श्रीगणेशाय नमः।

शिव महापुराण - २ — पृष्ठ 1071–1080

शिव महापुराण - २ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 1071–1080

पृष्ठ 1071

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अ ० ३७ ] वायवीयसंहिता

प्राणः स्वदेहजो वायुस्तस्यायामो निरोधनम् ।

तद्रेचकं पूरकं च कुम्भकं च त्रिधोच्यते ॥ २१

नासिकापुटमंगुल्या पीड्यैकमपरेण तु ।

औदरं रेचयेद्वायुं तथायं रेचकः स्मृतः ॥ २२

बाह्येन मरुता देहं दृतिवत्परिपूरयेत् ।

नासापुटेनापरेण पूरणात्पूरकं मतम् ॥ २३

न मुञ्चति न गृह्णाति वायुमन्तर्बहिः स्थितम् ।

सम्पूर्णं कुम्भवत्तिष्ठेदचलः स तु कुम्भकः ॥ २४

रेचकाद्यं त्रयमिदं न द्रुतं न विलम्बितम् ।

तद्यतः क्रमयोगेन त्वभ्यसेद्योगसाधकः ॥ २५

रेचकादिषु योऽभ्यासो नाडीशोधनपूर्वकः ।

स्वेच्छोत्क्रमणपर्यन्तः प्रोक्तो योगानुशासने ॥ २६

कन्यकादिक्रमवशात् प्राणायामनिरोधनम् ।

तच्चतुर्द्धापदिष्टं स्यान्मात्रागुणविभागतः ॥ २७

कन्यकस्तु चतुर्द्धा स्यात्स च द्वादशमात्रकः ।

मध्यमस्तु द्विरुद्धातश्चतुर्विंशतिमात्रकः ॥ २८

उत्तमस्तु त्रिरुद्धातः षड्विंशन् मात्रकः परः ।

स्वेदकंपादिजनकः प्राणायामस्तदुत्तरः ॥ २ ९

( उत्तरखण्ड ) १०५७ अपने शरीरमें प्रकट हुई जो वायु है, उसको प्राण कहते हैं । उसे रोकना ही उसका आयाम है । उस प्राणायामके तीन भेद कहे गये हैं- रेचक, पूरक और कुम्भक ॥ २१ ॥

नासिकाके एक छिद्रको दबाकर या बन्द करके दूसरेसे उदरस्थित वायुको बाहर निकाले । इस क्रियाको । रेचक कहा गया है । फिर दूसरे नासिका छिद्रके द्वारा बाह्य वायुसे शरीरको धौंकनीकी भाँति भर ले । इसमें वायुके पूरणकी क्रिया होनेके कारण इसे ‘ पूरक ' कहा गया है । जब साधक भीतरकी वायुको न तो छोड़ता है और न बाहरकी वायुको ग्रहण करता है, केवल भरे हुए घड़ेकी भाँति अविचलभावसे स्थित रहता है, तब उस प्राणायामको ‘ कुम्भक ' नाम दिया जाता है । योगके साधकको चाहिये कि वह रेचक आदि तीनों प्राणायामोंको न तो बहुत जल्दी - जल्दी करे और न बहुत देरसे करे । साधनाके लिये उद्यत हो क्रमयोगसे उसका अभ्यास करे ॥ २२–२५ ॥ रेचक आदिमें नाड़ीशोधनपूर्वक जो प्राणायामका अभ्यास किया जाता है, उसे स्वेच्छासे उत्क्रमणपर्यन्त करते रहना चाहिये - यह बात योगशास्त्रमें बतायी गयी है । कनिष्ठ आदिके क्रमसे प्राणायाम चार प्रकारका कहा गया है । मात्रा और गुणोंके विभाग— तारतम्यसे ये भेद बनते हैं ॥ २६-२७ ॥ चार भेदोंमेंसे जो कन्यक या कनिष्ठ प्राणायाम है, यह प्रथम उद्घात ' कहा गया है; इसमें बारह मात्राएँ होती हैं । मध्यम प्राणायाम द्वितीय उद्घात है, उसमें चौबीस मात्राएँ होती हैं । उत्तम श्रेणीका प्राणायाम तृतीय उद्घात है, उसमें छत्तीस मात्राएँ होती हैं । उससे भी श्रेष्ठ जो सर्वोत्कृष्ट चतुर्थ प्राणायाम है, वह शरीरमें स्वेद और कम्प आदिका | जनक होता है ॥ २८-२९ ॥ १ - उद्घातका अर्थ नाभिमूलसे प्रेरणा की हुई वायुका सिरमें टक्कर खाना है । यह प्राणायाममें देश, काल और संख्याका परिमाण है । इस प्रकार दिया गया है — ' बाह्यान्तरविषयाक्षेपी चतुर्थः ' अर्थात् बाह्य और २ - योगसूत्रमें चतुर्थ प्राणायामका परिचय आभ्यन्तर विषयोंको फेंकनेवाला प्राणायाम चौथा है । 2224 Shivmahapuran_IInd Part_Section_35_1_Front

पृष्ठ 1072

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१०५८

आनन्दोद्भवरोमाञ्चनेत्राभ्रूणां विमोचनम् ।

जल्पभ्रमणमूर्छाद्यं जायते योगिनः परम् ॥

जानुं प्रदक्षिणीकृत्य न द्रुतं न विलम्बितम् ।

अंगुलीस्फोटनं कुर्यात्सा मात्रेति प्रकीर्तिता ॥

मात्रा क्रमेण विज्ञेयाश्चोद्घातक्रमयोगतः ।

नाडीविशुद्धिपूर्वं तु प्राणायामं समाचरेत् ॥

अगर्भश्च सगर्भश्च प्राणायामो द्विधा स्मृतः ।

जपं ध्यानं विनागर्भः सगर्भस्तत्समन्वयात् ॥

अगर्भाद्गर्भसंयुक्तः प्राणायामः शताधिकः ।

तस्मात्सगर्भं कुर्वन्ति योगिनः प्राणसंयमम् ॥

प्राणस्य विजयादेव जीयन्ते देहवायवः ।

प्राणोऽपानः समानश्च ह्युदानो व्यान एव च ॥

नागः कूर्मश्च कृकलो देवदत्तो धनञ्जयः । प्रयाणं कुरुते श्रीशिवमहापुराण [ अ ० ३७ योगीके अन्दर आनन्दजनित रोमांच, नेत्रोंसे ३० अश्रुपात, जल्प, श्रान्ति और मूर्च्छा आदि भाव प्रकसे । होते हैं । घुटनेके चारों ओर प्रदक्षिण- क्रमसे न जल्दी और न बहुत धीरे - धीरे चुटकी बजाये । । घुटने बहुत ३१ एक परिक्रमामें जितनी देरतक चुटकी बजती है की । समयका मान एक मात्रा है । मात्राओंको क्रमशः , उस ३२ जानना चाहिये । उद्घात क्रम - योगसे नाड़ीशोधनपूर्वक प्राणायाम करना चाहिये ॥ ३०–३२ ॥ प्राणायामके दो भेद बताये गये हैं- अगर्भ और ३३ सगर्भ । जप और ध्यानके बिना किया गया प्राणायाम ' अगर्भ ' कहलाता है और जप तथा ध्यानके सहयोग-पूर्वक किये जानेवाले प्राणायामको ‘ सगर्भ ' कहते हैं । ३४ अगर्भसे सगर्भ प्राणायाम सौ गुना अधिक उत्तम है । इसलिये योगीजन प्रायः सगर्भ प्राणायाम किया करते हैं । प्राणविजयसे ही शरीरकी वायुओंपर विजय पायी जाती है॥३३-३४१ / २ ॥ ३५ प्राण, अपान, समान, उदान, व्यान, नाग, कूर्म, कृकल, देवदत्त और धनंजय - ये दस प्राणवायु हैं । प्राण प्रयाण करता है, इसीलिये उसे ' प्राण ' कहते यस्मात्तस्मात्प्राणोऽभिधीयते ॥ ३६ हैं । जो कुछ भोजन किया जाता है, उसे जो वायु अवाङ्नयत्यपानाख्यो यदाहारादि भुज्यते । नीचे ले जाती है, उसको ' अपान ' कहते हैं । जो व्यानो व्यान शयत्यङ्गान्यशेषाणि विवर्धयन् ॥ ३७ वायु सम्पूर्ण अंगोंको बढ़ाती हुई उनमें व्याप्त रहती है, उसका नाम ‘ व्यान ' है । जो वायु मर्मस्थानोंको उद्वेजयति मर्माणीत्युदानो वायुरीरितः । उद्वेजित करती है, उसकी ' उदान ' संज्ञा है । जो समं नयति सर्वाङ्गं समानस्तेन गीयते ॥ ३८ वायु सब अंगोंको समभावसे ले चलती है, वह

उद्गारे नाग आख्यातः कूर्म उन्मीलने स्थितः ।

कृकलः क्षवथौ ज्ञेयो देवदत्तो विजृम्भणे ॥ ३

न जहाति मृतं चापि सर्वव्यापी धनञ्जयः । अपने उस समनयनरूप कर्मसे ' समान ' कहलाती है ॥ ३५–३८ ॥ मुखसे कुछ उगलनेमें कारणभूत वायुको ९ ' नाग ' कहा गया है । आँख खोलनेके व्यापारमें ‘ कूर्म ' नामक वायुकी स्थिति है । छींकमें ‘ कृकल ' और जँभाईमें ‘ देवदत्त ' नामक वायुकी स्थिति है । ‘ धनंजय ' नामक वायु सम्पूर्ण शरीरमें व्याप्त रहती है । क्रमेणाभ्यस्यमानोऽयं प्राणायामः प्रमाणवान् ॥ ४० वह मृतक शरीरको भी नहीं छोड़ती । क्रमसे अभ्यासमें लाया हुआ यह प्राणायाम जब उचित प्रमाण या | मात्रासे युक्त हो जाता है, तब वह कर्ताके सारे दोषोंको वर्दहत्यखिलं दोषं कर्तुर्देहं च रक्षति दग्ध कर देता है और उसके शरीरकी रक्षा करता । है ॥ ३ ९ -४०१ / २ ॥ 2224 Shivmahanuron lod Dani Coat 25 1 Back

पृष्ठ 1073

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अ ० ३७ ] वायवीयसंहिता प्राणे तु विजिते सम्यक् तच्चिह्नान्युपलक्षयेत् ॥ ४१

विण्मूत्रश्लेष्मणां तावदल्पभावः प्रजायते ।

बहुभोजनसामर्थ्यं चिरादुच्छ्वासनंतथा ॥ ४२

लघुत्वं शीघ्रगामित्वमुत्साहः स्वरसौष्ठवम् । सर्वरोगक्षयश्चैव बलं तेजः सुरूपता ॥ ४३

धृतिर्मेधा युवत्वं च स्थिरता च प्रसन्नता ।

तपांसि पापक्षयता यज्ञदानव्रतादयः ॥ ४४

प्राणायामस्य तस्यैते कलां नार्हन्ति षोडशीम् ।

इन्द्रियाणि प्रसक्तानि यथास्वं विषयेष्विह ॥ ४५

आहत्य यन्निगृह्णाति स प्रत्याहार उच्यते ।

मन: पूर्वाणीन्द्रियाणि स्वर्गं नरकमेव च ॥ ४६

निगृहीतनिसृष्टानि स्वर्गाय नरकाय च ।

तस्मात्सुखार्थी मतिमान् ज्ञानवैराग्यमास्थितः ॥ ४७

इन्द्रियाश्वान्निगृह्याशु स्वात्मनात्मानमुद्धरेत् ।

धारणा नाम चित्तस्य स्थानबन्धः समासतः ॥ ४८

स्थानं च शिव एवैको नान्यद्दोषत्रयं यतः ।

कालं कं चावधीकृत्य स्थानेऽवस्थापितं मनः ॥ ४ ९

न तु प्रच्यवते लक्ष्याद्धारणा स्यान्न चान्यथा ।

मनसः प्रथमं स्थैर्यं धारणातः प्रजायते ॥ ५०

तस्माद्धीरं मनः कुर्याद्धारणाभ्यासयोगतः ।

ध्यै चिन्तायां स्मृतो धातुः शिवचिन्ता मुहुर्मुहुः ॥ ५१

अव्याक्षिप्तेन मनसा ध्यानं नाम तदुच्यते । ( उत्तरखण्ड ) १०५ ९ प्राणपर विजय प्राप्त हो जाय तो उससे प्रकट होनेवाले चिह्नोंको अच्छी तरह देखे । पहली होती है कि विष्ठा, मूत्र और कफकी बात यह लगती है, अधिक भोजन करनेकी मात्रा घटने और विलम्बसे शक्ति हो जाती है साँस चलती है । शरीरमें हलकापन आता है । शीघ्र चलनेकी शक्ति प्रकट होती है । हृदयमें उत्साह बढ़ता है । स्वरमें मिठास आती है । समस्त रोगोंका नाश हो जाता है । बल, तेज और सौन्दर्यकी । वृद्धि होती है॥४१–४३ ॥ धृति, मेधा, युवापन, स्थिरता और प्रसन्नता आती है । तप, प्रायश्चित्त, यज्ञ, दान और व्रत आदि जितने भी साधन हैं — ये प्राणायामकी सोलहवीं कलाके भी बराबर नहीं हैं ॥। ४४१/२ ॥ अपने - अपने विषयमें आसक्त हुई इन्द्रियोंको वहाँसे हटाकर जो अपने भीतर निगृहीत करता है, उस साधनको ‘ प्रत्याहार ' कहते हैं । मन और इन्द्रियाँ ही मनुष्यको स्वर्ग तथा नरकमें ले जानेवाली हैं । [ यदि उन्हें वशमें रखा जाय तो वे स्वर्गकी प्राप्ति कराती हैं और विषयोंकी ओर खुली छोड़ दिया जाय तो वे नरकमें डालनेवाली होती हैं । ] इसलिये सुखकी इच्छा रखनेवाले बुद्धिमान् पुरुषको चाहिये कि वह ज्ञान - वैराग्यका आश्रय ले इन्द्रियरूपी अश्वोंको शीघ्र ही काबूमें करके स्वयं ही आत्माका उद्धार करे ॥ ४५–४७१ / २ ॥ चित्तको किसी स्थान - विशेषमें बाँधना- किसी ध्येय - विशेषमें स्थिर करना - यही संक्षेपसे ' धारणा ' का स्वरूप है । एकमात्र शिव ही स्थान हैं, दूसरा नहीं; क्योंकि दूसरे स्थानोंमें त्रिविध दोष विद्यमान हैं । किसी नियमित कालतक स्थानस्वरूप शिवमें स्थापित हुआ मन जब लक्ष्यसे च्युत न हो तो धारणाकी सिद्धि समझना चाहिये, अन्यथा नहीं । मन पहले धारणासे ही स्थिर होता है, इसलिये धारणाके अभ्याससे मनको धीर बनाये ॥ ४८-५० [ अब ध्यानकी व्याख्या हैं । ] ध्यानमें ' ध्यै चिन्तायाम् ' यह धातु मानी गयी है । [ इसी धातुसे ल्युट् प्रत्यय करनेपर ‘ ध्यान ' की सिद्धि होती है; ] अतः विक्षेपरहित चित्तसे जो शिवका बारंबार चिन्तन 2224 Shivmahapuran_IInd Part_Section_35_2_Front

पृष्ठ 1074

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श्रीशिवमहापुराण [ अ ० ३७ १०६० यः ॥ ५२ किया जाता है, उसीका नाम ' ध्यान ' है । ध्येयमें स्थित ध्येयावस्थितचित्तस्य सदृशः प्रत्ययश्च प्रत्ययान्तरनिर्मुक्तः प्रवाहो ध्यानमुच्यते सर्वमन्यत्परित्यज्य शिव एव शिवंकरः परो ध्येयोऽधिदेवेशः समाप्ताथर्वणी श्रुतिः तथा शिवा परा ध्येया सर्वभूतगतौ शिवौ ॥

तौ श्रुतौ स्मृतिशास्त्रेभ्यः सर्वगौ सर्वदोदितौ ।

सर्वज्ञौ सततं ध्येयौ नानारूपविभेदतः ॥

विमुक्तिः प्रत्ययः पूर्वः प्रत्ययश्चाणिमादिकम् ।

इत्येतद् द्विविधं ज्ञेयं ध्यानस्यास्य प्रयोजनम् ॥

ध्याता ध्यानं तथा ध्येयं यच्च ध्यानप्रयोजनम् ।

एतच्चतुष्टयं ज्ञात्वा योगं युञ्जीत योगवित् ॥

ज्ञानवैराग्यसम्पन्नः श्रद्दधानः क्षमान्वितः ।

निर्ममश्च सदोत्साही ध्यातेत्थं पुरुषः स्मृतः ॥

जपाच्छ्रान्तः पुनर्ध्यायेद्ध्यानाच्छ्रान्तः पुनर्जपेत् ।

जपध्यानाभियुक्तस्य क्षिप्रं योगः प्रसिद्ध्यति ॥

धारणा द्वादशायामा ध्यानं द्वादशधारणम् । ध्यानद्वादशकं यावत्समाधिरभिधीयते ॥

समाधिर्नाम योगाङ्गमन्तिमं परिकीर्तितम् ।

समाधिना च सर्वत्र प्रज्ञालोकः प्रवर्तते ॥

यदर्थमात्रनिर्भासं स्तिमितोदधिवत्स्थितम् । | हुए चित्तकी जो ध्येयाकार वृत्ति होती है और बीचमें । दूसरी वृत्ति अन्तर नहीं डालती; उस ध्येयाकार | वृत्तिका प्रवाहरूपसे बना रहना ' ध्यान ' कहलाता ॥ ५३ सब वस्तुओंको छोड़कर केवल कल्याणकारी है । | दूसरी | परमदेव देवेश्वर शिवका ही ध्यान करना चाहिये वे । । ही सबके परम ध्येय हैं । यह अथर्ववेदकी श्रुतिका

।

अन्तिम निर्णय है॥५१-५३१ / २ ॥

५४ इसी प्रकार शिवादेवी भी परम ध्येय हैं । ये दोनों । शिवा और शिव सम्पूर्ण भूतोंमें व्याप्त हैं । श्रुति, स्मृति एवं शास्त्रोंसे यह सुना गया है कि शिवा और शिव । ५५ सर्वव्यापक, सर्वदा उदित, सर्वज्ञ एवं नाना रूपोंमें निरन्तर ध्यान करनेयोग्य हैं ॥ ५४-५५ ॥ इस ध्यानके दो प्रयोजन जानने चाहिये । पहला ५६ है मोक्ष और दूसरा प्रयोजन है अणिमा आदि सिद्धियोंकी उपलब्धि । ध्याता, ध्यान, ध्येय और ध्यान - प्रयोजन — इन चारोंको अच्छी तरह जानकर ५७ योगवेत्ता पुरुष योगका अभ्यास करे । जो ज्ञान और वैराग्यसे सम्पन्न, श्रद्धालु, क्षमाशील, ममतारहित तथा सदा उत्साह रखनेवाला है, ऐसा ही पुरुष ध्याता कहा ५८ गया है अर्थात् वही ध्यान करनेमें सफल हो सकता है॥५६-५८ ॥ साधकको चाहिये कि वह जपसे थकनेपर फिर ५ ९ ध्यान करे और ध्यानसे थक जानेपर पुनः जप करे । इस तरह जप और ध्यानमें लगे हुए पुरुषका योग जल्दी सिद्ध होता है । बारह प्राणायामोंकी एक धारणा ६० होती है, बारह धारणाओंका ध्यान होता है और बारह ध्यानकी एक समाधि कही गयी है । समाधिको ६१ योगका अन्तिम अंग कहा गया है । समाधिसे सर्वत्र बुद्धिका प्रकाश फैलता है ॥५ ९ –६१ ॥ जिस ध्यानमें केवल ध्येय ही अर्थरूपसे भासता स्वरूपशून्यवद्भानं समाधिरभिधीयते ॥ ६२ है, ध्याता निश्चल महासागरके समान स्थिरभावसे स्थित रहता है और ध्यानस्वरूपसे शून्य - सा हो जाता 302 है, उसे ' समाधि ' कहते हैं । जो योगी ध्येयमें चित्तको ध्येये मनः समावेश्य लगाकर सुस्थिरभावसे उसे देखता है और बुझी हुई निर्वाणानलवद्योगी पश्येदपि च सुस्थिरम् । | आगके समान शान्त रहता है वह ' समाधिस्थ ' समाधिस्थः प्रगीयते ॥ ६३ । कहलाता है ॥ ६२-६३ ॥, 2224 Shivmahapuran_IInd Part_Section_35_2_Back

पृष्ठ 1075

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अ ० ३८ ] वायवीयसंहिता न शृणोति न चाघ्राति न जल्पति न पश्यति

न च स्पर्शं विजानाति ।

न संकल्पयते मनः ॥

न वाभिमन्यते किञ्चिद् बध्यते न च काष्ठवत् । एवं शिवे विलीनात्मा समाधिस्थ इहोच्यते ॥ यथा दीपो निवातस्थः स्पन्दते न कदाचन । तथा समाधिनिष्ठोऽपि तस्मान्न विचलेत्सुधीः ॥

एवमभ्यसतश्चारं योगिनो योगमुत्तमम् ।

तदन्तराया नश्यन्ति विज्ञाः सर्वे शनैः शनैः ॥

इति ( उत्तरखण्ड ) १०६१ ६४ वह न सुनता है, न सूँघता है, न बोलता है, न देखता है, न स्पर्शका अनुभव संकल्प - विकल्प करता करता है, न मनसे है, न उसमें अभिमानकी वृत्तिका उदय होता है और न वह बुद्धिके । कुछ समझता है । केवल काष्ठकी द्वारा ही ६५ है । इस तरह भाँति स्थित रहता समाधिस्थ कहा शिवमें लीनचित्त हुए योगीको यहाँ जाता है ॥ ६४-६५ ॥ जैसे वायुरहित स्थानमें रखा हुआ दीपक कभी ६६ हिलता नहीं है - निःस्पन्द बना रहता है, उसी तरह समाधिनिष्ठ शुद्ध चित्त योगी भी उस समाधिसे कभी विचलित नहीं होता - सुस्थिरभावसे स्थिर इस प्रकार उत्तम योगका अभ्यास रहता है । करनेवाले योगीके सारे अन्तराय शीघ्र नष्ट हो जाते हैं और सम्पूर्ण विघ्न ६७ । भी धीरे - धीरे दूर हो जाते हैं ॥ ६६-६७ ॥ श्रीशिवमहापुराणे सप्तम्यां वायवीयसंहितायां उत्तरखण्डे योगगतिवर्णनं वायुनैमिषेयर्षिसंवादे ॥ इस प्रकार श्रीशिवमहापुराणके नाम सप्तत्रिंशोऽध्यायः ॥ ३७ ॥

ऋषियोंके संवादमें अन्तर्गत सातवीं वायवीयसंहिताके उत्तरखण्डमें वायु और नैमिषीय योगगतिवर्णन नामक सैंतीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ३७ ॥

अथाष्टत्रिंशोऽध्यायः योगमार्गके विघ्न, सिद्धि - सूचक उपसर्ग तथा पृथ्वीसे लेकर बुद्धितत्त्वपर्यन्त ऐश्वर्यगुणों का वर्णन, उपमन्युरुवाच

आलस्यं व्याधयस्तीव्राः प्रमादः स्थानसंशयः ।

अनवस्थितचित्तत्वमश्रद्धा भ्रान्तिदर्शनम् ॥

दुःखानि दौर्मनस्यं च विषयेषु च लोलता ।

दशैते युञ्जतां पुंसामन्तरायाः प्रकीर्तिताः ॥

आलस्यमलसत्वं तु योगिनां देहचेतसोः ।

धातुवैषम्यजा दोषा व्याधयः कर्मदोषजाः ॥

शिव - शिवाके ध्यानकी महिमा उपमन्यु कहते हैं— श्रीकृष्ण! आलस्य, तीक्ष्ण व्याधियाँ, प्रमाद, स्थान - संशय, अनवस्थितचित्तता, १ अश्रद्धा, भ्रान्ति - दर्शन, दुःख, दौर्मनस्य और विषय-लोलुपता — ये दस योगसाधनमें लगे हुए पुरुषोंके लिये २ योगमार्गके विघ्न कहे गये हैं * ॥१-२ ॥ योगियोंके शरीर और चित्तमें जो अलसताका भाव आता है, उसीको यहाँ ' आलस्य ' कहा गया है । वात, पित्त और कफ — इन धातुओंकी विषमतासे जो ३ दोष उत्पन्न होते हैं, उन्हींको ' व्याधि ' कहते हैं । * योगदर्शन, समाधिपादके ३० वें सूत्रमें नौ प्रकारके चित्तविक्षेपोंको योगका अन्तराय बताया गया है और ३१ वें सूत्रमें पाँच ' विक्षेपसहभू ' संज्ञक विघ्न अथवा प्रतिबन्धक कहे गये हैं । किंतु यहाँ शिवपुराणमें दस प्रकारके अन्तराय बताये गये हैं । इनमें योगदर्शनकथित ‘ अलब्धभूमिकत्व ' को छोड़ दिया गया है और ' विक्षेपसहभू ' में परिगणित दुःख और दौर्मनस्यको सम्मिलित कर लिया गया है । योगसूत्रमें ' स्त्यान और संशय - ये दो पृथक् - पृथक् अन्तराय ' हैं और यहाँ ' स्थान- संशय ' नामसे एक ही अन्तराय माना गया है; साथ ही इस पुराणमें ' अश्रद्धा ' को भी एक अन्तरायके रूपमें गिना गया है ।

पृष्ठ 1076

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( श्रीशिवमहापुराण [ अ ० ३८ १०६२ साधना नाम भावना । । कर्मदोषसे इन व्याधियोंकी उत्पत्ति होती है । असावधानीके प्रमादो नाम योगस्य कारण योगके साधनोंका न हो पाना ' प्रमाद ' है । ' इदं वेत्युभयाक्रान्तं विज्ञानं स्थानसंशयः ॥ ४ | है या नहीं है ' इस प्रकार उभयकोटिसे आक्रान्त यह । । ज्ञानका नाम ' स्थान - संशय ' है । मनका कहीं स्थिर हुए न अप्रतिष्ठा हि मनसस्त्वनवस्थितिरुच्यते | होना ही अनवस्थितचित्तता ( चित्तकी अस्थिरता ) है अश्रद्धा भावरहिता वृत्तिर्वै योगवर्त्मनि ॥ ५ योगमार्गमें भावरहित ( अनुरागशून्य ) जो मनकी वृत्ति ।

विपर्यस्ता मतिर्या सा भ्रान्तिरित्यभिधीयते ।

दुःखमज्ञानजं पुंसां चित्तस्याध्यात्मिकं विदुः ॥ ६

आधिभौतिकमङ्गोत्थं यच्च दुःखं पुरा कृतैः ।

आधिदैविकमाख्यातमशन्यस्त्रविषादिकम् ॥७

इच्छाविघातजं क्षोभं दौर्मनस्यं प्रचक्षते ।

विषयेषु विचित्रेषु विभ्रमस्तत्र लोलता ॥ ८

शान्तेष्वेतेषु विघ्नेषु योगासक्तस्य योगिनः ।

उपसर्गाः प्रवर्तन्ते दिव्यास्ते सिद्धिसूचकाः ॥ ९

प्रतिभा श्रवणं वार्ता दर्शनास्वादवेदनाः ।

उपसर्गाः षडित्येते व्यये योगस्य सिद्धयः ॥ १०

सूक्ष्मे व्यवहितेऽतीते विप्रकृष्टे त्वनागते ।

प्रतिभा कथ्यते योऽर्थे प्रतिभासो यथातथम् ॥ ११

श्रवणं सर्वशब्दानां श्रवणे चाप्रयत्नतः ।

वार्त्ता वार्त्तासु विज्ञानं सर्वेषामेव देहिनाम् ॥ १२

दर्शनं नाम दिव्यानां दर्शनं चाप्रयत्नतः ।

तथास्वादश्च दिव्येषु रसेष्वास्वाद उच्यते ॥ १३

स्पर्शनाधिगमस्तद्वद् वेदना नाम विश्रुता । । गन्धादीनां च दिव्यानामाब्रह्मभुवनाधिपाः । || १४ | है, उसीको ‘ अश्रद्धा ' कहा गया है ॥ ३–५ ॥ विपरीतभावनासे युक्त बुद्धिको ‘ भ्रान्ति ' कहते हैं । [ ' दुःख ' कहते हैं कष्टको, उसके तीन भेट हैं- आध्यात्मिक, आधिभौतिक और आधिदैविक । ] मनुष्योंके चित्तका जो अज्ञानजनित दुःख है, उसे आध्यात्मिक दुःख समझना चाहिये । पूर्वकृत कर्मोंके परिणामसे शरीरमें जो रोग आदि उत्पन्न होते हैं, उन्हें आधिभौतिक दुःख कहा गया है । विद्युत्पात, अस्त्र-शस्त्र और विष आदिसे जो कष्ट प्राप्त होता है, उसे आधिदैविक दुःख कहते हैं । इच्छापर आघात पहुँचनेसे मनमें जो क्षोभ होता है, उसीका नाम है ' दौर्मनस्य ' । विचित्र विषयोंमें जो सुखका भ्रम है, वही ' विषयलोलुपता ' है॥६–८ ॥ योगपरायण योगीके इन विघ्नोंके शान्त हो जानेपर जो ' दिव्य उपसर्ग ' ( विघ्न ) प्राप्त होते हैं, वे सिद्धिके सूचक हैं । प्रतिभा, श्रवण, वार्ता, दर्शन, आस्वाद और वेदना — ये छः प्रकारकी सिद्धियाँ ही ' उपसर्ग ' कहलाती हैं, जो योगशक्तिके अपव्ययमें कारण होती हैं ॥ ९ -१० ॥ जो पदार्थ अत्यन्त सूक्ष्म हो, किसीकी ओटमें हो, भूतकालमें रहा हो, बहुत दूर हो अथवा भविष्यमें होनेवाला हो, उसका ठीक - ठीक प्रतिभास ( ज्ञान ) हो जाना ‘ प्रतिभा ' कहलाता है । सुननेका प्रयत्न न करनेपर भी सम्पूर्ण शब्दोंका सुनायी देना ‘ श्रवण ’ कहा गया है । समस्त देहधारियोंकी बातोंको समझ लेना ‘ वार्ता ' है । दिव्य पदार्थोंका बिना किसी प्रयत्नके दिखायी देना ‘ दर्शन ' कहा गया है, दिव्य रसोंका स्वाद प्राप्त होना ' आस्वाद ' कहलाता है, अन्तःकरणके द्वारा दिव्य स्पर्शोका तथा ब्रह्मलोकतकके गन्धादि दिव्य भोगोंका अनुभव ' वेदना ' नामसे विख्यात है ॥ ११–१४ ॥

पृष्ठ 1077

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अ ० ३८ ] वायवीयसंहिता संतिष्ठन्ते च रत्नानि प्रयच्छन्ति बहूनि स्वच्छन्दमधुरा वाणी विविधा स्यात्प्रवर्तते च । रसायनानि सर्वाणि सिध्यन्ति प्रणिपत्यैनं योगसिद्ध्यैकदेशेऽपि दृष्टमेतन्मया यद्वत् कृशता स्थूलता बाल्यं नानाजातिस्वरूपं च ॥ १५ दिव्याश्चौषधयस्तथा

।

दिशंति सुरयोषितः ॥ १६

दृष्टे मोक्षे भवेन्मतिः ।

तद्वन्मोक्षो भवेदिति ॥१७

वार्द्धक्यं चैव यौवनम् ।

चतुर्णां देहधारणम् ॥ १८

पार्थिवांशं विना नित्यं सुरभिर्गन्धसंग्रहः ।

एवमष्टगुणं प्राहुः पैशाचं पार्थिवं पदम् ॥१ ९

जले निवसनं चैव भूम्यामेवं विनिर्गमः ।

इच्छेच्छक्तः स्वयं पातुं समुद्रमपि नातुरः ॥ २०

यत्रेच्छति जगत्यस्मिंस्तत्रैव जलदर्शनम् ।

विना कुम्भादिकं पाणौ जलसञ्चयधारणम् ॥ २१

यद्वस्तु विरसञ्चापि भोक्तुमिच्छति तत्क्षणात् ।

रसादिकं भवेच्चान्यत् त्रयाणां देहधारणम् ॥ २२

निर्व्रणत्वं शरीरस्य पार्थिवैश्च समन्वितम् ।

तदिदं षोडशगुणमाप्यमैश्वर्यमद्भुतम् ॥ २३

शरीरादग्निनिर्माणं तत्तापभयवर्जनम् ।

शक्तिर्जगदिदं दग्धुं यदीच्छेदप्रयत्नतः ॥ २४

स्थापनं वानलस्याऽप्सु पाणौ पावकधारणम् ।

दग्धे सर्गे यथापूर्वं मुखे चान्नादिपाचनम् ।

द्वाभ्यां देहविनिर्माणमाप्यैश्वर्यसमन्वितम् ॥ २५

एतच्चतुर्विंशतिधा तैजसं परिचक्षते । ( उत्तरखण्ड ) १०६३ सिद्ध योगीके पास स्वयं ही रत्न उपस्थित जाते हैं और बहुत - सी वस्तुएँ प्रदान हो इच्छानुसार नाना करते हैं । मुखसे सब प्रकारके प्रकारकी मधुर वाणी निकलती है । रसायन और दिव्य ओषधियाँ सिद्ध हो । जाती हैं । देवांगनाएँ इस योगीको प्रणाम [ मनोवांछित वस्तुएँ ] देती हैं । यह मैंने जैसे करके अनुभव किया है, तदनुसार योगसिद्धिके देखा या भी साक्षात्कार हो जाय तो मोक्षमें मन लग एकदेशका अर्थात् मोक्ष भी हो सकता जाता है है॥१५–१७ ॥ कृशता, स्थूलता, बाल्यावस्था, वृद्धावस्था, युवावस्था, नाना जातिका स्वरूप; पृथ्वी, जल, अग्नि और वायु - इन चार तत्त्वोंके शरीरको धारण करना, नित्य अपार्थिव एवं मनोहर गन्धको ग्रहण करना — ये पार्थिव ऐश्वर्यके आठ गुण बताये गये हैं ॥ १८-१९ ॥ जलमें निवास करना, पृथ्वीपर ही जलका निकल आना, इच्छा करते ही बिना किसी आतुरताके स्वयं समुद्रको भी पी जानेमें समर्थ होना, इस संसारमें जहाँ चाहे वहीं जलका दर्शन होना, घड़ा आदिके बिना हाथमें ही जलराशिको धारण करना, जिस विरस वस्तुको भी खानेकी इच्छा हो, उसका तत्काल सरस हो जाना, जल, तेज और वायु – इन तीन तत्त्वोंके शरीरको धारण करना तथा देहका फोड़े, फुंसी और घाव आदिसे रहित होना - पार्थिव ऐश्वर्यके आठ गुणोंको मिलाकर ये सोलह जलीय ऐश्वर्यके अद्भुत | गुण हैं ॥ २०–२३ ॥ शरीरसे अग्निको प्रकट करना, अग्निके तापसे जलनेका भय दूर हो जाना, यदि इच्छा हो तो बिना किसी प्रयत्नके इस जगत्को जलाकर भस्म कर देनेकी शक्तिका होना, पानीके ऊपर अग्निको स्थापित कर देना, हाथमें आग धारण करना, सृष्टिको जलाकर फिर उसे ज्यों - का - त्यों कर देनेकी क्षमताका होना, मुखमें ही अन्न आदिको पचा लेना तथा तेज और वायु — दो ही तत्त्वोंसे शरीरको रच लेना - ये आठ गुण जलीय ऐश्वर्यके उपर्युक्त सोलह गुणोंके साथ चौबीस होते हैं । ये चौबीस तैजस ऐश्वर्यके गुण कहे गये हैं ॥ २४-२५१ / २ ॥

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श्रीशिवमहापुराण [ अ ० ३८ १०६४ मनके समान वेगशाली होना, प्राणियोंके मनोजवत्वं भूतानां क्षणादन्तः प्रवेशनम् ॥ २६ | भीतर क्षणभरमें प्रवेश कर जाना, बिना प्रयत्नके | ही पर्वत आदिके महान् भारको उठा लेना, भारी पर्वतादिमहाभारधारणं चाप्रयत्नतः । हो जाना, हलका होना, हाथमें वायुको गुरुत्वं च लघुत्वं च पाणावनिलधारणम् ॥ २७ | लेना अंगुलिके अग्रभागकी चोटसे भूमिको पकड़ , भी । कम्पित कर देना, एकमात्र वायुतत्त्वसे ही शरीरका । अंगुल्यग्रनिपाताद्यैर्भूमेरपि च कम्पनम् । | निर्माण कर लेना - ये आठ गुण तैजस ऐश्वर्यके । एकेन देहनिष्पत्तिर्युक्तं भोगैश्च तेजसैः ॥ २८ | चौबीस गुणोंके साथ बत्तीस हो जाते हैं । विद्वानोंने

द्वात्रिंशद्गुणमैश्वर्यं मारुतं कवयो विदुः ।

छायाहीनविनिष्पत्तिरिन्द्रियाणामदर्शनम् ॥२ ९

खेचरत्वं यथाकाममिन्द्रियार्थसमन्वयः ।

आकाशलंघनं चैव स्वदेहे तन्निवेशनम् ॥ ३०

आकाशपिण्डीकरणमशरीरत्वमेव च ।

अनिलैश्वर्यसंयुक्तं चत्वारिंशद्गुणं महत् ॥ ३१

ऐन्द्रमैश्वर्यमाख्यातमाम्बरं तत्प्रचक्षते ।

यथाकामोपलब्धिश्च यथाकामविनिर्गमः ॥ ३२

सर्वस्याभिभवश्चैव सर्वगुह्यार्थदर्शनम् ।

कर्मानुरूपनिर्माणं वशित्वं प्रियदर्शनम् ॥ ३३

संसारदर्शनं चैव भोगैरैन्द्रैः समन्वितम् ।

एतच्चान्द्रमसैश्वर्यं मानसं गुणतोऽधिकम् ॥ ३४

छेदनं ताडनं चैव बंधनं मोचनं तथा ।

ग्रहणं सर्वभूतानां संसारवशवर्तिनाम् ॥ ३५

| प्रसादश्चापि सर्वेषां मृत्युकालजयस्तथा

आभिमानिकमैश्वर्यं । ।

प्राजापत्यं प्रचक्षते ॥ ३६ ।

। | वायुसम्बन्धी ऐश्वर्यके ये ही बत्तीस गुण स्वीकार किये हैं ॥ २६-२८१ / २ ॥ शरीरकी छायाका न होना, इन्द्रियोंका दिखायी न देना, आकाशमें इच्छानुसार विचरण करना, इन्द्रियोंके सम्पूर्ण विषयोंका समन्वय होना — आकाशको लाँघना, अपने शरीरमें उसका निवेश करना, आकाशको पिण्डकी भाँति ठोस बना देना और निराकार होना— ये आठ गुण अग्निके बत्तीस गुणोंसे मिलकर चालीस होते हैं । ये चालीस ही वायुसम्बन्धी ऐश्वर्यके गुण हैं । यही सम्पूर्ण इन्द्रियोंका ऐश्वर्य है, इसीको ' ऐन्द्र ' एवं ‘ आम्बर ' ( आकाशसम्बन्धी ) ऐश्वर्य भी कहते हैं ॥ २ ९ –३११ / २ ॥ इच्छानुसार सभी वस्तुओंकी उपलब्धि, जहाँ चाहे वहाँ निकल जाना, सबको अभिभूत कर लेना, सम्पूर्ण गुह्य अर्थका दर्शन होना, कर्मके अनुरूप निर्माण करना, सबको वशमें कर लेना, सदा प्रिय वस्तुका ही दर्शन होना और एक ही स्थानसे सम्पूर्ण संसारका दिखायी देना- ये आठ गुण पूर्वोक्त इन्द्रियसम्बन्धी ऐश्वर्य - गुणोंसे मिलकर अड़तालीस होते हैं । चान्द्रमस ऐश्वर्य इन अड़तालीस गुणोंसे युक्त कहा गया है । यह पहलेके ऐश्वर्योंसे अधिक गुणवाला है । इसे ‘ मानस ऐश्वर्य ' भी कहते हैं॥३२–३४ ॥ छेदना, पीटना, बाँधना, खोलना, संसारके वशमें रहनेवाले समस्त प्राणियोंको ग्रहण करना, सबको प्रसन्न रखना, पाना, मृत्युको जीतना तथा कालपर विजय पाना - ये सब अहंकारसम्बन्धी ऐश्वर्य अन्तर्गत हैं । आहंकारिक ऐश्वर्यको ही ' प्राजापत्य ' भी कहते हैं || ३५-३६ ॥

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अ ० ३८ ] वायवीयसंहिता एतच्चान्द्रमसैर्भोगैः षट्पञ्चाशद्गुणं महत् सर्गः संकल्पमात्रेण त्राणं संहरणं तथा स्वाधिकारश्च सर्वेषां भूतचित्तप्रवर्तनम् । असादृश्यं च सर्वस्य निर्माणं जगतः पृथक् शुभाशुभस्य करणं प्राजापत्यैश्च संयुतम् । चतुःषष्टिगुणं ब्राह्ममैश्वर्यं च प्रचक्षते बौद्धादस्मात्परं गौणमैश्वर्यं प्राकृतं विदुः ।

वैष्णवं तत्समाख्यातं तस्यैव भुवनस्थितिः ।

ब्रह्मणा तत्पदं सर्वं वक्तुमन्यैर्न शक्यते ॥

तत्पौरुषं च गौणं च गाणेशं पदमैश्वरम् ।

विष्णुना तत्पदं किञ्चिज्ज्ञातुमन्यैर्न शक्यते ॥

विज्ञानसिद्धयश्चैव सर्वा एवौपसर्गिकाः ।

निरोद्धव्याः प्रयत्नेन वैराग्येण परेण तु ॥

प्रतिभासेष्वशुद्धेषु गुणेष्वासक्तचेतसः ।

न सिध्येत्परमैश्वर्यमभयं सार्वकामिकम् ॥

तस्माद्गुणांश्च भोगांश्च देवासुरमहीभृताम् ।

तृणवद्यस्त्यजेत्तस्य योगसिद्धिः परा भवेत् ॥

अथवानुग्रहेच्छायां जगतो विचरेन्मुनिः ।

यथाकामं गुणान्भोगान्भुक्त्वा मुक्तिं प्रयास्यति ॥

अथ प्रयोगं योगस्य वक्ष्ये शृणु समाहितः ।

शुभे काले शुभे देशे शिवक्षेत्रादिके पुनः ।

विजने जन्तुरहिते नि: शब्दे बाधवर्जिते ॥

( उत्तरखण्ड ) १०६५ । चान्द्रमस ऐश्वर्यके गुणोंके साथ इसके आठ ॥ ३७ गुण मिलकर छप्पन होते हैं । महान् आभिमानिक ऐश्वर्यके ये ही छप्पन गुण हैं । संकल्पमात्रसे सृष्टि-रचना करना, पालन करना, संहार करना, सबके ऊपर अपना अधिकार स्थापित करना, प्राणियोंके चित्तको ॥ ३८ प्रेरित करना, सबसे अनुपम होना, इस जगत्से नये संसारकी रचना कर लेना तथा शुभको पृथक् और अशुभको शुभ कर देना - यह ' बौद्ध ऐश्वर्य अशुभ ' है । ॥ ३ ९ प्राजापत्य गुण होते ऐश्वर्यके गुणोंको मिलाकर इसके चौंसठ हैं । इस बौद्ध ऐश्वर्यको ही ‘ ब्राह्म ऐश्वर्य ' भी कहते हैं ॥ ३७–३९ ॥ इससे उत्कृष्ट है गौण ऐश्वर्य, जिसे प्राकृत भी कहते हैं । उसीका नाम ' वैष्णव ऐश्वर्य ' है । तीनों ४० लोकोंका पालन उसीके अन्तर्गत है । उस सम्पूर्ण वैष्णव - पदको न तो ब्रह्मा कह सकते हैं और न दूसरे ही उसका पूर्णतया वर्णन कर सकते हैं । उसीको पौरुषपद भी कहते हैं । गौण और पौरुषपदसे उत्कृष्ट ४१ गणपतिपद है । उसीको ईश्वरपद भी कहते हैं । उस पदका किंचित् ज्ञान श्रीविष्णुको है । दूसरे लोग उसे नहीं जान सकते ॥ ४०-४१ ॥ ये सारी विज्ञान - सिद्धियाँ औपसर्गिक हैं । इन्हें ४२ परम वैराग्यद्वारा प्रयत्नपूर्वक रोकना चाहिये । इन अशुद्ध प्रातिभासिक गुणोंमें जिसका चित्त आसक्त है, उसे सम्पूर्ण कामनाओंको पूर्ण करनेवाला निर्भय परम ४३ ऐश्वर्य नहीं सिद्ध होता ॥ ४२-४३ ॥ इसलिये देवता, असुर और राजाओंके गुणों तथा ४४ भोगोंको जो तृणके समान त्याग देता है, उसे ही उत्कृष्ट योगसिद्धि प्राप्त होती है । अथवा यदि जगत्पर अनुग्रह करनेकी इच्छा हो तो वह योगसिद्ध मुनि इच्छानुसार विचरे । इस जीवनमें गुणों और भोगोंका उपभोग करके अन्तमें उसे मोक्षकी प्राप्ति ४५ होगी ॥ ४४-४५ ॥ अब मैं योगके प्रयोगका वर्णन करूँगा । एकाग्रचित्त होकर सुनो । शुभ काल हो, शुभ देश हो, भगवान् शिवका क्षेत्र आदि हो, एकान्त स्थान हो, जीव - जन्तु न रहते हों, कोलाहल न होता हो और किसी बाधाकी ४६ सम्भावना न हो— ऐसे स्थानमें लिपी - पुती सुन्दर

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१०६६ सुप्रलिप्ते स्थले सौम्ये गन्धधूपादिवासिते मुक्तपुष्पसमाकीर्णे वितानादिविचित्रिते कुशपुष्पसमित्तोयफलमूलसमन्विते नाग्न्यभ्याशे जलाभ्याशे शुष्कपर्णचयेऽपि वा न दंशमशकाकीर्णे सर्पश्वापदसंकुले । न च दुष्टमृगाकीर्णे न भये दुर्जनावृते

श्मशाने चैत्यवल्मीके जीर्णागारे चतुष्पथे ।

नदीनदसमुद्राणां तीरे रथ्यान्तरेऽपि वा ॥

न जीर्णोद्यानगोष्ठादौ नानिष्टे न च निंदिते ।

नाजीर्णाम्लरसोद्गारे न च विण्मूत्रदूषिते ॥

न च्छ्र्द्यामातिसारे वा नातिभुक्तौ श्रमान्विते ।

न चातिचिन्ताकुलितो न चातिक्षुत्पिपासितः ॥

नापि स्वगुरुकर्मादौ प्रसक्तो योगमाचरेत् ।

युक्ताहारविहारश्च युक्तचेष्टश्च कर्मसु ॥

युक्तनिद्राप्रबोधश्च सर्वायासविवर्जितः । आसनं मृदुलं रम्यं विपुलं सुसमं [ अ ० ३८ । । भूमिको गन्ध और धूप आदिसे सुवासित करके वहाँ ॥ ४७ फूल बिखेर दे, चंदोवा आदि तानकर उसे विचित्र | रीतिसे सजा दे तथा वहा कुश, पुष्प, समिधा, जल । फल और मूलकी सुविधा हो । [ फिर वहाँ योगका , अभ्यास करे । ] अग्निके निकट, जलके समीप ॥ ४८ और सूखे पत्तोंके ढेरपर योगाभ्यास नहीं करना

।

चाहिये ॥ ४६–४८ ॥

जहाँ डाँस और मच्छर भरे हों, साँप और हिंसक ॥ ४ ९ जन्तुओंकी अधिकता हो, दुष्ट पशु निवास करते हों | भयकी सम्भावना हो तथा जो दुष्टोंसे घिरा हुआ, हो - ऐसे स्थानमें भी योगाभ्यास नहीं करना चाहिये । ५० श्मशानमें, चैत्यवृक्षके नीचे, बाँबीके निकट, जीर्ण-शीर्ण घरमें, चौराहेपर, नदी - नद और समुद्रके तटपर, गली या सड़कके बीचमें, उजड़े हुए उद्यानमें, गोष्ठ आदिमें अनिष्टकारी और निन्दित स्थानमें भी योगाभ्यास न करे ॥ ४ ९ -५०१ / २ ॥ ५१ जब शरीरमें अजीर्णका कष्ट हो, खट्टी डकार आती हो, विष्ठा और मूत्रसे शरीर दूषित हो, सर्दी हुई हो या अतिसार रोगका प्रकोप हो, अधिक भोजन कर लिया गया हो या अधिक परिश्रमके ५२ कारण थकावट हुई हो, जब मनुष्य अत्यन्त चिन्तासे व्याकुल हो, अधिक भूख - प्यास सता रही हो तथा जब वह अपने गुरुजनोंके कार्य आदिमें लगा हुआ हो, उस अवस्थामें भी उसे योगाभ्यास नहीं करना चाहिये ॥ ५१-५२१ / २ ॥ ५३ जिसके आहार - विहार उचित एवं परिमित हों, जो कर्मोंमें यथायोग्य समुचित चेष्टा करता हो तथा जो उचित समयसे सोता और जागता हो एवं सर्वथा आयासरहित हो, उसीको योगाभ्यासमें तत्पर होना शुचि ॥ ५४ चाहिये । आसन मुलायम, सुन्दर, विस्तृत, सब ओरसे बराबर और पवित्र होना चाहिये । पद्मासन और पद्मकस्वस्तिकादीनामभ्यसेदासनेषु स्वस्तिकासन आदि जो यौगिक आसन हैं, उनपर भी च । अभिवन्द्य स्वगुर्वन्तानभिवाद्याननुक्रमात् अभ्यास करना चाहिये । अपने आचार्यपर्यन्त गुरुजनकी ॥ ५५ परम्पराको क्रमशः प्रणाम करके अपनी गर्दन, मस्तक ऋजुग्रीवशिरोवक्षा नातिष्ठेच्छ्लिष्टलोचनः | और छातीको सीधी रखे । ओठ और नेत्र अधिक स किञ्चिदुन्नामितशिरा दन्तैर्दन्तान्न । | हुए न हों । सिर कुछ - कुछ ऊँचा हो । दाँतोंसे दाँतोंका

संस्पृशेत् ॥ ५६ । स्पर्श न करे ॥ ५३-५६ ॥