शिव महापुराण - २ — पृष्ठ 91–100
शिव महापुराण - २ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 91–100
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अ ० १६ ] शतरुद्रसंहिता ७ ९
दृष्ट्वा तं शङ्करं सर्वे सर्वदेवशिखामणिम् ।
प्रणम्य तुष्टुवुर्भक्त्या साच्युता नतमस्तकाः ॥
ततः प्रसन्नो भगवान् शङ्करो भक्तवत्सलः ।
पपौ विषं महाघोरं सुरासुरगणार्दनम् ॥
पीतं तं विषमं कण्ठे निदधे विषमुल्बणम् ।
रेजे तेनाति स विभुर्नीलकण्ठो बभूव ह ॥
ततः सुरासुरगणा ममन्थुः पुनरेव तम् ।
विषदाहविनिर्मुक्ताः शिवानुग्रहतोऽखिलाः ॥
ततो बहूनि रत्नानि निस्सृतानि ततो मुने ।
अमृतं च पदार्थं हि सुरदानवयोर्मुने ॥
तं पपुः केवलं देवा नासुराः कृपया हरेः ।
ततो बभूव सुमहद्रनं तेषां मिथोऽकदम् ॥
द्वन्द्वयुद्धं बभूवाथ देवदानवयोर्मुने ।
तत्र राहुभयाच्चन्द्रो विदुद्राव तदर्दितः ॥
जगाम सदनं शंभो: शरणं भयविह्वलः ।
सुप्रणम्य च तुष्टाव पाहि पाहीति संवदन् ॥
ततः सतामभयदः शङ्करो भक्तवत्सलः ।
दध्रे शिरसि चन्द्रं स विभुः शरणमागतम् ॥
अथागतस्तदा राहुस्तुष्टाव सुप्रणम्य तम् ।
शङ्करं सकलाधीशं वाग्भिरिष्टाभिरादरात् ॥
शंभुस्तन्मतमाज्ञाय तच्छिरांस्यच्युतेन ह ।
पुरा छिन्नानि वै केतुसंज्ञानि निदधे गले ॥
ततो युद्धेऽसुराः सर्वे देवैश्चैव पराजिताः ।
पीत्वामृतं सुराः सर्वे जयं प्रापुर्महाबलाः ॥
विष्णुसहित सभी देवता समस्त देवताओंके ५ शिखामणिस्वरूप उन शिवजीको देखकर सिर झुकाकर उन्हें प्रणाम करके भक्तिपूर्वक उनकी स्तुति करने लगे । उससे प्रसन्न होकर भक्तवत्सल भगवान् सदाशिवने ६ देवता एवं दानवोंको पीड़ित करनेवाले उस महाघोर विषका पान कर लिया ॥ ५-६ ॥ पीये गये उस महाभयानक विषको उन्होंने अपने ७ कण्ठमें ही धारण कर लिया, उससे वे प्रभु अत्यन्त सुशोभित हुए और नीलकण्ठ नामवाले हो गये ॥ ७ ॥
उसके पश्चात् शिवजीके अनुग्रहसे विषके ८ दाहसे मुक्त हुए देवताओं एवं असुरोंने पुनः समुद्रका मन्थन किया ॥८ ॥
हे मुने! इसके बाद देवता तथा दानवोंके ९ [ प्रयत्नोंसे मथे गये ] समुद्रसे अनेक रत्न निकले और अमृत जैसा — यह उत्तम पदार्थ भी उसीसे निकला, किंतु विष्णुकी कृपासे देवताओं तथा असुरोंमेंसे केवल १० देवता ही उसे पी गये, असुर नहीं । तब यह महान् रत्न उनके बीच द्वेषका कारण बन गया ॥ ९ -१० ॥ हे मुने! देवों और दानवोंमें [ भीषण ] द्वन्द्वयुद्ध ११ प्रारम्भ हुआ, तब राहुसे पीड़ित हुए चन्द्रमा उसके भयसे सन्तप्त होकर भाग खड़े हुए और भयसे व्याकुल होकर शिवजीकी शरणमें उनके भवन गये १२ एवं प्रणाम करके ' रक्षा कीजिये, रक्षा कीजिये ' - – इस प्रकार कहते हुए उनकी स्तुति करने लगे ॥ ११-१२ ॥ तब सत्पुरुषोंको अभय प्रदान करनेवाले १३ भक्तवत्सल तथा सर्वव्यापक शिवजीने शरणमें आये हुए चन्द्रमाको अपने मस्तकपर धारण कर लिया ॥१३ ॥
तदनन्तर [ चन्द्रमाका पीछा करता हुआ ] १४ राहु भी वहाँ आया और उसने सर्वेश्वर शिवजीको भलीभाँति प्रणामकर आदरपूर्वक प्रिय वाणीमें उनकी स्तुति की ॥ १४ ॥
शिवजीने उसका अभिप्राय जानकर पूर्वमें विष्णुके १५ द्वारा काटे गये उसके केतुसंज्ञक सिरोंको [ अपनी मुण्डमालामें पिरोकर ] गलेमें धारण कर लिया ॥ १५ ॥
इसके बाद उस युद्धमें सभी असुर देवताओंसे पराजित हो गये । अमृतका पान करके सभी महाबली १६ । देवगणोंने विजय प्राप्त की ॥ १६ ॥
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श्रीशिवमहापुराण [ अ ० १६ ८०
विष्णुप्रभृतयः सर्वे बभूवुश्चातिगर्विताः ।
बलानि चांकुरन्तो ऽन्तः शिवमायाविमोहिताः ॥ १७
ततः स शङ्करो देवः सर्वाधीशोऽथ गर्वहा ।
यक्षो भूत्वा जगामाशु यत्र देवाः स्थिता मुने ॥ १८
सर्वान् दृष्ट्वाच्युतमुखान्देवान्यक्षपतिः स वै ।
महागर्वाढ्यमनसा महेशः प्राह गर्वहा ॥। १ ९
यक्षेश्वर उवाच
किमर्थं संस्थिता यूयमत्र सर्वे सुरा मिथः ।
किमु काष्ठाखिलं ब्रूत कारणं मेऽनु पृच्छते ॥ २०
देवा ऊचुः
अभूदत्र महान्देव रणः परमदारुणः ।
असुरा नाशिताः सर्वेऽवशिष्टा विद्रुता गताः ॥ २१
वयं सर्वे महावीरा दैत्यघ्ना बलवत्तराः ।
अग्रेऽस्माकं कियन्तस्ते दैत्याः क्षुद्रबलाः सदा ॥ २२
नन्दीश्वर उवाच
इति श्रुत्वा वचस्तेषां सुराणां गर्वगर्भितम् ।
गर्वहासौ महादेवो यक्षरूपो वचोऽब्रवीत् ॥ २३ ।
यक्षेश्वर उवाच
हे सुरा निखिला यूयं मद्वचः शृणुतादरात् ।
यथार्थं वच्मि नासत्यं सर्वगर्वापहारकम् ॥ २४
गर्वमेनं न कुरुत कर्ता हर्तारः प्रभुः ।
विस्मृताश्च महेशानं कथयध्वं वृथा बलाः ॥ २५
युष्माकं चेत्स हि मदो जानतां स्वबलं महत् ।
मत्स्थापितं तृणमिदं छिन्त स्वास्त्रैश्च तैः सुराः ॥ २६
नन्दीश्वर उवाच इत्युक्त्वैकं तृणं तेषां निचिक्षेप पुरस्ततः ।
।
जह्रे सर्वमदं यक्षरूप ईशः सतां गतिः ॥ २७ ।
[ विजय प्राप्त कर लेनेपर ] शिवजीकी मायासे मोहित हुए विष्णु आदि देवताओंको अत्यन्त अहंकार | हो गया और वे अपने - अपने बलोंकी प्रशंसा करने लगे ॥ १७ ॥
हेमुने! इसके बाद गर्वको चूर करनेवाले | सर्वाधीश वे भगवान् शकर यक्षका रूप धारणकर । जहाँ देवगण स्थित थे, वहाँ शीघ्र गये ॥१८ ॥
गर्वका नाश करनेवाले यक्षपतिरूपी महेशने विष्णु आदि देवगणोंको देखकर अत्यन्त गर्वयुक्त मनसे उनसे कहा —॥१ ९ ॥ यक्षेश्वर बोले- हे देवताओ! आप सभी यहाँ | एकत्र होकर किसलिये खडे हैं? मैं इसका कारण पूछ रहा हूँ, आपलोग बतायें ॥ २० ॥
देवता बोले — हे देव! यहाँ [ देव - दानवोंमें ] भयंकर विकट संग्राम छिड़ा हुआ था, जिसमें समस्त असुर विनष्ट हो गये और जो बचे थे, वे भागकर चले गये ॥२१ ॥
हम सब बड़े पराक्रमी, दैत्योंको मारनेवाले तथा बड़े बलशाली हैं । हमारे समक्ष तुच्छ बलवाले वे क्षुद्र दैत्य भला किस प्रकार टिक सकते हैं? ॥ २२ ॥
नन्दीश्वर बोले- देवताओंकी गर्वभरी यह बात सुनकर गर्वका नाश करनेवाले यक्षरूपी महादेवने यह वचन कहा- ॥ २३ ॥
यक्षेश्वर बोले - हे देवगणो! आप सभी लोग आदरपूर्वक मेरी बात सुनिये, मैं [ आप ] सबके गर्वका नाश करनेवाला यथार्थ वचन कह रहा हूँ, असत्य नहीं । आपलोग इस प्रकारका अहंकार मत कीजिये, सबका रचयिता और संहारकर्ता स्वामी तो कोई दूसरा ही है । आपलोग उन महादेवको भूल गये और निर्बल होकर भी अपने बलका वृथा घमण्ड करते हैं ॥ २४-२५ ॥ हे देवगण! अपने महान् बलको जानते हुए आपलोगोंको यदि घमण्ड है, तो आपलोग मेरे द्वारा रखे गये इस तिनकेको अपने उन शस्त्रोंसे काटें ॥ २६ ॥
नन्दीश्वर बोले- ऐसा कहकर सत्पुरुषोंको गति देनेवाले यक्षरूपी महादेवजीने उन देवताओंके आगे एक तिनका फेंक दिया, जिसके द्वारा उन्होंने सभी देवताओंका मद दूर कर दिया ॥ २७ ॥
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अ ० १६ ] शतरुद्रसंहिता ८१
अथ सर्वे सुरा विष्णुप्रमुखा वीरमानिनः ।
कृत्वा स्वपौरुषं तत्र स्वायुधानि विचिक्षिपुः ॥ २८
तत्रासन् विफलान्याशु तान्यस्त्राणि दिवौकसाम् ।
शिवप्रभावतस्तेषां मूढगर्वापहारिणः ॥ २ ९
अथासीत्तु नभोवाणी देवविस्मयहारिणी ।
यक्षोऽयं शङ्करो देवाः सर्वगर्वापहारकः ॥ ३०
कर्ता हर्ता तथा भर्तायमेव परमेश्वरः ।
एतद्बलेन बलिनो जीवाः सर्वेऽन्यथा न हि ॥ ३१
अस्य मायाप्रभावाद् वै मोहिताः स्वप्रभुं शिवम् ।
मदतो बुबुधुर्नैवाद्यापि बोधतनुं प्रभुम् ॥ ३२
नन्दीश्वर उवाच
इति श्रुत्वा नभोवाणीं बुबुधुस्ते गतस्मयाः ।
यक्षेश्वरं प्रणेमुश्च तुष्टुवुश्च तमीश्वरम् ॥३३
देवा ऊचुः
देवदेव महादेव सर्वगर्वापहारक ।
यक्षेश्वर महालील माया तेऽत्यद्भुता प्रभो ॥ ३४
मोहिता माययाद्यापि तव यक्षस्वरूपिणः ।
सगर्वमभिभाषन्तस्त्वत्पुरो हि पृथङ्मयाः ॥ ३५
इदानीं ज्ञानमायातं तवैव कृपया प्रभो ।
कर्ता हर्ता च भर्ता च त्वमेवान्यो न शङ्कर ॥ ३६
त्वमेव सर्वशक्तीनां सर्वेषां हि प्रवर्तकः ।
निवर्तकश्च सर्वेशः परमात्माव्ययोऽद्वयः ॥ ३७
यक्षेश्वरस्वरूपेण सर्वेषां नो मदो हृतः ।
कृतो मन्यामहे तत्तेऽनुग्रहो हि कृपालुना ॥ ३८
अथ स यक्षनाथोऽनुगृह्य वै सकलान् सुरान् ।
विबोध्य विविधैर्वाक्यैस्तत्रैवान्तरधीयत ॥ ३ ९
[ इस तिनकेको काटनेके लिये ] अपनेको वीर माननेवाले विष्णु आदि सभी देवताओंने अपने पुरुषार्थका प्रयोग करके उसके ऊपर अपने - अपने अस्त्रको चलाया । किंतु मूढ़ोंके गर्वका नाश करनेवाले [ भगवान् ] शिवके प्रभावसे उन देवताओंके वे अस्त्र शीघ्र ही बेकार हो गये ॥ २८-२९ ॥ तब देवताओंके आश्चर्यको दूर करनेवाली आकाश-वाणी हुई कि हे देवताओ! ये यक्ष [ -रूपमें ] सबके अहंकारका अपहरण करनेवाले सदाशिव ही हैं ॥ ३० ॥
ये परमेश्वर ही सबके कर्ता, भर्ता और संहर्ता हैं । इन्हींके बलसे सभी जीव बलवान् हैं, अन्यथा नहीं ॥ ३१ ॥
हे देवताओ! इनकी मायाके प्रभावसे मोहित होकर तथा अहंकारवश आपलोग अपने ज्ञानमूर्ति स्वामी भगवान् शिवको अभीतक पहचान नहीं सके! ॥ ३२ ॥
नन्दीश्वर बोले- इस प्रकारकी आकाशवाणीको सुनकर देवताओंका सारा गर्व दूर हो गया और वे अपने ईश्वरको पहचान गये । उन्होंने यक्षेश्वरको प्रणाम किया तथा उनकी स्तुति की ॥ ३३ ॥
देवता बोले- हे देवदेव! हे महादेव! सबके अभिमानको दूर करनेवाले हे यक्षेश्वर! महालीला करनेवाले हे प्रभो! आपकी माया अत्यन्त अद्भुत है ॥ ३४ ॥
हे प्रभो! यक्षरूप धारण करनेवाले आपकी मायासे मोहित हुए हमलोग इस समय अपनेको [ आपसे ] पृथक् समझकर आपके सामने ही गर्वपूर्वक बोल रहे हैं ॥ ३५ ॥
हे प्रभो! हे शंकर! अब आपकी ही कृपासे हमें | इस समय ज्ञान हो गया कि आप ही कर्ता, हर्ता एवं भर्ता हैं, दूसरा नहीं । आप ही सभी जीवोंकी समस्त शक्तियोंके प्रवर्तक एवं निवर्तक हैं, आप ही सर्वेश, परमात्मा, अव्यय एवं अद्वितीय हैं॥३६-३७ ॥ आपने यक्षेश्वरका रूप धारणकर जो हमलोगोंके मदको दूर कर दिया है, उसे हमलोग आप कृपालुके द्वारा किया गया परम अनुग्रह मानते हैं ॥ ३८ ॥
उसके पश्चात् वे यक्षेश्वर सम्पूर्ण देवताओंपर कृपा करते हुए उन्हें अनेक वचनोंसे समझाकर वहीं । अन्तर्धान हो गये ॥३ ९ ॥
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८२ इत्थं स वर्णितः शम्भोरवतारः सुखावहः यक्षेश्वराख्यः सुखदः सतां तुष्टोऽभयंकरः
इदमाख्यानममलं सर्वगर्वापहारकम् ।
सतां सुशान्तिदं नित्यं भुक्तिमुक्तिप्रदं नृणाम् ॥
य इदं शृणुयाद्भक्त्या श्रावयेद्वा सुधीः पुमान् ।
सर्वकामानवाप्नोति ततश्च लभते गतिम् ॥
श्रीशिवमहापुराण [ अ ० १७ । _ [ हे मुनीश्वर! ] इस प्रकार शिवजीके यक्षेश्वर ॥ ४० । नामक अवतारका वर्णन कर दिया गया, जो सबको | आनन्द देनेवाला तथा सुख प्रदान करनेवाला है
। यह यक्षरूप प्रसन्न होनेपर सज्जनोंको अभय प्रदान ।
करनेवाला है ॥४० ॥
यह आख्यान अत्यन्त निर्मल तथा सबके । अभिमानको नष्ट करनेवाला है । यह सत्पुरुषोंको ४१ | सर्वदा शान्तिदायक एवं मनुष्योंको भोग एवं मोक्ष प्रदान करनेवाला है । जो बुद्धिमान् मनुष्य भक्तिसे युक्त हो इसको सुनता अथवा सुनाता है, वह इस लोकमें समस्त कामनाओंको प्राप्त कर लेता है और इसके ४२ । बाद परमगतिको प्राप्त करता है ॥ ४१-४२ ॥ इति श्रीशिवमहापुराणे तृतीयायां शतरुद्रसंहितायां यक्षेश्वरावतारवर्णनं नाम षोडशोऽ ोऽध्यायः ॥ १६ ॥
॥ इस प्रकार श्रीशिवमहापुराणके अन्तर्गत तृतीय शतरुद्रसंहितामें यक्षेश्वरावतार-वर्णन नामक सोलहवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ १६ ॥
अथ सप्तदशोऽध्यायः भगवान् शिवके महाकाल नन्दीश्वर उवाच
शृण्वथो गिरिशस्याद्यावतारान् दशसंख्यकान् ।
महाकालमुखान् भक्त्योपासनाकाण्डसेवितान् ॥
तत्राद्यो हि महाकालो भुक्तिमुक्तिप्रदः सताम् ।
शक्तिस्तत्र महाकाली भक्तेप्सितफलप्रदा ॥
तारनामा द्वितीयश्च ताराशक्तिस्तथैव सा ।
भुक्तिमुक्तिप्रदौ चोभौ स्वसेवकसुखप्रदौ ॥
भुवनेशो हि बालाह्वस्तृतीयः परिकीर्तितः ।
भुवनेशी शिवा तत्र बालाह्वा सुखदा सताम् ॥
श्रीविद्येशः षोडशाह्वः श्रीर्विद्या षोडशी शिवा । चतुर्थो भक्तसुखदो भुक्तिमुक्तिफलप्रदः ॥ आदि प्रमुख दस अवतारोंका वर्णन नन्दीश्वर बोले - – [ हे सनत्कुमार! ] अब आप उपासनाकाण्डद्वारा सेवित महेश्वरके सर्वप्रथम १ होनेवाले महाकाल आदि दस प्रमुख अवतारोंको भक्तिपूर्वक सुनिये ॥ १ ॥
उनमें प्रथम महाकाल नामक अवतार है, जो २ सज्जनोंको भोग एवं मोक्ष प्रदान करनेवाला है । [ इस अवतारमें ] उनकी शक्ति महाकाली हैं, जो भक्तोंको अभीष्ट फल प्रदान करती हैं ॥२ ॥
दूसरा अवतार तार नामसे विख्यात है, जिनकी ३ शक्ति तारा हैं । ये दोनों ही अपने भक्तोंको सुख प्रदान करनेवाले एवं भोग तथा मोक्ष देनेवाले हैं ॥ ३ ॥
तीसरा अवतार बाल भुवनेश्वरके नामसे पुकारा ४ जाता है । उनकी शक्ति बाला भुवनेश्वरी कही जाती हैं, ये सत्पुरुषोंको सुख प्रदान करती हैं । चौथा अवतार षोडश नामक विद्येशके रूपमें हुआ है । । षोडशी श्रीविद्या उनकी महाशक्ति हैं । यह अवतार | भक्तोंको सुख प्रदान करनेवाला तथा भोग एवं मोक्ष ५ देनेवाला है॥४-५ ॥
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अ ० १७ ] शतरुद्रसंहिता ८३
पञ्चमो भैरवः ख्यातः सर्वदा भक्तकामदः ।
भैरवी गिरिजा तत्र सदुपासककामदा ॥
छिन्नमस्तकनामासौ शिवः षष्ठः प्रकीर्तितः ।
भक्तकामप्रदा चैव गिरिजा छिन्नमस्तका ॥
धूमवान् सप्तमः शम्भुः सर्वकामफलप्रदः ।
धूमावती शिवा तत्र सदुपासककामदा ॥
शिवावतारः सुखदो ह्यष्टमो बगलामुखः ।
शक्तिस्तत्र महानन्दा विख्याता बगलामुखी ॥
शिवावतारो मातङ्गो नवमः परिकीर्तितः ।
मातंगी तत्र शर्वाणी सर्वकामफलप्रदा ॥
दशमः कमलः शम्भुर्भुक्तिमुक्तिफलप्रदः ।
कमला गिरिजा तत्र स्वभक्तपरिपालिनी ॥
एते दशमिताः शैवा अवताराः सुखप्रदाः ।
भुक्तिमुक्तिप्रदाश्चैव भक्तानां सर्वदा सताम् ॥
एते दशावतारा हि शङ्करस्य महात्मनः ।
नानासुखप्रदा नित्यं सेवतां निर्विकारतः ॥
एतद्दशावताराणां माहात्म्यं वर्णितं मुने ।
सर्वकामप्रदं ज्ञेयं तन्त्रशास्त्रादिगर्भितम् ॥
एतासामादिशक्तीनामद्भुतो महिमा मुने ।
सर्वकामप्रदो ज्ञेयस्तन्त्रशास्त्रादिगर्भितः ॥
शत्रुमारणकार्यादौ तत्तच्छक्तिः परा मता ।
खलदण्डकरी नित्यं ब्रह्मतेजोविवर्द्धिनी ॥
पाँचवाँ अवतार भैरव नामसे प्रसिद्ध है, जो ६ भक्तोंकी कामनाओंको निरन्तर पूर्ण करनेवाला है । | इनकी महाशक्ति गिरिजा भैरवी नामसे प्रसिद्ध हैं, जो सज्जनों एवं उपासकोंकी कामनाएँ पूर्ण करती हैं ॥ ६ ॥
शिवका छठा अवतार छिन्नमस्तक नामक कहा ७ गया है और उनकी महाशक्ति छिन्नमस्तका गिरिजा हैं, जो अपने भक्तोंका मनोरथ पूर्ण करनेवाली हैं ॥ ७ ॥
शिवके सातवें अवतारका नाम धूमवान् है, ८ जो सम्पूर्ण कामनाओंका फल प्रदान करनेवाला है । उनकी शक्ति धूमावती हैं, जो सज्जन उपासकोंको फल देनेवाली हैं ॥ ८ ॥
शिवजीका आठवाँ अवतार बगलामुख है, जो ९ सुख देनेवाला है । उनकी शक्ति बगलामुखी कही गयी हैं, जो परम आनन्दस्वरूपिणी हैं॥९॥
शिवजीका नौवाँ अवतार मातंग नामसे विख्यात १० है और उनकी शक्ति मातंगी हैं, जो [ अपने भक्तोंकी ] समस्त कामनाओंका फल प्रदान करती हैं ॥१० ॥
शिवजीका कल्याणकारी दसवाँ अवतार कमल ११ नामवाला है, जो भोग और मोक्ष देनेवाला है । उनकी शक्ति पार्वतीका नाम कमला है, जो भक्तोंका पालन करती हैं ॥११ ॥
शिवजीके ये दस अवतार हैं, जो सज्जनों एवं १२ भक्तोंको सर्वदा सुख देनेवाले तथा उन्हें भुक्ति एवं मुक्ति प्रदान करनेवाले हैं ॥१२ ॥
महात्मा शिवके ये दसों अवतार निर्विकार रूपसे १३ सेवा करनेवालोंको निरन्तर सभी प्रकारके सुख देते रहते हैं । हे मुने! मैंने शंकरजीके इन दसों अवतारोंके माहात्म्यका वर्णन किया है, इस माहात्म्यको सम्पूर्ण १४ कामनाओंको देनेवाला कहा गया है तथा यह तन्त्र-शास्त्रोंमें निगूढ़ है, ऐसा जानना चाहिये ॥ १३-१४ ॥ हे मुने! इन [ अवतारोंकी ] आदि शक्तियोंकी १५ महिमा भी अद्भुत है । इसे सभी कामनाओंको प्रदान करनेवाली तथा तन्त्रशास्त्र आदिमें गोपित जानना चाहिये । ये शक्तियाँ दुष्टोंको दण्ड देनेवाली तथा ब्रह्मतेजका विवर्धन करनेवाली हैं और शत्रुनिग्रह आदि कार्यके १६ । लिये सर्वश्रेष्ठ कही गयी हैं॥१५-१६ ॥
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८४ इत्युक्तास्ते मया ब्रह्मन्नवतारा महेशितुः । सशक्तिका दशमिता महाकालमुखाः शुभाः
शैवपर्वेषु सर्वेषु योऽधीते भक्तितत्परः ।
सोऽतिशम्भुप्रियो भवेत् ॥
एतदाख्यानममलं ब्राह्मणो ब्रह्मवर्चस्वी क्षत्रियो विजयी भवेत् धनाधिपो हि वैश्यः स्याच्छूद्रः सुखमवाप्नुयात्
शांकरा निजधर्मस्थाः शृण्वन्तश्चरितं त्विदम् ।
स्युर्विशेषेण शिवभक्ता भवन्तु च ॥
श्रीशिवमहापुराण [ अ ० १८ हे ब्रह्मन्! इस प्रकार मैंने शक्तियाँसहित शिवजीके महाकालादि प्रमुख शुभ दस अवतारोंका ॥ १७ वर्णन किया ॥१७ ॥
जो भक्तिमें तत्पर होकर सभी शैव पर्वोंमें शिवके इस निर्मल इतिहासको पढ़ता है, वह शिवका १८ | अत्यन्त प्रिय हो जाता है; ब्राह्मण ब्रह्मतेजसे युक्त तथा । क्षत्रिय विजयी हो जाता है, वैश्य धनाधिपति हो जाता ॥ १ ९ है एवं शूद्र सुख प्राप्त करता है॥१८-१९ ॥ अपने धर्ममें स्थित होकर इस चरित्रको सुननेवाले. | शिवभक्त सुखी हो जाते हैं और वे विशेषरूपसे शिवके २० । भक्त हो जाते हैं ॥ २० ॥
सुखिनः शतरुद्रसंहितायां शिवदशावतारवर्णनं नाम सप्तदशोऽध्यायः ॥ १७ ॥
इति श्रीशिवमहापुराणे तृतीयायां ॥ इस प्रकार श्रीशिवमहापुराणके अन्तर्गत तृतीय शतरुद्रसंहितामें शिवदशावतार-वर्णन नामक सत्रहवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ १७ ॥
अथाष्टादशोऽध्यायः शिवजीके एकादश नन्दीश्वर उवाच
एकादशावतारान्वै शृण्वथो शांकरान्वरान् ।
यान् श्रुत्वा न हि बाध्येत बाधासत्यादिसम्भवा ॥ १
पुरा सर्वे सुराः शक्रमुखा दैत्यपराजिताः ।
त्यक्त्वामरावतीं भीत्यापलायन्त निजां पुरीम् ॥ २
दैत्यप्रपीडिता देवा जग्मुस्ते कश्यपान्तिकम् ।
बध्वा करान्नतस्कन्धाः प्रणेमुस्तं सुविह्वलम् ॥ ३
सुनुत्वा तं सुराः सर्वे कृत्वा विज्ञप्तिमादरात् ।
सर्वं निवेदयामासुः स्वदुःखं तत्पराजयम् ॥ ४
ततः स कश्यपस्तात तत्पिता शिवसक्तधीः ।
तदाकर्ण्यामराकं वै दुःखितोऽभून्न चाधिकम् ॥ ५
तानाश्वास्य मुनिः सोऽथ धैर्यमाधाय शान्तधीः ।
काशीं जगाम सुप्रीत्या विश्वेश्वरपुरीं मुने ॥ ६
रुद्रावतारोंका वर्णन नन्दीश्वर बोले - – [ हे सनत्कुमार! ] अब शिवजीके उत्तम ग्यारह अवतारोंको सुनिये, जिन्हें सुनकर मनुष्यको असत्य आदिसे उत्पन्न होनेवाला पाप पीड़ित नहीं करता है ॥१ ॥
पूर्वकालकी बात है, दैत्योंसे पराजित होकर इन्द्र आदि देवता भयसे अपनी अमरावतीपुरी छोड़कर भाग गये थे । दैत्योंसे पीड़ित वे देवता कश्यपके समीप गये और अत्यन्त विनम्रताके साथ हाथ जोड़कर व्याकुलचित्त हो उन्हें प्रणाम किया ॥ २-३ ॥ भलीभाँति उनकी स्तुति करके सभी देवताओंने आदरपूर्वक प्रार्थनाकर अपने पराजयजन्य दुःखको निवेदन किया । हे तात! उसके बाद शिवमें आसक्त मनवाले उनके पिता कश्यप देवताओंका दुःख सुनकर कुछ दुखी तो हुए, पर अधिक नहीं; [ क्योंकि उनकी बुद्धि शिवमें निरत थी ] ॥ ४-५ ॥ हे मुने! शान्त बुद्धिवाले उन मुनिने देवताओंको आश्वस्त करके तथा धैर्य धारण करके अत्यन्त प्रसन्नतापूर्वक विश्वेश्वरपुरी काशीकी ओर प्रस्थान किया ॥६ ॥
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अ ० १८ ] शतरुद्रसंहिता ८५
गंगाम्भसि ततः स्नात्वा कृत्वा तं विधिमादरात् ।
विश्वेश्वरं समानर्च साम्बं सर्वेश्वरं प्रभुम् ॥
शिवलिंगं सुसंस्थाप्य चकार विपुलं तपः ।
शम्भुमुद्दिश्य सुप्रीत्या देवानां हितकाम्यया ॥
महान्कालो व्यतीयाय तपतस्तस्य वै मुने ।
शिवपादाम्बुजासक्तमनसो धैर्यशालिनः ॥
अथ प्रादुरभूच्छम्भुर्वरं दातुं तदर्षये ।
स्वपदासक्तमनसे दीनबन्धुः सतां गतिः ॥
वरं ब्रूहीति चोवाच सुप्रसन्नो महेश्वरः ।
कश्यपं मुनिशार्दूलं स्वभक्तं भक्तवत्सलः ॥
दृष्ट्वाथ तं महेशानं स प्रणम्य कृताञ्जलिः ।
तुष्टाव कश्यपो हृष्टो देवतातः प्रसन्नधीः ॥
कश्यप उवाच
देवदेव महेशान शरणागतवत्सल ।
सर्वेशः परमात्मा त्वं ध्यानगम्योऽद्वयोऽव्ययः ॥
बलनिग्रहकर्ता त्वं महेश्वर सतां गतिः ।
दीनबन्धुर्दयासिन्धुर्भक्तरक्षणदक्षधी: ॥
एते सुरास्त्वदीया हि त्वद्भक्ताश्च विशेषतः ।
दैत्यैः पराजिताश्चाद्य पाहि तान्दुःखितान् प्रभो ॥
असमर्थो रमेशोऽपि दुःखदस्ते मुहुर्मुहुः ।
अतः सुरा मच्छरणा वेदयन्तोऽसुखं च तत् ॥
तदर्थं देवदेवेश देवदुःखविनाशक ।
तत्पूरितुं तपोनिष्ठां प्रसन्नार्थं तवासदम् ॥
शरणं ते प्रपन्नोऽस्मि सर्वथाहं महेश्वर ।
कामं मे पूरय स्वामिन्देवदुःखं विनाशय ॥
वहाँ गंगाके जलमें स्नान करके श्रद्धासे ७ नित्यक्रियाकर उन्होंने पार्वतीसहित सर्वेश्वर प्रभु विश्वेश्वरका पूजन किया और देवगणोंके कल्याणकी कामनासे शिवकी प्रसन्नताहेतु श्रद्धायुक्त हो लिंगकी ८ स्थापनाकर कठोर तप करने लगे ॥ ७-८ ॥ हे मुने! इस प्रकार शिवके चरणकमलोंमें ९ आसक्त मनवाले उन धैर्यवान् महर्षिको तप करते हुए बहुत समय बीत गया॥९॥
तब सज्जनोंके एकमात्र शरण दीनबन्धु भगवान् १० शिव अपने चरणकमलोंमें आसक्त मनवाले उन ऋषिको वर देनेके लिये प्रकट हुए ॥ १० ॥
भक्तवत्सल शिवजीने अति प्रसन्न होकर ११ अपने भक्त मुनिश्रेष्ठ कश्यपसे ‘ वर माँगिये ’ – ऐसा कहा ॥ ११ ॥
उन महेश्वरको देखकर देवगणके पिता कश्यपने १२ हर्षित हो उन्हें प्रणाम किया और हाथ जोड़कर प्रसन्नचित्त होकर उनकी स्तुति की ॥ १२ ॥
कश्यपजी बोले- हे देवदेव! हे महेशान! हे शरणागतवत्सल! आप सर्वेश्वर, परमात्मा, ध्यानगम्य, १३ अद्वितीय तथा अविनाशी हैं ॥१३ ॥
हे महेश्वर! आप बलवानोंका निग्रह करनेवाले, १४ सज्जनोंको शरण देनेवाले, दीनबन्धु, दयासागर एवं भक्तोंकी रक्षा करनेमें दक्ष बुद्धिवाले हैं ॥ १४ ॥
ये सभी देवता आपके हैं और विशेषरूपसे आपके १५ भक्त हैं । हे प्रभो! इस समय ये दैत्योंसे पराजित हो गये हैं, अतः आप इन दुःखियोंकी रक्षा कीजिये ॥ १५ ॥
विष्णु भी असमर्थ हो जानेपर आपको ही १६ बारम्बार कष्ट देते हैं । इसलिये देवता भी [ मानो असहायसे होकर ] अपना दुःख प्रकट करते हुए मेरी शरणमें आये हुए हैं ॥ १६ ॥
हे देवदेवेश! हे देवगणके दुःखका निवारण १७ करनेवाले! मैं आपको प्रसन्न करना चाहता हूँ । [ अतएव देवताओंके ] अभीष्टको पूर्ण करनेके लिये काशीपुरीमें आकर आपके लिये तपस्या कर रहा हूँ ॥ १७ ॥
हे महेश्वर! मैं सब प्रकारसे आपकी शरण में प्राप्त हुआ हूँ । हे स्वामिन्! मेरी कामनाको पूर्ण १८ कीजिये और देवताओंके दुःखको दूर कीजिये ॥ १८ ॥
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श्रीशिवमहापुराण [ अ ० १८ ८६
देवेश दुःखितोऽहं विशेषतः ।
पुत्रदुःखैश्च मामीश सहायस्त्वं दिवौकसाम् ॥
सुखिनं कुरु
भूत्वा मम सुतो नाथ देवा यक्षाः पराजिताः ।
दैत्यैर्महाबलैः शम्भो सुरानन्दप्रदो भव ॥
सदैवास्तु महेशान सर्वलेखसहायकः ।
यथा दैत्यकृता बाधा न बाधेत सुरान्प्रभो ॥
नन्दीश्वर उवाच इत्युक्तस्य तु सर्वेशस्तथेति प्रोच्य शङ्करः 1 पश्यतस्तस्य भगवांस्तत्रैवान्तर्दधे हरः ॥
कश्यपोऽपि महाहृष्टः स्वस्थानमगमद् द्रुतम् ।
देवेभ्यः कथयामास सर्ववृत्तान्तमादरात् ॥
ततः स शङ्करः शर्वः सत्यं कर्तुं स्वकं वचः ।
सुरभ्यां कश्यपाज्जज्ञे एकादशस्वरूपवान् ॥
महोत्सवस्तदासीद् वै सर्वं शिवमयं त्वभूत् ।
आसन्हृष्टाः सुराश्चाथ मुनिना कश्यपेन च ॥
कपाली पिंगलो भीमो विरूपाक्षो विलोहितः ।
शास्ताजपादहिर्बुध्न्यश्शंभुश्चण्डो भवस्तथा ॥
एकादशैते रुद्रास्तु सुरभीतनयाः स्मृताः ।
देवकार्यार्थमुत्पन्नाः शिवरूपाः सुखास्पदम् ॥
ते रुद्राः काश्यपा वीरा महाबलपराक्रमाः ।
दैत्यान् जघ्नुश्च संग्रामे देवसाहाय्यकारिणः ॥
तद्रुद्रकृपया देवा दैत्यान् जित्वा च निर्भयाः ।
चक्रुः स्वराज्यं सर्वे ते शक्राद्याः स्वस्थमानसाः ॥
अद्यापि ते महारुद्राः सर्वे शिवस्वरूपकाः ।
देवानां रक्षणार्थाय विराजन्ते सदा दिवि ॥
ऐशान्यां पुरि ते वासं चक्रिरे भक्तवत्सलाः ।
विरमन्ते सदा तत्र नानालीलाविशारदाः ॥
हे देवेश! मैं अपने पुत्रोंके दुःखोंसे विशेषरूपसे १ ९ दुखी हूँ । हे ईश! मुझे सुखी कीजिये; आप ही । देवताओंके सहायक हैं । हे नाथ! देवता तथा यक्ष | महाबली दैत्योंसे पराभवको प्राप्त हुए हैं, अत: हे २० शम्भो! आप मेरे पुत्रके रूपमें अवतीर्ण होकर । देवताओंको आनन्द प्रदान कीजिये ॥ १ ९ -२० ॥ हे महेश्वर! हे प्रभो! जिस प्रकार इन देवताओंको २१ दैत्योंके द्वारा की जानेवाली बाधा पीड़ित न करे, उस । प्रकार आप सदा सभी देवताओंके सहायक बनें ॥ २१ ॥
नन्दीश्वर बोले- कश्यपके द्वारा इस प्रकार | कहे जानेपर सर्वेश्वर हर भगवान् शंकरजी ' तथास्तु ' २२ कहकर उनके देखते - देखते वहीं अन्तर्धान हो गये ॥ २२ ॥
कश्यपजी भी अत्यन्त प्रसन्न होकर शीघ्र अपने स्थानपर चले गये और उन्होंने आदरपूर्वक देवताओंसे २३ समस्त वृत्तान्त कह सुनाया ॥ २३ ॥
उसके बाद संहर्ता शंकरजीने अपना वचन सत्य २४ करनेके निमित्त ग्यारह रूप धारणकर कश्यपसे उनकी सुरभि नामक पत्नीके गर्भसे अवतार ग्रहण किया ॥ २४ ॥
उस समय महान् उत्सव हुआ और सब कुछ २५ शिवमय हो गया । कश्यपमुनिसहित सभी देवता भी बहुत प्रसन्न हुए ॥ २५ ॥
कपाली, पिंगल, भीम, विरूपाक्ष, विलोहित, शास्ता, २६ अजपाद्, अहिर्बुध्न्य, शम्भु, चण्ड तथा भव- ये ग्यारहों रुद्र सुरभिके पुत्र कहे गये हैं । ये सुखके आवासस्थान [ रुद्रगण ] देवताओंकी कार्यसिद्धिके लिये उत्पन्न हुए २७ थे । वे कश्यपपुत्र रुद्रगण वीर तथा महान् बल एवं पराक्रमवाले थे । इन्होंने संग्राममें देवताओंके सहायक २८ बनकर दैत्योंका संहार कर डाला ॥ २६–२८ ॥ उन रुद्रोंकी कृपासे इन्द्र आदि सभी देवता २ ९ दैत्योंको जीतकर निर्भय हो गये और स्वस्थचित्त होकर अपना - अपना राजकार्य सँभालने लगे ॥ २ ९ ॥ आज भी शिवस्वरूप वे सभी महारुद्र देवताओंकी ३० रक्षाके लिये सदा स्वर्गमें विराजमान हैं ॥ ३० ॥
भक्तवत्सल एवं नाना प्रकारकी लीला करनेमें | निपुण वे सब ईशानपुरीमें निवास करते हैं तथा वहाँ ३१ । सदा रमण करते हैं ॥ ३१ ॥
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अ ० १ ९ ] शतरुद्रसंहिता
तेषामनुचरा रुद्राः कोटिशः परिकीर्तिताः ।
सर्वत्र संस्थितास्तत्र त्रिलोकेष्वभिभागशः ॥ ३२
इति ते वर्णितास्तातावताराः शङ्करस्य वै ।
एकादशमिता रुद्राः सर्वलोकसुखावहाः ॥३३
इदमाख्यानममलं सर्वपापप्रणाशकम् ।
धन्यं यशस्यमायुष्यं सर्वकामप्रदायकम् ॥ ३४
य इदं शृणुयात्तात श्रावयेद्वै समाहितः ।
इह सर्वसुखं भुक्त्वा ततो मुक्तिं लभेत सः ॥ ३५
८७ उनके अनुचर करोड़ों रुद्र कहे गये हैं, जो तीनों लोकोंमें विभक्त होकर चारों ओर सर्वत्र स्थित हैं ॥ ३२ ॥
हे तात! इस प्रकार मैंने आपसे शंकरजीके अवतारोंका वर्णन किया; ये एकादश रुद्र सबको सुख प्रदान करनेवाले हैं ॥ ३३ ॥
यह आख्यान निर्मल, सभी पापोंको दूर करनेवाला, धन तथा यश प्रदान करनेवाला, आयुकी वृद्धि करनेवाला तथा सम्पूर्ण मनोरथोंको पूर्ण करनेवाला है ॥ ३४ ॥
हे तात! जो सावधान होकर इसको सुनता है अथवा सुनाता है, वह इस लोकमें सब प्रकारका सुख भोगकर अन्तमें मुक्ति प्राप्त कर लेता है ॥३५ ॥
इति श्रीशिवमहापुराणे तृतीयायां शतरुद्रसंहितायां एकादशावतारवर्णनं नामाष्टादशोऽध्यायः ॥ १८ ॥
॥ इस प्रकार श्रीशिवमहापुराणके अन्तर्गत तृतीय शतरुद्रसंहितामें एकादशावतार-वर्णन नामक अठारहवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ १८ ॥
अथैकोनविंशोऽध्यायः शिवजीके नन्दीश्वर उवाच
अथान्यच्चरितं शम्भोः शृणु प्रीत्या महामुने ।
यथा बभूव दुर्वासाः शङ्करो धर्महेतवे ॥
ब्रह्मपुत्रो बभूवातितपस्वी ब्रह्मवित्प्रभुः ।
अनसूयापतिर्धीमान्ब्रह्माज्ञाप्रतिपालकः ॥
सुनिर्देशाद् ब्रह्मणो हि सस्त्रीकः पुत्रकाम्यया ।
स त्र्यक्षकुलनामानं ययौ च तपसे गिरिम् ॥
प्राणानायम्य विधिवन्निर्विन्ध्यातटिनीतटे ।
तपश्चचार सुमहद् अद्वन्द्वोऽब्दशतं मुनिः ॥
य एक ईश्वरः कश्चिदविकारी महाप्रभुः ।
स मे पुत्रवरं दद्यादिति निश्चितमानसः ॥
बहुकालो व्यतीयाय तस्मिंस्तपति सत्तपः ।
आविर्बभूव तस्मात्तु शुचिर्त्वाला महीयसी ॥
दुर्वासावतारकी कथा नन्दीश्वर बोले – हे महामुने! अब आप शम्भुके एक और चरित्रको प्रेमपूर्वक सुनिये, जिसमें १ शंकरजी धर्म [ की स्थापना ] -के लिये दुर्वासा होकर प्रकट हुए थे ॥ १ ॥
ब्रह्माके परम तपस्वी एवं ब्रह्मवेत्ता अत्रि नामक २ पुत्र हुए; वे बड़े बुद्धिमान्, ब्रह्माजीकी आज्ञाका पालन करनेवाले एवं अनसूयाके पति थे ॥२ ॥
वे किसी समय ब्रह्माजीके निर्देशानुसार पुत्रकी ३ इच्छासे पत्नीसहित तप करनेके लिये त्र्यक्षकुल नामक पर्वतपर गये ॥३ ॥
उन मुनिने निर्विन्ध्या नदीके तटपर अपने प्राणोंको ४ रोककर निर्द्वन्द्व हो सौ वर्षपर्यन्त विधिपूर्वक महाघोर तप किया ॥ ४ ॥
उन्होंने अपने मनमें निश्चय किया कि जो ५ एकमात्र अविकारी अनिर्वचनीय महाप्रभु ईश्वर हैं, वे मुझे श्रेष्ठ पुत्र प्रदान करेंगे ॥ ५ ॥
इस प्रकार उत्कृष्ट तपमें प्रवृत्त हुए उन महर्षिका बहुत समय व्यतीत हो गया । तब उनके शरीरसे अत्यन्त ६ पवित्र और बहुत बड़ी अग्निज्वाला प्रकट हुई ॥६ ॥ ॥
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श्रीशिवमहापुराण [ अ ० १ ९ ८८
तयासन्निखिला लोका दग्धप्राया मुनीश्वराः ।
सर्वे पीडिता वासवादयः ॥ ७
तथा सुरर्षयः
अथ सर्वे वासवाद्या सुराश्च मुनयो मुने ।
ब्रह्मस्थानं ययुः शीघ्रं तज्ज्वालातिप्रपीडिताः ॥ ८
नत्वा नुत्वा विधिं देवाः तत्स्वदुःखं न्यवेदयन् ।
ब्रह्मा सह सुरैस्तात विष्णुलोकं ययावरम् ॥ ९
तत्र गत्वा रमानाथं नत्वा नुत्वा विधिः सुरैः ।
स्वदुःखं तत्समाचख्यौ विष्णवेऽनन्तकं मुने ॥ १०
विष्णुश्च विधिना देवै रुद्रस्थानं ययौ द्रुतम् ।
हरं प्रणम्य तत्रैत्य तुष्टाव परमेश्वरम् ॥११
स्तुत्वा बहुतया विष्णुः स्वदुःखं च न्यवेदयत् ।
शर्वं ज्वालासमुद्भूतमत्रेश्च तपसः परम् ॥ १२
अथ तत्र समेतास्तु ब्रह्मविष्णुमहेश्वराः ।
मुने संमन्त्रयाञ्चक्रुरन्योऽन्यं जगतां हितम् ॥ १३
तदा ब्रह्मादयो देवास्त्रयस्ते वरदर्षभाः ।
जग्मुस्तदाश्रमं शीघ्रं वरं दातुं तदर्षये ॥ १४
स्वचिह्नचिह्नितांस्तान्स दृष्ट्वात्रिर्मुनिसत्तमः ।
प्रणनाम च तुष्टाव वाग्भिरिष्टाभिरादरात् ॥ १५
ततः स विस्मितो विप्रस्तानुवाच कृताञ्जलिः ।
ब्रह्मपुत्रो विनीतात्मा ब्रह्मविष्णुहराभिधान् ॥ १६
अत्रिरुवाच
हे ब्रह्मन् हे हरे रुद्र पूज्यास्त्रिजगतां मताः ।
प्रभवश्चेश्वराः सृष्टिरक्षासंहारकारकाः ॥ १७
उस ज्वालासे सम्पूर्ण लोक प्रायः जलने लगा और इन्द्रादि सभी देवता, श्रेष्ठ मुनिगण तथा समस्त सुरर्षिगण भी पीड़ित हो उठे ॥७ ॥
हेमुने! इसके बाद इन्द्र आदि सभी देवता एवं मुनिगण उस ज्वालासे अतीव पीड़ित होकर शीघ्र ही ब्रह्मलोक गये ॥८ ॥
हे तात! देवताओंने नमस्कार एव स्तुतिकर ब्रह्मदेवके समक्ष अपना दुःख प्रकट किया । तब | ब्रह्माजी उन देवताओंको लेकर शीघ्रतासे विष्णुलोकको गये॥९॥
हे मुने! वहाँ देवताओंके साथ जाकर लक्ष्मीपतिको नमस्कार करके तथा उनकी स्तुतिकर अनन्त भगवान् विष्णुसे ब्रह्माजीने दुःख निवेदन किया ॥ १० ॥
तदनन्तर भगवान् विष्णु भी ब्रह्मा एवं देवताओंको लेकर शीघ्र रुद्रलोक गये और वहाँ पहुँचकर परमेश्वर शिवजीको प्रणाम करके उनकी स्तुति की ॥ ११ ॥
बहुत स्तुति करनेके बाद भगवान् विष्णुने शिवजीसे अपना सारा दुःख निवेदन किया कि अत्रिके तपसे एक ज्वाला उत्पन्न हुई है ॥१२ ॥
हे मुने! तदुपरान्त उस स्थानपर एकत्रित हुए ब्रह्मा, विष्णु एवं महेश्वरने मिलकर संसारके हितसाधनके लिये आपसमें मन्त्रणा की ॥ १३ ॥
इसके बाद ब्रह्मा आदि वरदश्रेष्ठ वे तीनों देवता उन मुनिको वर देनेके लिये शीघ्र ही उनके आश्रमपर पहुँचे ॥१४ ॥
अपने - अपने [ हंसादि वाहनोंके ] चिह्नोंसे चिह्नित उन देवगणोंको देखकर मुनिश्रेष्ठ अत्रिने उन्हें प्रणाम किया और प्रिय वाणीसे आदरपूर्वक उनकी स्तुति की ॥१५ ॥
तत्पश्चात् हाथ जोड़े हुए वे विनीतात्मा ब्रह्मपुत्र अत्रि उन ब्रह्मा, विष्णु तथा शिवसे विस्मित होकर कहने लगे —॥१६ ॥
अत्रि बोले- हे ब्रह्मन्! हे विष्णो! हे शिव! | आप सब तीनों लोकोंके पूज्य, प्रभु, ईश्वर और उत्पत्ति, स्थिति तथा प्रलय करनेवाले माने गये हैं ॥ १७ ॥