शिव महापुराण - २ — पृष्ठ 1051–1060

शिव महापुराण - २ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 1051–1060

पृष्ठ 1051

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अ ० ३२ ] वायवीयसंहिता

विषायते यदमृतं विषमप्यमृतायते ।

स्थलायते समुद्रोऽपि स्थलमप्यर्णवायते ॥ ७७

महीधरायते श्वभ्रं स च श्वभ्रायते गिरिः ।

पद्माकरायते वह्निः सरो वैश्वानरायते ॥ ७८

वनायते यदुद्यानं तदुद्यानायते वनम् ।

सिंहायते मृगः क्षुद्रः सिंहः क्रीडामृगायते ॥ ७ ९

स्त्रियोऽभिसारिकायन्ते लक्ष्मीः सुचरितायते ।

स्वैरप्रेष्यायते वाणी कीर्तिस्तु गणिकायते ॥ ८०

स्वैराचारायते मेधा वज्रसूचीयते मनः ।

महावातायते शक्तिर्बलं मत्तगजायते ॥ ८१

स्तम्भायते समुद्योगैः शत्रुपक्षे स्थिता क्रिया ।

शत्रुपक्षायतेऽरीणां सर्व एव सुहृज्जनः ॥ ८२

शत्रवः कुणपायन्ते जीवन्तोऽपि सबांधवाः ।

आपन्नोऽपि गतारिष्टः स्वयं खल्वमृतायते ॥ ८३

रसायनायते नित्यमपथ्यमपि सेवितम् ।

अनिशं क्रियमाणापि रतिस्त्वभिनवायते ॥ ८४

अनागतादिकं सर्वं करस्थामलकायते ।

यादृच्छिकफलायन्ते सिद्धयोऽप्यणिमादयः ॥ ८५

बहुनात्र किमुक्तेन सर्वकामार्थसिद्धिषु ।

अस्मिन्कर्मणि निर्वृत्ते त्वनवाप्यं न विद्यते ॥ ८६

( उत्तरखण्ड ) १०३७ अमृत विषके समान और विष भी अमृतके समान हो जाता है । समुद्र भी स्थल और स्थल भी समुद्रवत् हो जाता है । गड्ढा पहाड़ - जैसा ऊँचा और पर्वत भी गड्ढेके समान हो जाता है । अग्नि सरोवरके समान शीतल और सरोवर भी अग्नि के समान दाहक बन जाता है । उद्यान जंगल और जंगल उद्यान हो जाता है । क्षुद्र मृग सिंहके समान शौर्यशाली और सिंह भी क्रीडामृगके समान आज्ञापालक हो जाता है ॥ ७७–७९ ॥ स्त्रियाँ अभिसारिका बन जाती हैं - अधिक प्रेम करने लगती हैं और लक्ष्मी सुस्थिर हो जाती है । वाणी इच्छानुसार दासी बन जाती है और कीर्ति गणिकाके समान सर्वत्रगामिनी हो जाती है । बुद्धि स्वेच्छानुसार विचरनेवाली और मन हीरेको छेदनेवाली सूईके समान सूक्ष्म हो जाता है । शक्ति आँधीके समान प्रबल हो जाती है और बल मत्त गजराजके समान पराक्रमशाली हो जाता है । शत्रु - पक्षके उद्योग और कार्य स्तब्ध हो जाते हैं तथा शत्रुओंके समस्त सुहृद्गण उनके लिये शत्रुपक्षके समान हो जाते हैं॥८०–८२ ॥ शत्रु बन्धु - बान्धवोंसहित जीते - जी मुर्देके समान हो जाते हैं और सिद्धपुरुष स्वयं आपत्तिमें पड़कर भी अरिष्टरहित ( संकटमुक्त ) हो जाता है । अमरत्व-सा प्राप्त कर लेता है । उसका खाया हुआ अपथ्य भी उसके लिये सदा रसायनका काम देता है । निरन्तर रतिका सेवन करनेपर भी वह नया - सा ही बना रहता है । भविष्य आदिकी सारी बातें उसे हाथपर रखे हुए आँवलेके समान प्रत्यक्ष दिखायी देती हैं । अणिमा आदि सिद्धियाँ भी इच्छा करते ही फल देने लगती हैं । इस विषयमें बहुत कहनेसे क्या लाभ? इस कर्मका सम्पादन कर लेनेपर सम्पूर्ण अभिलषित सिद्धियोंमें कोई भी ऐसी सिद्धि नहीं रहती, जो | अलभ्य हो॥८३–८६ ॥ इति श्रीशिवमहापुराणे सप्तम्यां ॥ वायवीयसंहितायामुत्तरखण्डे वायवीयसंहितायामुत्तरखण्डे ऐहिकसिद्धिकर्मवर्णनं नाम द्वात्रिंशोऽध्यायः ॥ ३२ ॥

अन्तर्गत सातवीं वायवीयसंहिताके उत्तरखण्डमें ऐहिक ॥ इस प्रकार श्रीशिवमहापुराणके नामक बत्तीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ३२ ॥

सिद्धिकर्मवर्णन

पृष्ठ 1052

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श्रीशिवमहापुराण [ अ ० ३३ १०३८ अथ त्रयस्त्रिंशोऽध्यायः कर्म- शिवलिंग - महाव्रतकी विधि और महिमाका वर्णन पारलौकिक फल देनेवाले उपमन्युरुवाच

अतः परं प्रवक्ष्यामि केवलामुष्मिकं विधिम् ।

नैतेन सदृशं किञ्चित्कर्मास्ति भुवनत्रये ॥

पुण्यातिशयसंयुक्तः सर्वैर्देवैरनुष्ठितः ।

ब्रह्मणा विष्णुना चैव रुद्रेण च विशेषतः ॥

इन्द्रादिलोकपालैश्च सूर्याद्यैर्नवभिर्ग्रहैः ।

विश्वामित्रवसिष्ठाद्यैर्ब्रह्मविद्भिर्महर्षिभिः ॥

श्वेतागस्त्यदधीचाद्यैरस्माभिश्च शिवाश्रितैः ।

नंदीश्वरमहाकालभृङ्गीशाद्यैर्गणेश्वरैः ॥

पातालवासिभिर्दैत्यैः शेषाद्यैश्च महोरगैः ।

सिद्धैर्यक्षैश्च गन्धर्वै रक्षोभूतपिशाचकैः ॥

स्वं स्वं पदमनुप्राप्तं सर्वैरयमनुष्ठितः ।

अनेन विधिना सर्वे देवा देवत्वमागताः ॥

ब्रह्मा ब्रह्मत्वमापन्नो विष्णुर्विष्णुत्वमागतः ।

रुद्रो रुद्रत्वमापन्न इन्द्रश्चेन्द्रत्वमागतः ॥

गणेशश्च गणेशत्वमनेन विधिना गतः ।

सितचंदनतोयेन लिङ्गं स्नाप्य शिवं शिवाम् ।

श्वेतैर्विकसितैः पद्यैः सम्पूज्य प्रणिपत्य च ॥

तत्र पद्मासनं रम्यं कृत्वा लक्षणसंयुतम् ।

विभवे सति हेमाद्यै रत्नाद्यैर्वा स्वशक्तितः ॥

मध्ये केसरजालस्य स्थाप्य लिङ्गं कनीयसम् ।

अंगुष्ठप्रतिमं रम्यं सर्वगन्धमयं शुभम् ॥

दक्षिणे स्थापयित्वा तु बिल्वपत्रैः समर्चयेत् ।

अगुरुं दक्षिणे पार्श्वे पश्चिमे तु मनःशिलाम् ॥

उत्तरे चंदनं दद्याद्धरितालं तु पूर्वतः ।

सुगन्धैः कुसुमै रम्यैर्विचित्रैश्चापि पूजयेत् ॥

धूपं कृष्णागुरुं दद्यात्सर्वतश्च सगुग्गुलम् ।

वासांसि चातिसूक्ष्माणि विकाशानि निवेदयेत् ॥

पायसं घृतसंमिश्रं घृतदीपांश्च दापयेत् ।

सर्वं निवेद्य मन्त्रेण ततो गच्छेत्प्रदक्षिणाम् ॥

उपमन्यु कहते हैं— यदुनन्दन! अब मैं केवल । परलोकमें फल देनेवाले कर्मकी विधि बतलाऊँगा । तीनों १ लोकोंमें इसके समान दूसरा कोई कर्म नहीं है ॥ १ ॥

यह विधि अतिशय पुण्यसे युक्त है और सम्पूर्ण २ देवताओंने इसका अनुष्ठान किया है । ब्रह्मा, विष्णु, | रुद्र, इन्द्रादि लोकपाल, सूर्यादि नवग्रह, विश्वामित्र ३ और वसिष्ठ आदि ब्रह्मवेत्ता महर्षि, श्वेत, अगस्त्य | दधीचि तथा हम - सरीखे शिवभक्त, नन्दीश्वर, महाकाल , ४ और भृंगीश आदि गणेश्वर, पातालवासी दैत्य, शेष आदि महानाग, सिद्ध, यक्ष, गन्धर्व, राक्षस, भूत और ५ पिशाच - इन सबने अपना - अपना पद प्राप्त करनेके लिये इस विधिका अनुष्ठान किया है । इस विधिसे ही ६ सब देवता देवत्वको प्राप्त हुए हैं ॥२-६ ॥ इसी विधिसे ब्रह्माको ब्रह्मत्वकी, विष्णुको ७ विष्णुत्वकी, रुद्रको रुद्रत्वकी, इन्द्रको इन्द्रत्वकी और गणेशको गणेशत्वकी प्राप्ति हुई है । श्वेतचन्दनयुक्त जलसे लिंगस्वरूप शिव और शिवाको स्नान कराकर प्रफुल्ल श्वेत कमलोंद्वारा उनका पूजन करे । फिर ८ उनके चरणोंमें प्रणाम करके वहीं [ लिपी - पुती भूमिपर ] सुन्दर शुभलक्षण पद्मासन बनवाकर रखे । धन हो तो ९ अपनी शक्तिके अनुसार सोने या रत्न आदिका पद्मासन बनवाना चाहिये ॥७ – ९ ॥ कमलके केसरोंके मध्यभागमें अंगुष्ठके बराबर १० छोटे - से सुन्दर शिवलिंगकी स्थापना करे । वह सर्वगन्धमय और सुन्दर होना चाहिये । उसे दक्षिणभागमें स्थापित ११ करके बिल्वपत्रोंद्वारा उसकी पूजा करे । फिर उसके दक्षिणभागमें अगुरु, पश्चिम भागमें मैनसिल, उत्तरभागमें चन्दन और पूर्वभागमें हरिताल चढ़ाये । फिर सुन्दर १२ सुगन्धित विचित्र पुष्पोंद्वारा पूजा करे ॥ ॥ १०-१२ ॥ सब ओर काले अगुरु और गुग्गुलकी धूप दे । १३ अत्यन्त महीन और निर्मल वस्त्र निवेदन करे । घृतमिश्रित खीरका भोग लगाये । घीके दीपक जलाकर रखे । मन्त्रोच्चारणपूर्वक सब कुछ चढ़ाकर परिक्रमा १४ | करे ॥ १३-१४ ॥

पृष्ठ 1053

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अ ० ३४ ] वायवीयसहिता

प्रणम्य भक्त्या देवेशं स्तुत्वा चान्ते क्षमापयेत् ।

सर्वोपहारसंमिश्रं ततो लिङ्गं निवेदयेत् ॥१५

शिवाय शिवमन्त्रेण दक्षिणामूर्तिमाश्रितः ।

एवं योऽर्चयते नित्यं पञ्चगन्धमयं शुभम् ॥ १६

सर्वपापविनिर्मुक्तः शिवलोके महीयते ।

एतद् व्रतोत्तमं गुह्यं शिवलिङ्गमहाव्रतम् ॥ १७

भक्तस्य ते समाख्यातं न देयं यस्य कस्यचित् ।

देयं च शिवभक्तेभ्यः शिवेन कथितं पुरा ॥ १८

( उत्तरखण्ड ) १०३ ९ भक्तिभावसे देवेश्वर शिवको प्रणाम करके उनकी स्तुति करे और अन्तमें त्रुटियोंके लिये क्षमा - प्रार्थना करे । तत्पश्चात् शिवपंचाक्षरमन्त्रसे सम्पूर्ण उपहारोंसहित वह शिवलिंग शिवको समर्पित करे और स्वयं दक्षिणामूर्तिका आश्रय ले । जो इस प्रकार पंच गन्धमय शुभ लिंगकी नित्य अर्चना करता है वह सब पापोंसे मुक्त हो शिवलोकमें प्रतिष्ठित होता , है । यह शिवलिंग - महाव्रत सब व्रतोंमें उत्तम और गोपनीय है । तुम भगवान् शंकरके भक्त हो; इसलिये तुमसे इसका वर्णन किया है । जिस किसीको इसका उपदेश नहीं करना चाहिये । केवल शिवभक्तोंको ही इसका उपदेश देना चाहिये । प्राचीनकालमें भगवान् शिवने ही इस व्रतका उपदेश दिया था ॥ १५-१८ ॥ इति श्रीशिवमहापुराणे सप्तम्यां वायवीयसंहितायामुत्तरखण्डे आमुष्मिककर्मविधिवर्णनं ॥ इस प्रकार श्रीशिवमहापुराणके अन्तर्गत सातवीं नाम त्रयस्त्रिंशोऽध्यायः ॥ ३३ ॥

वायवीयसंहिताके उत्तरखण्डमें आमुष्मिक कर्मविधिवर्णन नामक तैंतीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ३३ ॥

अथ चतुस्त्रिंशोऽध्यायः मोहवश ब्रह्मा तथा विष्णुके द्वारा लिंगके आदि और अन्तको जाननेके लिये किये उपमन्युरुवाच

नित्यनैमित्तिकात्काम्याद्या सिद्धिरिह कीर्तिता ।

सा सर्वा लभ्यते सद्यो लिङ्गबेरप्रतिष्ठया ॥ १

सर्वो लिङ्गमयो लोकः सर्वं लिङ्गे प्रतिष्ठितम् ।

तस्मात्प्रतिष्ठिते लिङ्गे भवेत्सर्वं प्रतिष्ठितम् ॥ २

ब्रह्मणा विष्णुना वापि रुद्रेणान्येन केन वा ।

लिङ्गप्रतिष्ठामुत्सृज्य क्रियते स्वपदस्थितिः ॥ ३

किमन्यदिह वक्तव्यं प्रतिष्ठां प्रति कारणम् ।

प्रतिष्ठितं शिवेनापि लिङ्गं वैश्वेश्वरं यतः ॥ ४

तस्मात्सर्वप्रयत्नेन परत्रेह च शर्मणे ।

स्थापयेत्परमेशस्य लिङ्गं बेरमथापि वा ॥ ५

श्रीकृष्ण उवाच

किमिदं लिङ्गमाख्यातं कथं लिङ्गी महेश्वरः ।

कथं च लिङ्गभावोऽस्य कस्मादस्मिञ्छिवोऽर्च्यते ॥ ६

गये प्रयत्नका वर्णन उपमन्यु बोले— [ हे कृष्ण! ] नित्य - नैमित्तिक तथा काम्यव्रतसे जो सिद्धि यहाँ कही गयी है, वह सब लिंग अथवा मूर्तिकी प्रतिष्ठासे शीघ्र ही प्राप्त हो जाती है । समग्र जगत् लिंगमय है और सब कुछ लिंगमें प्रतिष्ठित है, अतः लिंगकी प्रतिष्ठा कर लेनेपर सबकी प्रतिष्ठा हो जाती है ॥ १-२ ॥ ब्रह्मा, विष्णु, रुद्र अथवा अन्य किसने लिंग - प्रतिष्ठाको छोड़कर अपना पद प्राप्त किया है अर्थात् किसीने भी नहीं । इस प्रतिष्ठाके सम्बन्धमें और अधिक क्या कहा भी जाय, क्योंकि [ स्वयं ] शिवने भी विश्वेश्वरलिंगकी प्रतिष्ठा की है । अत: इस लोक तथा परलोकमें कल्याणके लिये प्रयत्नपूर्वक परमेश्वरके लिंग अथवा मूर्तिकी स्थापना करनी चाहिये ॥ ३-५ ॥ श्रीकृष्ण बोले- यह लिंग क्यों कहा गया, महेश्वर लिंगी कैसे हैं, वे महेश्वर लिंगस्वरूप कैसे हुए और [ लिंग ] -में शिव किस कारणसे पूजे जाते हैं? ॥ ६ ॥

इस

पृष्ठ 1054

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१०४० उपमन्युरुवाच अव्यक्तं लिङ्गमाख्यातं त्रिगुणप्रभवाप्ययम् अनाद्यनन्तं विश्वस्य यदुपादानकारणम् तदेव मूलप्रकृतिर्माया च गगनात्मिका श्रीशिवमहापुराण [ अ ० ३४ उपमन्यु बोले — यह लिंग अव्यक्त, तीनों गुणोंको | उत्पन्न तथा विलीन करनेवाला, आदि - अन्तसे रहित । और संसारके प्रादुर्भावका उपादान कारण है ॥ ७ ॥ ॥

॥ ७ वह लिंग ही मूल प्रकृति तथा आकाशरूपा । । है, यह चराचर जगत् उसीसे उत्पन्न हुआ है । माया वह तत एव समुत्पन्नं जगदेतच्चराचरम् ॥ ८ [ लिंग ] अशुद्ध, शुद्ध तथा शुद्धाशुद्ध — इन तीन भेदोंवाला अशुद्धं चैव शुद्धं यच्छुद्धाशुद्धं च तत्त्रिधा ततः शिवो महेशश्च रुद्रो विष्णुः पितामहः ॥

भूतानि चेन्द्रियैर्जाता लीयन्तेऽत्र शिवाज्ञया ।

अतएव शिवो लिङ्गो लिङ्गमाज्ञापयेद्यतः ॥

यतो न तदनाज्ञातं कार्याय प्रभवेत्स्वतः ।

ततो जातस्य विश्वस्य तत्रैव विलयो यतः ॥

अनेन लिङ्गता तस्य भवेन्नान्येन केनचित् ।

लिङ्गं च शिवयोर्देहस्ताभ्यां यस्मादधिष्ठितम् ॥

अतस्तत्र शिवः साम्बो नित्यमेव समर्च्यते ।

लिङ्गवेदी महादेवी लिङ्गं साक्षान्महेश्वरः ॥

तयोः सम्पूजनादेव स च सा च समर्चितौ ।

न तयोर्लिंगदेहत्वं विद्यते परमार्थतः ॥

यतस्त्वेतौ विशुद्धौ तौ देहस्तदुपचारतः ।

तदेव परमा शक्तिः शिवस्य परमात्मनः ॥

शक्तिराज्ञां यदादत्ते प्रसूते तच्चराचरम् ।

न तस्य महिमा शक्यो वक्तुं वर्षशतैरपि ॥

येनादौ मोहितौ स्यातां ब्रह्मनारायणावपि ।

पुरा त्रिभुवनस्यास्य प्रलये समुपस्थिते ॥

वारिशय्यागतो विष्णुः सुष्वापानाकुलः सुखम् ।

यदृच्छया गतस्तत्र ब्रह्मा लोकपितामहः ॥

ददर्श पुण्डरीकाक्षं स्वपन्तं तमनाकुलम् ।

मायया मोहितः शम्भोर्विष्णुमाह पितामहः ॥

कस्त्वं वदेत्यमर्षेण प्रहृत्योत्थाप्य माधवम् ॥ | है । उसीसे शिव, महेश, रुद्र, विष्णु, पितामह ( ब्रह्मा ९ और इन्द्रियोंसहित [ पंच ] महाभूत – ये सब उत्पन्न ) | होते हैं और शिवकी आज्ञासे इसीमें विलीन हो जाते १० हैं । भगवान् शिवको भलीभाँति शिवलिंग ज्ञापित करता । है, अत: वे लिंगी हैं । उनकी आज्ञाके बिना कोई भी | स्वयं कार्य नहीं कर सकता है और उनसे उत्पन्न हुए ११ विश्वका विलय भी उन्हींमें हो जाता है । इसीसे उनकी लिंगात्मकता सिद्ध होती है, अन्य किसी [ भी माध्यम ] -से नहीं ॥ ८–११३ ॥ १२ शिव तथा शिवाका [ नित्य ] अधिष्ठान होनेके कारण यह लिंग उनका [ स्थूल ] विग्रह कहा जाता है । अतः उसीमें नित्य अम्बासहित शिवकी पूजा की जाती है । लिंगकी आधारवेदिका साक्षात् महादेवी पार्वती हैं और उसपर अधिष्ठित लिंग स्वयं महेश्वर १३ हैं । उन दोनोंके पूजनसे ही वे [ शिव ] तथा वे [ पार्वती ] पूजित हो जाते हैं । पारमार्थिक रूपसे तो उन [ शिव और शिवाके उपाधिविनिर्मुक्त ] विशुद्धरूप १४ होनेसे देहभाव है ही नहीं, अतः उनके लिंगात्मक देहकी कल्पना वस्तुतः औपचारिक है ॥ १२-१४ ॥ वही परमात्मा शिवकी परमा शक्ति है । वह शक्ति १५ परमात्माकी आज्ञाको प्राप्त करके चराचर जगत्की सृष्टि करती है । सैकड़ों वर्षोंमें भी उसकी महिमाका वर्णन १६ नहीं किया जा सकता है, जिसने पूर्वकालमें ब्रह्मा तथा विष्णुको भी मोहित कर दिया था ॥ १५ - १६३ ॥ १७ पूर्वकालमें इस त्रिलोकीका प्रलय हो जानेपर जब [ भगवान् ] विष्णु जलशय्यापर विराजमान होकर निश्चिन्त हो सुखपूर्वक शयन कर रहे थे, तब १८ लोकपितामह ब्रह्मा अपनी इच्छासे वहाँ जा पहुँचे । | उन पितामहने सुखपूर्वक सोते हुए विष्णुको देखा । और शम्भुकी मायासे मोहित होकर उन लक्ष्मीपति । १ ९ विष्णुको क्रोधपूर्वक मारकर उन्हें उठाया और कहा-तुम कौन हो, बताओ ॥ १७–१९ १ / २ ॥

पृष्ठ 1055

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अ ० ३४ ] वायवीयसंहिता स तु हस्तप्रहारेण तीव्रेणाभिहतः क्षणात् ॥ २० प्रबुद्धोत्थाय शयनाद्ददर्श परमेष्ठिनम् । तमाह चान्तः संक्रुद्धः स्वयमक्रुद्धवद्धरिः ॥ २१

कुतस्त्वमागतो वत्स कस्मात्त्वं व्याकुलो वद ।

इति विष्णुवचः श्रुत्वा प्रभुत्वगुणसूचकम् ॥२२

रजसा बद्धवैरस्तं ब्रह्मा पुनरभाषत ।

वत्सेति मां कुतो ब्रूषे गुरुः शिष्यमिवात्मनः ॥ २३

मां न जानासि किं नाथं प्रपञ्चो यस्य मे कृतिः ।

त्रिधात्मानं विभज्येदं सृष्ट्वाथ परिपाल्यते ॥ २४

संहरामि न मे कश्चित् स्स्रष्टा जगति विद्यते ।

इत्युक्ते सति सोऽप्याह ब्रह्माणं विष्णुरव्ययः ॥ २५

अहमेवादिकर्तास्य हर्ता च परिपालकः ।

भवानपि ममैवाङ्गादवतीर्णः पुराव्ययात् ॥ २६

मन्नियोगात्त्वमात्मानं त्रिधा कृत्वा जगत्त्रयम् ।

सृजस्यवसि चान्ते तत्पुनः प्रतिसृजस्यपि ॥ २७

विस्मृतोऽसि जगन्नाथं नारायणमनामयम् ।

तवापि जनकं साक्षान्मामेवमवमन्यसे ॥ २८

तवापराधो नास्त्यत्र भ्रान्तोऽसि मम मायया ।

मत्प्रसादादियं भ्रांतिरपैष्यति तवाचिरात् ॥ २ ९

शृणु सत्यं चतुर्वक्त्र सर्वदेवेश्वरो ह्यहम् ।

कर्ता भर्ता च हर्ता च न मयास्ति समो विभुः ॥ ३०

एवमेव विवादोऽभूद् ब्रह्मविष्ण्वोः परस्परम् ।

अभवच्च महायुद्धं भैरवं रोमहर्षणम् ॥ ३१

मुष्टिभिर्निघ्नतोस्तीव्रं रजसा बद्धवैरयोः । ( उत्तरखण्ड ) १०४१ हाथके तीव्र प्रहारसे आहत हुए वे विष्णु क्षणभरमें जग गये तथा उन्होंने शयनसे उठकर ब्रह्माजीको देखा और मनमें क्रुद्ध होकर भी स्वयं क्रोधरहितकी भाँति उनसे कहा - हे वत्स! तुम कहाँसे आये हो और [ इतना ] व्याकुल किसलिये हो, इसे बताओ ॥ २०-२११ / २ ॥ विष्णुका यह प्रभुत्वगुणसूचक वचन सुनकर रजोगुणसे [ चित्तके आक्रान्त होनेके कारण विष्णुके प्रति ] शत्रुताकी भावनावाले ब्रह्माने पुनः उनसे कहा— जैसे गुरु अपने शिष्यसे कहता है, वैसे ही तुम मुझे ' वत्स ' – ऐसा क्यों कह रहे हो? क्या तुम मुझ स्वामीको नहीं जानते हो, यह सम्पूर्ण जगत् - प्रपंच जिसकी अपनी रचना है? अपनेको तीन रूपोंमें विभक्त करके मैं इस जगत्का सृजन करके पुनः इसका पालन करता हूँ और [ अन्तमें ] संहार भी कर देता हूँ, संसारमें मेरी सृष्टि करनेवाला कोई नहीं है ॥ २२–२४१ / २ ॥ उनके ऐसा कहनेपर उन अविनाशी विष्णुने भी ब्रह्मासे कहा- मैं ही इस जगत्का आदिकर्ता, परिपालक तथा संहारक हूँ । आप भी पूर्वकालमें मेरे ही अव्ययस्वरूपसे अवतीर्ण हुए थे । मेरी ही आज्ञासे तुम अपनेको तीन रूपोंमें विभक्त करके तीनों लोकोंका सृजन करते हो, पालन करते हो और फिर अन्तमें संहार भी करते हो ॥ २५–२७ ॥ क्या तुम मुझ जगत्पति, निर्विकार नारायणको भूल गये हो और अपने ही पिताका ऐसा अपमान कर रहे हो, इसमें तुम्हारा अपराध नहीं है, तुम मेरी मायाके कारण भ्रमित हो गये हो, तुम्हारी यह भ्रान्ति मेरी कृपासे शीघ्र ही दूर हो जायगी ॥ २८-२९ ॥ हे चतुर्मुख! सत्य बात सुनो, मैं निश्चय ही सभी देवताओंका स्वामी हूँ और [ जगत्का ] सृजन करनेवाला, पालन करनेवाला तथा संहार करनेवाला हूँ, मेरे समान ऐश्वर्यशाली कोई नहीं है ॥३० ॥

ब्रह्मा तथा विष्णुका आपसमें इस प्रकारका विवाद हुआ और रजोगुणके कारण बद्धवैरवाले उन दोनोंके बीच घूँसोंसे एक - दूसरेपर तीव्र प्रहार करते हुए भयानक तथा रोमांचकारी युद्ध होने लगा । तब

पृष्ठ 1056

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१०४२ तयोर्दर्पापहाराय प्रबोधाय च देवयोः मध्ये समाविरभवल्लिंगमैश्वरमद्भुतम् ज्वालामालासहस्राढ्यमप्रमेयमनौपमम् क्षयवृद्धिविनिर्मुक्तमादिमध्यान्तवर्जितम् तस्य ज्वालासहस्त्रेण ब्रह्मविष्णू विमोहितौ विसृज्य युद्धं किं त्वेतदित्यचिन्तयतां तदा न तयोस्तस्य याथात्म्यं प्रबुद्धमभवद्यदा तदा समुद्यतौ स्यातां तस्याद्यन्तं परीक्षितुम् तत्र हंसाकृतिर्ब्रह्मा विश्वतः पक्षसंयुतः । मनोऽनिलजवो भूत्वा गतस्तूर्ध्वं प्रयत्नतः

नारायणोऽपि विश्वात्मा नीलाञ्जनचयोपमम् ।

वाराहममितं रूपमास्थाय गतवानधः ॥

एवं वर्षसहस्रं तु त्वरन् विष्णुरधोगतः । [ अ ० ३४ ॥ ३२ । उन दोनों देवताओंके अभिमानको नष्ट करनेके लिये | तथा उनके प्रबोधनके लिये उनके बीच अद्भुत । । शिवलिंग प्रकट हुआ, जो हजारों ज्वालासमूहोंसे ॥३३ युक्त, असीम, अनुपम, क्षय - वृद्धिसे रहित और आदि-। मध्य तथा अन्तसे रहित था ॥ ३१–३३३ ॥ ॥ ३४ तब उसके हजारों ज्वालासमूहोंसे ब्रह्मा | तथा विष्णु मोहित हो गये और युद्ध छोड़कर । । ' यह क्या है ' - ऐसा सोचने लगे । जब उन दोनोंको ॥ ३५ उसकी यथार्थता समझमें नहीं आयी, तब वे उसके ॥ ३६ आरम्भ तथा अन्तकी परीक्षा करनेके लिये उद्यत हुए ॥ ३४–३६ ॥ उस समय ब्रह्माजी पंख धारण किये हुए हंसरूप ॥ ३७ होकर सभी ओर मन तथा वायुके सदृश वेगवान् । होकर प्रयत्नपूर्वक ऊपरकी ओर गये और विश्वात्मा विष्णु भी नील अंजनपर्वतके समान वाराहका रूप ३८ धारणकर नीचेकी ओर गये॥३७-३८ ॥ इस प्रकार वराहरूपधारी विष्णुजी शीघ्रता करते नापश्यदल्पमप्यस्य मूलं लिङ्गस्य सूकरः ॥ ३ ९ हुए एक हजार वर्षोंतक नीचे जाते रहे, किंतु वे इस

तावत्कालं गतश्चोर्ध्वं तस्यान्तं ज्ञातुमिच्छया ।

श्रान्तोऽत्यन्तमदृष्ट्वान्तं पपाताधः पितामहः ॥

तथैव भगवान् विष्णुः श्रान्तः संविग्नलोचनः ।

क्लेशेन महता तूर्णमधस्तादुत्थितोऽभवत् ॥

समागतावथान्योन्यं विस्मयस्मेरवीक्षणौ ।

मायया मोहितौ शम्भोः कृत्याकृत्यं न जग्मतुः ॥

पृष्ठतः पार्श्वतस्तस्य चाग्रतश्च स्थितावुभौ ।

प्रणिपत्य किमात्मेदमित्यचिन्तयतां तदा ॥

इति श्रीशिवमहापुराणे हरिविधिमोहवर्णनं ॥ इस प्रकार श्रीशिवमहापुराणके लिंगके मूलदेशको अल्पमात्र भी देख पानेमें समर्थ नहीं हो सके । उसका अन्त जाननेकी इच्छासे उतने ४० ही समयतक ऊपरकी ओर गये हुए ब्रह्मा भी अत्यधिक थक गये और उसका अन्त न देखकर नीचे गिर पड़े ॥३ ९ -४० ॥ उसी प्रकार आकुल नेत्रोंवाले भगवान् विष्णु भी ४१ थककर बड़े कष्टसे शीघ्रतापूर्वक नीचेसे ऊपर आ गये ॥ ४१ ॥

वे दोनों आकर आश्चर्य तथा मुसकानसे युक्त ४२ होकर एक - दूसरेको देखने लगे और शिवकी मायासे मोहित होकर अपने कृत्य तथा अकृत्यको नहीं जान सके । उस समय वे दोनों उस [ लिंग ] -के पीछे, बगलमें तथा आगे खड़े होकर उसे प्रणाम करके ‘ यह ४३ । क्या है ' - ऐसा सोचने लगे॥४२-४३ ॥ सप्तम्यां वायवीयसंहितायामुत्तरखण्डे नाम चतुस्त्रिंशोऽध्यायः ॥ ३४ ॥

अन्तर्गत सातवीं वायवीयसंहिताके उत्तरखण्डमें हरिविधिमोहवर्णन नामक चौंतीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ३४ ॥

पृष्ठ 1057

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अ ० ३५ ] वायवीयसंहिता ( उत्तरखण्ड ) १०४३ अथ पञ्चत्रिंशोऽध्यायः लिंगमें शिवका प्राकट्य तथा उनके द्वारा ब्रह्मा - विष्णुको उपमन्युरुवाच

अथाविरभवत्तत्र सनादं शब्दलक्षणम् ।

ओमित्येकाक्षरं ब्रह्म ब्रह्मणः प्रतिपादकम् ॥ १

तदप्यविदितं तावद् ब्रह्मणा विष्णुना तथा ।

रजसा तमसा चित्तं तयोर्यस्मात्तिरस्कृतम् ॥

तदा विभक्तमभवच्चतुर्द्धकं तदक्षरम् ।

अ उ मेति त्रिमात्राभिः परस्ताच्चार्द्धमात्रया ॥ ३

तत्राकारः श्रितो भागे ज्वलल्लिङ्गस्य दक्षिणे ।

उकारश्चोत्तरे तद्वन्मकारस्तस्य मध्यतः ॥ ४

अर्द्धमात्रात्मको नादः श्रूयते लिङ्गमूर्द्धनि ।

विभक्तेऽपि तदा तस्मिन् प्रणवे परमाक्षरे ॥ ५

विभागार्थं च तौ देवौ न किञ्चिदवजग्मतुः ।

वेदात्मना तदाव्यक्तः प्रणवो विकृतिं गतः ॥ ६

तत्राकारो ऋगभवदुकारो यजुरव्ययः ।

मकारः साम सञ्जातो नादस्त्वाथर्वणी श्रुतिः ॥ ७

ऋगयं स्थापयामास समासात्त्वर्थमात्मनः ।

रजोगुणेषु ब्रह्माणं मूर्तिष्वाद्यं क्रियास्वपि ॥ ८

सृष्टिं लोकेषु पृथिवीं तत्त्वेष्वात्मानमव्ययम् ।

कलाध्वनि निवृत्तिं च सद्यं ब्रह्मसु पञ्चसु ॥ ९

लिङ्गभागेष्वधोभागं बीजाख्यं कारणत्रये ।

चतुःषष्टिगुणैश्वर्यं बौद्धं यदणिमादिषु ॥ १०

तदित्थमर्थैर्दशभिर्व्याप्तं विश्वमृचा जगत् ।

अथोपस्थापयामास स्वार्थं दशविधं यजुः ॥ ११

सत्त्वं गुणेषु विष्णुं च मूर्तिष्वाद्यं क्रियास्वपि ।

स्थितिं लोकेष्वन्तरिक्षं विद्यां तत्त्वेषु च त्रिषु ॥ १२

कलाध्वसु प्रतिष्ठां च वामं ब्रह्मसु पञ्चसु ।

मध्यं तु लिङ्गभागेषु योनिं च त्रिषु हेतुषु ॥ १३

प्राकृतं च तथैश्वर्यं तस्माद्विश्वं यजुर्मयम् । दिये गये ज्ञानोपदेशका वर्णन उपमन्यु बोले— [ हे कृष्ण! ] तदुपरान्त वहाँपर ब्रह्मतत्त्वका प्रतिपादक, नादमय, एकाक्षरात्मक शब्द-ब्रह्म ओंकार प्रकट हुआ ॥१ ॥

उस समय ब्रह्मा तथा विष्णु उसे भी नहीं जान सके; क्योंकि उन दोनोंका चित्त रजोगुण तथा तमोगुणसे आच्छन्न था ॥२ ॥

तब वह एक अक्षर [ ओम् ] अ, उ, म् – इन तीन मात्राओं तथा आगे आधी मात्राके द्वारा चार भागोंमें विभक्त हो गया ॥३ ॥

उस जाज्वल्यमान लिंगके दक्षिण भागमें अकार, उत्तरमें उकार और उसी तरह मध्यमें मकार सुना गया । लिंगके शीर्षभागमें अर्धमात्रात्मक नाद सुना गया ॥ ४३ ॥

तब उस परम अक्षर प्रणव ( ओम् ) -के विभक्त होनेपर भी वे दोनों देवता उस विभाजनके अर्थको कुछ भी नहीं समझ सके । इसके वह बाद अव्यक्त प्रणव वेदोंके रूपमें परिणमित हो गया । उसका अकार ऋग्वेद, उकार यजुर्वेद, मकार सामवेद और [ अर्धमात्रात्मक ] नाद अथर्ववेद हुआ॥५–७ ॥ [ सर्वप्रथम ] उस ऋग्वेदने संक्षेपमें अपने [ दशविध ] तात्पर्यको प्रस्तुत किया — गुणोंमें रजोगुण, मूर्तियोंमें आदिमूर्ति ब्रह्मा, क्रियाओंमें सृष्टि - क्रिया, लोकोंमें भूर्लोक, तत्त्वोंमें अविनाशी आत्मतत्त्व, कलाध्वोंमें निवृत्तिकला, पंचब्रह्मोंमें सद्योजात, लिंगके विभागोंमें अधोदेश, तीनों कारणोंमें बीज नामक कारण तथा अणिमादि सिद्धियोंमें स्थित चतुष्षष्टिगुणात्मक ऐश्वर्योंमें बौद्ध ऐश्वर्य – इस प्रकार दस अर्थोंसे समन्वित ऋग्वेदके द्वारा समस्त विश्व व्याप्त है ॥ ८-१० १/२ ॥ तदुपरान्त यजुर्वेदने अपने दशविध तात्पर्योको प्रतिपादित किया - गुणोंमें सत्त्वगुण, मूर्तियोंमें आदिमूर्ति विष्णु क्रियाओंमें स्थिति नामक क्रिया, लोकोंमें अन्तरिक्ष, तत्त्वोंमें विद्यातत्त्व, कलाध्वोंमें प्रतिष्ठा नामक कला, पंचब्रह्मों में वामदेव, लिंगविभागोंमें मध्यभाग, तीनों कारणोंमें योनि नामक कारण तथा ऐश्वर्योंमें प्राकृत ऐश्वर्य– इस प्रकार यह विश्व यजुर्वेदमय है ॥ ११–१३३ ॥

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( श्रीशिवमहापुराण [ अ ० ३५ १०४४ ततोपस्थापयामास सामार्थं दशधात्मनः ॥ १४

तमोगुणेष्वथो रुद्रं मूर्तिष्वाद्यं क्रियासु च ।

संहृतिं त्रिषु लोकेषु तत्त्वेषु शिवमुत्तमम् ॥ १५

विद्याकलास्वघोरं च तथा ब्रह्मसु पञ्चसु ।

लिङ्गभागेषु पीठोदर्ध्वं बीजिनं कारणत्रये ॥ १६

पौरुषं च तथैश्वर्यमित्थं साम्ना ततं जगत् ।

अथाथर्वाह नैर्गुण्यमर्थं प्रथममात्मनः ॥ १७

ततो महेश्वरं साक्षात् मूर्तिष्वपि सदाशिवम् ।

क्रियासु निष्क्रियस्यापि शिवस्य परमात्मनः ॥ १८

भूतानुग्रहणं चैव मुच्यन्ते येन जन्तवः ।

लोकेष्वपि यतो वाचो निवृत्ता मनसा सह ॥ १ ९

तदूर्ध्वमुन्मनालोकात् सोमलोकमलौकिकम् ।

सोमः सहोमया यत्र नित्यं निवसतीश्वरः ॥ २०

तदूर्ध्वमुन्मनालोकाद्यं प्राप्तो न निवर्तते ।

शान्तिं च शान्त्यतीतां च व्यापिकां वै कलास्वपि ॥ २१

तत्पूरुषं तथेशानं ब्रह्म ब्रह्मसु पञ्चसु ।

मूर्द्धानमपि लिङ्गस्य नादभागेष्वनुत्तमम् ॥ २२

यत्रावाह्य समाराध्यः केवलो निष्कलः शिवः ।

तत्त्वेष्वपि तदा बिन्दोर्नादात् शक्तेस्ततः परात् ॥ २३

तत्त्वादपि परं तत्त्वमतत्त्वं परमार्थतः ।

कारणेषु त्रयातीतान् मायाविक्षोभकारणात् ॥ २४

अनन्तात् शुद्धविद्यायाः परस्ताच्च महेश्वरात् ।

सर्वविद्येश्वराधीशान्न पराच्च सदाशिवात् ॥ २५

इसके पश्चात् सामवेदने अपने दशविध अर्थका | प्रतिपादन किया- गुणोंमें तमोगुण, मूर्तियोंमें आदिमूर्ति | रुद्र, क्रियाओंमें संहार क्रिया, तीनों लोकोंमें [ स्वर्ग लोक, तत्त्वोंमें उत्तम शिवतत्त्व, कलाध्वोंमें विद्याकला ] | पंचब्रह्मोंमें अघोर ब्रह्म, लिंगविभागों में पीठोर्ध्वभाग, तीनों कारणोंमें बीजी नामक कारण तथा ऐश्वयमिं, | पौरुष ऐश्वर्य - इस प्रकार यह विश्व सामवेदसे अभिव्याप्त है॥१४–१६१ / २ ॥ इसके उपरान्त अथर्ववेदने अपने निर्गुणात्मक | उत्कृष्ट तात्पर्यका प्रतिपादन किया- मूर्तियों में सदाशिवकी महेश्वर नामवाली मूर्ति, क्रियारहित परमात्मा शिवकी [ उपचारत: ] होनेवाली क्रियाओंमें प्राणिमात्रके प्रति अनुग्रहरूपा क्रिया, जिसके कारण ही प्राणियोंको मोक्षलाभ होता है; लोकोंमें वह अलौकिक सोमलोक, जिसे अधिगत करनेमें वागादि इन्द्रियोंसहित मन भी असमर्थ हो लौट आता है, वह अलौकिक सोमलोक तो उन्मनालोकसे भी ऊपर है, जहाँ उमाके साथ साम्बसदाशिव भगवान् ईशान नित्य विराजते हैं । उन्मनालोकके ऊपर विद्यमान उस लोकको प्राप्त हुआ जीव पुनः जन्म नहीं लेता ॥ १७–२०१ / २ ॥ कलाओंमें शान्तिकला तथा सभी कलाओं में अभिव्याप्त शान्त्यतीता कला, पंचब्रह्मोंमें तत्पुरुष तथा ईशानसंज्ञक ब्रह्म, लिंगके विभागोंमें मूर्धा नामक विभाग, [ प्रणवके कल्पित ] अवयवोंमें नाद नामक वह अवयव, जिसमें आवाहनपूर्वक एकमात्र निष्कल शिवकी ही आराधना की जाती है । तत्त्वोंमें वह तत्त्व, जो बिन्दुसे लेकर नाद तथा शक्तिसे भी परे है । उस तत्त्वसे भी परे जो परमार्थतः परतत्त्व है और जो अतत्त्व भी कहा जाता है । मायाके विक्षोभसे जो कार्यके जनक होते हैं, उन तीनों कारणोंसे भी वह अतीत है॥२१–२४ ॥ ३१ शुद्धविद्यासे परे जो महान् ऐश्वर्यवाला अनन्ततत्त्व है, उससे भी परे जो सर्वविद्येश्वरेश्वर तत्त्व है, उससे भी परे वह तत्त्व है, किंतु वह सदाशिवसे परे नहीं है ॥ २५ ॥

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अ ० ३५ ] वायवीयसंहिता

सर्वमन्त्रतनोर्देवात् शक्तित्रयसमन्वितात् ।

पञ्चवक्त्राद्दशभुजात् साक्षात् सकलनिष्कलात् ॥

२६ तस्मादपि पराद्विन्दोरर्द्धन्दोश्च ततः परात् । ततः परान्निशाधीशान्नादाख्याच्च ततः परात् ॥ २७ ततः परात् सुषुम्णेशाद् ब्रह्मरन्ध्रेश्वरादपि । ततः परस्मात् शक्तेश्च तेश्च परस्तात् शिवतत्त्वतः ॥ २८

परमं कारणं साक्षात्स्वयं निष्कारणं शिवम् ।

कारणानां च धातारं ध्यातारं ध्येयमव्ययम् ॥ २ ९

परमाकाशमध्यस्थं परमात्मोपरि स्थितम् ।

सर्वैश्वर्येण सम्पन्नं सर्वेश्वरमनीश्वरम् ॥ ३०

ऐश्वर्याच्चापि मायेयादशुद्धान् मानुषादिकात् ।

अपराच्च परात्त्याज्यादविशुद्धाध्वगोचरात् ॥ ३१

तत्परात् शुद्धविद्याद्यादुन्मनान्तात्परात्परात् ।

परमं परमैश्वर्यमुन्मनाद्यमनादि च ॥३२

अपारमपराधीनं निरस्तातिशयं स्थिरम् ।

इत्थमथैर्दशविधैरियमाथर्वणी श्रुतिः ॥ ३३

यस्माद् गरीयसी तस्माद्विश्वं व्याप्तमथर्वणा ।

ऋग्वेदः पुनराहेदं जाग्रद्रूपं मयोच्यते ॥ ३४

येनाहमात्मतत्त्वस्य नित्यमस्म्यभिधायकः ।

यजुर्वेदोऽवदत्तद्वत्स्वप्नावस्था मयोच्यते ॥ ३५

भोग्यात्मना परिणता विद्या वेद्या यतो मयि ।

साम चाह सुषुप्त्याख्यमेवं सर्वं मयोच्यते ॥ ३६

ममार्थेन शिवेनेदं तामसेनाभिधीयते । ( उत्तरखण्ड ) १०४५ सकलमन्त्रमय देहवाले, तीनों शक्तियोंसे समन्वित पंचमुख , दशभुज, सकल एवं निष्कल स्वरूपवाले साक्षात् परमदेवसे भी परे है । उनसे भी परे जो बिन्दु तथा अर्धेन्दुतत्त्व हैं और उनसे भी परे नाद नामक निशाधीश ( सोम ) तत्त्व परे सुषुम्णेश तथा उनसे परे ब्रह्मरन्ध्रेश है । नादसे ब्रह्मरन्ध्रेश्वरसे परे शक्तितत्त्व तत्त्व है, ( कुण्डलिनी ) तथा शक्तिसे परे स्थित जो शिवतत्त्व है, वह उससे भी परे है ॥ २६–२८ ॥ [ वे सर्वतत्त्वातीत परमतत्त्व ] भगवान् शिव जगत्के साक्षात् कारण न होते हुए भी वस्तुत: परमकारण हैं । उन्हींको कारणोंका आश्रय, ध्याता, ध्येय, अविनाशी, परमव्योमके मध्यमें अवस्थित, परमात्मतत्त्वसे भी ऊपर स्थित, सर्वैश्वर्यसम्पन्न, सर्वेश्वर, एकमात्र स्वयं ईश्वररूप [ माना गया है । ] मायासे जायमान अशुद्ध मानुषादि ऐश्वर्यसे परे, अपरसे भी परे जो षडध्वगोचर तत्त्व है, उससे भी परे, जो शुद्ध विद्यासे लेकर उन्मनापर्यन्त व्यापक परात्पर तत्त्व है, जो परमोत्कृष्ट है, परमैश्वर्यमय है, उन्मनाका भी आदि कारण तथा अनादि है । जो अनुल्लंघ्य, नित्य स्वतन्त्र, समस्त विशेषोंसे विशिष्ट है तथा स्थिर है— वही परमशिव है ॥२ ९ –३२१ / २ ॥ इस प्रकार इन दशविध अर्थोंसे समन्वित यह अथर्ववेद अत्यन्त महनीय है तथा यह समस्त विश्व अथर्ववेदके द्वारा व्याप्त है ॥ ३३१/२ ॥ ऋग्वेदने पुनः यह कहा कि [ जीवात्मा या जगत्की ] जाग्रदवस्थाका निरूपण मेरे द्वारा किया जाता है; क्योंकि मैं ही आत्मतत्त्वका सतत प्रतिपादन करनेवाला हूँ । उसी प्रकार यजुर्वेदने कहा कि [ जीवात्मा या जगत्की ] स्वप्नदशाका प्रतिपादन मेरे द्वारा किया जाता है; क्योंकि मुझमें या कि मुझसे ही भोग्यरूपमें परिणत हुई विद्याका अधिगम होता है । तदुपरान्त सामवेदने कहा कि सुषुप्ति नामक अवस्थाका समग्रतया प्रतिपादन मेरे द्वारा होता है तथा तमोगुणाश्रयी रुद्रके द्वारा प्रतिपादित समस्त अर्थ मेरा ही कथन है ॥ ३४-३६१ / २ ॥

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श्रीशिवमहापुराण [ अ ० ३५ १०४६ अथर्वाह तुरीयाख्यं तुरीयातीतमेव च ॥ ३७

मयाभिधीयते तस्मादध्वातीतपदोऽस्म्यहम् ।

अध्वात्मकं तु त्रितयं शिवविद्यात्मसंज्ञितम् ॥ ३८

तत्त्रैगुण्यं त्रयीसाध्यं संशोध्यं च पदैषिणा ।

अध्वातीतं तुरीयाख्यं निर्वाणं परमं पदम् ॥ ३ ९

तदतीतं च नैर्गुण्यादध्वनोऽस्य विशोधकम् ।

द्वयोः प्रमापको नादो नादान्तश्च मदात्मकः ॥ ४०

तस्मात् ममार्थस्वातन्त्र्यात् प्रधानः परमेश्वरः ।

यदस्ति वस्तु तत्सर्वं गुणप्राधान्ययोगतः ॥ ४१

समस्तं व्यस्तमपि च प्रणवार्थं प्रचक्षते ।

सर्वार्थवाचकं तस्मादेकं ब्रह्मैतदक्षरम् ॥ ४२

तेनोमिति जगत्कृत्स्नं कुरुते प्रथमं शिवः ।

शिवो हि प्रणवो ह्येष प्रणवो हि शिवः स्मृतः ॥ ४३

वाच्यवाचकयोर्भेदो नात्यन्तं विद्यते यतः ।

चिन्तया रहितो रुद्रो वाचो यन्मनसा सह ॥ ४४

अप्राप्य तन्निवर्तन्ते वाच्यस्त्वेकाक्षरेण सः ।

एकाक्षरादकाराख्यादात्मा ब्रह्माभिधीयते ॥ ४५

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एकाक्षरादुकाराख्याद् विद्या विष्णुरुदीर्यते ।

एकाक्षरान्मकाराख्यात् शिवो रुद्र उदाहृतः ॥ ४६

तत्पश्चात् अथर्ववेदने कहा कि ' तुरीय ' नामक तत्त्व तथा तुरीयातीत तत्त्व भी मेरे द्वारा ही निरूपित | होता है, इसलिये मुझे अध्वातीतपद अर्थात् अध्वातीत तत्त्वका प्रतिपादक भी कहा जाता है । अध्वात्मक तत्त्व तीन हैं- शिवतत्त्व, विद्यातत्त्व तथा आत्मतत्त्व । ये तीनों ही त्रिगुणात्मक तथा वेदोंके द्वारा ज्ञात । होनेयोग्य हैं । परमपदकी अभिलाषावाले साधकको अध्वातीत तुरीयनामक तत्त्वका अनुसन्धान करना चाहिये । यह तुरीयतत्त्व [ निर्विशेष ब्रह्म ] ही निर्वाण तथा परमपद कहा जाता है । गुणरहित होनेके कारण यह तुरीयतत्त्व अध्वातीत भी कहा गया है तथा अध्वात्मक शिवादि तत्त्वोंका यह विशोधक भी है । तुरीय तथा अध्वत्रितय शिवादि- इन दोनोंके आविर्भावका हेतु नाद है तथा नादतत्त्वकी चरम अवस्था ही मेरा स्वरूप है । इसलिये मेरे अनुसार [ सर्वतोभावेन ] स्वतन्त्र होनेसे परमेश्वर शिव ही प्रधान तत्त्व हैं ॥ ३७–४०१ / २ ॥ [ इस जगत्में ] जो कोई भी वस्तु है, वह सब गुणोंकी प्रधानताके योगसे समष्टि अथवा व्यष्टिरूपमें प्रणवार्थ कही जाती है । इसीलिये यह ब्रह्मरूप, एकाक्षरात्मक प्रणव [ व्यष्टि अथवा समष्टिरूप ] प्रत्येक वस्तुका अभिधायक कहा गया है । यही कारण है कि इस समग्र विश्वकी रचना ओंकारके द्वारा सर्वप्रथम भगवान् शिव करते हैं । शिवजी प्रणवसे अभिन्न हैं तथा यह प्रणव भी साक्षात् शिव ही है । [ प्रणव वाचक है तथा शिव वाच्य है; ] क्योंकि वाच्य और वाचकमें परमार्थतः भेद नहीं होता ॥ ४१-४३१ / २ ॥ भगवान् रुद्र [ सर्वथा ] अचिन्त्य हैं, क्योंकि वागादि इन्द्रियाँ भी मनके साथ उनका अनुसन्धान करनेमें असमर्थ होकर लौट आती हैं । वे [ रुद्रदेव तो केवल ] एकाक्षरात्मक प्रणवके द्वारा ही प्रतिपादित किये जा सकते हैं । [ प्रणवके अन्तर्वर्ती ] अकार नामक एकाक्षरसे आत्मस्वरूप ब्रह्माका निरूपण किया जाता है, उकार नामक एकाक्षरसे विद्यास्वरूप विष्णुका निरूपण | किया जाता है तथा मकार नामक एकाक्षरसे शिवस्वरूप रुद्रका प्रतिपादन किया जाता है ॥ ४४-४६ ॥ ७१७