Shatpath Brahman 1 2 — पृष्ठ 841–850

शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - १-२ - मोतीलाल शास्त्री · पृष्ठ 841–850

पृष्ठ 841

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तृतीयअध्याय तृतीय- चतुर्थ- ब्राह्मण शतपथब्राह्मण मन्त्र बोलता हुआ बहु अध्वर्यु अपने हृह्य का स्पर्श करता है । यही ' सर्वालम्भनकर्म्म ' बत-लाते हुए सूत्रकार कहते हैं ---" प्रियेण वाने " ति हवींषि द्यां कृत्वा “ ध्रुवा असद " भिति - सर्वाण्यालभते ( का ० श्र ० सू ० २२ = १६ । " पाहि मा " मित्यात्मानम् ' ( का ० श्र ० सू ० २८ २० ) । व्रतोपायनकर्म के सम्बन्ध में दो विकल्प पक्ष माने गए हैं । द्वितीयपक्ष का अवसर क है? इसका समाधान करते हुए सूत्रकार कहते हैं--" अत्र वा व्रतोपायनपत्र वा व्रतोपायनम " ( का ० श्र ० सू ० २२२ ) । इति कात्यायनश्रौतसूत्रे द्वितीयोध्यायः इति सूत्रप्रदर्शित पद्धतिसंगृहः वैज्ञानिकविवेचना-अथ - प्रोक्षणकम्मपिपत्तिः-( भाष्य ) - " पवित्रं वा आपः ' - ' मेध्या या आप: ' ( शत ० ब्रा ० १ १ २ ) इन ब्राह्मण - श्रुतियों के अनुसार पानी में मध्य और पवित्र नामक दो धर्म प्रतिष्ठित रहते हैं, जिन की विशद वैज्ञानिक - व्याख्या उसी ब्राह्मण में की जा चुकी है । इस यज्ञकर्म में उपयुक्त बर्हि, बेदि, तथा इध्म, तीनों यज्ञसंस्था में गृहीत होने से पवित्र तो बन चुके हैं । परन्तु श्रमी इन में उस मेध्य गुण का अभाव है, जिस के सम्बन्ध से ही ये यज्ञ के साथ अन्तर्यामसम्बन्ध करने में समर्थ हो सकती हैं । उस संगमनीय गुण का ( स्नेहगुण का ) इनमें आधान करने के लिए ही इनका प्रोजा किया जाता है, एवं प्रकृत प्रोक्षणकर्म की यही एकमात्र उपपत्ति है, जिसका " तन्मेध्यमे वै तद्ग्नये करोति " इन शब्दों में अभिनय हुआ है । जाग्नि ( आहवनीयग्नि ) के समिन्धन के लिए जो काष्ठभार यज्ञसंस्था में संग्रहीत होता है, उसे ' इन्वें ' ह वा अध्यय्र्युरग्निम ' इस निर्यचन से ' हम ' कहा जाता है । वह इष्मकाष्ठ कृष्णाग्नि का प्रतिरूप है । मृग्याग्नि ही कृष्णाग्नि कहलाया है, अतएव काष्टप्रमुत इम अग्नि को ' मृग ' भी कहा जाता है । सौराग्निमण्डल प्राकृतिक नित्य यज्ञमण्डल का आहवनीयाग्निमण्डल है । इस में प्रतिष्टित सौर सावित्राग्नि ११०८

पृष्ठ 842

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तृतीय व्याय तृतीय- चतुर्थ ब्राह्मरा प्रथमकाण्ड ( प्राणाग्नि ) श्रग्नीषोमात्मक सम्वत्सरयज्ञ का स्वरूप - समर्पक बनता हुआ यजात्मक है । इस सौर यज्ञाग्नि के ब्रह्मौदन, प्रवर्ग्य, भेद से दो विभाग होजाते हैं! जो सौर अग्नि सूर्यसंस्था की स्वरूपवा के लिए सदा सौरमण्डल में हीं अन्तर्थ्याम - सम्बन्ध से प्रतिष्ठित रहता है, उसे ब्रह्मइन अग्नि ' कहा जाता है, एव यह सूर्य का अपना प्रातिविक अग्निभाग है । जो सौर अग्नि प्रजापति की कामना से सौरसंस्था से पृथक् होकर भूगर्भ में प्रविष्ट होता हुआ पृथिवी की ओषधि - वनस्पतियों में ( इन के स्वरूप निर्माण के लिए ) प्रविष्ट रहता है, वह ' प्रवर्ग्याग्नि कहलाता है । इसी सौर - प्रवर्ग्य - यज्ञाग्नि से ही पार्थिवसंस्था की स्वरूप निष्पत्ति हुई है । यही पार्थिव अग्नि का प्रवर्ग्याश ' गायत्र ' नाम से व्यवहृत होने लगता है । स्व- सौरसंस्था में प्रतिष्टित वही ' सावित्राग्नि ' पारमेष्ठ्य, दाह्य, ' ब्रह्मणस्पति ' नामक सोमाहुति से शुक्ल ( ज्योतिर्म्मय ) बना रहता है, जिसे कि हम इस का जाग्रतरूप कह सकते हैं । यही शुक्ल, तथा प्रत्यक्षदृष्ट सौर यज्ञाग्नि प्रवर्ग्य - सम्बन्ध से जब पार्थिसंस्था में प्रविष्ट होजाता है, तो इमका शुक्लरूप उत्क्रान्त होजाता है । पारमेष्टय सोम के सम्बन्ध के उत्क्रान्त होजाने से अपना शुक्लरूप छोड़ता हुआ यह कृष्णरूप में ( अप्रत्यक्षरूप में ) परिणत होजाता है । यही इसका सुप्तरूप है । पार्थिव पदार्थों में, विशेषतः काष्ठादि में अग्नि का यही सुप्त स्वरूप प्रतिष्ठत है । जब अन्याग्नि के सम्बन्ध से इसे जगाया जाता है, तो यह जग पड़ता है, काष्ठ प्रज्ज्वलित होजाता है । तत्काल यह अपने शुक्लरूप में आता हुआ स्वा-स्थानभूत लोकोपलक्षित सार - देवमण्डल में चला जाता है । पार्थिव अग्नि की इसी सुम- जाग्रत -अवस्थाद्वयी का स्पष्टीकरण करती हुई मन्त्रश्रुति कहती है-" शेषे बनेषु मात्रोः संस्वा मर्तास इन्धते । न्द्रो व्यावहसि हविष्कृत श्रादिदेवेषु राजसि " ॥ ऋक् सं ० / ६० | १५ | सौर यज्ञाग्निवत् क्योंकि यह अग्नि प्रत्यक्ष नहीं है, अपितु मृग्यमाण ( खोजने योग्य ) है, अतएव इसे ‘ कृष्णमृग ' कहना अन्वर्थ बनता है । ' यज्ञभूमि ' नाम से प्रसिद्ध ' भारतवर्ष ' में स्वच्छन्द्ररूप से विचरण करने वाले * ' कृष्णमृग ' ( काले हरिण ) में भी इस कृष्णमृगाग्नि की ही प्रधानता है । अतएव यज्ञकर्म में यज्ञाग्नि की समृद्धि के लिए कृष्णमृगचर्म्म पर ही हविः पेषणादि कर्म होता है, जैसाकि पूर्वके -" श्रथ कृष्णाजिनमादत्ते " ( शत ० १ | १ | ४ | १ ) इत्यादि रूप से ' कृष्णाजिनब्राह्मण ' में विस्तार से बतलाया जाचुका है । सौर यज्ञाग्नि हीं ' प्रवर्ग्य ' के सम्बन्ध से पार्थिव पदार्थों में प्रविष्ट होता हुआ ' कृष्णमृग ' नाम से व्यवहृत होने लगता है, इसी रहस्य का निम्नलिखित ब्राह्मण - श्रुति से स्पष्टीकरण हुआ है-" यज्ञो ह देवेभ्यो ऽप चक्राम । स कृष्णो भूत्वा चचार । तस्य देवा अनुविद्य त्वमेवात्रच्छायाजह: " । शतः १ । १ । ४ । १ ) । " मृगधर्म्मा वै यज्ञः " ( पलायनशीलः ) ( तां त्रा ० ६: ७/१० ) " * तस्य ( अग्ने ) एष स्वोलोकः, खन्- ' कृष्णाजिनम् " ( शत ० ६ । ४ । २ । ६ । ) । - ' इयं वै पृथिवी कृष्णाजिनम् ' ( शत ० ६ | ४ | १ | ६ | ) | ' यज्ञो वै कृष्णाजिनम् ' ( शत ० ६ | ४ | १ | ६ | ) | ११०६

पृष्ठ 843

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तृतीय अध्याय तृतीय- चतुर्थ ब्राह्मण शतपथब्राह्मण वही मृग्याग्नि प्रतिरूपमर्थ्यादा से यहाँ तो ग्राहवनीयखर में प्रतिष्ठित है, एवं उस प्राकृतिक यज्ञ में श्रावनीयग्वर - स्थानीय सौर मण्डल में प्रतिष्ठित है । अतएव ' आहवनीये बरं तिष्ठति ' इस निर्वचन से इसे ' आखरंष्ट: ' नाम से भी व्यवहृत किया जासकता है । इसके अतिरिक्त काष्टदृष्टि से भी इस नाम का समन्वय किया जासकता है । ' आ-- समन्तात खरे - कठिने वृक्षे काष्ठे तिष्ठति ' इस निर्वचन से भी ( महीधरभाव्य ) इध्मकाष्टस्थ कृष्णाग्नि को ' आखरेष्ठः ' कहना अन्वर्थ बनता है । इध्म में भूत - देव भेद से दो भाग प्रतिष्ठित हैं । भृतभाग काष्टरूप से प्रत्यक्ष दृष्ट है, साथ ही इसका दिव्यातिशययुक्त यज्ञ से कोई सम्बन्ध भी नहीं है । सम्बन्ध अपेक्षित है उस दिव्याग्नि ( प्राणाग्नि ) का, जो इसमें कृष्णरूप से ( अप्रत्यक्षरूप से ) प्रतिष्ठित रहता हुआ ' आख़रेष्ठ बन रहा है । वही सङ्गमनीय है । भूतभाग प्राण --सम्बन्ध का निरोधक माना गया है । इसके सम्बन्ध से देवत्राण में अमेध्य ( असंगमनीय ) धर्म का समावेश हो जाना है । काष्ट - स्थित कणाग्नि के भृतसंसर्गजनित इसी अभेध्यभाव को हटाने के लिए ' कृष्णोऽस्या--खरेष्ठः यह मन्त्र बोलते हुए इध्म का प्रोक्षगण किया जाता है । जबतक यह प्रोक्षगाकर्म नहीं कर लिया जाता, तक इस इध्मस्थित कृष्णाग्नि का उस दिव्याग्नि - प्रतिरूप ग्राहवनीयज्ञाग्नि के साथ ग्रन्तर्याम - सम्बन्ध नहीं होसकता । एवं जनतक पार्थिव नि का दिव्याग्नि के साथ सम्बन्ध नहीं होजाता, तत्रतक ' बज्ञ ेन--पार्थिवयज्ञेन यज्ञमयजन्त - दिव्याग्निमयजन्त ' परिभाषा से सम्बन्ध रखने वाला पार्थिव आधिभौतिक ), दिव्य ( आधिदैविक ) यजमानाग्नि ( आध्यात्मिकाग्नि ) के समन्वय पर अपनी स्वरूप -- सम्पत्ति निर्भर रखने वाल । यज्ञातिशयलक्षण दैवात्मा उत्पन्न नहीं होसकता । इसके लिए प्रथम पार्थिव - इध्मकाष्टम्य कृष्णाग्नि का दिव्य श्राहवनीयाग्नि के साथ सम्बन्ध कराना आवश्यक है । यह तभी सम्भव है, जब कि इध्मकाष्ठाग्नि को मेध्य बना लिया जाय । जब इसे प्रोक्षण के द्वारा भूतानुगत अमेध्यधर्म से पृथक कर दिया जाता है, तो आहवनीयस्थित देवताओं के लिए यह जुष्ट ( सम्बन्धयोग्य ) बन जाता है । इसी मेध्य फल का अग्नये ' वा जु प्रोक्षामि " इस मन्त्रोत्तरभाग से स्पष्टीकरण होरहा है ॥ १ ॥

बेटि पर बर्हि का आस्तरण होता हैं । बर्हि ( दर्भ ) ' बेन ' नामक उस पानी से उत्पन्न हुआ है, जो सौरमण्डल की अन्तिम सीमा में ज्योतिर्मयरूप से प्रतिष्टित है । पारमेष्टय पानी का जो भाग सौर- रश्मियों में प्रविष्ट होकर अपने स्वभाविक मुरभाव को छोड़ता हुआ ज्योतिर्म्मय बनता हुआ यज्ञिय बन जाता है, उसी वेन नामक यज्ञिय तत्व से दर्भ की उत्पत्ति है, जैसाकि पूर्व के ' पवित्रे करोति ' ( शत ११ | २ | १ ) इत्यादि ' पवित्रत्राह्मण ' में दर्भोत्पत्तिविज्ञान ' बतलाते हुए विस्तार से स्पष्ट किया जाचुका है X | दिव्य

* श्रयं वेनश्चोदयत् पृश्निगर्भा ज्योतिर्जराय रजमो विमाने ।

इमां सङ्गमे सूर्यस्य शिशुन विप्रा मतिभीरिहन्ति ॥

- यजुः संहिता ७ | १६ | X- " सर्व वयं समुद्रः । तस्मादु है का आप बीभत्साञ्चक्रिरे । ता उपबुपति पत्र विरे । त इमे दर्भाः । ता हैता अनापूयिता श्रपः " । - शत ० त्राः ११ १११०

पृष्ठ 844

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तृतीय अध्याय प्रतीय - चतुर्थ- ब्राह्मण प्रथमकाण्ड प्राणात्मक दर्भ के इस दिव्यातिशय का वेदिके साथ तभी सम्बन्ध होसकता है, जब कि इध्मकाष्ठवत् पृथिवी की प्रतिक्रातेरूपा वेदि के पार्थिव अग्नि को भूतसंसर्गजनित मध्यधर्म से पृथक् कर लिया जाय । इस प्रयोजन के लिए ( बर्हिस्थित दिव्य प्राणके साथ वेदिस्थित कृष्णाग्नि के सम्बन्ध के लिए ) ही इध्मप्रोक्षणानन्तर वेदिका प्रोक्षण किया जाता है । प्रोक्षणमन्त्र है ' वेदिरसि, बर्हिषे त्वा जुड़ प्रोतामि ' यह । ' यह बेदि है ' इम वाक्य से श्रुति का तात्पर्य यही है कि, यही यज्ञप्राप्ति का साधन है । इसी में तो प्रवर्ग्य - यज्ञाग्नि प्रतिष्टत है । इसे मेध्य बनाना हीं प्रोक्षणकम्मोद्दश्य है ॥ २ ॥

वेटिप्रोक्षणानन्तर बर्हि का प्रोक्षण किया जाता है । बर्हि में भी भूत -- प्रारण भेद से दो विभाग हैं । फलतः इध्म - वेदिवत -- इसका दिव्य श्राप्य अग्नि भी भृतसंसर्गजनित अमेध्यधर्म से युक्त है । पत्रित्र -- मेध्य सुकूमात्र इस पर तभी रकबे जासकते है, जब कि इसका श्रमेध्यधम्मं हटा दिया जाय । तदर्थ ही - बर्हिरसि स्रुग्भ्यस्त्वा जुषं प्रोक्षामि ' मन्त्र से बर्हि का प्रोक्षण भी आवश्यक बन जाता है । यह दर्भ उस बेन पानी का प्रतिरूप है, जिस वेन पानी के वेष्टन से सम्पूर्ण पार्थिव त्रैलोक्य चारों ओर से वेष्टित होरहा है । पृथिवीरूपा वेटि का बृंहणकर्म्म ( वेष्टन कर्म्म ) वेनरूप दर्भ पर ही अवलम्बित है । इसी बृंहगा धर्म के कारण वेनप्रति--रूप - स्थानीय दर्भ को अवश्य ही ' बर्हि ' कहा जासकता है । यज्ञ में गृहीत भौतिक पदार्थों में ' भूत - प्राण ' भेद से दो दो वस्तुएँ हैं । दोनों में भूतभाग ग्रग्राह्य है, प्रागभाग ग्राह्य है । भूत श्रमेध्य है, तत्संसर्ग से प्राण भी श्रमेध्य बना रहता है । इस श्रमेध्यभावनिवृत्ति के लिए ही प्रोक्षणकर्म किया जाता है, और यही एकमात्र मंत्र प्रोक्षणकम्बों की उपपत्ति है । प्रोक्षणकर्म होता है -- दर्भतृणों के द्वारा - प्रोक्षणीपात्र में रक्ग्वे हुए मन्त्रभूत मेध्य पानियों से । दर्भतृण पूर्वकथनानुसार स्वयं पवित्र हैं । अतएव इन से प्रोक्षण करना अन्वर्थ [ बनता है ॥ ३ ॥

पर्जन्यदेवता वृष्टि के अधिष्ठाता है । पर्जन्य के द्वारा ग्राकाश से मरुत्-- गर्भ से भूतल की ओर जाता हुआ पानी थोड़ी देर तक तो भूतल पर दिखाई देता है । परन्तु कुछ ही समय में वह बिलीन होजाता है । इसका विलयन भूतलस्थित श्रोषधि -- वनस्पति के मूलों में हीं होता है । इसीलिए तो श्रोषधि-- वनस्पतियाँ जहाँ अपने तूलभागों से शुष्क- इव प्रतीत होती है, वहाँ इनके मूलभाग गीले रहते हैं । यह मूलार्द्रता ही इनके जीवन का कारण है । यही कारण है कि, एक वृक्ष की जड़ों को उखाड़ कर यदि अन्यत्र लगाने की कामना होती है, तो उस वृक्ष की जड़ों को उत्पादक लोग ( राई - बागवान ) मिट्टी सहित उस भाँति उग्वाड़ते हैं, जिससे उनका मूलार्द्रा भाग शुष्क न होजाय । इसप्रकार प्राकृतिक यज्ञ में सिञ्चक पर्जन्यदेवता के द्वारा सींचा हुआ पानी ओषधियों के मूलों में हीं प्रतिष्ठित रहता हैं । यह वैधयज्ञ उसी का प्रतिरूप है । " य देवा कुस्तत्करव । रिए " इस निगम से यहाँ भी प्रोक्षणीपात्र में बच्चे जल को बर्हि के मूलों में हो डालना न्यायप्राप्त है । यह विश्वास करने योग्य बात है कि, यज्ञकर्म में जो जो अतिशय उत्पन्न होते हैं, उन सबका फलभोक्ता बजमान ही बनता है, जैसा कि " तद्वै तदाहर्त्तयेवाधि " इत्यादि रूप से अनुपद में ह्रीं " तं - यज्ञ ' - वेद्यामन्त्रविन्दन् | यत् - वेद्यां - अन्यविन्दन्, तन् - वेदेर्वेदिच्चम् " | - ऐतरेय ब्राह्मण ३ । ६ । ११११

पृष्ठ 845

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तृतीयअध्याय तृतीय- चतुर्थ- काण्ड शतपथब्राह्मण स्पष्ट होने वाला है । यहाँ जलसेक से जो सिञ्चनकर्म होता है, उसका फल यह होता है कि, यज्ञकर्त्ता यजमान के उपभोग में लाने वाली औषधि - वनस्पतियाँ सदा उपजीवनीया ही बनी रहती हैं । इसीलिए कभी यज्ञकर्त्ता यजमान के लिए इन ओषधि - वनस्पतियों ( पार्थिव - अन्नादि भोग्य सम्पत्ति ) की कमी नहीं रहती | ओषधिमूलों को आर्द्रा बनाना हीं इस सिञ्चनकर्म का मुख्य उद्देश्य है । हम देखते हैं कि, यदि केवल औषधियों पर पानी डाला जाता है, तो इससे व े आर्द्र मल तबतक नहीं बनतीं, जबतक कि उनकी मिट्टी में पानी न डाला जाय । भूप्रदेश की आर्द्रता ही जाता का कारण है । फलतः सिञ्चन-कर्म का प्रधान लक्ष्य भूप्रदेश ही बनता है । एतद्वारा परम्परया ही आर्द्र मूला - सम्पत्ति प्राप्त होती है । अतएव यहाँ भी पानी डाला तो जाता है - बर्हिमलों में । परन्तु भावना की जाती है - ' अदित्यै व्युन्द-नमसि ' यह । ' हे शेष जल! आप इस पृथिवी के लिए क्लेदनद्रव्य हैं । मन्त्रभाग यही बतला रहा है कि, गीली मिट्टी ही श्रार्द्र मूला सम्पत्ति प्राप्ति का कारण है । यही कारण है कि, जबतक पर्य्याप्त वृष्टि नहीं होती, तत्रतक भूगर्भ श्रार्द्रा नहीं होता । एवं जबतक भूगर्भ आर्द्रा नहीं होता, तत्रत श्रोषधि - प्ररोहण नहीं होता । भूगर्भ की आर्द्रता ही जीवनरमप्रदात्री है, अतएव कृषकवर्ग भूगर्भ में हीं बीजवपन करते हैं || ४ || इति प्रोक्षणकम्मोपपत्तिः अथ प्रस्तरगृहणांपपत्तिः-प्रोक्षण कर्म के अनन्तर कुशमुष्टिलक्षण ' प्रस्तर ' का ग्रहण किया जाता है । प्राकृतिक यज्ञपुरुष का जैसा स्वरूप श्राधिदैविकसंस्था में है, वैसा ही यहाँ होना चाहिए । यह यज्ञरूप अध्यात्म – अधिदैवत - भेट से दो श्रेणियों में विभक्त है । दोनों में से पहिले आधिदैविक यज्ञपुरुष के स्वरूप का ही विचार कीजिए । ऋताग्नि — ऋतसोमात्मक सम्बत्मरमण्डल का ही नाम ' आधिदैविक यज्ञपुरुष ' है । इस सम्वत्सरयज्ञ के उत्तरायण, दक्षिणायन, विष्ववृत्त भेद से तीन प्रधान पर्व हैं । उत्तरायण पर्व इसके शरीर का उत्तर पार्श्व है, दक्षिणायन पर्व दक्षिण पार्श्व है, एवं मध्यस्थ त्रिष्ववृत्त ग्रात्मम्थानीय मध्याङ्ग ( धड़ ) है । स्तोम विज्ञान के अनुसार त्रिवृत्स्तोम से आरम्भ कर एकत्रिंशस्तोम पन्त ( सूर्य्यपर्यन्त ) अपनी व्याप्ति रखने वाले इस मम्वत्सर - पुरुष का त्रित्रस्थान ' पाद ' है, पञ्चदशस्थान ' मध्याङ्ग ' है, एवं एकविंशस्थान ' मस्तक ' है । तीनों के क्रमशः अग्नि वायु आदित्य नामक तीन प्राण प्रतिष्ठाना हैं । आदित्यागात्मक २१ एकविंश स्थानस्थित मस्तक स्थान के ऊर्ध्वभाग पर सूर्य स्थित हैं, जिसे कि यज्ञपरिभाषा में हम ' यूप ' कहा करते हैं । यह सूर्य्यात्मक ग्रूप सोमाहुति से ही स्वस्वरूप से सुरक्षित है । बूप का यूपत्त्व सोमाहुति पर ही निर्भर है । याधिदैविक सवत्सरयज्ञ के इमी त्रैलोक्यव्यापक स्वरूप का स्पष्टीकरण करते हुए वेदभगवान् कहते हैं— १ - " अथ ह वा एष महासुपर्ण एव यत् सम्बत्सरः । तस्य यान् पुरस्ताद्विषुत्रतः पण्मासानुपयन्ति, सोऽन्यतरः पक्षः, अथ यान् षड़परिस्तान् सोऽन्यतरः, आत्मा विषुवान् " । - शत ० १२ २ ३ ७ १११२

पृष्ठ 846

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तृतीयध्याय तृतीय- चतुर्थ - ब्राह्मण २. - " आत्मा वै सम्वत्मरस्य विषुवान, अङ्गानि मामा: ” । वें ३– “ आत्मा वै सम्वत्सरस्य विपुत्रान् ४ – “ सम्वत्सरो वै यज्ञः प्रजापतिः । पिधानः " । ( शत ० १११।१।१ ) - शत ० १२ २ ३।६ " अङ्गानि पक्षौ " । गो ० ब्रा ० पू ०४११८ प्रथमकाण्ड तस्यैतद् द्वारं यदमावास्या, चन्द्रमा एव द्वार-५ – ' पुरुषो वा सम्वत्सरः " ( शत ० १२२२ | ४ | १ ) ।

६ - " सहस्रशीर्षा पुरुषः सहस्राक्षः सहस्रपात् ।

सभूमिं सर्वतः स्मृत्वात्य तिष्ठद्दशाङ्गुलम् ” ॥

- जु ० सं ० ३१। * उक्त सम्वत्सरयज्ञपुरुष के मस्तकोस्थान में प्रतिष्ठित यूषात्मक सूर्य ही इस की — ' शिखा ' है । शिखा केशात्मिका - केशगुच्छात्मिका ही होती है । केश- लोमकी उत्पत्ति औषधि - वनस्पतियों से मानी गई है, जैसाकि – “ ओषधीर्लोमानि, वनस्पतीन केशाः " ( वृ ० अ ० उप ० ३।२।१३ ) इत्यादि श्रुति से स्पष्ट है । पारमेय सोम ही औषधि [ १ ] - वनस्पति के स्वरूप का जनक है । अन्तर यही है कि, वही सोम चन्द्ररूप से ( अग्निगर्मित सोमरूप से ) ओषधियों का जनक बनता है, एवं वही सोम सूर्य्यरूप से ( सोमगर्भित [ २ ] अग्नि रूप से ) वनस्पतियों का उत्पादक बनता है । जब सुय्यत्मिक [ ३ ] ग्रूप सोमात्मक है, सोम ही परम्परयाज केशलोमात्मक है, तो हम अवश्य ही सूर्य को इस यज्ञपुरुष की शिखा कह सकते हैं । इसी शिखात्मक सोमभाव के आगमन * सहस्र शब्द पूर्णभावात्मक वत्तुल वृत्त का ही सूचक है । क्योंकि जो बत्त ' ल होता है उसके केन्द्र से चारों ओर वषट्कारसम्पादिका वेद - लोक - वाक् - साहस्रियों का वितान होता है । सम्वत्सरपुरुष त्रिवेन्द्र है, अतएव क्रान्तिवृत्तात्मक सम्बत्सरचक त्रिकेन्द्र बनता हुआ दीर्घत्त ( अण्डवृत्त ) माना गया है । ' अक्ष: ' से विज्ञानचक्षु ही अभिप्रेत है । विज्ञानचक्षु का हृदय से सम्बन्ध है । हृदयस्थ मन पर ही विज्ञान प्रतिष्ठित रहता है । हृदयम् विज्ञान से मध्याङ्ग अभिप्रेत है । त्रिवृत्- पञ्चदश- एकत्रिंश, तीनों क्रमशः पाद - मध्य - मस्तक पर्व हैं | त्रिपर्वा यह पुरुष सप्तवितस्तिकाय से तो भूपिण्ड पर खड़ा है । एवं यही अध्यात्मसंस्था में १० ॥ अङ्गु-लात्मक प्रादेशमित प्रदेश में प्रतिष्ठित है । इसी आध्यात्मिक दृष्टि से - ' प्रत्यतिष्ठद्दशाङ्गुलम् ' कहा गया है । ( १ ) - " त्वमिमा ओषधीः सोम विश्वास्त्वमपो अजनयस्त्वं गाः । त्वमा ततन्र्थोर्गन्तरिक्षं त्वं ज्योतिषा वि तमो ववर्थ ॥ " ( २ ) - " ग्न वनस्पतिः " ( कौ ० ब्रा ० १०/६ ) ऋकूमं ० २।६१।२२ ( ३ ) - “ असौ वा अस्य आदित्यों ग्रूपः " ( ऐ ० ब्रा ० ५।२८ ) । " श्रादित्यो गृपः " ( ० त्रा ० ( २ | | ५ | २ ) । तै ० १११३

पृष्ठ 847

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तृतीय अध्याय तृतीय- चतुर्थ - मब्राह्मण त्रिन्निपः परिदिदिवे । १११४ शतपथब्राह्मण - बृ ० आ ० ३ | ४ | ४ | — मुण्डकोपनिषत गराइ - शत ० १०४ ० १ ० से तद्रूप सौर दिव्येन्द्रप्राण स्वस्वरूप से सुरक्षित है । यदि शिखात्मक सोम का ( सोमाहुति का ) सम्बन्ध न रहे, तो तत्काल सौरसंस्था उच्छिन्न होजाय । इसी उक्त – स्वरूपलक्षण आधिदैविक यज्ञपुरुष के अनुरूप आध्यात्मिक यज्ञपुरुष का स्वरूप --निर्माण हुआ है । सम्वत्सरयज्ञ के दक्षिण पार्श्व से इस के मेरुदण्ड से आरम्भ कर हृदय - रेख पर्यन्त दक्षिण पार्श्व का, बामपार्श्व से मेरुमण्डल से आरम्भ कर हृदय रेखापय्र्यन्त वाम पार्श्व का, तथा मध्याङ्गम्थानीय विषुवप्राण से मेरुदण्ड का निर्माण हुआ है । स्तोमविज्ञानानुसार त्रिवृत्सम्वत्सरभाग से पाद भाग का, पञ्चदशभाग से मध्याङ्ग का, एवं एकविंशभाग से शिरोभाग का निर्माण हुआ है । इसी में सौर- इन्द्रप्राण प्रतिष्ठित है, जो शिखान्तस्थान से निकल कर शिरोबिन्दु से आरम्भ कर सूर्य्यकेन्द्र पर्य्यन्त वितत ( ) महापथ के मार्ग से सूर्य-केन्द्रपर्य्यन्त एक निमेषमात्र में तीन बार आता जाता है ( ५ ) । यही प्राणगमनागमन शतायुः का प्रवर्त्तक माना गया है । सूर्य्यस्थित मनः प्राणवाङमय ( ६ ) ३६००० संख्यात्मक ' आयु: ' नामक मनोता का आगमन ही

४ अणुः पन्था विततः पुराणे । मां स्पृष्टोऽनुवित्तो मयैव ।

तेन धीरा अपियन्ति ब्रह्मविदः स्वर्ग लोकमित ऊर्ध्वं वियुक्ताः ॥

तस्मिञ्क्लत नीलमाहुः पिङ्गलं हरितं लोहितं च ।

एप पन्था ब्रह्मणा हानुर्विचस्तेनेति ब्रह्मवित्- पुण्यकृत् - तैजसश्च ॥

५. आविः - सन्निहितं गुहाचरं नाम महत्पदमत्रैतत्समर्पितम् । एजत् प्राणत् - - निमिपच्च यदेतञ्जानथ सदसद्वरेण्यं परं विज्ञानाद्वरिष्ठं प्रजानाम् ॥ तस्यैष आदेशो यदेतत्-- विद्यतो व्यद्य नदा ३ इतोति न्यमीमिपदा ३--इत्यधिदैवतम् ( केनोपनिषत् २६ ) | ६ - ‘ “ तदात्मानमन्यैच्छत्, तचपोऽतप्यत तत् प्रामूर्च्छत् तन् पत्रिशतं सहस्रा -पश्यदात्मनेोऽनीनन् मनोमयान्, प्राणमयान्, वाङमयान् ० " |

पृष्ठ 848

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तृतीय अध्याय तृतीय- चतुर्थ ब्राह्मण प्रथमकाण्ड थायु ( ७ ) रक्षाका कारण है । ' बृतीप्राण ' नाम से प्रसिद्ध इस गैश्वामित्र आयः , प्रारण का आगमन इसी प्राणसञ्चा-लन - क्रिया पर निर्भर है । जिस क्षण आध्यात्मिक प्राण, तथा उस सूर्य केन्द्रस्थ आधिदैविक प्रारण, इन दोनो के मध्य में अवसानधर्म्मा ग्राम्यत्रारण का श्रागमन होजाता है, तत्काल प्रायुःसूत्र बिन्दिन्न होजाता है, प्राण को उत्पादक दिव्यप्राण का जीवनस्रोत मिलना बन्द होजाता है, फलतः निधन होजाता है । इस निधन का अव रोधक प्रागगमनागमनलक्षण वही दैनंदिन है, जिसे यज्ञपरिभाषा में ' अहरहयज्ञ ' ( ८ कहा गया है । बतलाया गया है कि ' बृहती ' नामक आयुः स्वरूपसमर्पक वह दिव्य सौरप्राण शिखान्तस्थानस्थित मार्ग से निकलकर महापथ के द्वारा स्वप्रभव सूर्य से सम्बन्ध करता है । वही शिखान्तस्थान ' ब्रह्मरन्ध्र ' नाम से प्रसिद्ध है । विज्ञानभाषा में इसे ही * ' विहतिद्वा ' ( द्वारा ) ' नान्दनद्वा ' ( द्वार ) इत्यादि नामों से व्यवहृत किया गया है | मस्तकस्थ केशों का ऊर्ध्व प्रदेश में भ्रमररूप से एक स्थान पर अबसान होता है । जहाँ यह श्रवसानचिन्दु है, वहीं एक सुसूक्ष्म द्वार होता है । यही द्वार उस वैश्वामित्र श्रायुःप्राण के सञ्चार का मार्ग है । उक्त दिव्य प्राण सौर -- दिव्यप्राण का प्रवर्ग्याश है । तव सूर्यविरोधी तमा-मय आसुरत्राण का इस दिव्य सौरप्राण के साथ स्वाभाविक विरोध है । लौहधातु में ७ -- ' ' तमिन्द्र उवाच- ऋषे! प्रियं वै मे धामेोपगाः । वरं ते ददामि इति । स होवाच त्वामेव जानीयां, इति । तमिन्द्र उवाच - प्राणे वा अहमम्मि - ऋषे!, प्राणस्त्वं, प्राणः सर्वाणि भूतानि, प्राणो ह्येष य एव तपति । स एतेन रूपेण सर्वा दिशेो विष्टोऽस्मि । तम्य मेऽन्न मित्र दक्षिणम् । " तह श्वामित्रेण तपन्नेवास्मि इति होवाच । तद्वा इदं बृहती - सहस्र सम्पन्नम् । तस्य वा एतस्य बृहती सहस्रस्य - सम्पन्नस्य षट्त्रिंशतमक्षराणां सहस्राणि ( ३६००० ) भवन्ति । तावन्ति शतमम्वत्सराह्नां सहस्राणि भवन्ति । परस्तात् प्रज्ञामयेो देवतामयेा ब्रह्ममयोऽमृतमयः सम्भूय देवता अप्येति । तद्योऽहं सेोऽमी, योऽमौ - से I ऽहम् ” । ए ० अ ० २२२१४ ८- - " अरहर्वाऽएप यज्ञम्तायते, अहरहः मन्तिष्ठते, अहरहरेनेन स्वर्गस्य लोकस्य गन्यैयुङक्ते 11, रहनेनेन स्वर्ग लोकं गच्छति " । - शत ० ६४ प्र ० १ मा १५ कं ० । * " स एतमेव सीमानं विदार्थ, एतया द्वारा प्रापद्यत । सैषा विद्यतिर्नाम द्वा: । तदेतनन्दनम् " [ ऐ ० आ ० २ | ४ | ३ ] | १११५

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शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - १-२ - मोतीलाल शास्त्री, पृष्ठ 849 का मूल पृष्ठ
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तृतीय अध्याय तृतीय- चतुर्थ त्राह्मण -शतपथब्राह्मण आसुरप्राण की प्रधानता रहती है । इधर क्षौरक में लोह - तुरिका का उपयोग होता है । इस में रहने वाले सुरत्राण के स्पर्श से उस दिव्यत्राण को बचाने के लिए ही परम वैज्ञानिक महर्षियों के शान्त स्थान पर शिखाधारण आवश्यक माना है, जोकि शिखाधारण आर्षधर्म्य के अनगामी भारतीयों की महत्ता तथा विज्ञानानुगा-मिताही प्रकट कर रहा है । यह तो शिखाधारण का एक प्रासङ्गिक प्रयोजन बतलाया गया । दूसरा प्रयोजन है - प्रतिरूपमा से देवमर्थ्यादा का अनुगमन । प्राकृतिक यज्ञपुरुष जब यूपरूप शिखा से युक्त है, तो यज्ञमार्ग का अनुगमन करने वाली, तथा यज्ञपुरुष से तदाकारण उत्पन्न होने वाली प्रजा को भी अपनी अध्यात्मसंस्था ( शरीर ) का वैसा ही बाह्य आकार रखना चाहिए । देवो भूत्वा देवं भावयेत् ' का भी यही रहस्य है । आधिदैविक बज़पुरुष के और और पर्चा तो आध्यात्मिक यज्ञपुरुष में स्पष्ट हैं । परन्तु यूपस्थानीया शिखा अस्पष्ट है | अतः यूपाकृतिवत् केशान्तभाग में इस का भी प्रतिरूप मर्यादा से अवश्य ही समावेश होना चाहिए । शिखा धारण से जहाँ धर्मानुबन्धिनी यज्ञमर्थ्यादा की रक्षा होती है, वहाँ दिव्यत्राण - रक्षापूर्वक विज्ञान भी सुरक्षित, तथा पुष्पित - पल्लवित होता है । ' विज्ञान ' शब्द ऋषि की परिभाषा में आत्मानुगत उस नित्यविज्ञान का ही सूचक है, जिसके परिज्ञान, एवं अनुष्ठान से इहत्र - अमुत्र अभ्युदय - निःश्रेयम् सम्पत्तियाँ प्राप्त होती है । अतएव जो जातियाँ शिखा नहीं रखतीं अथवा तो जो भारतीय सन्ताने इस ' स्वस्त्यन कम्म ' का महत्त्व न समझती हुई कल्पित, विभीषिकामय नग्न सौन्दर्य का मोहकर शिवाधारण को व्यर्थ का आडम्बर समझतीं हैं, उनका विज्ञान ( बुद्धि ) भले ही भौतिक, नाशलीलाप्रवर्त्तके आसुरभावात्मक विज्ञान में निपुणता प्राप्त करले । परन्तु " नित्यं विज्ञानमानन्दं ब्रह्म " की परिभाषा से तो वे सर्वथा वञ्चित ही रह जाती हैं । जिह्वं यह वञ्चना स्वीकृत है, वे भले ही शिखा को ' शम्म ' ( लज्जा ) का कारण समझें । परन्तु जो वास्तव में ' शम् ( सुख ) ' का मर्म समझने वाले हैं, वे भारतीय तो अपनी शिखा रक्षा को जातीयता, धर्म्म, विज्ञानवृद्धि, आदि का ही उपोलक मानेंगे । बेदशास्त्र पर अनन्य निष्ठा रखने वालों के लिए तो उस दशा में उपपत्ति - जिज्ञासा का कोई भी महत्त्व नहीं रह जाता, जबकि – “ तस्येयमेव शिखा स्तुपः " इत्यादि रूप से स्वयं श्रुति भगवती शिखाधारण को आवश्यक कर्म्म मानने का आदेश दे रही है । प्रस्तुत प्रासङ्गिक चर्चा को हम इसलिए विशेष महत्त्व दे रहे हैं कि, आज नवशिक्षितों की परिष्कृतबुद्धि? के क्षेत्र में शिखान्सूत्रादि चिह्नों को लेकर बड़ा कोलाहल मचा हुआ है । विशेषतः शिखा के निष्काशन का तो बहुसंख्या में हीं अनुगमन होरहा है । हम समझते हैं, ऐसी दुष्प्रवृत्ति संस्कृति के अधःपतन की ही सूचना देने वाली है । इसलिए हम उन सम्भ्रान्त पुरुषों से निवेदन करेंगे कि वे अपने इस लाभप्रद, तथा गौरवपूर्ण चिह्न की रक्षा करने में हीं अपना लाभ, तथा गौरव समझने का अनुग्रह करेंगे । १११६

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शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - १-२ - मोतीलाल शास्त्री, पृष्ठ 850 का मूल पृष्ठ
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तृतीय अध्याय तृतीय- चतुर्थ- ब्राह्मण प्रथमकाण्ड आधिदैविक - यज्ञपुरुष से अध्यात्मिक यज्ञ की स्वरूपनिध्यति हुई है, एवं आध्यात्मिक यज्ञ से इस आधिभौतिक यज्ञपुरुष ( पुरुषप्रयत्नसाध्य वैधयज्ञ ) का वितान होरहा है । जब दोनों यज्ञपुरुष शिखा से युक्त हैं, तो प्रतिपद उह्नीं की अनुरूपता से सम्बन्ध रखने वाले इस चैव यज्ञमें भी शिखा स्थापन होना हीं चाहिए । इम यज्ञ से जो यज्ञातिशयरूप देवपुरुष ( दैवात्मा ) उत्पन्न होने वाला है, वह शिखा से शून्य रहता हुआ दिव्यप्राण के विकास से वञ्चित न रह जाय, श्रतएव यहाँ प्रस्तरग्रहण किया जाता है । प्रस्तर दर्भमुष्टि है | दर्भ वेनलक्षण सौम्य आपोमय तत्त्व है । सोम ही शिखा है, जैसाकि पूर्व में बतलाया जाचुका है । इसी सा-दृश्य से दर्भमुष्टिरूप प्रस्तर को अवश्य ही शिखा का निदान माना जासकता है । ' विष्णो स्तुपोऽसि यह प्रस्तर -- ग्रहण का मन्त्र है । विष्णु यज्ञपुरुष है । इसके पूर्वभाग में ( शिरोभाग ) में हीं प्रकृतियज्ञ में स्तुप

( शिग्या ) प्रतिष्ठित है । अतः प्रस्तर का ग्रहण भी पुरस्तात् ही होता है ॥ ५ ॥

इति- प्रस्तरग हणोपपत्तिः अथ सन्नहनबिसं मन स्थापनापपत्तिः: -जो बर्हि वेदि पर विद्वान के लिए संग्रहीत हैं, वे ' सन्नहन ' नामक रज्जु से बँधी रहती हैं । गाँठ बोल कर पहिले तो इस बर्हिः संघात से प्रस्तर ( स्तुप ) ले लिया जाता है । अनन्तर इस सन्नह्न ( चन्धनरज्जु ) का बर्हिःसंघात से पृथक् कर लिया जाता है । यह स्मरण रखने की बात है कि, जिस वेदि पर बर्हि का आप्त-रगा होने वाला है, वह वृषा - स्थानीय देवताओं की । यज्ञपुरुष की ) योषा ( पत्नी ) है । इमी के दाम्पत्यभाव से दैवात्मलक्षण अपत्य उत्पन्न होने वाला है । प्रजननक्रिया में नीवीबन्धन प्रतिबन्धक है । इधर सन्नइनरज्जु इस गोपा ] ( वेदि ) की नीवीस्थानीया है । क्योंकि च प्रजननकर्म्म होने वाला है, अतः इस बन्धन को पृथक करना हीं प्रकृत्या सुसङ्गत है । बन्धन को पृथक कर इसे वेदि के दक्षिण ओणिप्रदेश पर रक्खा जाता है । क्योंकि यह बन्धन प्रति-रूपदा से नीवी है । उधर नीवीबन्धन लोकव्यवहार में दक्षिण श्रोणि पर ही रहता है, साथ ही वह वेष्टन वस्त्र से ढँका भी रहता है । कन्यासन्तान की अपेक्षा पुत्रसन्तान का ( पितृऋण मोचन की दृष्टि से ) विशेष महत्त्व माना गया है । दक्षिण भाग अग्निप्रधान बनता हुआ पुरुषप्रधान है, वामभाग सोमप्रधान बनता हुआ स्त्रीप्रधान है । अतएव महर्षि चरकादि ने गर्भाधान - संस्कारकाल में पति के दक्षिण पैर से ही शय्याब्द होना आवश्यक माना है । इधर इस यज्ञ से भी देनात्मलक्षण पुरुषविध सन्तान का ही प्रजनन अपेक्षित है । अतः अग्निप्रधान दक्षिणा श्रोणि पर ही सन्नहन रखना उचित है । नीवीबन्धन शिष्टमटा के अनुसार ढँका रहता है । अतः यहाँ भी उसी मर्य्यादा का अनुगमन किया जाता है ॥ ६ ॥

अथ - बर्हिस्तरणोपपत्ति— कहा गया है कि, इस यज्ञकर्म में ग्रहीत प्रस्तर शिखा - स्थानीय है । सब शरीरावयवों का प्रतिरूप-मय्यदा से संग्रह होगया, शिखाधारण प्रस्तर से गतार्थ बन गया । अत्र के केश - लोम बच रहते हैं, जो शिखा १११७