Shatpath Brahman 1 2 — पृष्ठ 991–1000
शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - १-२ - मोतीलाल शास्त्री · पृष्ठ 991–1000
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सामिधेनीब्राहाण प्रथमकाण्ड आत्रेयी योषित् ( स्त्री ) के आतव में अग्नितत्त्व ही प्रधान माना गया है, जैसे कि पुरुष के शुक्र में- ' सोम ' प्रधान माना गया है । पुरुष का वह सोमात्मक रेतोरूप शुक्र ऋतुस्नाता स्त्री के शोणिताग्नि में आहुत होता है । इसी आहुति से - शुक्रस्थित पुम्भ्रूण तथा शोणितस्थित- स्त्री से अन्न अन्नादा-त्मक पारस्परिक संघर्ष से ही प्रजोत्पत्ति हुआ करती है । इसप्रकार ' श्रद्धा वै आपः सन्नमन्ते ' - ' श्रद्धा वा श्रपः ' इत्यादि श्रुतियों के अनुसार आपोमयी श्रद्धा, किंवा श्रद्धात्मिका आप: ही पूर्वक्रमानुसार आत्रेयी - योषित् के शोणित मे गर्भीभूत होकर - ' प्रजा ' - स्वरूप में परिणत होता है । स्वलोकानुगत सौरसावित्राग्नि ', अन्तरिक्षलोकानुगन वायव्य- पर्जन्याग्नि, पृथिवीलोकानुगत पार्थिव - गायत्राग्नि, अध्यात्मलोकानुगत - पुरुषशरीरस्थ वैश्वान-राग्नि ४, एवं स्त्री - शोणितम्भ - श्रार्त्त वाग्नि " इन पाँच अग्नियों में क्रमश: श्रद्धात्मक सोम ', सोमात्मक सोम, वर्षात्मक सोम ', अन्नात्मक सोम, एवं शुक्रात्मक सोम इन पाँच सोमद्रव्यों की आहुति से ही पाँचवीं आहुती में ' पुरुष ' नाम का प्रजावर्ग अभिव्यक्त हुआ है, जिस इस पञ्चात्मिका अभिव्यक्ति का - ' इति तु या हुतात्रापः पुरुषवचसो भवन्ति ' इत्यादि - छान्दोग्योपनिषत् की सुप्रसिद्धा- ' पञ्चा निविद्या ' से स्पष्टीकरण हुआ है, जैसाकि निम्नलिखित तालिका से स्पष्ट है । १ – द्युलोकः ---२ - अन्तरिक्षलोकः सावित्राग्निः - श्रद्धा — सोम: ( प्रथमाहुतिः ) । • - पर्जन्याग्निः - सोमः - सोम: ( द्वितीयाहुति: ) । ३ – भूलोकः - गायत्रा ग्न: - वृष्टिः — सोमः ( तृतीया हुनि: ) । ४ — अध्यात्मलोकः ( पुरुषः ) - वैश्वानराग्निः -- अन्न – सोमः ( चतुर्थी आहुतिः ) । ५ — योषिल्लोकः ( स्त्री ) - - श्रार्त्तवाग्निः - शुक्र -- सोम ( पञ्चमी आहुति: ) । तत्त्वात्मिका - प्रकृतिनिद्वा- ' अस्पृश्यता ' के नामश्रवणमात्र से भी अपने काल्पनिक मानवतावाद का सर्वनाश उद्घोषित करने लग पड़ता है । तत्त्वमूला अस्पृश्यता रही है, रहेगी, जिस का काल्पनिक मानवतावाद से त्रिकाल में भी उच्छेद, सम्भव नहीं है । हाँ, जो इस तत्त्वमूला ' अस्पृश्यता ' के उच्छेद में प्रवृत्त हैं, उन का प्राणनिबन्धन - सत्त्वानुबन्धी- स्वरूप अवश्य ही कालान्तर में उमी प्रकार उच्छिन्न होजाया करता है, जैसे कि भौतिकी कीटाणुजनिता - सांक्रामिकी अस्पृश्यता की उपेक्षा करने वाला स्वयमेव कालान्तर में रोगाक्रान्त बनता हुआ सम्मानपूर्वक ' कीनाशनिकेतन ' का अतिथि बन जाया करता है । इसी सम्बन्ध में यह भी अविस्मरणीय है कि, शास्त्र की तन्त्रमूला अस्पृश्यता जब रूदिवाद-ग्रहग्रस्त बन कर ' घृणा मूला ' बन जाती है, किंवा धर्म्म का दम्भ करने वाले धर्मध्वजियों के द्वारा स्वार्थ साधन के लिए बलपर्वक घृणा मूला बनाढी जाती है, तो उस अवस्था में यही अस्पृश्यता सामाजिक प्रचण्ड - द्व ेष काही कारण बन जाया करती है, जिस इत्थंभूता अशास्त्रीया - काल्पनिकी - घोरघोरतमा - घृणा मूला अस्पृश्यता ने हीं श्राज भारतीय समाज को विद्वेष की प्रचण्डाग्नि में हीं आहुत कर दिया है । # -विशेष विस्तार के लिए देखिए! छान्दोग्योपनिपन - हिन्दी - विज्ञानभाग्य का तत्प्रकरण [ ५ अध्याय के ४, ५, ६, ७, ८, ६- खण्ड • ] | १२५६
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चतुथ अध्याय सामिधेनीब्राह्मण उक्त पञ्चाग्निनियस से प्रकृत में हमें तीसरे पार्थिव अग्नि ही पाठकों का ध्यान आकर्षित करना है पानि और दृष्टि शतपथ । ह्मगा और डिजल नामक इन्द्र की ओर दोनों के राक्षायनिक सम्मिश्रण से ही सुप्रसिद्ध अन्न उत्पन्न हुआ है, जिन में पार्थिव अग्नि के साथ साथ पृथिवी के मूलभूत काल्वालीकृत-धामखुद - ममम प्रत्रिभा 1 एवं ती पाििवविध मलभाग का भी समावेश रहता है, जिन इन सत्र मलीमस भागों की आश्रयभूमि वह पार्विय ' अप ' तत्व ही है, जिसे ' वरुण ' के सम्बन्ध में ' आसुर -' भाव ' भी कहा जासकता है एक और यदि अन मं परम्परागत सौर दिव्य - खामिषाग्निधारा, इन्द्रप्राण सौम्यप्राण, आदि आदि दिव्यभाव समाविष्ट हैं, तो दूसरी ओर इसी अन्न में तथाकथित- । सुर - वारुण-मलीमसभाव भी अनिवान्यरूपेण समन्वित हैं और वो यह अन्न दिव्यभावानुबन्ध से रसात्मक एवं ग्रासुरभावानुबन्ध से मलात्मक उभयात्मक ही प्रमाणित होरहा है, जैसा कि पूर्व में भी स्पष्ट किया जाचुका है । न में रहने वाले यच्चयावत् आमुर भावों को हम जहाँ वरुणानुगत - ' सुराभाव ' कहेंगे, वहीं यद्ययावत् दिव्य - भावों को इन्द्रानुगत ' सोमभाव ' कहेंगे इसप्रकार प्रत्येक अन्न में - वरुणानुबन्धी-मलात्मक आसुर - दोषमात्र तथा इन्द्रानुबन्धी- रसात्मक- दिव्य - गुण - भाव, दोनों की स्वरूपता सिद्ध होजायगी । वे ही दोनों प्रतिद्वन्द्वी भाव दैवी सम्पत्ति, एवं आमुरीसम्पत्ति नाम से प्रसिद्ध होंगे । दैवीमम्पत्ति को –'गुण ' कहा जायगा, एवं आसुरीसम्पत्ति को ' होप ' कहा जायगा । श्रतएव गुणात्मक रसभाव से अनुप्राणित - ऐन्द्र - सांमभाव को अन्न का ' गुण ' माना जायगा, एवं दोषात्मक - मलभाव से अनुप्राणित – वारुण - सुराभाव की ' दोष ' कहा जायगा " और इसी प्रकृतिसिद्ध तथ्य के आधार पर ' गुणदोषमयं सर्व सृषा मृजति कौतुकी इस मुक्ति का समन्वय सम्मय बन सकेगा । सर्वान्ते च बारुण श्रासुर-मलात्मक मुराभाव की ही आवरणप्रवृत्ति के कारण ' तम ' कहा जाएगा, एवं ऐन्द्र- दिव्य - रसारमक - सोमभाव को ही आवरणनिवृत्ति के कारण ' योति ' कहा जायगा और पूर्वप्रतिज्ञात'तमसो मा ज्योतिर्गमय ' इस श्रौत उद्घोष का यही प्राणविज्ञानसम्मत संक्षिप्त समन्वय होगा, जिसे आधार बना कर ही हमें प्रक्रान्त आरला, तथा मान्य नामक दोनो सुप्रसिद्ध उन भयानक दोपों का संस्मरणमात्र ही कर लेना है, जिन उन सुप्रसिद्ध भवानक टोपों में ही नाव तिस्वरात्मक अत्यन्त प्रियमनोविनोदात्मक सङ्गीत ' जैसे अलौकिक राज्य को भी काल्वालीकृत प्रमाणित कर दिया है । तदेव अयताम! श्रुत्वा चा ताम्!! वरुणपुत्र भृगु का आसुर - तमः प्रधान - वारुणभाग ही ' सुरा ' है, एव वारुणि भृगु का दिव्य-ज्योतिःप्रधान ऐन्द्रभाग ही ' सोम ' है । वारुण - सुराभाग, एवं ऐन्द्र मोम भाग, दोनों क्रमशः मलात्मक एवं रसात्मक है, यह निष्कर्ष उक्त सन्दर्भ से भलीभाँति समन्वित होजाता है । वारुणि होने से ( भागव होने में ) सुरा भी मादकता से समन्वित है, तो सोम भी मादकता से अनुप्राणित है । एक मात्मिका मादकता है, तो दूसरी रसात्मिका मादकता है । प्रत्येक अन्न में मलात्मक सुराप्राण भी रहता है एवं रात्मक सोमयागा भी अतएंव प्रत्येक अन्न शारीरिक अग्नि में आहुत होकर प्राथमिक परिणामरूप से मादकता ही अभिव्यता करता है, जिस के सम्बन्ध में वर्तमान भूतविज्ञान की ऐसी मान्यता सुनी गई है कि भोजनद्रव्य के आमाशय में पहुँचते ही सम्पूर्ण रक्तप्रवाह आमाशय की ओर ही अनुगत १२६०
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चतुथ अध्याय सामिधेनीवाह्मण प्रथमकाण्ड होता है, फलत: ( शारीरिक रक्त प्रवाह के एक तोऽनुगामी बन जाने से ही ) भोजनानन्तर ' तन्द्रा ' जाने लगती है, जो विश्रामात्मिका शय्या की अनुगति से आगे जाकर ' निद्रा ' के रूप में परिणत होजाया करती है । इस भूतदृष्टि से हमारा कोई विरोध नहीं हैं । हम तो उस प्राणदृष्टि की ओर ही पाठकों का ध्यान याकर्षित करना चाहते हैं, जो स्वयं सुरा, और सोम नामक दो मादक भावों से समन्वित होकर अन्न की मूलप्रतिष्ठा बनी हुई है । तन्द्रा किंवा निद्रा, इसी अन्न की मादकता का परिणाम है । अतएव लोकव्यवहार में ' अन्न को मादक ' ही माना गया है । प्राप्यवारण - सुराभाग अपने सहज मलभाव से एकप्रकार का वैसा ' विष ' है, जिससे जीवनीय - शक्ति का ह्रास, किंवा श्रभिभव ही सम्भावित है । जबकि सौम्य ऐन्द्र - सोमभाग अपने सहज शिवतम रसात्मक-रसभाग से एक प्रकार का वैसा अमृत ' ही है, जिससे जीवनीय - शक्ति का संवर्द्धन, किंवा अभिव्यक्ति निश्चित है । अध्यात्मरचना के रचयिता शिल्पी प्रजापतिने मानव के प्रतिरूपात्मक - शरीरशिल्प में कण्ठप्रदेश में एक बेस लगा दिया है, जिस के द्वारा भुकान का सुरात्मक विभाग नियन्त्रित होकर, रस - मल के प्राथमिक विशकलनात्मक विश्लेषण से अन्नगत अमृतभाग ( सोमभाग ) से पृथक् होकर परावर्तित ही होजाता है । यां इस गलयन्त्र के अनुग्रह से मानव का जीवनीय प्राण अन्न के विभाग से, सुराभाग से अधिकांश में अपना परिणाण ही कर लेता है, जबकि अनुशयरूप से तो विष का अंश भी गलाधःकरणानुकूलव्यापार का विषात्मक अनुगामी बन ही जाता जाता है है,, और और यही शरीरश्रविष्ट सुभाग जृम्भा ( जँ भाई - गडाई ) - तन्द्रा - श्रालस्य - ) आदि रूप से अभिव्यक्त होता है । एक व्यक्ति के भाई लेने का अर्थ है - विषप्राण का मुक्त होकर पुनः बाहिर निकलना । इस सांक्रामिक विषप्राण-से सभीपस्थ अन्य व्यक्तियों का भी विषप्राण सङ्गाकर्षण से जागरूक होपड़ता है, जिस जागृति के निरोध के लिए ही जॅमाई करने वाले के लिए शास्त्र ने ' अलिध्वनि ' का आदेश दिया है, जिस ध्वनि के साविक स्वरूप के बिश्लेषण का अवसर नहीं है | मलात्मक - सुरारूप विष, रसात्मक सोमरूप अमृत, जीवनविघातक तथा जीवनसंरक्षक, इन दोनों का विभाजक कण्ठमध्यस्थ वही माङ्गलिक यन्त्र - " प्राशि-ऋषि ' नाम से ही वेद के ब्राह्मणभाग में प्रसिद्ध हुआ है । अन्नथित इह्रीं विषामृत - मय, सुरा - सोमात्मक-तपो - ज्योतिर्मय -दोष- गुणान्वित- द्विविरुद्ध भावों को लक्ष्य बनाकर ही ऋषिने अन्न को ' सुरा ' भी कहा है, एवं ' सोम ' नाम से भी यह अन्न व्यवहृत हुआ है । देखिए! १ – “ अनृतं पाप्मा, तमः सुरा " ( शत ० ५ १२२ | १० | ) | - " अभिमाद्यचिव हि सुरां पीत्वा वदति ( शत ० १ | ६ | ३ | ४ | ) ३ – “ तस्मात् सुरां पीत्वा रौद्रमनाः " ( शत ० १२७०३।२० । ) । १ २ ३ छक्का – पतन- जृम्भासु-२ ३
-जीवो निष्ठाङ्ग लिध्वनिः ।
गुरुणापि कर्त्तव्या अकृत्वा ब्रह्महा भवेत् ॥
१२६१ - स्मृतिः
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चतुर्थ अध्याय सामिधेनीमब्राह्मण शतपथब्राह्मण ४ – “ यदन्नश्य - शमलमासीत् सा सुरा अभवत् " ( तै ० ना ० १ । ३ । २ । ६ । ) । ५ – “ स्फिगीभ्यामेवास्य भामोऽस्रवत् । सा सुराभवत् - अन्नस्य रसः " ( शत ० १२ | ६ | १ | ७ ) । - " पांच वाऽएष श्रोषधीनांच रसः, यत्सुरा ( शत ० १२२८ । १ । ४ । ) । ७– “ अन्नं सुरा ” ( तै ० ब्रा ० १ | ३ | ३ | ५ | ) | ८. - " प्रजायतेर्वा एते अन्धसी, यत्सोमश्व, सुरा च " ( शत ० ५ | १ | १ | १० | ) ६- - " सत्यं वै श्रीतिः सोमः " ( शत ० ५ । १ । २ । १० । ) । १०- “ एष नैं सोमो राजा, अन्नाद्यम् ' ( कौ ० ब्रा ० ६।६ । ) । ११– “ एतद्व ै देवानां परमं - अन्न ं यत्सोमः " ( तै ० ब्रा ० १ ३।३।२ । ) । १२– “ एतद्वै परममन्नाद्यं ं , यत्सोमः " ( कौ ० ब्रा ० २।३।७ । ) । १३ “ अन्नं नै सोमः ” ( शत ० ३ | ६ | १ | ८ | ) | १४ - " प्राणः सोमः " ( शत ० ७ | १ | १ | २२ | ) | १५ - " आपः सोमः सुतः " ( शत ० ७।१।१।२२ । ) । १६- “ सौम्या श्रोषधयः " ( शत ० १२।१।१।२ । ) । सुरा, और सोम, इनदोनों विरुद्ध प्राणों से कृतमूर्ति अन्न की आहुति ही मानव के उस वैश्वानराग्नि को प्रदीप्त - उद्दीप्त - प्रज्वलित रखती है, जिस वैश्वानराग्नि को ही हमनें पूर्व में नाद - श्रुति स्वर - नामक तीन सङ्गीत-- सुरा नै मलमन्नानां, पाप्मा च मलमुच्चते । तस्मात् ब्राह्मण - राजन्यौ, वैश्यश्च न सुरां पिबेत् ॥ —मनुः जातिभ्रंशकर, मलिनीकरण, संकरीकरण, भेद से मादक द्रव्यों का शास्त्र ने त्रिधा वर्गीकरण किया है । वे ही तीनों विभाग क्रमशः ' सुरा - सीधु आसव ' इन नामों से प्रसिद्ध हैं । ' ब्राह्मणो मदिरां पीत्वा ब्राह्मण्यादेव हीयते ' के अनुसार सुरा वर्ण की ही उच्छेदिका है । भँग- चरस - गाँजा - अमल - सुलफा - कोकीन --पोसत अर्कपर्ण आदि मादकद्रव्य मलिनीकरण हैं एवं जर्दा तम्बाकू सिगरेट - बीड़ी आदि मादकद्रव्य सङ्करीकरण हैं । तीनों हीं मादकवर्गो में न्यूनाधिकरूपेण जीवनीय रस को नष्ट- अभिभूत करनेवाला विष रहता है । तीनों में सर्वतोऽधिक भयावहा सुरा की पैंटी - गौडी माध्वी ये तीन प्रमुख जातियाँ मानी गई हैं, जिनके प्रत्येक के अवान्तर भेदोपभेद सुराप्रकरणों में उपत्र हित हैं । १२६२
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चतुर्थ अध्याय सामिधेनीब्राह्मण प्रथमकाण्ड प्रतिष्ठाओं का प्रवर्त्तक बतलाया है । यहीं, इसी दृष्टिबिन्दु पर यह भी समन्वय करलेना चाहिए कि, सङ्गीत का शब्दात्मक - व्यञ्जनात्मक पार्थिव अनुष्टुप - मर्त्यभाव | पन्न - क - च - ट - त- पादि - रूप जितना - भूतभाग है ( सङ्गीत के शब्दात्मक बोल हैं ), वह भूतभाग तो वैश्वानराग्नि में अन्तर्य्याम - सम्बन्ध से प्रतिष्ठित अन्न के मलात्मक - तमो-मय - मर्त्य - सुराभाग से अनुप्राणित है, एवं श्रुत्यनुगत रूप जोस्वरभाग ( मधुमय वितान भाग ) है, वह वैश्वान-राग्नि में प्रतिष्ठित अन्न के रसात्मक ज्योतिर्मय - अमृत रसात्मक- सोमभाग से अनुप्राणित है । सौभ्यप्राण ही स्वररूष में परिणित हुआ है, एवं अन्न का भूतभाग ही स्वरानुगत व्यञ्जनों के रूप में परिणत हुआ है । यों सुरा सङ्गीत के शब्दात्मक व्यञ्जनों को, तथा सोम सङ्गीत के तानात्मक स्वरों की प्रतिष्ठा बने हुए हैं-अन्नपरम्परया, यही वक्तव्यनिष्कर्ष है । " सोमरसात्मक- ' स्वर ' तत्त्व " के इसी तथ्य को लक्ष्य बना कर श्रुति ने कहा है-" स यदाह स्वरोऽसीति, सोमं वा एतदाह । एप ह वै सोमः सूर्यो भूच्चा अमु-मिल्लोके स्वरति । तत् - यत् - स्वरति, तस्मात्- ' स्वरः ' । तत् - स्वरस्व - स्वरच्चम् । — गोपथब्राह्मण पू ० ५।१४ । गोपथश्रुति ने कहा है कि, – “ सो जो कि जिसे ' स्वर ' कहा है, वह इस ' सोम ' को ही कहा है । अर्थात् सोम के अभिप्राय से ही ( इस प्रकरण में ) ' स्वर ' शब्द प्रयुक्त हुआ है । निश्चयेन यह सोम ही सूर्यरूप में परिणत होकर स्वरमाण है । क्योंकि सोम ही सूर्यरूप में परिणत होकर स्वरभाव से समन्त्रित होरहा है । अतएव सोम को ' स्वर ' कहा गया है " । क्या तात्पर्य्य? | तात्पर्य्य स्पष्ट है । बतलाया गया है कि, सोम उस परमेडीलोक की ही वस्तु है, जिस पारमेष्ठ्य – वारुण – भृग्बङ्गिरोमय - आपोलोक के गर्भ में विभ्राट् भी सूर्य एक बुद्बुद् से अधिक अपनी कोई क्षमता नहीं रखता । पारमेष्ठ्य वह सोम जहाँ ' दाह्य ' है, वहाँ सौर सावित्राग्नि ' दाहक ' है । स्वत्वरूपेण सोम भी कृष्ण ( नीरूप है, एवं ' आकृष्णेन रजसा वर्त्तमानः ' के अनुसार स्वयं सूर्य्य, किंवा तद्रूप सावित्राग्नि भी कृष्ण ( ज्योतिर्विद्दीन ) ही है । इस दाहक कृष्णाग्नि में उस दाह्य - कृष्ण सोम की निरन्तर आहुति हो रही है, इसीसे सूर्य - ' अग्निहोत्र ' रूप में परिणत होरहा है - ( सूर्यो हवा अग्निहोत्रम् ) | दा सोम दाहक सौर अग्नि में आहुत होकर प्रज्ज्वलित होपड़ा है, और यही सौर प्रकाशात्मक- रश्मिमय वह साममण्डल है, जिसे हमने पूर्व में ' बरसाम ' कहा है । पिण्ड की मण्डलरूप में परिणति ही पिण्ड की स्वररूपता है । क्योंकि सोम ही प्रकाशमण्डलात्मक स्वररूपता में परिणत हुआ है । अतएव सोम के लिए ही यह कहा जाता है कि- ' हे सोम! श्रापने हीं ज्योतिरूप से विश्वान्धकार को फाड़ दिया है ', जैसा कि निम्न लिखित मन्त्रवर्ण से स्पष्ट प्रमाणित है—
त्वमिमा ओषधीः सोम! विश्वास्त्वमपोऽजनयस्त्वं गाः ।
त्वमा ततन्थोर्वन्तरिक्षं - त्वं ज्योतिषा वि तमो ववर्थ ॥
— ऋक्सं ] ० १।६१ | २२ | १२६३
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चतुर्थ अध्याय सामिधेनीब्राह्मगा शतपथब्राहाण ऐमी है यह सुरा, और ऐमा है यह सोम, जो यों - मलात्मिका दोषपूर्णा मादकता, तथा रसा-त्मिका गुणपूर्णा मादकता से समन्वित हो रहे हैं । सुरा के मलात्मक दोष की, तथा सोम के रसात्मक गुण की भूतदृष्ट्या मृत प्राणी, एवं जीवित प्राणी के भौतिक शरीरों से तुलना की जासकती है । कथमिति चेत्?, श्रयताम्! | जब मानव का भूतात्मा शतायुर्भोग- कालानन्तर इस भौतिक शरीर का परित्याग कर देता है, तो मानवशरीर - ' शव ' रूप में परिणत होजाता है । भूतात्मोत्क्रान्ति के साथ ही शारीरिक भूर्ती के मलभागों का निरन्तर विशोधन करते रहने वाला, अतएव ' पत्रमान ' नाम से प्रसिद्ध जीवनीय - रसात्मक - पारमेष्ठ्य-अमृत- सोमप्राण भी उत्क्रान्त होजाता है । इस पवमान सोम के उत्क्रान्त होते ही भौतिक शरीर का मलात्मक-वारुण – आप्य सुराभाग असपत्न रूप से पूर्ण मात्रा से अभिव्यक्त होपड़ता है । यही प्रचण्ड गन्ध ' शत्र-गन्ध ' ( दुर्गन्ध ) नाम से प्रसिद्ध है, जो दुर्गन्ध एक जीवित प्राणी के लिए क्षणमात्र के लिए भी सह्य नहीं हुआ करती । एकमात्र क्रव्यादाग्निदेव ही इस शत्रदोष को विलीन करने की क्षमता रखते हैं । वैश्वानराग्निमूर्ति भूतात्मा से जबतक भौतिक शरीर तप्त रहता है, तभीतक यह पवित्र सोम शरीर में अन्तर्य्याम सम्बन्ध से प्रतिष्ठित रहता है । वैश्वानराग्नि की उत्क्रान्ति के साथ ही यह सोम भी उत्क्रान्त हो जाता है । और यों उस अवस्था में तापशून्य, अतएव तप्त - इस शवशरीर से अग्निसहधर्म्मा पवित्र सोम का भी कोई सम्बन्ध नहीं रह जाता । यह वही पवित्र सोम तत्त्व है, जिसका गाङ्गयतोय में समावेश हुआ है । अतएव पारमेष्ठ - पवित्र सोम, और पार्थिव गाङ्गयतोय, दोनों अभिन्न मान लिए गए हैं । जबतक यह पावन सोम मानवशरीर में प्रतिष्ठित रहता है, तभीतक सुराजनित - मलीमस - भौतिक- दुर्गन्धि-किट्ट - मलादि - दोष मानवशरीर को अभिभूत नहीं कर सकते । सोम के इसी पवित्रधर्म का स्पष्ठीकरण करते हुए
ऋषि ने कहा है-पवित्रं ते विततं ब्रह्मणम्पते! प्रभुर्गात्राणि पर्येषि विश्वतः ।
तप्ततनूर्नतदामो अश्नुते शृतास इवहन्तस्तत् समाशत ॥
- ऋक्सं ० ६।८३ | १ | ईश्वरीय - आधिदैनिक - प्राणात्मक - सुसूक्ष्म - विश्व में सुरात्मक तमोमय- श्राप्य - आसुर - चारुणप्राण, तथा सोमात्मक्र — ज्योतिर्म्मय - सौम्य - दिव्य - ऐन्द्रप्राण, इन दोनों प्राणों का कैसा, और क्या स्वरूप है?, इनका किस लोकपुर ( परमेष्ठीपुर ) से सम्बन्ध है? इत्यादि मौलिक प्रश्नों के समाधान - समन्वय के लिए ही सुरा, और सोम, शब्दों का आधिदैविक चिरन्तन- इतिवृत्त पाठकों के सम्मुख रखा गया । अब इन दोनों के आध्यात्मिक ( मानवीय ) संस्थान की ओर ही सङ्गीतप्रेमियों का ध्यान आकर्षित किया जारहा है, जिसे थोड़े अवधानपूर्वक ही लक्ष्य बनाने का अनुग्रह होना चाहिए । अध्यात्मसंस्था में आत्मा, बुद्धि, मन, शरीर, नामक चार सुप्रसिद्ध पर्व हैं, जिन इन चारों पर्वों में से ' बुद्धि - मन- शरीर - इन तीन पर्वों के प्रभव - ( उत्पादक ) - प्रतिष्ठा ( आधार ) - परायण - ( लयस्थान ) प्रकृति - जगत् के क्रमशः " सूर्य्य- २ चन्द्रमा - भूपिण्ड ये तीन पर्व ही बने हुए हैं । सौरी बुद्धि, चान्द्र मन, पार्थिव शरीर, मानव के इन तीनों तन्त्रों में यदि बुद्धि का सर्वोपरि स्थित दिग्देशकालातीत ' आत्मा ' नाम के तुरीयपढ के साथ सम्बन्ध मान लिया जाता है, तो उस दशा में मानव के चारों पर्व आत्मा - बुद्धि, एवं १२६४
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चतुर्थ अध्याय सामिधेनीब्राह्मण प्रथमकाण्ड मनः - शरीर, इन दो पृथक् संस्थानों में विभक्त होजाते हैं । सोम, और सुरा नामक प्राणों के समन्वय के लिए, हमें अध्यात्म के मन और शरीर नामक दोनों चान्द्र पार्थिव पर्वो को हो लक्ष्य बना लेना है | मन चान्द्र है - ' चन्द्रमा मनसो जात: ' - ' मनश्चन्द्र ण लीयते ' के अनुसार । पाञ्चभौतिक शरीर का पृथिवीत्व तो सर्वत्रोधगम्य है ही । ' एप वै सोमो राजा देवानामन्न ', यच्चन्द्रमाः ' के अनुसार मन का प्रभव चन्द्रमा सोमात्मक है । ' अद्भ्यः पृथिवी ' के अनुसार शरीर का प्रभव भूपिण्ड - अपने मौलिक - उपादान से आप: प्रधान बनता हुआ वारुण - सुर प्राणात्मक है । यो चान्द्रसोममय - मन, एवं पार्थिव सुरामय शरीर, ये दोनों आध्यात्मिक पर्व ही आध्यात्मिक सोम, और सुरातत्त्व हैं, जिन्हें श्राधिदैविक सोम, और सुरा - प्राणों के प्रतीक नहीं, अपितु साक्षात्- ' प्रतिरूप ' ही माना जायगा । सोमात्मक मन की शास्त्र ने दो विभक्त अवस्थाएँ मानी हैं । यदि ऐन्द्रियक विषयों में आसक्त मन इन्द्रियवशबर्त्तो बनता हुआ फलकामुक ही प्रमाणित होजाता है, तो इस अवस्था किंवा दुरवस्था में यह सौम्य मन सौ बुद्धि के सत्त्व जुणात्मक - इन्द्र के अनुग्रह से ( ज्योति के अनुग्रह से ) वञ्चित होता हुआ स्व— ज्योति: स्वरूप से उसीप्रकार अभिभूत होजाता है, जैसेकि कृष्णपक्षीय चन्द्रमा सौर इन्द्रज्योति से वञ्चित होता हुआ कृष्णरूप में परिणत होजाता है । * तमोमय- वारुण- सुरात्मक - भौतिक - ऐन्द्रियक विषयों में यासक्त ऐसा ही मन - भूतात्मा के बन्धन का कारण माना गया है । ठीक इसके विपरीत यदि यही सौम्य मन सौरी बुद्धि के इन्द्रप्राण से समन्वित रहता हुआ ( बुद्धियोग-निष्ठ बनता हुआ ), बुद्धि के तेजोमय सङ्गधर्म से अनुप्राणित होकर विषयों का अनुगमन करता हुआ । भी असत बना रहता है, तो ऐसा मन उसी प्रकार ज्योतिम्मय है, जैसे कि शुक्लपक्षीय चन्द्रमा सौरज्योतिरिन्द्र के प्रतिफलन से ज्योतिर्मय बना रहता है । ऐसा प्रसङ्ग, ज्योतिर्मय बुद्धियोगान्वित -सत्त्वमन हीं भूतात्मा के बन्धनविमोकका प्रवर्तक माना गया है । यों - सौरीबुद्धि से युक्त सत्यमन, एवं सौरीबुद्धि से नियुक्त * चन्द्रमा का चन्द्रिका रूप प्रकाश ( ज्योलना ) सौर- इन्द्र- ज्योतिर्मय - रश्मियों का प्रतिफलन-मात्र ही है । चिना सौर- इन्द्रप्रकाश के चन्द्रमा अपने प्रातिस्त्रिकरूप ने घार कृष्ण ही है, जैसा कि ' चन्द्रमा वै ब्रह्मा कृष्ण: ' ( शत ० वा ० ) इत्यादि से स्पष्ट है । प्रतिफलनात्मक इसी सौरज्योतिर्भाव को लक्ष्य
में रखकर श्रुति ने कहा कि - -अत्राह गोरमन्वत नाम त्वष्टुर पीच्यम् ।
इत्था चन्द्रमसो गृहे ॥
—–ऋक्सं ० १२८५।१५ ।
-- न देहो न च जीवात्मा नेन्द्रियाणि परन्तप! ।
मन एव मनुष्याणां कारणं बन्ध - मोक्षयोः ॥
- प्राचीनसूक्तिः १२६५
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चतुर्थ अध्याय सामिधेनीब्राह्मण शतपथब्राहाण तमोमन, भेद से एक ही मन की दो विभिन्न अवस्थाएँ होजातीं हैं, जिन इन दोनों में से सत्त्वमन का तो बुद्धि के क्षेत्र में ही अन्तम मान लिया जाता है । फलतः मनस्त्वेन मन तमोरूपेणैव शेष रह जाता है, जोकि इन्द्रियों के माध्यम से शरीरासक्त बनता हुआ तम से ही अभिमूल रहता है । ऐसा सौम्य मन ही विषयासक्तिरूप प्रचण्डतमोरूप - ' आवरण ' से सदा ही श्रावृत रहता है । और सौम्य मन के इसी आवरणदोष का नाम है पूर्वप्रतिज्ञात- ' मात्र्य ' नामक भयानक दोष । बुद्धि का सहज गुण माना गया है – “ धृति, ” जिस गुण के कारण ही बुद्धिरूप उक्थ की रश्मिरूपा वृत्तियां -- ‘ धियः ' नाम से प्रसिद्ध हैं, जैसाकि – धियो यो नः प्रचोदयात् ' से स्पष्ट है । ' स्थिरता ' ही घृति का स्वरूप – परिचय है, जिस इस वौद्धिकी निरतिशया स्थिरता के अनुबन्ध से ही वह बौद्धिक- घृतिधर्म्म-' नितरां स्थितिः ' रूप से ' ' निष्ठा ' नाम से प्रसिद्ध हुआ है । व्यवसायात्मिका धृतिगुणसमन्विता, अतव निश्चित - निर्णयात्मिका ऐसी ' निष्ठाबुद्धि ' से समन्वित विवेकशील सात्त्विक मानव ही ' नैष्ठिक ' कहलाया है । ' निष्ठया हि प्रतिष्ठा स्यात् ' के अनुसार बौद्धिक निष्ठा ही मानव की प्रतिष्ठा का प्रमुख आधार है | बुद्धिका प्रभब सूर्य - ' मध्ये एकल एवं स्थाता ' - बृहद्ध - तस्थौ - भुवनेष्वन्तः -- सूर्यो बृहतीमध्यूढस्तपति ' इत्यादि के अनुसार मौरसम्बत्तर - मण्डल के मध्यवर्ती ' बृहतीछन्द ' नामक विष्वद्-वृत्त के केन्द्र में सबथा स्थिररूप से ही प्रतिष्ठित है, जिस इस स्थिर - सूर्य के चारों ओर ' क्रान्तिवृत्त ' के आधार पर तो भूपिण्ड परिक्रमा लगा रहा है, एवं अपने दक्षवृत्त के आधार चन्द्रमा भूपिण्ड के चारों और परिभ्रममाा है । सूर्य क्योंकि स्थितिभावापन्न है, अतएव तत्प्रसूता बुद्धि भी अपने प्रातिश्विक धर्म से स्थिरधर्म की ही प्रयोजिका बनी हुई है । बुद्धि का यह स्थिरधर्म ही निष्ठा कहलाया है । इधर चान्द्र मन नक्षत्राधिपति चन्द्रमा के प्रतिक्षण - विलक्षण - विचक्षण- परिवर्तित होने से उक्त निष्ठारूप -- स्थिरधर्म से प्रकृत्यैव वञ्चित है । अतएव निष्ठाशून्य, अतएव च नितान्त भाबुक इस चञ्चल मन को धृतिशून्य ही कहा गया है । इस चाञ्चल्य का ही नाम हैं- ' माल्य्य ', जिसकेअनुग्रह से मानव सभी क्षेत्रों में ' क्षणे तुष्टाः क्षणे रुष्टाः ' को ही चरितार्थ करता रहता है । जिस व्यक्ति का मन दुर्भाग्यवश स्थिरधर्म्म प्रयोजिक ' - व्यवसायात्मिका - निष्ठाबुद्धि के नियन्त्रण से पृथक् होजाता है, मनोवशवर्ती वह मानव अपने मानस - भावों को उसी प्रकार अस्तव्यस्तरूप से, अनर्गल-रूप से विभिन्न शारीरिक - हस्त - पाद - मुख नेत्रादि - मुद्राओं से अभिव्यक्त करता रहता है, जो भावभङ्गिमाएँ शिष्टजन -सम्प्रदाय में ग्लानिकर ही मानी गई हैं । बात बात पर प्रचण्ड अट्टाहास - [ फूहड़पने से मुख-विविर को विदीर्ण कर हा - हा - ही - ही - श्रो- हो - हो - इत्यादिरूप से प्रचण्डहास ] करते रहना, कराया करते रहना [ ताली बजाते रहना, चुटुकी बजाते रहना ], पादाघात [ पैर पटक पटक कर धमाधम करते - फट - कट -करते चलना, श्रथवा तो पैर रगड़ - रगड़ कर घिसते हुए चलना ], मुखवाद्य [ सीटी बजाना, मुख से चप् – चप्-* - चञ्चलं हि मनः कृष्ण! प्रमाथिबलवद्दृढम् । तस्याहं निग्रहं मन्ये वायोरपि सुदुष्करम् ॥ -गीता । १२६६
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चतुर्थ अध्याय सामिधेनीब्राह्मण प्रथमकाण्ड टप् -- टप् - धम् -- त्रम् -- भौं - भौं - आदि अनेक प्रकार की ध्वनियाँ करते रहना ], चक्षु से विभिन्न प्रकार की भावभङ्गियाँ अभिव्यक्त करते रहना, मनःप्रधान नारीवर्ग की माँति विविध प्रकार के शृङ्गार - हाव - भाव - वेश-भूषा - विन्यास - चटक - मटक यादि स्त्रैणभावों का अनुगमन करते रहना, यादि आदि भावुकतापूर्ण सभी व्यासङ्ग धृतिगुणविरोधी-- निष्ठाविरोधी - गाम्भीर्य्यविरोधी जिस भयानक मानसदोष से अभिव्यक्त होते रहते हैं, उसी मानसदोष का नाम है- ' माय ', जिसका अबोध बालकों में, सौम्य नारीवर्ग में, एवं अशिक्षित - यथा-जात -- प्राकृत - मानवों में साक्षात्कार किया जासकता है । मन सोमात्मक है, अब इस मानस- माल्ब्य दोष को हम सोमानुबन्धी दोष ही कहेंगे । एवं ग्रत्रैव एक प्रासङ्गिक विशेष तथ्य की ओर पाठकों का ध्यान आकर्षित करदेना चाहेंगे । पूर्व में तम, और ज्योति का स्वरूप- समन्वय करते हुए हमने सोम को ज्योतिस्तत्त्व कहा है, एवं सुरा को तमोभाव बतलाया है । एव तत्रैव ज्योतिर्मय सोम को ऐन्द्रतत्त्व प्रमाणित करते हुए इसे प्रजापति की गुरण - विभूति, तथा तमोमयी मुरा को वारुणतत्त्व छतलाते हुए इसे प्रजापत की दोपविभूति कहा गया है । इन्हीं सोम-सुरात्मक गुण - दोषों को ज्योतिर्मयी देवीसम्पत्ति, तया तमोमयी आसुरी - सम्पत्ति नामों से व्यवहृत करते हुए- ' गुणदोषमयं सर्वं स्रष्टा सृजति कौतुकी का उद्घोष किया है [ देखिए पृ ० स ० १२६०- ] । अत्र प्रकृत में - ‘ मात्र्य ' दोष की स्वरूपमीमांसा करते हुए हम सोमात्मक मनस्तन्त्र को भगानकदोष से समन्वित प्रमाणित करने की चेष्टा कर रहे हैं, जबकि पूर्व में इसी सोम को ऐन्द्री - ज्योति विभूत बतलाते हुए मन के स्वरूप – प्रतिष्टात्मक — इसी सोम को हमने महान गुरण हीं प्रमाणित किया था । पूर्वापरविरोधात्मक यह कैसा वदतोव्याघात?, इसी प्रासङ्गिकी विप्रतिपत्ति के निराकरण के लिए हमें यहाँ इस प्रसङ्ग का पुनः स्मरण करना पड़ रहा है | जैसा कि स्पष्ट किया जाचुका है, रसात्मक निवृत्तिप्रधान मन ', तथा वलात्मक प्रवृत्तिप्रधान मन ', के भेद से एक ही मनके सात्त्विक मन ', तमामन, भेट से शुक्ल चन्द्रमा ', कृष्णचन्द्रमा २ की भाँति दो स्वरूप होजाते हैं, जो द्विविध मन अन्तर्मन ', बहिर्मन नामों से भी प्रसिद्ध हैं, एवं जिन इन दोनों मनस्तन्त्रों के लिए ही गीता में क्रमशः मन्मना ', उन्मना, भाव अभिव्यक्त हुए हैं । चन्द्रमा के उपरि धरातल पर प्रतिष्ठिता मौरी बुद्धि ही इन्द्रप्राणात्मिका जनती हुई ज्योतिर्म्मयी है । जब चान्द्रमन का इस ज्योतिम्मश्री सौरी बुद्धि से अन्तयमात्मक ग्रन्थिबन्धन सम्बन्ध होजाता है, तो वही मन सौर -- इन्द्र से समन्वित होता हुआ ज्योतिर्म्मय बन जाता है । एवं जब ज्योतिम्मयी - ऐन्द्री - बुद्धि के श्राभ्यन्तर-अनुग्रहात्मक योग से वञ्चित होता हुआ मन ऐन्द्रियक- विषयों में आसक्त होता हुया भौतिक -- पार्थिब तमः प्रधान - ग्राध्य -- वारुण-- ग्रावरणात्मक संस्कारों से प्रावृत होजाता है, तो बही मन ऐन्द्र- ज्योतिर्भावानुग्रह से वञ्चित होता हुआ तमाभाव में हीं परिणत होजाता है । ऐसा विषयासक्त तयोमय मन ही तथाकथित माल्व्यदोष की प्रसारभूमि मान लिया गया है । इस स्थिति - विश्लेषण के अनन्तर पूर्व में मनोमय सोम को ज्योतिर्मय - गुणभाव बतलाना, एवं यहाँ उसी सोमात्मक मन को तमोमय - माल्य्य - दोष - मय बतलाना निर्विरोध ही समन्वित होजाता है, इतिनु सर्व सुस्थं प्रकृतिस्थमेव । बुद्धिनिबन्धना ' स्वरतालक्षणा निष्ठा से अनुप्राणित- ' धैर्य्य ' ही मानव के पुरुषार्थ - कर्म - निबन्धन -' पौरुप ' की मूलप्रतिष्ठा माना गया है । गन्धर्ण - अप्सरा - प्राण - निबन्धन - सौम्य - मन से अनुप्राणित नृत्यगीत -१२६७
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चतुर्थ अध्याय सामिधेनीब्राह्मण शतपथब्राह्मण वाद्यात्मक सङ्गीत निश्चयेन मानव के पौरुष - प्रवर्त्तक ' धै ' को विकम्पित ही कर देता है । इस धृतिविच्युति का ही नाम है — ' माल्ञ्यदोष ', जो भूतजगत् में- ' सुरा ' [ मद्य - शराब ] से समतुलित है । ताताथैय्या करते रहने वाले पौरुषविहीन परढवर्ग ( हिजड़े - गतराड़े - भाँड - आदि ) सुरात्मक इसी ' माल्यदोष ' से आपाद-मस्तक समा'लुत रहते हैं । अतए आचारनिष्ठात्मक -- कर्त्तव्यपथानुगमन, तत्त्वचिन्तन, मनन, याटि श्रादि धैर्य्यभावनिबन्धन निष्ठापथ तद्वर्ग के लिए दूरत: ही प्रणम्य बने रहते हैं, जो कि धृतिमूलक निष्ठापथ ही ब्राह्मण का वर्णानुबन्धी प्रमुख कत्तव्य माना गया है । एकमात्र इसी ग्रनुबन्ध से श्रुति ने तस्माद्ब्राह्मणो न गायेत, न नृत्येत ' यह आदेश प्रदान किया है । सुप्रसिद्धा मैत्रायणी श्रुतिने धृतिगुण विरोधी, तथाकथित माल्व्यदोष का इन शब्दों में स्पष्टीकरण किया है— So " अह वै प्रजापतेरात्मनो धैर्य्यमासीत्, अर्द्ध माल्व्यम् । यद्द्वैर्य, तत् पुरस्तात् कुरुत । यन्माल्यं, तत् पश्चात् पर्योहत । यद्ध - सोमः सः । ततो ब्राह्मण-मसृजन । तस्माद् ब्राह्मणः सर्व एव ब्रह्माभिधीरः । बन्माच्या सुरा वै सा । ततो राजन्यमसृजत । तस्माज्ज्यायाँश्च कनीयाँश्च स्नुपा च श्वसुरश्व सुरां पीचा विलालपत आसते । माल्ब्धं हि तत् । पाप्मा वै माल्व्यम् । तस्मात् ब्राह्मणः सुरां न पिबेत् । पाचमना-आत्मानं नेत् संसृजा - इति " । - मैत्रायणी श्रुतिः 2 यह तो सोममय - मानसिक- ' माल्व्यदोष ' का स्वरूपेतिवृत्ति - समन्वय । अब क्रमप्राप्त उस-हुआ । ' आग्ला ' नामक दूसरे भयानक दोष की स्वरूप - मीमांसा भी कर लीजिए, जिसका वैज्ञानिक महर्षियोंनें मानव के भौतिक - शरीर के साव प्रधान सम्बन्ध माना है । जिसप्रकार मन का स्वरूप निर्माण - भार्गव सोम से हुआ है, एवमेब शरीर के निर्माण में प्रधान द्रव्य भार्गव चारुण अपतत्त्व ही बना हुआ है । मन-सौम्य है, तो शरीर आप्य है । क्योंकि मन का प्रभव चन्द्रमा सौम्य है, तो शरीर का प्रभव भूपिण्ड आन्य है । ' समुद्रमभितः पिन्वमानम् ** के अनुसार भूपिण्ड रोदसी त्रैलोक्य के सुप्रसिद्ध क्षरभावापन्न, श्रुतएव वारुण, अतएव च अपेय: ' अत्र समुद्र ' के ही गर्भ में प्रतिष्ठित है, जिस समुद्र में परमाणुरूप से व्याप्त पार्थिवपरमाणुओं का सुप्रसिद्ध - ' एम्पवराह ' नामक ' भूव । यु ' से ही संवरण होता रहता है । इसी संवरण एवं प्राप्ति - व्याप्तिधर्म से पुञ्जीभूत होजाने वाले वे ही पार्थिव परमाणु आगे चलकर ' भूपिण्ड ' रूप में परिणत होजाते हैं । यही वराहभगवान् के द्वारा समुद्र में
* पपृष्ठमसि योनिरग्ने समुद्रमभितः पिन्वमानम् ।
बर्द्धमानो महाँ य च पुष्करे दिवो मात्रया वरिम्णा पृथस्त्र ॥
— यजुः सं ० १३।२ । - तासामन्या अन्यतरा तिलवणा - चारघम्मान्विताः - अपेया: -- ताः - अशान्तराः-आपः - समुद्र वृत्त्वा - अतिष्ठन् | ( गो ० ब्रा ० १।३ । ) — १२६८