शिव महापुराण - २ — पृष्ठ 1081–1090
शिव महापुराण - २ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 1081–1090
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अ ० ३८ ] वायवीयसंहिता ( उत्तरखण्ड
दन्ताग्रसंस्थितां जिह्वामचलां सन्निवेश्य च ।
पाणिभ्यां वृषणौ रक्षस्तथा प्रजननं पुनः ॥ ५७
ऊर्वोरुपरि संस्थाप्य बाहू तिर्यगयत्नतः ।
दक्षिणं करपृष्ठं तु न्यस्य वामतलोपरि ॥ ५८
उन्नाम्य शनकैः पृष्ठमुरो विष्टभ्य चाग्रतः । सम्प्रेक्ष्य नासिकाग्रं स्वं दिशश्चानवलोकयन् ॥ ५ ९
सम्भृतप्राणसञ्चारः पाषाण इव निश्चलः ।
स्वदेहायतनस्यान्तर्विचिन्त्य शिवमम्बया ॥ ६०
हृत्पद्मपीठिकामध्ये ध्यानयज्ञेन पूजयेत् ।
मूले नासाग्रतो नाभौ कंठे वा तालुरंध्रयोः ॥ ६१
भ्रूमध्ये द्वारदेशे वा ललाटे मूर्ध्नि वा स्मरेत् ।
परिकल्प्य यथान्यायं शिवयोः परमासनम् ॥ ६२
तत्र सावरणं वापि निरावरणमेव वा ।
द्विदले षोडशारे वा द्वादशारे यथाविधि ॥ ६३
दशारे वा षडस्त्रे वा चतुरस्त्रे शिवं स्मरेत् ।
भ्रुवोरन्तरतः पद्मं द्विदलं तडिदुज्ज्वलम् ॥ ६४
भ्रूमध्यस्थारविन्दस्य क्रमाद्वै दक्षिणोत्तरे ।
विद्युत्समानवर्णे च पर्णे वर्णावसानके ॥ ६५
षोडशारस्य पत्राणि स्वराः षोडश तानि वै ।
पूर्वादीनि क्रमादेतत्पद्मं कन्दस्य मूलतः ॥ ६६
ककारादिठकारान्ता वर्णाः पर्णान्यनुक्रमात् ।
भानुवर्णस्य पद्मस्य ध्येयं तद्हृदयान्तरे ॥ ६७
) १०६७ दाँतोंके अग्रभागमें स्थित अविचलभावसे हुई जिह्वाको रखते हुए, एड़ियोंसे दोनों अण्डकोशों और प्रजननेन्द्रियकी रक्षापूर्वक बिना किसी यत्नके दोनों जाँघोंके ऊपर अपनी दोनों भुजाओंको रखे । फिर दाहिने हाथ के पृष्ठभागको बायें हाथकी हथेलीपर रखकर धीरेसे पीठको ऊँची करे और छातीको आगेकी ओरसे सुस्थिर रखते हुए नासिकाके दृष्टि जमाये । अन्य दिशाओंकी ओर अग्रभागपर करे ॥ ५७–५९ दृष्टिपात न ॥ प्राणका संचार रोककर पाषाणके समान निश्चल हो जाय । अपने शरीरके भीतर मानस-मन्दिरमें हृदय - कमलके आसनपर पार्वतीसहित भगवान् शिवका चिन्तन करके ध्यान - यज्ञके द्वारा उनका पूजन करे ॥ ६० ९ / २ ॥ मूलाधार चक्रमें, नासिकाके अग्रभागमें, नाभिमें, कण्ठमें, तालुके दोनों छिद्रोंमें, भौंहोंके मध्यभागमें, द्वारदेशमें, ललाटमें या मस्तकमें शिवका चिन्तन करे । शिवा और शिवके लिये यथोचित रीतिसे उत्तम आसनकी कल्पना करके वहाँ सावरण या निरावरण शिवका स्मरण करे । द्विदल, चतुर्दल, षड्दल, दशदल, द्वादशदल अथवा षोडशदल कमलके आसनपर विराजमान शिवका विधिवत् स्मरण करना चाहिये । दोनों भौंहोंके मध्यभागमें द्विदल कमल है, जो विद्युत्के समान प्रकाशमान है॥६१–६४ ॥ भ्रूमध्यमें स्थित जो कमल है, उसके क्रमश: दक्षिण और उत्तर भागमें दो पत्ते हैं, जो विद्युत्के समान दीप्तिमान् हैं । उनमें दो अन्तिम वर्ण ' ह ' और ' क्ष ' अंकित हैं । षोडशदल कमलके पत्ते सोलह स्वररूप हैं, [ जिनमें ' अ ' से लेकर ' अ: ' तकके अक्षर क्रमशः अंकित हैं । ] यह जो कमल है, उसकी नालके मूलभागसे बारह दल प्रस्फुटित हुए हैं, जिनमें ' क ' से लेकर ' ठ ' तकके बारह अक्षर क्रमशः अंकित हैं । सूर्यके समान प्रकाशमान इस कमलके उन द्वादश दलोंका अपने हृदयके भीतर ध्यान करना चाहिये ॥ ६५–६७ ॥
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( श्रीशिवमहापुराण [ अ ० ३८ १०६८ तत्पश्चात् गो - दुग्धके समान उज्ज्वल कमलके वर्णाः पर्णानि पक्षस्य नाभेरुपरि पृष्ठतः । दलोंका चिन्तन करे । उनमें क्रमश: ' ड ' से लेकर गोक्षीरधवलस्योक्ता डादिफान्ता यथाक्रमम् । | ' दस फ ' तकके अक्षर अंकित हैं । इसके बाद नीचेकी अधो दलस्याम्बुजस्य एतस्य च दलानि षट् ॥ ६८ | | ओर दलवाले कमलके छः दल हैं, जिनमें ' ब ' विधूमाङ्गारवर्णस्य वर्णा वाद्याश्च लान्तिमाः
मूलाधारारविंदस्य हेमाभस्य यथाक्रमम् ।
वकारादिसकारान्ता वर्णाः पर्णमयाः स्थिताः ॥
एतेष्वथारविंदेषु यत्रैवाभिरतं मनः । तत्रैव देवं देवीं च चिन्तयेद्धीरया धिया
अंगुष्ठमात्रममलं दीप्यमानं समन्ततः ।
शुद्धदीपशिखाकारं स्वशक्त्या पूर्णमण्डितम् ॥
इन्दुरेखासमाकारं तारारूपमथापि वा ।
नीवारशूकसदृशं बिससूत्राभमेव वा ॥
कदम्बगोलकाकारं तुषारकणिकोपमम् ।
क्षित्यादितत्त्वविजयं ध्याता यद्यपि वाञ्छति ॥
तत्तत्तत्त्वाधिपामेव मूर्तिं स्थूलां विचिन्तयेत् ।
सदाशिवान्ता ब्रह्माद्या भवाद्याश्चाष्टमूर्तयः ॥
शिवस्य मूर्तयः स्थूलाः शिवशास्त्रे विनिश्चिताः ।
घोरा मिश्राः प्रशान्ताश्च मूर्तयस्ता मुनीश्वरैः ॥
फलाभिलाषरहितैश्चिन्त्याश्चिन्ताविशारदैः ।
घोराश्चेच्चिन्तिताः कुर्युः पापरोगपरिक्षयम् ॥
चिरेण मिश्रे सौम्ये तु न सद्यो न चिरादपि । से । लेकर ' ल ' तकके अक्षर अंकित हैं । इस कमलकी
।
कान्ति धूमरहित अंगारके समान है ॥ ६८३ ॥
मूलाधारमें स्थित जो कमल है, उसकी ६ ९ कान्ति सुवर्णके समान है । उसमें क्रमश: ' व ' से | लेकर ' स ' तकके चार अक्षर चार दलोंके रूपमें । स्थित हैं । इन कमलोंमेंसे जिसमें ही अपना मन रमे , उसीमें महादेव और महादेवीका अपनी धीर बुद्धिसे ॥ ७० चिन्तन करे ॥ ६ ९ -७० ॥ उनका स्वरूप अँगूठेके बराबर, निर्मल और सब ७१ ओरसे दीप्तिमान् है । अथवा वह शुद्ध दीपशिखाके समान आकारवाला है और अपनी शक्तिसे पूर्णत: मण्डित है । अथवा चन्द्रलेखा या ताराके समान ७२ रूपवाला है अथवा वह नीवारके सींक या कमलनालसे निकलेवाले सूतके समान है । कदम्बके गोलक या ओसके कणसे भी उसकी उपमा दी जा सकती ७३ है । वह रूप पृथिवी आदि तत्त्वोंपर विजय प्राप्त करनेवाला है । ध्यान करनेवाला पुरुष जिस तत्त्वपर विजय पानेकी इच्छा रखता हो, उसी तत्त्वके अधिपतिकी स्थूल मूर्तिका चिन्तन करे ॥ ७१–७३३ ॥ ७४ ब्रह्मासे लेकर सदाशिवपर्यन्त तथा भव आदि आठ मूर्तियाँ ही शिवशास्त्रमें शिवकी स्थूल मूर्तियाँ निश्चित की गयी हैं । मुनीश्वरोंने उन्हें ' घोर ', ' शान्त ' ७५ और ' मिश्र ' तीन प्रकारकी बताया है । फलकी आशा न रखनेवाले ध्यानकुशल पुरुषोंको इनका चिन्तन करना चाहिये । यदि घोर मूर्तियोंका चिन्तन किया ७६ जाय तो वे शीघ्र ही पाप और रोगका नाश करती हैं ॥ ७४–७६ ॥ मिश्र मूर्तियोंमें शिवका चिन्तन करनेपर | चिरकालमें सिद्धि प्राप्त होती है और सौम्यमूर्तिमें | शिवका ध्यान किया जाय तो सिद्धि प्राप्त होनेमें न | तो अधिक शीघ्रता होती है और न अधिक विलम्ब
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अ ० ३ ९ ] वायवीयसंहिता ( उत्तरखण्ड ) सौम्ये मुक्तिर्विशेषेण शान्तिः प्रज्ञा प्रसिध्यति १०६ ९ ॥ ७७ । ही । सौम्यमूर्तिमें ध्यान करनेसे सिध्यन्ति सिद्धयश्चात्र क्रमशो एवं शुद्ध बुद्धि प्राप्त होती है । क्रमशः विशेषतः मुक्ति, शान्ति इति श्रीशिवमहापुराणे नात्र संशयः ॥ ७८ । प्राप्त होती हैं, इसमें सभी सिद्धियाँ सप्तम्यां वायवीयसंहितायामुत्तरखण्डे संशय नहीं है॥७७-७८ ॥ ॥ इस प्रकार श्रीशिवमहापुराणके योगगतौ विघ्नोत्पत्तिवर्णनं नामाष्टत्रिंशोऽध्यायः विघ्नोत्पत्तिवर्णन अन्तर्गत सातवीं वायवीयसंहिताके उत्तरखण्डमें ॥ ३८ ॥
नामक अड़तीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ योगगतिमें ॥ ३८ ॥
अथैकोनचत्वारिंशोऽध्यायः ध्यान और उसकी महिमा, योगधर्म तथा शिवयोगीका प्राण देने अथवा शिवक्षेत्रमें उपमन्युरुवाच
श्रीकंठनाथं स्मरतां सद्यः सर्वार्थसिद्धयः ।
प्रसिध्यन्तीति मत्वैके तं वै ध्यायन्ति योगिनः ॥
स्थित्यर्थं मनसः केचित्स्थूलध्यानं प्रकुर्वते ।
स्थूले तु निश्चलं चेतो भवेत्सूक्ष्मे तु तत्स्थिरम् ॥
शिवे तु चिंतिते साक्षात्सर्वाः सिध्यन्ति सिद्धयः ।
मूर्त्यन्तरेषु ध्यातेषु शिवरूपं विचिन्तयेत् ॥
लक्षयेन्मनसः स्थैर्य तत्तद्ध्यायेत्पुनः पुनः ।
ध्यानमादौ सविषयं ततो निर्विषयं जगुः ॥
तत्र निर्विषयं ध्यानं नास्तीत्येव सतां मतम् ।
बुद्धेर्हि सन्ततिः काचिद्ध्यानमित्यभिधीयते ॥
तेन निर्विषया बुद्धिः केवलेह प्रवर्तते ।
तस्मात्सविषयं ध्यानं बालार्ककिरणाश्रयम् ॥
सूक्ष्माश्रयं निर्विषयं नापरं परमार्थतः ।
यद्वा सविषयं ध्यानं तत्साकारसमाश्रयम् ॥
निराकारात्मसंवित्तिर्ध्यानं निर्विषयं मतम् ।
निर्बीजं च सबीजं च तदेव ध्यानमुच्यते ॥
महत्त्व, शिवभक्त या शिवके लिये मरणसे तत्काल मोक्ष - लाभका कथन उपमन्यु कहते हैं— श्रीकृष्ण! श्रीकण्ठनाथका स्मरण करनेवाले लोगोंके सम्पूर्ण मनोरथोंकी सिद्धि १ तत्काल हो जाती है, ऐसा जानकर कुछ योगी उनका ध्यान अवश्य करते हैं ॥१ ॥
कुछ लोग मनकी स्थिरताके लिये स्थूलरूपका २ ध्यान करते हैं । स्थूल - रूपके चिन्तनमें लगकर जब चित्त निश्चल हो जाता है, तब सूक्ष्मरूपमें वह स्थिर होता है । भगवान् शिवका चिन्तन करनेपर सब सिद्धियाँ प्रत्यक्ष ३ सिद्ध हो जाती हैं । अन्य मूर्तियोंका ध्यान करनेपर भी शिवरूपका अवश्य चिन्तन करना चाहिये ॥ २-३ ॥ जिस - जिस रूपमें मनकी स्थिरता लक्षित हो, ४ उस - उसका बारंबार ध्यान करना चाहिये । ध्यान पहले सविषय होता है, फिर निर्विषय होता है - ऐसा ज्ञानी पुरुषोंका कथन है । इस विषयमें कुछ सत्पुरुषोंका मत ५ है कि कोई भी ध्यान निर्विषय होता ही नहीं । बुद्धिकी ही कोई प्रवाहरूपा संतति ' ध्यान ' कहलाती है ॥ ४-५ ॥ इसलिये निर्विषय बुद्धि केवल - निर्गुण - निराकार ६ ब्रह्ममें ही प्रवृत्त होती है । अतः सविषय ध्यान प्रात: कालके सूर्यकी किरणोंके समान ज्योतिका आश्रय लेनेवाला है । तथा निर्विषय ध्यान सूक्ष्मतत्त्वका अवलम्बन करनेवाला है । इन दोके सिवा और कोई ध्यान ७ वास्तवमें नहीं है । अथवा सविषय ध्यान साकार स्वरूपका अवलम्बन करनेवाला है तथा निराकार स्वरूपका जो बोध या अनुभव है, वही निर्विषय ध्यान माना गया है । वह सविषय और निर्विषय ध्यान ही ८ क्रमशः सबीज और निर्बीज कहा जाता है ॥ ६-८ ॥
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१०७० निराकाराश्रयत्वेन साकाराश्रयतस्तथा तस्मात्सविषयं ध्यानमादौ कृत्वा सबीजकम्
अन्ते निर्विषयं कुर्यान्निर्बीजं सर्वसिद्धये ।
प्राणायामेन सिध्यन्ति दिव्याः शांत्यादयः क्रमात् ॥
शान्तिः प्रशान्तिर्दीप्तिश्च प्रसादश्च ततः परम् ।
शमः सर्वापदां चैव शान्तिरित्यभिधीयते ॥
तमसोऽन्तर्बहिर्नाशः प्रशान्तिः परिगीयते ।
बहिरन्तःप्रकाशो यो दीप्तिरित्यभिधीयते ॥
स्वस्थता या तु सा बुद्धेः प्रसादः परिकीर्तितः ।
कारणानि च सर्वाणि सबाह्याभ्यन्तराणि च ॥
बुद्धेः प्रसादतः क्षिप्रं प्रसन्नानि भवन्त्युत ।
ध्याता ध्यानं तथा ध्येयं यद्वा ध्यानप्रयोजनम् ।
एतच्चतुष्टयं ज्ञात्वा ध्याता ध्यानं समाचरेत् ॥
ज्ञानवैराग्यसम्पन्नो नित्यमव्यग्रमानसः ।
श्रद्दधानः प्रसन्नात्मा ध्याता सद्भिरुदाहृतः ॥
ध्यै चिन्तायां स्मृतो धातुः शिवचिन्ता मुहुर्मुहुः ॥
योगाभ्यासस्तथाल्पोऽपि यथा पापं विनाशयेत् ।
ध्यायतः क्षणमात्रं वा श्रद्धया परमेश्वरम् ॥
अव्याक्षिप्तेन मनसा ध्यानमित्यभिधीयते ॥
बुद्धिप्रवाहरूपस्य ध्यानस्यास्यावलम्बनम् ।
ध्येयमित्युच्यते सद्भिस्तच्च साम्बः स्वयं शिवः ॥
विमुक्तिप्रत्ययं पूर्णमैश्वर्यं चाणिमादिकम् ।
शिवध्यानस्य पूर्णस्य साक्षादुक्तं प्रयोजनम् ॥
यस्मात्सौख्यं च मोक्षं च ध्यानादुभयमाप्नुयात् ।
तस्मात्सर्वं परित्यज्य ध्यानयुक्तो भवेन्नरः ॥
श्रीशिवमहापुराण [ अ ० ३ ९ निराकारका आश्रय लेनेसे उसे निर्बीज । ९ और साकारका आश्रय लेनेसे सबीजकी संज्ञा दी ॥ । गयी है । अतः पहले सविषय या सबीज ध्यान | करके अन्तमें सब प्रकारकी सिद्धिके लिये निर्विषय । अथवा निर्बीज ध्यान करना चाहिये । प्राणायाम | करनेसे क्रमशः शान्ति आदि दिव्य सिद्धियाँ सिद्ध १० होती हैं॥९ -१० ॥ उनके नाम हैं – शान्ति, प्रशान्ति, दीप्ति और ११ प्रसाद । समस्त आपदाओंके शमनको ही शान्ति कहा । गया है । तम ( अज्ञान ) - का बाहर और भीतरसे नाश । ही प्रशान्ति है । बाहर और भीतर जो ज्ञानका प्रकाश १२ होता है, उसका नाम दीप्ति है तथा बुद्धिकी जो स्वस्थता ( आत्मनिष्ठता ) है, उसीको प्रसाद कहा १३ गया है । बाह्य और आभ्यन्तरसहित जो समस्त करण हैं, वे बुद्धिके प्रसादसे शीघ्र ही प्रसन्न ( निर्मल ) हो | जाते हैं ॥ ११–१३१ / २ ॥ ध्याता, ध्यान, ध्येय और ध्यान- प्रयोजन – इन १४ चारको जानकर ध्यान करनेवाला पुरुष ध्यान करे । जो ज्ञान और वैराग्यसे सम्पन्न हो, सदा शान्तचित्त रहता हो, श्रद्धालु हो और जिसकी बुद्धि प्रसादगुणसे १५ युक्त हो, ऐसे साधकको ही सत्पुरुषोंने ध्याता कहा है ॥ १४-१५ ॥ १६ ' ध्यै चिन्तायाम् ' यह धातु है । इसका अर्थ है चिन्तन । भगवान् शिवका बारंबार चिन्तन ही ध्यान कहलाता है । जैसे थोड़ा - सा भी योगाभ्यास पापका १७ नाश कर देता है, उसी तरह क्षणमात्र भी ध्यान करनेवाले पुरुषके सारे पाप नष्ट हो जाते हैं । १८ श्रद्धापूर्वक, विक्षेपरहित चित्तसे परमेश्वरका जो चिन्तन है, उसीका नाम ' ध्यान ' है ॥ १६-१८ ॥ बुद्धिके प्रवाहरूप ध्यानका जो आलम्बन या १ ९ आश्रय है, उसीको साधु पुरुष ' ध्येय ' कहते हैं । स्वयं साम्ब सदाशिव ही वह ध्येय हैं । मोक्ष - सुखका पूर्ण अनुभव और अणिमा आदि ऐश्वर्यकी उपलब्धि- ये २० पूर्ण शिवध्यानके साक्षात् प्रयोजन कहे गये हैं । ध्यानसे | सौख्य और मोक्ष दोनोंकी प्राप्ति होती है, इसलिये | मनुष्यको सब कुछ छोड़कर ध्यानमें लग जाना २१ चाहिये ॥ १ ९ –२१ ॥
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अ ० ३ ९ ] वायवीयसहिता ( उत्तरखण्ड नास्ति ध्यानं विना ज्ञानं नास्ति ध्यानमयोगिनः । ध्यानं ज्ञानं च यस्यास्ति तीर्णस्तेन भवार्णवः
ज्ञानं प्रसन्नमेकाग्रमशेषोपाधिवर्जितम् ।
योगाभ्यासेन युक्तस्य योगिनस्वेव सिध्यति ॥
प्रक्षीणाशेषपापानां ज्ञाने ध्याने भवेन्मतिः ।
पापोपहतबुद्धीनां तद्बार्तापि सुदुर्लभा ॥
यथा वह्निर्महादीप्तः शुष्कमा च निर्दहेत् ।
तथा शुभाशुभं कर्म ध्यानाग्निर्दहते क्षणात् ॥
अत्यल्पोऽपि यथा दीपः सुमहन्नाशयेत्तमः ।
योगाभ्यासस्तथाल्पोऽपि महापापं विनाशयेत् ॥
ध्यायतः क्षणमात्रं वा श्रद्धया परमेश्वरम् ।
यद्भवेत् सुमहच्छ्रेयस्तस्यान्तो नैव विद्यते ॥
नास्ति ध्यानसमं तीर्थं नास्ति ध्यानसमं तपः ।
नास्ति ध्यानसमो यज्ञस्तस्माद्ध्यानं समाचरेत् ॥
तीर्थानि तोयपूर्णानि देवान्पाषाणमृण्मयान् । योगिनो न प्रपद्यन्ते प्रपद्यन्ते स्वात्मप्रत्ययकारणात् ॥
योगिनां च वपुः सूक्ष्मं भवेत्प्रत्यक्षमैश्वरम् ।
यथा स्थूलमयुक्तानां मृत्काष्ठाद्यैः प्रकल्पितम् ॥
यथेहान्तश्चरा राज्ञः प्रियाः स्युर्न बहिश्चराः ।
तथान्तर्ध्याननिरताः प्रियाश्शम्भोर्न कर्मिणः ॥
) १०७१ बिना ध्यानके ज्ञान नहीं होता और जिसने ॥ २२ योगका साधन नहीं किया है सिद्ध होता । जिसे ध्यान, उसका ध्यान नहीं हैं, उसने भवसागरको और ज्ञान दोनों प्राप्त उपाधियोंसे पार कर लिया । समस्त रहित, निर्मल ज्ञान और एकाग्रतापूर्ण २३ ध्यान — ये योगाभ्याससे युक्त योगीको हैं ॥ २२-२३ ॥ ही सिद्ध होते जिनके सारे पाप नष्ट हो गये हैं, उन्हींकी बुद्धि २४ ज्ञान और ध्यानमें लगती है । जिनकी बुद्धि पापसे दूषित है, उनके लिये ज्ञान और ध्यानकी बात भी अत्यन्त दुर्लभ है । जैसे प्रज्वलित हुई आग सूखी और गीली लकड़ीको भी जला देती है, उसी प्रकार २५ ध्यानाग्नि शुभ और अशुभ कर्मको भी क्षणभरमें दग्ध कर देती है॥२४-२५ ॥ जैसे बहुत छोटा दीपक भी महान् अन्धकारका २६ नाश कर देता है, इसी तरह थोड़ा - सा योगाभ्यास भी महान् पापका विनाश कर डालता है । श्रद्धापूर्वक क्षणभर भी परमेश्वरका ध्यान करनेवाले पुरुषको जो महान् श्रेय प्राप्त होता है, उसका कहीं अन्त २७ नहीं है ॥ २६-२७ ॥ ध्यानके समान कोई तीर्थ नहीं है, ध्यानके २८ समान कोई तप नहीं है और ध्यानके समान कोई यज्ञ नहीं है; इसलिये ध्यान अवश्य करे । अपने आत्मा एवं परमात्माका बोध प्राप्त करनेके कारण योगीजन केवल जलसे भरे हुए तीर्थों और पत्थर एवं मिट्टीकी बनी हुई देवमूर्तियोंका आश्रय नहीं लेते [ वे आत्मतीर्थमें २ ९ अवगाहन करते और आत्मदेवके ही भजनमें लगे रहते हैं ] ॥ २८-२९ ॥ जैसे अयोगी पुरुषोंको मिट्टी और काठ ३० आदिकी बनी हुई स्थूल मूर्तियोंका प्रत्यक्ष होता है, उसी तरह योगियोंको ईश्वरके सूक्ष्म स्वरूपका प्रत्यक्ष दर्शन होता है । जैसे राजाको अपने अन्त: पुरमें विचरनेवाले स्वजन एवं परिजन प्रिय होते हैं और बाहरके लोग उतने प्रिय नहीं होते, उसी प्रकार भगवान् शंकरको अन्तःकरणमें ध्यान लगानेवाले भक्त ही अधिक प्रिय हैं, बाह्य उपचारोंका आश्रय लेनेवाले ३१ | कर्मकाण्डी नहीं ॥ ३०-३१ ॥
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१०७२ बहिष्करा यथा लोके नातीव फलभोगिनः दृष्ट्वा नरेन्द्रभवने तद्वदत्रापि कर्मिणः विपद्यन्ते ज्ञानयोगार्थमुद्यतः श्रीशिवमहापुराण [ अ ० ३ ९ । जैसे लोकमें यह देखा गया है कि बाहरी ॥ ३२ / लोग राजाके भवनमें राजकीय पुरुषोचित फलका । उपभोग नहीं कर पाते, केवल अन्तः पुरके लोग ही । | उस फलके भागी होते हैं, उसी प्रकार यहाँ बाह्यकर्मी | पुरुष उस फलको नहीं पाते, जो ध्यानयोगियोंको सुलभ होता है ॥३२ ॥
। ज्ञानयोगकी साधनाके लिये उद्यत हुआ पुरुष यद्यन्तरा गमिष्यति ॥ / यदि बीचमें ही मर जाय तो भी वह योगके लिये योगस्योद्योगमात्रेण रुद्रलोकं अनुभूय सुखं तत्र स जातो योगिनां कुले ज्ञानयोगं पुनर्लब्ध्वा संसारमतिवर्तते जिज्ञासुरपि योगस्य यां गतिं लभते नरः न तां गतिमवाप्नोति सर्वैरपि महामखैः द्विजानां वेदविदुषां कोटिं सम्पूज्य यत्फलम् । भिक्षामात्रप्रदानेन तत्फलं शिवयोगिने
यज्ञाग्निहोत्रदानेषु तीर्थहोमेषु यत्फलम् ।
योगिनामन्नदानेन तत्समस्तं फलं लभेत् ॥
ये चापवादं कुर्वन्ति विमूढाः शिवयोगिनाम् ।
श्रोतृभिस्ते प्रपद्यन्ते नरकेष्वामहीक्षयात् ॥
सति श्रोतरि वक्ता स्यादपवादस्य योगिनाम् ।
तस्माच्छ्रोता च पापीयान्दण्ड्यः सुमहतां मतः ।
ये पुनः सततं भक्त्या भजन्ति शिवयोगिनः ॥
ते विदन्ति महाभोगानन्ते योगं च शांकरम् ।
भोगार्थिभिर्नरैस्तस्मात्सम्पूज्याः शिवयोगिनः ॥
प्रतिश्रयान्नपानाद्यैः शय्याप्रावरणादिभिः । योगधर्मः ससारत्वादभेद्यः ससारत्वादभेद्यः पापमुद्गरैः ॥ वज्रतंदुलवज्ज्ञेयं तथा पापेन योगिनः ३३ । उद्योग करनेमात्रसे रुद्रलोकमें जायगा । वहाँ दिव्य । । सुखका उपभोग करके वह फिर योगियोंके कुलमें जन्म लेगा और पुनः ज्ञानयोगको पाकर संसारसागरको ॥ ३४ लाँघ जायगा ॥३३-३४ ॥ । योगका जिज्ञासु पुरुष भी जिस गतिको पाता है, ॥ ३५ उसे यज्ञकर्ता सम्पूर्ण महायज्ञोंका अनुष्ठान करके भी नहीं पाता । करोड़ों वेदवेत्ता द्विजोंकी पूजा करनेसे जो फल मिलता है, वह एक शिवयोगीको भिक्षा देनेमात्रसे ॥ ३६ प्राप्त हो जाता है । यज्ञ, अग्निहोत्र, दान, तीर्थसेवन और होम — इन सभी पुण्यकर्मोंके अनुष्ठानसे जो फल मिलता है, वह सारा फल शिवयोगियोंको अन्न ३७ देनेमात्रसे प्राप्त हो जाता है॥३५–३७ ॥ जो मूढ़ मानव शिवयोगियोंकी निन्दा करते हैं, ३८ वे श्रोताओं सहित नरकमें पड़ते हैं और प्रलयकालतक वहीं रहते हैं । श्रोताके होनेपर ही कोई शिवयोगियोंकी निन्दाका वक्ता हो सकता है, इसलिये महापुरुषोंके मतमें उस निन्दाको सुननेवाला भी महान् पापी और ३ ९ दण्डनीय है । जो लोग सदा भक्तिभावसे शिवयोगियोंकी सेवा करते हैं, वे महान् भोग पाते और अन्तमें शिवयोगकी भी उपलब्धि कर लेते हैं । इसलिये भोगार्थी मनुष्योंको ४० चाहिये कि वे रहनेको स्थान, खान - पान, शय्या तथा ओढ़ने - बिछानेकी सामग्री आदि देकर सदा शिवयोगियोंका सत्कार करें ॥ ३८-४०१ / २ ॥ ४१ योगधर्म सुदृढ़ — अत्यन्त प्रबल है, अत: पापरूपी मुद्गरोंसे उसका भेदन नहीं हो सकता । योगधर्म और पाप - मुद्गरमें उतना ही अन्तर समझना चाहिये, जितना वज्र और तन्दुलमें; अतः योगीजन पापों और तापसमूहोंसे उसी तरह लिप्त नहीं होते, जैसे कमलका
न लिप्यन्ते च पापौघैः पद्मपत्रं यथाम्भसा ॥ ४२ । पत्ता पानीसे ॥ ४१-४२ ॥
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अ ० ३ ९ ] वायवीयसंहिता यस्मिन्देशे वसेन्नित्यं शिवयोगरतो मुनिः
सोऽपि देशो भवेत्पूतः स पूत इति किं ।
पुनः ॥ ४३
तस्मात्सर्वं परित्यज्य कृत्यमन्यद्विचक्षणः ।
सर्वदुःखप्रहाणाय शिवयोगं समभ्यसेत् ॥ ४४
सिद्धयोगफलो योगी लोकानां हितकाम्यया ।
भोगान्भुक्त्वा यथाकामं विहरेद्वात्र वर्तताम् ॥ ४५
अथवा क्षुद्रमित्येव मत्वा वैषयिकं सुखम् ।
त्यक्त्वा विरागयोगेन स्वेच्छया कर्म मुच्यताम् ॥ ४६
यस्त्वासन्नां मृतिं मर्त्यो दृष्ट्वारिष्टं च भूयसा । स योगारम्भनिरतः शिवक्षेत्रं समाश्रयेत् ॥ ४७
स तत्र निवसन्नेव यदि धीरमना नरः ।
प्राणान् विनापि रोगाद्यैः स्वयमेव परित्यजेत् ॥ ४८
कृत्वाप्यनशनं चैव हुत्वा चाङ्गं शिवानले ।
क्षिप्त्वा वा शिवतीर्थेषु स्वदेहमवगाहनात् ॥ ४ ९
शिवशास्त्रोक्तविधिवत्प्राणान्यस्तु परित्यजेत् ।
सद्य एव विमुच्येत नात्र कार्या विचारणा ॥५०
रोगाद्यैर्वाथ विवश: शिवक्षेत्रं समाश्रितः ।
म्रियते यदि सोऽप्येवं मुच्यते नात्र संशयः ॥ ५१
यथा हि मरणं श्रेष्ठमुशन्त्यनशनादिभिः ।
शास्त्रविश्रम्भधीरेण मनसा क्रियते यतः ॥ ५२
शिवनिन्दारतं हत्वा पीडितः स्वयमेव वा ।
यस्त्यजेद्दुस्त्यजान्प्राणान्न स भूयः प्रजायते ॥ ५३
शिवनिन्दारतं हन्तुमशक्तो यः स्वयं मृतः ।
सद्य एव प्रमुच्येत त्रिःसप्तकुलसंयुतः ॥ ५४
( उत्तरखण्ड ) १०७३ शिवयोगपरायण मुनि जिस देशमें नित्य निवास करता है, वह देश भी पवित्र हो जाता है । फिर उसकी पवित्रताके विषयमें तो कहना ही क्या? अतः एवं विद्वान् पुरुष सब कृत्योंको चतुर छोड़कर सम्पूर्ण दुःखोंसे छुटकारा पानेके लिये शिवयोगका अभ्यास करे ॥ ४३-४४ ॥ जिसका योगफल सिद्ध हो गया है, वह योगी यथेष्ट भोगोंको भोगकर समस्त लोकोंकी कामनासे संसारमें विचरे अथवा अपने हित-या विषयसुखको स्थानपर ही रहे अत्यन्त तुच्छ समझकर छोड़ दे और वैराग्ययोगसे स्वेच्छापूर्वक कर्मोंका परित्याग कर | दे ॥ ४५-४६ ॥ जो मनुष्य बहुत - से अरिष्ट देखकर अपनी मृत्युको निकट जान ले, उसे योगानुष्ठानमें संलग्न हो शिवक्षेत्रका आश्रय लेना चाहिये । वह मनुष्य यदि धीरचित्त होकर वहीं निवास करता रहे तो रोग आदिके बिना भी स्वयं ही प्राणोंका परित्याग कर सकता है । अनशन करके, शिवाग्निमें शरीरकी आहुति देकर अथवा शिवतीर्थोंमें अवगाहन करते हुए अपने शरीरको उन्हींके जलमें डालकर शिवशास्त्रोक्त विधिसे जो अपने प्राणोंका त्याग करता है, वह तत्काल मुक्त हो जाता है — इसमें अन्यथा विचार करनेकी आवश्यकता नहीं है अथवा जो रोग आदिसे विवश होकर शिवक्षेत्रकी शरण लेता है, उसकी भी यदि वहाँ मृत्यु हो जाय तो वह इसी प्रकार मुक्त हो जाता है — इसमें संशय नहीं है ॥ ४७–५१ ॥ इसलिये लोग अनशन आदिसे शिवक्षेत्रमें श्रेष्ठ मरणकी कामना करते हैं; क्योंकि शास्त्रपर विश्वास करके धीर हुए मनसे उनके द्वारा इस तरहकी मृत्यु स्वीकार की जाती है ॥५२ ॥
शिवकी निन्दा करनेवालेको आक्रान्त करके अथवा स्वयं निन्दासे व्यथित होकर जो कठिनाईसे त्याग किये जानेयोग्य [ अपने ] प्राणोंका त्याग कर देता है, वह पुन: जन्म नहीं लेता है ॥५३ ॥
शिवनिन्दा करनेवालेको आक्रान्त करनेमें असमर्थ जो [ व्यक्ति ] स्वयं मर जाता है, वह [ अपनी ] इक्कीस पीढ़ियोंके साथ स्वयं मुक्त हो जाता है ।
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( श्रीशिवमहापुराण [ अ ० ४० १०७४
शिवार्थे यस्त्यजेत्प्राणान् शिवभक्तार्थमेव वा ।
न तेन सदृशः कश्चिन्मुक्तिमार्गस्थितो नरः ॥ ५५
तस्माच्छीघ्रतरा मुक्तिस्तस्य संसारमंडलात् ।
एतेष्वन्यतमोपायं कथमप्यवलम्ब्य वा ॥ ५६
षडध्वशुद्धिं विधिवत्प्राप्तो वा म्रियते यदि ।
पशूनामिव तस्येह न कुर्यादौर्ध्वदैहिकम् ॥५७
नैवाशौचं प्रपद्येत तत्पुत्रादिर्विशेषतः ।
शिवचारार्थमथवा शिवविद्यार्थमेव वा ।
खनेद्वा भुवि तद्देहं दहेद्वा शुचिनाग्निना ॥ ५८
क्षिपेद्वाप्सु शिवास्वेव त्यजेद्वा काष्ठलोष्टवत् ।
अथैनमपि चोद्दिश्य कर्म चेत्कर्तुमीप्सितम् ॥ ५ ९
कल्याणमेव कुर्वीत शक्त्या भक्तांश्च तर्पयेत् ।
धनं तस्य भजेच्छैवः शैवी चेत्तस्य सन्ततिः ।
नास्ति चेत्तच्छिवे दद्यान्नादद्यात्पशुसन्ततिः ॥ ६०
इति श्रीशिवमहापुराणे सप्तम्यां | जो शिवके लिये अथवा शिवभक्तोंके लिये प्राणत्याग करता है, उसके समान दूसरा कोई मनुष्य मुत्याग मार्गपर स्थित नहीं है ॥ ५४-५५ ॥ इस कारण इस संसार मण्डलसे उसकी । शीघ्र मुक्ति हो जाती है । इनमेंसे किसी एक उपायका किसी तरह भी अवलम्बन करके अथवा त्ि षडध्वशुद्धिको प्राप्त होकर यदि कोई मनुष्य मरता है
तो उसका अन्य पशुओं - प्राणियोंके समान यहाँ ।
और्ध्वदैहिक संस्कार नहीं करना चाहिये ॥ ५६-५७ ॥
विशेषतः उसके पुत्र आदिको उसके मरने अशौचकी प्राप्ति नहीं होती । ऐसे पुरुषके मृत शरीरको धरतीमें गाड़ दे या पवित्र अग्निसे जला दे या शिव-स्वरूपजलमें डाल दे अथवा काठ या मिट्टीके ढेलेकी भाँति कहीं भी फेंक दे, सब उसके लिये बराबर है । यदि ऐसे पुरुषके उद्देश्यसे भी कोई कर्म करनेकी इच्छा हो तो दूसरोंका कल्याण ही करे और अपनी शक्तिके अनुसार शिवभक्तोंको तृप्त करे । उसके धनको शिवभक्त ही ग्रहण करे । यदि उसकी संतति शिवभक्त हो तो वह भी ग्रहण कर सकती है । यदि ऐसा सम्भव न हो तो उसका धन भगवान् शिवको समर्पित कर दे । परंतु उसकी पशुसंतति ( शिवभक्तिहीन संतान ) उस धनको ग्रहण न करे॥५८–६० ॥ वायवीयसंहितायामुत्तरखण्डे शैवयोगवर्णनं नामैकोनचत्वारिंशोऽध्यायः ॥ ३ ९ ॥ ॥ इस प्रकार श्रीशिवमहापुराणके अन्तर्गत सातवीं वायवीयसंहिताके उत्तरखण्डमें शैवयोगवर्णन नामक उनतालीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ३ ९ ॥ अथ चत्वारिंशोऽध्यायः वायुदेवका अन्तर्धान होना, ऋषियोंका सरस्वतीमें अवभृथ - स्नान और काशीमें दिव्य तेजका दर्शन करके ब्रह्माजीके पास सूचना देकर मेरुके सूत उवाच इति स विजितमन्योर्यादवेनोपमन्यो-रधिगतमभिधाय ज्ञानयोगं मुनिभ्यः । प्रणतिमुपगतेभ्यस्तेभ्य उद्भावितात्मा सपदि वियति वायुः सायमन्तर्हितोऽभूत् ॥ १ जाना, ब्रह्माजीका उन्हें सिद्धि - प्राप्तिकी कुमारशिखरपर भेजना सूतजी कहते हैं - इस प्रकार क्रोधको जीतनेवाले | उपमन्युसे यदुकुलनन्दन श्रीकृष्णने जो ज्ञानयोग प्राप्त किया था, उसका प्रणतभावसे बैठे हुए उन मुनियोंको
। उपदेश देकर आत्मदर्शी वायुदेव उसी समय सायंकाल ।
आकाशमें अन्तर्धान हो गये ॥ १ ॥
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अ ० ४० ] वायवीयसहिता ( उत्तरखण्ड) प्रभातसमये नैमिषीयास्तपोधनाः । १०७५ ततः कर्तुं सर्व एव समुद्ययुः ॥ २ तदनन्तर प्रात: काल नैमिषारण्यके सत्रान्तेऽवभृथं
तदा ब्रह्मसमादेशाद्देवी साक्षात्सरस्वती ।
प्रसन्ना • स्वादुसलिला प्रावर्तत नदी शुभा ॥ ३
सरस्वतीं नदीं दृष्ट्वा मुनयो हृष्टमानसाः । समाप्य सत्रं 19 प्रारब्ध चक्रुस्तत्रावगाहनम् ॥ ४
अथ सन्तर्प्य देवादींस्तदीयैः सलिलैः शिवैः ।
स्मरन्तः पूर्ववृत्तान्तं ययुर्वाराणसीं प्रति ॥ ५
तदा ते हिमवत्पादात्पन्ततीं दक्षिणामुखीम् ।
दृष्ट्वा भागीरथीं तत्र स्नात्वा तत्तीरतो ययुः ॥ ६
ततो वाराणसीं प्राप्य मुदिताः सर्व एव ते ।
तदोत्तरप्रवाहायां गङ्गायामवगाह्य च ॥ ७
अविमुक्तेश्वरं लिङ्गं दृष्ट्वाभ्यर्च्य विधानतः ।
प्रयातुमुद्यतास्तत्र ददृशुर्दिवि भास्वरम् ॥ ८
सूर्यकोटिप्रतीकाशं तेजोदिव्यं महाद्भुतम् ।
आत्मप्रभावितानेन व्याप्तसर्वदिगन्तरम् ॥ ९
अथ पाशुपताः सिद्धाः भस्मसञ्छन्नविग्रहाः ।
मुनयोऽभ्येत्य शतशो लीनाः स्युस्तत्र तेजसि ॥ १०
तथा विलीयमानेषु तपस्विषु महात्मसु ।
सद्यस्तिरोदधे तेजस्तदद्भुतमिवाभवत् ॥ ११
तद् दृष्ट्वा महदाश्चर्यं नैमिषीया महर्षयः ।
किमेतदित्यजानन्तो ययुर्ब्रह्मवनं प्रति ॥ १२
प्रागेवैषांतु गमनात्पवनो लोकपावनः । दर्शनं नैमिषीयाणां संवादस्तैर्महात्मनः ॥ १३ | शुद्धां बुद्धिं ततस्तेषां समाप्तिं साम्बे सानुचरे शिवे । चापि सत्रस्य दीर्घपूर्वस्य सत्रिणाम् ॥ १४ । मुनि सत्रके अन्तमें समस्त तपस्वी उस समय ब्रह्माजीके अवभृथ - स्नान करनेको उद्यत स्वादिष्ठ आदेशसे साक्षात् हुए । जलसे भरी हुई स्वच्छ सरस्वतीदेवी वहाँ बहने लगीं ॥। २-३ सुन्दर नदीके रूपमें सरस्वती ॥ बड़े प्रसन्न हुए नदीको । उन्होंने उपस्थित देख मुनि मन - ही - मन अवगाहन ( स्नान ) आरम्भ सत्र समाप्त करके उसमें जलसे देवता आदिका किया । उस नदीके मंगलमय स्मरण करते तर्पण करके पूर्व - वृत्तान्तका हुए वे सब - के - सब वाराणसीपुरीकी चल दिये॥४-५ ॥ ओर उस समय हिमालयके चरणोंसे निकलकर ओर बहनेवाली भागीरथीका दर्शन करके उन ऋषियोंने दक्षिणकी उसमें स्नान किया और भागीरथीके ही किनारेका । पकड़कर वे आगे बढ़े ॥ ६ ॥ मार्ग
तदनन्तर वाराणसीमें पहुँचकर उन सबको बड़ी प्रसन्नता हुई । वहाँ उत्तरवाहिनी गंगामें स्नान करके उन्होंने अविमुक्तेश्वर लिंगका दर्शन और विधिपूर्वक पूजन किया । पूजन करके जब वे चलनेको उद्यत हुए तब उन्होंने आकाशमें एक दिव्य और परम अद्भुत प्रकाशमान तेज देखा, जो करोड़ों सूर्योंके समान जान पड़ता था । उसने अपनी प्रभाके प्रसारसे सम्पूर्ण दिगन्तको व्याप्त कर लिया था ॥७ – ९ ॥ तदनन्तर जिन्होंने अपने शरीरमें भस्म लगा रखा था, वे सैकड़ों सिद्ध पाशुपत मुनि निकट जाकर उस तेजमें लीन हो गये । उन तपस्वी महात्माओंके इस प्रकार लीन हो जानेपर वह तेज तत्काल अदृश्य हो गया । वह एक अद्भुत - सी घटना घटित हुई! उस महान् आश्चर्यको देखकर वे नैमिषारण्यके निवासी महर्षि ‘ यह क्या है ' इस बातको न जानते हुए ब्रह्मवनको चले गये॥१०–१२ ॥ इनके जानेसे पहले ही लोकपावन पवनदेव वहाँ जा पहुँचे । उन्होंने नैमिषारण्यवासी ऋषियोंका जिस प्रकार साक्षात्कार हुआ, जिस तरह उनसे उनकी बातचीत हुई, उन ऋषियोंकी शुद्ध बुद्धि जिस प्रकार साम्ब सदाशिवमें लगी थी और जिस पार्षदोंसहित प्रकार उन यज्ञपरायण ऋषियोंका वह दीर्घकालिक
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१०७४ शिवार्थे यस्त्यजेत्प्राणान् शिवभक्तार्थमेव वा न तेन सदृशः कश्चिन्मुक्तिमार्गस्थितो नरः तस्माच्छीघ्रतरा मुक्तिस्तस्य संसारमंडलात् एतेष्वन्यतमोपायं कथमप्यवलम्ब्य वा षडध्वशुद्धिं विधिवत्प्राप्तो वा म्रियते यदि पशूनामिव तस्येह न कुर्यादौर्ध्वदैहिकम् नैवाशौचं प्रपद्येत तत्पुत्रादिर्विशेषतः
शिवचारार्थमथवा शिवविद्यार्थमेव वा ।
खनेद्वा भुवि तद्देहं दहेद्वा शुचिनाग्निना ॥
क्षिपेद्वाप्सु शिवास्वेव त्यजेद्वा काष्ठलोष्टवत् ।
अथैनमपि चोद्दिश्य कर्म चेत्कर्तुमीप्सितम् ॥
कल्याणमेव कुर्वीत शक्त्या भक्तांश्च तर्पयेत् ।
धनं तस्य भजेच्छैवः शैवी चेत्तस्य सन्ततिः ।
नास्ति चेत्तच्छिवे दद्यान्नादद्यात्पशुसन्ततिः ॥
इति श्रीशिवमहापुराणे श्रीशिवमहापुराण [ अ ० ४० | जो शिवके लिये अथवा शिवभक्तोंके लिये प्राणत्याग । । करता है, उसके समान दूसरा कोई मनुष्य मुक्ति-॥५५ मार्गपर स्थित नहीं है॥५४-५५ ॥ इस कारण इस संसार मण्डलसे उसकी । शीघ्र मुक्ति हो जाती है । इनमेंसे किसी एक उपायका ॥५६ किसी तरह भी अवलम्बन करके अथवा विधिवत् । । षडध्वशुद्धिको प्राप्त होकर यदि कोई मनुष्य मरता है ॥५७ तो उसका अन्य पशुओं - प्राणियोंके समान यहाँ । और्ध्वदैहिक संस्कार नहीं करना चाहिये ॥ ५६-५७ ॥ विशेषतः उसके पुत्र आदिको उसके मरनेसे । अशौचकी प्राप्ति नहीं होती । ऐसे पुरुषके मृत शरीरको धरतीमें गाड़ दे या पवित्र अग्निसे जला दे या शिव-५८ स्वरूपजलमें डाल दे अथवा काठ या मिट्टीके ढेलेकी भाँति कहीं भी फेंक दे, सब उसके लिये बराबर है । यदि ऐसे पुरुषके उद्देश्यसे भी कोई कर्म करनेकी इच्छा हो तो दूसरोंका कल्याण ही करे और अपनी ५ ९ शक्तिके अनुसार शिवभक्तोंको तृप्त करे । उसके धनको शिवभक्त ही ग्रहण करे । यदि उसकी संतति शिवभक्त हो तो वह भी ग्रहण कर सकती है । यदि ऐसा सम्भव न हो तो उसका धन भगवान् शिवको समर्पित कर दे । परंतु उसकी पशुसंतति ( शिवभक्तिहीन ६० संतान ) उस धनको ग्रहण न करे ॥ ५८–६० ॥ सप्तम्यां वायवीयसंहितायामुत्तरखण्डे शैवयोगवर्णनं नामैकोनचत्वारिंशोऽध्यायः ॥ ३ ९ ॥ ॥ इस प्रकार श्रीशिवमहापुराणके अन्तर्गत सातवीं वायवीयसंहिताके उत्तरखण्डमें शैवयोगवर्णन नामक उनतालीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ३ ९ ॥ अथ चत्वारिंशोऽध्यायः वायुदेवका अन्तर्धान होना, ऋषियोंका सरस्वतीमें अवभृथ - स्नान और काशीमें दिव्य तेजका दर्शन करके ब्रह्माजीके पास सूचना देकर मेरुके सूत उवाच इति स विजितमन्योर्यादवेनोपमन्यो-रधिगतमभिधाय ज्ञानयोगं मुनिभ्यः । प्रणतिमुपगतेभ्यस्तेभ्य उद्भावितात्मा सपदि वियति वायुः सायमन्तर्हितोऽभूत् ॥ १ जाना, ब्रह्माजीका उन्हें सिद्धि - प्राप्तिकी कुमारशिखरपर भेजना सूतजी कहते हैं - इस प्रकार क्रोधको जीतनेवाले । | उपमन्युसे यदुकुलनन्दन श्रीकृष्णने जो ज्ञानयोग प्राप्त किया था, उसका प्रणतभावसे बैठे हुए उन मुनियोंको | उपदेश देकर आत्मदर्शी वायुदेव उसी समय सायंकाल आकाशमें अन्तर्धान हो गये ॥ १ ॥