङ्ग से स्पष्ट कर दिया है पुराणपुरुष भगवान् व्यास ने ( देखिए महाभारत अनु ० १० ) सरस्वतीवाङमय ( शब्दवाङमय ) आङ्गिरस तत्त्व ही ' श्री ' है, एवं श्रम्भृणी वाङमय ( अर्थवा-ङमय ) भार्गव तत्त्व ही ' लक्ष्मी: है ', जैसाकि पूर्व में स्पष्ट किया जाचुका है । लोकैश्वर्य्यसंसाधक यज्ञात्मक कर्म में क्योंकि प्राकृत विश्व में पारमेष्ठ्य - भार्गवाङ्गिरस तप ही प्रमुख है । यही कारण है कि, प्रकृति के हविर्यज्ञ में - ' श्रथाङ्गारैरभ्यूति - भृगूणामङ्गिरसां तपसा तप्यध्वम् ' इत्यादिरूपेण यज्ञैश्वर्य्यात्मक लोकैश्वर्य्य के संमाधक इस दूसरे वैष्णव- मार्गशङ्गिरस - ' तेजिछतप ' का ही समन्वय हुआ है, जैसाकि उसी सन्दर्भ के ' एतद्वै तेजिष्ठ ' तेज: - यद्भग्वङ्गिरसाम् ' इत्यादि उत्तर वाक्य से स्पष्ट है । अत्र शेष रह जाता है भूः -- चन्द्र - गर्भित सौरमण्डल । तदनुबन्धी तप ही ' माहेश्वरतप ' कहलाया है, जिसका प्रधानरूप से - ' दाहकता ' से ही सम्बन्ध माना गया है । भूतपति, त्रिनेत्र महेश ही रोदसी त्रिलोकी के अधिष्ठाता हैं । ' रुद्र ' ही इनका मूलस्वरूप है, जो कि - ' अग्नित्र रुद्रः ' के अनुसार अग्निप्रधान हैं | अतएव ‘ रोदसी ' को - ‘ रुद्रपत्नी ' माना है शास्त्र ने । ' सोऽरोदीत् तद्रुद्रस्य रुद्रत्वम् ' हीं रुद्र का स्वरूप परिचय है । अपनी प्रचण्डतमा दाहकशक्ति से ये ही विश्व के संहारक हैं । श्रतएव रुद्रात्मक इस सौरतप को अवश्य ही हम -- ' दाहार्थक - तप ' कह सकते हैं । और यही कमप्राप्त तीसर । तपोविवर्त्त है । निष्कर्षतः स्वायम्भुव ब्राह्मतप ' सन्तापार्थक तप ' है, जिसका सुप्रसिद्ध ६ ठे ' तपोलोक ' से सम्बन्व है | पारमेष्ट्य वैष्णत्रतप ही ' ऐश्वर्यार्थिक तप ' है, जो भार्गवाङ्गिरस तप है । एवं सौर - रौद्रतप ही-
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द्वितीयश्श्रध्याय प्रथमकाण्ड प्रथमत्राह्मण ' दाहाथक त ' है, जो अग्निप्रधान तप है । इसप्रकार तीन चिश्वसंस्थानों के अनुबन्ध से तपोभाव क्रमशः त्रिसंस्थ बन जाता है, जिसके ब्रह्मा विष्णु महेश, तीन विश्व देवता मूलप्रवत्त के अने हुए हैं । तीनों विश्व-देवता आत्मब्रह्म के - अमृत - ब्रह्म - शुक्र- नामक तीन विवत्तों से क्रमश: अनुप्राणित हैं, जो कि तीनों आत्म-विवस ' मनः- प्रारण वाक् प्राधान्य से ज्ञान - क्रिया- अर्थ - शक्तिमय बने हुए हैं । अतएव सन्तापात्मक ब्राह्मत को ज्ञानात्मक तप कहा जायगा, ऐश्वय्यत्मिक वैश्यायतप को कम्र्मात्मक तप माना जाएगा, एवं दाहात्मक तप को रौद्रतप माना जायगा । तीनों हीं तपों का अथर्ववेद के सुप्रसिद्ध काल में सर्वथा पृथक-त्वेनैव स्वरूप - दिग्दर्शन हुआ है । कालसूक्त में काल से तीन स्थानों पर तप का आविर्भाव बतलाया गया है कालनिवत्तों से अवश्य ही तीनों का स्वरूप पृथक पृथक ही होना चाहिए अन्यथा मन्त्रद्रष्टा ऋषि एक ही काल में विभिन्नरूपेण कदापि तीन बार ' तप ' का उल्लेख न करते ' काले तपः काले ज्येष्ठ-वाले ब्रह्म - समाहितम् ' मन्त्र का ' तप ' शब्द सन्तापार्थक स्वायम्भुव ब्राह्मतप का ही संग्राहक बन रहा है । उभी सूक्त के ' करवपः कालात तपः कालादजायत ' मन्त्र का ' तयः ' शब्द दाहार्थक सीर रौद्रताप का ही संग्रह कर रहा है । एवं ' कालादापः समभवन - कालात् तपो दिशः ' मन्त्र का ' तप ' शब्द ऐश्वर्थक परमेष्ट्य- वैष्णव तप का ही संग्राहक बन रहा हैं । तीनों तपों से अनुप्राणित समाहितम् समभवत्- आजा-यत तीन विभिन्न विवाद भी तीनों के पार्थक्य की ओर ही सङ्केत कर रहे हैं । वातप ज्ञानमय बनता हुआ शाश्वत सनातन - तप है । अतएव उसके लिए ' काले समाहितम् ' कहना हीं अन्यर्थ है । वैष्णव तप ऐश्वर्य्यात्मिका सम्भूति का प्रवर्तक है । अतएव तत्सम्बन्ध में - ' कालान्- तपः समभवत् ' कहना हीं अन्वर्थ है तीसरा रौद्रत अपनी उत्पन्न विनाश शालिनी मीतिकता से क्योंकि परिवर्तनशील है । अतएव इसके लिए ' तपः काल बजायत ' कहना ही समीचीन है । मानवीय अध्यात्मसंस्था का शरीर ही इसका विश्व है, जिसके कारण सूक्ष्म स्थूल - भेद से अधि-दैवतवत् विवर्त्त । तत् तीनही प्रमुख विवस है कारगाशरीर का ही नाम विज्ञानबुद्धि है, सूक्ष्मशरीर का ही नाम प्रज्ञानमन है, एवं स्थूलशरीर का ही नाम भौतिकशरीर है । तीनों क्रमशः ब्राह्म - वैष्णव- रौद्र हैं । रुद्राग्नि को चितिमूला सञ्चिति से ही पञ्चचिकि भौतिक शरीर का स्वरूप निर्माण हुआ है । ( देखिए शत ० ७ | १ | १ | १–५ पर्य्यन्त ) | ' शान्तरुद्रिय ' नामक सुप्रसिद्ध ' शतरुद्रियान्न ' से ही भूतशरीरानुगत रुद्रताप की उपशान्ताना है तिने तत्रैव I फलतः भौतिक - स्थूलशरीर का रुद्रतपोभावत्व सर्वात्मना संसिद्ध होजाता है ।दूसरा सौम्य मनस्तन्त्र प्रत्यक्ष में हीं अपने सोमात्मक पारमेष्ट्य- धर्मानुबन्ध से पारमेष्ठ्य वैष्णवतप का प्रतिरूप प्रमाणित होरहा है । तीसरा विज्ञानबुद्धिरूप कारणशरीर अपने ज्ञानभाव से ब्राह्मतप का प्रतिरूप पना हुआ है । और यो मानव के शरीरत्रयात्मक बुद्धि मनः शरीर नामक तीनों विश्वतन्त्र अधिदैवत-संस्था के तीनों तपोभावों से क्रमशः समन्वित होरहे हैं । प्राकृतिक - श्राधिदैविक संघर्षात्मक तीनों हीं तपों का प्राथमिक परिणाम ' तत्त्व ' ही माना गया है । ब्राह्मतप से उत्पन्न ' आग ' ही ' स्वेद ' नामक पारमेष्ठय - ऋत अथवरूप सुवेद है, जिसका शीर्ष-७ - विस्तार के लिए देखिए दिग्देशकालस्वरूपमीमांसा ' नामक सहस्रपृष्टात्मक स्वतन्त्र-निबन्ध ६५६
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द्वितीय अध्याय शतपथब्राह्मण प्रथमब्राह्मण स्थानीय स्वायभुव ललाट से ही सर्वप्रथम उपक्रम होता है । वैष्णवतप से उत्पन्न ' आप ' ही श्रद्धा नामक वह ' अम्भः ' तत्त्व है, जिसे परमभाग्यशाली भारतराष्ट्र गाङ्गेय तोयात्मिका- ' ब्रह्मदची ' के रूप में उपलब्ध कर रहा है । एवं तीसरे सौर - रौद्रतप से उत्पन्न श्रापः ही ' मरीचि ' नाम से सुप्रसिद्ध है, जिस का मूर्तरूप भारतराष्ट्र को ' यामुनेय ' ( यमुनाजल ) के रूप में उपलब्ध होरहा है । गाङ्ग ेयतोय ( गङ्गाजल ) पारमेष्ठ्य पवित्र सोम के सम्बन्ध से जहाँ शीतप्रकृतिक है, वहां यामुनेयतोय ( यमुनाजल ) सौर मरीचि के सम्बन्ध से अग्निप्रकृतिक ही माना गया है । अधिदैवत- स्थिति के अनुसार ही मानव की अध्यात्मसंस्था में भी बौद्धिक - मानसिक - शारीरिक तापरूप ब्राह्म- वैष्णव- रौद्र - तापों से त्रिविध अपतत्त्व अभिव्यक्त होता है, जिस तत्त्व का ' अश्रु--संक्षरितमासीत् ' श्रुति के अनुसार एक साङ्केतिक नाम है- ' अश्रु ' । ब्राह्म तपोरूप - ज्ञानप्रधान - बौद्धिक तप ही - ' परिश्रम ' कहलाया है । इस से होने वाले संघर्ष से उत्पन्न ' अश्रु ' ही ' परिश्रमाश्रु ' कहलाएँ हैं, जो प्रकृतिवत् सर्वप्रथम मानव के ललाट प्रदेश में हीं ' स्वेदकण ' रूप से अभिव्यक्त होते हैं । परिणाम है इन अ का शान्तानन्द की प्राप्ति ( देखिए गोपथ - पू ० १ | १ | १ | ) | वैष्णव तपोरूप- कर्म्मप्रधान - श्रद्धा-वात्सल्य - स्नेहादि - वृत्तिसमन्वित मानसिक तप ही - ' श्रम ' कहलाया है । इस से उत्पन्न संघर्ष से सर्वप्रथम मानव के चक्षुर्द्वार से ही अप्तत्त्व विनिर्गत होता है, जिन का नाम है - ' प्रेमाश्रु ', जो कि सुखकर, तथा ऐश्वर्य्य के प्रवर्तक माने गए हैं । तीसरे सौर- रौद्र- तपोरूप - भूतप्रधान - शारीरिक तपः संघर्ष से उत्पन्न दाहक तत्व का नाम है - ' सेवा ', जिस के सामान्यवेग से तो सर्वाङ्गशरीर से ही स्वेद निकलते हैं । किन्तु यही यदि प्रच-एडरूप में परिणत होजाता है, तो यही ' शोकाश्र रूप में परिणत होता हुआ चक्षुर्द्वार से निकल पड़ता है सम्पूर्ण शरीर को दग्ध ही करता हुआ । प्रेमाश्रु का संवरण जहाँ स्वास्थ्यप्रद माना गया है, वहाँ शोकाश्रु, का संवरण स्तम्भन - अत्यन्त ही हानिकर माना गया । इस वेग का तो बहिर्विनिर्गत होजाना हीं श्रेयः-पन्था है । यह है ' तपः ' शब्द की त्रिधा व्याप्ति के चिरन्तन - इतिवृत्त का संक्षिप्त स्वरूप - निदर्शन, जिसे आधार बना कर ही मानव को, विशेषतः भारतीय- मानव की, तत्रापि श्रुति स्मृति - पुराण निष्ठ - सांस्कृतिक- मानव को तीनों तपोभावों के समन्वय से ही अपना ' तपः ' कर्म्म व्यवस्थित करना चाहिए, जो कि समन्वयात्मिका यह - तपो व्यवस्था साम्प्रदायिकों के काल्पनिक - तपोभाव से, साधु - सन्तों के कायक्लेशात्मक प्रदर्शनात्मक तपोमय आण्डम्बरों से, और प्रकान्त युग के काल्पनिक त्याग - तपस्या बलिदानों के भावुकतापूर्ण विजृम्भणों में आपाट-मस्तक निमज्जित - भावुक - देशाभिमानियों ( प्रतिमानियों ) के सेवात्मक तपोभावों से, एवमेव अन्यान्य भी ज्ञात - अज्ञात अनेक कारणों से सर्वथैव अन्तर्मुखा बन गई है । जिसे आज तपस्या, त्याग और बलिदान कहा आरहा है, उम का तो दाहात्मक भौतिक ताप - मात्र से ही सम्बन्ध है, जिस का एकमात्र फल माना गया है-' शोकाश्रु ' । रुद्र - भावापन्न इस केवल भौतिक - तप से तो - ' सोऽरोदीत ' के अतिरिक्त अन्य कोई भी परिणाम नहीं निकला करता तबतक, जबतक कि इस भौतिक तप के मूल में हम भृग्वङ्गिरोमूलक - पारमेष्ठ्य तप प्रति--ष्टित नहीं कर लेते । क्योंकि यही पारमेष्ठ्य तप ऐश्वर्य का, तन्मूला श्रीः, और लक्ष्मीः का संसाधक माना गया है, जिसे विस्मृत कर, किंवा उपेक्षित कर, और आज की भाषा में निरपेक्ष मान कर हमने भारतराष्ट्र के ऐश्वर्य्य को सर्बथा ही पराङमुख कर लिया है । इस भार्गवाङ्गिरस- ऐश्वर्य्यसंसाधक- पारमेष्ठ्य - तप का अनु-६५७
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द्वितीयाध्याय प्रथम काण्ड प्रथमत्राह्मण ग्रह तभी सम्भावित है, जब कि इस वैष्णवतप के मूल में हम ज्ञानमय- ब्राह्मतप प्रतिष्ठित करलें । वही वास्तविक तप है । अतएव भारतराष्ट्र की राष्ट्रीय कामनाओं का स्वरूप - दिग्दर्शन कराते हुए ऋषि ने— ‘ श्र । ब्रह्मन! ब्राह्मणो ब्रह्मवर्चसी जायताम् ' इत्यादि रूप से सर्वप्रथम प्रजापति से इस राष्ट्र के ज्ञानगोत्ता ब्राह्मण के लिए ब्रह्मव चौरूप ज्ञानमय ब्राह्मतप ही याचा अभिव्यक्त की है, इत्यलमतिपल्ल विलेन ' तपः ' -शब्द स्वरूप दिग्दर्शनेन । तालिकारूपेण हमें तपः शब्द के तथोक्त चिरन्तन इतिवृत्त का मनन - निदिध्यासन करना चाहिए । एवं तन्माध्यम से ब्राह्मतप के आधार पर, माहेश्वरतप के द्वारा मार्गवाङ्गिरस तप को ही अपना लक्ष्य बनाना चाहिए, जैसाकि श्रुति के इस उदात्त उदघोष से स्पष्ट है कि— ' भृगूणामङ्गिरसां तपसा तप्यध्वम् ' ॥ १३ ॥
१- स्वायुम्भव - ब्राह्मतप— अमृताव्ययानुगत- मनोऽनुगत - ज्ञानमय - तप २- पारमेष्ठ्य-- वैष्णवतप - ब्रह्माक्षरानुगत - प्राणानुगत - क्रियामय- तप ३ - सौर- रौद्रतप शुक्रक्षरानुगत — वागनुगत -- र्थमय - तप १ -- बौद्धिक तप – परिश्रमात्मक - ( परिश्रमाश्रु से समन्वित ) — सन्तापात्मक- तप २- मानसिक तप - श्रमात्मक --- ( प्र मान से समन्वित ) - ऐश्वर्य्यात्मक- तप ३ - शारीरिक तप-- सेवात्मक - - ( शोकाश्रु से समन्वित ) – दाहात्मक- तप इति तपःस्वरूप दिगदर्शनम ' ईशात्रास्यमिदं सर्वम् ' - ' ब्रह्म वेदं सर्वम् ' इत्यादि श्रौत वाक्यों के अनुसार विश्व के यच्चयावत् पदार्थ ब्रह्मसत्ता से आक्रान्त हैं । ब्रह्मतत्त्व ' नित्यं विज्ञानमानन्दं ब्रह्म ' के नित्यत्रि-अनुसार ज्ञानघन है, आनन्दमय है । ऐसी अवस्था में नित्य - विज्ञान - श्रानन्दमूर्ति ब्रह्ममय पदार्थों को परमार्थ-दृष्टि से कभी ' चेतन ' नहीं बतलाया जामकता । साधारणदृष्टि से व्यबहार - मर्य्यादा के निर्वाह के लिए यद्यपि जड़ - चेतन व्यवहार ठीक है । परन्तु परमार्थदृष्टि से विज्ञानकोटि में यह भेद निरर्थक ही सिद्ध होजाता है । वैज्ञानिक महर्षि प्रत्येक पदार्थ को अव्यय के श्वोवसीयस्मन से ज्ञानयुक्त, अव्यय के प्राणतत्त्व से क्रियायुक्त, एवं अव्यय के वाक्तत्व से अर्थयुक्त देखते हैं । प्रत्येक पदार्थ ' अर्थ ' है । उस में अर्थाधार-भूता ' क्रिया ' है । क्रिया में अन्तःस्थूत क्रियाधार ' ज्ञान ' है । प्रत्येक पदार्थ क्रियामय है, यह सिद्धान्त निर्विवाद है । उधर क्रिया विना ज्ञान के सम्भव नहीं, यह सिद्धान्त भी स्वत: सिद्ध है । सुतरां पदार्थमात्र का ' चेतनत्त्व ' सिद्ध होजाता है । इसी नित्यसिद्ध चैतन्यबाद को लक्ष्य में रख कर ऋषि ने दृषत्, और ६५८
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द्वितीयाध्याय शतपथब्राह्मण प्रथमब्राह्मण कृष्णमृगचर्म्म को ' चेतन ' मानते हुए ' तत् संज्ञामेवैतद् वदति - नेदन्योऽन्यं हिनसातै ' ये अक्षर कहे हैं । दृषत् पात्राणमयी है | पाषाण उपर्युक्त घन - तरल - विरलावस्था - विज्ञान के अनुसार ध्रुवकोटि में प्रविष्ट होता हुआ निदान के द्वारा पृथिवी है । उधर कृष्णमृगचर्म्म पृथिवी की त्वचा है, जैसाकि कृष्णमृगचम्म-स्तरण - प्रकरण में विस्तार से बतलाया जाचुका है । दृषत् पर उपल के द्वारा त्रक्रिया के होने से कृष्ण-मृग् चर्म पर आघात होना स्वाभाविक है । क्योंकि हत् चर्म पर ही प्रतिष्ठित रहती है । इस श्राघात से चम में क्षोभभाव उत्पन्न होता है । चोभ हिंसामूलक है । हिंसामूलक क्षोभ यज्ञ का विघातक है । इस अनिष्ट को दूर करने के लिए ही " अदित्यास्त्वग् वेत्त " कहा है । सजातीय वस्तुओं के संघर्ष से उत्पन्न होने वाला क्षोभ हिंसा का कारण नहीं बनता । एक ही प्रासाद में १० सजातीय बन्धु कष्ट पाकर भी रहजाते हैं । सुविधा रहने पर भी खटपट नहीं होती । परन्तु विजातीय अन्य एक व्यक्ति के प्रविष्ट होने से असुविधा का अनुभव होने लगता है । कृष्णमृगचम्भं, और दृघत् सजातीय हैं, इस मनोभाव को दृढ़ करने के लिए ही पूर्वोक्त वाक्य कहा गया है ॥१४, १५ ॥ दृपत् के पश्चिमभाग में शम्या रक्खी जाती है । पूर्वादिक देवताओं का स्थान है । इसीलिए वेदि प्राक् प्रवरणा ( पूर्व की ओर झुकी हुई ) बनाई जाती है । इसी दिव्यभाव की प्राप्ति के लिए शम्या को पश्चिमभाग में दृषत् के नीचे रकवा जाता है । शम्या निदान के द्वारा अन्तरिक्ष है । अन्तरिक्ष ने हीं द्यावा-पृथिवी के स्वरूप को विभक्त कर प्रतिष्ठित कर रक्खा है । आगे उपल को द्युलोक की प्रतिकृति बतलाने वाले हैं । द्यलं करूपा उपल की शम्या सचमुच ' स्कम्भनी ' है । यदि शम्या स्वस्थान से स्खलित हो जाय, तो उपल कभी प्रतिष्ठत नहीं रहमकती । इसी अभिप्राय से ' दिवस्कम्भनीरसि ' यह कहा है || १६ || द्यावापृथिवी एक प्रकार की चक्की है । वायुः सञ्चार चक्की में होने वाला पेरण - व्यापार है । पृथिवी के ऊपर द्य के द्वारा वायु के समावेश से अनपेषण होता रहता है । पिष्ट अन्नरस प्राणीवर्ग का पालन किया करता है । इसी आधिदैविक स्थिति को लक्ष्य में रखकर इस के साथ तुलना करते हुए याज्ञवल्क्यने दृषत् को पृथिवी माता कहा है । शम्या को वायुस्थानीय होने से अन्तरिक्ष कहा है । एवं उपल को रूप बतलाया है । इस समानता से त्रैलोक्यात्मक मम्वत्सरयज्ञ की सम्पत्ति आ जाती है । ' पुरुषो वै यज्ञः ' के अनुसार हमारा यह वैधयज्ञ पुरुषलक्षण है । अतः आधिदैविक यज्ञवत् इस में पुरुषयज्ञ के ( आध्यात्मिक यज्ञ के ) भावों का भी समाविष्ट होना आवश्यक है । पुरुषयज्ञानुसार हबदुपल इस यज्ञपुरुष के दोनों हुन् हैं । शम्या जिह्वा है । पुरुषयज्ञ में जिह्वा शब्दकर्म्म करती है, अतएव तत्प्रतिकृतिभूता शम्या से यहाँ ' समाहननकर्म्म ' किया जाता है । इसी पुरुषसम्पत्ति का निरूपण करते हुए भगवान् याज्ञवल्क्य कहते हैं - ' हनुऽएव दृपदुपले ।
जिह्वै व शम्या । तस्माच्छम्यया समाहन्ति । जिह्वया हि बढ़ति ॥ १७ । १८ ॥
बिना हिंसा के यज्ञ तिकर्त्तव्यता कथर्माप पूरी नहीं की जासकती । ऐसा कोई भी यज्ञ नहीं है, जिस में हिंसा न होती हो । प्रागावियोग ही हिंसा है । सर्वसाधारण की दृष्टि में जड़, चेतन में भेद है । परन्तु वैज्ञानिक महर्षि सब को चेतना से युक्त मानते हैं, जैसा कि पूर्व में बतलाया जाचुका है । पुरोडाश सम्पन्न करने के लिए जिस धान्य का ग्रहण किया जाता है, वह एक प्राणयुक्त द्रव्य है । मनुष्य की सत्ता के लिए जो प्राण नित्य अपेक्षित हैं, वे सत्र प्राण यहाँ प्रतिष्टित हैं । उत्पन्न होने वाले पदार्थमात्र में त्रैलोक्य के प्राण विद्यमान ६५६
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द्वितीय अध्याय प्रथमकाण्ड प्रथम ब्राह्मगा रहते हैं । पृथिवी - अन्तरिक्ष- द्य - तीनों के रस के सम्मिश्रण से प्रत्येक पदार्थ उत्पन्न हुआ है । एवं जबतक तत्तत्पदार्थों के साथ उपर्युक्त दीनों प्राणों का आदान- विसर्गात्मक सम्बन्ध होता रहता है, तभीतक तत्तत्-पदार्थं स्वस्वरूप में प्रतिष्ठित रहते हैं । पार्थिवप्राण अपान है । अन्तरिक्ष्य प्राण व्यान है । दिव्य प्राण प्रारण शब्द से ही प्रसिद्ध है । द्युलोक से आता हुआ प्राण प्राण है, यही निर्गच्छत् अवस्था में ‘ उदान ' नाम से व्यबहृत होने लगता है । पार्थिब प्राण आगमनावस्था में ' समान ' कहलाता है, बही निर्गमनावस्था में ' अपान ' कहलाने लगता है । इसप्रकार अपान और प्राण के अपान समान, प्राण उदान, ये विवर्त्त निष्पन्न होजाते हैं । मध्यस्थ प्रादेशमित व्यानप्रारण सर्वथा स्थिर है । पार्थिव प्राणदेवता, एवं सौर प्राणदेवता इसी व्यानसत्ता पर अवलम्बित हैं । व्यानरूप उपांशुसवन ( शिन्ना ) पर उपांशुरूप प्राण-तथा अन्तर्य्यामरूप अपान दोनों में जीवनोपयिक उपाश्वन्तर्य्यामव्यापार हुआ करता है । प्राणापान जीवनसत्ता के कारण नहीं हैं, अपितु - जिस स्थिर व्यान के आधार पर प्राणापान गमनागमन करते हैं, वह व्यान हीं जीवन सत्ता का कारण है । इसी व्यान - विज्ञान को लक्ष्य में रख कर ऋषि कहते हैं-न प्राणेन नापानेन मर्त्यो जीवति कश्चन ॥ इतरेण तु जीवन्ति यस्मिन्नेता बुपाश्रितौ ॥१ ॥
ऊर्ध्व प्राणमन्नयति अपानं प्रत्यगस्यति ॥ मध्ये वामनमासीनं सर्वे देवा उपासते ॥ २ ॥
- उपनिषदि उक्त कथन से सिद्ध हुआ कि, पञ्चप्राण ही जीवनसत्ता के आधार हैं । पेवणव्यापार से पांचों प्राण निकल जाते हैं । हवि निर्जीव होजाता है । उधर देवता प्राणरूप हैं । प्रारूप अन्नाददेवता निष्प्राण अन्न कभी नहीं ले सकते । सजातीय अन्न ही उन के लिए ग्राह्य है । निर्जीव हवि में उमी पञ्चप्राणात्मक प्राणतत्त्व के समावेश के लिए ' प्राणाय त्वा ' इत्यादि मन्त्र - प्रयोग किया जाता है, जैसा कि मूल में स्पष्ट होगया है || १६ | २० | २१ | २२ || इति-- द्वितीयाध्याये - प्रथमं -- ब्राह्मणम् इति प्रथम प्रथम पञ्चमं ब्राह्मणम् इति उपवेषसंपादनम अग्नौ कपालोपधानेन हविः परिपाकञ्च १० ६६०
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द्वितीय अध्याय शतपथब्राह्मण द्वितीयब्राह्मण अथ प्रथमकाण्डं द्वितीयाध्याये द्वितीयं ब्राह्मणम् प्रथम पाठके च पष्ठं ब्राह्मणम् ११ - पिष्टंनोदकमिश्रितेन पुरोडासम्पादनम् ( मूल ) – पवित्रवति संपति, पात्रयां पवित्रे ऽवधाय - " देवस्य त्वा सवितुः
प्रसवेऽश्विनोर्बाहुभ्यां पूष्णो हस्ताभ्यां संव्वपामि " - [ १ ० २१ मं ० ] इति ।
सोऽसावेवैतस्य यजुषो बन्धुः ॥ १ ॥
अथान्तर्वेद्य पविशति 1 । अथैक उपसर्जनी भिरैति । ता आनयति । ताः पवित्राभ्यां प्रतिगृति- " समाप प्रोषधीभिः - ( १ ० २१ मं ० ) इति । सं ह्येतदाप प्रोष-विभिताभिः पिष्टाभिः सङ्गच्छन्ते । " समोषधयो रसेन " - - ( १ ० १६ मं ० ) इति । सं ह्येतदोषधयो रसेनैताः पिष्टा अद्भिः संगच्छन्ते । श्रापो तासां रसः । “ म ँ रेबनीजंगतीभिः पृच्यन्ताम् " - १ ० २१ मं ० ) इति । रेवत्य आप:, जगत्य श्रोषधयः, ता उ ह्येतदुभय्यः सम्पृच्यन्ते । “ से मधुमतीमधुमतीभिः पृच्यन्ताम् ” -( १ ० २१ मं ० ) इति । सं रसवत्यो रसवतीभिः पृच्यन्तामित्येवैतदाह || २ || अथ संयोति - “ जनयत्यै त्वा संयौमि " ( १ ० २१ मं ० ) इति । यथा
श्रियेऽन्नाद्यायेमाः प्रजा यजमानाय यच्छेत् एवं तद् संयोति । अधिवन्नु वै संयौति ।
यथा वा अधिवृक्तोऽग्नरिधिजायेत, एवं वै तत् संयोति ॥ ३ ॥
अथ द्वैधा करोति- यदि े द्व हविषी भवतः । पौर्णमास्यां वें द्वो हविषी भवतः । स यत्र पुनर्न संहरिष्यन्यात् । तदभिमृशति - " इदमने रिदमनीषोमयोः " - ( १ अॅ०-२१ मं ० ) इति । नाना वा एतदग्रे हविगृह्णन्ति । तव सहावध्नन्ति । तत् सह पिंषन्ति । तत् पुनर्नाना करोति । तस्मादेवमभिमृशति -- अधिवृणक्त्येवैष पुरोडाशम् " अधिश्रयत्य-सावाज्यम् ॥४ ॥
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द्वितीय अध्याय प्रथमकाण्ड द्वितीयब्राह्मण तद्वा एतदुभयं सह क्रियते । तद्यदेतदुभयं सह क्रियते । श्रद्ध ह वा एष आत्मनो यज्ञस्य यदाज्यम् । अर्द्धा यदिह हविर्भवति । स यश्वासाबद्ध य उ चायमर्द्ध:, ता उभावनिं गमयावेति । तस्माद्वा एतदुभयं सह क्रियते । एवमु हैष आत्मा यज्ञस्य सन्धीयते ॥ ५ ॥
सोऽसावाज्यमधिश्रयति- “ इषे त्वा " - ( १ ० २२ मं ० ) इति । वृष्टयै तदाह-यदाह ' इषे त्वेति ' | तत् - पुनरुद्वासयति । ' उर्जे त्वेति ' । यो दृष्टादुर्ग रसो जायते, तस्मै तदाह || ६ || अथ पुरोडाशमधिवृणक्ति- " धम्र्मोऽमि " - ( १ ० २२ मं ) इति । यज्ञमे चैतत् करोति । यथा धर्म्म प्रवृञ्ज्यात् एवं प्रवृणक्ति । “ विश्वायुः " - [ १ ० २२ मं ० ] इति । तदायुर्दधाति ॥ ७ ॥।
तं प्रथयति-- " उरुप्रथा · उरुप्रथस्व " - [ १ ० २२ मं ० ] इति । प्रथयत्येवैन-मेतत् । " उरु ते बज्ञपतिः प्रथताम् - [ १ ० २२ मं ० ] इति । यजमानो वै यज्ञ-पतिः । तद्यजमानायैवेतदा शिपमाशास्ते || ८ || तं न सत्रा पृथु ं कुर्यात् । मानुषं ह कुर्यात् यत् पृथु ं कुर्यात् । व्यृद्ध ं वै तद् यज्ञस्य-यन्मानुषम् | नेद् व्यृद्ध ं यज्ञे करवाणीति, तस्मान्न सत्रा पृथु कुर्यात् ॥६ ॥
अश्वशफमात्र ं कुर्यादित्यु हैक आहुः । कस्तद्वेद यावानश्वशकः । यावन्तमेव स्वयं मनसा न सत्रा पृथु ' मन्येत एवं कुर्यात् ॥ १० ॥
तमद्भिरभिमृशति सकृद्वा त्रिर्वा । तद्यदेवास्यात्रावघ्नन्तो वा पिषन्तो वा दवांन्त
वा विवा बृहन्ति, शान्तिरापः, तदद्भिः शान्त्या शमयति । तदद्भिः सन्दधाति ।
तस्मादद्भिरभिमृशति ॥११ ॥
सोऽभिमृशति - " अग्निष्टे त्वचं मा हिसीत् " - [ १ २२ मं ० ] इति ।
अग्निना वा एनमेतदभितप्स्यन् भवति । एष ते त्वचं मा हिंसीदित्येवैतदाह ॥ १२ ॥
तं पर्यग्निं करोति । अच्छिद्र मे वै न मे तदग्निना परिगृह्णाति -नेदेनं नाष्ट्रा रक्षांसि प्रमृ-शानिति । निहिं रक्षसामपहन्ता - तस्मात् पर्यग्निं करोति ॥१३ ॥
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द्वितीय अध्याय शतपथब्राह्मण द्वितीयत्राह्मण तं श्रपयति-- ' " देवस्त्वा सविता श्रपयतु " - [ १ श्र ० २२ मं ० ] इति । न वा एतस्य मनुष्यः श्रपयिता । देवो ह्यः, तदेनं देव एव सविता श्रपयति । " वर्षिष्ठेऽधि-नाके " -- [ १ अ ० २२ मं ० ] इति । देवत्रो एतदाह यदाह वर्षिष्ठे ऽधिनाक इति ।
तमभिमृशति -- शृतं वेदानीति । तस्माद्वा - अभिमृशति ॥ १४ ॥
सोऽभिमृशति -- ‘ “ मा भेर्मा संविक्थाः - ( १ ० २३ मं ० ) इति । मा त्वं भैषी-मसंविक्थाः यत्त्वाहममानुषं सन्तं मानुषोऽभिमृशामीत्येवैतदाह ॥ १५ ॥
यदा श्रुतः, अथाभिवासयति -- नेदेनमुपरिष्टान्नाष्ट्रा रक्षांस्यवपश्यानिति 1 । नेद्वे व नग्न इत्र मुषित इव शयाता इत्यु चैव तस्माद्वा अभिवासयति ॥१६ ॥
सोऽभिवासयति -- " तमेरुर्यज्ञो ऽतमेरुयजमानस्य प्रजा भूयात् " - ( १ अ ०
२३ मं ० ) इति । नेदेतदनु यज्ञो वा यजमानो वा ताम्याद्यदिदमभिवासयामीति ।
तस्मादेवमभिवासयति ॥१७ ॥
अथ पात्रीनिर्णेजनमङ्ग लिप्रणेजनमाप्त्येभ्यो निनयति । तद्द्यदाप्त्येभ्येा निन– यति ॥ १८ ॥
इति - प्रथमकाण्डे द्वितीयाध्याये द्वितीयं ब्राह्मणम् प्रथमप्रपाठके च षष्ठं ब्राह्मणम् समाप्तश्चात्र प्रथमः प्रपाठक ( अनुवाद ) - आज्यनिर्वाप के अनन्तर अध्वर्यु -- " पाध्यां सपवित्रायां पिष्टान्यावपति " देवस्य त्वे " ति ' ' ( का ० ० सू ० २ ५ १० ) के अनुसार प्रोक्षणीपात्र में से पवित्र ( दर्भ ) लेकर उसे इडापात्री में उद्गाय रखकर उसके ऊपर - " देवस्य त्वा सवितुः प्रसवे ऽश्विनोर्वा -हुभ्यां पूष्णो हस्तभ्या संवपामि " यह मन्त्र बोलता हुआ कृष्णमृगचर्म्म पर स्थित पिष्ट पुरो-SIT को कृष्ण मृगचर्म से ही डालता है । ( उपयुक्त ) मन्त्र का वही बन्धु ( तात्पर्य्य ) है, जो कि पूर्व में आए हुए " देवस्य त्वा " इत्यादि मन्त्रव्याख्यान में बतलाया जाचुका है || १ || ६६३
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द्वितीय अध्याय प्रथमकाण्ड द्वितीयब्राह्मण वा " ( का ० श्र ० पुरोडाश - संवापानन्तर अर्ध्या- ' श्रवणस्य पश्चादुपविशत्यन्तर्णेदि के पश्चिम भाग पात्री को लेकर * श्रपणाग्नि लू ० २।५।११ ) के अनुसार पवित्रयुक्ता ( दुर्भयुक्त से संलग्न ) होकर सपवित्रपात्री को वैदि के मध्य में में बैठता है । अथवा वेढ़ि के पश्चिमभाग है । प्रतिष्ठित कर वहीं बैठ जाता ० २।५।१२ ) के अनुसार अध्य अनन्तर— - ' उपसर्जनीरानयत्यन्यः ' ( का ० श्र ० सू पानी को ठंढा कर x नाम से प्रसिद्ध तप्त का सहायक श्रीध्र नाम का ऋत्विक डाल उपसर्जनी देता है । ' आनयति ' पद को प्रकृत में ' तत्ते इडापात्री में स्थित पिठ पुरोडाश के ऊपर । इसी भाँति निनगार्थक ही समझना चाहिए सिदध्यानयति ' इस प्रकरणान्तर की तूष्णीमासेचनं विधत्तं ( सा ० मा ० ) यह अभिप्राय से भाष्यकार ने - अथ तासां कहा है । को अध्वर्यु दक्षिण हाथ में रक्खे इसप्रकार — श्राग्नीध्र के द्वारा श्रानीयमाना ' समाप ' इति उपर्जनी ' ( का ० श्र ० २ ५ १३ ) के अनुसार — हुए पवित्र से - पवित्राभ्यां प्रतिगृह्णाति पृच्यन्तां सम्मधुमतीमधु-‘ यो समापऽयोषधीभिः समोषधयो रसेन मन्त्र संरेवतीर्जगतभिः बोलता हुआ पवित्र से उपसर्जनी आपः का मतीभिः पृच्यन्ताम् ” ( ११२ ११ य ० ) यह ग्रहण करता है । सव्यहस्त में ग्रहण कर अधिश्रित उपसर्जनी तात्पर्य यही है कि - आग्नीध्र ' स्पय ' को के ऊपर पवित्र युक्त को उँढा कर अध्वर्यु के दक्षिणभाग से लेकर अध्वर्यु विपुरोडाश का हाथ पुरोडाशपात्री के ऊपर रहता है । हाथ पर डालता है । इस निनयनकाल में करें, जिससे कि मन्त्रान्त में उपर्जनीका प्रतिमस आग्नीध्र को चाहिए कि, वह इसप्रकार निनयन सम्पन्न होजाय । श्रुति कहती है ) ओषधिरूप इन पिटों के ( उपर्युक्त मन्त्र का विभागशः अर्थ हैं । करती एवं श्रपधिरूप हुई मे पिष्ट पुरोडाश इस रस के साथ साथ में उपसर्जनी आपः सङ्गत हो रहीं का रस है । पानी रेवत्य ' हैं, ओषधियाँ जागत्य ' सङ्गत होरहे हैं । पानी ही इन प्रोपधियों को में पण होता है, एवं कितने हीं श्राहवनीय * कितने हीं आचायों के मतानुसार गाईपत्य चाहिए | परन्तु कात्यायन इनमे विकल्प में हीं अध्वर्यु को बेटना श्रपथाग्नि समझते हैं । उभयथा वैदिमध्य मानते हैं । , वह को मिलाने के लिए जो पानी लिया जाता है X ' उपसृजत्याभि: ' इस व्युत्पत्ति से विष्ट पुरोडाश ' उपसर्जनी ' नाम से प्रसिद्ध है । ६६४