Shatpath Brahman 1 2 — पृष्ठ 431–440
शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - १-२ - मोतीलाल शास्त्री · पृष्ठ 431–440
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द्वितीयअध्याय ) ( अग्नि रचन्वर ) ( वाक शाकर ) ( आप वैरूर्य : ) गौ मंडल अब ( ) वाक् मंडल अम्नि ( ) द्यौः मंडल ( टिङ् द्वितीयब्राह्मण शतपथब्राह्मण : पिण्ड → पृथिवी ६६५ ( २ ) -- पार्थिव सम्वत्सर चक्रानुगत सामत्रयी - परिलेखः –
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दैवतम् ( सौर ) ) ( # वैराजम ६१६ द्वितीयाध्याय ( ३ ) --सौर पार्थिव - सामाविमानपरिलेखः-प्रथमकाण्ड ) बृहत् सौर ( रथन्तर सूर्य्यपिण्डः भूषिण्डः ), पार्थिव ( वैरूपम
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द्वितीयाध्याय शतपथब्राह्मण द्वितीयब्राह्मण स्तोम का स्वरूप बतलाने हुए पूर्व में हमने युग्स - श्रयुग्म भेद से स्तोमों को दो भागों में विभक्त बतलाया है । इन में त्रिवृदादि पूर्वोक्त षट्स्तोम युग्मस्तोम हैं । एवं ४८ पर्य्यन्त व्याप्त स्तोम युग्मस्तोम हैं । अयुग्मम्तोमों का स्वरूप जैसे ३३ अहर्गणों से सम्पन्न होता है, एवमेव युग्मम्तोमों का स्वरूप छन्द से सम्पन्न होता है । पृथिवी के वाक् - गौ: - यौः तीन मनोता हैं । वाक् अग्नि है । गौ इन्द्र ( मरुत्वानिन्द्र ) है । आदित्य है । तीनों क्रमशः गायत्री - त्रिष्टुप -जगती छन्दो से छन्दित हैं । अष्टाक्षरा गायत्री त्रिपात् सम्बन्ध से चतुर्विंशत्यक्षरा है । एकादशाक्षरा त्रिष्टुप - चतुश्चत्वारिंशदक्षरा ( ४४ ) है । एवं द्वाद-शाक्षरा जगती अष्टाचत्वारिंशदक्षरा ( ४८ ) है । इसप्रकार २४-४४-४८ भेद से पृथिवीपृष्ठ से प्रारम्भ कर वेदपृष्ठ पर्य्यन्त तीन युग्मस्तोम व्याप्त हैं । छन्दः सम्बन्ध से ही इह्न ' छन्दोमा स्तोम ' कहा जाता है । इन का अहर्गहणात्मक स्तोमों से सम्बन्ध नही है, अपितु छन्दोऽक्षरों से सम्बन्ध है । अतवए ' बन्दोमास्तोम ' के निम्नलिखित लक्षण किए जाते हैं-' अस्तोमा वा एते यच्छन्दोमा ' तो ब्रा ० ३।६।३ ) ' तद्यच्छन्दोभिर्मितास्तस्माच्छन्दोमा: ' । ( कौ ० ना ० २६।७ ) ' किं छन्दसश्चन्दोमा इत्येतच्छन्दसो यदेता अक्षरपङ तय इति ब्रूयात् ' ( तां c ० १४/११/५ ) इत्यादि सूर्य्यमयडल के ऊपर पोमय परमेष्ठीमण्डल है । यह सौर रैवतसाम के सम्बन्ध से ' रेवती ' नाम से प्रसिद्ध है । पानी में रहने वाला जो रस भाग है, वही रेवती है । रसरूप रेवती के सम्बन्ध से ही पारमेष्ठ्य आपः रेवती नाम से प्रसिद्ध होजाता है । यह रेवती श्राप: जागत औषधियों से संश्लिष्ट रहता है । ओषधि नाम से प्रसिद्ध सोम यहीं ( परमेष्ठी में ) प्रतिष्ठित है । दस प्रकार के सोमों में से अन्यतम सोम ही ' श्रोषधि ' नाम से प्रसिद्ध | ' चित्रं देवानामुद्गात् ' ( यजुः ] के अनुसार देवप्राण का विकास सूर्य्य में होता है । पारमेष्ठ्य ओषधिसोम सौर देवताओं की अपेक्षा प्रथम है । अतएव इस के लिए श्रुति कहती है-' या ओषधीः पूर्वा जाता देवेभ्यस्त्रियुगं पुरा । - अथर्वसं पारमेष्ट्यलोक इसी सौम्यप्राण के सम्बन्ध से पितृलोक कहलाता है । यही धितत्त्व है । इसी अभिप्राय से - ‘ ओषधिलोको वै पितरः ' ( शत ० १३८ ११ २० ) यह कहा जाता है । जिस भौतिकभाग में यह औषधिसोम प्रतिष्ठित होजाता है, वह भी ओषधि नाम से ही व्यवहृत होता है । ४८ स्तोमावच्छिन्न पारावत-पृष्ट जगतीछन्द से छन्दित है, यह अनुपद में ही बतलाया जाचुका है । इसी स्थान पर पारमेष्ठ्य ओषधि-सोम प्रतिष्ठित है । जगती के सम्बन्ध से ही इस औषधितत्त्व को ' जगत्य ' कहा है । प्रकृति में दोनों का नित्य सम्बन्ध है । उसी सम्बन्ध को प्रकट करने के लिए - ' सं रेवतीर्जगतीभिः ' इत्यादि कहा गया है || २ || यज्ञ का एकमात्र फल है - ऐहलौकिक अभ्युदयभोगपूर्वक स्वर्गप्राप्ति । इस स्वर्गप्राप्ति का एकमात्र साधन है दैवात्मा । यज्ञ के द्वारा नवीन दैवात्मा उत्पन्न किया जाता है । ऋक् - यजुः साम से निष्पन्न ६६७
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द्वितीयाध्याय प्रथम कागड द्वितीयत्राह्मण वालेौर्य - श्रद्गात्र - कर्म्म से कृतरूप त्रयीमूर्ति यज्ञकर्त्ता यजमान के मानुपात्मा ( कम्र्मात्मा भोक्तात्मा ) से नित्य सम्बद्ध रहता हुआ वह यज्ञिय देवात्मा सप्तदश स्थान में प्रतिष्ठित होजाता है । स्थूलशरीर - विमोकानन्तर इसी आकर्षण से नित्य आकर्षित यजमान का मानुषात्मा सप्तदश स्वर्गस्थान में ( जोकि स्वर्गस्थान ' त्रिणाचिकेत ' नामसे प्रसिद्ध है ) प्रतिष्ठित होजाता है । जबतक यज्ञातिशय रहता है, तत्रतक यजमान का कर्मात्मा स्वर्ग में प्रतिष्ठित रहता है । यज्ञातिशय के भुक्त होजाने पर पुनः वह आत्मा " क्षीणे पुण्ये मर्त्यलोके बसन्ति " इस प्राप्त सिद्धान्त के अनुसार मर्त्यभाव को प्राप्त होजाता है | आज वह यजमान उसी दिव्यलोक की प्राप्ति के लिए यज्ञ कर रहा है । तदर्थ इसे यज्ञात्मा उत्पन्न करना है । तदर्थ पुरोडाश सम्पन्न किया जाता है । पुरोडाश ही यज्ञात्मा का उपादान है । परन्तु जबतक इसके साथ पानी का सम्बन्ध नहीं करा दिया जाता, तबतक यह पिष्टद्रव्य कथमपि दैवात्मा का जनक नहीं बन सकता । प्रजननधर्म्म एकमात्र पानी में हीं है । अपतत्व के जाया - धारा- आपः ये तीन प्रधान गुण हैं । वस्तु उत्पन्न करना इसी पानी का काम है । भाव गुण नामसे प्रसिद्ध मानसी सृष्टि के साथ यद्यपि केवल प्राणतत्त्व का ही सम्बन्ध है । परन्तु ' वैकारिकीसृष्टि ' नाम से प्रसिद्ध ' मैथुनीसृष्टि ' का तो प्रथम उपक्रम अप्तत्व ही है ।
सोऽभिध्याय शरीरात् स्वात् सिसृक्षुर्विविधाः प्रजाः ।
अप एव ससर्जादो तासु बीजमगसृजत् ॥
- मनुः श उक्त मानवसिद्धान्त के अनुसार प्राणमय स्वयम्भू प्रजापति को प्रजोत्पत्ति के लिए मैथुनीसृष्टि के मूलस्तम्भभूत तत्त्व को ही सर्वप्रथम उत्पन्न करना पड़ता है । पानी के समन्वय से ही त्रयीमूर्ति स्वयम्भू प्रजापति ' अण्डरूप ' में परिणित होते हैं । इसी अण्ड से सम्पूर्ण प्रजा उत्पन्न होती है । इसी अण्डोत्पत्ति-विज्ञान को लक्ष्य में रखकर वाजिश्र ति कहती है-" सोऽपोऽसृजत वाच एव लोकात् । वागेवास्य सासृज्यत । सेदं सर्वमाप्नोद्यदिदं किश्च । यदा'नोत्तस्मादापः । सोऽकामयत ' आभ्योऽदभ्योऽधि प्रजायेय इति सोऽनया या विद्यया महापः प्राविशत् । तत एडं समवति " । - शत ० ६ | १ | || १० इति पानी तरल द्रव्य है | बिना इसके समन्वय के मत्रमुत मैथुनी सृष्टि की उत्पत्ति असम्भव है । शुक्र-शांति के समन्वय से प्रजोत्पत्ति होती है । परन्तु दोनों में हीं अपतत्त्व प्रतिष्ठित है । दोनों हीं तरल हैं । पतत्त्व के इसी प्रजननधर्म को लक्ष्य में रखकर ब्राह्मगाग्रन्थों में इस तत्त्व को ' जाया ' नाम से व्यवहृत किया है । जिसप्रकार उत्पन्न करना पानी का काम है, तथैव उत्पन्न प्रजा को प्रतिष्ठित रखना भी इसी अप्तत्त्व का काम है । इमीलिए इसे ' धारा ' भी कहा जाता है । सर्वत्र व्याप्त होने से आप तत्त्व सत्रका जनक होने से जाया, एवं सबकी प्रतिष्ठा होने से धारा, नामसे प्रसिद्ध यह तत्त्व ही ' सर्वम् ' है । अप्तत्त्व के इह्रीं धर्म्मो का निरूपण करती हुई गोपथश्रुति करती है -६६८
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द्वितीय अध्याय शतपथब्राह्मण द्वितीयब्राह्मणप्र " स भूयोऽश्राम्यत् भूयोतप्यत भूय आत्मानं समतपत् । तस्य श्रान्तस्य तप्तस्य सन्तप्तस्य सर्वेभ्यो रोमगर्चेभ्यः पृथक् स्वेदधाराः प्रास्यन्दन्त । तदब्रवीत् आभिर्वा अहमिदं सर्वं धारयिष्यामि यदिदं किञ्च, आभिर्वा अहमिदं सर्वं जनविष्यामि यदिदं किञ्च, आभिर्वा अहमिदं सर्वमायामि यदिदं किञ्च । तद्यद्ब्रवीत् श्रामि ० धारा ० इति तस्मात् धारा अभवंस्तद्धाराणां धाररात्त्वं यच्चासु ध्रियते । तद्यदब्रवीत् इदं सर्वं जनयिष्यामि इति तस्माज्जाया अभवंस्तज्जायानां जायात्वं यच्चासु पुरुषो जायते । यच्च पुत्रः पुन्नाम नरकमनेकशततारं तस्मात् त्रातिं पुत्रस्तत्पुत्रस्य पुत्रच्चम् । तद्यदब्रवीत् - आभिर्वा अहमिदं सर्वं स्यामि इति तस्मादापो भवस्तदपामप्त्वम् । श्राप्नोति ह वै सर्वान् कामान् यान् कामयते " । - गो ० ब्रा ० पू ० १ प्र ० २ ब्रा ० इति । उपर्युक्त इसी प्रजननभाव की प्राप्ति के लिए पुरोडाश में पानी मिलाया जाता है । तत्त्व के इसी प्रजननधर्म्मको लक्ष्य में रखकर - ' जनयत्यै त्वा संयोनि ' यह कहा जाता है । परन्तु पानी मिला समय यह ध्यान अवश्य रखना चाहिए कि, इसमें इस मात्रा से ही पानी मिलाया नाय, जिससे परिपाक टीक हो जाय, न तो पानी की कभी से पुरोडाश जले, एवं न पानी की अधिकता से परिपाक में कमी रहे 1 । इसी मात्राभाव को लक्ष्य में रखकर " यथा वाऽधिवृक्तोऽग्नेरधिजायेत एवं वै तत् संयोति " यह कहा गया है || ३ || ४ || प्रत्येक वस्तु की स्वरूपसिद्धि के लिए श्राज्य और पृष्ठ नामसे दो तत्व अपेक्षित हैं । दोनों के समन्वय से ही पदार्थ निष्पन्न होता है । पुरुषमृष्टि को ही लीजिए । पुरुष में आत्मा - पुर दो भाग हैं । ' पुर ' आत्मा का ' शरीर ' है । आत्मा इसी पुर में प्रतिष्ठित रहता हुआ ' पुरुष ' शब्द से व्यवहृत होता है । दोनों के ( आत्मा - पुर ) के समन्वय से अध्यात्मसंस्थान का स्वरूप निष्पन्न होता है । इन दोनों में आत्मा अनस्था है, शरीर अस्थिमत है । सूक्ष्मभाव अनस्था है, स्थूलभाव अनस्था है । प्रारूप सूक्ष्मतत्त्व ही भूतमय स्थूलभाग की प्रतिष्टा है । अनस्था प्रथमज है, अस्थिमत् अनन्तर उत्पन्न होता है । शुक्रशोणित के समन्वित रूप में पहिले अनस्था औपपातिक आत्मा प्रविष्ट होता है । अनन्तर हस्त पाद - उर - आदि अङ्गोषहिता शरीरयष्टि का निर्माण होता है । इसी विज्ञान को लक्ष्य में रखकर श्रुति कहती है--" को ददर्श प्रथमं जायमानमस्थन्वन्तं यदनस्था विभर्त्ति ' इति । इस अनस्थातत्त्व का ही नाम याज्ञिक परिभाषा में आज्य है, एवं अस्थिमन तत्त्व ही ' पृष्ठ ' नाम से प्रसिद्ध है । दोनों के सह सम्बन्ध से ही प्रजोत्पत्ति होती है । प्रकृत में पुरोडाश पृष्ठतत्त्व है, श्राज्य ( घृत ) आज्यतत्त्व है । प्रकृतियज्ञ में दोनों का साथ ही समन्वय होता है । यहाँ नवीन यज्ञात्मा उत्पन्न करना है । यहाँ भी आत्मा - शरीर, दोनों अपेक्षित हैं । यज्ञपुरुष का आधा भाग यहाँ हत्रि है, आधा आज्य है । दोनों के समन्वय के लिए ही दोनों साथ मिलाए जाते हैं । इसी विज्ञानको लक्ष्य में रखकर भगवान् यज्ञबल्क्थ ने कहा है-६६६
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द्वितीयाध्याय प्रथम कागड द्वितीयब्राह्मण " स श्वासावर्द्धा य उ चायमर्द्धस्ता उभावग्निं गमयाव - इति । तस्माद्वा एत--दुभयं सह क्रियते । एवमु हैप आत्मा यज्ञस्य सन्धीयते " ॥५ ॥
पृथिवी दधिस्थान है, अन्तरिक्ष घृतस्थान है, एवं द्युलोक मधुस्थान है ( देखिए शत ० कां ० कुर्मचितित्राह्मण ) । ' तेजो वै घृतम् ' के अनुसार यह घृत साक्षात् श्रग्नि है । वरुण से प्रतिमूर्च्छित अग्नि घृत है, एवं वरुण से प्रतिमूच्छित इन्द्र तैल है । आयप्राण का ही नाम वरुण है । इसके आक्रमण से जब अग्नि का स्वरूप दान्त होजाता है, तो इस अवस्था में ही अग्नि ' घृत ' रूप में परिणत होजाता है । अन्तरिक्षस्थ वायु में यह घृतमात्रा सर्वत्र व्याप्त है । भूमण्डल से निकलने वाले अग्नि का वेग जिस समय बढ़ता है, तो इस सजातीय अग्निमात्रा के सम्बन्ध से ग्रान्तरिक्ष्य ग्रग्निमूर्ति घृत बलवान् बनता हुआ वरुणा– क्रमण से पृथक होता हुआ पिघल पड़ता है । ऐसी अवस्था में यह भूमण्डल पर गिर पड़ता है । यही त्रुष्टि है । ष्टिजल घृत है | अतएव यास्कने उदक को घृत माना है । श्रुतिने तो--‘ कृष्णं नियानं हरयः सुपणां श्रपो वसाना दिवमुत्पतन्ति । त आवृत्रन्त्सदनादृतस्यादिद् घृतेन पृथिवी व्युद्यते ' - ऋक् सं ० १।१६५ सू ० ४७ सं ० इत्यादि रूप से स्पष्ट ही वृष्टिजल को ' घृत ' कहा है । ओर ओर समयों में यद्यपि इस घृत में वरुण की भी प्रधानता रहती है, परन्तु श्राश्विनमास में तो केवल घृत का ही पौर्णमास होता है । आश्विन के दृष्टि-जल में धृत की प्रधानता रहती है । अतएव लोकभाषा में यह किंवदन्ती प्रचलित है कि – ' पानी क्या बरस रहा है, घी बरस रहा है ' । निष्कर्ष यही हुआ । कि, घृत ही अग्निपरिताप से पिघलता हुआ वृष्टि का कारण बनता है । यह नृष्टिजल, किवा घृत जब ओषधि - बनस्पतियों में प्रविष्ट होता है, तो उनमें एक प्रकार की प्रफुल्लता आ जाती है । सब में एकप्रकार की सरसता आ जाती है । यही सरस र ' उर्ज ' है । यही दृष्टि का फल है । आपको यह विश्वास करना चाहिए कि, यह यज्ञकर्ता यजमान जिस घृत की पुरोडाश के साथ अग्नि में आहुति देता है, वह घृत वृष्टिरूप में परिणत होकर इसी यजमान का अन्नाद्य बनता है । क्योंकि ' यावद् वित्तं तावदात्मा ' इस श्रौत सिद्धान्त के अनुसार यह घृत यजमान का श्रात्मांश है । स्वभाग है । इमसे उत्पन्न होने वाला अन्नाद्य इसी यजमान का स्वभागधेय है । इसी वृष्टि, एवं ऊर्क रसविज्ञान को लक्ष्य में रावकर श्रुति कहती है -' इषेत्वेति वृष्ट्य तदाह, यदाह इषेत्वेति, पुनरुद्वासयति ऊर्जेत्वेति । यो दृष्टाद् ग्रसो जायते तस्मै तदाह ' | जबतक आन्तरिक्ष्य धृत के साथ ऊष्मा का सम्बन्ध रहता है, तत्रतक तो वृष्टि होती है, एवं जब ऊष्मा शान्त होजाती है, तो वही दृष्टिरूप में परिणत घृत ' ऊकू ' रूप में परिणत होजाता है । ऊक्-ग्म वृष्टि की उद्वासित अवस्था है । इसलिए – ' पुनरुद्वासयति ऊर्जेत्त्वा ' यह कहा है || ६ || अग्नि में सोम की आहुति देना हीं यज्ञ है । यह सोम -राजा, वाज, ग्रह, हवि, भेद से चार भागों में विभक्त है । राजा सोम से राजसूययज्ञ होता है, वाज से वाजपेययज्ञ होता है, ग्रहपात्रस्थ वल्ली-७००
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द्वितीयअध्याय शतपथब्राह्मण द्वितीयब्राह्मण सोम ही ग्रहसोम है । इससे ज्योतिष्टोमा परपर्थ्यापक ग्रहयज्ञ होता है । एवं अन्नगत सोम हविः सोम है । इससे निष्पन्न होने वाले दर्शपूर्णमासादि - ' हविर्यज्ञ हैं । यह यज्ञ ब्रह्मोदन - प्रवर्ग्य भेद से दो भागों में विभक्त है । जो अन्न आत्मा में अन्तर्य्याम - सम्बन्ध से प्रविष्ट रहता है, वह ब्रह्मोदन है । इसकी हुति कथमपि नहीं हो सकती । एवं श्रात्मसत्ता से विरहित अन्न प्रवर्ग्य है । यही बाहुतिद्रव्य बनता है । चिना प्रवर्ग्य बनाए वह अन्न अन्य की आहुति नहीं बन सकता । इसी प्रवर्ग्यभाव को सूचित करने के लिए प्रकृत में ' धर्मोऽसीति, यज्ञमैवेतनकरोति ( यज्ञान्नमेवैतत् करोति ) ' यह कहा है । देवता श्रमृत हैं । अमृतप्राणदेवता मर्त्य अन्न की आहुति कभी नहीं लेते । यह पुरोडाश सर्वथा मर्त्यभावापन्न है । कारण - इसे कूटा जाता है, पीसा जाता है, अग्नि से परिपक्क किया जाता है । इन दुद्दन्ति क्रियाओं से अन्न का प्रागा निकल जाता है । पुरोडाश निर्जीव होजाता है । अतः ' जीवं व देवानां हविरमृतममृतानाम् ' इस निगम सिद्धान्त के अनुसार तबतक यह पुरोडाश देवताओं के लिए सर्वथा अयोग्य रहता है, जबतक कि इसके साथ श्रायु: समर्पक प्राणतत्व का सम्बन्ध न करा दिया जाय । इसी जीवनसम्पत्ति को प्रतिष्ठित करने के लिए-' विश्वायुः ' कहा गया है || ७ || जत्रतक अन्नरस वृष्टि के रूप में परिणत रहता है, तबतक बनस्पति - रूप में परिणत होकर वही अन्नरस विशाल अन्तरिक्ष के जाता है । पुरोडाश के लिए लाया हुआ वही हविः यज्ञशाला की वह भूमाभाव से युक्त रहता है । श्रोषध, भूमाभाव से च्युत होता हुआ सीमित बन सीमा से और भी अधिक सीमित होजाता है । कूट - पीस कर जब इस अन्न को पुरोडाश - स्वरूप में परिणत कर दिया जाता है, तो यह और भी अधिक सीमित होजाता है । ' यो भूमा - तद्वै - सुखम् यदपं तद्दुःखम् इस लक्षण के अनुसार उत्तरोत्तर भूमाभाव से च्युत होता हुआ अन्नरस अल्पसम्पत्ति से श्राक्रान्त होकर दुःखभाव से युक्त होजाता है । यजमान स्वर्गरूपभूमा सूख की प्राप्ति के लिए ही यज्ञ करना चाहता है । इस भूमासुख की प्राप्ति का अन्यतम साधन यही पुरोडाश है । आज यह सीमित होरहा है । यह ठीक है कि, अग्नि में बहुत होने के अनन्तर यह अग्नि के विशकलन से विशकलित होता हुआ द्युलोकस्य सप्तदशस्तोम पर्यन्त वितत होता हुआ भूमा-भाव से युक्त होजायगा | परन्तु वर्त्तमान में तो यह अल्पता से ही युक्त है । इसी दुःखमूला अल्पता को हटा-कर इस पुरोडाश में भूमाभाव प्रतिष्ठित करने के लिए ही पुरोडाश को फैलाया जाता है । यजमान का वित्तरूप, अतएव स्वात्मरूप पुरोडाश यदि भूमाभाव से युक्त है, तो यजमान का मानुषात्मा, एवं तद्वद्ध यज्ञात्मा भी अवश्य ही भूमाभाव से युक्त है । यजमान इस भूमाभाव से युक्त हो, एकमात्र इसी आशी: प्राप्ति के लिए पुरोडाश का प्रथन किया जाता है । इसी भूमाविज्ञान को लक्ष्य में रखकर श्रुतिने
कहा है-' तं प्रथयति - उरुप्रथा उरुप्रथस्व । उरु ते यज्ञपतिः प्रथताम् ॥ ८ ॥
भूमाभाव की भी सीमा होती है । विश्व में प्रतिष्ठित मनुष्य का अभ्युदय सीमित भूमाभाव पर ही अवलम्बित है । यदि किसी मनुष्य को आत्मा के ( प्रज्ञानात्मा के ) श्रायतन से अधिक भूमाभाव प्राप्त होजाता है, तो विश्वास रखिए, वह कभी जीवित नहीं रह सकता । निस्सीम भूमा विश्व के वाहिर की वस्तु है । वह विश्वाभ्युदय को अभिभूत करने वाली है । यजमान को ऐसी भूमा अपेक्षित नहीं है, जिससे उसका
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द्वितीयश्रध्याय प्रथमखण्ड द्वितीयबाहारण स्वरूप ही उच्छिन्न होजाय । ' विश्व में रहते हुए उसे विश्व के किसी पदार्थ की कमी न रहै ' यही भूमा प्रकृत में अपेक्षित है । जो यथाजात, अतएव ' मनुष्य ' शब्दभाक् व्यक्ति अज्ञानवश अपनी छन्द: -सीमा से ( शक्ति - योग्यतादि के मापदण्ड से ) अधिक भूमाभाव प्राप्त करने का साहस कर बैठते हैं, वे अपने यज्ञात्मा के स्वरूप को ही उछिन्न कर बैठते हैं । मनुष्य अनृतसंहित है । उसका सोचा हुआ कार्य्यं व्यर्थ है, हानिकर है । अत: ऐसे अवसरों पर शास्त्रीय आदेश से ही काम लेना चाहिए । ' हम भी मनुष्य हैं-ईश्वर ने हमें भी बुद्धिबल दिया है, हम स्वयं अपनी भलाई बुराई सोच सकते हैं, शास्त्र भीतो मनुष्यों के ही बनाए हुए हैं, फिर हम क्यों अन्धभक्त बने रहें ' इसप्रकार की अस्मिता में पड़कर जो मूढधी मानुषभाव को प्रधान मानते हुए उन आर्ष आशाओं का तिरस्कार कर देते हैं, वे सचमुच स्वयं तिरस्कृत होते हुए अभ्युदयपथ से एकान्ततः विमुख ही होजाते हैं । इसलिए अनृतसंहित मनुष्य का यह आवश्यक कर्त्तव्य हो जाता है कि, वह सत्यसंहित प्राप्तपुरुषों के द्वारा निर्दिष्ट मार्गरूप शास्त्र के अाधार पर ही अपने कर्त्तव्यकर्त्तव्य का निश्चय करें । इसीमें उनका अभ्युदय, तथा निःश्रेयस् है । इसी आदेश को उद्धृत
कर हुए भगवान् कहते हैं -' यः शास्त्रविधिमुत्सृज्य वर्त्तते कामकारतः ।
न स सिद्धिमवाप्नोति न सुखं न परां गतिम् ॥
तस्माच्छास्त्रं प्रमाणन्ते कार्याकार्यव्यवस्थितौ ।
ज्ञात्वा शास्त्रविधानोक्त ' कर्मकत्त ' मिहार्हसि ' ॥
- गीता 9 यही आदेश प्रकृत से सम्बद्ध है । पुरोडाश का प्रथन मनमाना नहीं कर देना चाहिए । कितने ह्रीं आचार्यों का यह विचार है कि, त्रैलोक्य में विराट् पुरुष व्याप्त है । सुप्रसिद्ध पूर्व परिचित स्तीम्यत्रैलोक्य के त्रिवृत् - पञ्चदश- एकविंश- स्तोमों में व्याप्त वैश्वानर - हिरण्यगर्भ सर्वज्ञ की समष्टि ही विराट् पुरुष है । इस विराट् पुरुष की व्याप्ति पार्थिव त्रैलोक्य में में है । प्राणमयी पृथिवी का वह भाग जो कि सूर्य्य की ओर रहा है, ' अदिति ' नाम से प्रसिद्ध है । यही अदितिमण्डल स्तोम्यत्रैलोक्य की, विराट् पुरुष की प्रतिष्ठा है । इस अदिति-मण्ड़ल में प्रतिष्ठित सौर, एवं पार्थिव प्राण की समष्टि ही ' अश्व ' पशु है । जो सौर प्रारण पृथिवी से स्पृष्ट होकर पृथिबी से टकराता हुआ २१ वें अहर्गण पर्य्यन्त सून्यप्रमुख होता हुआ त्रैलोक्य में व्याप्त रहता है, इसी का नाम ' अश्वपशु ' है । इसी में विराट् पुरुष का अन्तर्भाव है । त्रैलोक्य की सम्पूर्ण कामनाएँ यहीं प्रतिष्ठित हैं । अश्वमूर्ति विराट्पुरुष का एकचतुर्थाश ही हमारे भूपिण्ड में व्याप्त रहता है । “ त्रिपादूर्ध्व उदैत पुरुषः पादोस्येहाभवत्पुन: ' ( यजु: सं ० ) के अनुसार इस विराट्मूर्त्ति अश्वपशु के तीन पाद ऊपर रहते हैं, एक पाट भूपिड पर रहता है । हमारी कामनाओं के लिए एक ही अश्वशफ पर्य्याप्त है । इसी विज्ञान को लक्ष्य में रखकर तित्तिरि आचार्य का कहना है कि, अश्वशफमात्रा से ही पुरोडाश का प्रथन करना चाहिए । बात यद्यपि ठीक है । परन्तु याज्ञवल्क्य का कहना है कि, अश्वशफमात्रा की पूरी इयत्ता हो, तब तो ठीक है । परन्तु ऐसा होना कठिन है । अश्वशफ की ठीक ठीक सीमा प्राप्त करने में भूल होसकती है । ऐसी अवस्था में यज्ञ में अनृतभाव का प्रवेश दुर्निवार है । इसलिए उचित यही है कि, किसी नियत सीमाभाव के बन्धन ७.२
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द्वितीयश्रध्याय शतपथब्राह्मगा द्वितीयब्राह्मण में न पड़कर आत्मानुकूल ही प्रथन करना चाहिए । ऐसा करने से भूमाभाव की भी प्राप्ति होजाती है, एवं अनृतभाव का प्रवेश भी नहीं होता । इसी विज्ञान को लक्ष्य में रखकर - ' यावन्तमेत्र स्वयं मनसा न सत्रा पृथु मन्येत - एवं कुयात् ' यह कहा गया हैं ॥ ६. । १० | ११ | १२ | १३ | १४ | १५ | १६ | १७ | १८ | इति प्रथमकाण्डान्तर्गत- द्वितीयाध्याय के द्वितीय ब्राह्मण का, एवं प्रथमप्रपाठक के छठे ब्राह्मण का ' भाष्य ' अत्र उपरत प्रथम प्रपाठक समाप्त ७०३
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श्रीः थ - प्रथमकाण्डे द्वितीयाध्याये तृतीयं ब्राह्मणम् द्वितीयप्रपाठके च प्रथमं ब्राह्मणम् १२ - पात्रीनिर्णेजनम् – पुरोडाशमीमांसा - समन्वितम् - म ( मूल ) - चतुर्धा विहितो हवा अग्रेऽग्निरास । स यमग्रे ऽग्निं होत्राय स प्र प्रावृणत वाघन्वत् । प्राधन्वत् । यं द्वितीयं प्रावृणत - स प्रवाधन्वत् । यं तृतीयं प्रावृणत सहसेवा-अथ योऽयमेतद्यग्निः -म भीषा निलिन्ये । सोऽपः प्रविवेश । तं देवा अनुविद्य , याभ्यो वो दभ्य आनिन्युः । मो s पोऽभितिष्ठेव अवष्ठयता स्थ-- या अप्रपदनं ॥ स्थ मामकामं नयन्तीति । तत आप्त्याः सम्प्रभृवुः त्रितो, द्वित, एकतः ॥ १ त इन्द्र ेण सह चेरुः -- यथेदं ब्राह्मणो राजानमनुचरति । स यत्र एव त्रिशीर्षाणं जघान । त्वाष्ट्र त्यह विश्वरूपं जघान - तम्य हैतेऽपि वध्यस्य विदाञ्चकुः । शश्वद्धनं त्रित
तदिन्द्रोऽमुच्यत । देवो हि सः ॥ २ ॥
। यज्ञ त उ त ऊचुः -- उपैवेभ एनो गच्छन्तु येऽस्य वध्यस्यावेदिपुरिति । किमिति यदेभ्यः पात्री निर्णेजनमङ्ग लिप्रजनं निन-वैषु मृष्टामिति । तदेवैतद्यज्ञा मृष्ट -यन्ति ॥ ३ ॥
एवादक्षि-त उ हाप्त्या ऊचुः -- अत्येव वयमिदमस्मत्परो नयामति । कमभीति । ह य यज्ञो मृष्ट । न हविषा जाता इति । तस्मान्नादक्षिणेन हविषा यजेत् ॥४ ॥ । श्राप्त्येषु
त्या उ ह तम्मिन मृजते - योऽदक्षिणेन हविषा यजते ततो देवा एतां दर्शपूर्णमासो दक्षिणामकल्पयन् - यदन्वाहार्यम् । नेददक्षिणं भवति हवि-- । रमदिति । तन्नाना निनयति । तथैभ्येाऽसमदं करोति । तदभितपति -- तथैषां शृतं ७०४