Shatpath Brahman 1 2 — पृष्ठ 981–990
शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - १-२ - मोतीलाल शास्त्री · पृष्ठ 981–990
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चतुथ अध्याय सामिधेनीब्राह्मण शतपथब्राह्मण यह तो हुआ नाद - श्रुति - स्वर - भावों का सङ्गीतानुगत, तथा उच्चारणानुगत - स्वरूप - समन्वय का प्रास-ङ्गिक दिग्दर्शन । अब दो शब्दों में परब्रह्मानुगता अर्थसृष्टि [ भृतभौतिकी पदार्थसृष्टि ] के अनुबन्ध से भी ' स्वर ' की आराधना कर लीजिए । सम्पूर्ण विश्व की उत्पत्ति ' शब्द तन्मात्रा से एवं तत्प्रसूता स्पर्श-* रूप - रम - ' गन्ध - मात्राओं से ही हुई है, यह पूर्व में स्पष्ट किया जाचुका है । इन पाँचों हीं तन्मात्राओं का मूलाधारभूत मौलिक शब्दतन्मात्रात्मक वह तत्त्व है क्या? इस प्रश्न का उत्तर है - " तत्त्वात्मक, ऋक्-यजुः साम - नामक - अपौरुषेय - वेद " * । तत्त्वात्मक वेद के ‘ ऋग् ’ भाग से तो वस्तु का ' पिएड ' ( मूर्ति ) बनता है, ' यजुर्भाग ' से वस्तु का क्रियात्मक ' गतिभाव ' अभिव्यक्त होता है, एव ' सामभाग ' से वस्तु का ' मण्डल ' अभिव्यक्त होता है । प्रत्येक भौतिक -- पदार्थ में पिण्ड, गति, मण्डल, ये तीन तीन पर्वविभाग विज्ञानसिद्ध हैं । पिण्ड वह भाग है, जो अमुक - स्थान- प्रदेश घेरता है, एवं जिसका हम स्पर्श तो कर सकते हैं, किन्तु देख नहीं सकते । श्रतएव इस पिण्ड को ' धामच्छद ' ( स्थानावरोधक - जगह रोकने वाला ) कहा जाता है, एवं यही--' स्पृश्य पिण्ड ' भी कहलाता है । इस पिएड में जायते -- अस्ति - त्रिपरिणमते वर्द्धते - क्षीयते -- विनश्यति -नाम के सुप्रसिद्ध - पड्भावबिकारात्मक परिवर्तन प्रक्रान्त रहते हैं । परिवर्तनात्मक इन विकारभावों का ही नाम ' गति ' है । प्रत्येक वस्तुपिएड के केन्द्र में प्रतिष्ठित उक्थरूप प्राणाग्नि की अर्करूपा रश्मियाँ केन्द्र से बाहिर वस्तुवृत्त के आकार से समतुलित मण्डल बनाती हुई निकलतीं हैं । ये रश्मिमण्डल हीं पिण्डात्मक वस्तु के ' मण्डल ' हैं । एवं हमें वस्तु का जो प्रत्यक्ष होता है, वह वस्तुतः पिण्ड का प्रत्यक्ष न होकर इन मण्डलों में से ही किसी एक मण्डल का ही प्रत्यक्ष होता है । अतएव इसे ' दृश्यमण्डल ' कहा गया है, जिस का न तो स्पर्श ही सम्भव है, एवं जो मण्डल प्राण की प्रधानता से न धामच्छद ही बनता । पिएड ही स्पृश्य बनता है, एवं मण्डल ही दृश्य बनता स्पृश्यपिण्ड, तथा दृश्यमण्डल इन दोनों के माध्यम से अपारपारीणरूप से परिव्याप्त क्षणे - क्षणे परिवर्तमान गतिभाव ही, पिण्ड, गति, एवं मण्डल - रूप - त्र्यात्मक - त्रिमूर्ति ही वस्तु का सम्पूर्ण इतिवृत्त है । और इन तीनो वस्तुभावों के मूलप्रवर्त्तक तत्व ही क्रमशः ऋक् -- यजुः - साम - नामक मौलिक तत्त्व हैं, जैसाकि निम्न लिखित मन्त्र से स्पष्टतमरूपेण उद्घोषित है—
ऋग्भ्यो जातां सर्वशो मूर्तिमाहुः सर्वा गतिर्याजुषी हैव शश्वत् ।
सर्ग तेजः सामरूपं ह शश्वत् सर्व हीदं ब्रह्मणा हैव सृष्टम् ॥
--तै ० वा ०
* - शब्दः, स्पर्शश्च रूपं च रसो गन्धश्च पञ्चमः ।
वेदादेव प्रसूयन्ते प्रसृति - गुण - कर्म्मतः ॥
- मनुः १२२६८० इस तत्त्वात्मक - वेद का स्वरूप - दिग्दर्शन शतपथ - प्रथम खण्ड में कराया जा चुका है । १२४६
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चतुर्थ अध्याय सामिधेनीब्राह्मण शतपथब्राहाण केन्द्रावच्छिन्न -- ऋङमय - स्पृश्य - धामच्छद - ' वस्तुपिण्ड ' ही ' नाद ' तत्त्व ' है. पिण्ड - मण्डलान्तवर्त्ती-यजुर्म्मय - ' गतिभाव ' ही ' श्र तितत्त्व ' है, एवं पिण्डकेन्द्र से प्राणरश्मिमण्डलरूपेण सहस्रभाव - समन्वित-साममय - ‘ मण्डल ' ही ' स्वरतत्त्व ' है । यों नाद ऋपिण्ड से, श्रुति यजुर्गात से, तथा स्वर माम-मण्डल से सर्वात्मना समतुलित हैं । अतएव ' साम ' का एक साङ्केतिक पारिभाषिक नाम रख लिया गया है -- ' स्वरसाम ' | स्वर, और साम, अभिन्न तत्त्व है । प्रातिश्विक रूप से वही मण्डल- ' स्वर ' है, एवं पिण्ड, तथा गति से समन्वित होता हुआ वही स्वर - ' साम ' कहलाने लगता है, और यही त्रिमूर्ति स्वरसाम-' गायनात्मक ' सङ्गीत की प्राणप्रतिष्ठा माना गया है, जैसाकि - ' गीतिषु सामाख्या ' इस श्रर्धवचन से प्रमाणित है । बिना स्वर का शब्द केवल ऋक् है, अथवा तो यजु: है । स्वरसाम के प्रवेश से ही अपने पिण्डात्मक ( गद्य - पद्यात्मक ) स्वरूप से - परणरूपेण वितत होता हुआ मण्डलरूप में परिणत होता हुआ ( फैलता हुआ ) ‘ साम ' रूप गान ( गायन - गीति ) रूप में परिणत होता है । अतएव सर्वात्मना सभी दृष्टियों से सामात्मक स्वर, किंवा स्वरात्मक साम हो सङ्गत की प्राणप्रतिष्ठा बन रहा है, जिस स्वरसाम के - ‘ त्रयः स्त्ररसामान: ' रूप से तीन महिमा - विवर्त्त माने गए हैं, जिनका अत्र स्पष्टीकरण सम्भव नहीं है । तदित्थं -- प्राम *, मूर्च्छना, जाति, क्रम, तान, आरोह, अवरोह, वादी, संवादी, नाद, श्रुति, स्वर, आदि आदि अनेक विभृतियों से सुसमन्वित, नृत्य - गीत- ब्राद्य - भेद से तीन प्रक्रमों में विभक्त शास्त्रीय सङ्गीत के नाद - श्रुति- स्वर - नामक प्रतिष्ठात्मक तीनों स्तम्भों का मूलाधार प्रथम - स्थानीय वैश्वानराग्निप्राण मूर्त्ति, गुञ्जन भावनिबन्धन जो उपक्रम - स्थानीय तत्त्व है, वही वैदिक - सामविज्ञान की परिभाषा मे - ' हिङ्कार ' नाम से प्रसिद्ध हुआ है | स्वरात्मक साम ही क्योंकि हृदयोत्थित नादात्मक इस हिङ्कार को वितानभाव में परिणत करता है, दूसरे शब्दों में सौर- मधु - रस से समाप्लुत नवत्रिद्वात्मक चार्हत - स्वररूप साम के मण्डलों के वैतानिक रूपों के आधार पर ही ( स्वरसंधान के आधार पर ही ) क्योंकि नादात्मिका ' हिं- हिं- हिं -- हुं -- हुं - हूं ' इत्यादि - अनुकरणात्मिका सन्तनन भावात्मिका सङ्गीतोपक्रमस्थानीया ध्वनि का आधार बनता है, अतएव कहा, और माना जायगा कि, स्वरात्मक साम ही हिङ्कार का प्रवर्त्तक है, इसी आधार पर श्रुति ने कहा है कि-" नासामा हिङ – क्रियते ” सामस्वरमण्डलात्मक सामस्वरमण्डलानुगत ' हिङ्कार ' ही नाट है, नाद ही श्रुति का प्रवर्त्तक है, एवं श्रुति के द्वारा ही स्वरों की अभिव्यक्ति होती है । एकमात्र इसी समसम्बन्धानुबन्ध से प्रकृत - ब्राह्मण के ' हिङ्कार ' शब्द के पारिभाषिक समन्वय के लिए ही हमें सङ्गीतानुगत- ' नाद - श्रति - स्वर ' नामक तीनों प्रक्रमों का प्रासङ्गिक दिग्दर्शन कराना पड़ा । क्योंकि नाद - श्रुति -- स्वर भावों के स्वरूप परिचय के बिना श्रुतिका -' हिङ्कार ' शब्द कदापि समन्वित नहीं हो सकता । अतएव श्रुति के ' हिंङ्कार ' शब्द - समन्वयानुबन्ध से हमें इस त्रित्व का संस्मरण कर लेना पड़ा है । * -ग्रामः स्वरसमूहः स्यात् मृच्छनादेः समाश्रयः ।
तौ द्वौ, धरातले तत्र स्यात् पड्ज ग्राम आदिमः ।
द्वितीयो मध्यमग्रामस्तयोर्लक्षणमुच्यते ॥
-- इत्यादि १२५०
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चतुर्थ अध्याय सामिधेनीब्राह्मण प्रथमकाण्ड सङ्गीतप्रेमियों के मनोऽनुरञ्जन के लिए स्वरग्रामानुगता तालिका अत्र समुद्धता है ---श्रुति स्वर - ग्राम — चक्रम्--पड्ज प्रामस्वरा: मध्यमग्रामस्वराः गान्धार प्रामस्वराः श्रुतिसंख्या श्रुतिनामानि श्रुतिजातयः तीव्रा दीना * नी २ कुमुद्वती यता # **** * ३ मन्दा मृदु * छन्दोवती मध्या * * ५ दयावती करुण | * ** सा ** I रञ्जनी मध्या * रे ७ रतिका मृदुः * रे * द रौद्री दीप्ता * * ε क्रोधा आप्ता ग * १० बज्रिका दीप्ता ११ प्रसारिणी श्राप्ता * * * ग * * # १२ प्रीति मृदुः ** I १३ मार्ज्जनी मध्या * # म म १४ क्षितिः मृदुः * * * १३. रक्ता मध्या * # * १६ सन्दीपनी प्राप्ता * प प १७ श्रलापिनी करुणा १८ मदन्ती करुणा * * ** * * १६ रोहिणी आप्ता * # ' व २० रम्या मध्या * ध ** २१ उग्रा दीप्ता * * * २२ शोभिनी मध्या ** नी ** १२५१
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--तालिकेयम् जाति-३ २ . ४ ५ ६ 19 संख्या जातयः मन्धुनाः न्यासाः उपन्यासाः नदेशिश्वराः सा घाड वेदशिस्वराः १ पाइसी उत्तरायता सारेगमपध सा गप नि २ ग्रामी धनी रे 7 रेचनी गान्धारी पौरवी सागमपती ग साप ध साप I मध्यमा कालोपनता सेरिम म ध सारे ग गनी . ५ पञ्चमी कालोपना रेप प रेपनी ग गनी ६ धैवती अनिरुद्गता ध रे ध मध रे प साप ७ नेवादी अमिरुद्गता_ सागनी ना सागनी प साप द केशिकी कलोपनता सागप ग सापनी * षड्जोटीच्या ग्रश्वक्रान्ता साधनी म ध रे षडजमध्यमा मत्सरीकृता साम ग ग सारेगमपधनीसा प रे नी रे 1 1 * माघ सारेगमपधनी गनी ** ११ गान्धारोदीच्या पौरवी साम साध १२ रक्तगान्धारी कलोपनता सागमपनी म ध ३ १३ कैशिकी हारिणाश्वा सागमपधनी पनी सागमपधनी ध ३ १४ मध्यमोदीवा सोवीरी म साध १५ वी काम्म शुद्धमच्या रेपधनी प रेपनी १६ गान्भारपञ्चमी दारियाश्वा प ग प १७ आभी सौवीरी रेगपनी ग वेगपनी सा १८ नन्दबन्ती हारिणाश्वा प ग प म मा
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चतुर्थ अध्याय सामिधेनीब्राह्मण इति - सङ्गीतानुगतं - नाद - श्रुति - म्बर - स्वरूप - दिग्दर्शनम् प्रथमकाण्ड प्रकृतमनुसरामः । नाद - श्रुति- स्वरूपात्मक - पूर्वोक्त प्रासङ्गिक - प्रकरण का उपक्रम करते हुए हमने निवेदन किया था कि, नृत्य - गीत - वाद्यात्मक, नाद - श्रति - स्वर - त्रयी के आधार पर सुप्रतिष्ठित भी नृत्य-गीत - वाद्यात्मक सङ्गीत मानव की अध्यात्मसंस्था में आत्मसंविद् - विरोधी ' आग्लादोप ', एवं बुद्धिनिष्ठा-विरोधी - ' माल्व्यदोष ' उत्पन्न कर दिया करता है । तत्रैव इन दोनों दोषों के सम्बन्ध में समझने जैसी बात की और भी सङ्कत हुआ था ( देखिए पृ ० सं १२१३ ) । उस ' समझने जैसी कुछ बात ' के इतिवृत्त के समन्वय के लिए ही हमें सङ्गीत के नाद - श्रुति स्वर भाव का दिग्दर्शन उपक्रान्त करना पड़ा । अत्र प्रतिज्ञात ' दोष ' स्वरूपों की और ही सङ्गीतप्रेमियों का ध्यान आकर्षित किया जारहा है । आग्ला, तथा माल्य नामक सुप्रसिद्ध मानसिक तथा शारीरिक दोषों के स्वरूप समन्वय के लिए हमें - ' तमसो मा ज्योतिर्गमय ' इस सुप्रसिद्ध श्रुतिवचन में पठित ' तम ', और ' ज्योति ' इन दो तत्त्वों की ओर ही नैष्ठिक मानवश्रेष्ठों का ध्यान आकर्षित करना पड़ेगा । सृष्टि के मूल भूत आभू ', और अभ्यर नामक दो तत्त्वों की प्रथमा मौलिक अभिव्यक्ति का नाम हीं क्रमशः रस ', और बल ' है । इस रमतत्त्व की प्रथमा अभिव्यक्ति, एवं भूतत्त्व की द्वितीया अभिव्यक्ति का नाम जहाँ ' जू ' है, वहाँ जलतत्त्व की प्रथमा अभिव्यक्ति, एवं ' अभ्वतत्त्व ' की द्वितीया अभिव्यक्ति का नाम हीं ' यत् ' है । इस ' जू ' तत्त्व की प्रथमा अभिव्यक्ति, रस तत्त्व की द्वितीया अभिव्यक्ति एवं ग्राभूतत्त्व की तृतीया अभिव्यक्ति का नाम जहाँ ' तेज: ' है, वहाँ ' यत् ' तत्त्व की प्रथमा अभिव्यक्ति चलतत्त्व की द्वितीया अभिव्यक्ति एवं अभ्वतत्त्व की तृतीया अभिव्यक्ति का नाम ही ' स्नेह ' है । इस ' तेजस्तत्त्व ' की प्रथमा अभिव्यक्ति, जूतत्त्व की द्वितीया अभिव्यक्ति रसतत्त्व की तृतीया अभिव्यक्ति, तथा आभूतत्त्व की चतुर्थी अभिव्यक्ति का ही नाम जहाँ लोकप्रसिद्ध ' ज्योति: ' है, वहाँ ' स्नेहतत्त्व ' की प्रथमा अभिव्यक्ति, ' यत्तत्त्व ' की द्वितीया अभिव्यक्ति, बलतत्त्व की तृतीया अभिव्यक्ति, एवं अभ्वतत्त्व की चतुर्थी अभिव्यक्ति का ही नाम लोकप्रसिद्ध ' तमः ' है । क्या तात्पर्य? | इस तात्पर्य के समन्वय के लिए हम आपका ध्यान उस एकमेवाद्वितीयंलक्षण ' विश्वातीत- परात्परब्रह्म ' की ओर ही आकर्षित करना चाहेंगे, जिसका साङ्केतिक नाम है ' अनेजदेकम् ' । त्रिकम्पनात्मक – प्रतिक्षणविलक्षणभावापन्न - श्रात्यन्तिकरूप से परवत्तनात्मक भाव का है - ' एजत् ', एवं अविकम्पनात्मक - सदैकरस - प्रात्यन्तिकरूप से अपरिवर्त्तशील भाव का नाम है - ' अनेजत् ' । स्थितिभाव ही अमेजन है, एवं गतिभाव ही एजन् है । स्थितिप्रकृतिक अमेजन तथा गतिप्रकृतिक- एजत्, परस्परात्यन्तविरूद्ध इन दोनों भावों की सत्तासिद्धा एकरूपता का ही नाम है वह विश्वातीत - परात्परब्रह्म, जिसका समष्ट्यात्मक नाम माना गया है ' अत्यनपिनद्धम ' । अत्यन पिनद्धात्मक स्थितिगतिप्रकृतिक-अनेजत् - एजत् - मृर्त्ति इसी परात्परब्रह्म का प्रथम मौलिक स्वरूप श्रभू, और अध्यात्मक, हैं । आभू अजत् है, अभ्व एजत् है । ईशोपनिषत् ने इसी स्वरूप का इन शब्दों में माङ्गलिक सस्मरण किया है— १२५३
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चतुर्थ अध्याय सामिधेनीब्राह्मण शतपथब्राह्मण
अनेजदेकं मनसो जवीयो नेनद्द ेवा आप्नुवन् पूर्वमर्शत् ।
तद्भावतोऽन्यानत्येति तिष्ठत्तस्मिन्नपो मातरिश्वा दधाति ॥
- ईशोपनिषत् अनेजदेजन्मूर्त्ति - श्रभू - अम्बात्मक - इनी ब्रह्म का दूसग बिवस ' रसबलात्मक है, तीसरा वि ' यत् - जू'- रात्मक है, चौथा विवर्त्त ' ' तेजः स्नेहात्मक ' है, एवं पाँचवाँ विवर्त्त ' ज्योति स्तमोरूप है । प्रत्येक रूप द्विपर्वा है, जिन में प्रथम - प्रथम पर्व सर्वत्र सदात्मक है, एवं द्वितीय - द्वितीय पर्व असदात्मक है । और यही ज्योति, तथा तम के मौलिक चिरन्तन - इतिवृत्त का अथ से इतिपर्य्यन्त का महामङ्गलप्रद माङ्गलिक-पावन संस्मरण है । विश्वातीतभावाः विश्वभावाः २ ३ ४ ५ ६ ७ १- अजव आभू रमः ि तेज: ज्योतिः ( स्थितिप्रकृतिकः सद्भाब: -अमृतम् २– एजत् अभ्वम् दलम्-यत स्नेहम्- तमः ( गतिप्रकृतिकः असद्भावः-मृत्युः ) - " अमृतं चैत्र मृत्युश्च सदसच्चाहमर्जुन! " तेजो लक्षण ज्योतिर्भाव का ही नाम है- ' इन्द्र ', एवं स्नेहलक्षण तमोभाव का ही नाम है ' वरुण ' । इन्द्र ही मित्र ' ' नाम से प्रसिद्ध है । अतएव ज्योतिःस्वरूप इन्द्र तथा तमःस्वरूप वरुण, इन दोनों की समन्वितास्था का एक साङ्केतिक नाम होगया है - मित्रावरुणौ ', जो कि अध्यात्मभाषा में ' ऋतू -- दक्षौ ' नाम से प्रसिद्ध है, जैसाकि - ' क्रतूद हवा अस्य मित्रावरुणौ ' ( शत ० ४ काण्डे ) इत्यादि श्रुति से प्रमाणित है । उपरि निर्द्दिष्टा तालिका के विश्वभावों में क्रमप्राप्त चतुर्थ- ' जूः, और यन ' इन दोनों की समष्टि ही- ' यज्जू ' नामक वयोरूप वह ' बजुः ' तत्त्व है, जो ऋक्साम नामक वयोनाधात्मक छन्द से छन्दित रहता हुत्र्या त्रयीमय बना हुआ है । ऋक्साम से छन्दित नद्ध सीमित - परिवेष्टित ' जूरूप स्थितिभाव ', एवं ' यद्रूप गतिभाव ', इन दोनों की समष्टिरूप त्रयीमयतत्त्व का ही नाम ' स्वयम्भूब्रह्म ' है, जो ' स्वयमेव उद्बभौं ' के अनुसार ही ' स्वयम्भूः ' कहलाया है । इसी स्वायम्भुव - यजुः के जू भाग से तेज के द्वारा ज्योति के माध्यम से तो इन्द्रमित्र की अभिव्यक्ति हुई है, एवं इसी स्वायम्भुव - यजुः के यद्भाग से स्नेह के द्वारा तम के माध्यम से वृत्रवरुण की अभिव्यक्ति हुई है । ज्योतिर्म्मय इन्द्रमित्र एवं तमोमय वृत्रवरुण, दोनों क्रमशः स्वयम्भू १२५४
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चतुथ अध्याय सामिधेनीब्राह्मण प्रथमकाण्ड के जू, और यत् के ही परिणाम हैं । वही स्वायम्भुबी यजुर्बाक्- ' सोऽपोऽसृजत - याच एव लोकान - बागेत्र-साऽसृज्यत ' के अनुसार आ । पोमण्डलरूप में परिणत होती हुई - ' परमेष्ठी ' नाम से प्रसिद्ध है, जो कि स्वयम्भू का ही प्रथमावतार माना गया है । इस आपोमय पारमेष्ठ्य समुद्र में तेजोमयी अग्निचिति से पुञ्जीभूत- प्रदीप्त - प्रचण्ड तेजोमय- सौर संस्थान ही इन्द्रमित्र है, एवं स्वयं पारमेष्ट्य- स्नेहमयी आपः वृत्रत्ररुण है । और य परमेष्ठी के ही गर्भ मे अपप्रधान स्नेह प्रधान वृत्रत्ररुण, तथा तेजःप्रधान - इन्द्रमित्र ( सूर्य्य ), दो स्वतन्त्र संस्थान अभिव्यक्त होजाते हैं । सावित्राग्निचितिरूप - तेनोमय इन्द्रमित्ररूप सूर्य को थोड़ी देर के लिए तटस्थ मानते हुए, वृत्रापोमय-स्नेहमय- वरुणरूप परमेष्ठी को ही लक्ष्य बनाइए । पोमय प्रधान - ऋतप्रधान ( अतएव अमृतभावापन्न ) पारमेष्ट्य वरुण की वैज्ञानिकानें परिपक्वावस्था, परिपक्कावस्था - भेद से दो अवस्था मान हैं । अपरिपक्क वरुण जहाँ विशुद्ध सुरभाव है, वहाँ परिपक्क वरुण अंशतः सुरभावात्मक बनता हुआ भी अधिकांश से गन्धर्व, तथा पितृभाव-प्रधान ही बन जाता है । ब्रह्माग्नि ( स्वायम्भुव तेजोलक्षण - प्राणाग्नि के सम्बन्ध से पारमेष्ठ्य वरुण - श्रापः-तत्त्वः का जो भाग परिपक्क होजाता है, वही वरुण की उत्तरावस्थारूपा - परिपकावस्था ' कहलाई है । भूतमूला - लोकंदृष्टि से उस अलौकिकी - प्राणात्मिका अवस्थाद्वयी का उदाहरण - माध्यम - मात्रेण य समन्वय किया जासकता है कि, " चारों ओर से सीमाबद्ध, अतएव वायव्यप्राण के सञ्चारधर्म से वञ्चित, अतएव च पूति - पङ्कादि - मलीमस - भावों से काल्वालीकृत सीमित जल का नाम हीं ' वृत्रात्मक वरुण ' है, यही वरुण की अपरिपकावस्थात्मिका पूर्वावस्था है, जिस इत्थंभूत मलीमस - अवरुद्ध - अपरिपक्क - निष्कैवल्य-वारुण - पानी को ही आसुर पानी कहा जाय ॥ एवं इसे ही विविध रोगों का, विभिन्न दोषों का प्रवर्त्तक माना जायगा । इसके अतिरिक्त प्रचण्ड - प्रवाह से समन्वित, अतएव वायव्यप्राण से आलोडित - विलोडित, अतएव मलीमस भाव से संम्पृष्ट विशुद्ध - निम्मल पानी ही ' दिव्यपानी ' है, जिसमें श्राग्नेयप्राण *, वायव्यप्राण ÷, इन्द्रप्राण, आदि अनेक दिव्यप्राणों का समावेश रहता है । अतएव ऐसा गतिधर्म्मा - विशुद्ध पानी सर्वथैव स्वास्थ्यकर माना गया है । यही बरुण की परिपक्वावस्थारूपा उत्तरावस्था है । यों लौकिक उदाहरण विधि से उस पारमेष्ठ्य अलौकिक प्रारणात्मक वारुणपानी की भी अपरिपक्क, परिपक्क, इन दोनों अवस्थाओं का अनुमान लगाया जासकता है । वरुण की अपरिपक्का पूर्वावस्था का ही नाम है – ' वरुण ', एवं इमी वरुण की अग्नि त्रायु - इन्द्र-प्राण - समन्विता - ' परिपक्का ' उत्तरावस्था का ही नाम है- ' भृगु ' । परिपाकधर्म का ही नाम ' भर्जन ' है । एवं परिपाकात्मक इस भर्जन सम्बन्ध से ही वरुणपिता की पूर्वावस्था से समुद्रभूत उत्तरावस्थारूप - पुत्रात्मक-परिपक्व भाव का नाम होगया है - ' भृगु ', जैसा कि निम्न लिखित श्रुतिवचनों से विस्पष्टरूपेण प्रमाणित है-* – अपां संघातो, विलयनञ्च तेजः संयोगात् ( वैशेषिक दर्शन – कणादसूत्र ) । --- ‘ इन्द्रतुरीया ग्रहा गृह्यन्ते ' के अनुसार गतिधम्मां वायु में एक चतुर्थांश इन्द्रप्राण भी समाविष्ट रहा करता है । १२५५
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चतुर्थ अध्याय सामिधेनीब्राह्मण शतपथब्राह्मण " ता आपः सृष्ट्वाऽन्येन प्रजापतिः । तासु श्रायामपश्यन ( तमोभावमवश्यन् ) । ता आपः - श्रान्ता:, सप्ताः सन्तप्ताः - सार्द्धमेव रेतसा द्वैधमभवन् । तासामन्या अन्यतरा तिलवणा ( चारधर्मान्विता ) ( अनएव ) पेश अवादाः ( मधुप्राणशून्याः ), ता अशान्ता आपः समुद्र ं वृच्चा - अतिष्ठन् ( ता हमा एक आपः - अपरिपक्त्राः वरुण! --त्मिकाः ) । अथ - इतराः पेयाः स्वाव्यः शान्तास्तत्रैवाभ्यश्राम्यत्, अभ्वतषत् समतपत् । ताभ्यः श्रान्ताभ्यः - तप्ताभ्यः सन्तप्ताम्पः बद्रेत आसीत्, तत् असृज्यत ( परिपक्त्रमभूत् । यदभृज्यतः - तस्माद् ' भृगुः समभवत् तद् भृगोभ्रं गुचम् " । — गोषथत्राह्मण - पूर्वभाग ११० । ३ ब्रा ० । ( २ ) - ' वरुणस्थ व सुषुवाणम्य भर्गापक्रामत् । स त्रेधापतत् । नद्भृगुरभवत् " । वे - ताण्ड्यमात्राह्मण ४८ । ६ । १ ( ३ ) " - तम्ब प्रजापतेः यत्रेतसः प्रथममुददीप्यत तदसावादित्योऽभवत् । अथ - यत्-द्वितीयमासीत्, तद् - भृगुरभवत् । तं वरुणो न्यगृह्णीत । तस्मात् स भृगुर्वारुणिः ” । — सरेयत्राह्मण ३ । ३४ । " आग्नेय - वाकय- ऐन्द्रप्रारण से समन्वित अतएव परिक्थ भर्जनशील - पारमेष्ठ्य वारुण-आप्यतत्त्व का ही नाम - ' भृगु ' है " उक्त तीनों श्रुतिवचनों का यही निष्कर्थ है । द्वितीया श्रुति में ' वरुणस्य भर्गः - ग्रेधा - अपतन ' यह कहा गया है, जैस का तात्पर्य यही है कि, ' ध्रुव - ( घन ) - धर्म -( तरल ) -- धरुण ( विरल ) नाम की सुप्रसिद्धा तीन अवस्थाओं के कारण यह भृगुतत्त्व तीन अवस्थाओं में परिचत होजाता है, जोकि तीनों भार्गवी अवस्थाएँ हीं क्रमश: - आपः वायुः सोमः इन नामों से प्रसिद्ध हुई हैं, जैसाकि " वायु- रापः - चन्द्रमाः ( सोमः ) इत्येते भृगवः " ( गो ० ना ० पू ० २८,६, 1 ) इत्यादि वचन से स्पष्ट है । ये तीनों हीं भार्गवतत्त्व वारुण- श्रपतत्त्व के प्रकृतिसिद्ध त्रिवृत्करण से व्यात्मक-त्र्यात्मक बने हुए हैं मनः प्राणवाङमय आत्मा के त्रिवृद्भाव की भाँति । जिस का तात्पर्य्य यही निकलता है कि, घनावस्थापत्त्र - भार्गव - अपतत्त्व भी प्राप: - बायुः सोमात्मक है । तरलावस्थापन्न भार्गव - वायुतत्त्व भी त्र्यात्मक है । एवं विरलावस्थापन भार्गव सोम भी त्र्यात्मक है । इस व्यात्मकता के अनुबन्ध से ही तीनों सहचारी माने गए हैं । त्र्यात्मक भार्गव प्राण का ही नाम ' असुर ' है, त्र्यात्मक भार्गव - वायव्यप्रारण का ही नाम ' गन्धर्व ' है, एवं व्यात्मक भार्गव - सौम्यप्रारण का ही नाम ' पितर ' है । श्रासुर प्राणात्मक बारुण - भार्गव श्राप्यप्राण ही अप्सुसरणशील दिग्भावप्रवर्तक- अप्सरा प्राण ' की अभिव्यक्ति का कारण बना हुआ है । वारुणभार्गव - वायव्यप्राण का गन्धर्वप्राणत्त्व तो प्रातिस्त्विकरूपेणैव स्फुट है । श्राप्य - श्रप्सराप्राण * इति तु पञ्चम्बामाहुतावापः पुरुषवचसो भवन्ति ( छा ० उप ० ५२६ । १ । ) । " व्यात्मकत्वात्तु भूयस्त्वात् " ( वेदान्तसूत्र शशश ) । १२५६
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चतुर्थ अध्याय सामिधेनीब्राह्मण प्रथमका एड क । ही साङ्केतिक नाम है – ' सुरा ', एवं वायव्य गन्धर्वप्राण से सुरक्षित ( अपरिपक्क - विशुद्ध आसुर - वारुण-आक्रमण से सुरक्षित ) पितृप्राणात्मक भार्गवप्राण का ही नाम है - ' सोम ' | और यही सुरा, तथा सोम नामक उन वारुणतत्त्वों का संक्षिप्ततम स्वरूप - दिग्दर्शन है, जिन इन दोनों तत्त्वों के स्वरूप- समन्वय के लिए ही हमें नेजदे जद्- मूला - भृगुत्रयी- समन्विता सृष्टिधारा का अत्र संस्मरण करना पड़ा है । पारमेष्ठ्य-भार्गव- वारुण - सुरा, और सोम, नामक तत्त्वों के आधार पर ही हमें उन आग्ला, तथा मात्र्य, नामक दोनों सुप्रसिद्ध दोषों की स्वरूपमीमांसा करनी है, जिन दोनों भयानक दोषों ने हीं सर्वथैव - तत्त्वसम्मत भी, प्रकृतिसिद्ध भी, नाद श्रति - स्वर - जैसे दिव्यतत्त्वों से समन्वित भी नृत्य गीत वाद्यात्मक सङ्गीत को आत्यन्तिकरूपेण काल्वालीकृत ही प्रमाणित कर रक्खा है । इदमत्र - अबधेयम् । तम, और ज्योति नामक जिन दो तत्त्वों का पूर्व में संस्मरण हुआ था ( देखिए पृ ० सं ० १२५,३ ), तत्रैव यह भी स्पष्ट कर दिया गया था कि, वरुण का नाम ही तम है, एवं इन्द्र का नाम ही ज्योति है । यहीं, इसी दृष्टि बिन्दु पर सुरा, और सोमके सम्बन्ध में भी किञ्चिदिव अवधेय है । नमोमय वरुण से जहाँ सुरा का सम्बन्ध माना जायगा, वहाँ ज्योतिर्मय इन्द्र से सोम का सम्बन्ध माना जायगा । अतएव सुरा जहाँ ' वारुणी ' कहलाई है, वहाँ सोम इन्द्रप्रिय तत्त्व माना गया है । दैनंदिनीय भोजनकर्म से अनुप्राणित अन्न के उदाहरण से ही प्रथम भौतिकी दृष्टि से ही हमें सुरा, और सोम, इन दोनों तत्त्वों का स्वरूप परिचय प्राप्त कर लेना चाहिए । यत्र - गोधूम - चणकयन्त्र - माप- मुद्ग - तन्दुल- ( जौ - गेहूँ - चना- बाजरा - उर्द - मूँग चाँवल ) आदि अन्नों की उत्पत्ति ' पचाग्निविद्या के अनुसार पानी से ही हुई है । दिव्य - सौर लौक के दिव्य तेजोमय-सावित्राग्नि में सर्वप्रथम स्रोमात्मिका ' श्रद्धा ' की आहुति होती है । तेजोमय यह सावित्राग्नि ' अग्नि ' है, स्नेहमयी श्रद्धा ‘ सोम ' है | इन दोनों के यजन से ही ' अग्नौ सोमाहुतिर्यज्ञः ' के अनुसार यज्ञस्वरूपात्मक ' सोम ' नामक पूर्वभाव अभिव्यक्त होता है इन दोनों श्रारम्भणों ( उपादनों ) के परस्वरोपमद्दन से दिव्याग्नि, और श्रद्धा के यजनात्मक उपमद्दन का ही परिणाम ' सोम ' है, और यही प्रथमाहुति से अनुप्राणित अन्नका प्रथम मौलिक स्वरूप है । दिव्यलोक के अनन्तर दूसरा अन्तरिक्ष्य - वायुलोक है । इस अन्तरिक्ष वर्षाविरोधी - जलावरोधक- श्रासुरप्राण के प्रचण्डशत्रु ) मरुत्त्वान् नामक ‘ पर्ज्जन्य ं * नामक वायव्याग्नि परव्याप्त है । इस अान्तरिक्ष्य पर्जन्याग्नि में इस दूसरे अग्नि- सोम यजन से जो अग्रिम अपूर्वभाव उत्पन्न होता है, उसे कहा गया है । लोक में ' नमुचि ' नामक— ' वायव्य इन्द्र ' से समन्वित सोम की आहुति होती है । ही ' वर्षा ' ( वृष्टिजल ) वायव्य - अन्तरिक्षलोक के अनन्तर आग्नेय पृथिवीलोक का स्थान आता होता है । इस पार्थिव गायत्राग्नि में ' वर्षा ' रूप सोमान्न की आहुति होती हैं । इसी आहुति से गायत्राग्नि, एवं वर्षाजल, दोनों * पर्जन्य का ही उत्तररूप ' पुरोत्रात ' है, जिसे हमारे प्रान्त में ' पुरवाई हवा ' कहा जाता है । इसके प्रवाह से ही वृष्टि हुआ करती है । इसे ही प्रतीव्यभाषा में सम्भवतः ' मान्सून ' कहा गया होगा । १२५.७
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चतुर्थ - अध्याय सामिधेनीबादारण शपथब्राह्मण के यजनात्मक सम्मिश्रण से पार्थिव धरातल पर जो अपूर्वभाव उत्पन्न होता है, वही सुप्रसिद्ध - यवगोधूमादि-' अन्न ' नाम से प्रसिद्ध है । आगे चल कर पार्थिव अग्नि के प्रवर्ण्यभूत पुरुष के शारीरिक वैश्वानर अग्नि में अन्नात्मक सोम की आहुति होती है । पुरुषाग्नि में आहुत अन्न सोम का यह अग्नि उसीप्रकार बिशकलन कर देता । है, जैसे कि प्रज्ज्वलित काष्ठाग्नि में हुत - समाहित - काष्टादि द्रव्य तेजोमय, अतएव विकासधर्म्मा अग्नि से विशकलित होजाया करते हैं । संकुचितभाव को, घनता को विदीर्ण करदेना हीं अग्नि का प्रमुख कर्म्म है । इसी विशकलन से पुरुषाग्नि ( वैश्वानराग्नि ) में हुत अन्न विशकलित होजाता है । अन्न पूर्वातिक्रम- तारतम्य से परम्परया सौर- अग्नि, श्रद्धा, अन्तरिक्ष्य पर्जन्याग्नि, सोम, पार्थिव अग्नि, वर्षाजल, पार्थिव मलीमस भूतभाग, आदि आदि रसात्मक, एवं मलात्मक, अनेक तत्त्व समन्वित रहते हैं । शारीरिक अग्नि का पहिला काम है- अपने में बहुत गृहीत रस - मलात्मक-इस अन्न के रसभागों, तथा मलभागों को विशकलित कर देना । अग्नि के द्वार । विशकलित होने वाले इह्रीं रस - मल - भागों के क्रमिक विशकलन से मुक्त अन्न की रस- असृक्- मांस - मेद अस्थि - मज्जा - शुक्र, ये सात अवस्थाएँ होजातीं हैं, जिन में उत्तर उत्तर की अवस्थाएँ पूर्व - पूर्व अवस्थाओं की अपेक्षा जहाँ ' मल ' है, वहाँ पूर्वावस्थाएँ उत्तरावस्थाओं की अपेक्षा - ' रस ' है । इन सप्तविध - रस - मलात्मक - शारीरिक धातुओं में इसी अन्न का सातवाँ अन्तिम धातु शुक्रात्मक ' रेत ' है । अतएव श्रुति ने पुरुषाग्नि में आहुत अन्नात्मक सोम के परिणाम का नाम ' रेतः ' ( शुक्र ) ही मान लिया है । और आगे चलिए । योषाप्राणात्मिका ' स्त्री ' के प्रजनन - शक्तिमय आर्त्तव ( शोणित- रुधिर ) में धाम छदा भूतसृष्टि का मूलप्रवर्तक वह अत्रिप्रारण प्रतिष्ठित है, जिस के मलात्मक - धामच्छद - भूतानु-शय की अभिव्यक्ति प्रतिमास अमुक दिवसों में होती रहती है । वही स्त्री की ' ऋतुकालावस्था ' कहलाई है, इसी कालावधि में यह ऋतुमती स्त्री ' आत्रेयीयोपिन् ' कहलाई है । सर्वथैव काल्वालीकृत, अतएव निरतिशय मलीमस, किन्तु अपने धामच्छद - भौतिक धर्म से प्रजननशक्ति से समन्वित रक्तमिश्रित यह अत्रिप्राण सर्वथैव दिब्यप्राण का विरोधी बना रहता है, जो भूतस्पर्श ( शरीरस्पर्श ) माध्यममात्र से स्पर्शकर्ता के दिव्यप्राण को मूर्च्छित करने की क्षमता रखता है । इसी तत्त्व के आधार पर आत्रेयी ऋतुमती स्त्री अस्पृश्य पाप्राणा-त्मक अन्त्यजादिवत् - अमुक अवधि पर्यन्त ' अस्पृश्या ' ही मान ली गई है * । * — काक - श्वानादि प्राणी, अन्त्यज - अन्त्यावसायी मानव, ऋतुमती स्त्री, आदि से सम्बन्ध रखने वाली ' अस्पृश्यता ' का एकमात्र आधार माङ्कयामिक वे मलीमस - प्राय ही हैं, जिन के आधार पर ही अमुक परिगणित जड़ - चेतन पदार्थ शास्त्र में ' अस्पृश्य ' मान लिए गए हैं । तत्त्वमूला इस अस्पृश्यता को भले ही प्राणदृष्टया आज का भूतविज्ञानवादी समन्वित न कर सके । किन्तु भूतमूला - कीटाणु संक्रमणजनिता प्रचण्ड अस्पृश्यता तो उसकी दृष्टि में भी पदे पदे न केवल मान्या हीं, अपितु आराध्या ही बनी हुई है । यत्किञ्चित् से भौतिक - मल से आज के भूतबाढी की भृकुटी तन जाती है, और ' गन्दगी - गन्दगी ' के चीत्कार से वह इस ' अस्पृश्यता ' का घन्टाघर करने लग पड़ता है, जबकि प्रात्यन्तिकरूपेण भूतास्पृश्यवादी यही भूतवैज्ञानिक आज भारतीय शास्त्र की प्राणमूला, अतएव रूप - रम- गन्ध - स्पर्श - शून्या, अतएव इन्द्रियातीता सुसूक्ष्मा १२५८