शिव महापुराण - २ — पृष्ठ 1031–1040

शिव महापुराण - २ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 1031–1040

पृष्ठ 1031

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अ ० ३१ ] वायवीयसंहिता । त्वदधीनमिदं कृत्स्नं जगद्धि ससुरासुरम् ॥ ११ । अतस्त्वद्विहितामाज्ञां क्षमते कोऽतिवर्तितुम् ॥ १२

अयं पुनर्जनो नित्यं भवदेकसमाश्रयः ।

भवानतोऽनुगृह्यास्मै प्रार्थितं सम्प्रयच्छतु ॥ १३

जयाम्बिके जगन्मातर्जय सर्वजगन्मयि ।

जयानवधिकैश्वर्ये जयानुपमविग्रहे ॥ १४

जय वाङ्मनसातीते जयाचिद्ध्वान्तभञ्जिके ।

जय जन्मजराहीने जय कालोत्तरोत्तरे ॥ १५

जयानेकविधानस्थे जय विश्वेश्वरप्रिये ।

जय विश्वसुराराध्ये जय विश्वविजृम्भिणि ॥ १६

जय मङ्गलदिव्याङ्गि जय मङ्गलदीपिके ।

जय मङ्गलचारित्रे जय मङ्गलदायिनि ॥ १७

नमः परमकल्याणगुणसञ्चयमूर्तये ।

त्वत्तः खलु समुत्पन्नं जगत्त्वय्येव लीयते ॥ १८

त्वद्विनातः फलं दातुमीश्वरोऽपि न शक्नुयात् ।

जन्मप्रभृति देवेशि जनोऽयं त्वदुपाश्रितः ॥ १ ९

अतोऽस्य तव भक्तस्य निर्वर्तय मनोरथम् ।

। पञ्चवक्त्रो दशभुजः शुद्धस्फटिकसंनिभः ॥ २०

। वर्णब्रह्मकलादेहो देवः सकलनिष्कलः ।

। शिवमूर्तिसमारूढः शान्त्यतीतः सदाशिवः ।

। भक्त्या मयार्चितो मह्यं प्रार्थितं शं प्रयच्छतु ॥ २१

( उत्तरखण्ड ) १०१७ देवताओं और असुरोंसहित यह सम्पूर्ण जगत् आपके करनेमें अधीन है । अतः आपकी आज्ञाका उल्लंघन कौन समर्थ हो सकता है ॥ ११-१२ हे सनातनदेव! यह सेवक एकमात्र आपके ॥ आश्रित है; अतः आप इसपर अनुग्रह ही इसकी प्रार्थित वस्तु करके इसे प्रदान करें ॥ १३ ॥

अम्बिके! जगन्मातः! आपकी जय हो । सर्वजगन्मयि! आपकी जय हो । असीम ऐश्वर्यशालिनि आपकी जय हो । आपके श्रीविग्रहकी कहीं उपमा! नहीं है, आपकी जय हो ॥१४ ॥

मन, वाणीसे अतीत शिवे! आपकी जय हो । अज्ञानान्धकारका भंजन करनेवाली देवि! आपकी जय हो । जन्म और जरासे रहित उमे! आपकी जय हो । कालसे भी अतिशय उत्कृष्ट शक्तिवाली दुर्गे! आपकी जय हो ॥ १५ ॥

अनेक प्रकारके विधानोंमें स्थित परमेश्वरि! आपकी जय हो । विश्वनाथप्रिये! आपकी जय हो । समस्त देवताओंकी आराधनीया देवि! आपकी जय हो । सम्पूर्ण विश्वका विस्तार करनेवाली जगदम्बिके! आपकी जय हो ॥ १६ ॥

मंगलमय दिव्य अंगोंवाली देवि! आपकी जय हो । मंगलको प्रकाशित करनेवाली! आपकी जय हो ।

मंगलमय चरित्रवाली सर्वमंगले! आपकी जय हो ।

मंगलदायिनि! आपकी जय हो ॥ १७ ॥

परम कल्याणमय गुणोंकी आप मूर्ति हैं, आपको नमस्कार है । सम्पूर्ण जगत् आपसे ही उत्पन्न हुआ है, अतः आपमें ही लीन होगा ॥१८ ॥

देवेश्वरि! अतः आपके बिना ईश्वर भी फल देनेमें समर्थ नहीं हो सकते । यह जन जन्मकालसे ही आपकी शरणमें आया हुआ है । अतः देवि! आप अपने इस भक्तका मनोरथ सिद्ध कीजिये ॥ १ ९ १ / २ ॥ प्रभो! आपके पाँच मुख और दस भुजाएँ हैं । | आपकी अंगकान्ति शुद्ध स्फटिकमणिके समान निर्मल है । वर्ण, ब्रह्म और कला आपके विग्रहरूप हैं । आप सकल और निष्कल देवता हैं । शिवमूर्तिमें सदा व्याप्त रहनेवाले हैं । शान्त्यतीत पदमें विराजमान सदाशिव आप ही हैं । मन मैंने भा भक्तिभावसे आपकी अर्चना की है । हा प्रार्थित कल्याण प्रदान करें ॥ २०-२१ ॥ आप मुझे

पृष्ठ 1032

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श्रीशिवमहापुराण [ अ ० ३१ १०१८ सदाशिव अंकमें आरूढ़ इच्छाशक्तिस्वरूपा सदाशिवाङ्कमारूढा शक्तिरिच्छा शिवाह्वया । सर्वलोकजननी शिवा मुझे मनोवांछित वस्तु, मनोरथम् ॥ २२ प्रदान जननी सर्वलोकानां प्रयच्छतु शिवयोर्दयितौ पुत्रौ देवौ हेरम्बषण्मुखौ शिवानुभावौ सर्वज्ञौ शिवज्ञानामृताशिनौ तृप्तौ परस्परं स्निग्धौ शिवाभ्यां नित्यसत्कृतौ सत्कृतौ च सदा देवौ ब्रह्माद्यैस्त्रिदशैरपि सर्वलोकपरित्राणं कर्तुमभ्युदितौ सदा स्वेच्छावतारं कुर्वन्तौ स्वांशभेदैरनेकशः ताविमौ शिवयोः पार्श्वे नित्यमित्थं मयार्चितौ तयोराज्ञां पुरस्कृत्य प्रार्थितं मे प्रयच्छताम् शुद्धस्फटिकसङ्काशमीशानाख्यं सदाशिवम् मूर्द्धाभिमानिनी मूर्तिः शिवस्य परमात्मनः शिवार्चनरतं शान्तं शान्त्यतीतं खमास्थितम् पञ्चाक्षरान्तिमं बीजं कलाभिः पञ्चभिर्युतम् प्रथमावरणे पूर्वं शक्त्या सह समर्चितम् पवित्रं परमं ब्रह्म प्रार्थितं मे प्रयच्छतु बालसूर्यप्रतीकाशं पुरुषाख्यं पुरातनम् पूर्ववक्त्राभिमानं च शिवस्य परमेष्ठिनः शान्त्यात्मकं मरुत्संस्थं शम्भोः पादार्चने रतम् प्रथमं शिवबीजेषु कलासु च चतुष्कलम् ॥ पूर्वभागे मया भक्त्या शक्त्या सह समर्चितम् पवित्रं परमं ब्रह्म प्रार्थितं मे प्रयच्छतु अञ्जनादिप्रतीकाशमघोरं घोरविग्रहम् देवस्य दक्षिणं वक्त्रं देवदेवपदार्चकम् ॥ विद्यापदं समारूढं वह्निमण्डलमध्यगम् द्वितीयं शिवबीजेषु कलास्वष्टकलान्वितम् ॥ शम्भोर्दक्षिणदिग्भागे शक्त्या सह समर्चितम् पवित्रं परमं ब्रह्म प्रार्थितं मे प्रयच्छतु ॥ करें ॥ २२ ॥

शिव और पार्वतीके प्रिय पुत्र, शिवके समान । प्रभावशाली सर्वज्ञ तथा शिवज्ञानामृतका पान करके ॥ २३ । रहनेवाले देवता गणेश और कार्तिकेय परस्पर स्नेह रखते तृप्त । । हैं । शिवा और शिव दोनोंसे सत्कृत हैं तथा ब्रह्मा आदि । ॥ २४ देवता भी इन दोनों देवोंका सर्वथा सत्कार करते हैं । ये । । दोनों भाई निरन्तर सम्पूर्ण लोकोंकी रक्षा करनेके लिये । ॥ / उद्यत रहते हैं और अपने विभिन्न अंशोंद्वारा अनेक बार २५ स्वेच्छापूर्वक अवतार धारण करते हैं । वे ही ये दोनों । बन्धु शिव और शिवाके पार्श्वभागमें मेरे द्वारा इस प्रकार । ॥ २६ पूजित हो उन दोनोंकी आज्ञा ले प्रतिदिन मुझे प्रार्थित वस्तु प्रदान करें ॥ २३–२६ ॥ । जो शुद्ध स्फटिकमणिके समान निर्मल, ईशान ॥ २७ नामसे प्रसिद्ध और सदा कल्याणस्वरूप है, परमात्मा शिवकी मूर्धाभिमानिनी मूर्ति है; शिवार्चनमें रत, शान्त, । शान्त्यतीतकलामें प्रतिष्ठित, आकाशमण्डलमें स्थित, ॥ २८ शिव पंचाक्षरका अन्तिम बीजस्वरूप, पाँच कलाओंसे युक्त और प्रथम आवरणमें सबसे पहले शक्तिके साथ । पूजित है, वह पवित्र परब्रह्म मुझे शन मेरी अभीष्ट वस्तु ॥ २ ९ प्रदान करे ॥ २७–२९ ॥ । जो प्रात: कालके सूर्यकी भाँति अरुणप्रभासे युक्त, ॥ ३० पुरातन, तत्पुरुष नामसे विख्यात, परमेष्ठी शिवके पूर्ववर्ती मुखका अभिमानी, शान्तिकलास्वरूप या शान्तिकलामें । प्रतिष्ठित, वायुमण्डलमें स्थित, शिवचरणार्चनपरायण, ३१ शिवके बीजोंमें प्रथम और कलाओंमें चार कलाओंसे युक्त है, मैंने पूर्वदिशामें भक्तिभावसे शक्तिसहित जिसका । पूजन किया है, वह पवित्र परब्रह्म शिव मेरी प्रार्थना ॥ ३२ सफल करे ॥ ३०–३२ ॥ । जो कज्जलपर्वतके समान श्याम, घोर शरीरवाला ३३ एवं अघोर नामसे प्रसिद्ध है, महादेवजीके दक्षिण मुखका अभिमानी तथा देवाधिदेव शिवके चरणोंका । । पूजक है, विद्याकलापर आरूढ़ और अग्निमण्डलके ३४ मध्य विराजमान है, शिवबीजोंमें द्वितीय तथा कलाओं में | अष्टकलायुक्त एवं भगवान् शिवके दक्षिणभागम । । शक्तिके साथ पूजित है, वह पवित्र परब्रह्म मुझे मेरी ३५ । अभीष्ट वस्तु प्रदान करे ॥ ३३-३५ ॥

पृष्ठ 1033

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अ ० ३१ ] वायवीयसहिता

कुङ्कुमक्षोदसङ्काशं वामाख्यं वरवेषधृक् ।

वक्त्रमुत्तरमीशस्य प्रतिष्ठायां प्रतिष्ठितम् ॥ ३६

वारिमण्डलमध्यस्थं महादेवार्चने रतम् । तरीयं शिवबीजे त्रयोदशकलान्वितम् ॥ ३७

देवस्योत्तरदिग्भागे शक्त्या सह समर्चितम् ।

पवित्रं परमं ब्रह्म प्रार्थितं मे प्रयच्छतु ॥ ३८

शङ्खकुन्देन्दुधवलं सद्याख्यं सौम्यलक्षणम् ।

शिवस्य पश्चिमं वक्त्रं शिवपादार्चने रतम् ॥ ३ ९

निवृत्तिपदनिष्ठं च पृथिव्यां समवस्थितम् ।

तृतीयं शिवबीजेषु कलाभिश्चाष्टभिर्युतम् ॥ ४०

देवस्य पश्चिमे भागे शक्त्या सह समर्चितम् ।

पवित्रं परमं ब्रह्म प्रार्थितं मे प्रयच्छतु ॥ ४१

शिवस्य तु शिवायाश्च हृन्मूर्त्ती शिवभाविते ।

तयोराज्ञां पुरस्कृत्य ते मे कामं प्रयच्छताम् ॥ ४२

शिवस्य च शिवायाश्च शिवामूर्त्ती शिवाश्रिते ।

सत्कृत्य शिवयोराज्ञां ते मे कामं प्रयच्छताम् ॥ ४३

शिवस्य च शिवायाश्च वर्मणी शिवभाविते ।

सत्कृत्य शिवयोराज्ञां ते मे कामं प्रयच्छताम् ॥ ४४

शिवस्य च शिवायाश्च नेत्रमूर्त्ती शिवाश्रिते ।

सत्कृत्य शिवयोराज्ञां ते मे कामं प्रयच्छताम् ॥ ४५

अस्त्रमूर्ती च शिवयोर्नित्यमर्चनतत्परे ।

सत्कृत्य शिवयोराज्ञां ते मे कामं प्रयच्छताम् ॥ ४६

वामो ज्येष्ठस्तथा रुद्रः कालो विकरणस्तथा ।

बलो विकरणश्चैव बलप्रमथनः परः ॥ ४७

सर्वभूतस्य दमनस्तादृशाश्चाष्टशक्तयः ।

प्रार्थितं मे प्रयच्छन्तु शिवयोरेव शासनात् ॥ ४८

( उत्तरखण्ड ) १०१ ९ जो कुंकुमचूर्ण अथवा केसरयुक्त चन्दनके समान रक्त - पीतवर्णवाला, सुन्दर वेषधारी और वामदेव नामसे प्रसिद्ध है, भगवान् शिवके उत्तरवर्ती मुखका अभिमानी है, प्रतिष्ठाकलामें प्रतिष्ठित है, जलके मण्डलमें विराजमान तथा महादेवजीकी अर्चनामें शिवबीजोंमें चतुर्थ तथा तेरह कलाओंसे तत्पर है । महादेवजीके युक्त है और उत्तरभागमें शक्तिके साथ पूजित हुआ है, वह पवित्र परब्रह्म मेरी प्रार्थना पूर्ण करे ॥ ३६-३८ ॥ जो शंख, कुन्द और चन्द्रमाके समान धवल, सौम्य तथा सद्योजात नामसे विख्यात है, भगवान् शिवके पश्चिम मुखका अभिमानी एवं शिवचरणोंकी अर्चनामें रत है, निवृत्तिकलामें प्रतिष्ठित तथा पृथ्वी-मण्डलमें स्थित है, शिवबीजोंमें तृतीय, आठ कलाओंसे युक्त और महादेवजीके पश्चिमभागमें शक्तिके साथ पूजित हुआ है, वह पवित्र परब्रह्म मुझे मेरी प्रार्थित वस्तु दे ॥३ ९ –४१ ॥ शिव और शिवाकी हृदयरूपिणी मूर्तियाँ शिवभावसे भावित हो उन्हीं दोनोंकी आज्ञा शिरोधार्य करके मेरा मनोरथ पूर्ण करें ॥ ४२ ॥

शिव और शिवाकी शिखारूपा मूर्तियाँ शिवके ही आश्रित रहकर उन दोनोंकी आज्ञाका आदर करके मुझे मेरी अभीष्ट वस्तु प्रदान करें ॥ ४३ ॥

शिव और शिवाकी कवचरूपा मूर्तियाँ शिवभावसे भावित हो शिव - पार्वतीकी आज्ञाका सत्कार करके मेरी कामना सफल करें ॥४४ ॥

शिव और शिवाकी नेत्ररूपा मूर्तियाँ शिवके आश्रित रह उन्हीं दोनोंकी आज्ञा शिरोधार्य करके मुझे मेरा मनोरथ प्रदान करें ॥ ४५ ॥

शिव और शिवाकी अस्त्ररूपा मूर्तियाँ नित्य उन्हीं दोनोंके अर्चनमें तत्पर रह उनकी आज्ञाका सत्कार करती हुई मुझे मेरी अभीष्ट वस्तु प्रदान करें ॥ ४६ ॥

वाम, ज्येष्ठ, रुद्र, काल, विकरण, बलविकरण, बलप्रमथन तथा सर्वभूत - दमन - ये आठ शिवमूर्तियाँ तथा इनकी वैसी ही आठ शक्तियाँ -वामा, ज्येष्ठा, रुद्राणी, काली, विकरणी, बलविकरणी, बलप्रमथनी तथा सर्वभूतदमनी — ये सब शिव और शिवाके ही शासनसे मुझे प्राथित वस्तु प्रदान करें । ४७-४८ ॥

पृष्ठ 1034

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श्रीशिवमहापुराण [ अ ० ३१ १०२०

सूक्ष्मश्च शिवश्चाप्येकनेत्रकः ।

अथानन्तश्च श्रीकण्ठश्च शिखण्डिकः ॥ ४ ९

एकरुद्रस्त्रिमूर्तिश्च

तथाष्टौ शक्तयस्तेषां द्वितीयावरणेऽर्चिताः ।

ते मे कामं • प्रयच्छन्तु शिवयोरेव शासनात् ॥ ५०

भवाद्या मूर्तयश्चाष्टौ तासामपि च शक्तयः ।

महादेवादयश्चान्ये तथैकादशमूर्तयः ॥ ५१

शक्तिभिः सहिताः सर्वे तृतीयावरणे स्थिताः ।

सत्कृत्य शिवयोराज्ञां दिशन्तु फलमीप्सितम् ॥ ५२

वृषराजो महातेजा महामेघसमस्वनः ।

मेरुमन्दरकैलासहिमाद्रिशिखरोपमः ॥५३

सिताभ्रशिखराकारः ककुदा परिशोभितः ।

महाभोगीन्द्रकल्पेन वालेन च विराजितः ॥ ५४

रक्तास्य शृङ्गचरणो रक्तप्रायविलोचनः ।

पीवरोन्नतसर्वाङ्गः सुचारुगमनोज्ज्वलः ॥५५

प्रशस्तलक्षणः श्रीमान् प्रज्वलन्मणिभूषणः ।

शिवप्रियः शिवासक्तः शिवयोर्ध्वजवाहनः ॥ ५६

तथा तच्चरणन्यासपावितापरविग्रहः ।

गोराजपुरुषः श्रीमान् श्रीमच्छूलवरायुधः ।

तयोराज्ञां पुरस्कृत्य स मे कामं प्रयच्छतु ॥ ५७

नन्दीश्वरो महातेजा नगेन्द्रतनयात्मजः ।

सनारायणकैर्देवैर्नित्यमभ्यर्च्य वन्दितः ॥ ५८

शर्वस्यान्तःपुरद्वारि सार्धं परिजनैः स्थितः । ।

सर्वेश्वरसमप्रख्यः सर्वासुरविमर्दनः ॥५ ९

| सर्वेषां शिवधर्माणामध्यक्षत्वेऽभिषेचितः । । अनन्त, सूक्ष्म, शिव ( अथवा शिवोत्तम ), एकनेत्र एकरुद्र, त्रिमूर्ति, श्रीकण्ठ और शिखण्डी - ये आठ, | विद्येश्वर तथा इनकी वैसी ही आठ शक्तियाँ-| अनन्ता, सूक्ष्मा, शिवा ( अथवा शिवोत्तमा ), एकनेत्रा | एकरुद्रा, त्रिमूर्ति, श्रीकण्ठी और शिखण्डिनी, जिनकी, | द्वितीय आवरणमें पूजा हुई है, शिवा और शिवके ही शासनसे मेरी मन: कामना पूर्ण करें ॥ ४ ९ -५० ॥ भव आदि आठ मूर्तियाँ और उनकी शक्तियाँ तथा शक्तियसहित महादेव आदि ग्यारह मूर्तियों, | जिनकी स्थिति तीसरे आवरणमें है, शिव और | पार्वतीकी आज्ञा शिरोधार्य करके मुझे अभीष्ट फल प्रदान करें ॥ ५१-५२ ॥ जो वृषभोंके राजा महातेजस्वी, महान् मेघके समान शब्द करनेवाले, मेरु, मन्दराचल, कैलास और हिमालयके शिखरकी भाँति ऊँचे एवं उज्ज्वलवर्णवाले हैं, श्वेत बादलोंके शिखरकी भाँति ऊँचे ककुद्से शोभित हैं, महानागराज ( शेष ) -के शरीरकी भाँति पूँछ जिनकी शोभा बढ़ाती है, जिनके मुख, सींग और पैर भी लाल हैं, नेत्र भी प्रायः लाल ही हैं, जिनके सारे अंग मोटे और उन्नत हैं, जो अपनी मनोहर चालसे बड़ी शोभा पाते हैं, जिनमें उत्तम लक्षण विद्यमान हैं, जो चमचमाते हुए मणिमय आभूषणोंसे विभूषित हो अत्यन्त दीप्तिमान् दिखायी देते हैं, जो भगवान् शिवको प्रिय हैं और शिवमें ही अनुरक्त रहते हैं, शिव और शिवा दोनोंके ही जो ध्वज और वाहन हैं तथा उनके चरणोंके स्पर्शसे जिनका पृष्ठभाग परम पवित्र हो गया है, जो गौओंके राजपुरुष हैं, वे श्रेष्ठ और चमकीला त्रिशूल धारण करनेवाले नन्दिकेश्वर वृषभ शिव और शिवाकी आज्ञा शिरोधार्य करके मुझे अभीष्ट वस्तु प्रदान करें ॥ ५३–५७ ॥ जो गिरिराजनन्दिनी पार्वतीके लिये पुत्रके तुल्य प्रिय हैं, श्रीविष्णु आदि देवताओंद्वारा नित्य पूजित एवं | वन्दित हैं, भगवान् शंकरके अन्तःपुरके द्वारपर परिजनोंके साथ खड़े रहते हैं, सर्वेश्वर शिवके समान ही तेजस्वी हैं तथा समस्त असुरोंको कुचल देनेकी शक्ति रखते हैं, शिवधर्मका पालन करनेवाले सम्पूर्ण शिवभक्तोंके अध्यक्षपदपर जिनका अभिषेक हुआ है, जो भगवान् ।

पृष्ठ 1035

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अ ० ३१ ] वायवीयसहिता शिवप्रियः शिवासक्तः श्रीमच्छूलवरायुधः ॥ ६० संसक्तस्त्वनुरक्तश्च तैरपि । शिवाश्रितेषु शिवयोराज्ञां स मे कामं प्रयच्छतु ॥ ६१ सत्कृत्य

महाकालो महाबाहुर्महादेव इवापरः ।

महादेवाश्रितानां नित्यमेवाभिरक्षतु ॥ ६२

शिवप्रिय: शिवासक्तः शिवयोरर्चकः सदा ।

सत्कृत्य शिवयोराज्ञां स मे दिशतु काङ्क्षितम् ॥ ६३

सर्वशास्त्रार्थतत्त्वज्ञः शास्ता विष्णोः परा तनुः ।

महामोहात्मतनयो मधुमांसासवप्रियः ।

तयोराज्ञां पुरस्कृत्य स मे कामं प्रयच्छतु ॥ ६४

ब्रह्माणी चैव माहेशी कौमारी वैष्णवी तथा ।

वाराही चैव माहेन्द्री चामुण्डा चण्डविक्रमा ॥ ६५

एता वै मातरः सप्त सर्वलोकस्य मातरः ।

प्रार्थितं मे प्रयच्छन्तु परमेश्वरशासनात् ॥ ६६

मत्तमातङ्गवदनो गङ्गोमाशङ्करात्मजः ।

आकाशदेहो दिग्बाहुः सोमसूर्याग्निलोचनः ॥ ६७

ऐरावतादिभिर्दिव्यैर्दिग्गजैर्नित्यमर्चितः शिवज्ञानमदोद्भिन्नस्त्रिदशानामविघ्नकृत् ॥ ६८

विघ्नकृच्चासुरादीनां विघ्नेशः शिवभावितः ।

सत्कृत्य शिवयोराज्ञां स मे दिशतु काङ्क्षितम् ॥ ६ ९

षण्मुखः शिवसम्भूतः शक्तिवज्रधरः प्रभुः ।

। अग्नेश्च तनयो देवो ह्यपर्णातनयः पुनः ॥ ७०

सिख गङ्गायाश्च गणाम्बायाः कृत्तिकानां तथैव च । ( उत्तरखण्ड ) १०२१ शिवके प्रिय, शिवमें ही नामक श्रेष्ठ आयुध अनुरक्त तथा तेजस्वी त्रिशूल शिवके शरणागत धारण करनेवाले हैं, भगवान् शिवभक्तोंका भक्तोंपर जिनका स्नेह है तथा नन्दीश्वर भी जिनमें अनुराग है, वे महातेजस्वी शिव और पार्वतीकी आज्ञाको शिरोधार्य करके मुझे मनोवांछित वस्तु प्रदान करें ॥ ५८–६१ दूसरे महादेवके समान महातेजस्वी ॥ महाकाल महादेवजीके शरणागत महाबाहु रक्षा करें ॥ ६२ ॥ भक्तोंकी नित्य ही

वे भगवान् शिवके प्रिय हैं, भगवान् शिवमें उनकी आसक्ति है तथा वे सदा ही शिव तथा पार्वतीके पूजक हैं, इसलिये शिवा और शिवकी आज्ञाका आदर करके मुझे मनोवांछित वस्तु प्रदान करें ॥ ६३ ॥

जो सम्पूर्ण शास्त्रोंके तात्त्विक अर्थके ज्ञाता, भगवान् विष्णुके द्वितीय स्वरूप, सबके शासक तथा महामोहात्मा [ कद्रू ] -के पुत्र हैं, मधु, फलका गूदा और आसव जिन्हें प्रिय हैं, वे नागराज भगवान् शेष शिव और पार्वतीकी आज्ञाको सामने रखते हुए मेरी । इच्छाको पूर्ण करें ॥६४ ॥

ब्रह्माणी, माहेश्वरी, कौमारी, वैष्णवी, वाराही, माहेन्द्री तथा प्रचण्ड पराक्रमशालिनी चामुण्डादेवी– ये सर्वलोकजननी सात माताएँ परमेश्वर शिवके आदेशसे मुझे मेरी प्रार्थित वस्तु प्रदान करें॥६५-६६ ॥ जिनका मतवाले हाथीका - सा मुख है; जो गंगा, उमा और शिवके पुत्र हैं; आकाश जिनका शरीर है, दिशाएँ भुजाएँ हैं तथा चन्द्रमा, सूर्य और अग्नि जिनके तीन नेत्र हैं; ऐरावत आदि दिव्य दिग्गज जिनकी नित्य पूजा करते हैं, जिनके मस्तकसे शिवज्ञानमय मदकी धारा बहती रहती है, जो देवताओंके विघ्नका निवारण करते और असुर आदिके कार्योंमें विघ्न डालते रहते हैं, वे विघ्नराज गणेश शिवसे भावित हो शिवा और शिवकी आज्ञा शिरोधार्य करके मेरा मनोरथ प्रदान करें ॥ ६७–६९ ॥ जिनके छः मुख हैं, भगवान् शिवसे जिनकी उत्पत्ति हुई है, जो शक्ति और वज्र धारण करनेवाले अग्निके पुत्र तथा अपर्णा ( शिवा ) - के बालक प्रभु हैं, कृत्तिकाओंके भी पुत्र हैं; हैं; गंगा, गणाम्बा तथा

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श्रीशिवमहापुराण [ अ ० ३१ १०२२ विशाखेन च शाखेन नैगमेयेन चावृतः ॥ ७१ 1 इन्द्रजिच्चेन्द्रसेनानीस्तारकासुरजित्तथा वेधकश्च स्वतेजसा ॥ ७२ शैलानां मेरुमुख्यानां

तप्तचामीकरप्रख्यः शतपत्रदलेक्षणः ।

रूपोदाहरणं महत् ॥ ७३

कुमारः सुकुमाराणां

शिवप्रियः शिवासक्तः शिवपादार्चकः सदा ।

सत्कृत्य शिवयोराज्ञां स मे दिशतु काङ्क्षितम् ॥ ७४

ज्येष्ठा वरिष्ठा वरदा शिवयोर्यजने रता ।

तयोराज्ञां पुरस्कृत्य सा मे दिशतु काङ्क्षितम् ॥ ७५

त्रैलोक्यवन्दिता साक्षादुल्काकारा गणाम्बिका ।

जगत्सृष्टिविवृद्ध्यर्थं ब्रह्मणाभ्यर्थिता शिवात् ॥ ७६

शिवायाः प्रविभक्ताया भ्रुवोरन्तरनिःसृताः ।

दाक्षायणी सती मेना तथा हैमवती ह्युमा ॥ ७७

कौशिक्याश्चैव जननी भद्रकाल्यास्तथैव च ।

अपर्णायाश्च जननी पाटलायास्तथैव च ॥ ७८

शिवार्चनरता नित्यं रुद्राणी रुद्रवल्लभा ।

सत्कृत्य शिवयोराज्ञां सा मे दिशतु काङ्क्षितम् ॥ ७ ९

चण्डः सर्वगणेशानः शम्भोर्वदनसम्भवः ।

सत्कृत्य शिवयोराज्ञां स मे दिशतु काङ्क्षितम् ॥ ८०

पिङ्गलो गणपः श्रीमान् शिवासक्तः शिवप्रियः ।

आज्ञया शिवयोरेव स मे कामं प्रयच्छतु ॥ ८१

भृङ्गीशो नाम गणपः शिवाराधनतत्परः ।

प्रयच्छतु स मे कामं पत्युराज्ञापुरःसरम् ॥८२

वीरभद्रो महातेजा हिमकुन्देन्दुसन्निभः ।

भद्रकालीप्रियो नित्यं मातॄणां चाभिरक्षिता ॥ ८३

यज्ञस्य च शिरोहर्ता दक्षस्य च दुरात्मनः । विशाख शाख और नैगमेय - इन तीनों भाइयोंसे घिरे, रहते हैं; जो इन्द्र- विजयी, इन्द्रके सेनापति जो | सदा तथा तारकासुरको परास्त करनेवाले हैं; जिन्होंने अपनी शक्तिसे मेरु आदि पर्वतोंको छेद डाला है, जिनकी अंगकान्ति तपाये हुए सुवर्णके समान है, नेत्र प्रफुल्ल | कमलके समान सुन्दर हैं, कुमार नामसे जिनकी प्रसिद्धि है, जो सुकुमारोंके रूपके सबसे बड़े उदाहरण | हैं; शिवके प्रिय, शिवमें अनुरक्त तथा शिव - चरणोंकी | नित्य अर्चना करनेवाले हैं; वे स्कन्द शिव और | शिवाकी आज्ञा शिरोधार्य करके मुझे मनोवांछित वस्तु दें ॥ ७०–७४ ॥ सर्वश्रेष्ठ और वरदायिनी ज्येष्ठादेवी, जो सदा शिव और पार्वतीके पूजनमें लगी रहती हैं, भगवान् उन दोनोंकी आज्ञा मानकर मुझे मनोवांछित वस्तु प्रदान करें ॥ ७५ ॥

त्रैलोक्यवन्दिता, साक्षात् उल्का ( लुकाठी ) -जैसी आकृतिवाली गणाम्बिका, जो जगत्‌की सृष्टि बढ़ानेके लिये ब्रह्माजीके प्रार्थना करनेपर शिवके शरीरसे पृथक् हुई शिवाके दोनों भौंहोंके बीचसे निकली थीं, जो दाक्षायणी, सती, मेना तथा हिमवान्कुमारी उमा आदिके रूपमें प्रसिद्ध हैं; कौशिकी, भद्रकाली, अपर्णा और पाटलाकी जननी हैं; नित्य शिवार्चनमें तत्पर रहती हैं एवं रुद्रवल्लभा रुद्राणी कहलाती हैं, वे शिव और शिवाकी आज्ञा शिरोधार्य करके मुझे मनोवांछित वस्तु दें॥७६–७९ ॥ समस्त शिवगणोंके स्वामी चण्ड, जो भगवान् शंकरके मुखसे प्रकट हुए हैं, शिवा और शिवकी आज्ञाका आदर करके मुझे अभीष्ट वस्तु प्रदान करें ॥ ८० ॥

भगवान् शिवमें आसक्त और शिवके प्रिय गणपाल श्रीमान् पिंगल शिव और शिवाकी आज्ञासे ही मेरी मन: कामना पूर्ण करें ॥ ८१ ॥

शिवकी आराधनामें तत्पर रहनेवाले भृंगीश्वर नामक गणपाल अपने स्वामीकी आज्ञा ले मुझ मनोवांछित वस्तु प्रदान करें ॥ ८२ ॥

हिम, कुन्द और चन्द्रमाके समान उज्ज्वल, भद्रकालीके प्रिय, सदा ही मातृगणोंकी रक्षा करनेवाले | दुरात्मा दक्ष और उसके यज्ञका सिर काटनेवाले

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अ ० ३१ ] वायवीयसंहिता उपेन्द्रेन्द्रयमादीनां देवानामङ्गतक्षकः ॥ ८४ ।

शिवस्यानुचरः श्रीमान् शिवशासनपालकः ।

शिवयोः शासनादेव स मे दिशतु काङ्क्षितम् ॥

८५

सरस्वती महेशस्य वाक्सरोजसमुद्भवा ।

शिवयोः पूजने सक्ता सा मे दिशतु काङ्क्षितम् ॥ ८६

विष्णोर्वक्षःस्थिता लक्ष्मीः शिवयोः पूजने रता ।

शिवयोः शासनादेव सा मे दिशतु काङ्क्षितम् ॥ ८७

महामोटी महादेव्याः पादपूजापरायणा ।

तस्या एव नियोगेन सा मे दिशतु काङ्क्षितम् ॥ ८८

कौशिकी सिंहमारूढा पार्वत्याः परमा सुता ।

विष्णोर्निद्रा महामाया महामहिषमर्दिनी ॥ ८ ९

निशुम्भशुम्भसंहर्त्री मधुमांसासवप्रिया ।

सत्कृत्य शासनं मातुः सा मे दिशतु काङ्क्षितम् ॥ ९ ०

रुद्रा रुद्रसमप्रख्याः प्रमथाः प्रथितौजसः ।

भूताख्याश्च महावीर्या महादेवसमप्रभाः ॥ ९ १

नित्यमुक्ता निरुपमा निर्द्वन्द्वा निरुपप्लवाः ।

सशक्तयः सानुचराः सर्वलोकनमस्कृताः ॥ ९ २

सर्वेषामेव लोकानां सृष्टिसंहरणक्षमाः ।

परस्परानुरक्ताश्च परस्परमनुव्रताः ॥ ९ ३

परस्परमतिस्निग्धाः परस्परनमस्कृताः ।

शिवप्रियतमा नित्यं शिवलक्षणलक्षिताः ॥ ९ ४

सौम्या घोरास्तथा मिश्राश्चान्तरालद्वयात्मिकाः ।

विरूपाश्च सुरूपाश्च नानारूपधरास्तथा ॥ ९ ५

सत्कृत्य शिवयोराज्ञां ते मे कामं दिशन्तु वै ।

देव्याः प्रियसखीवर्गो देवीलक्षणलक्षितः ॥ ९ ६

सहितो रुद्रकन्याभिः शक्तिभिश्चाप्यनेकशः ।

। तृतीयावरणे शम्भोर्भक्त्या नित्यं समर्चितः ॥ ९ ७ ।

सत्कृत्य शिवयोराज्ञां स मे दिशतु मङ्गलम् । ( उत्तरखण्ड ) १०२३ उपेन्द्र, इन्द्र और यम आदि देवताओंके कर देनेवाले, शिवके अनुचर तथा शिवकी अंगोंमें घाव आज्ञाके पालक, महातेजस्वी श्रीमान् वीरभद्र शिव और शिवा आदेशसे ही मुझे मेरी मनचाही वस्तु दें ॥ ८३-८५ ॥ महेश्वरके मुखकमलसे प्रकट हुई तथा शिव-पार्वतीके पूजनमें आसक्त रहनेवाली वे सरस्वतीदेवी मुझे मनोवांछित वस्तु प्रदान करें ॥८६ ॥

भगवान् विष्णुके वक्ष: स्थलमें विराजमान लक्ष्मीदेवी, जो सदा शिव और शिवाके पूजनमें लगी रहती हैं, उन शिवदम्पतीके आदेशसे ही मेरी अभिलाषा पूर्ण करें ॥ ८७ ॥

महादेवी पार्वतीके पादपद्मोंकी पूजामें परायण महामोटी उन्हींकी आज्ञासे मेरी मनचाही वस्तु मुझे दें ॥ ८८ ॥

पार्वतीकी सबसे श्रेष्ठ पुत्री सिंहवाहिनी कौशिकी, भगवान् विष्णुकी योगनिद्रा महामाया, महामहिषमर्दिनी, महालक्ष्मी तथा मधु और फलोंके गूदे तथा रसको प्रेमपूर्वक भोग लगानेवाली निशुम्भ - शुम्भसंहारिणी महासरस्वती माता पार्वतीकी आज्ञासे मुझे मनोवांछित वस्तु प्रदान करें ॥ ८ ९ - ९ ० ॥ रुद्रदेवके समान तेजस्वी रुद्रगण, प्रख्यातपराक्रमी प्रमथगण तथा महादेवजीके समान तेजस्वी, महाबली भूतगण, जो नित्यमुक्त, उपमारहित, निर्द्वन्द्व, उपद्रवशून्य, शक्तियों और अनुचरोंके साथ रहनेवाले, सर्वलोकवन्दित, समस्त लोकोंकी सृष्टि और संहारमें समर्थ, परस्पर एक - दूसरेके अनुरक्त और भक्त, आपसमें अत्यन्त स्नेह रखनेवाले, एक - दूसरेको नमस्कार करनेवाले, शिवके नित्य प्रियतम, शिवके ही चिह्नोंसे लक्षित, सौम्य, घोर, उभय भावयुक्त, दोनोंके बीचमें रहनेवाले द्विरूप, कुरूप, सुरूप और नानारूपधारी हैं, वे शिव और शिवाकी आज्ञाका सत्कार करते हुए मेरा मनोरथ सिद्ध करें ॥ ९ १ – ९ ५१ / २ ॥ देवीकी प्रिय सखियोंका समुदाय, जो देवीके ही लक्षणोंसे लक्षित है और भगवान् शिवके तीसरे आवरणमें रुद्रकन्याओं तथा अनेक शक्तियोंसहित नित्य भक्तिभावसे पूजित हुआ है, वह शिव - पार्वतीकी आज्ञाका सत्कार करके मुझे मंगल प्रदान करे ॥ ९ ६ - ९ ७३ ॥

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१०२४ दिवाकरो महेशस्य मूर्तिर्दीप्तसुमण्डलः निर्गुणो गुणसङ्कीर्णस्तथैव गुणकेवलः अविकारात्मक श्चाद्य एकः सामान्यविक्रियः असाधारणकर्मा च सृष्टिस्थितिलयक्रमात् एवं त्रिधा चतुर्द्धा च विभक्तः पञ्चधा पुनः चतुर्थावरणे शम्भोः पूजितश्चानुगैः सह शिवप्रियः शिवासक्तः शिवपादार्चने रतः सत्कृत्य शिवयोराज्ञां स मे दिशतु मङ्गलम् दिवाकरषडङ्गानि दीप्ताद्याश्चाष्टशक्तयः आदित्यो भास्करो भानू रविश्चेत्यनुपूर्वशः अर्को ब्रह्मा तथा रुद्रो विष्णुश्चादित्यमूर्तयः ॥ विस्तरा सुतरा बोधिन्याप्यायिन्यपराः पुनः । उषा प्रभा तथा प्राज्ञा संध्या चेत्यपि शक्तयः सोमादिकेतुपर्यन्ता ग्रहाश्च शिवभाविताः । शिवयोराज्ञया नुन्ना मङ्गलं प्रदिशन्तु मे अथवा द्वादशादित्यास्तथा द्वादश शक्तयः ऋषयो देवगन्धर्वाः पन्नगाप्सरसां गणाः ग्रामण्यश्च तथा यक्षा राक्षसाश्च सुरास्तथा सप्त सप्तगणाश्चैते सप्तच्छन्दोमया हयाः वालखिल्यादयश्चैव सर्वे शिवपदार्चकाः सत्कृत्य शिवयोराज्ञां मङ्गलं प्रदिशन्तु मे ब्रह्माथ देवदेवस्य मूर्तिर्भूमण्डलाधिपः चतुःषष्टिगुणैश्वर्यो बुद्धितत्त्वे प्रतिष्ठितः निर्गुणो गुणसङ्कीर्णस्तथैव गुणकेवलः अविकारात्मको देवस्ततः साधारणः पुरः असाधारणकर्मा च सृष्टिस्थितिलयक्रमात् एवं त्रिधा चतुर्द्धा च विभक्तः पञ्चधा पुनः चतुर्थावरणे शम्भोः पूजितश्च सहानुगैः शिवप्रियः शिवासक्तः शिवपादार्चने रतः सत्कृत्य शिवयोराज्ञां स मे दिशतु मङ्गलम् । श्रीशिवमहापुराण [ अ ० ३१ सूर्य महेश्वरकी मूर्ति हैं, उनका ॥ ९ ८ भगवान् दीप्तिमान् है, वे निर्गुण होते हुए भी कल्याणमय सुन्दर | मण्डल । । गुणोंसे युक्त हैं, केवल सद्गुणरूप हैं; निर्विकार, सबके ॥ ९९ आदि कारण और एकमात्र ( अद्वितीय ) हैं; यह सामान्य उन्हींकी सृष्टि है; सृष्टि, पालन और संहार । । जगत् उनके कर्म असाधारण हैं; इस तरह वे तीन ॥ १०० क्रमसे, चार | और पाँच रूपोंमें विभक्त हैं; भगवान् शिवके चौथे आवरणमें । अनुचरोंसहित उनकी पूजा हुई है; वे शिवके प्रिय, शिवमें ॥ १०१ । ही आसक्त तथा शिवके चरणारविन्दोंकी अर्चनामें तत्पर । हैं; ऐसे सूर्यदेव शिवा और शिवकी आज्ञाका सत्कार करके मुझे मंगल प्रदान करें ॥ ९८–१०१३ ॥ ॥ १०२ सूर्यदेवसे सम्बन्ध रखनेवाले छहों अंग, उनकी । । दीप्ता आदि आठ शक्तियाँ, आदित्य, भास्कर, भानु, १०३ रवि, अर्क, ब्रह्मा, रुद्र तथा विष्णु - ये आठ आदित्यमूर्तियाँ और उनकी विस्तरा, सुतरा, बोधिनी, आप्यायिनी तथा । १०४ उनके अतिरिक्त उषा, प्रभा, प्राज्ञा और संध्या — ये शक्तियाँ; चन्द्रमासे लेकर केतुपर्यन्त शिवभावित ग्रह, ॥ १०५ बारह आदित्य, उनकी बारह शक्तियाँ तथा ऋषि, देवता, । गन्धर्व, नाग, अप्सराओंके समूह, ग्रामणी ( अगुवा ), ॥ १०६ यक्ष, राक्षस- ये सात - सात संख्यावाले गण, सात । छन्दोमय अश्व, वालखिल्य आदि मुनि - ये सब - के-॥ १०७ सब भगवान् शिवके चरणारविन्दोंकी अर्चना करनेवाले । हैं । ये लोग शिव और पार्वतीकी आज्ञाका आदर करते ॥ १०८ हुए मुझे मंगल प्रदान करें ॥ १०२ – १०८ ॥ ब्रह्माजी देवाधिदेव महादेवजीकी मूर्ति हैं ॥ भूमण्डलके अधिपति हैं । चौंसठ गुणोंके ऐश्वर्यसे युक्त ॥ १० ९ हैं और बुद्धितत्त्वमें प्रतिष्ठित हैं । वे निर्गुण होते हुए । भी अनेक कल्याणमय गुणोंसे सम्पन्न हैं, सद्गुणसमूहरूप हैं, निर्विकार देवता हैं, उनके सामने दूसरे सब लोग ॥ ११० साधारण हैं । सृष्टि, पालन और संहारके क्रमसे उनके । सब कर्म असाधारण हैं । इस तरह वे तीन, चार एवं ॥ १११ । पाँच आवरणों या स्वरूपोंमें विभक्त हैं । भगवान् | शिवके चौथे आवरणमें अनुचरोंसहित उनकी पूजा । । हुई है; वे शिवके प्रिय, शिवमें ही आसक्त तथा शिवके ॥ ११२ चरणारविन्दोंकी अर्चनामें तत्पर हैं; ऐसे ब्रह्मदेव शिवा और शिवकी आज्ञाका सत्कार करके मुझे मंगल प्रदान करें ॥ १० ९ -११२१ / २ ॥

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अ ० ३१ ] हिरण्यगर्भो लोकेशो सनत्कुमारः सनकः प्रजानां पतयश्चैव सपत्नीका एकादश शिवार्चनरताश्चैते शिवाज्ञावशगाः सर्वे वायवीयसंहिता विराट् कालश्च पूरुषः ॥ ११३

सनन्दश्च सनातनः ।

दक्षाद्या ब्रह्मसूनवः ॥ ११४

धर्मः सङ्कल्प एव च ।

शिवभक्तिपरायणाः ॥ ११५

दिशन्तु मम मङ्गलम् ।

चत्वारश्च तथा वेदाः सेतिहासपुराणकाः ॥ ११६

धर्मशास्त्राणि विद्याभिवैदिकीभिः समन्विताः ।

परस्पराविरुद्धार्थाः शिवप्रकृतिपादकाः ॥ ११७

सत्कृत्य शिवयोराज्ञां मङ्गलं प्रदिशन्तु मे ।

अथ रुद्रो महादेवः शम्भोर्मूर्तिर्गरीयसी ॥ ११८

वायमण्डलाधीशः पौरुषैश्वर्यवान् प्रभुः ।

शिवाभिमानसम्पन्नो निर्गुणस्त्रिगुणात्मकः ॥ ११ ९

केवलं सात्त्विकश्चापि राजसश्चैव तामसः ।

अविकाररतः पूर्वं ततस्तु समविक्रियः ॥ १२०

असाधारणकर्मा च सृष्ट्यादिकरणात्पृथक् ।

ब्रह्मणोऽपि शिरश्छेत्ता जनकस्तस्य तत्सुतः ॥ १२१

जनकस्तनयश्चापि विष्णोरपि नियामकः ।

बोधकश्च तयोर्नित्यमनुग्रहकरः प्रभुः ॥ १२२

अण्डस्यान्तर्बहिर्वर्ती रुद्रो लोकद्वयाधिपः ।

शिवप्रियः शिवासक्तः शिवपादार्चने रतः ॥ १२३

शिवस्याज्ञां पुरस्कृत्य स मे दिशतु मङ्गलम् ।

तस्य ब्रह्म षडङ्गानि विद्येशानां तथाष्टकम् ॥ १२४

चत्वारो मूर्तिभेदाश्च शिवपूर्वाः शिवार्चकाः ।

शिवो भवो हरश्चैव मृडश्चैव तथापरः ।

शिवस्याज्ञां पुरस्कृत्य मङ्गलं प्रदिशन्तु मे ॥ १२५

अथ विष्णुर्महेशस्य शिवस्यैव परा तनुः ।

वारितत्त्वाधिपः साक्षादव्यक्तपदसंस्थितः ॥ १२६

2224 Shivmahapuran_IInd Part_Section_34_1_Front ( उत्तरखण्ड ) १०२५ हिरण्यगर्भ, लोकेश, विराट् कालपुरुष, सनत्कुमार, सनक, सनन्दन, सनातन, दक्ष आदि ब्रह्मपुत्र, ग्यारह प्रजापति और उनकी पत्नियाँ, धर्म तथा संकल्प — ये सब - के - सब शिवकी अर्चनामें तत्पर रहनेवाले और शिवभक्तिपरायण हैं, अतः शिवकी आज्ञाके अधीन मुझे मंगल प्रदान करें ॥ ११३ - ११५१/२ ॥ हो चार वेद, इतिहास, पुराण, धर्मशास्त्र और वैदिक विद्याएँ — ये सब - के - सब एकमात्र शिवके स्वरूपका प्रतिपादन करनेवाले हैं; अतः इनका तात्पर्य एक - दूसरेके विरुद्ध नहीं है । ये सब शिव और शिवाकी आज्ञा शिरोधार्य

करके मेरा मंगल करें ॥। ११६-११७ई ॥

महादेव रुद्र शम्भुकी सबसे गरिष्ठ मूर्ति हैं । ये अग्निमण्डलके अधीश्वर हैं । समस्त पुरुषार्थों और ऐश्वर्योंसे सम्पन्न हैं, सर्वसमर्थ हैं । इनमें शिवत्वका अभिमान जाग्रत् है । ये निर्गुण होते हुए भी त्रिगुणरूप हैं । केवल सात्त्विक, राजस और तामस भी हैं । ये पहलेसे ही निर्विकार हैं । सब कुछ इन्हींकी सृष्टि है । सृष्टि, पालन और संहार करनेके कारण इनका कर्म असाधारण माना जाता है । ये ब्रह्माजीके भी मस्तकका छेदन करनेवाले हैं । ब्रह्माजीके पिता और पुत्र भी हैं । इसी तरह विष्णुके भी जनक और पुत्र हैं तथा उन्हें नियन्त्रणमें रखनेवाले हैं । ये उन दोनों - ब्रह्मा और विष्णुको ज्ञान देनेवाले तथा नित्य उनपर अनुग्रह रखनेवाले हैं ॥ ये प्रभु ब्रह्माण्डके भीतर और बाहर भी व्याप्त हैं तथा इहलोक और परलोक - दोनों लोकोंके अधिपति रुद्र हैं । ये शिवके प्रिय, शिवमें ही आसक्त तथा शिवके ही चरणारविन्दोंकी अर्चनामें तत्पर हैं, अतः शिवकी आज्ञाको सामने रखते हुए मेरा मंगल करें ॥ ११८-१२३१ / २ ॥ भगवान् शंकरके स्वरूपभूत ईशानादि ब्रह्म, हृदयादि छ: अंग, आठ विद्येश्वर, शिव आदि चार मूर्तिभेद – शिव, भव, हर और मृड - ये सब - के - सब शिवके पूजक हैं । ये लोग शिवकी आज्ञाको शिरोधार्य । करके मुझे मंगल प्रदान करें ॥ १२४-१२५ ॥ भगवान् विष्णु महेश्वर शिवके ही उत्कृष्ट स्वरूप हैं । वे जलतत्त्वके अधिपति और साक्षात् प्रतिष्ठित हैं । प्राकृत गुणोंसे रहित हैं । | अव्यक्त पदपर

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१०२६

निर्गुणः सत्त्वबहुलस्तथैव गुणकेवलः ।

अविकाराभिमानी च त्रिसाधारणविक्रियः ॥

असाधारणकर्मा च सृष्ट्यादिकरणात्पृथक् ।

दक्षिणाङ्गभवेनापि स्पर्धमानः स्वयम्भुवा ॥

आद्येन ब्रह्मणा साक्षात्सृष्टः स्रष्टा च तस्य तु ।

अण्डस्यान्तर्बहिर्वर्ती विष्णुर्लोकद्वयाधिपः ॥

असुरान्तकरश्चक्री शक्रस्यापि तथानुजः 1 प्रादुर्भूतश्च दशधा भृगुशापच्छलादिह ॥

भूभारनिग्रहार्थाय स्वेच्छ्यावातरत् क्षितौ ।

अप्रमेयबलो मायी मायया मोहयन् जगत् ॥

मूर्ति कृत्वा महाविष्णुं सदाविष्णुमथापि वा ।

वैष्णवैः पूजितो नित्यं मूर्तित्रयमयासने ॥

शिवप्रियः शिवासक्तः शिवपादार्चने रतः ।

शिवस्याज्ञां पुरस्कृत्य स मे दिशतु मङ्गलम् ॥

वासुदेवोऽनिरुद्धश्च प्रद्युम्नश्च ततः परः ।

सङ्कर्षणः समाख्याताश्चतस्रो मूर्तयो हरेः ॥

मत्स्यः कूर्मो वराहश्च नारसिंहोऽथ वामनः ।

रामत्रयं तथा कृष्णो विष्णुस्तुरगवक्त्रकः ॥

चक्रं नारायणस्यास्त्रं पाञ्चजन्यं च शार्ङ्गकम् ।

सत्कृत्य शिवयोराज्ञां मङ्गलं प्रदिशन्तु मे ॥

प्रभा सरस्वती गौरी लक्ष्मीश्च शिवभाविता ।

शिवयोः शासनादेता मङ्गलं प्रदिशन्तु मे ॥

इन्द्रोऽग्निश्च यमश्चैव निरृतिर्वरुणस्तथा ।

वायुः सोमः कुबेरश्च तथेशानस्त्रिशूलधृक् ॥

सर्वे शिवार्चनरताः शिवसद्भावभाविताः ।

सत्कृत्य शिवयोराज्ञां मङ्गलं प्रदिशन्तु मे ॥

त्रिशूलमथ वज्रं च तथा परशुसायकौ ।

खड्गपाशाङ्कुशाश्चैव पिनाकश्चायुधोत्तमः ॥

श्रीशिवमहापुराण [ अ ० ३१ उनमें दिव्य सत्त्वगुणकी प्रधानता है तथा वे विशुद्ध हैं । उनमें निर्विकाररूपताका अभिमान १२७ गुणस्वरूप तीनों लोक उनकी कृति हैं । सृष्टि है । | साधारणतया, पालन | आदि करनेके कारण उनके कर्म असाधारण हैं प्रकट हुए स्वयम्भूके साथ एक सपवे । वे १२८ रुद्रके दक्षिणांगसे । स्पर्धा कर चुके हैं । साक्षात् आदिब्रह्माद्वारा उत्पादित । होकर भी वे उनके भी उत्पादक हैं । ब्रह्माण्डके भीतर १२ ९ और बाहर व्याप्त हैं । इसलिये विष्णु कहलाते हैं । दोनों लोकोंके अधिपति हैं । असुरोंका अन्त करनेवाले, । चक्रधारी तथा इन्द्रके भी छोटे भाई हैं । दस अवतारविग्रहों के १३० रूपमें यहाँ प्रकट हुए हैं । भृगुके शापके बहाने पृथ्वीका | भार उतारनेके लिये उन्होंने स्वेच्छासे इस भूतलपर । अवतार लिया है । उनका बल अप्रमेय है । वे मायावी १३१ हैं और अपनी मायाद्वारा जगत्‌को मोहित करते हैं । उन्होंने महाविष्णु अथवा सदाविष्णुका रूप धारण १३२ करके त्रिमूर्तिमय आसनपर वैष्णवोंद्वारा नित्य पूजा प्राप्त की है । वे शिवके प्रिय, शिवमें ही आसक्त तथा शिवके चरणोंकी अर्चनामें तत्पर हैं । वे शिवकी आज्ञा १३३ शिरोधार्य करके मुझे मंगल प्रदान करें १२६–१३३ ॥ वासुदेव, अनिरुद्ध, प्रद्युम्न तथा संकर्षण - ये १३४ श्रीहरिकी चार विख्यात मूर्तियाँ ( व्यूह ) हैं । मत्स्य, कूर्म, वराह, नृसिंह, वामन, परशुराम, राम, बलराम, श्रीकृष्ण, १३५ विष्णु, हयग्रीव, चक्र, नारायणास्त्र, पांचजन्य तथा शार्ङ्गधनुष – ये सब - के - सब शिव और शिवाकी आज्ञाका १३६ सत्कार करते हुए मुझे मंगल प्रदान करें ॥ १३४–१३६ ॥ प्रभा, सरस्वती, गौरी तथा शिवके प्रति भक्तिभाव रखनेवाली लक्ष्मी – ये शिव और शिवाके १३७ आदेशसे मेरा मंगल करें ॥ १३७ ॥

इन्द्र, अग्नि, यम, निरृति, वरुण, वायु, सोम, १३८ कुबेर तथा त्रिशूलधारी ईशान – ये सब - के - सब शिवसद्भावसे भावित होकर शिवार्चनमें तत्पर रहते हैं । | ये शिव और शिवाकी आज्ञाका आदर मानकर मुझे १३ ९ मंगल प्रदान करें ॥ १३८-१३९ ॥ त्रिशूल, वज्र, परशु, बाण, खड्ग, पाश, अंकुश १४० और श्रेष्ठ आयुध पिनाक -ये महादेव तथा महादेवीके दिव्यायुधानि देवस्य देव्याश्चैतानि नित्यशः । 15 दिव्य आयुध शिव और शिवाकी आज्ञाका त्य सत्कृत्य शिवयोराज्ञां रक्षां कुर्वन्तु मे सदा ॥ १४१ सत्कार करते हुए सदा मेरी रक्षा करें ॥ १४०-१४१ ॥ 2224 Shivmahapuran_IInd Part_Section_34_1_Back