Shatpath Brahman 1 2 — पृष्ठ 421–430
शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - १-२ - मोतीलाल शास्त्री · पृष्ठ 421–430
पृष्ठ 421
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
द्वितीयध्याय शतपथब्राह्मण द्वितीयाकारण है । घट पानी का आयतन है । ये सब अपने आधेयों के एकत: आधार हैं । मन के उपरि भाग में विषयों का प्रतिबिम्ब पड़ता है । अतएव मन के लिए ' मनो वा आयतनम् ' ( विषयाणाम्, ( शत ० १४ २ ) यह कहा जाता है । जिसे लोकभाषा में ' आधार ' कहा जाता है, वेदभाषा में वही आधार ' आयतन ' नाम से व्यवहत किया जाता है । ' वसुधानकोश ' ( डिब्बी ) तद्गत वस्तु का ' आत्रपन ' है । ' स्तौम्यत्रिलोकी ' नाम से प्रसिद्ध त्रैलोक्यमका महावेदिरूपा ' उख्या पृथिवी ( महिमा पृथिवी ) ' चतुर्दशविध भूतसर्गो का ' आयपन ' है । इसी आधार पर —‘अयं वै लोक आत्रपनं महत् ' [ तै ० ब्रा ० ३ ६ ५५ ] यह कहा जाता है । वसुधानकोश तद्गत वस्तु का चारों ओर से आधार है । अतएव हम इसे अवश्य ही आपन कह सकते हैं । प्रत्येक पदार्थ को अ ने उदर में रख कर उसे सुरक्षित रखने वाला उस वस्तु का प्रकाश है । अतएव सर्वतः आधारभुत तत्तद्वस्तु के तत्तदाकाश को भी हम तत्तद्वस्तु का ' आचपन ' मान सकते हैं । ' आकाशो वै नाम - रूपयोनि-बेड़िता ' [ उपनिषत् ] के अनुसार बहिमंण्डलस्वरूप आकाश ही तत्तद् वस्तु के नामरूप, एवं कर्म्म की प्रतिष्टा है । इसी आधार पर आपनतत्त्व को एवं ब्रह्म ' ( आकशब्रह्म ) कहा जाता है । दूसरा है अन्नादब्रह्म | अग्नितत्त्व का ही नाम ' अन्नाद ' है, जैसाकि पूर्व में बतलाया जाचुका है । यह अन्नादतत्त्व ही मुख्य ' आत्मा ' है । यही श्रावपन पर प्रतिष्ठित रहता है । आवपन पर प्रतिष्ठित यह अन्नावाग्निभूः भुवस्वः भेट से विधा विभक्त रहता है । त्रिधा विभक्त यह अग्नितत्त्व सुखसाधक बनता हुआ कं ब्रह्म ' नाम से व्यवहृत होता है । तीसरा है अन्नब्रह्म आपस्तश्व का ही नाम अन्नब्रह्म है । इसीसे रममाण होता हुआ अग्नि ' के ' रूप में परिणत होता है, अतएव इस अन्नब्रह्म को ' रं ब्रह्म ' कहा जाता है । ' खंब्रह्म ' पर प्रतिष्ठित ' कं ब्रह्म ' यदि ' रं ब्रह्म ' से अनुगृहीत रहता है, तो शान्ति है । इसी आधार पर ' खं - कं - रम् ' तीनों की समष्टि ' ब्रह्म ' नाम से व्यवहृत की जाती है । आपनब्रह्म आकाश है । यही बाकशुक्र है । अन्नादब्रह्म अग्निशुक है । अन्न आपः शुक्र है । बाक् आपः अग्नि ही आपन - अन्न अन्नाद है । तीनों की समष्टि ही ' सर्वम् ' है । ध्यान रहे, आकाश से प्रकृत के ' शुन इन्द्र ' ही अभिप्रेत है, न कि सांख्योक्त कल्पित शून्यप्रदेश । शून्यप्रदेश आकाश नहीं है, अपितु ' इन्द्रप्राण ' आकाश है । इसीके लिए ' शुन हुवेम मधवानमिन्द्रम् ' यह कहा जाता है । इसी सांख्ययुग की भ्रान्ति में पड़ कर इतर मावावालांने भी आकाश को तत्त्व मर्यादा से बहिष्कृत कर दिया है । वे भी आतश ( तेज ), बाद ( वायु ), आब ( जल ), खाक ( पृथिवी ), ये चार ही तत्त्व मुख्य मानते हैं फलक ( आसमाँ आकाश ) उनकी दृष्टि में तत्व नहीं है । यही भ्रान्ति तत्त्वविज्ञान का गर्व रखने वाले बीसवीं सदी के वैज्ञानिकाने की है । कुछ भी हो । भारतीय वैज्ञानिकों की दृष्टि में तो आवपनरूप आकाश अवश्य ही तत्त्व है । हमारा ' पञ्चतत्त्ववाद ' सुप्रसिद्ध है । आकाश ही आत्मरूप अन्ना का आत्मा है । इसी आधार पर आत्मा का ' मनोमयः प्राणशरीरो भारूपः- आकाशात्म " यह लक्षण किया जाता है । ६८५
पृष्ठ 422
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
द्वितीयअध्याय अधिदैवतम् — १ - वाकू ” स्वयम्भूः परमेष्ठी..... २ - श्रापः.... स्वः सूर्यः -पूर्य्य: ३- भुवः वायुः भूः ४- श्रापः.... ५ - वाक् ----चन्द्रमाः ' ' ' पृथिवी..... प्रथमकाण्ड द्वितीयत्राह्मण परमाकाशः अन्नब्रह्म अन्नादब्रह्म अन्नंबझ पुरावाकाशः ६८६ बतलाना प्रकृत में यही है कि इस वाक्तत्त्व का नाम हीं ' आकाश ' है । यही वपन है । यह तत्त्व स्वयम्भू में प्रतिष्ठित है | परमेष्ठी श्रापोमय है । ईश्वरीय - लीला बड़ी विचित्र है । वह पुत्रोत्पत्ति से पहिले अन्नादब्रह्मरूप पुत्र के लिए अन्नरूप दुग्ध [ माता के स्तनों में ] उत्पन्न कर देता है । पहिले अन्न है, फिर अन्नाद है । सौराग्नि पीछे उत्पन्न होता है । किन्तु तदन्नभूत अन्नरूप पारमेष्ठ्य सोम उससे पहिले ही उत्पन्न होजाता है । अग्नितत्त्व उभयतः अरूप अन्न से परिग्रहीत है । मध्यस्थ अग्नि अनि - वायु- आदित्य भेद से त्रिधा विभक्त है । तीनों श्रग्नियों के उस ओर पार--मेष्ठ्थ आप: है, इस ओर चान्द्र आप: है । चन्द्रमा के इस ओर ग्रावपनरूप वाङमय पृथिवीपिएड है, जैसाकि निम्नलिखित तालिका से स्पष्ट होजाता है— दोनों ओर अत्रुरूप सोम है । चान्द्रसोम भास्वरसांम है । यही ईश्वरप्रजापति का मन है । तत्प्रतिष्ठ अग्नि उसकी वागिन्द्रिय है 1 । वायु प्राणेन्द्रिय है । सूर्य्य चक्षु हैं । पारमेष्ठ्याः [ दिक्सोम ] श्रोत्र है । यही अवस्था अध्यात्म में समझनी चाहिए । हृदय में चन्द्रमारूप मन है । मुख - नासिका चक्षु, तीनों क्रमशः वाक् प्रारण चक्षु - रूप अभि--वायु- सूर्य है । श्रोत्रेन्द्रिय पारमेष्ठ्य सोम है । शिरोगुहा स्वायम्भुव परमाकाश है । बस्तिगुहा पार्थिव पुराणाकाश है । जैसी स्थिति वहाँ है, ठीक वही स्थिति यहाँ है । ' पूर्णमद: - पूर्णमिदम्, यदेवेह तद– मुत्र ' सिद्धान्त सर्वात्मना श्रन्वर्थ प्रमाणित होरहा है ।
पृष्ठ 423
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
द्वितीय अध्याय अध्यात्मम्— शतपथब्राह्मण शिरोगुहा- परमाकाशः स्वयम्भूः वाक -- १ श्रोत्रे --- अनं ब्रह्म परमेष्टी आप: --- २ प्राणः- वायुः नादब्रह्म सू श्रग्निः -३ वाक -अग्निः मनः ——— अन्नं त्रह्म चन्द्रमाः आपः -- ४ बस्तिगुहा - पुराणाकाः पृथिवी वाक – ५ द्वितीयब्राह्मण हमने कहा था कि, प्रकृत में हमारा सम्बन्ध पृथिवी और सूर्य से है । अतः इह्रीं दोनों की ओर आपका ध्यान आकर्षित किया जाता है । इन दोनों में भी प्रथम पृथिवी को ही लक्ष्य बनाया जाता है । पृथिवी सर्वान्त में है । इसके भूः पृथिवी ये दो मेट हैं । जिस पृथिवीपिण्ड पर हम सब प्रतिष्ठित हैं, वही ' भू ' है, एवं वषट्कारमण्डलावच्छिन्ना महिमा - पृथिवी पृथिवी है । भू मर्त्यरूपिणी है, पृथिवी अमृतरूपिणी है । वाक्-श्राप: - अग्निरूप अमृतशुक से महिमाख्य पृथिवी का स्वरूप निष्पन्न हुआ है । भूपिण्ड पर पहिला स्तर अग्नि का है । यह अग्नि घन -- तरल - विरल भेद से त्रेधा विभक्त होता हुआ पूर्वोक्त त्रिवृत् पञ्चदश- एकविंश स्तोमों में क्रमश: प्रतिष्ठित है । त्रिवृत्स्तोम इस पृथिबीलोक का ' पृथिवीलोक ' है, इसके प्रतिष्ठावा ( अधिष्ठाता ) अग्निदेवता हैं । पञ्चदशस्तोम इस पृथित्री का ' अन्तरिक्षलोक ' है, इसके प्रतिष्ठावा वायुदेवता हैं । एक-विंशस्तोम इस पृथिवी का द्युलोक है । इसके प्रतिष्टावा इन्द्रापरर्थ्यायक आदित्यदेवता है । इसप्रकार स्तोमात्मिका इस महिमा - पृथिवी में स्तोममेद से तीन लोक होजाते हैं । स्तोमसम्बन्ध से ही यह त्रैलोक्य स्तौम्य त्रिलोकी नाम से प्रसिद्ध है । महिमामयी होने से यह ' मही ' नाम से भी प्रसिद्ध है ( देखिए तै ० ब्रा ० २२४६८ ) । इसी त्रैलोक्यात्मिका पृथिवी को लक्ष्य में रखकर - ' तिम्रो व इमाः पृथिव्य:, इयम हैका, द्वो अस्याः परे ' ( शत ०५।१।५।२१ ) यह कहा जाता है । अग्नि में सोमाहुति का होना हीं यज्ञ है । पृथिवीपृष्ट से २१ एकविंशस्तोम पर्य्यन्त व्याप्त इस अग्नि में पारमेष्ठ्य सोम निरन्तर श्राहुत होता रहता है । अतएव इस अग्निपृष्ठ को हम अवश्य ही ' यज्ञपृष्ठ ' कह सकते हैं । अग्निज्येष्ठ आठ वसु, वायुज्येष्ठ ११ रुद्र, इन्द्रज्येष्ठ १२ आदित्य, सान्ध्यगत दो अश्विनीप्रारण ( नासत्य – एत्रं दत्र ), इस प्रकार ३३ आग्नेय सोमपा देवता ( ११ प्रयाज, ११ अनुयाज, ११ अनुयाज, मेद से ३३ असोमपा, किन्तु श्राज्यपा देवताओं से युक्त ) इस यज्ञमण्डल में प्रतिष्टित होते हुए ' यज्ञिय ' नाम से प्रसिद्ध हैं । इह्रीं यज्ञिय देवताओं को लक्ष्य में रखकर श्रुति कहती है-६८७
पृष्ठ 424
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
द्वितीयाध्याय प्रथमकाण्ड
' इति स्तुनासो सथा रिषादशो ये स्थ त्रयव त्रिंशच्च ।
मनोर्देवा यज्ञियासः ' ॥
- यजु संहिता द्वितीयब्राह्मण एकविंश स्तोम - पर्यन्त ही यह अग्नि नहीं जाता, अपितु २१ से ऊपर पन्त ( २२ पर्य्यन्त ) जाता है । २१ का तरगा कर जाता है । अतएव इस यज्ञात्मक श्राग्नेयम्तोम को ' रथन्तरसाम ' कहा जाता है, एवं रथन्तर के सम्बन्ध से ही यह अग्नि ' राथन्तर ' नाम से भी प्रसिद्ध है । ' एकविंशो वै स्वर्गो लोकः ' ( शत ० १०१५ | ४ | ६ ) एकत्रिंशो वा इत: स्वर्गोलोकः ' ( तै ० ब्रा ० ३॥१२।५।७ ) ‘ एकत्रिंशो वा एप य एष ( सूर्यः ) तपति ' ( कौ ० २५ / १ ) इत्यादि निगमवचनों के अनुसार सूर्य्य पृथिवी के २१ वै अहर्गण पर प्रतिष्ठित है । एवं ' स्वरहर्देवाः सूर्यः ' ( श ० १ | १ | १ | ५ ) के अनुसार सूर्यं ही म्वर्लोक है | यह सूर्य ' असो वा आदित्य एष रथ: ' ( ० ६ | ४ | १ | १५ ) के अनुसार ' रथ ' नाम से प्रसिद्ध है । रथ का अर्थ है ' रस: ' । ' अभौ वा आदित्यो देवमधु ' ( छा ० उ ० ) के अनुसार सूर्य्य ' मधुरस ' है । ' तं वा एतं ( सूर्य्यं ) रसं सन्तं रथ इत्याचक्षते ' ( गो ० ब्रा ० पू ० २।२१ ) के अनुसार रस के सम्बन्ध से ही सूर्य परीक्षप्रिय देवताओं की परोक्ष भाषानुसार ' रथ ' नाम से व्यवहृत हुआ है । पार्थिवाग्नि इस सूर्यरूप रथ का भी क्योंकि तर कर जाता है । अतएव इस आग्नेय स्तोम को ' रथन्तरसाम ' कहा जाता है । पिच पृथिवी-पिण्ड मे निकलने वाला यह अग्नि भी ग्स है । यही ' अग्निरम ' दधि घृत - मधु रूप में परिणत होता हुआ अग्नि-वायु -- आदित्य नाम से व्यवहृत होता है । ' दृधि हैवास्य लोकस्य रूपम, घृतमन्तरिक्षस्य, मध्वमुख्य ' ( श ० ७ ० कम्पनितिवाह्मण ) के अनुसार वही अग्नि रसरूप में परिणत होरहा है । अग्नि की इसी रसावस्था का निरूपण करती हुई वाजिश्रुति कहती है-' आपो वा अर्कः । तद्यदां शर आसीत् तत् समहन्यत । सा तम्यामश्राम्यत् । तस्य श्रान्तस्य तप्तस्य तेजो रमो निरवर्त्तताग्निः । स कुरुत् - आदित्यां तृतीयम्. वायुं तृतीयम् । स एष प्रास्त्रेधा विहितः ' - शत ० १०।६।५२-३ पृथिव्यभवत् । धात्मानं व्य-अग्निरम है, वायु रमतर है, एवं मधुमय आदित्याग्नि रसतम है । दूसरे शब्दों में अग्नि में ' रसमात्रा ' साधारण हैं । वायु में उससे अधिक हैं, एवं श्रादित्यभाग रसघन होता हुआ रसतम है । इसीलिए आदित्यरूप अग्निरसतमात्मक अन्तिम साम - " रसनमं ह वै तद्रथन्तरमित्याचक्षते परोक्षम् ” ( शत ० ६. | १ | २ | ६६ ) के अनुसार ' रथन्तर ' नामसे व्यवहृत हुआ है । यह है अमृताग्निस्वरूप प्रथम पृष्ठका पहिला स्वरूप । यह पृष्ट लोहित है । इसी में मप्तव का अन्तर्भाव है । अतएव इसे ' ष्ण ' भी कहा जाता है । दूसरा अष्ठ है । २१ से ३ पर्यंत है । यही ' अत्रसमुद्र ' कहलाता है । यह भी पृथिबी की ही वस्तु है । कारण -- वाकूपृष्ठ पर्यन्त पृथिवी की सत्ता मानी जाती है । इसी पृष्ठ के सम्बन्ध से ६८८
पृष्ठ 425
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
द्वितीय अध्याय शतपथब्राह्मण द्वितीयत्राह्मणः पृथिवी को ' सागराम्बरा ' कहा जाता है । यह अपतत्त्व सर्वथा कृष्ण है । इसी अपतत्त्व में गोतत्त्व प्रतिष्टित रहता है । सामतत्त्व की ( * ) प्रतिष्ठा यही पोमयी गो है । इसी आधार पर " स हैष सोमोऽजस्रो यद्गौ: " ( यजुः स ० १३ - ३३ ) - ( श ० ७५।२।२६ ) यह कहा जाता है । इसी पोमय, अतएव विष्णु-देवतामय गोतत्त्वका निरूपण करती हुई यजुःश्रुति कहती है ।
या ते धामान्युष्मसि गमध्ये यत्र गावो भूरिशृङ्गा प्रयासः ।
त्राह तदुरु गायस्व विष्णोः परमं पदमव भारि भूरि ॥
— यजुः संहिता ६ | ३ | यह गोतत्त्व ' विराजो वा एतद्रूपं यद्गौः ' ( तां ० ब्रा ० ४ ६ ३ ) के अनुसार ' विराट् ' है । विराट के सम्बन्ध से ही यह पृष्टात्मक पोमय पार्थिवसाम ' वैरूप ' नाम से प्रसिद्ध है । रथन्तराग्नि की दूसरी अवस्था यही ' वैरूपसाम ' है, इसी अभिप्राय से - " यद्वै रथन्तरं तद्वैरूपम् " ( ऐ ० ब्रा ० २।१३ ) यह कहा जाता है । अप्पृष्ट घोग् कृष्ण है । तीसरा है बाकपृष्ठ | यही सर्वान्त का वेदपृष्ट है । यही ब्रह्मपृष्ठ है । यहाँ पार्थिव प्रजापति की सृष्टि त्रिश्रान्त है । प्रजाप'त इसी वाकपृष्ठ पर पार्थिव सृष्टि को सर्वात्मना सम्पन्न करने में समर्थ होते हैं | इसी समाप्ति - सूचक भाव को प्रधान मानते हुए ऋषियोंने इस अन्तिम सामको - ' शक्करी ' नाम से व्यवहृत किया है । इसी विज्ञान को लक्ष्य में रखकर – '- ' यदिमांल्लोकान् प्रजापतिः सृष्ट्वेदं सर्वमशक्नोद्यदिदं किञ्च । तच्छकर्णोऽभवंस्तच्छकरीणां शक्करीत्त्वम ' ( ऐ ० ५। ७ ) यह कहा है । यह वेदपृष्ठ ज्ञानज्योतिर्मय बनता हुआ सर्वथा शुक्ल है । इसप्रकार लोहित - कृष्ण - - शुक्ल - वर्णात्मक, रथन्तर वैरूप- शाक्कर - सामा-त्मक– अग्नि - आपः चाकू - रूप अमृतशुक्रात्मक यह महामण्डल ' पृथिवी ' नाम से प्रसिद्ध हो— रहा है । यह तो हुआ श्रमृतशुक्रों का दिग्दर्शन । अब मर्त्य - शुक्रात्मक भूपिण्ड पर भी दृष्टिनिक्षेप कर लीजिए । हमने कहा है कि, भूपिण्ड के उपादान मर्त्य - वाकू, आपः - अग्नि हैं । अग्नि पहिला स्तर है । ‘ यच्च– किञ्चिद्दार्ष्टिविषयकमग्निकम्मैव तत् सर्वम ' ( या ० नि ० ) के अनुसार दृश्यभाग अग्नि है । इसे हमने ' पृश्नि ' कहा है । प्रत्येक वस्तुपिण्ड में सातों रूपों में से कोई न कोई रूप अवश्य रहता है । यही पहिला अग्निस्तर है । किसी भी पिण्ड को श्राप जला दीजिए । जलने के अनन्तर सबका परिणाम ' कृष्ण ' ही होगा । पहिले अग्निस्तर के उत्क्रान्त होने पर दूसरा यही कृष्णस्तर निकलता है । यही कृष्णवर्णात्मक दूसरा अप्पृष्ठ है | यदि फिर उस वस्तु के साथ अधिक अग्निसंयोग कराया जाता है, तो यह कृष्णवर्णात्मक अपूस्तर भी उत्क्रान्त होजाता है, एवं तीसरा शुक्लस्तर निकल आता है । यही भस्मावस्था है । यही उस पदार्थ की ' भूति ' ( विभूति ) है | यही वेदपृष्ठ है । इसप्रकार प्रत्येक वस्तु के पिण्डभाग में उपर्युक्त ( तीन ) ( * ) गोलोकवासी श्रापोमय विष्णु ही गोसंचारण करते हैं । तदंशभूत कृष्णने गोचारणवृत्ति को क्यों अङ्गीकार किया?, इस प्रश्न का भी यही समाधान है । इस विषय का विषद विवेचन गीताविज्ञान-भाष्यान्तर्गत श्राचार्य्यरहस्य के " परोमेष्ठो कृष्ण रहस्य " नामक प्रकरण में देखना चाहिए । ६८६
पृष्ठ 426
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
द्वितीयाध्याय प्रथमकाण्ड द्वितीयब्राह्मण पृष्ट हैं, महिमामण्डल में उपयुक्त तीनों अमृतपृष्ठ हैं । वीं सम्पूर्ण प्रपच षाट्कौशिक ही प्रमाणित हो-रहा है । १ - वाकू - शाक्करमा ४८ पर्यन्त — पारावतपृष्ठम् २ –श्रपः -- वैरूपसाम – ३३ पर्य्यन्त — श्रप पृष्ठम् ' मही ' ' महिमा ' ३ – अग्नि: रथन्तरसाम- २१ पर्य्यन्त — यज्ञपृष्ठम् १ – अग्निः दृश्यभागः २ - आपः - अन्त ' स्तरः ३ - वाक - सर्वान्तरतमः स्तरः। भूः - पिण्डः पार्थिव संस्था-शाकरसाम --- वाक् ४८ पारावतपृष्ठम् वैरूप साम --- प: ३३ —— श्रपूपृष्टम् ' मही ' रथन्तरसाम - अग्निः २१ - - यज्ञपृष्ठम श्रग्निः १ श्रपः २ वाकू ३ । भूः यही स्थिति मौरमण्डल की समझिए । सूर्य्यपिण्ड के ऊपर पहिला पृष्ठ सावित्राग्नि का है । दूसरा पृष्ठ है तीसरा वाकपृष्ट है । विश्व में ज्योतिष्मान् पदार्थ स्त्र - पर - रूप भेद से तीन भागों में विभक्त हैं । जिहें अन्य से प्रकाश लेने की आवश्यकता नहीं है, अपितु जो अपनी ज्योति से अपने आप प्रकाशित हैं, वे मन्त्र स्वज्योतिर्म्म पदार्थ हैं । इनका सांकेतिक नाम सूर्य है । श्राप जिसे सूर्य्यं कहते हैं, वही सूर्य्य नहीं है, अपि तु स्वज्योतिर्मय स्वाती नक्षत्र, पशुपति नीलकण्ठ आदि नामों से प्रसिद्ध लुब्धक नामक नक्षत्र, चित्रा, श्रादि सत्र सूर्ख है । अतएव स्वासी को ' सविता ' कहा आता है । जो पिण्ड सौर ज्योति मे प्रकाशित है, बे सब ' चन्द्रमा ' नाम से प्रसिद्ध हैं । मङ्गलग्रह के उपग्रह दो चन्द्रमा हैं । बृहस्पति के चार है । शनि में आठ हैं । पृथिवी में एक है । एवं जो दूसरों को प्रकाशित करने में असमर्थ होते हुए केवल अपने स्वरूप का ही अभिव्यक्त करने में समर्थ हैं, वे सब रूपज्योतिर्म्मय पदार्थ हैं । उहाँ सङ्केत-भाषानुसार ' पृथिवी ' कहा जाता है । श्रनन्त सूर्य हैं, अनन्त चन्द्रमा हैं, एवं अनन्त ही पृथिवियाँ हैं । रूपज्योतिर्मयीं पृथिवी के माम की अपेक्षा परज्योतिर्मय चन्द्रमा का साम अधिक बड़ा होता है, एवं ६१.
पृष्ठ 427
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
द्वितीयअध्याय शतपथब्राहाण द्वितीयब्राह्मण चन्द्रमा की अपेक्षा स्वज्योतिर्मय सूर्य का साम और भी अधिक बृहत् होता है । इसी विज्ञान के आधार ५ र सौर साम को ‘ बृहतसाम ' कहा जाता है । जैसे पृथिवी के साम को सुर्यरथ के सम्बन्ध से, एवं रसके सम्बन्ध से ' रथन्तर ' कहा जाता है, चान्द्रसाम ' राजा ' सोम के सम्बन्ध से ' राजन ' नाम से व्यवहृत होता है, एवमेव स्वज्योतिर्म्मय सौरसाम बृहत् ( बड़ा ) होने से ' बृहत्साम ' नाम से प्रसिद्ध है । इसी विज्ञान की लक्ष्य में रखकर बृहत्साम का “ यद्धस्वं तद्रथन्तरं यद्दीर्घं तद् बृहत् ' यह लक्षण किया जाता है ( देखिए कौ ० ब्रा ० ३।५ ) । अपि च- सूर्य्य बृहतीछन्द पर प्रतिष्ठित है । णोत्तर - पार्श्वस्थ इतर वृत्तों की अपेक्षा बृहत् ( बड़ा ) खगोल गोल है । पिण्ड के मध्य का पूर्वापरवृत्त दक्षि-होता है | अतएव ' विष्वद्वृत्त ' नाम से प्रसिद्ध इम मध्य के पूर्वापरवृत्त को ' बृहतीछन्द ' कहा जाता है । सूर्य सदा इसी पर प्रतिष्ठित है । पृथिवी इसके चारों ओर घुम्ती है । पृथिवी के परिभ्रमण से सूख का उदयास्तभाव प्रतीत होता है । वस्तुत: वैदिक - विज्ञान के अनुसार सूर्य रोदसीत्रिलोकी की अपेक्षा सर्वथा स्थिर है । सूर्य के इसी स्थिरभाव को लक्ष्य में रखकर निम्न लिखित श्रौतस्मार्त्तं वचन हमारे सम्मुख उपस्थित होते हैं— ' सवा एप न कदाचनान्तमेति, नोदेति । तं यदस्तमेतीति मन्यन्ते - अह्न एक तदन्तमित्वाऽथात्मानं विपर्यस्यते । रात्रिमेवावस्तात् कुरुते - अहः परस्तात् । अथ यदेनं प्रातरुदेतीति मन्यन्ते - रात्रिरेव तदन्तमित्वाऽथात्मानं विपर्यस्यते । हरेवा -वस्तात्, रात्रिं परस्तात् । स वा एष न कदाचन निम्लोचति । - ऐ ० ब्रा ० ३।४४ इति ' स वा एष न कदाचनास्तमयति, नोदयति । तद्यदेनं पश्चादस्तमयतीति मन्यन्ते-श्रह्न एव तदन्तं गत्वाश्रात्मानं विपर्यस्यते । अहरेवाधस्तात् कृणुते, रात्रिं परस्तात् । - गो ० वा ० उ ० ४।१० । नवोदेता, नास्तमेता, एकल एव मध्ये स्थाता ( छा ० उ ० ) । बृहत्यां वा असावादित्यः सूर्यः श्रियां प्रतिष्ठायां प्रतिष्ठितस्तपति । ' मूर्यो बृहती मध्ययूढस्तपति ' ।
' वास्तमनमर्कस्य नोदयः सर्वदा सतः ।
उदयास्तमनं चैव दर्शनादर्शनं रवेः ॥
- विष्णुपुराणे - गो ० ० प्रा ० उ ० ५/७ | पूर्वोक्त बृहतीछन्द पर ही सूर्य्य प्रतिष्ठित है । यही इतर छन्दों का मूलाधार है, जैसाकि पूर्व प्रकरणों में विस्तार के साथ बतलाया जाचुका है । इस बृहतीछन्द के सम्बन्ध से भी सौरसाम को ' बृहतीसाम ' कहा जाता है | पाठकों को यह ध्यान में रखना चाहिए कि, जब रूपज्योतिर्म्मयी पृथिवी का रथन्तरसाम ही सूक्ष्य में ६६१
पृष्ठ 428
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
द्वितीयअध्याय प्रथमकाण्ड द्वितीयब्राह्मण ऊपर, २२ वें अहर्गण पर्य्यन्त चला जाता है, तो स्वज्योतिर्मय सौर बृहत्साम कहाँतक जायगा । सूर्य्य का २१ बाँ अहर्गण बड़ी दूर पर्य्यन्त जायगा । यदवधि - पन्त सूर्य का २१ व अहर्गण है, तदवधिपर्यन्त ही सौर अग्नि व्याप्त है । तत्पर्य्यन्त ही बृहत्साम है । अग्निपृष्ठ के अनन्तर दूसरा अप 38 है । यहाँ गोतत्य उत्पन्न होता है, जैसाकि पार्थिबसामनिरूपण में बतलाया जाचुका है । इसी के सम्बन्ध से यह ' वैराजसाम ' कहलाता है । तीसरा वाक्प्रष्ट है । यही ' रैबतसाम ' नाम से प्रसिद्ध है । ये तीनों अमृतपृष्ठ हैं । एवं स्वयं सूर्य्यपिण्ड मर्त्यपृष्ठत्रयात्मक है । ' वाग्वै रेवती ( शत ० ३८।१।२२ ) के अनुसार सौर वाक्पृष्ठ रेवती है । इसीके सम्बन्ध से यह अन्तिम पृष्ठ ' रैवतसाम ' नाम से प्रसिद्ध होता है । इसप्रकार पृथिवीवत् सूर्य में भी बाग - आप- अग्निः श्रादि ६ शुक्रों का भोग सिद्ध होजाता है । सृष्टिविद्या के दृष्टिमूलक, स्थितिमूलक, सृष्टिमूलक- नामक तीन विवत्तों के भेट से ही विश्वपत्रों के स्थिर - चर - भावों का समन्वय हुआ है वेदशास्त्र में । दृष्टिमूला सृष्टिविद्या के अनुसार पृथिवी स्थिर है, सूर्य्य चर है, जैसा कि – ' रथेनादेबो याति भुवनानि पश्यन् ' ( यजुः ) से स्पष्ट है । किन्तु स्थितिमूला सृष्टिविद्या के अनुसार पृथिवी चला है, और सूर्य्य स्थिर है, जैसाकि – ' नैवोदेता ० ' इत्यादि से स्पष्ट है । एवं सृष्टि-मूला सृष्टिविद्या के अनुसार केवल सत्य स्वयम्भू को छोड़कर सभी चल हैं, परिभ्रममाण हैं, जैसाकि अन्य निबन्धों में विस्तार से प्रतिपादित है । सौरसंस्था-रैवतसाम - वाक ४८ - पारावतपृष्ठम् वैराजसाम - श्रापः ३३ पृष्ठम् - महिमा बृहत्साम -- अग्निः - २१ --- यज्ञपृष्टम् अग्नि: -.. आपः--वाक्-१- वाकू — रवतसाम – ४८ - ५ त पारावतपृष्ठम् २- श्रापः- वैराजसाम -- ३३ – पर्य्यन्त – श्रप्पृष्ठम् ३ - अग्निः - बृहत्साम - २१- पर्य्यन्त - यज्ञपृष्ठम् १- अग्निः - दृश्यभागः - श्रापः - अन्तस्तरः -'पिण्डः ' ३ - वाकू - सर्वान्तरतमः स्तरः - पिण्डः } -महि ' महिमा ' ६६२
पृष्ठ 429
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
द्वितीयाध्याय - ऐ ० ब्रा ७७ श्र ० 99 न्यामयः I ऐ ० ब्रा ० १६ अ ० द्वितीयब्राह्मण शतपथब्राह्मण ६६३ प्रसङ्गागत यह और समझ लेना चाहिए कि, पूर्व में जिन पार्थिव, एवं सौर सामों का दिग्दर्शन कराया गया हैं, उनका परम्पर ' अतिमान ' होता है । दूसरे शब्दों में ६ औ सामो का ( रथन्तर - वैरूप-शाकर, बृहद् - त्रैराज - वत सामों का ) परस्पर अतिमानसम्बन्ध है । रथन्तर- वैरूप - शाक्कर, तीनों एक ही रथन्तर के रूप हैं 1 । एवमेव बृहद - वैराज - रैवत, तीनों एक ही बृहत् के विवर्त्त हैं, जैसा कि श्रुति करती है. -" यद्वै रथन्तर ं तद् वैरूपम्, यद् बृहत् - तद्व राजम् । यद्रथन्तरंरौं - तच्छाक्करम्, यद्— बृहत्, तद्रवतम् ” । इनमें बृहद्रथन्तर का अतिमान है । रथन्तर बृहत् के गर्भ में निविष्ट है । वैरूप, और बृहन् का प्रतिमान है । वैरूपसाम के गर्भ में बृहत्साम निविष्ट है । वैराज, और वैरूप का प्रतिमान है । वैराज के गर्भ में वैरूप है । एवं शाकर, और रैवत का अतिमान है । अर्थात् रैवत के गर्भ में शावरसाम अवस्थित है । इसी अतिमानसम्बन्ध का निरूपण करती हुई ऐतरेयश्रुति कहती है— हच्चा वा इदमग्ग्रे रथन्तरं चास्ताम् । वाक् च वै तम्मनश्चास्ताम् । वाग्वै रथन्तर-म् - मनो बृहत् । तद्बृहत्पूर्वं ससृजानं रथन्तरमत्यमन्यत । तद् रथन्तरं गर्भमधत्त तद्वैरूपमसृजत । ते द्वे भूत्वा रथन्तर ं च वैरूपं च बृहदत्यमन्येताम् । तद् बृहद्गर्भ-मधत्त । तच्छास्वरमसृजत । तानि त्रीणि भूखा रथन्तरं च रूपं च शास्त्ररच, बृहच्च, वैराजं चात्यमन्येताम् । तद्दृहद्गर्भमधत्त । तद्वतमसृजत । तानि षट् पृष्ठा-इसी अतिमानसम्बन्ध से द्यावापृथिवीरूप सूर्य, एवं पृथिवी का मिथुन होरहा है । इसी मिथुन से रोदसीत्रैलोक्य के सम्पूर्ण पदार्थ उत्पन्न होते हैं । आगे के रेखाचित्रों से पड़विध शुक्रों का, एवं विध ही सौर- पार्थिव सामों का अतिमानसम्बन्ध सर्वात्मना स्पष्ट हो जाता है ।
पृष्ठ 430
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
छन्दोमा )४८ ( वाक् ' मही ' ) गोसवः ( ३३ : ' आप सागराम्बरा ' ) सम्वत्सरः २१ : ( अग्नि ' मझिया ' आणिः आपः वाक् द्वितीयअध्याय ( १ ) - बागापोऽग्निः - शुक्रत्रय वितान परिलेख ः— प्रथमकाण्ड द्वितीयब्राह्मण