श्रीगणेशाय नमः।

शिव महापुराण - २ — पृष्ठ 1041–1050

शिव महापुराण - २ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 1041–1050

पृष्ठ 1041

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अ ० ३१ ] वायवीयसहिता

वृषरूपधरो देवः सौरभेयो महाबलः ।

वडवाख्यानलस्पद्ध पञ्चगोमातृभिर्वृतः ॥ १४२

वाहनत्वमनुप्राप्तस्तपसा परमेशयोः ।

तयोराज्ञा पुरस्कृत्य स मे कामं प्रयच्छतु ॥ १४३।

नन्दा सुनन्दा सुरभिः सुशीला सुमनास्तथा ।

पञ्च गोमातरस्त्वेताः शिवलोके व्यवस्थिताः ॥ १४४

शिवभक्तिपरा नित्यं शिवार्चनपरायणाः ।

शिवयोः शासनादेव दिशन्तु मम वाञ्छितम् ॥ १४५

क्षेत्रपालो महातेजा नीलजीमूतसंनिभः ।

दंष्ट्राकरालवदनः स्फुरद्रक्ताधरोज्ज्वलः ॥ १४६

रक्तोर्ध्वमूर्द्धजः श्रीमान् भ्रुकुटीकुटिलेक्षणः ।

रक्तवृत्तत्रिनयनः शशिपन्नगभूषणः ॥ १४७

नग्नस्त्रिशूलपाशासिकपालोद्यतपाणिकः ।

भैरवो भैरवैः सिद्धैर्योगिनीभिश्च संवृतः ॥ १४८

क्षेत्रे क्षेत्रे समासीनः स्थितो यो रक्षकः सताम् ।

शिवप्रणामपरमः शिवसद्भावभावितः ॥ १४ ९

शिवाश्रितान् विशेषेण रक्षन् पुत्रानिवौरसान् ।

सत्कृत्य शिवयोराज्ञां स मे दिशतु मङ्गलम् ॥ १५०

तालजङ्घादयस्तस्य प्रथमावरणेऽर्चिताः ।

सत्कृत्य शिवयोराज्ञां चत्वारः समवन्तु माम् ॥ १५१

भैरवाद्याश्च ये चान्ये समन्तात्तस्य वेष्टिताः ।

तेऽपि मामनुगृह्णन्तु शिवशासनगौरवात् ॥ १५२

2224 Shivmahapuran_IInd Part_Section_34_2_Front ( उत्तरखण्ड ) १०२७ वृषभरूपधारी देव, जो सुरभिके महाबली पुत्र हैं, वडवानलसे भी होड़ लगाते हैं, पाँच गोमाताओंसे घिरे रहते हैं और अपनी तपस्याके प्रभावसे परमेश्वर शिव तथा परमेश्वरी शिवाके वाहन हुए हैं, उन दोनोंकी आज्ञा शिरोधार्य करके मेरी इच्छा पूर्ण करें ॥ १४२-१४३ ॥ नन्दा, सुनन्दा, सुरभि, सुशीला और सुमना - ये पाँच गोमाताएँ सदा शिवलोकमें निवास करती हैं । ये सब - की - सब नित्य शिवार्चनमें लगी रहती हैं और शिवभक्ति - परायणा हैं, अतः शिव तथा शिवाके आदेशसे ही मेरी इच्छाकी पूर्ति करें॥१४४-१४५॥ क्षेत्रपाल महान् तेजस्वी हैं, उनकी अंगकान्ति नील मेघके समान है और मुख दाढ़ोंके कारण विकराल जान पड़ता है । उनके लाल - लाल ओठ फड़कते रहते हैं, जिससे उनकी शोभा बढ़ जाती है, उनके सिरके बाल भी लाल और ऊपरको उठे हुए हैं । वे तेजस्वी हैं, उनकी भौंहें तथा आँखें भी टेढ़ी ही हैं । वे लाल और गोलाकार तीन नेत्र धारण करते हैं । चन्द्रमा और सर्प उनके आभूषण हैं । वे सदा नंगे ही रहते हैं तथा उनके हाथोंमें त्रिशूल, पाश, खड्ग और कपाल उठे रहते हैं । वे भैरव हैं और भैरवों, सिद्धों तथा योगिनियोंसे घिरे रहते हैं । प्रत्येक क्षेत्रमें उनकी स्थिति है । वे वहाँ सत्पुरुषोंके रक्षक होकर रहते हैं । उनका मस्तक सदा शिवके चरणोंमें झुका रहता है, वे सदा शिवके सद्भावसे भावित हैं तथा शिवके शरणागत भक्तोंकी औरस पुत्रोंकी भाँति विशेष रक्षा करते हैं । ऐसे प्रभावशाली क्षेत्रपाल शिव और शिवाकी आज्ञाका सत्कार करते हुए मुझे मंगल प्रदान करें ॥१४६–१५० ॥ तालजंघ आदि शिवके प्रथम आवरणमें पूजित हुए हैं, वे चारों देवता शिवकी आज्ञाका आदर करके मेरी रक्षा करें ॥ १५१ ॥

जो भैरव आदि तथा दूसरे लोग शिवको सब ओरसे घेरकर स्थित हैं,, वे भी शिवके आदेशका । गौरव मानकर मुझपर अनुग्रह करें ॥ १५२ ॥

पृष्ठ 1042

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( १०२८ मुनयो दिव्या देवैश्च पूजिताः । नारदाद्याश्च साध्या नागाश्च ये देवा जनलोकनिवासिनः महर्लोकनिवासिनः । विनिवृत्ताधिकाराश्च सप्तर्षयस्तथान्ये वै वैमानिकगणैः सह ॥

सर्वे शिवार्चनरताः शिवाज्ञावशवर्तिनः ।

शिवयोराज्ञया मह्यं दिशन्तु समकाङ्क्षितम् ॥

गन्धर्वाद्याः पिशाचान्ताश्चतस्त्रो देवयोनयः ।

सिद्धा विद्याधराद्याश्च येऽपि चान्ये नभश्चराः ॥

असुरा राक्षसाश्चैव पातालतलवासिनः ।

अनन्ताद्याश्च नागेन्द्रा वैनतेयादयो द्विजाः ॥

कूष्माण्डाः प्रेतवेताला ग्रहा भूतगणाः परे ।

डाकिन्यश्चापि योगिन्यः शाकिन्यश्चापि तादृशाः ॥

क्षेत्रारामगृहादीनि तीर्थान्यायतनानि च ।

द्वीपाः समुद्रा नद्यश्च नदाश्चान्ये सरांसि च ॥

गिरयश्च सुमेर्वाद्याः काननानि समन्ततः ।

पशवः पक्षिणो वृक्षाः कृमिकीटादयो मृगाः ॥

भुवनान्यपि सर्वाणि भुवनानामधीश्वराः ।

अण्डान्यावरणैः सार्धमासाश्च दश दिग्गजाः ॥

वर्णाः पदानि मन्त्राश्च तत्त्वान्यपि सहाधिपैः ।

ब्रह्माण्डधारका रुद्रा रुद्राश्चान्ये सशक्तिकाः ॥

यच्च किञ्चिज्जगत्यस्मिन्दृष्टं चानुमितं श्रुतम् ।

सर्वे कामं प्रयच्छन्तु शिवयोरेव शासनात् ॥

अथ विद्या परा शैवी पशुपाशविमोचिनी ।

पञ्चार्थसंज्ञिता दिव्या पशुविद्याबहिष्कृता ॥

शास्त्रं च शिवधर्माख्यं धर्माख्यं च तदुत्तरम् ।

शैवाख्यं शिवधर्माख्यं पुराणं श्रुतिसम्मितम् ॥

शैवागमाश्च ये चान्ये कामिकाद्याश्चतुर्विधाः ।

शिवाभ्यामविशेषेण सत्कृत्येह समर्चिताः ॥

ताभ्यामेव समाज्ञाता ममाभिप्रेतसिद्धये ।

कर्मेदमनुमन्यन्तां सफलं साध्वनुष्ठितम् ॥

श्वेताद्या नकुलीशान्ताः सशिष्याश्चापि देशिकाः ।

तत्सन्ततीया गुरवो विशेषाद् गुरवो मम ॥

शैवा माहेश्वराश्चैव ज्ञानकर्मपरायणाः कर्मेदमनुमन्यन्तां सफलं साध्वनुष्ठितम् ॥ श्रीशिवमहापुराण [ अ ० ३१ नारद आदि देवपूजित दिव्य मुनि, साध्य ॥ १५३ नाग, जनलोकनिवासी देवता, विशेषाधिकारसे सम्पन्न, | महर्लोकनिवासी, सप्तर्षि तथा अन्य वैमानिकगण १५४ सदाशिवकी अर्चनामें तत्पर रहते हैं । ये सब शिवकी | आज्ञाके अधीन हैं, अतः शिवा और शिवकी आज्ञासे १५५ मुझे मनोवांछित वस्तु प्रदान करें ॥ १५३ - १५५ गन्धर्वोंसे लेकर पिशाचपर्यन्त जो चार देवयोनियाँ ॥ १५६ हैं, जो सिद्ध, विद्याधर, अन्य | राक्षस, पातालतलवासी अनन्त १५७ आदि दिव्य पक्षी, कूष्माण्ड, | भूतगण, डाकिनियाँ, योगिनियाँ, १५८ ही और स्त्रियाँ, क्षेत्र, आराम तीर्थ, देवमन्दिर, द्वीप, समुद्र, १५ ९ आकाशचारी, असुर आदि नागराज, , गरुड प्रेत, वेताल, ग्रह, शाकिनियाँ तथा वैसी ( बगीचे ), गृह आदि नदियाँ, नद, सरोवर, सुमेरु आदि पर्वत, सब ओर फैले हुए वन, पशु, पक्षी, १६० वृक्ष, कृमि, कीट आदि, मृग, समस्त भुवन, भुवनेश्वर, आवरणोंसहित ब्रह्माण्ड, बारह मास, दस दिग्गज, १६१ वर्ण, पद, मन्त्र, तत्त्व, उनके अधिपति, ब्रह्माण्डधारक रुद्र, अन्य रुद्र और उनकी शक्तियाँ तथा इस जगत्में १६२ कुछ भी देखा, सुना और अनुमान किया हुआ है - ये सब - के - सब शिवा और शिवकी आज्ञासे मेरा १६३ मनोरथ पूर्ण करें ॥ १५६–१६३ ॥ जो पंच - पुरुषार्थस्वरूपा होनेसे पंचार्था कही गयी है, जिसका स्वरूप दिव्य है तथा जो पशुविद्याकी १६४ कोटिसे बाहर है, वह पशुओंको पाशसे मुक्त करनेवाली शैवी परा विद्या, शिवधर्मशास्त्र, शैवधर्म, श्रुतिसम्मत १६५ शिवसंज्ञकपुराण, शैवागम तथा धर्मकामादि चतुर्विध पुरुषार्थ, जिन्हें शिव और शिवाके समान ही मानकर १६६ उन्हींके समान पूजा दी गयी है, उन्हीं दोनोंकी आज्ञा लेकर मेरे अभीष्टकी सिद्धिके लिये इस कर्मका अनुमोदन करें, इसे सफल और सुसम्पन्न घोषित १६७ करें ॥ १६४–१६७ ॥ श्वेतसे लेकर नकुलीशपर्यन्त, शिष्य - सहित १६८ आचार्यगण, उनकी संतानपरम्परामें उत्पन्न गुरुजन, | विशेषत: मेरे गुरु, शैव, माहेश्वर, जो ज्ञान और कर्ममें क | तत्पर रहनेवाले हैं, मेरे इस कर्मको सफल और १६ ९ | सुसम्पन्न मानें ॥ १६८-१६९ ॥ 2224 Shivmahapuran_IInd Part_Section_34_2_Back

पृष्ठ 1043

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अ ० ३१ ] वायवीयसहिता

लौकिका ब्राह्मणाः सर्वे क्षत्रियाश्च विशः क्रमात् ।

वेदवेदाङ्गतत्त्वज्ञाः सर्वशास्त्रविशारदाः ॥ १७०

सांख्या वैशेषिकाचैव यौगा नैयायिका नराः ।

सौरा ब्राह्मास्तथा रौद्रा वैष्णवाश्चापरे नराः ॥ १७१

शिष्टाः सर्वे विशिष्टाश्च शिवशासनयन्त्रिताः ।

कर्मेदमनुमन्यन्तां ममाभिप्रेतसाधकम् ॥ १७२ ।

शैवाः सिद्धान्तमार्गस्थाः शैवाः पाशुपतास्तथा ।

शैवा महाव्रतधराः शैवाः कापालिकाः परे ॥ १७३

शिवाज्ञापालकाः पूज्या ममापि शिवशासनात् ।

सर्वे मामनुगृह्णन्तु शंसन्तु सफलक्रियाम् ॥ १७४

दक्षिणज्ञाननिष्ठाश्च दक्षिणोत्तरमार्गगाः ।

अविरोधेन वर्तन्तां मन्त्रं श्रेयोऽर्थिनो मम ॥ १७५

नास्तिकाश्च शठाश्चैव कृतघ्नाश्चैव तामसाः ।

पाषण्डाश्चातिपापाश्च वर्तन्तां दूरतो मम ॥ १७६

बहुभिः किं स्तुतैरत्र येऽपि केऽपि चिदास्तिकाः ।

सर्वे मामनुगृह्णन्तु सन्तः शंसन्तु मङ्गलम् ॥ १७७

नमः शिवाय साम्बाय ससुतायादिहेतवे ।

पञ्चावरणरूपेण प्रपञ्चेनावृताय ते ॥ १७८

इत्युक्त्वा दण्डवद् भूमौ प्रणिपत्य शिवं शिवाम् ।

जपेत्पञ्चाक्षरीं विद्यामष्टोत्तरशतावराम् ॥ १७ ९

तथैव शक्तिविद्यां च जपित्वा तत्समर्पणम् ।

कृत्वा तं क्षमयित्वेशं पूजाशेषं समापयेत् ॥ १८०

एतत्पुण्यतमं स्तोत्रं शिवयोर्हृदयङ्गमम् ।

सर्वाभीष्टप्रदं साक्षाद्भुक्तिमुक्त्यैकसाधनम् ॥ १८१

य इदं कीर्तयेन्नित्यं शृणुयाद्वा समाहितः ।

सविधूयाशु पापानि शिवसायुज्यमाप्नुयात् ॥ १८२

( उत्तरखण्ड ) १०२ ९ लौकिक ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, वेदवेदांगोंके तत्त्वज्ञ विद्वान्, सर्वशास्त्रकुशल सांख्यवेत्ता वैशेषिक योगशास्त्रके आचार्य, नैयायिक,, सूर्योपासक,, शैव वैष्णव, ब्रह्मोपासक, , तथा अन्य सब शिष्ट और विशिष्ट पुरुष शिवकी आज्ञाके अधीन हो मेरे इस कर्मको अभीष्टसाधक मानें ॥ १७०–१७२ ॥ सिद्धान्तमार्गी शैव, पाशुपत शैव, महाव्रतधारी शैव तथा अन्य कापालिक शैव - ये सब - के - सब शिवकी आज्ञाके पालक तथा मेरे भी पूज्य हैं । अतः शिवकी आज्ञासे इन सबका मुझपर अनुग्रह हो और वे इस कार्यको सफल घोषित करें ॥ १७३-१७४ ॥ जो दक्षिणाचारके ज्ञानमें परिनिष्ठ तथा दक्षिणाचारके उत्कृष्ट मार्गपर चलनेवाले हैं, वे परस्पर विरोध न रखते हुए मन्त्रका जप करें और मेरे कल्याणकामी हों ॥ १७५ ॥

नास्तिक, शठ, कृतघ्न, तामस, पाखण्डी और अति पापी प्राणी मुझसे दूर ही रहें । यहाँ बहुतोंकी स्तुतिसे क्या लाभ? जो कोई भी आस्तिक संत हैं, वे सब मुझपर अनुग्रह करें और मेरे मंगल होनेका आशीर्वाद दें॥१७६-१७७ ॥ जो पंचावरणरूपी प्रपंचसे घिरे हुए हैं और सबके आदि कारण हैं, उन आप पुत्रसहित साम्ब सदाशिवको मेरा नमस्कार है ॥१७८ ॥

ऐसा कहकर शिव और शिवाके उद्देश्यसे भूमिपर दण्डकी भाँति गिरकर प्रणाम करे और कम-से - कम एक सौ आठ बार पंचाक्षरी विद्याका जप करे । इसी प्रकार शक्तिविद्या ( ॐ नमः शिवायै ) का जप करके उसका समर्पण करे और महादेवजीसे क्षमा माँगकर शेष पूजाकी समाप्ति करे ॥ १७ ९ -१८० ॥ यह परम पुण्यमय स्तोत्र शिव और शिवाके हृदयको अत्यन्त प्रिय है, सम्पूर्ण मनोरथोंको देने-वाला है और भोग तथा मोक्षका एकमात्र साक्षात् साधन है ॥१८१ ॥

जो एकाग्रचित्त हो प्रतिदिन इसका कीर्तन अथवा श्रवण करता है, वह सारे पापोंको शीघ्र ही धो - बहाकर भगवान् शिवका सायुज्य प्राप्त कर लेता शेक | है ॥ १८२ ॥

पृष्ठ 1044

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१०३०

गोघ्नश्चैव कृतघ्नश्च वीरहा भ्रूणहापि वा ।

शरणागतघाती च मित्रविश्रम्भघातकः ॥

मातृहा पितृहापि वा । दुष्टपापसमाचारो स्तवेनानेन जप्तेन तत्तत्पापात् प्रमुच्यते ॥ भयेषु च । दुःस्वप्नादिमहानर्थसूचकेषु यदि सङ्कीर्तयेदेतन्न ततोऽनर्थभाग्भवेत् ॥

आयुरारोग्यमैश्वर्यं यच्चान्यदपि वाञ्छितम् ।

स्तोत्रस्यास्य जपे तिष्ठंस्तत्सर्वं लभते नरः ॥

असम्पूज्य शिवं स्तोत्रं जपात्फलमुदाहृतम् ।

सम्पूज्य च जपे तस्य फलं वक्तुं न शक्यते ॥

आस्तामियं फलावाप्तिरस्मिन् सङ्कीर्तिते सति ।

सार्धमम्बिकया देवः श्रुत्वैव दिवि तिष्ठति ॥

तस्मान्नभसि सम्पूज्य देवदेवं सहोमया ।

कृताञ्जलिपुटस्तिष्ठन् स्तोत्रमेतदुदीरयेत् ॥

श्रीशिवमहापुराण [ अ ० ३२ जो गोहत्यारा, कृतघ्न, वीरघाती, गर्भस्थ शिशुकी हत्या करनेवाला, शरणागतका वध करनेवाला १८३ | और मित्रके प्रति विश्वासघाती है, दुराचार और | पापाचारमें ही लगा रहता है तथा माता और पिताका १८४ भी घातक है, वह भी इस स्तोत्रके जपसे तत्काल पाप - मुक्त हो जाता है ॥ १८३-१८४ ॥ दुःस्वप्न आदि महान् अनर्थसूचक भयके उपस्थित | होनेपर यदि मनुष्य इस स्तोत्रका कीर्तन करे तो वह १८५ । कदापि अनर्थका भागी नहीं हो सकता ॥ १८५ ॥

आयु, आरोग्य, ऐश्वर्य तथा और जो भी | मनोवांछित वस्तु है, उन सबको इस स्तोत्रके जपमें १८६ । संलग्न रहनेवाला पुरुष प्राप्त कर लेता है ॥ १८६ ॥

• शिवकी पूर्वोक्त पूजा न करके केवल स्तोत्रका १८७ पाठ करनेसे जो फल मिलता है, उसको यहाँ बताया गया है; परंतु शिवकी पूजा करके इस स्तोत्रका पाठ करनेसे जो फल मिलता है, उसका तो वर्णन ही नहीं किया जा सकता ॥ १८७ ॥

यह फलकी प्राप्ति अलग रहे, इस स्तोत्रका १८८ कीर्तन करनेपर इसे सुनते ही माता पार्वतीसहित महादेवजी आकाशमें आकर खड़े हो जाते हैं । अत: उस समय उमासहित देवदेव महादेवकी आकाशमें पूजा करके दोनों हाथ जोड़ खड़ा हो जाय और इस १८ ९ स्तोत्रका पाठ करे ॥ १८८-१८९ ॥ इति श्रीशिवमहापुराणे सप्तम्यां वायवीयसंहितायामुत्तरखण्डे शिवमहास्तोत्रवर्णनं नामैकत्रिंशोऽध्यायः ॥ ३१ ॥

॥ इस प्रकार श्रीशिवमहापुराणके अन्तर्गत सातवीं वायवीयसंहिताके उत्तरखण्डमें शिवमहास्तोत्रवर्णन नामक इकतीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ३१ ॥

अथ द्वात्रिंशोऽध्यायः ऐहिक फल देनेवाले कर्मों और उनकी विधिका वर्णन, शिव - पूजनकी विधि, शान्ति - पुष्टि आदि विविध काम्य कर्मोंमें विभिन्न हवनीय पदार्थोंके उपयोगका विधान उपमन्युरुवाच उपमन्यु कहते हैं - हे श्रीकृष्ण! यह मैंने तुमसे एतत्ते कथितं कृष्ण कर्मेहामुत्र सिद्धिदम् । इहलोक और परलोकमें सिद्धि प्रदान करनेवाला क्रम क्रियातपोजपध्यानसमुच्चयमयं परम् ॥ १ बताया है, जो उत्तम तो है ही, इसमें क्रिया, जप, तप और ध्यानका समुच्चय भी है ॥१ ॥

अब मैं शिव - भक्तोंके लिये यहीं फल देनेवाले अथ वक्ष्यामि शैवानामिहैव फलदं नृणाम् । पूजन, होम, जप ध्यान तप और दानमय महान् पूजाहोमजपध्यानतपोदानमयं,, ज्ञाताको महत् ॥ २ कर्मका वर्णन करता हूँ । मन्त्रार्थके श्रेष्ठ

पृष्ठ 1045

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अ ० ३२ ] वायवीयसहिता

तत्र संसाधयेत्पूर्वं मन्त्रं मन्त्रार्थवित्तमः ।

दृष्टसिद्धिकरं कर्म नान्यथा फलदं यतः ॥ ३

सिद्धमन्त्रोऽप्यदृष्टेन प्रबलेन तु केनचित् ।

प्रतिबन्धफलं कर्म न कुर्यात्सहसा बुधः ॥ ४ ।

तस्य तु प्रतिबन्धस्य कर्तुं शक्येह निष्कृतिः ।

परीक्ष्य शकुनाद्यैस्तदादौ निष्कृतिमाचरेत् ॥ ५

योऽन्यथा कुरुते मोहात्कमैहिकफलं नरः ।

न तेन फलभाक्स स्यात्प्राप्नुयाच्चोपहास्यताम् ॥ ६

अविस्रब्धो न कुर्वीत कर्म दृष्टफलं क्वचित् ।

स खल्वश्रद्दधानः स्यान्नाश्रद्धः फलमृच्छति ॥ ७

नापराधोऽस्ति देवस्य कर्मण्यपि तु निष्फले ।

यथोक्तकारिणां पुंसामिहैव फलदर्शनात् ॥ ८

साधकः सिद्धमन्त्रश्च निरस्तप्रतिबंधकः ।

विश्वस्तः श्रद्दधानश्च कुर्वन्नाप्नोति तत्फलम् ॥ ९

अथवा तत्फलावाप्त्यै ब्रह्मचर्यरतो भवेत् ।

रात्रौ हविष्यमश्नीयात्पायसं वा फलानि वा ॥ १०

हिंसादि यन्निषिद्धं स्यान्न कुर्यान्मनसापि तत् ।

सदा भस्मानुलिप्ताङ्गः सुवेषश्च शुचिर्भवेत् ॥ ११

इत्थमाचारवान्भूत्वा स्वानुकूले शुभेऽहनि ।

पूर्वोक्तलक्षणे देशे पुष्पदामाद्यलंकृते ॥ १२

आलिप्य शकृता भूमिं हस्तमानावरां यथा ।

विलिखेत्कमले भद्रे दीप्यमानं स्वतेजसा ॥ १३

तप्तजाम्बूनदमयमष्टपत्रं सकेसरम् ।

मध्ये कर्णिकया युक्तं सर्वरत्नैरलंकृतम् ॥१४

स्वाकारसदृशेनैव नालेन च समन्वितम् । ( उत्तरखण्ड ) १०३१ चाहिये कि वह पहले मन्त्रको सिद्ध करे, अन्यथा इष्टसिद्धिकारक कर्म भी फलद नहीं होता ॥ २-३ ॥ मन्त्र सिद्ध कर लेनेपर भी, जिस कर्मका फल किसी प्रबल अदृष्टके कारण प्रतिबद्ध हो, उसे विद्वान् पुरुष सहसा न करे । उस प्रतिबन्धकका यहाँ निवारण किया जा सकता है । कर्म करनेके पहले ही शकुन आदि करके उसकी परीक्षा कर ले और प्रतिबन्धकका पता लगनेपर उसे दूर करनेका प्रयत्न करे॥४-५ ॥ जो मनुष्य ऐसा न करके मोहवश ऐहिक फल देनेवाले कर्मका अनुष्ठान करता है, वह उससे फलका भागी नहीं होता और जगत्में उपहासका पात्र बनता है । जिस पुरुषको विश्वास न हो, वह ऐहिक फल देनेवाले कर्मका अनुष्ठान कभी न करे; क्योंकि उसके मनमें श्रद्धा नहीं रहती और श्रद्धाहीन पुरुषको उस कर्मका फल नहीं मिलता॥६-७ ॥ किया कर्म निष्फल हो जाय, तो भी उसमें देवताका कोई अपराध नहीं है; क्योंकि शास्त्रोक्त विधिसे ठीक - ठीक कर्म करनेवाले पुरुषोंको यहीं फलकी प्राप्ति देखी जाती है ॥८ ॥

जिसने मन्त्रको सिद्ध कर लिया है, प्रतिबन्धकको दूर कर दिया है, मन्त्रपर विश्वास रखता है और मनमें श्रद्धासे युक्त है, वह साधक कर्म करनेपर उसके फलको अवश्य पाता है॥९॥

उस कर्मके फलकी प्राप्तिके लिये ब्रह्मचर्यपरायण होना चाहिये । रातमें हविष्य भोजन करे, खीर या फल खाकर रहे, हिंसा आदि जो निषिद्ध कर्म हैं, उन्हें मनसे भी न करे, सदा अपने शरीरमें भस्म लगाये, सुन्दर एवं पवित्र वेषभूषा धारण करे और पवित्र रहे ॥ १०-११ ॥ इस प्रकार आचारवान् होकर अपने अनुकूल शुभ दिनमें पुष्पमाला आदिसे अलंकृत पूर्वोक्त लक्षणवाले स्थानमें एक हाथ भूमिको गोबरसे लीपकर वहाँ बिछे हुए भद्रासनपर कमल अंकित करे, जो अपने तेजसे प्रकाशमान हो ॥ १२-१३ ॥ वह तपाये हुए सुवर्णके समान रंगवाला हो । उसमें आठ दल हों और केसर भी बना हो । मध्यभागमें वह कर्णिकासे युक्त और सम्पूर्ण रत्नोंसे अलंकृत हो । उसमें अपने आकारके समान ही नाल

पृष्ठ 1046

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१०३२ तादृशे स्वर्णनिर्माणे कंदे सम्यग्विधानतः तत्राणिमादिकं सर्वं संकल्प्य मनसा पुनः रत्नजं वाथ सौवर्णं स्फटिकं वा सलक्षणम् लिङ्गं सवेदिकं चैव स्थापयित्वा विधानतः तत्रावाह्य यजेद्देवं साम्बं सगणमव्ययम् तत्र माहेश्वरी कल्प्या मूर्तिर्मूर्तिमतः प्रभोः चतुर्भुजा चतुर्वक्त्रा सर्वाभरणभूषिता शार्दूलचर्मवसना किञ्चिद्विहसितानना

वरदाभयहस्ता च मृगटङ्कधरा तथा ।

अथवाष्टभुजा चिन्त्या चिन्तकस्य यथारुचि ॥

तदा त्रिशूलपरशुखड्गवज्राणि दक्षिणे ।

वामे पाशांकुशौ तद्वत्खेटं नागं च बिभ्रती ॥

बालार्कसदृशप्रख्या प्रतिवक्त्रं त्रिलोचना ।

तस्याः पूर्वमुखं सौम्यं स्वाकारसदृशप्रभम् ॥

दक्षिणं नीलजीमूतसदृशं घोरदर्शनम् ।

उत्तरं विद्रुमप्रख्यं नीलालकविभूषितम् ॥

पश्चिमं पूर्णचन्द्राभं सौम्यमिन्दुकलाधरम् ।

तदङ्कमंडलारूढा शक्तिर्माहेश्वरी परा ॥

महालक्ष्मीरिति ख्याता श्यामा सर्वमनोहरा ।

मूर्ति कृत्वैवमाकारां सकलीकृत्य च क्रमात् ॥

मूर्तिमन्तमथावाह्य यजेत्परमकारणम् ।

स्नानार्थे कल्पयेत्तत्र पञ्चगव्यं तु कापिलम् ॥

पञ्चामृतं च पूर्णानि बीजानि च विशेषतः ।

पुरस्तान्मण्डलं कृत्वा रत्नचूर्णाद्यलंकृतम् ॥

श्रीशिवमहापुराण [ अ ० ३२ होनी चाहिये । वैसे स्वर्णनिर्मित कमलपर सम्यग्विधिसे ॥ १५ अणिमा आदि सब सिद्धियोंकी | मन - ही - मन भावना । करे । फिर उसपर रत्नका, सोनेका अथवा स्फटिक । । मणिका उत्तम लक्षणोंसे युक्त वेदीसहित शिवलिंग ॥ १६ स्थापित करे ॥ १४–१६ ॥ उसमें विधि - पूर्वक पार्षदोंसहित अविनाशी साम्ब । । सदाशिवका आवाहन और पूजन करे । फिर वहाँ ॥ १७ । साकार भगवान् महेश्वरकी भावनामयी मूर्तिका निर्माण करे, जिसके चार भुजाएँ और चार मुख हों । वह सब । आभूषणोंसे विभूषित हो, उसे व्याघ्रचर्म पहनाया गया ॥ १८ हो । उसके मुखपर कुछ - कुछ हास्यकी छटा छा रही । हो । उसने अपने दो हाथोंमें वरद और अभयकी मुद्रा धारण की हो और शेष दो हाथोंमें मृग- मुद्रा और टंक १ ९ ले रखे हों । अथवा उपासककी रुचिके अनुसार अष्टभुजा मूर्तिकी भावना करनी चाहिये॥१७–१९ ॥ उस दशामें वह मूर्ति अपने दाहिने चार हाथोंमें २० त्रिशूल, परशु, खड्ग और वज्र लिये हो और बायें चार हाथोंमें पाश, अंकुश, खेट और नाग धारण करती हो । उसकी अंगकान्ति प्रात: कालके सूर्यकी भाँति लाल हो और वह अपने प्रत्येक मुखमें तीन-२१ तीन नेत्र धारण करती हो । उस मूर्तिका पूर्ववर्ती मुख सौम्य तथा अपनी आकृतिके अनुरूप ही कान्तिमान् है । दक्षिणवर्ती मुख नील मेघके समान श्याम और । देखनेमें भयंकर है । उत्तरवर्ती मुख मूँगेके समान लाल २२ है और सिरकी नीली अलकें उसकी शोभा बढ़ाती हैं॥२०–२२ ॥ पश्चिमवर्ती मुख पूर्ण चन्द्रमाके समान उज्ज्वल, २३ सौम्य तथा चन्द्रकलाधारी है । उस शिवमूर्तिके अंकमें पराशक्ति माहेश्वरी शिवा आरूढ़ हैं । उनकी अवस्था सोलह वर्षकी - सी है । वे सबका मन मोहनेवाली हैं और महालक्ष्मीके नामसे विख्यात हैं ॥ २३१/२ ॥ २४ इस प्रकार भावनामयी मूर्तिका निर्माण और पद्धति क्रमसे सकलीकरण करके उनमें मूर्तिमान् परम कारण शिवका आवाहन और पूजन करे । वहाँ २५ | स्नान करानेके लिये कपिला गायके पंचगव्य और । पंचामृतका संग्रह करे । विशेषतः चूर्ण और बीजको २६ भी एकत्र करे । फिर पूर्वदिशामें मण्डल बनाकर उसे

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अ ० ३२ ] वायवीयसंहिता कर्णिकायां प्रविन्यस्येदीशानकलशंपुनः । सद्यादिकलशान्पश्चात्परितस्तस्य कल्पयेत् ॥ २७

ततो विद्येशकलशानष्टौ पूर्वादिवत्क्रमात् ।

तीर्थाम्बुपूरितान्कृत्वा सूत्रेणावेष्ट्य पूर्ववत् ॥ २८

पुण्यद्रव्याणि निक्षिप्य समन्त्रं सविधानकम् ।

दुकूलाद्येन वस्त्रेण समाच्छाद्य समन्ततः ॥ २ ९

सर्वत्र मन्त्रं विन्यस्य तत्तन्मन्त्रपुरःसरम् ।

स्नानकाले तु सम्प्राप्ते सर्वमङ्गलनिःस्वनैः ॥ ३०

पञ्चगव्यादिभिश्चैव स्नापयेत्परमेश्वरम् । ततः कुशोदकाद्यानि स्वर्णरत्नोदकान्यपि ॥ ३१

गन्धपुष्पादिसिद्धानि मन्त्रसिद्धानि च क्रमात् ।

उद्धृत्योद्धृत्य मन्त्रेण तैस्तैः स्नाप्य महेश्वरम् ॥ ३२

गन्धपुष्पादिदीपांश्च पूजाकर्म समाचरेत् ।

पलावरः स्यादालेप एकादशपलोत्तरः ॥ ३३

सुवर्णरत्नपुष्पाणि शुभानि सुरभीणि च ।

नीलोत्पलाद्युत्पलानि बिल्वपत्राण्यनेकशः ॥ ३४

कमलानि च रक्तानि श्वेतान्यपि च शम्भवे ।

कृष्णागुरूद्भवो धूपः सकर्पूराज्यगुग्गुलः ॥ ३५

कपिलाघृतसंसिद्धा दीपाः कर्पूरवर्तिजाः ।

पञ्च ब्रह्मषडङ्गानि पूज्यान्यावरणानि च ॥ ३६

नैवेद्यः पयसा सिद्धः स गुडाज्यो महाचरुः ।

पाटलोत्पलपद्माद्यैः पानीयं च सुगन्धितम् ॥ ३७

पञ्चसौगंधिकोपेतं ताम्बूलं च सुसंस्कृतम् ।

सुवर्णरत्नसिद्धानि भूषणानि विशेषतः ॥ ३८

वासांसि च विचित्राणि सूक्ष्माणि च नवानि च ।

दर्शनीयानि देयानि गानवाद्यादिभिः सह ॥ ३ ९

( उत्तरखण्ड ) १०३३ रत्नचूर्ण आदिसे अलंकृत करके कमलकी कर्णिकामें ईशान- कलशकी स्थापना करे । तत्पश्चात् उसके चारों ओर सद्योजात आदि मूर्तियोंके कलशोंकी स्थापना करे ॥ २४–२७ ॥ इसके बाद पूर्व आदि आठ दिशाओंमें क्रमशः विद्येश्वरके आठ कलशोंकी स्थापना करके उन सबको तीर्थके जलसे भर दे और कण्ठमें सूत लपेट दे । फिर उनके भीतर पवित्र द्रव्य छोड़कर मन्त्र और विधिके साथ साड़ी या धोती आदि वस्त्रसे उन सब कलशको चारों ओरसे आच्छादित कर दे ॥ २८-२९ ॥ तदनन्तर मन्त्रोच्चारणपूर्वक उन सबमें मन्त्रन्यास करके स्नानका समय आनेपर सब प्रकारके मांगलिक शब्दों और वाद्योंके साथ पंचगव्य आदिके द्वारा परमेश्वर शिवको स्नान कराये । कुशोदक, स्वर्णोदक और रत्नोदक आदिको - जो गन्ध, पुष्प आदिसे वासित और मन्त्रसिद्ध हों — क्रमशः ले - लेकर मन्त्रोच्चारणपूर्वक उन - उनके द्वारा महेश्वरको नहलाये ॥ ३०–३२ ॥ फिर गन्ध, पुष्प और दीप आदि निवेदन करके पूजा - कर्म सम्पन्न करे । आलेपन या उबटन कम - से-कम एक पल और अधिक - से - अधिक ग्यारह पल हो । सुन्दर, सुवर्णमय और रत्नमय पुष्प अर्पित करे । सुगन्धित नील कमल, नील कुमुद, अनेकशः बिल्वपत्र, लाल कमल और श्वेत कमल भी शम्भुको चढ़ाये । कालागुरुके धूपको कपूर, घी और गुग्गुलसे युक्त करके निवेदन करे ॥ ३३–३५ ॥ कपिला गायके घीसे युक्त दीपकमें कपूरकी बत्ती बनाकर रखे और उसे जलाकर देवताके सम्मुख दिखाये । ईशानादि पाँच ब्रह्मकी, छहों अंगोंकी और पाँच आवरणोंकी पूजा करनी चाहिये ॥ ३६ ॥

दूधमें तैयार किया हुआ पदार्थ नैवेद्यके रूपमें निवेदनीय है । गुड़ और घीसे युक्त महाचरुका भी भोग लगाना चाहिये । पाटल, उत्पल और कमल आदिसे सुवासित जल पीनेके लिये देना चाहिये । पाँच प्रकारकी सुगन्धोंसे युक्त तथा अच्छी तरह लगाया हुआ ताम्बूल मुखशुद्धिके लिये अर्पित करना चाहिये । सुवर्ण और रत्नोंके बने हुए आभूषण, नाना प्रकारके रंगवाले नूतन महीन वस्त्र, जो दर्शनीय हों, इष्टदेवको देने चाहिये । उस समय गीत, और कीर्तन आदि भी करने चाहिये ॥ ३७-३९ ॥ / वाद्य

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श्रीशिवा [ अ ० ३२ १०३४

मूलमन्त्रस्य लक्षः परमसंख्यया ।

जपश्च च पूजा फलवशादिह ॥ ४०

एकावरा त्र्युत्तरा

दशसंख्यावरो होमः प्रतिद्रव्यं शतोत्तरः ।

घोररूपश्शिवश्चिन्त्यो मारणोच्चाटनादिषु ॥ ४१

शिवलिङ्गे शिवाग्नौ च ह्यन्यासु प्रतिमासु च ।

चिन्त्यः सौम्यतनुः शम्भुः कार्ये शान्तिकपौष्टिके ॥ ४२

आयसौ स्स्रुक्स्त्रुवौ कार्यों मारणादिसु कर्मसु ।

तदन्यत्र तु सौवर्णौ शान्तिकाद्येषु कृत्स्नशः ॥ ४३

दूर्वया घृतगोक्षीरमिश्रया मधुना तथा ।

चरुणा सघृतेनैव केवलं पयसापि वा ॥ ४४

जुहुयान्मृत्युविजये तिलै रोगोपशान्तये ।

घृतेन पयसा चैव कमलैर्वाथ केवलैः ॥ ४५

समृद्धिकामो जुहुयान्महादारिद्र्यशान्तये ।

जातीपुष्पेण वश्यार्थी जुहुयात्सघृतेन तु ॥ ४६

घृतेन करवीरैश्च कुर्यादाकर्षणं द्विजः ।

तैलेनोच्चाटनं कुर्यात्स्तम्भनं मधुना पुनः ॥ ४७

स्तम्भनं सर्षपेणापि लशुनेन तु पातनम् ।

ताडनं रुधिरेण स्यात्खरस्योष्ट्रस्य चोभयोः ॥ ४८

मारणोच्चाटने कुर्याद्रोहिबीजैस्तिलान्वितैः ।

विद्वेषणं च तैलेन कुर्याल्लाङ्गलकस्य तु ॥ ४ ९

बंधनं रोहिबीजेन सेनास्तम्भनमेव च । रक्तसर्षपसंमिश्रैर्होमद्रव्यैरशेषतः ॥५० हस्तयन्त्रोद्भवैस्तैलैर्जुहुयादाभिचारिके कटुकीतुषसंयुक्तैः कार्पासास्थिभिरेव च ॥५१ सर्षपैस्तैलसंमिश्रैर्जुहुयादाभिचारिके ज्वरोपशान्तिदं क्षीरं सौभाग्यफलदं तथा ॥ ५२ ।

सर्वसिद्धिकरो होमः क्षौद्राज्यदधिभिर्युतैः ।

क्षीरेण तन्दुलैश्चैव चरुणा केवलेन वा ॥ ५३

मूलमन्त्रका एक लाख जप करना चाहिये पूजा कम - से - कम एक बार, नहीं तो दो या तीन बार । | करनी चाहिये; क्योंकि अधिकका अधिक फल होता | है | होम- सामग्रीके लिये जितने द्रव्य हों, उनमेंसे | प्रत्येक द्रव्यकी कम - से - कम दस और अधिक - से-| अधिक सौ आहुतियाँ देनी चाहिये 1 । अभिचार आदि कर्ममें शिव घोररूपका चिन्तन करना चाहिये शान्तिकर्म या पौष्टिककर्म करते समय शिवलिंगमें । | शिवाग्निमें तथा अन्य प्रतिमाओंमें शिवके सौम्यरूपका, ध्यान करना चाहिये ॥ ४०–४२ ॥ अभिचार आदि कर्मोंमें लोहेके बने हुए स्रुक् और खुवाका उपयोग करना चाहिये । अन्य शान्ति आदि कर्मोंमें सुवर्णके [ अथवा यज्ञिय काष्ठके ] स्रुक् और स्रुवा बनवाने चाहिये । मृत्युपर विजय पानेके लिये घी, दूधमें मिलायी हुई दूर्वासे, मधुसे, घृतयुक्त चरुसे अथवा केवल दूधसे भी हवन करना चाहिये तथा रोगोंकी शान्तिके लिये तिलोंकी आहुति देनी चाहिये । समृद्धिकी इच्छा रखनेवाला पुरुष महान् दारिद्र्यकी शान्तिके लिये घी, दूध अथवा केवल कमलके फूलोंसे होम करे । अभिचार कर्मका इच्छुक पुरुष घृतयुक्त जातीपुष्प ( चमेली या मालतीके फूल ) -से हवन करे॥४३–४६ ॥ द्विजको चाहिये कि वह घृत और करवीर-पुष्पोंकी आहुति, तेलकी आहुति और मधुकी आहुतिसे इन कर्मोंको करे ॥ ४७ ॥

तन्त्रशास्त्रीय अभिचार कर्मोंमें सार्षप, लशुन, तिलमिश्रित रोहिबीज, लांगलक तैल, शोणित आदिका प्रयोग होता है ॥ ४८-५० ॥ अभिचार - कर्ममें हस्तचालित यन्त्रसे तैयार किये गये तेलकी आहुति देनी चाहिये । कुटकीकी भूसी, कपासकी ढोढ़ तथा तैलमिश्रित सरसोंकी भी आहुति दी जा सकती है । दूधकी आहुति ज्वरकी शान्ति करनेवाली तथा सौभाग्यरूप फल प्रदान करनेवाली होती है॥५१-५२ ॥ मधु, घी और दहीको परस्पर मिलाकर इनसे, दूध और चावलसे अथवा केवल चरुसे किया गया होम सम्पूर्ण सिद्धियोंको देनेवाला होता है । सात

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अ ० ३२ ] वायवीयसंहिता शान्तिकं पौष्टिकं वापि सप्तभिः समिदादिभिः

।

द्रव्यैर्विशेषतो होमे वश्यमाकर्षणं तथा ॥ ५४

वश्यमाकर्षणं चैव श्रीप्रदं च विशेषतः ।

बिल्वपत्रैस्तु हवनं शत्रोर्विजयदं तथा ॥ ५५

समिधः शान्तिकार्येषु पालाशखदिरादिकाः ।

करवीरार्कजाः क्रौर्ये कण्टकिन्यश्च विग्रहे ॥ ५६

प्रशान्तः शान्तिकं कुर्यात्पौष्टिकं च विशेषतः ।

निर्घृणः क्रुद्धचित्तस्तु प्रकुर्यादाभिचारिकम् ॥ ५७

अतीव दुरवस्थायां प्रतीकारान्तरं न चेत् ।

आततायिनमुद्दिश्य प्रकुर्यादाभिचारिकम् ॥ ५८

स्वराष्ट्रपतिमुद्दिश्य न कुर्यादाभिचारिकम् ।

यद्यास्तिकः सुधर्मिष्ठो मान्यो वा योऽपि कोऽपि वा ॥ ५ ९

तमुद्दिश्यापि नो कुर्यादाततायिनमप्युत ।

मनसा कर्मणा वाचा योऽपि कोऽपि शिवाश्रितः ॥ ६०

स्वराष्ट्रपतिमुद्दिश्य शिवाश्रितमथापि वा ।

कृत्वाभिचारिकं कर्म सद्यो विनिपतेन्नरः ॥ ६१

स्वराष्ट्रपालकं तस्माच्छिवभक्तं च कञ्चन ।

न हिंस्यादभिचाराद्यैर्यदीच्छेत्सुखमात्मनः ॥ ६२

अन्यं कमपि चोद्दिश्य कृत्वा वै मारणादिकम् ।

पश्चात्तापेन संयुक्तः प्रायश्चित्तं समाचरेत् ॥६३

बाणलिङ्गेऽपि वा कुर्यान्निर्धनो धनवानपि ।

स्वयम्भूतेऽथ वा लिङ्गे आर्षके वैदिकेऽपि वा ॥ ६४

अभावे हेमरत्नानामशक्तौ च तदर्जने । ( उत्तरखण्ड ) १०३५ प्रकारकी समिधा आदिसे शान्तिक अथवा पौष्टिक कर्म भी करे । विशेषतः द्रव्योंद्वारा होम करनेपर वश्य और आकर्षणकी सिद्धि होती है । बिल्वपत्रोंका हवन वशीकरण तथा आकर्षणका साधक और लक्ष्मीकी प्राप्ति करानेवाला है, साथ ही वह शत्रुपर विजय प्रदान कराता है॥५३–५५ ॥ शान्तिकार्यमें पलाश और खैर आदिकी समिधाओंका होम करना चाहिये । क्रूरतापूर्ण कर्ममें कनेर और आककी समिधाएँ होनी चाहिये । लड़ाई-झगड़ेमें कटीले पेड़ोंकी समिधाओंका हवन करना चाहिये । शान्ति और पुष्टिकर्मको विशेषतः शान्तचित्त पुरुष ही करे । जो निर्दय और क्रोधी हो, उसीको आभिचारिक कर्ममें प्रवृत्त होना चाहिये । वह भी उस दशामें, जबकि दुरवस्था चरम सीमाको पहुँच गयी हो और उसके निवारणका दूसरा कोई उपाय न रह गया | हो, आततायीको नष्ट करनेके उद्देश्यसे आभिचारिक कर्म करना चाहिये ॥ ५६-५८ ॥ अपने राष्ट्रके स्वामीको हानि पहुँचानेके उद्देश्यसे आभिचारिक कर्म कदापि नहीं करना चाहिये । यदि कोई आस्तिक, परम धर्मात्मा और माननीय पुरुष हो, उससे यदि कभी आततायीपनका कार्य हो जाय, तो भी उसको नष्ट करनेके उद्देश्यसे आभिचारिक कर्मका प्रयोग नहीं करना चाहिये । जो कोई भी मन, वाणी और क्रियाद्वारा भगवान् शिवके आश्रित हो, उसके तथा राष्ट्रस्वामीके उद्देश्यसे भी आभिचारिक कर्म करके मनुष्य शीघ्र ही पतित हो जाता है । इसलिये कोई भी पुरुष जो अपने लिये सुख चाहता हो, अपने राष्ट्रपालक राजाकी तथा शिवभक्तकी अभिचार आदिके द्वारा हिंसा न करे । दूसरे किसीके उद्देश्यसे भी अभिचार आदिका प्रयोग करनेपर पश्चात्तापसे युक्त हो प्रायश्चित्त करना चाहिये ॥५ ९ –६३ ॥ निर्धन या धनवान् पुरुष भी बाणलिंग ( नर्मदासे प्रकट हुए शिवलिंग ), स्वयम्भूलिंग, ऋषियोंद्वारा स्थापित लिंग या वैदिक लिंगमें भगवान् शंकरकी पूजा करे । जहाँ ऐसे लिंगका अभाव हो वहाँ सुवर्ण और रत्नके बने हुए शिवलिंगमें पूजा करनी चाहिये । यदि सुवर्ण और रत्नोंके उपार्जनकी शक्ति न हो तो

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१०३६ मनसैवाचरेदेतद् द्रव्यैर्वा प्रतिरूपकैः क्वचिदंशे तु यः शक्तस्त्वशक्तः क्वचिदंशके सोऽपि शक्त्यनुसारेण कुर्वंश्चेत्फलमृच्छति कर्मण्यनुष्ठितेऽप्यस्मिन्फलं यत्र न दृश्यते द्विस्त्रिर्वावर्त्तयेत्तत्र सर्वथा दृश्यते फलम्

पूजोपयुक्तं यद् द्रव्यं हेमरत्नाद्यनुत्तमम् ।

तत्सर्वं गुरवे दद्याद् दक्षिणां च ततः पृथक् ॥

स चेन्नेच्छति तत्सर्वं शिवाय विनिवेदयेत् ।

अथवा शिवभक्तेभ्यो नान्येभ्यस्तु प्रदीयते ॥

यः स्वयं साधयेच्छक्त्या गुर्वादिनिरपेक्षया ।

सोऽप्येवमाचरेदत्र न गृह्णीयात्स्वयं पुनः ॥

स्वयं गृह्णाति यो लोभात्पूजाङ्गद्रव्यमुत्तमम् ।

कांक्षितं न लभेन्मूढो नात्र कार्या विचारणा ॥

अर्चितं यत्तु तल्लिंगं गृह्णीयाद्वा न वा स्वयम् ।

गृह्णीयाद्यदि तन्नित्यं स्वयं वान्योऽपि वार्चयेत् ॥

यथोक्तमेव कर्मैतदाचरेद्यो ऽनपायतः ।

फलं व्यभिचरेन्नैवमित्यतः किं प्ररोचकम् ॥

तथाप्युद्देशतो वक्ष्ये कर्मणः सिद्धिमुत्तमाम् ।

अपि शत्रुभिराक्रान्तो व्याधिभिर्वाप्यनेकशः ॥

मृत्योरास्यगतश्चापि मुच्यते निरपायतः ।

पूजायतेऽतिकृपणो रिक्तो वैश्रवणायते ॥

कामायते विरूपोऽपि वृद्धोऽपि तरुणायते ।

शत्रुर्मित्रायते सद्यो विरोधी किंकरायते ॥

श्रीशिवमहापुराण [ अ ० ३२ ॥ ६५ । मनसे ही भावनामयी मूर्तिका निर्माण करके मानसिक । पूजन करना चाहिये । अथवा प्रतिनिधि द्रव्योंद्वारा । शिवलिंगकी कल्पना करनी चाहिये ॥ ६४-६५ ॥ जो किसी अंशमें समर्थ और किसी अंशमें । । असमर्थ है, वह भी यदि अपनी शक्तिके अनुसार ॥६६ । पूजन - कर्म करता है तो अवश्य फलका भागी होता | है | जहाँ इस कर्मका अनुष्ठान करनेपर भी फल नहीं । । दिखायी देता, वहाँ दो या तीन बार उसकी आवृत्ति ॥ ६७ । करे । ऐसा करनेसे सर्वथा फलका दर्शन होगा । पूजाके | उपयोगमें आया हुआ जो सुवर्ण, रत्न आदि उत्तम | द्रव्य हो, वह सब गुरुको दे देना चाहिये तथा उसके ६८ अतिरिक्त दक्षिणा भी देनी चाहिये ॥ ६६-६८ ॥ यदि गुरु नहीं लेना चाहते हों तो वह सब वस्तु भगवान् शिवको ही समर्पित कर दे अथवा शिवभक्तोंको ६ ९ दे दे । इनके सिवा दूसरोंको देनेका विधान नहीं है । जो पुरुष गुरु आदिकी अपेक्षा न रखकर स्वयं यथाशक्ति पूजा सम्पन्न करता है, वह भी ऐसा ही आचरण करे । ७० पूजामें चढ़ायी हुई वस्तु स्वयं न ले ले । जो मूढ़ लोभवश पूजाके अंगभूत उत्तम द्रव्यको स्वयं ग्रहण कर लेता है, वह अभीष्ट फलको नहीं पाता । इसमें अन्यथा विचार ७१ नहीं करना चाहिये ॥ ६ ९ –७१ ॥ किसीके द्वारा पूजित शिवलिंगको मनुष्य ग्रहण ७२ करे या न करे, यह उसकी इच्छापर निर्भर है । यदि ले ले तो स्वयं नित्य उसकी पूजा करे अथवा उसकी प्रेरणासे दूसरा कोई पूजा करे । जो पुरुष इस कर्मका शास्त्रीय विधिके अनुसार ही निरन्तर अनुष्ठान करता है, वह फल पानेसे कभी वंचित नहीं रहता । इससे बढ़कर प्रशंसाकी ७३बात और क्या हो सकती है? ॥ ७२-७३ की तथापि मैं संक्षेपसे कर्मजनित उत्तम सिद्धिकी ७४ महिमाका वर्णन करता हूँ । इससे शत्रुओं अथवा अनेक प्रकारकी व्याधियोंका शिकार होकर और मौतके मुँहमें पड़कर भी मनुष्य बिना किसी विघ्न-| बाधाके मुक्त हो जाता है । अत्यन्त कृपण भी उदार । ७५ और निर्धन भी कुबेरके समान हो जाता है । कुरूप भी कामदेवके समान सुन्दर और बूढ़ा भी जवान हो जाता है । शत्रु क्षणभरमें मित्र और विरोधी भी किंकर हो ७६ | जाता है॥७४–७६ ॥