श्रीगणेशाय नमः।
शिव महापुराण - २ — पृष्ठ 1061–1070
शिव महापुराण - २ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 1061–1070
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अ ० ३५ ] वायवीयसंहिता दक्षिणाङ्गान् महेशस्य जातो ब्रह्मात्मसंज्ञकः
वामाङ्गादभवद्विष्णुस्ततो ।
विद्येति संज्ञितः ॥ ४७
हृदयान्नीलरुद्रोऽभूच्छिवस्य शिवसंज्ञकः । सृष्टेः प्रवर्तको ब्रह्मा स्थितेर्विष्णुर्विमोहकः ॥ ४८ संहारस्य तथा रुद्रस्तयोर्नित्यं नियामकः ॥ ४ ९
तस्मात्त्रयस्ते कथ्यन्ते जगतः कारणानि च ।
कारणत्रयहेतुश्च शिवः परमकारणम् ॥ ५०
अर्थमेतमविज्ञाय रजसा बद्धवैरयोः ।
युवयोः प्रतिबोधाय मध्ये लिङ्गमुपस्थितम् ॥ ५१
एवमोमिति मां प्राहुर्यदिहोक्तमथर्वणा ।
ऋचो यजूंषि सामानि शाखाश्चान्याः सहस्रशः ॥ ५२
वेदेष्वेवं स्वयं वक्त्रैर्व्यक्तमित्थं वदत्स्वपि ।
स्वप्नानुभूतमिव तत्ताभ्यां नाध्यवसीयते ॥ ५३
तयोस्तत्र प्रबोधाय तमोपनयनाय च ।
लिङ्गेऽपि मुद्रितं सर्वं यथा वेदैरुदाहृतम् ॥ ५४
तद् दृष्ट्वा मुद्रितं लिङ्गे प्रसादाल्लिङ्गिनस्तदा ।
प्रशान्तमनसौ देवौ प्रबुद्धौ सम्बभूवतुः ॥ ५५
उत्पत्तिं विलयं चैव याथात्म्यं च षडध्वनाम् ।
ततः परतरं धाम धामवन्तं च पूरुषम् ॥ ५६
निरुत्तरतरं ब्रह्म निष्कलं शिवमीश्वरम् ।
पशुपाशमयस्यास्य प्रपञ्चस्य सदा पतिम् ॥ ५७
अकुतोभयमत्यन्तमवृद्धिक्षयमव्ययम् बाह्यमाभ्यन्तरं व्याप्तं बाह्याभ्यन्तरवर्जितम् ॥ ५८
। निरस्तातिशयं शश्वद्विश्वलोकविलक्षणम् ।
अलक्षणमनिर्देश्यमवाङ्मनसगोचरम् ॥ ५ ९ ।
( उत्तरखण्ड ) १०४७ महेश्वरके दक्षिणांगसे आत्मसंज्ञक ब्रह्माका प्रादुर्भाव हुआ तथा उनके वामांगसे विद्यासंज्ञक विष्णु हुए | उन सदाशिव हृदयदेशसे शिवसंज्ञक प्रकट प्राकट्य हुआ । ब्रह्माके द्वारा सृष्टिका नीलरुद्रका और विमोहक प्रवर्तन हुआ विष्णुके द्वारा स्थितिकार्य किया गया । रुद्रदेवने सृष्टिका संहार तथा सम्पन्न विष्णुका नियमन कार्य किया॥४७–४९ ब्रह्मा और ॥ यही कारण है कि ये तीनों देवता जगत्के कारण कहे गये हैं और इन तीनों कारणोंके भी कारण शिव परमकारण कहे गये हैं । इस बातको बिना भलीभाँति समझे रजोगुणसे प्रेरित होकर तुम दोनोंने आपसमें वैर बाँध लिया, अतः तुमलोगोंको प्रतिबोधित करनेके लिये मध्यमें यह लिंग उपस्थित हुआ ॥ ५०-५१ ॥ इस प्रकार अथर्ववेदके द्वारा प्रतिपादित मतका समर्थन ' ओम् ' [ ऐसा ही है ] कहकर सैकड़ों, हजारों शाखाओंवाले ऋग्वेद, यजुर्वेद तथा सामवेदने भी किया । स्वयं वेदोंके द्वारा अपने श्रीमुखसे इस प्रकार सुस्पष्ट रूपसे कहे जानेपर भी उन दोनों [ देवताओं ] -को स्वप्नकालिक अनुभूतिके समान [ परमतत्त्वका ] निश्चय न हो सका, तब वहाँपर उनके अज्ञानका हरणकर उन्हें प्रबोधित करनेके लिये वह वेदोक्त मत उसी लिंगमें वैसे ही मुद्रित अर्थात् अंकित हो गया । तब उन लिंगी भगवान् शिवके अनुग्रहसे लिंगमें अंकित उस अभिप्रायका अवलोकनकर वे दोनों देवता शान्तचित्त तथा ज्ञानवान् हो गये॥५२–५५ ॥ उस समय उत्पत्ति, प्रलय, षडध्वाओंका वास्तविक स्वरूप, अध्वातीत श्रेष्ठतम परमपद, परमपदमें अधिष्ठित परमपुरुष, निरुत्तरतर अर्थात् सर्वातिशायि निष्कल ब्रह्मस्वरूप महेश्वर शिव, जो कि पशुपाशमय इस जगत्प्रपंचके नित्य अधिपति हैं, जो सर्वतोभावेन भयरहित हैं, जिनके स्वस्वरूपमें वृद्धि अथवा ह्रासरूप विकार नहीं होते, ऐसे बाह्य- आभ्यन्तरदेशमें व्याप्त, बाह्य तथा आभ्यन्तरके भेदसे रहित, सर्वथा समस्त अतिशयोंका अतिक्रमण करनेवाले, समस्त लोकसे विलक्षण, लक्षणोंसे रहित, अनिर्देश्य, वागादि इन्द्रियों तथा मनसे ज्ञात न होनेवाले, ज्योतिःस्वरूप, एकरस, शान्त, प्रसन्न, सर्वदा भासमान, समस्त मंगलोंके
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१०४८ प्रकाशैकरसं शान्तं प्रसन्नं सततोदितम् सर्वकल्याणनिलयं शक्त्या तादृशयान्वितम् ज्ञात्वा देवं विरूपाक्षं ब्रह्मनारायणौ तदा रचयित्वाञ्जलिं मूर्ध्नि भीतौ तौ वाचमूचतुः ब्रह्मोवाच अज्ञो वाहमभिज्ञो वा त्वयादौ देव निर्मितः ईदृशीं भ्रान्तिमापन्न इति कोऽत्रापराध्यति आस्तां ममेदमज्ञानं त्वयि सन्निहते प्रभो निर्भयः कोऽभिभाषेत कृत्यं स्वस्य परस्य वा आवयोर्देवदेवस्य विवादोऽपि हि शोभनः पादप्रणामफलदो नाथस्य भवतो यतः विष्णुरुवाच स्तोतुं देव न वागस्ति महिम्नः सदृशी तव प्रभोरग्रे विधेयानां तूष्णींभावो व्यतिक्रमः किमत्र संघटेत्कृत्यमित्येवावसरोचितम् । अजानन्नपि यत्किञ्चित् प्रलप्य त्वां नतोऽस्म्यहम् कारणत्वं त्वया दत्तं विस्मृतं तव मायया । मोहितोऽहंकृतश्चापि पुनरेवास्मि शासितः
विज्ञापितैः किं बहुभिर्भीतोऽस्मि भृशमीश्वर ।
यतोऽहमपरिच्छेद्यं त्वां परिच्छेत्तुमुद्यतः ॥
त्वामुशन्ति महादेवं भीतानामार्तिनाशनम् ।
अतो व्यतिक्रमं मेऽद्य क्षन्तुमर्हसि शंकर ॥
इति विज्ञापितस्ताभ्यामीश्वराभ्यां महेश्वरः ।
प्रीतोऽनुगृह्य तौ देवौ स्मितपूर्वमभाषत ॥
ईश्वर उवाच
वत्स वत्स विधे विष्णो मायया मम मोहितौ ।
युवां प्रभुत्वेऽहंकृत्य बद्धवैरौ परस्परम् ॥
श्रीशिवमहापुराण [ अ ० ३५ | अधिष्ठान तथा अपने सदृश महिमामयी परमशक्तिसे । समन्वित विरूपाक्ष भगवान् शंकरको [ तत्त्वतः ] जानकर ॥ ६० तथा विष्णु तब सिरपर अंजलि बाँधकर भयभीत । | ब्रह्मा हो इस प्रकार कहने लगे — ॥५६–६१ ॥ ॥ ६१ ब्रह्माजी बोले — हे देव! मैं अज्ञानी हूँ अथवा | आपको भलीभाँति जाननेवाला हूँ [ चाहे जो कुछ भी । हूँ, पर ] प्रारम्भमें आपके द्वारा ही उत्पन्न किया गया ॥ ६२ । हूँ । [ यदि मैं ] इस प्रकारके भ्रमसे ग्रस्त हुआ तो इसमें किसका अपराध कहा जाय! आपके समीप होनेपर । भी यदि मेरा अज्ञान रहता है, तो रहे ( इससे क्या ॥ ६३ हानि हो सकती है! ) ऐसा कौन है, जो निर्भय होकर अपना अथवा पराया कृत्य बता सके । [ हे प्रभो! ] । हमलोगोंका विवाद भी मंगलमय ही है; क्योंकि ॥ ६४ देवाधिदेव आप स्वामीका चरणवन्दनरूप फल इसीसे मिला है ॥ ६२–६४ ॥ विष्णु बोले – हे देव! [ यद्यपि ] आपकी । महिमाके अनुरूप स्तुति करनेमें वाणी समर्थ नहीं है, ॥ ६५ [ तथापि ] स्वामीके समक्ष सेवकोंका मौन रहना भी तो अपराध ही है । इस अवसरपर क्या करना उचित रहेगा, यह तो मैं नहीं जानता तथापि जैसे - तैसे प्रलाप ॥ ६६ करते हुए मैं आपको प्रणाम करता हूँ । आपने ही हमें जगत्कारणता प्रदान की थी, परंतु आपकी मायासे मोहित होनेके कारण मैं [ आपको ] भूल गया । जब ॥ ६७ मैं अभिमानग्रस्त हो उठा तब आपने ही मुझे [ इस समय ] पुनः अनुशासित किया है । बहुत कुछ कहनेसे क्या लाभ? हे ईश्वर! मैं अत्यधिक भयभीत हो गया ६८ हूँ; क्योंकि मैंने अपरिच्छिन्न स्वरूपवाले आपको परिच्छिन्न बतानेका दुःसाहस किया है ॥ ६५–६८ ॥ आप महादेवको भयभीत लोगोंके दुःखका ६ ९ नाशक कहा जाता है, इसलिये हे शंकर! मेरे इस । अपराधको आज आप क्षमा कर दीजिये । इस प्रकार, उन दोनों लोकेश्वरोंके द्वारा निवेदन किये जानेपर ७० प्रसन्न हुए भगवान् उन देवताओंपर कृपा करके मुसकराते हुए कहने लगे— ॥ ६ ९ -७० ॥ ईश्वर बोले- हे वत्स विधे! हे वत्स विष्णो! । तुम दोनों मेरी मायासे मोहित होकर अपनी प्रभुताका ७१ | अहंकार करने लगे और तुमने आपसंमें शत्रुता मान
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अ ० ३५ ] वायवीयसहिता
विवादं युद्धपर्यन्त कृत्वा नोपरतौ किल ।
ततश्छिन्ना प्रजासृष्टिर्जगत्कारणभूतयोः॥७२
अज्ञानमानप्रभवाद्वैमत्याद्युवयोरपि तन्निवर्तयितुं युष्मद्दर्पमोहौ मयैव तु ॥ ७३
एवं निवारितावद्यलिङ्गाविर्भावलीलया ।
तस्माद्भूयो विवादं च व्रीडां चोत्सृज्य कृत्स्नशः ॥ ७४
यथास्वं कर्म कुर्यातां भवन्तौ वीतमत्सरौ ।
पुरा ममाज्ञया सार्द्धं समस्तज्ञानसंहिताः ॥ ७५
युवाभ्यां हि मया दत्ताः कारणत्वप्रसिद्धये ।
मन्त्ररत्नं च सूत्राख्यं पञ्चाक्षरमयं परम् ॥ ७६
मयोपदिष्टं सर्वं तद्युवयोरद्य विस्मृतम् ।
ददामि च पुनः सर्वं यथापूर्वं ममाज्ञया ॥ ७७
यतो विना युवां तेन न क्षमौ सृष्टिरक्षणे ।
एवमुक्त्वा महादेवो नारायणपितामहौ ॥ ७८
मन्त्रराजं ददौ ताभ्यां ज्ञानसंहितया सह ।
तौ लब्ध्वा महतीं दिव्यामाज्ञां माहेश्वरीं पराम् ॥ ७ ९
महार्थं मन्त्ररत्नं च तथैव सकलाः कलाः ।
दण्डवत्प्रणतिं कृत्वा देवदेवस्य पादयोः ॥ ८०
अतिष्ठतां वीतभयावानंदस्तिमितौ तदा ।
एतस्मिन्नन्तरे चित्रमिन्द्रजालवदैश्वरम् ॥ ८१
लिङ्गं क्वापि तिरोभूतं न ताभ्यामुपलभ्यते ।
ततो विलप्य हाहेति सद्यः प्रणयभङ्गतः ॥ ८२
किमद्भुतमिदं वृत्तमिति चोक्त्वा परस्परम् ।
अचिंत्यवैभवं शम्भोर्विचिन्त्य च गतव्यथौ ॥ ८३
अभ्युपेत्य परां मैत्रीमालिंग्य च परस्परम् ।
जगद्व्यापारमुद्दिश्य जग्मतुर्देवपुङ्गवौ ॥ ८४ ।
( उत्तरखण्ड ) १०४ ९ ली । तुम लोगोंकेवाद - विवादका पर्यवसान युद्धमें हुआ तथापि उससे निवृत्त नहीं हो सके । जगत्के कारणस्वरूप तुम दोनोंके अज्ञान तथा अहंकारसे उत्पन्न हुई असहमतिके कारण यह प्रजासृष्टि विच्छिन्न हो रही थी, तब [ प्रजाओंके उच्छेदको रोकनेके लिये इस समय मैंने लिंगरूपसे ] लीलापूर्वक आविर्भूत होकर तुम्हारे अभिमान तथा मोहको निवृत्त किया है । इसलिये बार- बारके विवाद तथा पूर्णरूपसे परित्याग करके आपलोगोंको लज्जाका होकर अपने - अपने कर्तव्यका ईर्ष्यासे मुक्त चाहिये ॥ ७१–७४ अनुपालन करना ॥ तुमलोगोंकी कारणत्वप्रसिद्धि अर्थात् जगन्निर्माण आदि सामर्थ्यकी सिद्धिके लिये मैंने अपनी आज्ञाशक्तिके साथ पूर्वकालमें समस्त ज्ञानराशि तुम्हें प्रदान की थी । [ उसके साथ ही ] पंचाक्षरात्मक सूत्रनामसे प्रसिद्ध अत्यन्त उत्कृष्ट मन्त्ररत्नका भी मैंने आप लोगोंको उपदेश किया था, आज वह सब कुछ तुमलोग भूल चुके हो । अब मैं फिरसे अपनी आज्ञाशक्तिके साथ पूर्वकी भाँति वह सब प्रदान कर रहा हूँ, क्योंकि बिना उसके तुम दोनों सृष्टिरचना तथा उसके पालनमें समर्थ नहीं हो सकोगे ॥७५–७७१ / २ ॥ भगवान् नारायण तथा ब्रह्माजीसे इस प्रकार कहकर भगवान् महादेवने उन दोनोंको ज्ञानराशिके साथ [ पंचाक्षर ] मन्त्रराज प्रदान किया । वे दोनों दिव्य, परा, महिमामयी, माहेश्वरी आज्ञाशक्ति, परमार्थरूप मन्त्ररत्न तथा समस्त कलाओंको प्राप्त करनेके उपरान्त देवाधिदेवके चरणोंमें दण्डवत् प्रणाम करके निर्भय तथा आनन्दमग्न होकर स्थित हो गये । इस बीचमें आश्चर्यजनक इन्द्रजालकी भाँति वह भगवल्लिंग अन्तर्धान हो गया । जब वे उसे देख नहीं पाये तो भावनाके आहत - सी हो जानेके कारण उस समय हाहाकारपूर्वक विलाप करने लगे ॥ ७८–८२ ॥ घटित हुआ यह वृत्तान्त सत्य है या असत्य है, इस प्रकार परस्पर कहते हुए वे भगवान् शंकरके अचिन्तनीय ऐश्वर्यका स्मरणकर व्यथारहित हो गये । उन्होंने उत्तम मित्रभावसे युक्त हो एक - दूसरेका आलिंगन किया और संसारके कृत्यों [ को सम्पन्न करने ] -के
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श्रीशिवमहापुराण [ अ ० ३६ १०५० ततः प्रभृति शक्राद्याः सर्व एव सुरासुराः । नरा नागा नार्यश्चापि विधानतः । ऋषयश्च कुर्वन्ति लिङ्गे तं पूजयन्ति च ॥ लिङ्गप्रतिष्ठां वे दोनों देवश्रेष्ठ [ अपने - अपने धामको । उद्देश्यसे गये । उसी समयसे इन्द्र आदि देवगण ] | चले ऋषिगण, मनुष्य, नाग तथा स्त्रियाँ-, | असुरगण, शिवलिंगकी प्रतिष्ठा [ [ ये सभी ] विधानपूर्वक करके | लिंगमूर्तिमें उन भगवान् शिवकी अर्चना करने ८५ | लगे ॥ ८३–८५ ॥ हरिविधिमोहनिवारणं नाम पञ्चत्रिंशोऽध्यायः ॥ ३५ इति श्रीशिवमहापुराणे सप्तम्यां वायवीयसंहितायामुत्तरखण्डे सातवीं वायवीयसंहिताके उत्तरखण्डमें ॥ ॥ इस प्रकार श्रीशिवमहापुराणके अन्तर्गत पैंतीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ३५ ॥
हरिविधिमोहनिवारण नामक अथ षट्त्रिंशोऽध्यायः शिवलिंग एवं शिवमूर्तिकी प्रतिष्ठाविधिका वर्णन श्रीकृष्ण उवाच
भगवन् श्रोतुमिच्छामि प्रतिष्ठाविधिमुत्तमम् ।
लिङ्गस्यापि च बेरस्य शिवेन विहितं यथा ॥
उपमन्युरुवाच
अनात्मप्रतिकूले तु दिवसे शुक्लपक्षके ।
शिवशास्त्रोक्तमार्गेण कुर्याल्लिंगं प्रमाणवत् ॥
स्वीकृत्याथ शुभस्थानं भूपरीक्षां विधाय च ।
दशोपचारान्कुर्वीत लक्षणोद्धारपूर्वकान् ॥
तेषां दशोपचाराणां पूर्वं पूज्य विनायकम् ।
स्थानशुद्ध्यादिकं कृत्वा लिङ्गं स्नानालयं नयेत् ॥
शलाकया काञ्चनया कुंकुमादिरसाक्तया ।
लक्षितं लक्षणं शिल्पशास्त्रेण विलिखेत्ततः ॥
अष्टमृत्सलिलैर्वाथ पञ्चमृत्सलिलैस्तथा ।
लिङ्गं पिंडिकया सार्द्धं पञ्चगव्यैश्च शोधयेत् ॥
सवेदिकं समभ्यर्च्य दिव्याद्यं तु जलाशयम् ।
नीत्वाधिवासयेत्तत्र लिङ्गं पिंडिकया सह ॥
अधिवासालये शुद्धे सर्वशोभासमन्विते ।
सतोरणे सावरणे दर्भमालासमावृते ॥
दिग्गजाष्टकसंपन्ने दिक्पालाष्टघटान्विते ।
अष्टमङ्गलकैर्युक्ते कृतदिक्पालकार्चिते ॥
तैजसं दारवं वापि कृत्वा पद्मासनाङ्कितम् ॥
विन्यसेन्मध्यतस्तत्र विपुलं पीठकालयम् ॥
श्रीकृष्ण बोले- [ हे भगवन्! ] मैं लिंग तथा मूर्तिकी उत्तम प्रतिष्ठाविधिको सुनना चाहता हूँ, जिसे १ शिवजीने कहा था ॥१ ॥
उपमन्यु बोले— [ हे कृष्ण! ] शुक्लपक्षमें अपने [ चन्द्र - तारा आदिके विचारसे ] अनुकूल दिनमें शिवशास्त्रमें बतायी गयी रीतिसे प्रमाणके अनुसार लिंग बनाये । शुभ २ स्थानका चयन करके भूपरीक्षाकर लक्षणोंके प्रतिकूल दोषोंका निराकरण करके दसों उपचार करे | उन दस ३ उपचारोंके अन्तर्गत सर्वप्रथम विनायक ( श्रीगणेश ) -का पूजन करके स्थानशुद्धि आदि करे और लिंगको ४ स्नानगृहमें ले जाय॥२–४ ॥ कुंकुम आदिके रससे रंजित सोनेकी शलाकासे ५ उसपर लक्षणांकन करे और शिल्पशास्त्रके द्वारा लक्षणोंको उत्कीर्ण करे । उसके बाद आठ प्रकारकी मिट्टियोंसे युक्त जलसे अथवा पाँच प्रकारकी मिट्टियोंसे ६ युक्त जलसे और पंचगव्यसे पिण्डिकासहित लिंगका शोधन करे॥५-६ ॥ इसके बाद वेदीसहित लिंगका पूजन करके जलाशयमें ७ ले जाकर वहाँ पिण्डिकाके साथ लिंगका अधिवासन करे । सभी शोभाओंसे समन्वित, तोरण ( बन्दनवार ) से ८ | सुशोभित, आवरण ( चन्दोवा आदि ) -से युक्त, कुशकी | मालाओंसे आवेष्टित, आठों दिग्गजोंसे युक्त, आठों दिक्पालोंके घटोंसे समन्वित, आठों मंगलद्रव्योंसे युक्त ९ और पूजित, दिक्पालोंसे सुशोभित, पवित्र अधिवासगृहमें पद्मासनसे अंकित एक धातु अथवा काष्ठकी विशाल १० चौकी बनाकर वहाँपर बीचमें रखे ॥ ७–१० ॥
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अ ० वायवीयसहिता समभ्यर्च्य भद्रादींश्चतुरः _ द्वारपालान् क्रमात् । विभद्रश्च सुनन्दश्च विनन्दकः सुभद्रश्च ॥ ११
सापयित्वा समभ्यर्च्य लिङ्गं वेदिकया सह ।
सकूर्चाभ्यां तु वस्त्राभ्यां समावेष्ट्य समन्ततः ॥ १२
शनकैस्तोयं पीठिकोपरि शाययेत्
प्रापय्य ।
प्राक् शिरस्कमधः सूत्रं पिंडिकां चास्य पश्चिमे ॥ १३
सर्वमङ्गलसंयुक्तं लिङ्गं तत्राधिवासयेत् ।
पञ्चरात्रं त्रिरात्रं वाप्येकरात्रमथापि वा ॥ १४
विसृज्य पूजितं तत्र शोधयित्वा च पूर्ववत् ।
सम्पूज्योत्सवमार्गेण शयनालयमानयेत् ॥ १५
तत्रापि शयनस्थानं कुर्यात् मण्डलमध्यतः ।
शुद्धैर्जलैः स्नापयित्वा लिङ्गमभ्यर्चयेत्क्रमात् ॥ १६
शान्यां पद्ममालिख्य शुद्धलिप्ते महीतले ।
शिवकुम्भं शोधयित्वा तत्रावाह्य शिवं यजेत् ॥ १७
वेदीमध्ये सितं पद्मं परिकल्प्य विधानतः ।
तस्य पश्चिमतश्चापि चण्डिकापद्ममालिखेत् ॥ १८
क्षौमाद्यैर्वाहतैर्वस्त्रैः पुष्पैर्दभैरथापि वा ।
प्रकल्प्य शयनं तस्मिन् हेमपुष्पं विनिक्षिपेत् ॥ १ ९
तत्र लिङ्गं समानीय सर्वमङ्गलनिःस्वनैः ।
रक्तेन वस्त्रयुग्मेन सकूर्चेन समन्ततः ॥ २०
सह पिंडिकयावेष्ट्य शाययेच्च यथा पुरा ।
पुरस्तात्पद्ममालिख्य तद्दलेषु यथाक्रमम् ॥ २१
विद्येशकलशान्न्यस्येन्मध्ये शैवीं च वर्द्धनीम् ।
परीत्य पद्मत्रितयं जुहुयुर्द्विजसत्तमाः ॥ २२
तेचाष्टमूर्त्तयः कल्प्याः पूर्वादिपरितः स्थिताः ।
चत्वारश्चाथ वा दिक्षु स्वध्येतारः सजापकाः ॥ २३
जुहुयुस्ते विरिञ्च्याद्याश्चतस्त्रो मूर्तयः स्मृताः ।
देशिकः प्रथमं तेषामैशान्यां पश्चिमेऽथ वा ॥ २४
प्रधानहोमं कुर्वीत सप्तद्रव्यैर्यथाक्रमम् ।
आचार्यात् पादमर्द्धं वा जुहुयुश्चापरे द्विजाः ॥ २५
( उत्तरखण्ड ) १०५१ तत्पश्चात् सुभद्र, विभद्र, सुनन्द तथा विनन्द– इन चार द्वारपालोंका पूजन करके वेदीसहित लिंगको स्नान कराकर पूजन करके उसे कूर्चसहित दो वस्त्रोंसे चारों ओरसे लपेटकर जलको धीरे - धीरे पोंछकर पीठिकाके ऊपर शयन कराये, लिंगका सिर पूर्वकी ओर, सूत्रको नीचेकी ओर तथा पिण्डिकाको इसके पीछे पश्चिमकी ओर रखे ॥ ११–१३ ॥ सभी मंगल द्रव्योंसे युक्त लिंगका वहाँ पाँच रात, तीन रात अथवा एक राततक अधिवासन कराये ॥ १४ ॥
उस स्थानपर पूर्वमें पूजित देवताओंका विसर्जन करके लिंगका पूर्वकी भाँति शोधनकर पुन: पूजन करे और उत्सव करते हुए उसे शयनस्थानपर ले जाय ॥ १५ ॥
वहाँ भी मण्डलके मध्यमें शयनस्थान बनाये और शुद्ध जलसे लिंगको स्नान कराकर क्रमसे पूजन करे ॥ १६ ॥
ईशानकोणमें [ गोमयसे ] लिपे हुए शुद्ध भूमितलपर कमलकी रचना करके शिवकुम्भका स्थापन कर उसमें शिवका आवाहन करके पूजन करे । वेदीके मध्यमें विधानपूर्वक श्वेत कमल बनाकर उसके पश्चिममें भी पिण्डिकाके लिये कमलकी रचना करे । रेशमी आदि नवीन वस्त्रों अथवा पुष्पों अथवा दर्भोंसे शयन तैयार करके उसपर स्वर्णपुष्प बिखेरे ॥ १७–१९ ॥ सभी मंगल ध्वनियोंके साथ वहाँ लिंगको लाकर कूर्चसहित दो लाल वस्त्रोंसे चारों ओरसे पिण्डिकाके साथ उसे लपेटकर पूर्वकी भाँति शयन कराये । इसके बाद उसके आगे कमलकी रचना करके उसके दलोंमें क्रमानुसार विद्येश्वरके कलशोंको रखकर बीचमें शैवी वर्धनी स्थापित करे और [ वरण ] किये गये श्रेष्ठ ब्राह्मण तीनों पद्मांकित मण्डलोंकी परिक्रमा करते हुए आहुति डालें ॥ २०-२२ ॥ [ यजनकर्ममें वरण किये गये ] उन आठ ब्राह्मणोंके प्रति ' ये भगवान् शिवकी आठ मूर्तियाँ हैं ' ऐसी भावना करे, वे पूर्व आदिके क्रमसे स्थित होकर कर्म सम्पन्न करें अथवा चार दिशाओंमें पाठ तथा जप करनेवाले ब्रह्मा आदि चार ब्राह्मण स्थित हों । वे हवन करें । उनसे पहले आचार्य ईशानकोणमें अथवा पश्चिममें सात द्रव्योंसे यथाक्रम प्रधान होम करे । अन्य ब्राह्मण आचार्यसे आधा अथवा चौथाई हवन करें ॥ २३-२५ ॥
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श्रीशिवमहापुराणा [ अ ० ३६ १०५२
प्रधानमेकमेवात्र जुहुयादथ वा गुरुः ।
पूर्वं पूर्णाहुतिं हुत्वा घृतेनाष्टोत्तरं शतम् ॥ २६
मूर्ध्नि मूलेन लिङ्गस्य शिवहस्तं प्रविन्यसेत् ।
शतमर्द्धं तदर्द्धं वा क्रमाद् द्रव्यैश्च सप्तभिः ॥ २७
हुत्वा हुत्वा स्पृशेल्लिङ्गं वेदिकां च पुनः पुनः ।
पूर्णाहुतिं ततो हुत्वा क्रमाद्दद्याच्च दक्षिणाम् ॥ २८
आचार्यात् पादमर्द्धं वा होतॄणां स्थपतेरपि ।
तदर्द्ध देयमन्येभ्यः सदस्येभ्यश्च शक्तितः ॥ २ ९
ततः श्वभ्रे वृषं हैमं कूर्चं वापि निवेश्य च ।
मृदम्भसा पञ्चगव्यैः पुनः शुद्धजलेन च ॥ ३०
शोधितां चंदनालिप्तां श्वभ्रे ब्रह्मशिलां क्षिपेत् ।
करन्यासं ततः कृत्वा नवभिः शक्तिनामभिः ॥ ३१
हरितालादिधातूंश्च बीजगन्धौषधैरपि ।
शिवशास्त्रोक्तविधिना क्षिपेद् ब्रह्मशिलोपरि ॥ ३२
प्रतिलिङ्गं तु संस्थाप्य क्षीरवृक्षसमुद्भवम् ।
स्थितं बुद्ध्वा तदुत्सृज्य लिङ्गं ब्रह्मशिलामपि ॥ ३३
प्रागुदक्प्रवरां किञ्चित् स्थापयेन्मूलविद्यया ।
पिण्डिकां चाथ संयोज्य शाक्तं मूलमनुस्मरन् ॥ ३४
बन्धनं बन्धकद्रव्यैः कृत्वा स्थानं विशोध्य च ।
दत्त्वा चार्घ्यं च पुष्पाणि कुर्युर्यवनिकां पुनः ॥ ३५
यथायोग्यं निषेकादि लिङ्गस्य पुरतस्तदा ।
आनीय शयनस्थानात्कलशान्विन्यसेत्क्रमात् ॥ ३६
महापूजामथारभ्य सम्पूज्य कलशान्दश ।
शिवमन्त्र मनुस्मृत्य शिवकुम्भजलान्तरे ॥३७
अंगुष्ठानामिकायोगादादाय तमुदीरयेत् ।
न्यसेदीशानभागस्य मध्ये लिङ्गस्य मन्त्रवित् ॥ ३८
शक्तिं न्यसेत्तथा विद्यां विद्येशांश्च यथाक्रमम् ।
लिङ्गमूले शिवजलैस्ततो लिङ्गं निषेचयेत् ॥ ३ ९
वर्द्धन्या पिंडिकां लिङ्गं विद्येशकलशैः पुनः ।
अभिषिच्यासनं पश्चादाधाराद्यं प्रकल्पयेत् ॥ ४०
प्रधान होम आचार्य अथवा गुरु काई एक ही करे, पहले घृतसे एक सौ आठ आहुति देकर पुनः । पूर्णाहुति प्रदान करे । मूल मन्त्रसे शिवलिंगके शीर्षदेशपर । शिवहस्त रखे । इसके बाद क्रमसे सात द्रव्योंसे सौ पचास अथवा पचीस आहुतियाँ देते हुए बार - बार, । लिंग तथा वेदिकाका स्पर्श करे । इसके बाद पूर्णाहुति प्रदान करके क्रमसे दक्षिणा दे । आचार्यसे आधी | अथवा चौथाई दक्षिणा हवनकर्ताओंको, उसकी आधी दक्षिणा शिल्पीको और अन्य सदस्योंको अपने सामर्थ्यके अनुसार दक्षिणा दे ॥ २६–२९ ॥ तत्पश्चात् गड्ढेमें स्वर्ण - वृषभ अथवा कूर्च रखकर मिट्टीयुक्त जलसे, पंचगव्योंसे तथा पुनः शुद्ध जलसे शुद्ध की हुई तथा चन्दनसे लिप्त ब्रह्मशिलाको गड्ढेमें स्थापित करे । इसके बाद शक्तिके नौ नामोंसे करन्यास करके शिवशास्त्रमें कथित विधिके अनुसार बीज, गन्ध तथा औषधियोंके साथ हरिताल आदि धातुओंको ब्रह्मशिलाके ऊपर छोड़े ॥ ३०–३२ ॥ क्षीरवृक्ष [ दूधवाले ] के काष्ठसे निर्मित प्रत्येक लिंगको समीप रखकर, मूलमन्त्र पढ़ते हुए उसे ईशानाभिमुख स्थापित करे । उस समय शक्तिबीजका उच्चारण करते हुए स्थानशोधनकर बन्धक द्रव्योंसे पिण्डिकाको स्थिर करे । इसके बाद अर्घ्य पुष्पादि अर्पित करके परदा डाल दे । तत्पश्चात् यथोचित रीतिसे निषेक आदि कृत्य करके शयनस्थानमें रखे कलशोंको लाकर लिंगके समक्ष उन्हें क्रमशः स्थापित कर दे ॥ ३३–३६ ॥ तत्पश्चात् उन कलशोंका पूजन करके महापूजाका आरम्भ करे । शिवमन्त्रका स्मरण करते हुए शिवकुम्भस्थ जलको अंगुष्ठ- अनामिकाके योगसे ग्रहण करते हुए मूल मन्त्रका उच्चारण करे । मन्त्रज्ञ साधक लिंगके ईशान भागके मध्यमें शक्ति-कलश तथा ब्रह्मकलशादिकी स्थापना करे । तदुपरान्त शिवकुम्भके जलसे लिंगमूलका अभिषेक करे । तत्पश्चात् । वर्धनीके जलसे पिण्डिकाका तथा विद्येशकलशोंके । | द्वारा लिंगका अभिषेक करके आधार आदि आसनकी परिकल्पना करे ॥ ३७-४० ॥ ॥
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अ ० ३६ ] वायवीयसहिता कृत्वा पञ्चकलान्यासं दीप्तं लिङ्गमनुस्मरेत् । आवाहयेत् शिवौ साक्षात् प्राञ्जलिः प्रागुदङ्मुखः ॥ ४१ वृषाधिराजमारुह्य विमानं वा नभस्तलात् ।
अलंकृतं सहायान्तं देव्या देवमनुस्मरन् ।
सर्वाभरणशोभाढ्यं सर्वमङ्गलनिःस्वनैः ॥ । ४२
ब्रह्मविष्णुमहेशार्कशक्राद्यैर्देवदानवैः आनन्दक्लिन्नसर्वांगैर्विन्यस्ताञ्जलिमस्तकैः ॥४३
स्तुवद्भिरेव नृत्यद्भिर्नमद्भिरभितो वृतम् ।
ततः पञ्चोपचारैश्च कृत्वा पूजां समापयेत् ॥ ४४
नातः परतरः कश्चिद्विधिः पञ्चोपचारकात् ।
प्रतिष्ठां लिङ्गवत्कुर्यात् प्रतिमास्वपि सर्वतः ॥ ४५
लक्षणोद्धारसमये कार्यं नयनमोचनम् ।
जलाधिवासे शयने शाययेत्तांस्त्वधोमुखीम् ॥ ४६
कुम्भोदशायितां मन्त्रैर्हृदि तां सन्नियोजयेत् ।
कृतालयां परामाहुः प्रतिष्ठामकृतालयात् ॥ ४७
शक्तः कृतालयः पश्चात् प्रतिष्ठाविधिमाचरेत् ।
अशक्तश्चेत्प्रतिष्ठाप्य लिङ्गं बेरमथापि वा ॥ ४८
शक्तेरनुगुणं पश्चात् प्रकुर्वीत शिवालयम् ।
गृहाच च पुनर्वक्ष्ये प्रतिष्ठाविधिमुत्तमम् ॥ ४ ९
कृत्वा कनीयसं बेरं लिङ्गं वा लक्षणान्वितम् ।
अयने चोत्तरे प्राप्ते शुक्लपक्षे शुभे दिने ॥ ५०
वेद कृत्वा शुभे देशे तत्राब्जं पूर्ववल्लिखेत् ।
विकीर्य पत्रपुष्पाद्यैर्मध्ये कुम्भं निधाय च ॥ ५१
परितस्तस्य चतुरः कलशान् दिक्षु विन्यसेत् ।
पञ्च ब्रह्माणि तद्बीजैस्तेषु पञ्चसु पञ्चभिः ॥ ५२
न्यस्य सम्पूज्य मुद्रादि दर्शयित्वाभिरक्ष्य च ।
विशोध्य लिङ्गं बैरं वा मृत्तोयाद्यैर्यथा पुरा ॥ ५३
स्थापयेत्पुष्पसंछन्नमुत्तरस्थेवरासने वरासने ॥ ३ निधाय पुष्पं शिरसि प्रोक्षयेत् प्रोक्षणीजलैः ॥ ५४ । ( उत्तरखण्ड ) १०५३ तदनन्तर पूर्व अथवा उत्तरकी ओर मुख करके हाथ जोड़कर साक्षात् शिव - शिवाका आवाहन वृषभराज अथवा अलंकृत विमानपर करे । देवी [ पार्वती ] -के साथ आकाशमार्गसे आरूढ़ होकर समस्त आभूषणोंकी आते हुए, प्रकारकी शोभासे सम्पन्न और सभी मंगलध्वनि करनेवाले, आनन्दसे विह्वल समस्त अंगोंवाले, [ अपनी ] अंजलियोंको मस्तकपर रखे हुए, स्तुति, नृत्य तथा नमस्कार करते हुए ब्रह्मा-विष्णु - महेश - सूर्य - शक्र आदि देवताओं तथा दानवोंसे घिरे हुए भगवान् शिवका स्मरण करते हुए पंचोपचारसे पूजन करके इसका समापन करे ॥४१–४४ ॥ पंचोपचारसे बढ़कर पूजाकी कोई भी विधि नहीं है । लिंगकी भाँति प्रतिमाओंमें भी भलीभाँति प्रतिष्ठा करे । लक्षणके उद्धारके समय नेत्रोंको उन्मीलित कर दे, जलाधिवासमें शयन कराते समय प्रतिमाको अधोमुख करके शयन कराये ॥ ४५-४६ ॥ मन्त्रोंसे कुम्भजलमें सुलायी गयी उस मूर्तिका हृदयमें ध्यान करे । आलय ( स्थान ) - रहितसे आलययुक्त प्रतिष्ठाको श्रेष्ठ कहा गया है । यदि समर्थ हो, तो मन्दिर बनवाकर बादमें प्रतिष्ठाविधि करे और यदि असमर्थ हो, तो लिंग अथवा मूर्तिकी प्रतिष्ठा करके बादमें अपने सामर्थ्यके अनुसार शिवालयका निर्माण करे ॥ ४७-४८३ ॥ अब मैं गृहमें पूजाके योग्य मूर्ति अथवा लिंगकी उत्तम प्रतिष्ठाविधिका वर्णन करूँगा । एक छोटी तथा लक्षणयुक्त मूर्ति अथवा [ वैसा ही ] लिंग बनाकर उत्तरायण उपस्थित होनेपर शुक्लपक्षमें शुभ दिनमें शुभ स्थानमें वेदीका निर्माण करके वहाँ पूर्वकी भाँति कमलकी रचना करे । वहाँ पत्र - पुष्प आदि बिखेरकर मध्यमें कलश रखकर उसके चारों दिशाओंमें चार कलश स्थापित करे ॥ ४ ९ –५११ / २ ॥ इसके बाद पाँच ब्रह्मोंका उनके पाँच बीजमन्त्रोंसे उन पाँच कलशोंमें न्यास करके उनका पूजन करके, मुद्रा आदि दिखाकर, रक्षाविधान करके और पुनः पूर्वकी भाँति मिट्टी - जल आदिके द्वारा लिंग अथवा मूर्तिका शोधन करके पुष्पसे आच्छादितकर उसे उत्तर दिशामें स्थित उत्तर्म आसनपर स्थापित करे । तत्पश्चात् उसके सिरपर रखकर प्रोक्षणी जलसे प्रोक्षण करे ॥ ५२-५४ ॥ पुष्प
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( श्रीशिवमहापुराण [ अ ० ३६ १०५४
समभ्यर्च्य पुनः पुष्पैर्जयशब्दादिपूर्वकम् ।
स्नापयेन्मूलविद्यया ॥
कुम्भैरीशानविद्यान्तैः
ततः पञ्चकलान्यासं कृत्वा पूजां च पूर्ववत् ।
नित्यमाराधयेत्तत्र देव्या देवं त्रिलोचनम् ॥
एकमेवाथ वा कुम्भं मूर्तिमन्त्रसमन्वितम् ।
न्यस्य पद्मान्तरे सर्वं शेषं पूर्ववदाचरेत् ॥
अत्यन्तोपहतं लिङ्गं विशोध्य स्थापयेत्पुनः ।
सम्प्रोक्षयेदुपहतं मनागुपहतं यजेत् ॥
लिङ्गानि बाणसंज्ञानि स्थापनीयानि वा न वा ।
तानि पूर्वं शिवेनैव संस्कृतानि यतस्ततः ॥
शेषाणि स्थापनीयानि यानि दृष्टानि बाणवत् ।
स्वयमुद्भूतलिङ्गे च दिव्ये चार्षे तथैव च ॥
अपीठे पीठमावेश्य कृत्वा सम्प्रोक्षणं विधिम् ।
यजेत्तत्र शिवं तेषां प्रतिष्ठा न विधीयते ॥
दग्धं श्लथं क्षताङ्गं च क्षिपेल्लिङ्गं जलाशये ।
संधानयोग्यं संधाय प्रतिष्ठाविधिमाचरेत् ॥
विकलाल्लिङ्गाद्देवपूजापुरःसरम् ।
उद्वास्य हृदि संधानं त्यागं वा युक्तमाचरेत् ॥
एकाहपूजाविहतौ कुर्याद् द्विगुणमर्चनम् ।
द्विरात्रे च महापूजां सम्प्रोक्षणमतः परम् ॥
मासादूर्ध्वमनेकाहं पूजा यदि विहन्यते ।
प्रतिष्ठा प्रोच्यते कैश्चित्कैश्चित्सम्प्रोक्षणक्रमः ॥
सम्प्रोक्षणे तु लिङ्गादेर्देवमुद्वास्य पूर्ववत् ।
अष्टपञ्चक्रमेणैव स्नापयित्वा मृदम्भसा ॥
गवां रसैश्च संस्नाप्य दर्भतोयैर्विशोध्य च ।
प्रोक्षयेत्प्रोक्षणीतोयैर्मूलेनाष्टोत्तरं शतम् ॥
इसके बाद पुष्पोंसे पूजन करके जयध्वनिके साथ ईशानसे लेकर विद्येश्वरतकके कुम्भसे मूलमन्त्रके ५५ । द्वारा स्नान कराये । पुनः पाँच कलाओंका न्यास तथा पूर्वकी भाँति पूजन करके वहाँ देवीके साथ भगवान् ५६ / । त्रिलोचनकी नित्य आराधना करे । अथवा मूर्तिसे युक्त | तथा मन्त्राभिमन्त्रित एक कुम्भको कमलके बीच में ५७ रखकर शेष सब कुछ पूर्वकी भाँति करे ॥ ५५-५७ ॥ अत्यधिक दोषयुक्त लिंगका शोधन करके उसे | पुनः स्थापित करे, दोषयुक्त लिंगका प्रोक्षण करे और ५८ । थोड़ा दोषयुक्त लिंगका पूजन करे । बाणसंज्ञक लिंगोंकी | प्रतिष्ठा करे अथवा न करे; क्योंकि वे तो शिवजीके ५ ९ द्वारा पहले ही संस्कार - सम्पन्न किये गये हैं । अन्य | लिंग जो बाणसदृश दिखायी देते हैं, उनकी स्थापना कर लेनी चाहिये । स्वयंभू लिंग, देवताओं द्वारा स्थापित ६० लिंग तथा ऋषियोंद्वारा स्थापित लिंगके पीठरहित होनेपर उन्हें पीठमें बैठाकर सम्प्रोक्षणविधान करके उनमें शिवका पूजन करे, उनकी प्रतिष्ठा नहीं क की ६१ जाती है॥५८–६१ ॥ जले हुए, क्षतिग्रस्त तथा विशीर्ण अंगवाले ६२ लिंगको जलाशयमें डाल देना चाहिये, किंतु जोड़े जा सकनेवाले लिंगको जोड़कर उसकी प्रतिष्ठा करनी चाहिये । विशीर्ण हुए लिंग अथवा मूर्तिमें देवताकी पूजाके उपरान्त हृदयमें उद्वासन करके उस [ लिंग ६३ आदि ] -का सन्धान या त्याग जो उचित हो, उसे करना चाहिये॥६२-६३ ॥ एक दिन पूजा छूट जानेपर दूसरे दिन दुगुना ६४ पूजन करे और दो रात पूजाके छूट जानेपर महापूजा करे तथा इससे भी अधिक समयतक यदि पूजा न हुई हो तो सम्प्रोक्षण करे । यदि एक माससे अधिक अनेक दिनों तक पूजा बाधित हो गयी हो, तो कुछ लोग पुनः ६५ प्रतिष्ठाका और कुछ लोग सम्प्रोक्षणका विधान बताते हैं ॥ ६४-६५ ॥ लिंग आदिके सम्प्रोक्षणमें पूर्वकी भाँति शिवजीका ६६ उद्वासन करके पाँच अथवा आठ बार मिट्टीयुक्त जलसे । स्नान कराकर पुनः गायके दूध आदिसे स्नान कराये । और कुशोदकसे शोधन करके एक सौ आठ बार मूलमन्त्र के ६७ । द्वारा प्रोक्षणीके जलसे प्रोक्षण करे ॥ ६६-६७ ॥ ॥ः
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अ ० ३७ ] वायवीयसहिता
सपुष्पं सकुशं पाणिं न्यस्य लिङ्गस्य मस्तके ।
पञ्चावरं जपेन्मूलमष्टोत्तरशतोत्तरम् ॥ ६८
ततो मूलेन मूर्द्धादिपीठान्तं संस्पृशेदपि ।
पूजां च महतीं कुर्याद्देवमावाह्य पूर्ववत् ॥६ ९
अलब्धे स्थापिते लिङ्गे शिवस्थाने जलेऽथ वा । वह्नौ रवौ तथा व्योम्नि भगवन्तं इति श्रीशिवमहापुराणे शिवं यजेत् ॥७० ( उत्तरखण्ड ) १०५५ कम लिंगके मस्तकपर पुष्प - कुशसहित हाथ रखकर - से - कम पाँच बार या एक सौ आठ बार और इसके बाद मूलमन्त्रसे सिरसे जप करे स्पर्श करे । शिवजीका आवाहन लेकर पीठतकका करके पूर्वकी भाँति महापूजा करे । स्थापित लिंगके उपलब्ध न होनेपर शिवस्थानमें, जलमें, अग्निमें, सूर्यमें अथवा आकाशमें भगवान् शिवकी पूजा करे सप्तम्यां वायवीयसंहितायामुत्तरखण्डे ॥ ६८–७० ॥ ॥ इस प्रकार श्रीशिवमहापुराणके अन्तर्गत सातवीं प्रतिष्ठाविधिवर्णनं नाम षट्त्रिंशोऽध्यायः ॥ ३६ ॥
प्रतिष्ठाविधिवर्णन नामक वायवीयसंहिताके उत्तरखण्डमें छत्तीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ३६ ॥
अथ सप्तत्रिंशोऽध्यायः योगके अनेक भेद, उसके आठ और छः प्राणायाम, दशविध प्राणोंको धारणा, ध्यान और श्रीकृष्ण उवाच
ज्ञाने क्रियायां चर्यायां सारमुद्धृत्य संग्रहात् ।
उक्तं भगवता सर्वं श्रुतं श्रुतिसमं मया ॥ १
इदानीं श्रोतुमिच्छामि योगं परमदुर्लभम् ।
साधिकारं च साङ्गं च सविधिं सप्रयोजनम् ॥ २
यद्यस्ति मरणं पूर्वं योगाद्यनुपमर्दतः ।
सद्यः साधयितुं शक्यं येन स्यान्नात्महा नरः ॥ ३
तच्च तत्कारणं चैव तत्कालकरणानि च ।
तद्भेदतारतम्यं च वक्तुमर्हसि तत्त्वतः ॥ ४
उपमन्युरुवाच
स्थाने पृष्टं त्वया कृष्ण सर्वप्रश्नार्थवेदिना ।
ततः क्रमेण तत्सर्वं वक्ष्ये शृणु समाहितः ॥ ५
निरुद्धवृत्त्यन्तरस्य शिवे चित्तस्य निश्चला ।
या वृत्तिः सा समासेन योग: स खलु पञ्चधा ॥ ६
मन्त्रयोग: स्पर्शयोगो भावयोगस्तथापरः ।
अभावयोगः सर्वेभ्यो महायोगः परो मतः ॥ ७ ।
अंगोंका विवेचन - यम, नियम, आसन, जीतनेकी महिमा, प्रत्याहार, समाधिका निरूपण श्रीकृष्णने कहा— भगवन्! आपने ज्ञान, क्रिया और चर्याका संक्षिप्त सार उद्धृत करके मुझे सुनाया है । यह सब श्रुतिके समान आदरणीय है और इसे मैंने ध्यानपूर्वक सुना है ॥१ ॥
अब मैं अधिकार, अंग, विधि और प्रयोजनसहित परम दुर्लभ योगका वर्णन सुनना चाहता हूँ ॥२ ॥
यदि योग आदिका अभ्यास करनेसे पहले ही मृत्यु हो जाय तो मनुष्य आत्मघाती होता है; अत: आप योगका ऐसा कोई साधन बताइये, जिसे शीघ्र सिद्ध किया जा सके, जिससे कि मनुष्यको आत्मघाती न होना पड़े । योगका वह अनुष्ठान, उसका कारण, उसके लिये उपयुक्त समय, साधन तथा उसके भेदोंका तारतम्य क्या है? ॥३-४ ॥ उपमन्यु बोले – श्रीकृष्ण! तुम सब प्रश्नोंके तारतम्यके ज्ञाता हो । तुम्हारा यह प्रश्न बहुत ही उचित है, इसलिये मैं इन सब बातोंपर क्रमशः प्रकाश डालूँगा । तुम एकाग्रचित्त होकर सुनो ॥५ ॥
जिसकी दूसरी वृत्तियोंका निरोध हो गया है, ऐसे चित्तकी भगवान् शिवमें जो निश्चल वृत्ति है, उसीको संक्षेपसे ' योग ' कहा गया है । यह योग पाँच प्रकारका है — मन्त्रयोग, स्पर्शयोग योग,, भावयाग भावयोग,, अ अभावयोग और महायोग ॥ ६-७ ॥
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१०५६ मन्त्राभ्यासवशेनैव मन्त्रवाच्यार्थगोचरः अव्याक्षेपा मनोवृत्तिर्मन्त्रयोग उदाहृतः प्राणायाममुखा सैव स्पर्शयोगोऽभिधीयते स मन्त्रस्पर्शनिर्मुक्तो भावयोगः प्रकीर्तितः विलीनावयवं विश्वं रूपं सम्भाव्यते यतः अभावयोगः सम्प्रोक्तोऽनाभासाद्वस्तुनः सतः
शिवस्वभाव एवैकश्चिन्त्यते निरुपाधिकः ।
यथा शैवमनोवृत्तिर्महायोग इहोच्यते ॥
दृष्टे तथानुश्रविके विरक्तं विषये मनः ।
यस्य तस्याधिकारोऽस्ति योगे नान्यस्य कस्यचित् ॥
विषयद्वयदोषाणां गुणानामीश्वरस्य च ।
दर्शनादेव सततं विरक्तं जायते मनः ॥
अष्टाङ्गो वा षडङ्गो वा सर्वयोगः समासतः ।
यमश्च नियमश्चैव स्वस्तिकाद्यं तथासनम् ॥
प्राणायामः प्रत्याहारो धारणा ध्यानमेव च ।
समाधिरिति योगांगान्यष्टावुक्तानि सूरिभिः ॥
आसनं प्राणसंरोधः प्रत्याहारोऽथ धारणा ।
ध्यानं समाधिर्योगस्य षडंगानि समासतः ॥
पृथग्लक्षणमेतेषां शिवशास्त्रे समीरितम् ।
शिवागमेषु चान्येषु विशेषात् कामिकादिषु ॥
योगशास्त्रेष्वपि तथा पुराणेष्वपि केषु च ।
अहिंसा सत्यमस्तेयं ब्रह्मचर्यापरिग्रहः ।
यम इत्युच्यते सद्भिः पञ्चावयवयोगतः ॥
शौचं तुष्टिस्तपश्चैव जपः प्रणिधिरेव च ।
इति पञ्च प्रभेदः स्यान्नियमः स्वांशभेदतः ॥
स्वस्तिकं पद्ममध्येन्दुं वीरं योगं प्रसाधितम् ।
पर्यङ्कं च यथेष्टं च प्रोक्तमासनमष्टधा ॥
श्रीशिवमहापुराण [ अ ० ३७ मन्त्र - जपके अभ्यासवश मन्त्रके वाच्यार्थमें स्थित । विक्षेपरहित जो मनकी वृत्ति है, उसका ॥ ८ हुई ' मन्त्रयोग ' है । मनकी वही वृत्ति जब प्राणायामको नाम | दे तो उसका नाम ' स्पर्शयोग ' होता है ॥ | प्रधानता मन्त्रके स्पर्शसे रहित हो तो ' भावयोग वही | स्पर्शयोग जब ' ॥ ९ कहलाता है ॥८ - ९ ॥ । जिससे सम्पूर्ण विश्वके रूपमात्रका अवयव विलीन ( तिरोहित ) हो जाता है, उसे ' अभावयोग ' ॥ १० । कहा गया है; क्योंकि उस समय सद्वस्तुका भी भान नहीं होता ॥ १० ॥
जिससे एकमात्र उपाधिशून्य शिवस्वभावका ११ चिन्तन किया जाता है और मनकी वृत्ति शिवमयी हो जाती है, उसे ‘ महायोग ' कहते हैं ॥११ ॥
देखे और सुने गये लौकिक और पारलौकिक १२ विषयोंकी ओरसे जिसका मन विरक्त हो गया हो, उसीका योगमें अधिकार है, दूसरे किसीका नहीं है । लौकिक और पारलौकिक दोनों विषयोंके दोषोंका १३ और ईश्वरके गुणोंका सदा ही दर्शन करनेसे मन विरक्त होता है॥१२-१३ ॥ प्रायः सभी योग आठ या छः अंगोंसे युक्त होते १४ हैं । यम, नियम, स्वस्तिक आदि आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान और समाधि - ये विद्वानोंने १५ योगके आठ अंग बताये हैं । आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान और समाधि – ये थोड़ेमें १६ योगके छः लक्षण हैं॥१४–१६ ॥ शिव - शास्त्रमें इनके पृथक् - पृथक् लक्षण बताये १७ गये हैं । अन्य शिवागमोंमें, विशेषतः कामिक आदिमें, योगशास्त्रोंमें और किन्हीं - किन्हीं पुराणोंमें भी इनके लक्षणोंका वर्णन है । अहिंसा, सत्य, अस्तेय, ब्रह्मचर्य और अपरिग्रह — इन्हें सत्पुरुषोंने यम कहा है । इस १८ प्रकार यम पाँच अवयवोंके योगसे युक्त है ॥ १७-१८ ॥ शौच, सन्तोष, तप, जप ( स्वाध्याय ) और १ ९ प्रणिधान - इन पाँच भेदोंसे युक्त दूसरे योगांगको । नियम कहा गया है । तात्पर्य यह कि नियम अपने अंशोंके भेदसे पाँच प्रकारका है । आसनके आठ भेद । | कहे गये हैं— स्वस्तिक आसन, पद्मासन, अर्धचन्द्रासन, | वीरासन, योगासन, प्रसाधितासन, पर्यकासन और
२० अपनी रुचिके अनुसार आसन ॥। १ ९ -२० ॥