शिव महापुराण - २ — पृष्ठ 1001–1010

शिव महापुराण - २ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 1001–1010

पृष्ठ 1001

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अ ० २५ ] वायवीयसहिता विद्युद्वलयकल्पानि भूषणानि विशेषतः ॥ २०

सर्वाण्येतानि कर्पूरनिर्यासागुरुचन्दनैः ।

आधूपितानि पुष्पौघैर्वासितानि समन्ततः ॥ २१

चन्दनागुरुकर्पूरकाष्ठगुग्गुलुचूर्णकैः घृतेन मधुना चैव सिद्धो धूपः प्रशस्यते ॥ २२

कपिलासम्भवेनैव घृतेनातिसुगन्धिना ।

नित्यं प्रदीपिता दीपाः शस्ताः कर्पूरसंयुताः ॥ २३

पञ्चगव्यं च मधुरं पयो दधि घृतं तथा ।

कपिलासम्भवं शम्भोरिष्टं स्नाने च पानके ॥ २४

आसनानि च भद्राणि गजदन्तमयानि च ।

सुवर्णरत्नयुक्तानि चित्राण्यास्तरणानि च ॥ २५

मृदूपधानयुक्तानि सूक्ष्मतूलमयानि च ।

उच्चावचानि रम्याणि शयनानि सुखानि च ॥ २६

नद्याः समुद्रगामिन्या नदाद्वाम्भः समाहृतम् ।

शीतञ्च वस्त्रपूतं तद्विशिष्टं स्नानपानयोः ॥ २७

छत्रं शशिनिभं चारु मुक्तादामविराजितम् ।

नवरत्नचितं दिव्यं हेमदण्डमनोहरम् ॥ २८

चामरे च सिते सूक्ष्मे चामीकरपरिष्कृते ।

राजहंसयाकारे रत्नदण्डोपशोभिते ॥ २ ९

दर्पणं चापि सुस्निग्धं दिव्यगन्धानुलेपनम् ।

समन्ताद्रत्नसञ्छन्नं स्रग्वरैश्चापि भूषितम् ॥ ३०

गम्भीरनिनदः शंखो हंसकुंदेन्दुसन्निभः ।

आस्यपृष्ठादिदेशेषु रत्नचामीकराचितः ॥ ३१

काहलानि च रम्याणि नानानादकराणि च ।

सुवर्णनिर्मितान्येव मौक्तिकालंकृतानि च ॥३२

( उत्तरखण्ड ) ९ ८७ हुए तथा विद्युन्मण्डलके समान चमकीले हों ये सब वस्तुएँ कपूर, गुग्गुल, अगुरु और चन्दनसे , आधूपित तथा पुष्पसमूहोंसे सुवासित होनी चाहिये । चन्दन, अगुरु, कपूर, सुगन्धित काष्ठ तथा गुग्गुलके चूर्ण, घी और मधुसे बना हुआ धूप उत्तम माना गया है ॥ १ ९ –२२ ॥ कपिला गायके अत्यन्त सुगन्धित घीसे प्रतिदिन जलाये गये कर्पूरयुक्त दीप श्रेष्ठ माने गये हैं । पंचगव्य, मीठे पदार्थ और कपिला गायका दूध, दही एवं घी — ये सब भगवान् शंकरके स्नान और पानके लिये अभीष्ट हैं ॥ २३-२४ ॥ हाथीके दाँतके बने हुए भद्रासन, जो सुवर्ण एवं रत्नोंसे जटित हैं, शिवके लिये श्रेष्ठ बताये गये हैं । उन आसनोंपर विचित्र बिछावन, कोमल गद्दे और तकिये होने चाहिये । इनके सिवा और भी बहुत-सी छोटी - बड़ी सुन्दर एवं सुखद शय्याएँ होनी चाहिये ॥ २५-२६ ॥ समुद्रगामिनी नदी एवं नदसे लाया तथा कपड़ेसे छानकर रखा हुआ शीतल जल भगवान् शंकरके स्नान और पानके लिये श्रेष्ठ कहा गया है । चन्द्रमा समान उज्ज्वल छत्र, जो मोतियोंकी लड़ियोंसे सुशोभित, नवरत्नजटित, दिव्य एवं सुवर्णमय दण्डसे मनोहर हो, भगवान् शिवकी सेवामें अर्पित करनेयोग्य हैं ॥ २७-२८ ॥ सुवर्णभूषित दो श्वेत चँवर, जो रत्नमय दण्डोंसे शोभायमान तथा दो राजहंसोंके समान आकारवाले हों, शिवकी सेवामें देनेयोग्य हैं । सुन्दर एवं स्निग्ध दर्पण, जो दिव्य गन्धसे अनुलिप्त, सब ओरसे रत्नोंद्वारा आच्छादित तथा सुन्दर हारोंसे विभूषित हो, भगवान् शंकरको अर्पित करना चाहिये ॥२ ९ -३० ॥ उनके पूजनमें हंस, कुन्द एवं चन्द्रमाके समान उज्ज्वल तथा गम्भीर ध्वनि करनेवाले शंखका उपयोग करना चाहिये, जिसके मुख और पृष्ठ आदि भागोंमें रत्न एवं सुवर्ण जड़े गये हों । शंखके सिवा नाना प्रकारकी ध्वनि करनेवाले सुन्दर काहल ( वाद्यविशेष ), जो सुवर्णनिर्मित तथा मोतियोंसे अलंकृत हों, बजाने चाहिये ॥ ३१-३२ ॥

पृष्ठ 1002

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श्रीशिवमहापुराण [ अ ० ९ ८८ भेरीमृदङ्गमुरजतिमिच्छपटहादयः प्रयत्नतः ॥ ३३ कल्पनीयाः समुद्रकल्पसन्नादाः

भाण्डान्यपि च रम्याणि पात्राण्यपि च कृत्स्नशः ।

तदाधाराणि सर्वाणि सौवर्णान्येव साधयेत् ॥ ३४

आलयं च महेशस्य शिवस्य परमात्मनः ।

राजावसथवत्कल्प्यं शिल्पशास्त्रोक्तलक्षणम् ॥ ३५

उच्चप्राकारसंभिन्नं भूधराकारगोपुरम् ।

अनेकरत्नसंछन्नं हेमद्वारकपाटकम् ॥ ३६

तप्तजाम्बूनदमयं रत्नस्तम्भशतावृतम् ।

मुक्तादामवितानाढ्यं विद्रुमद्वारतोरणम् ॥ ३७

चामीकरमयैर्दिव्यैर्मुकुटैः कुम्भलक्षणैः ।

अलंकृतशिरोभागमस्त्रराजेन चिह्नितम् ॥ ३८

राजन्यार्हनिवासैश्च राजवीथ्यादिशोभितैः ।

प्रोच्छ्रितप्रांशुशिखरैः प्रासादैश्च समन्ततः ॥ ३ ९

आस्थानस्थानवर्यैश्च स्थितैर्दिक्षु विदिक्षु च ।

अत्यन्तालंकृतप्रान्तमन्तरावरणैरिव ॥ ४०

उत्तमस्त्रीसहस्त्रैश्च नृत्यगेयविशारदैः ।

वेणुवीणाविदग्धैश्च पुरुषैर्बहुभिर्युतम् ॥४१

रक्षितं रक्षिभिर्वीरैर्गजवाजिरथान्वितैः 1 अनेकपुष्पवाटीभिरनेकैश्च सरोवरैः ॥ ४२

दीर्घिकाभिरनेकाभिर्दिग्विदिक्षु विराजितम् ।

वेदवेदान्ततत्त्वज्ञैः शिवशास्त्रपरायणैः ॥ ४३

शिवाश्रमरतैर्भक्तैः शिवशास्त्रोक्तलक्षणैः ।

शान्तैः स्मितमुखैः स्फीतैः सदाचारपरायणैः ॥ ४४

शैवैर्माहेश्वरैश्चैव श्रीमद्भिः सेवितं द्विजैः । । १ एवमन्तर्बहिर्वाथ यथाशक्तिविनिर्मितैः ॥ ४५ स्थाने शिलामये दान्ते दारवे चेष्टकामये । । | २५ इनके अतिरिक्त भेरी, मृदंग, मुरज, तिमिच्छ | पटह आदि बाजे भी, जो समुद्रकी गर्जनाके और | ध्वनि करनेवाले हों, यत्नपूर्वक जुटाकर रखने समान | पूजाके सभी पात्र, भाण्ड और उनके आधार चाहिये । सुवर्णके ही बनवाये॥३३-३४ ॥ भी परमात्मा महेश्वर शिवका मन्दिर राजमहलके समान बनवाना चाहिये, जो शिल्पशास्त्रमें बताये । लक्षणोंसे युक्त हो । वह ऊँची चहारदीवारीसे घिरा हुए | उसका गोपुर इतना ऊँचा हो कि पर्वताकार दिखायी हो । । दे । वह अनेक प्रकारके रत्नोंसे आच्छादित हो । उसके । दरवाजेके फाटक सोनेके बने हुए हो ॥ ३५-३६ ॥ उस मन्दिरके मण्डपमें तपाये हुए सोने तथा रत्नोंके सैकड़ों खम्भे लगे हों । चंदोवेमें मोतियोंकी लड़ियाँ लगी हुई हों । दरवाजेके फाटकमें मूँगे जड़े गये हों । मन्दिरका शिखर सोनेके बने हुए दिव्यं कलशाकार मुकुटोंसे अलंकृत एवं अस्त्रराज त्रिशूलसे चिह्नित हो ॥ ३७-३८ ॥ वह मन्दिर राजमार्गोंसे शोभायमान तथा चारों ओरसे अत्यधिक ऊँचे शिखरोंवाले राजोचित भवनोंसे युक्त होना चाहिये । उसमें दिशाओं और विदिशाओंमें उत्तम सभाभवन, विश्रामभूमियाँ आदि हों तथा उसका अन्तर्भाग सभी प्रकारसे अलंकृत होना चाहिये । नृत्य तथा गायनमें पारंगत हजारों स्त्रियों तथा वीणा, वेणु आदिके वादनमें निपुण पुरुषोंसे उसे युक्त होना चाहिये । गज, अश्व तथा रथोंसे युक्त वीर रक्षकोंसे वह रक्षित हो तथा उसमें सभी दिशाओं - विदिशाओंमें अनेक पुष्पोद्यान और सरोवर हों ॥ ३ ९ -४२ ॥ उस भवनके सभी ओर बहुत -सी - स बावलियाँ बनायी गयी हों । वेद तथा वेदान्त विद्याके मर्मको समझनेवाले, शिवशास्त्रपरायण, शैवधर्मके अनुपालक, शिवशास्त्रमें बताये गये लक्षणोंसे सम्पन्न, शान्त, प्रसन्नमुख, भक्तिनिष्ठ, सदाचारनिरत तथा सौभाग्यसम्पन्न शैव और माहेश्वर द्विजोंसे वह सेवित हो रहा हो ॥ ४३-४४१ / २ ॥ अपने सामर्थ्यके अनुरूप इस प्रकारकी आन्तरिक तथा बाह्य संरचनावाले स्थानपर या कि शिलानिर्मित, हाथीदाँतसे निर्मित, काष्ठनिर्मित, ईंटोंसे बने या केवल

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अ ० २५ ] वायवीयसहिता ( उत्तरखण्ड ) * वलं मृण्मये वापि पुण्यारण्येऽथवागिरौ ॥ ४६ । नद्यां देवालयेऽन्यत्र देशे वाथ गृहे शुभे । वाथ दरिद्रो वा स्वकां शक्तिमवंचयन् । आढ्यो द्रव्यैर्न्यायार्जितैरेव भक्त्या देवं समर्च्चयेत् ॥ ४७ अथान्यायार्जितैश्चापि भक्त्या चेच्छिवमर्चयेत् । ९ ८ ९ मृत्तिकासे निर्मित भवनमें अथवा किसी पावन वन, पर्वत, नदीतट, देवमन्दिर, किसी पवित्र क्षेत्रमें या शुभ गृहमें समृद्ध अथवा विपन्न साधकको अपने सामर्थ्यके अनुरूप न्यायोपार्जित द्रव्योंसे भक्तिपूर्वक महादेवजीकी पूजा करनी चाहिये ॥ ४५–४७ ॥ यदि कोई अन्यायोपार्जित द्रव्यसे भी भक्तिपूर्वक न तस्य प्रत्यवायोऽस्ति भाववश्यो यतः प्रभुः ॥ ४८ शिवजीकी पूजा करता है तो उसे भी कोई पाप नहीं

न्यायार्जितैरपि द्रव्यैरभक्त्या पूजयेद्यदि ।

न तत्फलमवाप्नोति भक्तिरेवात्र कारणम् ॥ ४ ९ ॥

भक्त्या वित्तानुसारेण शिवमुद्दिश्य यत्कृतम् ।

अल्पे महति वा तुल्यं फलमाढ्यदरिद्रयोः ॥ ५०

भक्त्या प्रचोदितः कुर्यादल्पवित्तोऽपि मानवः ।

महाविभवसारोऽपि न कुर्याद् भक्तिवर्जितः ॥ ५१

सर्वस्वमपि यो दद्याच्छिवे भक्तिविवर्जितः ।

न तेन फलभाक् स स्याद् भक्तिरेवात्र कारणम् ॥ ५२

न तत्तपोभिरत्युग्रैर्न च सर्वैर्महामखैः ।

गच्छेच्छिवपुरं दिव्यं मुक्त्वा भक्तिं शिवात्मिकाम् ॥ ५३

गुह्याद्गुह्यतरं कृष्ण सर्वत्र परमेश्वरे ।

शिवे भक्तिर्न संदेहस्तया युक्तो विमुच्यते ॥ ५४

शिवमन्त्र जपो ध्यानं होमो यज्ञस्तपः श्रुतम् ।

दानमध्ययनं सर्वे भावार्थं नात्र संशयः ॥ ५५

भावहीनो नरः सर्वं कृत्वापि न विमुच्यते ।

भावयुक्तः पुनः सर्वमकृत्वापि विमुच्यते ॥ ५६

चान्द्रायणसहस्त्रैश्च प्राजापत्यशतैस्तथा । लगता; क्योंकि भगवान् भावके वशीभूत हैं । न्यायोपार्जित धनसे भी यदि कोई बिना भक्तिके पूजन करता है तो उसे उसका फल नहीं मिलता; क्योंकि पूजाकी सफलतामें भक्ति ही कारण है ॥ ४८-४९ ॥ भक्तिसे अपने वैभवके अनुसार भगवान् शिवके उद्देश्यसे जो कुछ किया जाय वह थोड़ा हो या बहुत, करनेवाला धनी हो या दरिद्र, दोनोंका समान फल है । जिसके पास बहुत थोड़ा धन है, वह मानव भी भक्ति-भावसे प्रेरित होकर भगवान् शिवका पूजन कर सकता है, किंतु महान् वैभवशाली भी यदि भक्तिहीन है तो उसे शिवका पूजन नहीं करना चाहिये ॥ ५०-५१ ॥ शिवके प्रति भक्तिहीन पुरुष यदि अपना सर्वस्व भी दे डाले तो उससे वह शिवाराधनाके फलका भागी नहीं होता; क्योंकि आराधनामें भक्ति ही कारण है । शिवके प्रति भक्तिको छोड़कर कोई अत्यन्त उग्र तपस्याओं और सम्पूर्ण महायज्ञोंसे भी दिव्य शिवधाममें नहीं जा सकता । अतः श्रीकृष्ण! सर्वत्र परमेश्वर शिवके आराधनमें भक्तिका ही महत्त्व है । यह गुह्यसे

भी गुह्यतर बात है । इसमें संदेह नहीं है ॥ ५२ - ५४ ॥

शिवमन्त्रका जप, ध्यान, होम, यज्ञ, तप, वेदाभ्यास, दान तथा अध्ययन – ये सब भाव ( भक्ति ) -के ' लिये ही हैं, इसमें सन्देह नहीं है । भावरहित मनुष्य इन सबका अनुष्ठान करके भी मुक्त नहीं होता है, किंतु भावयुक्त मनुष्य ये सब बिना किये भी मुक्त हो जाता है॥५५-५६ ॥ हजारों चान्द्रायण व्रतों, सैकड़ों प्राजापत्य व्रतों, महीनेभरके उपवासों तथा अन्य [ सत्कर्मों ] -से शिव-मासोपवासैश्चान्यैश्च शिवभक्तस्य किं पुनः ॥ ५७ भक्तको क्या प्रयोजन! इस लोकमें भक्तिहीन मनुष्य अल्प भोगोंके लिये पर्वतकी कन्दराओंमें तप करते हैं, पर अभक्ता मानवाश्चास्मिँल्लोके गिरिगुहासु च ॥ । भावसे ही मुक्त भी हो जाता है ॥ ५७-५८ ॥ तपंति चाल्पभोगार्थं भक्तो भावेन मुच्यते ॥ ५८ । भक्त तो

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९९ ० सात्त्विकं मुक्तिदं कर्म सत्त्वे वै योगिनः स्थिताः राजसं सिद्धिदं कुर्युः कर्मिणो रजसावृताः असुरा राक्षसाश्चैव तमोगुणसमन्विताः ऐहिकार्थं यजन्तीशं नराश्चान्येऽपि तादृशाः तामसं राजसं वापि सात्त्विकं भावमेव च आश्रित्य भक्त्या पूजाद्यं कुर्वन् भद्रं समश्नुते

यतः पापार्णवात् त्रातुं भक्तिनौरिव निर्मिता ।

तस्माद्भक्त्युपपन्नस्य रजसा तमसा च किम् ॥

अन्त्यजो वाधमो वापि मूर्खो वा पतितोऽपि वा ।

शिवं प्रपन्नश्चेत् कृष्ण पूज्यः सर्वसुरासुरैः ॥

तस्मात् सर्वप्रयत्नेन भक्त्यैव शिवमर्चयेत् ।

अभक्तानां क्वचिदपि फलं नास्ति यतस्ततः ॥

वक्ष्याम्यतिरहस्यं ते शृणु कृष्ण वचो मम ।

वेदैः शास्त्रैर्वेदविद्भिर्विचार्य सुविनिश्चितम् ॥

श्रीशिवमहापुराण [ अ ० २६ सात्त्विक कर्म मुक्ति देनेवाला होता है । सत्त्वमें ही स्थित रहते हैं । कर्मपरायण, अतः ॥ ५ ९ । योगी करनेवाले राजस कर्म रजोगुणी | लोग सिद्धि प्रदान करते हैं ॥ । लौकिक कामनाओंकी प्राप्तिके लिये शिवका ॥ ६० करते हैं ॥५ ९ -६० ॥ यजन । तामस, राजस अथवा सात्त्विक - किसी भी ॥ ६१ भावका आश्रय लेकर भक्तिपूर्वक पूजा आदि करनेवाली कल्याण प्राप्त करता है ॥ ६१ ॥

पापके महासागरको पार करनेके लियेभगवान् ६२ शिवकी भक्ति नौकाके समान है । इसलिये जान भक्तिभावसे युक्त है, उसे रजोगुण और तमोगुणसे क्या हानि हो सकती है? श्रीकृष्ण! अन्त्यज, अधम, मूर्ख ६३ अथवा पतित मनुष्य भी यदि भगवान् शिवकी शरणमें चला जाय तो वह समस्त देवताओं एवं असुरोंके लिये भी पूजनीय हो जाता है । अतः सर्वथा प्रयत्न करके ६४ भक्तिभावसे ही शिवकी पूजा करे; क्योंकि अभक्तोंको कहीं भी फल नहीं मिलता ॥ ६२–६४ ॥ हे कृष्ण! अब मैं आपको एक परम रहस्य बताऊँगा, आप मेरा वचन सुनिये, वेदोंके विद्वानोंने वेदों तथा शास्त्रोंके द्वारा विचार र करके इसे सुनिश्चित ६५ | किया है ॥ ६५ ॥

इति श्रीशिवमहापुराणे सप्तम्यां वायवीयसंहितायामुत्तरखण्डे शिवशास्त्रोक्तपूजनवर्णनं नाम पञ्चविंशोऽध्यायः ॥ २५ ॥

॥ इस प्रकार श्रीशिवमहापुराणके अन्तर्गत सातवीं वायवीयसंहिताके उत्तरखण्डमें शिवशास्त्रोक्त पूजनवर्णन नामक पचीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ २५ ॥

अथ षड्विंशोऽध्यायः सांगोपांगपूजाविधानका वर्णन उपमन्युरुवाच

ब्रह्मघ्नो वा सुरापो वा स्तेयी वा गुरुतल्पगः ।

मातृहा पितृहा वापि वीरहा भ्रूणहापि वा ॥

सम्पूज्यामन्त्रकं भक्त्या शिवं परमकारणम् ।

तैस्तैः पापैः प्रमुच्येत वर्षैर्द्वादशभिः क्रमात् ॥

तस्मात् सर्वप्रयत्नेन पतितोऽपि यजेत् शिवम् ।

भक्तश्चेन्नापरः कश्चिद्भिक्षाहारो जितेद्रियः ॥

उपमन्यु बोले- ब्राह्मणहन्ता, सुरापान करनेवाला, चोरी करनेवाला, गुरुपत्नीके साथ व्यभिचार १ करनेवाला, माता - पिताका वध करनेवाला, राजहन्ता तथा भ्रूणहत्या करनेवाला भी बिना मन्त्रके ही भक्तिपूर्वक परम कारण शिवका पूजन करके उन - उन २ पापोंसे क्रमसे बारह वर्षोंमें मुक्त हो जाता है । अतः | पतितको भी सभी प्रयत्नोंसे शिवकी पूजा करनी चाहिये । भक्त ही मुक्त होता है, दूसरा कोई नहीं, चाहे ३ वह भिक्षाहारी और जितेन्द्रिय ही हो ॥ १८३॥ ॥

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अ ० २६ ] वायवीयसहिता

कृत्वापि सुमहत्पापं भक्त्या पञ्चाक्षरेण तु ।

देवेशं तस्मात्पापात्प्रमुच्यते ॥ ४

पूजयेद्यदि वायुभक्षाश्च ये चान्ये व्रतकर्शिताः । अभक्षा शिवलोकसमागमः तेषामेतैर्व्रतैर्नास्ति ॥ ५

भक्त्या पञ्चाक्षरेणैव यः शिवं सकृदर्चयेत् ।

सोऽपि गच्छेच्छिवस्थानं शिवमन्त्रस्य गौरवात् ॥ ६

तस्मात्तपांसि यज्ञाश्च सर्वे सर्वस्वदक्षिणाः ।

शिवमूर्त्यर्चनस्यैते कोट्यंशेनापि नो समाः ॥ ७

बद्धो वाप्यथ मुक्तो वा पाशात्पञ्चाक्षरेण चेत् ।

पूजयन्मुच्यते भक्तो नात्र कार्या विचारणा ॥ ८

अरुद्रो वा सरुद्रो वा सूक्तेन शिवमर्चयेत् ।

यः सकृत्पतितो वापि मूढो वा मुच्यते नरः ॥ ९

षडक्षरेण वा देवं सूक्तमन्त्रेण पूजयेत् ।

शिवभक्तो जितक्रोधो ह्यलब्धो लब्ध एव च ॥ १०

अलब्धाल्लब्ध एवात्र विशिष्टो नात्र संशयः ।

सब्रह्माङ्गेन वा तेन सहंसेन विमुच्यते ॥ ११

तस्मान्नित्यं शिवं भक्त्या सूक्तमन्त्रेण पूजयेत् ।

एककालं द्विकालं वा त्रिकालं नित्यमेव वा ॥ १२

येऽर्चयन्ति महादेवं विज्ञेयास्ते महेश्वराः ॥

( उत्तरखण्ड ) ९९ १ उपमन्यु कहते हैं— [ यदुनन्दन! ] कोई बड़ा भारी पाप करके भी भक्तिभावसे पंचाक्षर - मन्त्रद्वारा यदि देवेश्वर शिवका पूजन करे तो वह उस पापसे मुक्त हो जाता है ॥ ४ ॥

जो जल तथा वायुका आहार ग्रहण करनेवाले और व्रतोंके द्वारा शरीरको कृश करनेवाले अन्य लोग हैं, [ वे भले ही इनका आचरण करते रहें, पर बिना । शिवभक्तिके ] उनका इन व्रतोंके द्वारा शिवलोक-सान्निध्य नहीं हो सकता है ॥५ ॥

जो भक्तिभावसे पंचाक्षर मन्त्रद्वारा एक ही बार शिवका पूजन कर लेता है, वह भी शिवमन्त्रके गौरववश शिवधामको चला जाता है ॥६ ॥

अतः सभी तप, यज्ञ तथा सर्वस्व दक्षिणाएँ — ये सब शिवमूर्तिके पूजनके करोड़वें अंशके भी बराबर नहीं हैं ॥७ ॥

कोई बद्ध हो अथवा मुक्त हो, पंचाक्षरमन्त्रसे पूजा करनेवाला भक्त मुक्त हो जाता है, इसमें कोई विचार नहीं करना चाहिये । कोई सरुद्र अर्थात् रुद्रोपासक हो या अरुद्र अर्थात् परम्परासे उपासक न हो, अथवा पतित या मोहग्रस्त ही क्यों न हो, किंतु [ शास्त्रोंमें ] भलीभाँति कहे गये [ पंचाक्षरमन्त्र ] -के द्वारा यदि एक बार भी शिवपूजन करता है तो उसे मोक्ष प्राप्त होता है । ८ - ९ ॥ दीक्षित अथवा अदीक्षित शिवभक्तको चाहिये कि वह क्रोधादि विकारोंको जीतकर [ शास्त्रोंमें ] भलीभाँति प्रतिपादित इस षडक्षरमन्त्रके द्वारा भगवान् शिवका पूजन करे ॥ १० ॥

दीक्षाविहीनकी अपेक्षा शिवोपासनामें दीक्षित साधकका विशेष अधिकार निश्चय ही बताया गया है । पंच ब्रह्ममन्त्रों तथा हंस मन्त्रके [ पारायण - जप आदिके ] द्वारा मनुष्य मोक्ष प्राप्त कर लेता है ॥ ११ ॥

अतः प्रतिदिन भक्तिपूर्वक इस प्रशंसित मन्त्रसे शिवका पूजन करना चाहिये । जो लोग प्रतिदिन एक समय, दो समय अथवा तीन समय महादेवकी पूजा करते हैं, उन्हें [ साक्षात् ] शिवका प्रमुख गण समझना ज्ञानेनात्मसहायेन नार्चितो शिवः ॥ १३ चाहिये । जिसने आत्मसहायक ज्ञानसे भगवान् शिवका भगवान् अर्चन नहीं किया, वह इस दु: खसागररूपी संसारमें दीर्घकालतक भ्रमण करता रहता है ॥ १२-१३१ / २ ॥ स चिरं संसरत्यस्मिन् संसारे दुःखसागरे ।

पृष्ठ 1006

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९९ २ दुर्लभं प्राप्य मानुष्यं मूढो नार्चयते शिवम् निष्फलं तस्य तज्जन्म मोक्षाय न भवेद्यतः दुर्लभं प्राप्य मानुष्यं येऽर्चयन्ति पिनाकिनम् तेषां हि सफलं जन्म कृतार्थास्ते नरोत्तमाः भवभक्तिपरा ये च भवप्रणतचेतसः भवसंस्मरणोद्युक्ता न ते दुःखस्य भागिनः भवनानि मनोज्ञानि विभ्रमाभरणाः स्त्रियः धनं चातृप्तिपर्यन्तं शिवपूजाविधेः फलम् । श्रीशिवमहापुराण [ अ ० २६ जो मूढ़ दुर्लभ मानव - जन्म पाकर भगवान ॥१४ । शिवकी अर्चना नहीं करता, उसका वह जन्म निष्फल । है; क्योंकि वह मोक्षका साधक नहीं होता ॥ १४१ / २ ॥ ॥ १५ जो दुर्लभ मानव - जन्म पर पिनाकपाणि | महादेवजीकी आराधना करते हैं, उन्हींका जन्म सफल है और वे ही कृतार्थ एवं श्रेष्ठ मनुष्य हैं । जो । शिवकी भक्तिमें तत्पर रहते हैं, जिनका चित्त ॥ १६ । भगवान् शिवके सामने प्रणत होता है तथा जो | भगवान् सदा | ही भगवान् शिवके चिन्तनमें लगे रहते हैं, वे कभी । दुःख भागी नहीं होते ॥ १५-१६१ / २ ॥ ॥ १७ मनोहर भवन, हाव, भाव, विलाससे विभूषित [ तरुणी ] स्त्रियाँ और जिससे पूर्ण तृप्ति हो जाय , इतना धन — ये सब भगवान् शिवकी आराधनाके फल ये वाञ्छन्ति महाभोगान् राज्यं च त्रिदशालये ॥ १८ हैं । जो देवलोकमें महान् भोग और राज्य चाहते हैं,

ते वाञ्छन्ति सदाकालं हरस्य चरणाम्बुजम् ।

सौभाग्यं कान्तिमद्रूपं सत्त्वं त्यागार्द्रभावता ॥

शौर्यं वै जगति ख्यातिः शिवमर्चयतो भवेत् ।

तस्मात् सर्वं परित्यज्य शिवैकाहितमानसः ॥

शिवपूजाविधिं कुर्याद्यदीच्छेत् शिवमात्मनः ।

त्वरितं जीवितं याति त्वरितं याति यौवनम् ॥

त्वरितं व्याधिरभ्येति तस्मात् पूज्यः पिनाकधृक् ।

यावन्नायाति मरणं यावन्नाक्रमते जरा ॥

यावन्नेन्द्रियवैकल्यं तावत्पूजय शङ्करम् ।

न शिवार्चनतुल्योऽस्ति धर्मोऽन्यो भुवनत्रये ॥

इति विज्ञाय यत्नेन पूजनीयः सदाशिवः ।

द्वारयागं च वनिकां परिवारबलिक्रियाम् ॥

नित्योत्सवं च कुर्वीत प्रासादे यदि पूजयेत् ।

हविर्निवेदनादूर्ध्वं स्वयं चानुचरोऽपि वा ॥

प्रासादपरिवारेभ्यो बलिं दद्याद्यथाक्रमम् । वे सदा भगवान् शिवके चरणारविन्दोंका चिन्तन करते हैं । सौभाग्य, कान्तिमान् रूप, बल, त्याग, दयाभाव, १ ९ शूरता और विश्वमें विख्याति – ये सब बातें भगवान् शिवकी पूजा करनेवाले लोगोंको ही सुलभ होती हैं ॥ १७–१९ १ / २ ॥ २० इसलिये जो अपना कल्याण चाहता हो, उसे सब कुछ छोड़कर केवल भगवान् शिवमें मन लगा उनकी आराधना करनी चाहिये । जीवन बड़ी तेजी से २१ जा रहा है, यौवन शीघ्रतासे बीता जा रहा है और रोग तीव्रगतिसे निकट आ रहा है, इसलिये सबको पिनाकपाणि महादेवजीकी पूजा करनी चाहिये, जबतक मृत्यु नहीं २२ आती है, जबतक वृद्धावस्थाका आक्रमण नहीं होता और जबतक इन्द्रियोंकी शक्ति क्षीण नहीं हो जाती है, तबतक ही भगवान् शंकरकी आराधना कर लो । २३ भगवान् शिवकी आराधनाके समान दूसरा कोई धर्म तीनों लोकोंमें नहीं है॥२०–२३ ॥ इस बातको समझकर प्रयत्नपूर्वक भगवान २४ सदाशिवकी अर्चना करनी चाहिये । यदि शिवजीकी पूजा प्रासादमें की जाय, उस अवसरपर द्वारयाग, वृक्षारोपण, | परिवार देवताओंके लिये बलि - निवेदन तथा नित्योत्सव २५ करना चाहिये । हविको निवेदित करनेसे पहले स्वयं | ( आचार्य ) अथवा अनुचर ( शिष्य ) प्रासादमें स्थित | परिवार देवताओंको बतायी गयी रीतिसे बलि प्रदान

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अ ० २६ ] वायवीयसंहिता ( उत्तरखण्ड ) निर्गम्य सह वादित्रैस्तदाशाभिमुखः स्थितः ॥

पुष्पं धूपं च दीपं च दद्यादन्नं जलैः सह ।

ततो दद्यात् महापीठे तिष्ठन् बलिमुदङ्मुखः ॥

ततो निवेदितं देवे यत्तदन्नादिकं पुरा ।

तत्सर्वं सावशेषं वा चण्डाय विनिवेदयेत् ॥

हुत्वा च विधिवत्पश्चात्पूजाशेषं समापयेत् ।

कृत्वा प्रयोगं विधिवद्यावन्मन्त्रं जपं ततः ॥

नित्योत्सवं प्रकुर्वीत यथोक्तं शिवशासने ।

विपुले तैजसे पात्रे रक्तपद्मोपशोभिते ॥

अस्त्रं पाशुपतं दिव्यं तत्रावाह्य समर्चयेत् ।

शिरस्यारोप्य तत्पात्रं द्विजस्यालंकृतस्य च ॥

न्यस्तास्त्रवपुषा तेन दीप्तयष्टिधरस्य च ।

प्रासादपरिवारेभ्यो बहिर्मङ्गलनिःस्वनैः ॥

नृत्यगेयादिभिश्चैव सह दीपध्वजादिभिः ।

प्रदक्षिणत्रयं कृत्वा न द्रुतं चाविलम्बितम् ॥

महापीठं समावृत्य त्रिः प्रदक्षिणयोगतः । पुनः प्रविष्टो द्वारस्थो यजमानः कृताञ्जलिः आदायाभ्यन्तरं नीत्वा ह्यस्त्रमुद्वासयेत्ततः प्रदक्षिणादिकं कृत्वा यथापूर्वोदितं क्रमात् आदाय चाष्टपुष्पाणि पूजामथ समापयेत् ९९ ३ २६ । करे । उस समय प्रासादसे बाहर जाकर उन - उन देवताओंके समक्ष स्थित होकर मंगलवाद्य भी बजवाने चाहिये । बलि देनेसे पूर्व पुष्प, धूप, दीप आदि अन्य २७ उपचार समर्पितकर उस महापीठमें उत्तराभिमुख स्थित होकर साधक अन्न, जलादिके सहित बलि प्रदान करे । पहले जो अन्न आदि शिवजीको निवेदन किया २८ जा चुका है और उससे जो बच गया है, यह सब चण्डको निवेदित कर दे ॥ २४–२८ ॥ तदुपरान्त सविधि हवन करके अवशिष्ट पूजनको २ ९ सम्पन्न करे, इस अनुष्ठानको पूर्णकर यथा सामर्थ्य मन्त्र जप भी करे । इस प्रकार शिवशास्त्रमें बतायी गयी विधिसे नित्योत्सव करना चाहिये ॥ २ ९ १ / २ ॥ ३० रक्तवर्णके [ अष्टदल ] कमलसे सुशोभित एक बड़े [ सुवर्ण ] धातुपात्रमें [ भगवान् शिवके ] दिव्य पाशुपत अस्त्रका आवाहनकर उसकी पूजा करे । ३१ यजमान अस्त्रमन्त्रसे न्यास करके उस पात्रको [ वस्त्र-माल्यादिसे ] अलंकृत तथा चमकती हुई छड़ी लेकर स्थित ब्राह्मणके सिरपर रखकर उसके साथ शिवप्रासादके परिवार - देवताओंको [ पूजा - बलि आदि ३२ प्रदान करके ] न अधिक वेगसे न ही मन्द गतिसे अर्थात् मध्यम गतिसे उस महापीठकी तीन बार प्रदक्षिणा करे । उस समय प्रासादसे बाहर मांगलिक ध्वनि ( शंख, मृदंग आदि ) तथा नृत्य - गीतादि भी होने ३३ चाहिये । साधक [ पूजाके अंगके रूपमें ] दीपदान तथा ध्वजदान भी करे । महापीठकी तीन बार प्रदक्षिणा करके अंजलि बाँधे हुए यजमान मन्दिरके द्वारपर । आये और अस्त्रके सहित मन्दिरके अन्दर प्रविष्ट हो ॥ ३४ उस अस्त्रराजका विसर्जन कर दे । तदुपरान्त पूर्वमें बतायी गयी विधिसे क्रमपूर्वक प्रदक्षिणा आदि सम्पन्न करके आठ पुष्प लेकर पूजाका समापन

॥ ३५ | करे ॥ ३०–३५ ॥

इति श्रीशिवमहापुराणे सप्तम्यां वायवीयसंहितायामुत्तरखण्डे साङ्गोपाङ्ग-नाम षड्विंशोऽध्यायः ॥ २६ ॥

पूजाविधानवर्णनं सातवीं वायवीयसंहिताके उत्तरखण्डमें सांगोपांगपूजा-॥ इस प्रकार श्रीशिवमहापुराणके अन्तर्गत छब्बीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ २६ ॥

विधानवर्णन नामक 2224 Shivmahapuran IInd Part_Section_33_1_Front

पृष्ठ 1008

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९९ ४ श्रीशिवमहापुराण [ अ ० २७ अथ सप्तविंशोऽध्यायः शिवपूजनमें अग्निकर्मका वर्णन उपमन्युरुवाच अथाग्निकार्यं वक्ष्यामि कुण्डे वा स्थण्डिलेऽपि वा वेद्यां वा ह्यायसे पात्रे मृण्मये वा नवे शुभे आधायाग्निं विधानेन संस्कृत्य च ततः परम् तत्राराध्य महादेवं होमकर्मसमाचरेत् कुण्डं द्विहस्तमानं वा हस्तमात्रमथापि वा वृत्तं वा चतुरस्त्रं वा कुर्याद्वेदिं च मण्डलम् ॥

कुण्डं विस्तारवन्निम्नं तन्मध्येऽष्टदलाम्बुजम् ।

चतुरंगुलमुत्सेधं तस्य द्व्यङ्गुलमेव वा ॥

वितस्तिद्विगुणोन्नत्या नाभिमन्तः प्रचक्षते ।

मध्ये च मध्यमाङ्गुल्या मध्यमोत्तमपर्वणोः ॥

अंगुलैः कथ्यते सद्भिश्चतुर्विंशतिभिः करः ।

मेखलानां त्रयं वापि द्वयमेकमथापि वा ॥

यथाशोभं प्रकुर्वीत श्लक्ष्णमिष्टं मृदा स्थिरम् ।

अश्वत्थपत्रवद्योनिं गजाधरवदेव वा ॥

झ्रमेखलामध्यतः कुर्यात् पश्चिमे दक्षिणेऽपि वा ।

शोभनामग्रतः किञ्चिन्निम्नामुन्मीलिकां शनैः ॥

अग्रेण कुण्डाभिमुखीं किञ्चिदुत्सृज्य मेखलाम् ।

नोत्सेधनियमो वेद्याः सा मार्दी वाथ सैकती ॥

मण्डलं गोशकृत्तोयैर्मानं पात्रस्य नोदितम् ।

कुण्डं च मृण्मयं वेदिमालिम्पेद् गोमयाम्बुना ॥

प्रक्षाल्य तापयेत्पात्रं प्रोक्षयेदन्यदम्भसा । स्वसूत्रोक्तप्रकारेण उपमन्यु बोले— [ हे कृष्ण! ] अब । अग्निकार्यका वर्णन करूँगा । कुण्डमें, स्थण्डिलपर मैं ॥ । १ वेदीमें, लोहेके हवनपात्रमें या नूतन सुन्दर मिट्टीके, पात्रमें विधिपूर्वक अग्निकी स्थापना करके उसका । । संस्कार करे । तत्पश्चात् वहाँ महादेवजीकी आराधना ॥ २ करके होमकर्म आरम्भ करे ॥ १-२ ॥ । कुण्ड दो या एक हाथ लम्बा -- -चौड़ा होना | चाहिये I । वेदीको गोल या चौकोर बनाना चाहिये ३ । ' । साथ ही मण्डल भी बनाना आवश्यक है । कुण्ड विस्तृत और गहरा होना चाहिये । उसके मध्यभागमें ४ अष्टदल कमल अंकित करे । वह दो या चार अंगुल ऊँचा हो । कुण्डके भीतर दो बित्तेकी ऊँचाईपर नाभिकी स्थिति बतायी गयी है । मध्यमा अंगुलिके ५ मध्यम और उत्तम पर्वोंके बराबर मध्यभाग या कटिभाग जानना चाहिये ॥ ३–५ ॥ साधु पुरुष चौबीस अंगुलके बराबर एक हाथका ६ परिमाण बताते हैं । कुण्डकी तीन, दो या एक मेखला होनी चाहिये । इन मेखलाओंका इस तरह निर्माण करे, जिससे कुण्डकी शोभा बढ़े । सुन्दर और चिकनी योनि ७ बनाये, जिसकी आकृति पीपलके पत्तेकी भाँति अथवा हाथीके अधरोष्ठके समान हो॥६-७ ॥ कुण्डके दक्षिण या पश्चिम भागमें मेखलाके ८ बीचोबीच सुन्दर योनिका निर्माण करना चाहिये, जो मेखलासे कुछ नीची हो । उसका अग्रभाग कुण्डकी ओर हो तथा वह मेखलाको कुछ छोड़कर बनायी गयी ९ हो । वेदीके लिये ऊँचाईका कोई नियम नहीं है । वह मिट्टी या बालूकी होनी चाहिये ॥८ - ९ ॥ गायके गोबर या जलसे मण्डल बनाना १० चाहिये । पात्रका परिमाण नहीं बताया गया है । कुण्ड और मिट्टीकी वेदीको गोबर और जलसे लीपना चाहिये ॥ १० ॥

पात्रको धोकर तपाये तथा अन्य वस्तुओंका । जलसे प्रोक्षण करे । अपने - अपने गृह्यसूत्रमें बतायी हुई कुण्डादौ विलिखेत्ततः ॥ ११ विधिके अनुसार कुण्डमें और वेदीपर उल्लेखन ( रेखा ) 2224 Shivmahapuran_IInd Part_Section_33_1_Back

पृष्ठ 1009

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अ ० २७ ] वायवीयसहिता ( उत्तरखण्ड )

सम्प्रोक्ष्य कल्पयेद्दर्भैः पुष्पैर्वा वह्निविष्टरम् ।

अर्चनार्थं च होमार्थं सर्वद्रव्याणि साधयेत् ॥

प्रक्षाल्य क्षालनीयानि प्रोक्षण्या प्रोक्ष्य शोधयेत् ।

मणिजं काष्ठजं वाथ श्रोत्रियागारसम्भवम् ॥

अन्यं वाभ्यर्हितं वह्निं ततः साधारमानयेत् । ९९ ५ करे । [ रेखाओंपरसे मृत्तिका लेकर ईशानकोणमें फेंक १२ दे । ] फिर अग्निके उस आसनका कुशों अथवा पुष्पद्वारा जलसे प्रोक्षण करे । तत्पश्चात् पूजन और हवनके लिये सब प्रकारके द्रव्योंका संग्रह करे ॥ ११-१२ ॥ धोनेयोग्य वस्तुओंको धोकर प्रोक्षणीके जलसे १३ उनका प्रोक्षण करके उन्हें शुद्ध करे । इसके बाद सूर्यकान्तमणिसे प्रकट, काष्ठसे उत्पन्न, श्रोत्रियकी अग्निशालामें संचित अथवा दूसरी किसी उत्तम अग्निको त्रिःप्रदक्षिणमावृत्य कुण्डादेरुपरि क्रमात् ॥१४ आधारसहित ले आये । उसे कुण्ड अथवा वेदीके ऊपर

बह्निबीजं समुच्चार्य त्वादधीताग्निमासने ।

योनिमार्गेण वा तद्वदात्मनः सम्मुखेन वा ॥

योनि प्रदेशगः सर्वं कुण्डं कुर्याद्विचक्षणः ।

स्वनाभ्यन्तःस्थितं वह्निं तद्रन्ध्राद्विस्फुलिङ्गवत् ॥

निर्गम्य पावके बाह्ये लीनं बिम्बाकृतिं स्मरेत् । तीन बार प्रदक्षिणक्रमसे घुमाकर अग्निबीज ( रं ) - का उच्चारण करके उस अग्निको उक्त कुण्ड या वेदीके आसनपर स्थापित कर दे । कुण्डमें स्थापित करना हो १५ तो योनिमार्गसे अग्निका आधान करे और वेदीपर अपने सामनेकी ओर अग्निकी स्थापना करे ॥ १३–१५ ॥ योनिप्रदेशके पास स्थित विद्वान् पुरुष समस्त १६ कुण्डको अग्निसे संयुक्त करे । साथ ही यह भावना करे कि अपनी नाभिके भीतर जो अग्निदेव विराजमान हैं, वे ही नाभिरन्ध्रसे चिनगारीके रूपमें निकलकर बाह्य अग्निमें मण्डलाकार होकर लीन हुए हैं ॥ १६३ ॥

आज्यसंस्कारपर्यन्तमन्वाधानपुरःसरम् ॥१७ अग्निपर समिधा रखनेसे लेकर घीके संस्कारपर्यन्त स्वसूत्रोक्तक्रमात्कुर्यात् मूलमन्त्रेण मन्त्रवित् । शिवमूर्तिं समभ्यर्च्य ततो दक्षिणपार्श्वतः न्यस्य मन्त्रं घृते मुद्रां दर्शयेद्धेनुसंज्ञिताम् स्रुक्स्त्रुवौ तैजसो ग्राह्यौ न कांस्यायससैसकौ यज्ञदारुमयौ वापि स्मातौ वा शिल्पसम्मतौ पर्णे वा ब्रह्मवृक्षादेरच्छिद्रे मध्य उत्थिते संमृज्य दर्भैस्तौ वह्नौ सन्ताप्य प्रोक्षयेत्पुनः परिषिच्य स्वसूत्रोक्तक्रमेण शिवपूर्वकैः जुहुयादष्टभिर्बीजैरग्निसंस्कारसिद्धये सारा कार्य मन्त्रज्ञ पुरुष अपने गृह्यसूत्रमें बताये हुए क्रमसे मूलमन्त्रद्वारा सम्पन्न करे । तदनन्तर शिवमूर्तिकी ॥ १८ पूजा करके दक्षिण पार्श्वमें मन्त्र- न्यास करे और घृतमें । धेनुमुद्राका प्रदर्शन करे ॥ १७-१८१ / २ ॥ ॥ १ ९ स्रुक् और स्रुवा — ये दोनों धातुके बने हुए हों तो ग्रहण करनेयोग्य हैं । परंतु काँसे, लोहे और शीशेके बने हुए स्रुक्, स्रुवाको नहीं ग्रहण करना चाहिये अथवा यज्ञसम्बन्धी काष्ठके बने हुए स्रुक्, स्रुवा भी । ग्राह्य हैं । स्मृति या शिल्पशास्त्रमें जो विहित हों, वे ॥ २० भी ग्राह्य हैं अथवा ब्रह्मवृक्ष ( पलास या गूलर ) आदिके छिद्ररहित तथा ऊपरकी ओर उभारवाले बिचले दो पत्ते लेकर उन्हें कुशसे पोंछे और अग्निमें तपाकर फिर उनका प्रोक्षण करे । [ उन्हीं पत्तोंको स्रुक् । रूप दे ] उनमें घी उठाये और अपने ॥ २१ और स्रुवाका हुए क्रमसे शिवबीज ( ॐ ) -सहित गृह्यसूत्रमें बताये आठ बीजाक्षरोंद्वारा अग्निमें आहुति दे । इससे अग्निका संस्कार सम्पन्न होता है ॥ १ ९ -२११ / २ ॥ 2224 Shivmahapuran_IInd Part_Section_33_2_Front

पृष्ठ 1010

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९९ ६ श्रीशिवमहापुराण [ अ ० २७ भुं स्तुं बुं श्रुं क्रमेणैव पुं डुं डुं इत्यतः परम् ॥ २२

बीजानि सप्त सप्तानां जिह्वानामनुपूर्वशः ।

त्रिशिखा मध्यमा जिह्वा बहुरूपसमाह्वया ॥ २३

तस्याः शिखा दक्षिणतो ज्वलन्ती वामतः परा ।

हिरण्या प्रागुदग्जिह्वा कनका पूर्वतः स्थिता ॥ २४

रक्तानेयी नैर्ऋती च कृष्णान्या सुप्रभा मता ।

अतिरिक्ता मरुज्जिह्वा स्वनामानुगुणप्रभा ॥ २५

स्वबीजानन्तरं वाच्या स्वाहान्तञ्च यथाक्रमम् ।

जिह्वामन्त्रैस्तु हुत्वाज्यं जिह्वास्त्वैकैकशः क्रमात् ॥ २६

रं वह्नयेति स्वाहेति मध्ये हुत्वाहुतित्रयम् ।

सर्पिषा वा समिद्भिर्वा परिषेचनमाचरेत् ॥ २७

एवं कृते शिवाग्निः स्यात्स्मरेत्तत्र शिवासनम् ।

तत्रावाह्य यजेद्देवमर्धनारीश्वरं शिवम् ।

दीपान्तं परिषिच्याथ समिद्धोमं समाचरेत् ॥ २८

ताः पालाश्यः परा वापि यज्ञिया द्वादशाङ्गुलाः । वे बीज इस प्रकार हैं — श्रुं स्तुं बुं श्रुं पुं डुं डुं | ये सात हैं, इनमें शिवबीज ( ॐ ) - को सम्मिलित लेनेपर आठ बीजाक्षर होते हैं । उपर्युक्त सात कर बीज । क्रमशः अग्निकी सात जिह्वाओंके हैं । उनकी मध्यमा जिह्वाका नाम बहुरूपा है । उसकी तीन शिखाएँ हैं । उनमेंसे एक शिखा दक्षिणमें और दूसरी वाम दिशा ( उत्तर ) में प्रज्वलित होती है और बीचवाली शिखा । बीचमें ही प्रकाशित होती है । ईशानकोणमें जो जिह्वा है, उसका नाम हिरण्या है । पूर्वदिशामें विद्यमान जिह्वा । कनका नामसे प्रसिद्ध है । अग्निकोणमें रक्ता, नैर्ऋत्यकोणमें | कृष्णा और वायव्यकोणमें सुप्रभा नामकी जिह्वा । प्रकाशित होती है । इनके अतिरिक्त पश्चिममें जो जिह्वा प्रज्वलित होती है, उसका नाम मरुत् है । इन सबकी प्रभा अपने - अपने नामके अनुरूप है ॥ २२-२५ ॥ अपने - अपने बीजके अनन्तर क्रमशः इनका नाम लेना चाहिये और नामके अन्तमें स्वाहाका प्रयोग करना चाहिये । इस तरह जो जिह्वामन्त्र * बनते हैं, उनके द्वारा क्रमशः प्रत्येक जिह्वाके लिये एक - एक घीकी आहुति दे, परंतु मध्यमाकी तीन जिह्वाओंके लिये तीन आहुतियाँ दे । कुण्डके मध्यभागमें ‘ रं वह्नये स्वाहा ' बोलकर तीन आहुतियाँ दे । ये आहुतियाँ घी अथवा समिधासे देनी चाहिये । आहुति देनेके पश्चात् अग्निमें जलका सेचन करे ॥ २६-२७ ॥ ऐसा करनेपर वह अग्नि भगवान् शिवकी हो जाती है । फिर उसमें शिवके आसनका चिन्तन करे और वहाँ अर्धनारीश्वर भगवान् शिवका आवाहन करके पूजन करे । पाद्य - अर्घ्य आदिसे लेकर दीपदानपर्यन्त पूजन करके अग्निका जलसे प्रोक्षण करे । तत्पश्चात् समिधाओंकी आहुति दे । वे समिधाएँ पलासकी या गूलर आदि दूसरे यज्ञिय वृक्षकी होनी चाहिये । उनकी लम्बाई बारह अंगुलकी हो । समिधाएँ टेढ़ी न हों । स्वतः सूखी हुई भी न हों । उनके छिलके न उतरे हों तथा उनपर किसी अवक्रा न स्वयं शुष्काः सत्वचो निर्व्रणाः समाः ॥ २ ९ प्रकारकी चोट सी होनी न हो । सब समिधाएँ एक -बुं कनकायै ओं भुं त्रिशिखायै बहुरूपायै स्वाहा ( दक्षिणे मध्ये उत्तरे च ) ३। ओं स्तुं हिरण्यायै स्वाहा ( ऐशान्याम् ) १ । ओं ड्रं, सुप्रभायै स्वाहा ( पूर्वस्याम् ) १। ओं श्रुं रक्तायै स्वाहा ( आग्नेय्याम् ) १। ओं पुं कृष्णायै स्वाहा ( नैर्ऋत्याम् ) १। ओं स्वाहा ( पश्चिमायाम् ) १ । ओं दुं मरुज्जिह्वायै स्वाहा: ( वायव्ये ) १ । 2224 Shivmahapuran_IInd Part_Section_33_2_Back