Shatpath Brahman 1 2 — पृष्ठ 831–840

शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - १-२ - मोतीलाल शास्त्री · पृष्ठ 831–840

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तृतीयध्याय तृतीय- चतुर्थ - त्राह्मण शतपथब्राह्मगा तिर्यगूरूप से प्रतिष्ठित करने का एक दूसरा यह भी कारण है कि ) वेदि पर प्रतिष्ठित प्रस्तर ( निदानेन ) तत्र ( शास्ता राजा ) है, एवं बिछी हुई इतर बाई ( निदानेन ) विट् ( शासित -प्रजा ) है । इस प्रस्तररूप तत्र तथा हि - रूप विट् दोनों की प्रतिष्ठा के लिए ही ( दोनों की स्वरूपरक्षा के लिए, पारस्परिक सम्बन्ध के लिये ही तिर्य्यक स्थापन उचित है ) । इसलिये इन्हें तिरूप से ही प्रतिष्ठित करता है । इस ( विधरणकर्म के सम्बन्ध ) से ही इन तृणों को ( यज्ञविज्ञान - परिभाषा में ) ' विधृती ' नाम से व्यवहृत किया गया है ॥ १८ ॥

८ - विधृती के ऊपर प्रस्तर को फैलाना-( वेदस्थित वस्तिर के ऊपर पश्चिम भाग में प्रतिष्ठित किये गए उन दोनों ' वि ' नामक दुर्भतृणों पर ) वह अध्वर्यु - " ऊम्रद सं त्वा स्तृणामि स्वासस्य देवेभ्यः ” ( यजुः सं ० २४ - देवताओं के लिए सुखपूर्वक बैठने योग्य ऊर्णसूत्र मे निम्मित कमलवन मृदुपण, ऐसे आपको प्रस्तरको चिज्ञाता हूँ ) यह मन्त्र बोलता हुआ ( उस दर्भमुषिलक्षण ) प्रस्तर को फैलाता है | ' आप देवताओं के लिये साधु - मृदुस्पर्श हैं ' यही कहा गया है, जोकि ' ऊर्णम्रट्सं-त्वा ' यह कहा गया है । ' स्वास्थं देभ्यः ' इस मन्त्रभाग से ' आप देवताओं के लिये अच्छी " बैठक हैं ' यही कहा गया है ॥ ११ ॥

दोनों हाथों में प्रस्तर का स्पर्श करना मन्त्रपूर्वक प्रस्तर- स्तरणानन्तर वह अध्वर्यु - - " " या त्या वसवो रुद्रा आदित्याः सदन्तु " ( यजुः ००५ सनत्रयाधिष्ठाता वसु - रुद्र आदित्य देवता आपको प्रस्तर को - देवप्रतिष्ठा के लिए. सन और फैलावे ) यह मन्त्र बोलता हुआ स्तीर्ण प्रस्तर पर अपने दोनों हाथ रखता हैं ॥ १६ ॥

१० - प्रस्तर का बाएँ हाथ से स्पर्श किए हुए स्रुचों का दहिने हाथ से ग्रहण, तथा प्रस्तर पर स्थापन-वह अध्वर्यु ' प्रस्तर के साथ अपने वामहस्त का सम्बन्ध बनाए हुए ही रखता है ( हुआ ) || १२ || दहिने हाथ से जुहू का ग्रहण करता है । नाम्रा - राक्षसगण ( दोनों के मध्य में ) पहिले ( त्राह्मणशरीर के नाम्रा - राक्षम नाशक दिव्यप्राण के सम्बन्ध होने से पहिले ) प्रधि न होजांय, ( इस उद्देश्य से ही प्रस्तर के साथ हस्त - सम्बन्ध बनाए रखते हुए ही जुहू ग्रहण करना है ) । ब्राह्मण निश्चयेन राक्षमों का नाशक है । इसीलिए ( करस्पर्श के द्वारा अविच्छिन्नरूप से दिव्य-शक्ति का प्रवेश सुरक्षित रखने के लिए ) सव्य हाथ से स्पर्श बनाए रखता है || १३ || अनन्तर ही - " घृताच्यसि जुहूर्नाम्ना " ( यजुः स ० शी हे जुहू! आप ( स्वरूप में तो ] तसे परिपूर्ण हैं, एवं नाम से जुड़ ( आहुति देने वाली ) हैं, ' यह मन्त्र बोलता हुआ दक्षिण १०६८

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तृतीययाय रातीय- चतुथ ब्राह्मण प्रथमकाण्ड हाथ से आग्नीध्र के द्वारा समर्पित ) जुहू का ग्रहण करता है । निश्चयेन जुहू ( घृत प्राप्ति के कारण ) ' घृताची ' है, साथ ही यह नाम से निश्चयेन ' जुड़ ' ( आहुति देने वाली ) है । ( ग्रहणानन्तर बह अध्वर्यु ) - " सेदं प्रियेण धाम्ना प्रियं सद आसीद ' [ यजुः सं ] ० ६ | | ऐसी आप अपने प्रिय धामरूप आाज्य के साथ इस प्रस्तर पर विराजिए, यह मन्त्र बोलता हुआ इस जुहू को वेदि-स्थित प्रस्तर पर रख देता है । इसके अनन्तर वह अध्वर्यु ' घृताच्यस्युपभृन्नाम्ना [ यजुः सं ० शुई । हे उपभृत् आप व्रताची हैं, नाम से जुहू के उप - समोद का श्राज्य लेने से उपभृत हैं ) यह मन्त्र बोलता हुआ उपभृत का ग्रहण करता है । यह सचमुच ' घृताची ' है, एवं सचमुच नाम से ' उत्कृत् ' है । अनन्तर " सेड़ प्रियेण धाम्ना प्रियं सद् आसीद " ( यजुः सं ० २। ६ ) यह मन्त्र बोलता हुआ इसे प्रस्तर पर रख देता है । उपभृग्रहण - स्थापनानन्तर वह अध्वर्यु --' घृताच्यसि धृवा नास्ना " ( यजु सं ० २६ - हे ध्रुवा! धाप घृताची हैं, एवं आत्मरूप से एक स्थान पर प्रतिष्ठित रहने के कारण लोक में यथार्थतः ' धुवा ' नाम से प्रसिद्ध हैं ) यह मन्त्र बोलता हुआ धुत्रा का ग्रहण करता है । अनन्तर- " सेदं प्रियेण धाम्ना प्रियंसद आसीद ' ( यजुः सं ० २।६ ) यह बोलता हुआ इसे प्रस्तर पर रखता है । ( इसप्रकार वाम - हाथ से प्रस्तर से सन्बन्ध बनाए रखना हुआ अध्वर्यु क्रमशः आग्नीध से अपने दाहिने हाथ में जुहू - उपभृत-बा लेता जाता है, और वेदि के पश्चिम भाग में बिछे हुए प्रस्तरासन पर उन्हें रखता जाता है ) । इन तीनों से अतिरिक्त जो पुरोडाशादि विद्रव्य हैं, उह्न भो " मेदं नियेधानाप्रियं सद आसीद " यही मन्त्र बोलता हुआ प्रस्तर पर रखता है - ( यदन्यङः ) ॥ १४ ॥

[ त्रों के सादनकर्म में विशेषता बतलाती हुई श्रुति कहती है ] - वह अध्वर्यु प्रस्तर के ऊपर तो जुहू रखता है, एवं अन्य [ उपभृत - ध्रुवा ] स्रुचों को प्रस्तर से नीचे वर्हि पर रखता है । कारण यहीं है कि [ निदानेन ] जुहू क्षत्र है, एवं अन्य स्रुक् बिट् हैं । जुहरूप ] क्षेत्र को ऊपर, तथा उपभृत् - धुत्रारूप बिट को नीचे रखता हुआ [ ] अध्वर्यु क्षेत्र को ही बिट् से ऊँचा बैठने वाला बनाता है । अतएव ऊँचे आसन पर विराजमान क्षत्रिय राजा की नीचे से खड़े-खड़े प्रजा उपासना किया करती है । इसी प्राकृतिक नियमानुसार जुहू को प्रस्तर के ऊपर रखना है, एवं अन्य चों का नीचे [ रखता है ] ॥ १५ ॥

११- स्पर्शक [ अनन्तर वह अध्य- " ध्रुवा असदन्नृतस्य योनौ ना बिप्लां पाहि पाहि यश, पाहि यज्ञपतिम् " ( यजुः सं ० २२६ यज्ञ को योनिरूप, कम्मसमाति पय्यन्त निश्चत रूप से प्रतिष्ठित रहने वाले जो हरिद्रव्यादि यहाँ प्रतिटित हुए हैं, हे विष्णों! आप उनकी रक्षा करें, पां बज्ञपत्ति यजमान की रक्षा करें " यह मन्त्र बोलता हुआ आज्यस्थालीस्थ आाज्य का जुह्वादिस्थित का एवं पुरोडाश आदि का उपयोगक्रम से स्पर्श करता है । इमी कर्म का मन्त्र - खण्डरूप से प्रति-पादन करती हुई श्रुति कहती है ] -१०६६

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तृतीय अध्याय तृतीय- चतुर्थ ब्राह्मण शतपथब्राह्मण " वा सदन " यह मन्त्र बोलता हुआ आज्यादिका स्पर्श करता है । बे द्रव्य कति पर्यन्त निश्चलरूप से ही प्रतिष्ठित है । ( मन्त्र का अगला भाग है ) - ' ऋतस्य बोनी " यह । यज्ञ हो ॠ को योनि है । यज्ञ पर हो ये जुह्वादि प्रतिष्ठित हैं । ( मन्त्र का अगता भाग है ) - " पाहि पाहि यज्ञं पाहि यज्ञरतिम् " यह । इस से ( यज्ञरता के साथ ही ) बज--मानरक्षा के लिए प्रार्थना की गई है । अनन्तर- " पाहि मा यज्ञन्यन " ( यजुः सं २२६ । यज्ञकर्म को अग्रगामी बनाने वाले मुझ - ऋत्विक् की भी रक्षा करें ) यह मन्त्र बोलता हुआ अध्वर्यु स्वयं अपने शरीर का स्पर्श करता है । इस कर्म से यह अपने आप को भी यज्ञ से बाहिर नहीं करना है । विष्णु को ही यज्ञ कहते हैं । यज्ञ की रक्षा में हीं रक्षार्थ ( इस स्पर्शकर्म से ) सब को प्रतिष्ठित करता । इसी अभि प्राय से - ' हे विष्णो! आप रक्षा करें! ' यह कहा गया है ॥ १६ ॥

प्रथमकाण्डानुगत- तीसरे अध्याय का चौथा ब्राह्मण एवं तीसरे प्रपाठक का पहिला ब्राह्मण उपरत “ परिधि - ब्राह्मण ” समाप्त द्विवाह्मणात्मक - इध्म - परिधि ब्राह्मण - उपरत इति - मूलानुवादः सूत्रप्रदर्शित - पद्धतिसंग्रहः-* १ - इध्म - वेदि - बर्हिषां प्रोक्षणम् आज्यग्रहण के अनन्तर वेदिमध्य से आज्यस्थाली लेकर उसे किसी सुरक्षित स्थान में रख दिया जाता है । अनन्तर अग्निसमिन्धन के लिए यज्ञसंस्था में गृहीत रज्जु से बँधे हुए इध्मभार ( काभार ) की अन्थि खोलता है । ग्रन्थि खोलने के अनन्तर प्रोक्षणकर्म के लिए ब्रह्मा से -" ब्रह्मन्! इध्मं प्रांनिष्यामि " इन शब्दों में आज्ञा माँगता है । ब्रह्मा - " ओ प्रांत यश, देवता वर्धय त्वं नाकस्य पृष्ठे यजमानोऽस्तु । सम ऋषीणां सुकृतां यत्र जोकस्तत्रमं यज्ञ यजमानं व येहि " ( का ००२ ) यह चुपचाप बोलता हुआ - " प्रोत " इन शब्दों में प्रोक्षणकर्म की आज्ञा देता है । इसी अकृत प्रोक्षणकर्म की इतिकर्त्तव्यता बतलाते हुए सूत्रकार कहते हैं-" इध्मं प्रोक्षति विस्रस्य वेदिं च बहिः प्रतिगृह्य वेद्यां कृत्वा पुरस्तादग्रन्थि -" कृष्णोऽमि इति प्रतिमन्त्रम् " ( का ० श्र ० सु ० २ | ७ | १६ ) । ११००

पृष्ठ 834

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तृतीय अध्याय तृतीय- चतुर्थ ब्राह्मण प्रथमकारा स्वस्थान पर प्रतित उध्म की ग्रन्थि खोलकर - " श्री कृष्णां स्याखरष्ठोऽनये त्वा जुष्ठ प्रोज्ञामि " यह मन्त्र बोलता हुआ अध्वर्यु इष्म का ( प्रणीता - पात्रस्थ प्रणीताजल से कुशा के ( द्वारा ) प्रोक्षण करता है । इध्मप्रोक्षणानन्तर- " ओं वेदिसहिये त्या जुष्टं प्रोतामि " यह मन्त्र बोलता हुआ । वेदि का प्रोक्षण करता है । वेदि - प्रोक्षणानन्तर आग्नीध नामक ऋत्त्विक् से सोंपे गए ' बहि ' नामक कुशों को लेकर इले वेदि के ऊपर ( बर्हिग्रन्थि को पूर्व की ओर रखता हुआ ) रखकर प्रोक्षणकर्म के लिए ब्रह्मा से - " ब्रह्मन्! बहिः प्रांतिष्यामि " इन शब्दों में आज्ञा माँगता है । ब्रह्मा - " प्रोक्ष यज्ञ देवता वर्धय त्वं " इत्यादि मन्त्रपाठानन्तर " श्रों प्रोक्ष " इन शब्दों में आज्ञा देता है । इस मन्त्र से अनुज्ञात अध्वर्यु " ओं बर्हिरति गुस्यस्त्वा जुष्टं प्राक्षामि " यह चोलता हुआ वेदिस्थ बर्हि का प्रोक्षण करता है । अग्नि के अभाव में अवभृथेषि में तथा परि-श्रितकर्म में इध्म का प्रोक्षण नहीं होता । एवं गृहमेधीयकर्म में ( का श्रीसु ० ५/६ ६२५ ) क्योंकि बर्हिस्तरण नहीं होता, अतः वहाँ वेदि का प्रोक्षण नहीं होता । प्रोक्षणकर्म्म के सम्बन्ध में यह प्रासङ्गिकी विशेषत । समझनी चाहिए । -: *: -२- प्रोक्षणी - शेषेण हि लोपसेचनम प्रोक्षणकर्म्म के अनन्तर वह अध्वर्यु प्रोक्षणीपात्र में बाकी बचे हुए जल को " ओं आदि-त्यैन्दनमति " यह मन्त्र बोलता हुआ कुशा के मूल भाग में डाल देता है । यही बतलाते हुए मुत्रकार कहते हैं-" शेषं मूलेषूपसिञ्चति - " अदित्यैव्युन्दन " मिति " ( का • श्र ० सु ०२ / ७ / १७ ) ३ - पवित्रे प्रणीतासु निधाय बर्हिषः पुरस्तात् प्रस्तरग्रहणम् मूलोप सिञ्चनकर्म्म के अनन्तर अपने हाथ से प्रणीता - पात्रस्थ जलों में दो दर्भतृण रखता है । अनन्तर वेदि पर स्थित बर्हि की गाँठ पृथक करता है । अनन्तर बर्हि के पूर्वभाग से कुशमुषि का ग्रहण करता है, जो कि कुशमुष्टि ' प्रस्तर ' नाम से व्यवहृत हुई है । बर्हिपुलक से प्रस्तर नामक कुश के ग्रहण के लिए ही क्योंकि यों " विष्णो स्तुपोऽसि " यह मन्त्र विहित है, जहाँ पितृयज्ञ में प्रस्तर का बर्हि से पृथक करण नहीं होता, वहाँ - " प्रस्तर उपसन्नद्धः " ( का ० श्र ० ५।२।२७ ) इस सिद्धान्त के अनुसार पहिले से बद्ध प्रस्तर का ही ग्रहण होजाता है । फलतः पितृ-में प्रस्तरग्रह एकाल में मन्त्र - प्रयोग नहीं होता । प्रस्तरग्रहण की इसी इतिकर्तव्यता का स्पष्टी-करण करते हुए सूत्रकार कहते हैं-" पवित्रे निधाय प्रणीतासु, बहिर्विस स्य, पुरस्तात् - प्रस्तरग्रहणं - " विष्णा " रिति " ( का ० श्री ० ० २ | ७ | १ = ) । ----

पृष्ठ 835

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तृतीयअध्याय ४ - वेद्यां बर्हिपा त्रिवृत स्तरणम तृतीय- चतुर्थ ब्राह्मण शतपथब्राह्मण प्रस्तरग्रहण के अनन्तर वह अब स्वहस्त में गृहीत प्रस्तर ब्रह्मा को सौंप देता है । वैदिस्थित बर्हिक की बन्धनरज्जु को बाद की दाहिनी श्रोणि पर उसे रखकर अन्य वर्हि - तृणों से ढाँक देना है । अनन्तर- " ओं ऊणदमं त्वा स्तृणानि स्वास्थं देवेभ्यः " यह मन्त्र बोलता हुआ वेदि पर तीन बार करके प्रागय कुश विधाता है । यही त्रिवृत स्तरणकर्म्म कहलाता है, जैसा कि सूत्रकार कहते हैं-" ब्रह्मण प्रदाय, सन्नहनं चित्रस्य, दक्षिणस्यां वेदि स्तृणाति — “ ऊर्णग्रदस " मिति त्रिवृत् " वेदिश्रो निद्राय, अरवच्छाद्य का ० श्री ० म्रु ० २ | ७ | १६ ) । अथवा त्रिवृत स्तरण न कर जितने तृणों से वेदि इसप्रकार ढँक जाय, जिससे वेदि का मृण्मय प्रदेश न दिखाई पड़े, ऐसे घनरूप से स्तरणकर्म करना चाहिये । इसी पक्षान्तर को उद्धृत करते हुए सूत्रकार कहते हैं -" उपपत्या वा बहुलम " का ० ० ० २/७/२० स्तरण के सम्बन्ध में यह विशेषता है कि, बर्हि के मूलभाग अधः रहने चाहिएँ । कहा गया है कि, तीन कुशमुप्रियाँ बिछाई जातीं हैं । पहिले जो मुडि बिछाई जाती है, उसके मूलभागों को दूसरी मुटि के अग्रभागों से, तथा दूसरी के मूलभागों को तीसरी मुटि के अग्रभागों से आच्छादित कर देना चाहिए । इसप्रकार अवरमूलपद्धति स्तरणकर्म करना चाहिए । इस विशेषता के अतिरिक्त ' पश्चादपवर्ग ' रूप से दूसरा विशेषता और होती है । वैदि के पूर्वभाग से तो स्तरणकर्म का आरम्भ होना चाहिए, एवं पश्चिम भाग में अवसान करना चाहिए । यही पश्चादप-वर्गस्तणात्मक एक पक्ष है । अथवा प्रागपवर्ग - रूप से भी आच्छादन किया जासकता है । इस पक्ष में पूर्व - पूर्वस्तृत वर्हि के अग्रभागों से पश्चात स्वीर्य्यमारण बर्हि के मूलभागों का आच्छादन करना चाहिए । स्तरणकर्मानुगत इहीं तीनों विशेषभाव का स्पष्टीकरण करते हुए सूत्रकार करते हैं-" अधरमूलम् ” - “ पश्चादपवर्गम् " " प्रवृहं वा " ( का ० श्री ० मु ०२ | ७ | २१,२२,२३ ) ५- आहवनीयकल्पनात पूर्व हविपामुद्रासनम विःपरिपाक के सम्बन्ध में दो पक्ष माने गए हैं । गहिपत्याग्नि में इविःपरिपाक करना -एक पक्ष है । एवं इवनीयाग्नि में परिपाक करना- एक पक्ष है । जो वनीय- परिपाक का अनु-गामी है, उस यजमान के यज्ञ में इस स्तर कर्म के अनन्तर ' हविरुद्धासन ' कर्म होना चाहिए । स्तर कर्म के अनन्तर ही इध्मादि से अग्नि को प्रबल बनाया जाने वाला है । यदि इस कर्म के

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तृतीयध्याय तृतीय- चतुर्थ ब्राह्मण प्रथमकाण्ड पीछे उद्वासनकर्म किया जायगा, तो हविद्रव्य के जलने का भय रहेगा । अतः अग्नि - प्रबलृप्ति ( ज्वलन ) से पूर्व ही उद्वासन कर लेना उचित है । जो गार्हपत्यपक्ष का अनुगामी है, वह उद्वासन कब करे?, इसका निर्णय आगे ( का ० २८ १४ ) होने वाला है । आहवनीयश्रापी यजमान के यज्ञ में इसी उद्वासनकर्म का सम्बन्ध बतलाते हुए सूत्रकार कहते हैं-' अत्रोद्वासनमाहवनीयश्रापिणः ” ( का ० श्र ० सू ० २ | ७ | २४ ) —— * --६- समित् - प्रक्षेपेणाहवनीयस्य समर्थीकरणम् हविरुद्रासन - कर्म्म के अनन्तर वह अध्वर्यु इध्मभार में से एक समिश्र लेकर, तथा ब्रह्मा से प्रस्तर लेकर आह्वनीयाग्निकुण्ड के ऊपर समीप से प्रस्तर अपने हाथ में रखता हुआ उस समिध के आघात से आहवनीयकुण्ड में प्रतिष्ठित काष्ठादि का भस्म अलग कर अग्नि को प्रचल बनाता है । इध्म से होने वाला यह समर्थनकर्म्म क्योंकि अग्नि से ही सम्बन्ध रखता है, न कि अप से, तथा परिश्रित से अत्र अप में, और परिश्रितों में यह कर्म नहीं होता है । इसी समर्थन कर्म का स्पष्टीकरण करते हुए सूत्रकार कहते हैं-" इध्मान समिधमादायाहवनीयं कल्पयति, उपर्युपरि प्रस्तर ' धारयन् " ( का ० श्र ० सू ० २ । ७ । २ ५। ) । ७- अनुयाजार्थमुन्मुकयो राहवनीया निष्काशनम् अग्निसमर्थीकरण के अनन्तर प्रज्ज्वलित अग्नि में से दो उल्मुक लिए जाते हैं । छन्दो-देवता से सम्बन्ध रखने वाला अनुयाजकर्म्म वैकल्पिक माना गया है । यदि अनुयाजकर्म्म संगृ-होत है, तो उसी दशा में अनुयाज के लिए दो उल्मुक श्राहवनीय से पृथक् निकाल लिए जाते हैं । जब अनुयाजकर्म का समय आता है, तब पुनः उन ( अन्यत्र स्थापित ) उल्मुकों को आह--चनी में डालकर अनुयाजकर्म किया जाता है । क्योंकि आतिथ्येष्टि में ( का ० श्र ० ८ ११ के अनुसार ), तथा गृहमेधीयादि में ( का ० श्र ० ५/६ / ६ / २ / ५ के अनुसार ) अनुयाजकर्म्म का अभाव वहाँ उल्मुक निष्काशन भी नहीं होता । इति - कानीय श्रौतसूत्रे - द्वितीयाध्याये सप्तमी कण्डिका समाप्ता ११०३

पृष्ठ 837

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तृतीयाध्याय तृतीय- चतुथ ब्राह्मण शतपथब्राह्मण ८ - आहवनीयस्य पश्चिमे दक्षिणे, उत्तरे, क्रमेण परिधिपरिधानम् उल्मुकनिष्काशन - कर्म के अनन्तर वह अ क्रमशः " - गन्धर्वस्त्वा विश्वावसु:: " " - इन्द्रस्य बाहुरमि दक्षिणो ० " - " - मित्रावरुणौ त्वा ० - इन मन्त्रों का उच्चारण करना हुआ, ( ब्राह्मणग्रन्थों में परिगणित पलाशादि किसी ) एक यज्ञिय वृक्ष से निम्मित, परिमाण में बाहुमात्र, स्वरूप में गोली, जातितः पालाशः - वैकङ्कन - कार्ष्म- चैत्र में से पूर्व पूर्व की न निलने मिलने पर उत्तर को, अथवा खादिर- औदुम्बर की तीन परिधियाँ आहवनीयकुण्ड के मध्यम ( पश्चिम ), दक्षिण, उत्तर प्रान्तभागों में क्रमशः प्रतिष्ठित करता है । इसी क्रमिक परिधानकर्म का स्पीकरण करते हुए सूत्रकार कहते हैं-" परिधीन् परिदधाति आर्द्रान् एकवृतीयान् बाहुमात्रानू, पालाशयैकङ्कत - कार्य-वैन्वान्, पूर्वालाभे उत्तरान् खादिरौदुम्बराना, मध्यम - दक्षिणोत्तर।न् -- ‘ गन्धर्व ० ' इति प्रतिमन्त्रम् " ( का ० श्री ० सू ० २।१।१ ) । - * -६ - आहवनीयाग्नौ समिधाधानम् — परिधि - परवानक के अनन्तर वह अब अग्निकल्पार्थ पहिले से गृहीत समिधा का पहिले रखी हुई मध्यम परिधि के साथ स्पर्श कराके खड़ा होकर – बीतिहोत्रम ० " यह मन्त्र बोलता हुआ उस समिधा को आहवनीयाग्नि में डालता है । दूसरी समिधा को परिधि से बिना स्पर्श करा ही “ समिदसि " यह मन्त्र बोलना हुआ आहवनीय में डालता है । उह्नीं दोनों प्रक्षेष - कर्मो का स्पष्टीकरण करते हुए सूत्रकार कहते हैं-" प्रथमं परिधिं समिधोपस्दृश्य " वीतिहोत्र " मित्यादधाति " । अनुपस्पृश्य द्वितीयां " सांमदसी " ति ' ( का ० श्री ० सू ० २ / १ / २,३ ) । १० आहवनीयेक्षणपूर्वकं मन्त्रस्मरणम् समिधाधान - कर्म के अनन्तर वह अध्वर्यु आहवनीय अग्नि की ओर देखता हुआ " सूर्यस्त्वा पुराना कस्याश्चिदभिशप्त्यै " इस मन्त्र का संहितापठित स्वरसंधानपूर्वक उच्चारण करता है । इसी कर्म का दिग्दर्शन कराते हुए सूत्रकार कहते हैं- -" सूर्यस्त्वे " ति जयति, आहवनीयमीक्षमाणस्तद्वचनात् " । ( का ० श्र ० सू ० २२८१४ ) । ११०४

पृष्ठ 838

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तृतीय अध्याय तृतीय - चतुर्थ - ब्राह्मण ११ – उद्गग्रयोर्विधृत्योर्वेद्यां निधानम् प्रथमकाण्ड मन्त्रस्मरण - कर्म्म के अनन्तर वह अध्वर्यु पुनः वेदि की ओर लौट आता है । वहाँ आकार वेदि पर बिछे हुए बर्हि के ऊपर दो पवित्र ( दर्भतृण ) उत्तराम तिर्य्यग्रूप से — " ओं-सवितुर्बाहूस्थ: " यह मन्त्र बोलता हुआ रखता है । ये दर्भत ही " विधृति " नाम से प्रसिद्ध हैं । निम्न लिखित सूत्र से इसी कर्म का स्पष्टीकरण होरहा है-" श्रावृत्य वेदिं तिरश्ची निदधाति - " सवितु " रिति " ( का ० श्रौ ० सू ० २५ | ) | इन दर्भतृणों के सम्बन्ध में एक जिज्ञासा शेष रह जाती है । वह यही कि, जिन दो तृणों का निधन हुआ है, वे इस वेदि पर बिछे बर्हि में से ही लिए जायँ अथवा अन्य दर्भतृण लिए जाँय? | इस जिज्ञासा का समाधान करते हुए सूत्रकार कहते हैं-“ अन्ये वाऽयुक्तत्वात् " ( का ० श्रौ ० सृ ० २२८ | ६ ) । इस निधानकर्म के लिए दूसरे ही तृण लेने चाहिएँ । क्योंकि वेदि सम्बन्धी - वर्हितृणों में से इन दोनों का ग्रहण बिहित नहीं हैं । वेदि - तृणों का केवल स्तरणकर्म में हीं विनियोग त्रिहित है । अतः अन्य तृरण ही रखने चाहिएँ । अन्यत्र भी पवित्र पशूपाकरण - प्रहोपस्पर्श - अग्निमन्थ-नादि में जहाँ तृण - निधान विहित है, सर्वत्र अन्य तृण ही लेने चाहिएँ । यही प्रासङ्गिक व्यवस्था बतलाते हुए सूत्रकार कहते हैं-" अन्यत्रापि तृणार्थे " ( का ० औ ० सू ० २८७ ) । क्योंकि तृणनिधान - प्रसङ्ग से अन्य स्थलों की चर्चा चल पड़ी । अतएव इस प्रसङ्गदृषि से आज्य के मम्बन्ध में भी विनियोग - मर्यादा का स्पष्टीकरण कर दिया जाता है । आज्य में एक " पाञ्जन " कर्म होता है । यज्ञिय ग्रूप के चारों ओर घृत का सम्बन्ध कराना हीं यूपाञ्जनक है । प्रश्न होता है कि, जिस आज्यस्थाली में प्रयाजनुयाजादि के लिए आज्य लिया जाता है, इस यूपाञ्जन - कर्म्म के लिए भी इसी में से लिया जाता है, अथवा इसकेलिए अन्य आय का ग्रहण होता है?, सूत्रकार उत्तर देते हैं-" यूपाञ्जने च सर्पिः " ( का ० श्रौ ० सू ० २८ | = ) । यूपाञ्जन - साधक घृत अन्य ( लौकिक ) ही लेना चाहिए । आज्यस्थाली का आज्य इस कर्म नियुक्त नहीं है । ज्योतिषोमयज्ञ में पुरोडाश का इन्द्र - वायु के लिए, पयस्या का मित्रा बरुण के लिए, तथा धान का अश्विनीकुमारों के लिए प्रक्षेप होता है । इसप्रकार प्रक्षेप कर्म के लिए अपेक्षित १ ९ ०५

पृष्ठ 839

शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - १-२ - मोतीलाल शास्त्री, पृष्ठ 839 का मूल पृष्ठ
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तृतीयअध्याय तृतीय- चतुथ ब्राह्म शतपथब्राह्मण पुरोडाशादि प्राकृत लिए जायँ, अथवा लौकिक? इस सम्बन्ध में ऐच्छिक व्यवस्था बतलाते हुए सूत्रकार कहते हैं -" पुरोडाश - पयस्या - धानासु चेच्छन् " ( का ० श्र ० सू ० २।८।६ ) । १२ - विधृत्योरुपरि प्रस्तरस्तरणं, पाणिद्वयेन तदभिमशनञ्च वेदि के ऊपर विवृति - स्थापन - कर्म के अनन्तर वह अध्वर्यु उन तिर्यरूप से उद्गग्र प्रतिष्ठित दर्भ - तृणों के ऊपर - " दमं त्वा स्तृणामि स्वास्थं देवेभ्यः ” यह मन्त्र बोलता हुआ प्रस्तर ( एन्नामक दर्भमुखि ) विद्वाता है । प्रस्तर बिछाने के अनन्तर वह अध्वर्यु ' – " ओ-आत्या वसवो रुद्रा आदित्याः सदन्तु " यह मन्त्र वोलता हुआ अपने दोनों हाथों से वेदि पर फैलाए गए उस प्रस्तर को दबाता है । इह्रीं स्तरण - अभिमर्शन - कम्मों का स्पष्टीकरण करते हुए सूत्रकार कहते हैं-“ तयोः प्रस्तरं स्तृणा - " त्यूर्णम्रदस " मिति ( का श्र ० सू ० २ १० ) । “ अभिनिदधा- " त्या त्या वसव " इति ( का ० श्र ० सू ० २२८ । ११ ) । १३ प्रस्तरस्पर्शद्वारा दक्षिणेन त्र चां ग्रहणं, प्रस्तरे स्थापनञ्च । प्रस्तरस्तरण - स्पर्श - कम्र्मानन्तर वह अध्वर्यु अपने दोनों हाथों में से बाम हाथ तो प्रस्तर पर रक्खे रहता है, एवं दहिने हाथ में अग्नीध नामक ऋत्विक् से क्रमशः मोंत गए जुहू - उपभृत् - ध्रुवा नामक पात्रों को - " घृताची ० " इत्यादि संहितोक्त तीनों मन्त्रों का उच्चारण करता हुआ प्रस्तर पर पूर्वाय स्थापित करता है । इस स्थापनकर्म में बिशेषता यह है कि, जुहू को तो प्रस्तर के ऊपर रक्खा जाता है, एवं उपभृत्, तथा ध्रुवा को प्रस्तर से नीचे बर्हि पर रक्खा जाता है । ग्रहण, स्थापन - वैशिष्ट्य की इसी इतिकर्तव्यता का स्पष्टीकरण करते हुए सूत्र-कार कहते हैं-" सव्याशून्ये जुहू प्रतिगृह्य निदधाति " घृताची " इति । - का ० ० २२८ १३ । “ एवमितरे उत्तराभ्यां प्रतिमन्त्रं बर्हिष्युपभृतं, धृवा चात्रक्रष्ट ऽनुपूर्वम " - का ० श्र ० सू ०८।१३ । १४ - पुरोडाशस्य घृतेनाञ्जनं, कपालानाश्च घृतेनेपदञ्जनम् कस्थापन - कर्म के अनन्तर वह अध्वर्यु वेदिस्थान से गार्हपत्य के समीप आता है । वहाँ आकर पुरोडाशद्रव्य पर घृत डालकर उसे ढूँढा कर पहिले से सम्पन्न पुरोडाशपात्री में उन्हें ११०६

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शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - १-२ - मोतीलाल शास्त्री, पृष्ठ 840 का मूल पृष्ठ
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. तृतीय अध्याय तृतीय- चतुर्थ - ब्राह्मण प्रथमका एड रख फेर – " बस्ते प्राणः पशुषु प्रविष्टो देवानां निशमनु यो वितते । आत्मन्वान सोम घृतवान हि भूत्वाऽगिन्छ स्वर्यजमानाय दिन्द " यह मन्त्र बोलता हुआ पुरोडाशपात्री में प्रतिष्ठित पुरो-डाशद्वयी को ज्य से चुपड़ता है । जहाँ अग्निदेवता का सम्बन्ध है, वहाँ ' अग्नि गच्छ स्वर्यजमानाय इत्यादि रूप से मन्त्र प्रयोग होगा । एवं जहाँ अन्य देवताओं का सम्बन्ध है, वहाँ " अग्नीषोमों गच्छ स्वं " - " इन्द्राग्नी गच्छ स्वर्यजमानाय " इत्यादि रूप से ऊड़ किया जायगा । पुरोडाशाञ्जन के अनन्तर जिस क्रम से कपाल रक्यं गए थे, उसी क्रम से उन उन कपालों का वह अध्वर्यु – “ यानि धर्मे कपालान्गुप चिन्वन्ति बेधसः । पूएस्तान्यपि इन्द्रवायू विमु-चताम " यह मन्त्र बोलता हुआ घृत से थोड़ा थोड़ा चुपड़ता हैं । किह्नीं याज्ञिकों के मत में कपालाञ्जनक तूष्णीं ( बिना मन्त्र - प्रयोग के ) होता है । दोनों वैकल्पिक पक्ष ऐच्छिक हैं । जितने कपाल इस कर्म में गृहीत हैं, उनका निधानक्रम से संख्यापूर्वक प्रथममुद्वासयाम, द्वितीय, तृतीयं ०, इत्यापिरूप से ही उदासन करना चाहिए । इसी कम्मों की इतिकर्तव्यता बतलाते हुए सूत्रकार कहते हैं-" पुरोडाशौ श्रभिघार्य. उद्वास्य उपस्तीर्णे निधायाऽनक्ति " बस्ते प्राणः पशुषु प्रविष्टो देवानां विष्टामनु यो वितस्थे | आत्मन्वान् सोम घृतवान् हि भूत्वाग्निं गच्छ स्वर्यजमानाय विन्दे " ति " ( का ० श्र ० सू ० २८ १४ ) । " यथा देवतमन्यत् " ( का ० श्र ० सू ० २८ । १ ) । " प्रत्यनक्ति कपालानि - " यानि बम्मे कपालान्युष चिन्वन्ति वेधसः । पूष्णस्तान्यपि व्रत इन्द्रवायू विमुञ्चता " मिति " ( का श्र ० सू ० २।८।१६ । ) । " तुष्णीं ग " ( का ० औ ० सू ० २२ = | १७ | " संख्य योद्वासयति " ( क ० ००१ ) १५-- सर्वालम्भनम उक्त कम्र्मानन्तर यह अध्वर्यु - " - प्रियेण धाम्ना प्रियं मद आसीद " यह मन्त्र बोलता हु - श्राज्य - पुरोडाशादि विद्रव्यों को वेदिस्थित ध्रुवापात्र के उत्तर प्रदेश में बेदि पर रखकर-" धवा असदन्नृतस्य योनौ ता विष्णो पाहि पाहि यज्ञ, पाहि यज्ञपतिम " इस मन्त्र की आवृत्ति - पूर्वक आाज्यस्थाली - स्थित श्राज्य का, जुहू - उपभृत - धबा स्थित आज्य का पुरोडाशपात्री में स्थित पुरोडाशद्वयी का उपयोगक्रम से स्पर्श करता है । अनन्तर - " न पाहि मां यज्ञन्यम् " यह ११०७