श्रीगणेशाय नमः।
शिव महापुराण - २ — पृष्ठ 991–1000
शिव महापुराण - २ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 991–1000
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अ ० २३ ] वायवीयसहिता ( उत्तरखण्ड ) यागमग्निकार्यावसानकम् । अङ्गमभ्यन्तरं वा न वा पश्चाद् बहिर्यागं समाचरेत् ॥ विधाय द्रव्याणि मनसा कल्पयित्वा विशोध्य च । तत्र ध्यात्वा विनायकं देवं पूजयित्वा विधानतः ॥ चोत्तरे चैव नन्दीशं सुयशां तथा । दक्षिणे आराध्य मनसा सम्यगासनं कल्पयेद्बुधः ॥
आराधनादिकैर्युक्तः सिंहयोगासनादिकम् ।
पद्मासनं वा विमलं तत्त्वत्रयसमन्वितम् ॥
तस्योपरि शिवं ध्यायेत् साम्बं सर्वमनोहरम् ।
सर्वलक्षणसम्पन्नं सर्वावयवशोभनम् ॥
सर्वातिशयसंयुक्तं सर्वाभरणभूषितम् ।
रक्तास्यपाणिचरणं कुन्दचन्द्रस्मिताननम् ॥
शुद्धस्फटिकसङ्काशं फुल्लपद्मत्रिलोचनम् ।
चतुर्भुजमुदाराङ्ग चारुचन्द्रकलाधरम् ॥
वरदाभयहस्तं च मृगटङ्कधरं हरम् ।
भुजङ्गहारवलयं चारुनीलगलान्तरम् ॥
सर्वोपमानरहितं सानुगं सपरिच्छदम् ।
ततः संचिन्तयेत्तस्य वामभागे महेश्वरीम् ॥
प्रफुल्लोत्पलपत्राभां विस्तीर्णायतलोचनाम् ।
पूर्णचन्द्राभवदनां नीलकुंचितमूर्धजाम् ॥
नीलोत्पलदलप्रख्यां चन्द्रार्द्धकृतशेखराम् ।
अतिवृत्तघनोत्तुंगस्निग्धपीनपयोधराम् ॥
९ ७७ मनुष्य अग्निहोत्रपर्यन्त अन्तर्यागका अनुष्ठान २ करके पीछे बहिर्याग ( बाह्यपूजन ) करे । ( उसकी विधि इस प्रकार है— ) अन्तर्यागमें पहले पूजाद्रव्योंको ३ मनसे कल्पित और शुद्ध करके गणेशजीका विधिपूर्वक चिन्तन एवं पूजन करे ॥ २-३ ॥ तत्पश्चात् दक्षिण और उत्तरभागमें क्रमशः ४ नन्दीश्वर और सुयशाकी आराधना करके विद्वान् पुरुष मनसे उत्तम आसनकी कल्पना करे ॥ ४ ॥
सिंहासन, योगासन अथवा तीनों तत्त्वोंसे युक्त ५ निर्मल पद्मासनकी भावना करे ॥ उसके ऊपर सर्वमनोहर साम्ब - शिवका ध्यान करे ॥ ५१/२ ॥ ६ वे शिव समस्त शुभ लक्षणोंसे युक्त और सम्पूर्ण अवयवोंसे शोभायमान हैं । वे सबसे बढ़कर हैं और समस्त आभूषण उनकी शोभा बढ़ाते हैं । उनके हाथ - पैर लाल हैं । उनका मुसकराता हुआ मुख कुन्द ७ और चन्द्रमाके समान शोभा पाता है । उनकी अंगकान्ति शुद्ध स्फटिकके समान निर्मल है । तीन नेत्र प्रफुल्ल कमलकी भाँति सुन्दर हैं । चार भुजाएँ, उत्तम ८ अंग और मनोहर चन्द्रकलाका मुकुट धारण किये भगवान् हर अपने दो हाथोंमें वर तथा अभयकी मुद्रा धारण करते हैं और शेष दो हाथोंमें मृगमुद्रा एवं टंक लिये हुए हैं । उनकी कलाईमें सर्पोंकी माला कड़ेका ९ काम देती है । गलेके भीतर मनोहर नील चिह्न शोभित होता है, उनकी कहीं कोई उपमा नहीं है । वे अपने अनुगामी सेवकों तथा आवश्यक उपकरणोंके साथ विराजमान हैं ॥ ६ – ९ १ / २ ॥ इस तरह ध्यान करके उनके वाम - भागमें १० महेश्वरी शिवाका चिन्तन करे । शिवाकी अंगकान्ति प्रफुल्ल कमलदलके समान परम सुन्दर है । उनके नेत्र बड़े - बड़े हैं । मुख पूर्ण चन्द्रमाके समान सुशोभित है । मस्तकपर काले - काले घुँघराले केश शोभा पाते ११ हैं । वे नील उत्पलदलके समान कान्तिमती हैं । मस्तकपर अर्धचन्द्रका मुकुट धारण करती हैं । उनके पीन पयोधर अत्यन्त गोल, घनीभूत, ऊँचे और स्निग्ध हैं । शरीरका मध्यभाग कृश है । नितम्बभाग स्थूल है । वे महीन पीले वस्त्र धारण किये हुए हैं । सम्पूर्ण उनकी शोभा बढ़ाते हैं । ललाटपर लगे हुए १२ | आभूषण
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श्रीशिवमहापुराण [ अ ० ९ ७८ २३ । । सुन्दर तिलकसे उनका सौन्दर्य और खिल तनुमध्यां पृथुश्रोणीं पीतसूक्ष्मवराम्बराम् विचित्र फूलोंकी मालासे गुम्फित केशपाश उठा है । सर्वाभरणसंपन्नां ललाटतिलकोज्ज्वलाम् ॥ १३ / उनकी । विचित्रपुष्पसङ्कीर्णकेशपाशोपशोभिताम् सर्वतोऽनुगुणाकारां किञ्चिल्लज्जानताननाम् ॥ १४
हेमारविन्दं विलसद्दधानां दक्षिणे करे ।
दंडवच्चापरं हस्तं न्यस्यासीनां महासने ॥ १५
पाशविच्छेदिकां साक्षात्सच्चिदानन्दरूपिणीम् ।
एवं देवं च देवीं च ध्यात्वासनवरे शुभे ॥ १६
सर्वोपचारवद् भक्त्या भावपुष्पैः समर्चयेत् ।
अथवा परिकल्प्यैवं मूर्तिमन्यतमां विभोः ॥ १७
शैवीं सदाशिवाख्यां वा तथा माहेश्वरीं पराम् ।
षड्विंशकाभिधानां वा श्रीकंठाख्यामथापि वा ॥ १८
मन्त्रन्यासादिकांश्चापि कृत्वा स्वस्यां तनौ यथा ।
अस्यां मूर्ती मूर्तिमन्तं शिवं सदसतः परम् ॥ १ ९
ध्यात्वा बाह्यक्रमेणैव पूजां निर्वर्त्तयेद्धिया ।
समिदाज्यादिभिः पश्चान्नाभौ होमं च भावयेत् ॥ २०
भ्रूमध्ये च शिवं ध्यायेच्छुद्धदीपशिखाकृतिम् ।
इत्थमङ्गे स्वतंत्रे वा योगे ध्यानमये शुभे ॥ २१
अग्निकार्यावसानं च सर्वत्रैव समो विधिः ।
अथ चिन्तामयं सर्वं समाप्याराधनक्रमम् ॥ २२
लिङ्गे च पूजयेद्देवं स्थंडिले वानलेऽपि वा ॥ २३ ।
। शोभा बढ़ाते हैं । उनकी आकृति सब ओरसे । और सुडौल है । मुख लज्जासे कुछ - कुछ झुका सुन्दर दाहिने हाथमें शोभाशाली सुवर्णमय कमल है । वे धारण | किये हुए हैं और दूसरे हाथको दण्डकी भाँति सिंहासनपर रखकर उसका सहारा ले उस महान् आसनपर बैठी हुई हैं । शिवादेवी समस्त पाशोंका छेदन करनेवाली साक्षात् सच्चिदानन्दस्वरूपिणी हैं ॥ १०-१५१ / २ ॥ इस प्रकार महादेव और महादेवीका ध्यान करके शुभ एवं श्रेष्ठ आसनपर सम्पूर्ण उपचारोंसे युक्त भावमय पुष्पोंद्वारा उनका पूजन करे ॥ १६१/२ ॥ अथवा उपर्युक्त वर्णनके अनुसार प्रभु शिवकी एक मूर्ति बनवा ले, उसका नाम शिव या सदाशिव हो । दूसरी मूर्ति शिवाकी होनी चाहिये; उसका नाम माहेश्वरी षड्विंशका अथवा ' श्रीकण्ठ ' हो ॥ १७-१८ ॥ फिर अपने ही शरीरकी भाँति मूर्तिमें मन्त्रन्यास आदि करके उस मूर्तिमें सत् - असत्से परे मूर्तिमान् परम शिवका ध्यान करे । इसके बाद बाह्य पूजनके ही क्रमसे मनसे पूजा सम्पादित करे । तत्पश्चात् समिधा और घी आदिसे नाभिमें होमकी भावना करे ॥ १ ९ -२० ॥ तदनन्तर भ्रूमध्यमें शुद्ध दीपशिखाके समान आकार - वाले ज्योतिर्मय शिवका ध्यान करे । इस प्रकार अपने अंगमें अथवा स्वतन्त्र विग्रहमें शुभ ध्यानयोगके द्वारा अग्निमें होम- पर्यन्त सारा पूजन करना चाहिये । यह विधि सर्वत्र ही समान है । इस तरह ध्यानमय आराधनाका सारा क्रम समाप्त करके महादेवजीका शिवलिंगमें, वेदीपर अथवा अग्निमें पूजन करे ॥ २१-२३ ॥ इति श्रीशिवमहापुराणे सप्तम्यां वायवीयसंहितायामुत्तरखण्डेपूजाविधान-व्याख्यानवर्णनं नाम त्रयोविंशोऽध्यायः ॥ २३ ॥
॥ इस प्रकार श्रीशिवमहापुराणके अन्तर्गत सातवीं वायवीयसंहिताके पूजाविधानव्याख्यानवर्णन उत्तरखण्डमें नामक तेईसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ २३ ॥
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अ ० २४ ] वायवीयसहिता ( उत्तरखण्ड ) ९ ७ ९ अथ चतुर्विंशोऽध्यायः शिवपूजनकी विधि उपमन्युरुवाच
प्रोक्षयेन्मूलमन्त्रेण पूजास्थानं विशुद्धये ।
गन्धचन्दनतोयेन पुष्पं तत्र विनिक्षिपेत् ॥
अस्त्रेणोत्सार्य वै विघ्नानवगुण्ठ्य च वर्मणा ।
अस्त्रं दिक्षु प्रविन्यस्य कल्पयेदर्चनाभुवम् ॥
तत्र दर्भान्परिस्तीर्य क्षालयेत्प्रोक्षणादिभिः ।
संशोध्य सर्वपात्राणि द्रव्यशुद्धिं समाचरेत् ॥
प्रोक्षणीमर्घ्यपात्रं च पाद्यपात्रमतः परम् ।
तथैवाचमनीयस्य पात्रं चेति चतुष्टयम् ॥
प्रक्षाल्य प्रोक्ष्य वीक्ष्याथ क्षिपेत्तेषु जलं शिवम् ।
पुण्यद्रव्याणि सर्वाणि यथालाभं विनिक्षिपेत् ॥
रत्नानि रजतं हेम गन्धपुष्पाक्षतादयः ।
फलपल्लवदर्भांश्च पुण्यद्रव्याण्यनेकधा ॥
स्नानोदके सुगन्धादि पानीये च विशेषतः ।
शीतलानि मनोज्ञानि कुसुमादीनि निक्षिपेत् ॥
उशीरं चन्दनं चैव पाद्ये तु परिकल्पयेत् ।
जातिकङ्कोलकर्पूरबहुमूलतमालकान् ॥
क्षिपेदाचमनीये च चूर्णयित्वा विशेषतः ।
एलां पात्रेषु सर्वेषु कर्पूरं चन्दनं तथा ॥
कुशाग्राण्यक्षतांश्चैव यवव्रीहितिलानपि ।
आज्यसिद्धार्थपुष्पाणि भसितं चार्घ्यपात्रके ॥
कुशपुष्पयवव्रीहिबहुमूलतमालकान् प्रक्षिपेत् प्रोक्षणीपात्रे भसितं च यथाक्रमम् ॥
सर्वत्र मन्त्रं विन्यस्य वर्मणावेष्ट्य बाह्यतः ।
पश्चादस्त्रेण संरक्ष्य धेनुमुद्रां प्रदर्शयेत् ॥
पूजाद्रव्याणि सर्वाणि प्रोक्षणीपात्रवारिणा ।
सम्प्रोक्ष्य मूलमन्त्रेण शोधयेद्विधिवत्ततः ॥
उपमन्यु कहते हैं— यदुनन्दन! विशुद्धिके लिये मूलमन्त्रसे गन्ध, चन्दनमिश्रित जलके द्वारा १ पूजास्थानका प्रोक्षण करना चाहिये । इसके बाद वहाँ फूल बिखेरे ॥ १ ॥
अस्त्र - मन्त्र ( फट् ) -का उच्चारण करके विघ्नोंको २ भगाये । फिर कवच - मन्त्र ( हुम् ) -से पूजास्थानको सब ओरसे अवगुण्ठित करे । अस्त्र - मन्त्रका सम्पूर्ण दिशाओंमें न्यास करके पूजाभूमिकी कल्पना करे । वहाँ सब ओर कुश बिछा दे और प्रोक्षण आदिके द्वारा ३ उस भूमिका प्रक्षालन करे । पूजासम्बन्धी समस्त पात्रोंका शोधन करके द्रव्यशुद्धि करे ॥ २-३ ॥ प्रोक्षणीपात्र, अर्घ्यपात्र, पाद्यपात्र और आचमनीय-४ पात्र – इन चारोंका प्रक्षालन, प्रोक्षण और वीक्षण करके इनमें शुभ जल डाले और जितने मिल सकें, ५ उन सभी पवित्र द्रव्योंको उनमें डाले॥४-५ ॥ पंचरत्न, चाँदी, सोना, गन्ध, पुष्प, अक्षत आदि तथा ६ फल, पल्लव और कुश – ये सब अनेक प्रकारके पुण्य द्रव्य हैं । स्नान और पीनेके जलमें विशेषरूपसे सुगन्ध ७ आदि एवं शीतल मनोज्ञ पुष्प आदि छोड़े॥६-७ ॥ पाद्यपात्रमें खश और चन्दन छोड़ना चाहिये । आचमनीयपात्रमें विशेषतः जायफल, कंकोल, कपूर, ८ सहिजन और तमालका चूर्ण करके डालना चाहिये । इलायची सभी पात्रोंमें डालनेकी वस्तु है । कपूर, ९ चन्दन, कुशाग्रभाग, अक्षत, जौ, धान, तिल, घी, सरसों, फूल और भस्म - इन सबको अर्घ्यपात्रमें १० छोड़ना चाहिये॥८–१० ॥ कुश, फूल, जौ, धान, सहिजन, तमाल और भस्म — इन सबका प्रोक्षणीपात्रमें प्रक्षेपण करना ११ चाहिये ॥ ११ ॥
सर्वत्र मन्त्र - न्यास करके कवच - मन्त्रसे प्रत्येक १२ पात्रको बाहरसे आवेष्टित करे । तत्पश्चात् अस्त्र-मन्त्रसे उसकी रक्षा करके धेनुमुद्रा दिखाये । पूजाके सभी द्रव्योंका प्रोक्षणीपात्रके जलसे मूलमन्त्रद्वारा प्रोक्षण करके विधिवत् शोधन करे ॥ १२-१३ ॥ १३ |
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९ ८० पात्राणां प्रोक्षणीमेकामलाभे सर्वकर्मसु साधयेदर्घ्यमद्भिस्तत्सामान्यं साधकोत्तमः ततो विनायकं देवं भक्ष्यभोज्यादिभिः क्रमात् पूजयित्वा विधानेन द्वारपार्श्वेऽथ दक्षिणे
अन्तःपुराधिपं साक्षान्नन्दिनं सम्यगर्चयेत् ।
चामीकराचलप्रख्यं सर्वाभरणभूषितम् ॥
बालेन्दुमुकुटं सौम्यं त्रिनेत्रं च चतुर्भुजम् ।
दीप्तशूलमृगीटंकतिग्मवेत्रधरं प्रभुम् ॥
चन्द्रबिम्बाभवदनं हरिवक्त्रमथापि वा ।
उत्तरे द्वारपार्श्वस्य भार्यां च मरुतां सुताम् ॥
सुयशां सुव्रतामम्बां पादमण्डनतत्पराम् ।
पूजयित्वा प्रविश्यान्तर्भवनं परमेष्ठिनः ॥
संपूज्य लिङ्गं तैर्द्रव्यैर्निर्माल्यमपनोदयेत् ।
प्रक्षाल्य पुष्पं शिरसि न्यसेत्तस्य विशुद्धये ॥
पुष्पहस्तो जपेत् शक्त्या मन्त्रं मन्त्रविशुद्धये ।
ऐशान्यां चण्डमाराध्य निर्माल्यं तस्य दापयेत् ॥
कल्पयेदासनं पश्चादाधारादि यथाक्रमम् । श्रीशिवमहापुराण [ अ ० २४ । श्रेष्ठ साधकको चाहिये कि अधिक पात्रोंके ॥ १४ । मिलनेपर सब कर्मोंमें एकमात्र प्रोक्षणीपात्रको न | सम्पादित करके रखे और उसीके जलसे सामान्यतः ही । । अर्घ्य आदि दे । तत्पश्चात् मण्डपके दक्षिण द्वारभागमें ॥ १५ भक्ष्य - भोज्य आदिके क्रमसे विधिपूर्वक विनायकदेवकी | पूजा करके अन्तःपुरके स्वामी साक्षात् नन्दीकी भलीभाँति पूजा करे॥१४-१५१ / २ ॥ १६ उनकी अंगकान्ति सुवर्णमय पर्वतके समान है । समस्त आभूषण उनकी शोभा बढ़ाते हैं । मस्तकपर । । बालचन्द्रका मुकुट सुशोभित होता है । उनकी मूर्ति १७ सौम्य है । वे तीन नेत्र और चार भुजाओंसे युक्त हैं । उन प्रभुके एक हाथमें चमचमाता हुआ त्रिशूल, दूसरेमें मृगी, तीसरेमें टंक और चौथेमें तीखा बेंत है । उनके मुखकी कान्ति चन्द्रमण्डलके समान उज्ज्वल है । मुख वानरके सदृश है ॥ १६-१७१ / २ ॥ १८ द्वारके उत्तर पार्श्वमें उनकी पत्नी सुयशा हैं, जो मरुद्गणोंकी कन्या हैं । वे उत्तम व्रतका पालन करनेवाली हैं और पार्वतीजीके चरणोंका शृंगार करनेमें लगी रहती हैं ॥ १८१/२ ॥ १ ९ उनका पूजन करके परमेश्वर शिवके भवनके भीतर प्रवेश करे और उन द्रव्योंसे शिवलिंगका पूजन करके निर्माल्यको वहाँसे हटा ले । तदनन्तर फूल २० धोकर शिवलिंगके मस्तकपर उसकी शुद्धिके लिये रखे ॥ १ ९ -२० ॥ फिर हाथमें फूल ले यथाशक्ति मन्त्रका जप करे । २१ इससे मन्त्रकी शुद्धि होती है । ईशानकोणमें चण्डकी आराधना करके उन्हें पूर्वोक्त निर्माल्य अर्पित करे ॥ २१ ॥
तत्पश्चात् इष्टदेवके लिये आसनकी कल्पना आधारशक्तिं कल्याणीं श्यामां ध्यायेदथो भुवि ॥ २२ करे । क्रमशः आधार आदिका ध्यान करे — कल्याणमयी आधार - शक्ति भूतलपर विराजमान हैं और उनकी अंगकान्ति श्याम है । इस प्रकार उनके स्वरूपका चिन्तन तस्याः पुरस्तादुत्कण्ठमनन्तं कुण्डलाकृतिम् । करे । उनके ऊपर फन उठाये सर्पाकार अनन्त बैठे हैं, धवलं पञ्चफणिनं लेलिहानमिवाम्बरम् ॥ २३ जिनकी अंगकान्ति उज्ज्वल है । वे पाँच फनोंसे युक्त हैं । और आकाशको चाटते हुए - से जान पड़ते हैं । अन्त तस्योपर्यासनं भद्रं ऊपर भद्रासन है, जिसके चारों पायोंमें सिंहकी आकृति धर्मो ज्ञानं च वैराग्यमैश्वर्यं कण्ठीरवचतुष्पदम् । बनी हुई है । वे चारों पाये क्रमशः धर्म, ज्ञान, वैराग्य च पदानि वै ॥ २४ । और ऐश्वर्यरूप हैं ॥ २२–२४ ॥
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अ ० २४ ] वायवीयसहिता ( उत्तरखण्ड )
आग्नेयादिश्वेतरक्तपीतश्यामानि वर्णतः ।
अधर्मार्वान्युत्तरान्तान्यनुक्रमात् ॥ २५
राजावर्तमणिप्रख्यान्यस्य गात्राणि भावयेत् ।
अस्योर्ध्वच्छादनं पद्ममासनं विमलं सितम् ॥ २६ ।
अष्टपत्राणि तस्याहुरणिमादिगुणाष्टकम् ।
केसराणि च वामाद्या रुद्रा वामादिशक्तिभिः ॥ २७
बीजान्यपि च ता एव शक्तयोऽन्तर्मनोन्मनीः ।
कर्णिकापरवैराग्यं नालं ज्ञानं शिवात्मकम् ॥ २८
कन्दश्च शिवधर्मात्मा कर्णिकान्ते त्रिमण्डले ।
त्रिमण्डलोपर्यात्मादितत्त्वत्रितयमासनम् ॥२ ९
सर्वासनोपरि सुखं विचित्रास्तरणास्तृतम् ।
आसनं कल्पयेद्दिव्यं शुद्धविद्यासमुज्ज्वलम् ॥ ३०
आवाहनं स्थापनं च सन्निरोधं निरीक्षणम् ।
नमस्कारं च कुर्वीत बध्वा मुद्राः पृथक्पृथक् ॥ ३१
पाद्यमाचमनं चार्घ्यं गन्धं पुष्पं ततः परम् ।
धूपं दीपं च ताम्बूलं दत्त्वाथ स्नापयेत् शिवौ ॥ ३२
अथवा परिकल्प्यैवमासनं मूर्तिमेव च ।
सकलीकृत्य मूलेन ब्रह्मभिश्चापरैस्तथा ॥ ३३
आवाहयेत्ततो देव्या शिवं परमकारणम् । ९ ८१ धर्म नामवाला पाया आग्नेयकोणमें है और उसका रंग सफेद है । ज्ञान नामक पाया नैर्ऋत्यकोणमें है और उसका रंग लाल है । वैराग्य वायव्यकोणमें है और उसका रंग पीला है तथा ऐश्वर्य ईशानकोणमें है और उसका वर्ण श्याम है । अधर्म आदि उस आसनके पूर्वादि भागोंमें क्रमशः स्थित हैं अर्थात् अधर्म पूर्वमें, अज्ञान दक्षिणमें, अवैराग्य पश्चिममें और अनैश्वर्य उत्तरमें हैं । इनके अंग राजावर्त मणिके समान हैं— ऐसी भावना करनी चाहिये । इस भद्रासनको ऊपरसे आच्छादित करनेवाला श्वेत निर्मल पद्ममय आसन है ॥ २५-२६ ॥ अणिमा आदि आठ ऐश्वर्य - गुण ही उस कमलके आठ दल हैं; वामदेव आदि रुद्र अपनी वामा आदि शक्तियोंके साथ उस कमलके केसर हैं । वे मनोन्मनी आदि अन्तः : शक्तियाँ ही बीज हैं, अपर वैराग्य कर्णिका है, शिवस्वरूप ज्ञान नाल है, शिवधर्म कन्द है, कर्णिकाके ऊपर तीन मण्डल ( चन्द्रमण्डल, सूर्यमण्डल और वह्नि-मण्डल ) हैं और उन मण्डलोंके ऊपर आत्मतत्त्व, विद्यातत्त्व तथा शिवतत्त्वरूप त्रिविध आसन हैं ॥ २७–२९ ॥ इन सब आसनोंके ऊपर विचित्र बिछौनोंसे आच्छादित एक सुखद दिव्य आसनकी कल्पना करे, जो शुद्ध विद्यासे अत्यन्त प्रकाशमान हो ॥३० ॥
आसनके अनन्तर आवाहन, स्थापन, संनिरोधन, निरीक्षण एवं नमस्कार करे । इन सबकी पृथक् - पृथक् मुद्राएँ बाँधकर दिखाये * ॥३१ ॥
तदनन्तर पाद्य, आचमन, अर्घ्य, [ आदि देकर स्नान कराये, तदुपरान्त वस्त्र, यज्ञोपवीत, ] गन्ध, पुष्प, धूप, दीप, [ नैवेद्य ] और ताम्बूल देकर शिवा और शिवको समर्पित करे । अथवा उपर्युक्त रूपसे आसन और मूर्तिकी कल्पना करके मूलमन्त्र एवं अन्य ईशानादि ब्रह्ममन्त्रोंद्वारा सकलीकरणकी क्रिया करके देवी पार्वतीसहित परम कारण शिवका आवाहन करे ॥ ३२-३३१ / २ ॥ मूलपर्वपर अँगूठेको लगा देना ' आवाहन ' मुद्रा है । इसी आवाहन मुद्राको * दोनों हाथोंकी अंजलि बनाकर अनामिका हो अंगुलिके जाती है । यदि मुट्ठीके भीतर अँगूठेको डाल दिया जाय और दोनों हाथोंकी होती मुट्ठी हैं । अधोमुख कर दिया जाय तो वह ' स्थापन ' मुद्रा । दोनों मुट्ठियोंको उत्तान कर देनेपर ' सम्मुखीकरण ' नामक मुद्रा संयुक्त कर दी जाय तो वह ' संनिरोधन ' मुद्रा कही गयी है देवताके सामने डाल देना, मुखको नीचेकी ओर रखना और दोनों इसीको यहाँ ' निरीक्षण ' नामसे कहा गया है । शरीरको दण्डकी भाँति यहाँ ' नमस्कार ' मुद्रा कहा गया है । हाथोंको देवताकी ओर फैला देना- साष्टांग प्रणामकी इस क्रियाको ही
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९ ८२ श्रीशिवमहापुराण [ अ ० २४ निश्चलमक्षरम् ॥ ३४ भगवान् शिवकी अंगकान्ति शुद्ध स्फटिकके शुद्धस्फटिकसङ्काशं देवं
कारणं सर्वलोकानां सर्वलोकमयं परम् ।
अन्तर्बहिः स्थितं व्याप्य ह्यणोरणु महत्तरम् ॥ ३५
भक्तानामप्रयत्नेन दृश्यमीश्वरमव्ययम् ।
ब्रह्मेन्द्रविष्णुरुद्राद्यैरपि देवैरगोचरम् ॥ ३६
वेदसारं च विद्वद्भिरगोचरमिति श्रुतम् ।
आदिमध्यान्तरहितं भेषजं भवरोगिणाम् ॥ ३७
शिवतत्त्वमिति ख्यातं शिवार्थं जगति स्थिरम् ।
पञ्चोपचारवद्भक्त्या पूजयेल्लिङ्गमुत्तमम् ॥ ३८
लिङ्गमूर्त्तिर्महेशस्य शिवस्य परमात्मनः ।
स्नानकाले प्रकुर्वीत जयशब्दादिमङ्गलम् ॥ ३ ९
पञ्चगव्यघृत क्षीरदधिमध्वादिपूर्वकैः मूलैः फलानां सारैश्च तिलसर्षपसक्तुभिः ॥ ४०
बीजैर्यवादिभिश्शस्तैश्चूर्णैर्माषादिसंभवैः ।
संस्नाप्यालिप्य पिष्टाद्यैः स्नापयेदुष्णवारिभिः ॥ ४१
घर्षयेद्बिल्वपत्राद्यैर्लेपगन्धापनुत्तये पुनः संस्नाप्य सलिलैश्चक्रवर्त्तुपचारतः ॥ ४२
सुगन्धामलकं दद्याद् हरिद्रां च यथाक्रमम् ।
ततः संशोध्य सलिलैर्लिङ्गं बेरमथापि वा ॥ ४३
स्नापयेद्गन्धतोयेन कुशपुष्पोदकेन च ।
हिरण्यरत्नतोयैश्च मन्त्रसिद्धैर्यथाक्रमम् ॥ ४४
असंभवे तु द्रव्याणां यथासंभवसंभृतैः समान उज्ज्वल है । वे निश्चल, अविनाशी, | लोकोंके परम कारण, सर्वलोकस्वरूप, सबके समस्त भीतर विद्यमान, सर्वव्यापी, अणु - से - अणु और बाहर-महान्से भी महान् हैं ॥ ३४-३५ ॥ भक्तोंको अनायास ही दर्शन देते हैं । सबके ईश्वर एवं अव्यय हैं । ब्रह्मा, इन्द्र, विष्णु तथा । आदि देवताओंके लिये भी अगोचर हैं । सम्पूर्ण रुद्र । वेदोंके सारतत्त्व हैं । विद्वानोंके भी दृष्टिपथमें नहीं । आते हैं । आदि, मध्य और अन्तसे रहित हैं । भवरोगसे । ग्रस्त प्राणियोंके लिये औषधरूप हैं । शिवतत्त्व रूपमें विख्यात हैं और सबका कल्याण करने के लिये जगत्में सुस्थिर शिवलिंगके रूपमें विद्यमान हैं ॥ ३६-३७१ / २ ॥ ऐसी भावना करके भक्तिभावसे गन्ध, धूप, दीप, पुष्प और नैवेद्य – इन पाँच उपचारोंद्वारा उत्तम शिवलिंगका पूजन करे । परमात्मा महेश्वर शिवकी लिंगमयी मूर्तिके स्नानकालमें जय - जयकार आदि शब्द और मंगलपाठ करे ॥ ३८-३९ ॥ पंचगव्य, घी, दूध, दही, मधु [ और शर्करा ] -के साथ फल - मूलके सारतत्त्वसे, तिल, सरसों, सत्तू उबटनसे, जौ आदिके उत्तम बीजोंसे, उड़द आदिके चूर्णोंसे तथा आटा आदिसे आलेपन करके मन्दोष्ण जलसे शिवलिंगको नहलाये ॥ ४०-४१ ॥ लेप और गन्धके निवारणके लिये बिल्वपत्र आदिसे रगड़े । फिर जलसे नहलाकर चक्रवर्ती सम्राट्के लिये उपयोगी उपचारोंसे ( अर्थात् सुगन्धित तेल-फुलेल आदिके द्वारा ) सेवा करे । सुगन्धयुक्त आँवला और हल्दी भी क्रमशः अर्पित करे । इन सब वस्तुओंसे शिवलिंग अथवा शिवमूर्तिका भलीभाँति शोधन करके चन्दनमिश्रित जल, कुश - पुष्पयुक्त जल, सुवर्ण एवं रत्लयुक्त जल तथा मन्त्रसिद्ध जलसे क्रमश: स्नान कराये ॥ ४२–४४ ॥ इन सब द्रव्योंका मिलना सम्भव न होनेपर यथासम्भव संगृहीत वस्तुओंसे युक्त जलद्वारा अथवा केवलैर्मन्त्रतोयैर्वा स्नापयेच्छ्रद्धया । | केवल मन्त्राभि - मन्त्रित जलद्वारा श्रद्धापूर्वक शिवको शिवम् ॥ ४५ स्नान कराये ॥ ४५ ॥
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अ ० २४ ] वायवीयसहिता ( उत्तरखण्ड )
कलशेनाथ शंखेन वर्द्धन्या पाणिना तथा ।
सपुष्पेण स्नापयेन्मन्त्रपूर्वकम् ॥ ४६
सकुशेन
पवमानेन रुद्रेण नीलेन त्वरितेन च ।
लिङ्गसूक्तादिसूक्तैश्च शिरसाथर्वणेन च ॥ ४७
ऋग्भिश्च सामभिः शैवैर्ब्रह्मभिश्चापि पञ्चभिः ।
स्नापयेद्देवदेवेशं शिवेन प्रणवेन च ॥ ४८
यथा देवस्य देव्याश्च कुर्यात्स्नानादिकं तथा ।
न तु कश्चिद्विशेषोऽस्ति तत्र तौ सदृशौ यतः ॥ ४ ९
प्रथमं देवमुद्दिश्य कृत्वा स्नानादिकाः क्रियाः ।
देव्यै पश्चात्प्रकुर्वीत देवदेवस्य शासनात् ॥५०
अर्द्धनारीश्वरे पूज्ये पौर्वापर्यं न विद्यते ।
तत्र तत्रोपचाराणां लिङ्गे वान्यत्र वा क्वचित् ॥ ५१
कृत्वाऽभिषेकं लिङ्गस्य शुचिना च सुगन्धिना ।
संमृज्य वाससा दद्यादंबरं चोपवीतकम् ॥ ५२
पाद्यमाचमनं चार्घ्यं गन्धं पुष्पं च भूषणम् ।
धूपं दीपं च नैवेद्यं पानीयं मुखशोधनम् ॥ ५३
पुनश्चाचमनीयं च मुखवासं ततः परम् ।
मुकुटं च शुभं भद्रं सर्वरत्नैरलंकृतम् ॥५४
भूषणानि पवित्राणि माल्यानि विविधानि च ।
व्यजने चामरे छत्रं तालवृन्तं च दर्पणम् ॥ ५५
दत्त्वा नीराजनं कुर्यात्सर्वमङ्गलनिःस्वनैः ।
गीतनृत्यादिभिश्चैव जयशब्दसमन्वितैः ॥ ५६
हैमे च राजते ताम्रे पात्रे वा मृण्मये शुभे ।
पद्मकैः शोभितैः पुष्यैर्बीजैर्दध्यक्षतादिभिः ॥ ५७
त्रिशूलशंखयुग्माब्जनन्द्यावर्तैः करीषजैः ।
श्रीवत्सस्वस्तिकादर्शवज्रर्वह्न्यादिचिह्नितैः ॥ ५८
९ ८३ कलश, शंख और वर्धनीसे तथा कुश और पुष्पसे युक्त हाथके जलसे मन्त्रोच्चारणपूर्वक इष्टदेवताको नहलाना चाहिये । पवमानसूक्त, रुद्रसूक्त, नीलरुद्रसूक्त, त्वरितमन्त्र, लिंगसूक्त आदिसूक्तोंसे, अथर्वशीर्ष, ऋग्वेद, सामवेद तथा शिवसम्बन्धी ईशानादि पंच- ब्रह्ममन्त्र, शिवमन्त्र तथा प्रणवसे देवदेवेश्वर शिवको स्नान कराये ॥ ४६-४८ ॥ जैसे महादेवजीको स्नान कराये, उसी तरह महादेवी पार्वतीको भी स्नान आदि कराना चाहिये । उन दोनोंमें कोई अन्तर नहीं है; क्योंकि वे दोनों सर्वथा समान हैं । पहले महादेवजीके उद्देश्यसे स्नान आदि क्रिया करके फिर देवीके लिये उन्हीं देवाधिदेवके आदेशसे सब कुछ करे ॥ ४ ९ -५० ॥ अर्धनारीश्वरकी पूजा करनी हो तो उसमें पूर्वापरका विचार नहीं है । अत: उसमें महादेव और महादेवीकी साथ - साथ पूजा होती रहती है । शिवलिंगमें या अन्यत्र मूर्ति आदिमें अर्द्धनारीश्वरकी भावनासे सभी उपचारोंका शिव और शिवाके लिये एक साथ ही उपयोग होता है ॥ ५१ ॥
पवित्र सुगन्धित जलसे शिवलिंगका अभिषेक करके उसे वस्त्रसे पोंछे । फिर नूतन वस्त्र एवं यज्ञोपवीत चढ़ाये । तत्पश्चात् पाद्य, आचमन, अर्घ्य, गन्ध, पुष्प, आभूषण, धूप, दीप, नैवेद्य, पीनेयोग्य जल, मुखशुद्धि, पुनराचमन, मुखवास तथा सम्पूर्ण रत्नोंसे जटित सुन्दर मुकुट, आभूषण, नाना प्रकारकी पवित्र पुष्पमालाएँ, छत्र, चँवर, व्यजन, ताड़का पंखा और दर्पण देकर सब प्रकारकी मंगलमयी वाद्यध्वनियोंके साथ इष्टदेवकी नीराजना करे ( आरती उतारे ) । उस समय गीत और नृत्य आदिके साथ जय - जयकार भी होनी चाहिये॥५२–५६ ॥ सोना, चाँदी, ताँबा अथवा मिट्टीके सुन्दर पात्रमें कमल आदिके शोभायमान फूल रखे । कमलके बीज तथा दही, अक्षत आदि भी डाल दे । त्रिशूल, शंख, दो कमल, नन्द्यावर्त नामक शंखविशेष, सूखे गोबरकी | आग, श्रीवत्स, स्वस्तिक, दर्पण, वज्र तथा अग्नि
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श्रीशिवमहापुराण [ अ ० २४ ९ ८४ तु मध्यमे । । आदिसे चिह्नित पात्रमें आठ दीपक रखे । वे आठों अष्टौ प्रदीपान्परितो विधायैकं आठ दिशाओंमें रहें और एक नौवाँ दीपक मध्यभागमें तेषु वामादिकाश्चिन्त्याः पूज्याश्च नव शक्तयः ॥ ५ ९ | रहे । इन नवों दीपकोंमें वामा आदि नव शक्तियोंका
कवचेन समाच्छाद्य संरक्ष्यास्त्रेण सर्वतः ।
धेनुमुद्रां च संदर्श्य पाणिभ्यां पात्रमुद्धरेत् ॥ ६०
अथवारोपयेत्पात्रे पञ्चदीपान्यथाक्रमम् ।
विदिक्ष्वपि च मध्ये च दीपमेकमथापि वा ॥ ६१
ततस्तत्पात्रमुद्धृत्य लिङ्गादेरुपरि क्रमात् ।
त्रिः प्रदक्षिणयोगेन भ्रामयेन्मूलविद्यया ॥ ६२
दद्यादर्घ्यं ततो मूर्ध्नि भसितं च सुगन्धितम् ।
कृत्वा पुष्पाञ्जलिं पश्चादुपहारान्निवेदयेत् ॥ ६३
पानीयं च ततो दद्याद्दत्त्वा वाचमनं पुनः ।
पञ्च सौगन्धिकोपेतं ताम्बूलं च निवेदयेत् ॥ ६४
प्रोक्षयेत्प्रोक्षणीयानि गाननाट्यानि कारयेत् ।
लिङ्गादौ शिवयोश्चिन्तां कृत्वा शक्त्या जपेत् शिवम् ॥ ६५
प्रदक्षिणं प्रणामं च स्तवं चात्मसमर्पणम् ।
विज्ञापनं च कार्याणां कुर्याद्विनयपूर्वकम् ॥ ६६
अर्घ्यं पुष्पाञ्जलिं दत्त्वा बद्ध्वा मुद्रां यथाविधि ।
पश्चात्क्षमापयेद्देवमुद्वास्यात्मनि चिन्तयेत् ॥ ६७
पाद्यादिमुखवासान्तमर्ध्याद्यं चातिसङ्कटे ॥
पुष्पविक्षेपमात्रं वा कुर्याद्भावपुरःसरम् ॥६८
तावतैव परो धर्मो भावेन सुकृतो भवेत् ।
असम्पूज्य न भुञ्जीत शिवमाप्राणसञ्चरात् ॥ ६ ९
यदि पापस्तु भुंजीत स्वैरं तस्य न निष्कृतिः ।
प्रमादेन तु भुंक्ते चेत्तदुद्गीर्य प्रयत्नतः ॥ ७० ।
स्नात्वा द्विगुणमभ्यर्च्य देवं देवीमुपोष्य च । ।
ध्यान तथा पूजन करे॥५७–५९ ॥
फिर कवचमन्त्रसे आच्छादन और अस्त्रमन्त्रद्वारा | सब ओरसे संरक्षण करके धेनुमुद्रा दिखाकर दोनों | हाथोंसे पात्रको ऊपर उठाये अथवा पात्रमें क्रमशः । पाँच दीप रखे । चारको चारों कोनोंमें और एकको बीचमें स्थापित करे ॥ ६०-६१ ॥ तत्पश्चात् उस पात्रको उठाकर शिवलिंग या शिवमूर्ति आदिके ऊपर क्रमशः तीन बार प्रदक्षिण क्रमसे घुमाये और मूलमन्त्रका उच्चारण करता रहे । तदनन्तर मस्तकपर अर्घ्य और सुगन्धित भस्म चढ़ाये । फिर पुष्पांजलि देकर उपहार निवेदन करे । इसके बाद जल देकर आचमन कराये । फिर पाँच सुगन्धित द्रव्योंसे युक्त ताम्बूल भेंट करे ॥ ६२-६४ ॥ तत्पश्चात् प्रोक्षणीय पदार्थोंका प्रोक्षण करके नृत्य और गीतका आयोजन करे । लिंग या मूर्ति आदिमें शिव तथा पार्वतीका चिन्तन करते हुए यथाशक्ति शिव - मन्त्रका जप करे । जपके पश्चात् प्रदक्षिणा, नमस्कार, स्तुतिपाठ, आत्मसमर्पण तथा कार्यका विनयपूर्वक विज्ञापन करे ॥ ६५-६६ ॥ फिर अर्घ्य और पुष्पांजलि दे विधिवत् मुद्रा बाँधकर इष्टदेवसे त्रुटियोंके लिये क्षमा - प्रार्थना करे । तत्पश्चात् मूर्तिसहित देवताका विसर्जन करके अपने हृदयमें उसका चिन्तन करे । पाद्यसे लेकर मुखवासपर्यन्त पूजन करना चाहिये अथवा अर्घ्य आदिसे पूजन आरम्भ करना चाहिये या अधिक संकटकी स्थितिमें प्रेमपूर्वक केवल फूलमात्र चढ़ा देना चाहिये ॥ ६७-६८ ॥ प्रेमपूर्वक उतनेसे ही अर्थात् फूलमात्र चढ़ा देने ही परम धर्मका सम्पादन हो जाता है । जबतक प्राण रहे शिवका पूजन किये बिना भोजन न करे ॥६ ९ ॥ यदि कोई पापी स्वेच्छासे भोजन ग्रहण करता है, तो उसके पापका प्रतिकार नहीं हो सकता । यदि भूलसे खा ले तो उसे प्रयत्नपूर्वक उगल दे । स्नान करके शिव तथा पार्वतीका दोगुना पूजनकर निराहार
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अ ० २५ ] वायवीयसहिता ( उत्तरखण्ड) ९ ८५ शिवस्यायुतमभ्यस्येद्ब्रह्मचर्यपुरःसरम् ॥ ७१ । रहकर ब्रह्मचर्यपूर्वक शिवका दस हजार शक्तितो दत्त्वा सुवर्णाद्यं शिवाय च । और दूसरे दिन यथाशक्ति शिवको अथवा शिवभक्तको जप करे परेद्युः वा कृत्वा महापूजा शुचिर्भवेत् सुवर्ण आदि प्रदानकर महापूजा करके वह पवित्र हो
शिवभक्ताय ॥ ७२ । जाता है॥७०-७२ ॥
इति श्रीशिवमहापुराणे सप्तम्यां वायवीयसंहितायामुत्तरखण्डे शास्त्रोक्तशिवपूजनवर्णनं ॥ इस प्रकार श्रीशिवमहापुराणके अन्तर्गत सातवीं नाम चतुर्विंशोऽध्यायः ॥ २४ ॥
शिवपूजनवर्णन नामक वायवीयसंहिताके उत्तरखण्डमें शास्त्रोक्त चौबीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ २४ ॥
अथ पञ्चविंशोऽध्यायः शिवपूजाकी विशेष विधि तथा शिव भक्तिकी महिमा उपमन्युरुवाच
अनुक्तं चात्र पूजायाः क्रमलोपभयादिव ।
यत्तदन्यत्प्रवक्ष्यामि समासान्न तु विस्तरात् ॥
हविर्निवेदनात्पूर्वं दीपदानादनन्तरम् ।
कुर्यादावरणाभ्यर्चां प्राप्ते नीराजनेऽथवा ॥
तत्रेशानादिसद्यान्तं रुद्राद्यस्त्रान्तमेव च शिवस्य वा शिवायाश्च प्रथमावरणे यजेत् ॥ ऐशान्यां पूर्वभागे च दक्षिणे चोत्तरे तथा । पश्चिमे च तथाग्नेय्यामैशान्यां नैर्ऋते तथा वायव्यां पुनरैशान्यां चतुर्दिक्षु ततः परम् गर्भावरणमाख्यातं मन्त्रसंघातमेव वा हृदयाद्यस्त्रपर्यन्तमथवापि समर्चयेत् तद्बहिः पूर्वतः शक्रं यमं दक्षिणतो यजेत् वरुणं वारुणे भागे धनदं चोत्तरे बुधः ईशमैशेऽनलं स्वीये नैर्ऋते निर्ऋतिं यजेत् मारुते मारुतं विष्णुं नैर्ऋते विधिमैश्वरे उपमन्यु बोले — हे कृष्ण! इस विषयमें जो कुछ नहीं कह पाया हूँ, उसे पूजाके क्रमके १ लोप होनेके भयसे विस्तारपूर्वक तो नहीं, अपितु संक्षेपमें ही कहूँगा ॥१ ॥
उपमन्यु कहते हैं — यदुनन्दन! दीपदानके २ बाद और नैवेद्य - निवेदनसे पहले आवरण - पूजा करनी चाहिये अथवा आरतीका समय आनेपर आवरणपूजा करे ॥२ ॥
। वहाँ शिव या शिवाके प्रथम आवरणमें ३ ईशानसे लेकर ' सद्योजातपर्यन्त ' तथा हृदयसे लेकर अस्त्रपर्यन्तका पूजन करे * ॥३ ॥
ईशानमें, पूर्वभागमें, दक्षिणमें, उत्तरमें, ॥ ४ पश्चिममें, आग्नेयकोणमें, ईशानकोणमें, नैर्ऋत्यकोणमें, वायव्यकोणमें, फिर ईशानकोणमें तत्पश्चात् चारों । दिशाओंमें गर्भावरण अथवा मन्त्र- संघातकी पूजा ॥ ५ बतायी गयी है या हृदयसे लेकर अस्त्रपर्यन्त अंगों की । पूजा करे ॥ ४-५१ / २ ॥ ॥ ६ इनके बाह्यभागमें पूर्वदिशामें इन्द्रका, दक्षिण-दिशामें यमका, पश्चिम दिशामें वरुणका, उत्तर दिशामें कुबेरका, ईशानकोणमें ईशानका, अग्निकोणमें । अग्निका, नैर्ऋत्य - कोणमें निर्ऋतिका, वायव्यकोणमें ॥ ७ वायुका, नैर्ऋत्य और पश्चिमके बीचमें अनन्त या विष्णुका तथा ईशान और पूर्वके बीचमें ब्रह्माका । पूजन करे ॥ ६-७१ / २ ॥ * और सद्योजात – इन पाँच मूर्तियोंका तथा हृदय, सिर, शिखा, कवच, अर्थात् – ईशान, तत्पुरुष, अघोर, वामदेव नेत्र और अस्त्र- इन अंगोंका पूजन करना चाहिये ।
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९ ८६ ( श्रीशिवमहापुराण [ अ ० २५ ॥ ८ कमलके बाह्यभागमें वज्रसे लेकर कमलपर्यन्त बहि: पद्मस्य वज्राद्यान्याब्जान्तान्यायुधान्यपि | लोकेश्वरोंके सुप्रसिद्ध आयुधोंका पूर्वादि दिशाओं प्रसिद्धरूपाण्याशासु लोकेशानां क्रमाद्यजेत् । | क्रमश: पूजन करे । यह ध्यान करना चाहिये कि में देवं देवीं च संप्रेक्ष्य सर्वावरणदेवताः बद्धाञ्जलिपुटा ध्येयाः समासीना यथासुखम् सर्वावरणदेवानां स्वाभिधानैर्नमोयुतैः पुष्पैः सम्पूजनं कुर्यान्नत्वा सर्वान्यथाक्रमम् गर्भावरणमेवापि यजेत्स्वावरणेन वा
योगे ध्याने जपे होमे बाह्ये वाभ्यन्तरेऽपि वा ।
हविश्च षड्विधं देयं शुद्धं मुद्गान्नमेव च ॥
पायसं दधिसंमिश्रं गौडं च मधुनाप्लुतम् ।
एतेष्वेकमनेकं वा नानाव्यञ्जनसंयुतम् ॥
गुडखण्डान्वितं दद्यान्मथितं दधि चोत्तमम् ।
भक्ष्याण्यपूपमुख्यानि स्वादुमन्ति फलानि च ॥
रक्तचन्दनपुष्पाढ्यं पानीयं चातिशीतलम् ।
मृदु एलारसाक्तं च खण्डं पूगफलस्य च ॥
दलानि नागवल्ल्याश्च युक्तानि खदिरादिभिः ।
गौराणि स्वर्णवर्णानि विहितानि शिवानि च ।
शैलमेव सितं चूर्णं नातिरूक्षं न दूषितम् ॥
कर्पूरं चाथ कङ्कोलं जात्यादि च नवं शुभम् । आलेपनं ॥ ९ आवरणदेवता सुखपूर्वक बैठकर महादेव और महादेवीकी समस्त ओर दोनों हाथ जोड़े देख रहे हैं । फिर सभी । । देवताओंको प्रणाम करके ' नमः ' पदयुक्त अपने आवरण ॥ १० - अपने नामसे पुष्पोपचार समर्पणपूर्वक उनका क्रमश । । करे । ( यथा इन्द्राय नमः पुष्पं समर्पयामि इत्यादि : पूजन ॥ ११ । इसी तरह गर्भावरणका भी अपने आवरण सम्बन्धी । ) मन्त्रसे यजन करे ॥ ८–११ ॥ योग, ध्यान, होम, जप और बाह्य अथवा १२ आभ्यन्तरमें भी देवताका पूजन करना चाहिये । इसी तरह उनके लिये छ: प्रकारकी हवि भी देनी चाहिये— किसी एक शुद्ध अन्नका बना हुआ, मूँगमिश्रित अन्न या मूँगकी खिचड़ी, खीर, दधिमिश्रित अन्न, गुड़का १३ बना हुआ पकवान तथा मधुसे तर किया हुआ भोज्य पदार्थ – इनमेंसे एक या अनेक हविष्यको नाना प्रकारके व्यंजनोंसे संयुक्त तथा गुड़ और खाँड़से सम्पन्न करके नैवेद्यके रूपमें अर्पित करना चाहिये । साथ ही मक्खन १४ और उत्तम दही परोसना चाहिये । पूआ आदि अनेक प्रकारके भक्ष्य पदार्थ और स्वादिष्ट फल देने चाहिये ॥ १२–१४ ॥ लाल चन्दन और पुष्पवासित अत्यन्त शीतल १५ जल अर्पित करना चाहिये । मुख - शुद्धिके लिये मधुर इलायचीके रससे युक्त सुपारीके कोमल टुकड़े, खैर आदिसे युक्त सुनहरे रंगके पीले पानके पत्तोंके बने हुए बीड़े, शिलाजीतका चूर्ण, सफेद चूना, जो अधिक १६ रूखा या दूषित न हो, कपूर, कंकोल, नूतन एवं सुन्दर जायफल आदि अर्पित करने चाहिये । आलेपनके चन्दनं स्यान्मूलकाष्ठं रजोमयम् ॥ १७ लिये चन्दनका मूलकाष्ठ कस्तूरिका अथवा उसका चूरा, कस्तूरी, कुंकुमं च रसो मृगमदात्मकः । कुंकुम, मृगमदात्मक रस होने चाहिये । फूल वे ही पुष्पाणि सुरभीण्येव पवित्राणि शुभानि च ॥ १८ चढ़ाने चाहिये, जो सुगन्धित, पवित्र और सुन्दर हों ॥ १५–१८ ॥ निर्गन्धान्युग्रगन्धानि दूषितान्युषितानि च । गन्धरहित, उत्कट गन्धवाले, दूषित, बासी तथा स्वयमेव विशीर्णानि न देयानि शिवार्चने ॥ १ ९ | स्वयं ही टूटकर गिरे हुए फूल शिवके पूजनमें नहीं देने वासांसि च मृदून्येव तपनीयमयानि | चाहिये । कोमल वस्त्र ही चढ़ाने चाहिये । भूषणों में च । । विशेषतः वे ही अर्पित करने चाहिये जो सोनेके बने ,