शिव महापुराण - २ — पृष्ठ 151–160
शिव महापुराण - २ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 151–160
पृष्ठ 151
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
अ ० ३१ ] शतरुद्रसंहिता १३ ९
अथ प्रभाते सा राज्ञी ददर्श विमलं सरः ।
अतीता दूरमध्वानं दयया शङ्करस्य हि ॥
तत्रागत्य प्रिया राज्ञः संतप्ता सुकुमारिणी ।
निवासार्थं सरस्तीरे छायावृक्षमुपाश्रयत् ॥
तत्र दैववशाद्राज्ञी मुहूर्त्ते सद्गुणान्विते ।
असूत तनयं दिव्यं सर्वलक्षणलक्षितम् ॥
अथ तज्जननी दैवात्तृषिताति नृपाङ्गना ।
सरोऽवतीर्णा पानार्थं ग्रस्ता ग्राहेण पाथसि ॥
स सुतो जातमात्रस्तु क्षुत्पिपासार्दितो भृशम् ।
रुरोद च सरस्तीरे विनष्टपितृमातृकः ॥
तस्मिन्वने क्रन्दमाने जातमात्रे सुते मुने ।
कृपान्वितो महेशोऽभूदन्तर्यामी स रक्षकः ॥
प्रेरिता मनसा काचिदीशेन त्रासहारिणा ।
अकस्मादागता तत्र भ्रमन्ती भैक्ष्यजीविनी ॥
सा त्वेकहायनं बालं वहन्ती विधवा निजम् ।
अनाथमेकं क्रन्दन्तं शिशुं तत्र ददर्श ह ॥
सा दृष्ट्वा तत्र तं बालं वने निर्मनुजे मुने ।
विस्मिताति द्विजस्त्री सा चिचिन्त हृदये बहु ॥
अहो सुमहदाश्चर्यमिदं दृष्टं मयाधुना ।
असंभाव्यमकथ्यं च सर्वथा मनसा गिरा ॥
अच्छिन्ननाभिनालोऽयं रसायां केवलं शिशुः ।
शेते मातृविहीनश्च क्रन्दंस्तेजस्विनां वरः ॥
अस्य पित्रादयः केऽपि न सन्तीह सहायिनः ।
कारणं किं बभूवाथ ह्यहो दैवबलं महत् ॥
न जाने कस्य पुत्रोऽयमस्य ज्ञातात्र कोऽपि न ।
यतः पृच्छाम्यस्य जन्म जाता च करुणा मयि ॥
इस प्रकार शिवजीकी दयासे [ सुरक्षित हुई ] वह ९ रानी नगरसे बहुत दूर जा पहुँची और उसने प्रातःकालके समय [ वहाँपर ] एक स्वच्छ सरोवरको देखा ॥ ९ ॥
वहाँ आकर राजाकी उस सुकुमार पत्नीने १० शोकसे व्याकुल हो विश्रामके लिये उस सरोवरके तटपर एक छायादार वृक्षका आश्रय लिया । वहाँपर ११ रानीने दैववश शुभ ग्रहोंसे युक्त मुहूर्तमें सर्वलक्षणसम्पन्न दिव्य पुत्रको जन्म दिया ॥ १०-११ ॥ उसी समय भाग्यवश प्याससे व्याकुल हुई उस १२ सद्योजात शिशुकी माता वह रानी ज्यों ही जल लेनेके लिये सरोवरमें उतरी कि जलमें स्थित ग्राहने उसे पकड़ लिया । भूख एवं प्याससे अत्यधिक व्याकुल १३ तथा पिता एवं मातासे रहित वह नवजात बालक सरोवरके किनारे रोने लगा ॥ १२-१३ ॥ हे मुने! [ उत्पन्न होते ही भूख - प्याससे व्याकुल १४ हो ] रोते हुए उस नवजात शिशुपर सर्वान्तर्यामी तथा सर्वरक्षक वे महेश्वर दयार्द्र हो उठे ॥ १४ ॥
उसी समय कष्ट दूर करनेवाले भगवान्के १५ द्वारा मनसे प्रेरित की गयी एक भिखारिन वहाँ अकस्मात् आ पहुँची । अपने एक वर्षके पुत्रको लिये हुए उस विधवाने उस रोते हुए अनाथ बच्चेको वहाँ १६ देखा ॥ १५-१६ ॥ हे मुने! उस बालकको निर्जन वनमें देखकर वह १७ ब्राह्मणी अत्यन्त आश्चर्यचकित हो अपने हृदयमें बहुत विचार करने लगी ॥१७ ॥
अहो! मैंने इस समय बहुत बड़ा आश्चर्य १८ देखा, जो असम्भव एवं मन तथा वाणीसे सर्वथा अकथनीय है । तेजस्वियोंमें श्रेष्ठ इस बालकका अभीतक नालच्छेदन नहीं हुआ है और यह मातृविहीन १ ९ हो रोता हुआ अकेला ही पृथिवीपर लेटा हुआ है ॥ १८-१९ ॥ यहाँ तो इसकी सहायता करनेवाले इसके माता-२० पिता आदि कोई नहीं हैं, इसमें क्या कारण हो सकता है, अहो, दैवबल बड़ा प्रबल है!॥ २० ॥
यह न जाने किसका पुत्र है, इसे जाननेवाला भी यहाँ कोई नहीं है, जिससे इसके जन्मके विषयमें मैं २१ । पूछूं । मुझे तो इसपर बहुत ही दया आ रही है ॥ २१ ॥
पृष्ठ 152
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
१४० इच्छाम्येनं पोषितुं हि बालमौरसपुत्रवत् संस्प्रष्टुं नोत्सहेऽज्ञात्वा कुलजन्मादि चास्य वै नन्दीश्वर उवाच इति संचिन्त्यमानायां तस्यां विप्रवरस्त्रियाम् कृपां चकार महतीं शंकरो भक्तवत्सलः दध्रे भिक्षुस्वरूपं हि महालीलो महेश्वरः सर्वथा भक्तसुखदो निरुपाधिः स्वयं सदा तत्राजगाम सहसा स भिक्षुः परमेश्वरः । यत्रास्ति संदेहवती द्विजस्त्री ज्ञातुमिच्छती
भिक्षुवर्यस्वरूपोऽसावविज्ञातगतिः प्रभुः ।
तामाह विप्रवनितां विहस्य करुणानिधिः ॥
भिक्षुवर्य उवाच
सन्देहं कुरु ' नो चित्ते विप्रभामिनि मा खिद ।
रक्षैनं बालकं प्रीत्या सुपवित्रं स्वपुत्रकम् ॥
अनेन शिशुना श्रेयः प्राप्स्यसे न चिरात्परम् ।
पुष्णीहि सर्वथा ह्येनं महातेजस्विनं शिशुम् ॥
नन्दीश्वर उवाच
इत्युक्तवन्तं तं भिक्षुस्वरूपं करुणानिधिम् ।
सा विप्रवनिता शम्भुं प्रीत्या पप्रच्छ सादरम् ॥
विप्रवनितोवाच
त्वदाज्ञयैनं बालं हि रक्षिष्यामि स्वपुत्रवत् ।
पोक्ष्यामि नात्र सन्देहो मद्भाग्यात्त्वमिहागतः ॥
तथापि ज्ञातुमिच्छामि विशेषेण तु तत्त्वतः ।
कोऽयं कस्य सुतश्चायं कस्त्वमत्र समागतः ॥
मुहुर्मम समायाति ज्ञानं भिक्षुवर प्रभो ।
त्वं शिवः करुणासिन्धुस्त्वद्भक्तोऽयं शिशुः पुरा ॥
केनचित्कर्मदोषेण सम्प्राप्तोऽयं दशामिमाम् । श्रीशिवमहापुराण [ अ ० ३१ । मैं अब इस बालकका अपने औरसपुत्रकी ॥ २२ भाँति पालन करना चाहती हूँ, परंतु इसके कुल आगे जन्म आदिका ज्ञान न होनेसे इसे छूनेका साहस नहीं होता ॥ २२ ॥
नन्दीश्वर बोले- जब वह श्रेष्ठ ब्राह्मणी अपने । मनमें इस प्रकारका विचार कर रही थी, उसी समय ॥ २३ भक्तवत्सल शिवजीने बड़ी दया की ॥२३ ॥
। सदैव महान् लीलाएँ करनेवाले, स्वयं उपाधिरहित ॥ २४ तथा भक्तोंको हर प्रकारका सुख देनेवाले उन महेश्वरने [ उस समय ] भिक्षुकका रूप धारण कर लिया ॥ २४ ॥
भिक्षुकरूपधारी वे परमेश्वर वहाँ सहसा आये , ॥ २५ जहाँ उस बालकके विषयमें जाननेकी इच्छावाली सन्देहग्रस्त ब्राह्मणी विद्यमान थी ॥ २५ ॥
तब अविज्ञातगति तथा दयासागर उन भिक्षुक-२६ रूपधारी भगवान् शंकरने हँसकर उस ब्राह्मणपत्नीसे कहा- ॥ २६ ॥
भिक्षुश्रेष्ठ बोले - हे ब्राह्मणी! तुम अपने मनमें शंका मत करो और दुखी मत होओ, तुम अपने २७ पुत्रतुल्य इस पवित्र बालककी प्रसन्नतापूर्वक रक्षा करो थोड़े ही समयके उपरान्त इस बालकसे तुम्हारा २८ परम कल्याण होनेवाला है, अतः सब प्रकारसे इस महातेजस्वी शिशुका पालन - पोषण करो ॥ २७-२८ ॥ नन्दीश्वर बोले- भिक्षुरूप धारण करनेवाले करुणासागर शिवजीने जब इस प्रकार कहा, तब ब्राह्मणीने २ ९ प्रेमके साथ आदरपूर्वक उनसे पूछा— ॥ २ ९ ॥ ब्राह्मणी बोली- मैं आपकी आज्ञासे अपने पुत्रके समान इस बालककी रक्षा करूँगी तथा भरण - पोषण ३० करूँगी, इसमें सन्देह नहीं है, आप मेरे भाग्यसे ही यहाँ पधारे हैं । फिर भी मैं आपसे सत्य - सत्य विशेष रूपसे जानना चाहती हूँ कि यह कौन है, यह किसका पुत्र है ३१ और यहाँ आये हुए आप कौन हैं? ॥ ३०-३१ ॥ हे भिक्षुवर! हे प्रभो! मुझे बारंबार ऐसा ज्ञात हो ३२ रहा है कि आप दयासागर भगवान् शिव हैं और यह शिशु पूर्वजन्ममें आपका भक्त था ॥३२ ॥
किसी कर्मके दोषसे यह इस अवस्थाको प्राप्त हुआ है, उसे भोगकर आपकी कृपासे यह पुनः परम तद्भुक्त्वा परमं श्रेयः प्राप्स्यते त्वदनुग्रहात् ॥ ३३ | कल्याणको प्राप्त करेगा ॥ ३३ ॥
पृष्ठ 153
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
अ ० ३१ ] शतरुद्रसंहिता १४१
त्वन्माययैव साहं वै मार्गभ्रष्टा विमोहिता ।
आगता प्रेषिता त्वत्तो ह्यस्य रक्षणहेतुतः ॥
नन्दीश्वर उवाच
इति तद्दर्शनप्राप्तविज्ञानां विप्रकामिनीम् ।
ज्ञातुकामां विशेषेण प्रोचे भिक्षुतनुः शिवः ॥
भिक्षुवर्य उवाच
शृणु प्रीत्या विप्रपनि बालस्यास्य पुरेहितम् ।
सर्वमन्यस्य सुप्रीत्या वक्ष्यते तत्त्वतोऽनघे ॥
सुतो विदर्भराजस्य शिवभक्तस्य धीमतः ।
अयं सत्यरथस्यैव स्वधर्मनिरतस्य हि ॥
शृणु सत्यरथो राजा हतः शाल्वै रणे परैः ।
तत्पत्नी निशि सुव्यग्रा निर्ययौ स्वगृहाद् द्रुतम् ॥
असूत तनयं चैनं समायाता प्रगेऽत्र हि ।
सरोऽवतीर्णा तृषया ग्रस्ता ग्राहेण दैवतः ॥
नन्दीश्वर उवाच
इति तस्य समुत्पत्तिं तत्पितुः सङ्गरे मृतिम् ।
तन्मातृमरणं ग्राहात्सर्वं तस्यै न्यवेदयत् ॥
अथ सा ब्राह्मणी चैव विस्मिताति मुनीश्वर ।
पुनः पप्रच्छ तं भिक्षुं ज्ञानिनं सिद्धरूपकम् ॥
ब्राह्मण्युवाच
स राज्ञोऽस्य पिता भिक्षो वरभोगान्तरैव हि ।
कस्माच्छाल्वैः स्वरिपुभिः स्वल्पेहैश्च विघातितः ॥
कस्मादस्य शिशोर्माता ग्राहेणाशु सुभक्षिता । यस्मादनाथोऽयं जातो विबन्धुश्चैव जन्मतः कस्मात्सुतो ममापीह सुदरिद्रो हि भिक्षुकः । भवेत्कथं सुखं भिक्षो पुत्रयोरनयोर्वद नन्दीश्वर उवाच इति तस्या वचः श्रुत्वा स भिक्षुः परमेश्वरः । विप्रपत्न्याः प्रसन्नात्मा प्रोवाच विहसँश्च ताम् आपकी मायासे मोहित हुई मैं अपना मार्ग भूलकर ३४ इधर आ गयी, [ जिससे ज्ञात होता है कि ] इसके पालन करनेके लिये आपने ही मुझे यहाँ भेजा है ॥ ३४ ॥
नन्दीश्वर बोले- शिवजीके दर्शनसे ज्ञानको प्राप्त हुई तथा विशेषरूपसे जाननेकी इच्छावाली उस ३५ ब्राह्मणीसे भिक्षुरूपधारी शिवने कहा- ॥ ३५ ॥
भिक्षुवर बोले - हे विप्रपलि! इस सर्वमान्य बालकका पूर्वकालीन इतिहास तुमसे प्रसन्नतापूर्वक ३६ कह रहा हूँ । हे अनघे! तुम प्रेमपूर्वक इसे सुनो ॥ ३६ ॥
यह [ बालक ] शिवभक्त, बुद्धिमान् तथा अपने ३७ धर्ममें निरत रहनेवाले विदर्भराज सत्यरथका पुत्र है ॥ ३७ ॥
[ हे ब्राह्मणी! ] सुनो, राजा सत्यरथ शत्रु शाल्वोंद्वारा ३८ युद्धमें मार डाले गये, जिससे अत्यन्त भयभीत हुई उनकी पत्नी रात्रिमें शीघ्रतासे अपने घरसे निकल गयीं ॥ ३८ ॥
उन्होंने इस वनमें आकर प्रातःकाल होते - होते ३ ९ इस पुत्रको जन्म दिया, किंतु प्यास लगनेसे वह सरोवरमें उतरीं, तब दुर्भाग्यसे ग्राहने उन्हें अपना ग्रास बना लिया ॥ ३ ९ ॥ नन्दीश्वर बोले- इस प्रकार उन्होंने बालककी उत्पत्ति, उसके पिताका संग्राममें मरण एवं ग्राहद्वारा ४० उसकी माताकी मृत्युके विषयमें उससे कहा ॥४० ॥
हे मुनीश्वर! तब वह ब्राह्मणी अत्यन्त विस्मित ४१ हुई और उसने ज्ञानी तथा सिद्धस्वरूप उन भिक्षुकसे पुनः पूछा —॥४१ ॥
ब्राह्मणी बोली- हे भिक्षो! इस राजपुत्रका श्रेष्ठ पिता उत्तमोत्तम भोग करते हुए भी इन क्षुद्र शाल्वोंके ४२ द्वारा किस प्रकार मारा गया और ग्राहने इस शिशुकी माताको शीघ्र क्यों ग्रास बना लिया, जिसके कारण यह ॥ ४३ जन्मसे अनाथ एवं बन्धुरहित हो गया है? ॥ ४२-४३ ॥ हे भिक्षो! मेरा यह पुत्र भी परम दरिद्र तथा ॥ ४४ भिक्षुक क्यों हुआ? किस उपायसे मेरे ये दोनों पुत्र सुखी होंगे, यह बताइये ॥ ४४ ॥
नन्दीश्वर बोले – उस ब्राह्मणीका यह वचन सुनकर भिक्षुरूपधारी उन परमेश्वरने प्रसन्नचित्त होकर ॥ ४५ । हँसते हुए उससे कहा —॥४५ ॥
पृष्ठ 154
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
१४२ भिक्षुवर्य उवाच विप्रपत्ति विशेषेण सर्वप्रश्नान्वदामि ते शृणु त्वं सावधानेन चरित्रमिदमुत्तमम् अमुष्य बालस्य पिता स विदर्भमहीपतिः पूर्वजन्मनि पाण्ड्योऽसौ बभूव नृपसत्तमः स शैवनृपतिर्धर्मात्पालयन्निखिलां महीम् स्वप्रजां रञ्जयामास सर्वोपद्रवनाशनः
कदाचित्स हि सर्वेशं प्रदोषे पर्यपूजयत् ।
त्रयोदश्यां निराहारो दिवानक्तव्रती शिवम् ॥
तस्य पूजयतः शम्भुं प्रदोषे गिरिशं रते महान् शब्दो बभूवाथ विकटः सर्वथा पुरे तमाकर्ण्य रवं सोऽथ राजा त्यक्तशिवार्चनः । रिप्वागमनशङ्कातो निर्ययौ भवनाद् बहिः
एतस्मिन्नेव काले तु तस्यामात्यो महाबली ।
गृहीतशत्रुसामन्तो राजान्तिकमुपाययौ ॥
तं दृष्ट्वा शत्रुसामन्तं महाक्रोधेन विह्वलः ।
अविचार्य वृषन्तस्य शिरश्छेदमकारयत् ॥
असमाप्येशपूजां तामशुचिर्नष्टधीर्नृपः । श्रीशिवमहापुराण [ अ ० ३१ भिक्षुवर्य बोले- हे विप्रपत्नि! मैं तुम्हारे सभी । । प्रश्नोंका उत्तर विशेषरूपसे दे रहा हू, तुम सावधान ॥ ४६ होकर इस उत्तम चरित्रका श्रवण करो ॥४६ ॥
। विदर्भ देशका राजा, जो इस बालकका पिता था, ॥ ४७ वह पूर्वजन्ममें पाण्ड्य देशका श्रेष्ठ राजा था ॥ ४७ ॥
। सम्पूर्ण उपद्रवोंका नाश करनेवाला वह शिवभक्त ॥ ४८ राजा सम्पूर्ण पृथ्वीका पालन करता हुआ अपनी प्रजाको प्रसन्न रखता था ॥४८ ॥
किसी समय उसने दिनमें निराहार रहकर नक्तव्रत ४ ९ करते हुए त्रयोदशीके प्रदोषकालमें शिवकी पूजा की ॥ जब वह प्रदोषकालमें शिवजीका पूजन कर रहा था, ॥ ५० तभी नगरमें बड़ा भयानक शब्द हुआ ॥ ४ ९ -५० ॥ उस [ भयावह ] ध्वनिको सुनकर वह राजा ॥ ५१ शत्रुके आक्रमणकी आशंकासे शिवार्चनका परित्यागकर घरसे बाहर निकल पड़ा ॥५१ ॥
इसी समय उसका महाबली मन्त्री भी शत्रुता ५२ करनेवाले सामन्तको साथ लेकर राजाके निकट आ गया ॥ ५२ ॥
अत्यधिक क्रोधसे व्याकुल राजाने उस शत्रु ५३ सामन्तको देखकर बिना धर्माधर्मका विचार किये निर्दयताके साथ उसका सिर कटवा दिया ॥ ५३ ॥
उस शिवपूजाको समाप्त किये बिना ही अपवित्र रात्रौ चकार सुप्रीत्या भोजनं नष्टमंगलः ॥५४ तथा नष्ट बुद्धिवाले राजाने रातमें प्रेमपूर्वक भोजन
विदर्भे सोऽभवद्राजा जन्मनीह शिवव्रती ।
शिवार्चनान्तरायेण परैर्भोगान्तरे हतः ॥
तत्पिता यः पूर्वभवे सोऽस्मिञ्जन्मनि तत्सुतः ।
अयमेव हतैश्वर्यः शिवपूजाव्यतिक्रमात् ॥
अस्य माता पूर्वभवे सपत्नीं छद्मनाहरत् ।
भक्षिता तेन पापेन ग्राहेणास्मिन् भवे हि सा ॥
एषा प्रवृत्तिरेतेषां भवत्यै परिकीर्तिता ।
अनर्चितशिवा भक्त्या प्राप्नुवन्ति दरिद्रताम् ॥
किया, जिससे वह मंगलहीन हो गया ॥ ५४ ॥
उसके पश्चात् इस जन्ममें वह विदर्भ देशका ५५ शिवभक्त राजा हुआ, किंतु [ पूर्वजन्ममें ] शिवार्चनमें होनेवाले पापके कारण शत्रुओंने राज्यसुखभोगके समय ही उसका वध कर दिया ॥ ५५ ॥
पूर्वजन्ममें जो उसका पुत्र था, वह ही इस ५६ जन्ममें भी हुआ है, किंतु शिवपूजाके व्यतिक्रमसे यह सारे ऐश्वर्यसे रहित है ॥५६ ॥
इसकी माताने पूर्वजन्ममें अपनी सौतको छलसे ५७ मरवा दिया था, उस पापसे इस जन्ममें उसे ग्राहने निगल लिया ॥५७ ॥
[ हे ब्राह्मणी! ] मैंने इन सबका सारा वृत्तान्त तुमसे कह दिया, भक्तिपूर्वक शिवकी अर्चना न ५८ । करनेवाले मनुष्य दरिद्र हो जाते हैं ॥५८ ॥
पृष्ठ 155
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
अ ० ३१ ] शतरुद्रसंहिता १४३
एष ते तनयः पूर्वजन्मनि ब्राह्मणोत्तमः ।
प्रतिग्रहैर्वयो निन्ये न यज्ञाद्यैः सुकर्मभिः ॥
अतो दारिद्र्यमापन्नः पुत्रस्ते द्विजभामिनि ।
तद्दोषपरिहारार्थं शरणं शंकरं व्रज ॥
एताभ्यां खलु बालाभ्यां शिवपूजा विधीयताम् ।
उपवीतानन्तरं हि शिवः श्रेयः करिष्यति ॥
नन्दीश्वर उवाच
इति तामुपदिश्याथ भिक्षुवर्यतनुः शिवः ।
स्वरूपं दर्शयामास परमं भक्तवत्सलः ॥
अथ सा विप्रवनिता ज्ञात्वा तं शंकरं प्रभुम् ।
सुप्रणम्य हि तुष्टाव प्रेम्णा गद्गदया गिरा ॥
ततः स भगवान् शम्भुर्धृतभिक्षुतनुर्द्रुतम् ।
पश्यन्त्या विप्रपल्यास्तु तत्रैवान्तरधीयत ॥
अथ तस्मिन् गते भिक्षौ विश्रब्धा ब्राह्मणी च सा ।
तमर्भकं समादाय सस्वपुत्रा गृहं ययौ ॥
एकचक्राह्वये रम्ये ग्राम्ये कृतनिकेतना ।
स्वपुत्रं राजपुत्रं च वरान्नैश्च व्यवर्धयत् ॥
ब्राह्मणैः कृतसंस्कारौ कृतोपनयनौ च तौ ।
ववृधाते स्वगेहे च शिवपूजनतत्परौ ॥
तौ शाण्डिल्यमुनेस्तात निदेशान्नियमस्थितौ ।
प्रदोषे चक्रतुः शम्भोः पूजां कृत्वा व्रतं शुभम् ॥
कदाचिद् द्विजपुत्रेण विनासौ राजनन्दनः ।
नद्यां स्नातुं गतः प्राप निधानकलशं वरम् ॥
एवं पूजयतोः शम्भुं राजद्विजकुमारयोः ।
सुखेनैव व्यतीयाय तयोर्मासचतुष्टयम् ॥
एवमर्चयतोः शम्भुं भूयोऽपि परया मुदा ।
संवत्सरो व्यतीयाय तस्मिन्नेव तयोर्गृहे ॥
तुम्हारा यह पुत्र पूर्वजन्ममें श्रेष्ठ ब्राह्मण था, ५ ९ इसने यज्ञादि सुकर्म किये नहीं; केवल प्रतिग्रहोंको लेनेमें ही अपना जीवन बिता दिया । हे ब्राह्मणी! इसीलिये तुम्हारा पुत्र दरिद्र हुआ है, उन दोषोंको दूर ६० करनेके लिये तुम शंकरकी शरणमें जाओ और इन दोनों बालकोंको लेकर शिवजीकी पूजा करो । इन दोनोंका यज्ञोपवीत हो जानेके पश्चात् शिवजी कल्याण ६१ करेंगे ॥ ५ ९ –६१ ॥ नन्दीश्वर बोले – उसे ऐसा उपदेश देकर भिक्षुरूपधारी भक्तवत्सल भगवान् शिवने उसे अपना ६२ उत्कृष्ट स्वरूप दिखाया ॥ ६२ ॥
इसके बाद वह ब्राह्मणी उन भिक्षुश्रेष्ठको शिव ६३ जानकर उन्हें भलीभाँति प्रणाम करके प्रेमपूर्वक गद्गद वाणीमें उन प्रभुकी स्तुति करने लगी ॥ ६३ ॥
उसके बाद विप्रपत्नीके देखते - देखते भिक्षुरूपधारी ६४ वे भगवान् शिव शीघ्र ही वहीं अन्तर्धान हो गये ॥ ६४ ॥
भिक्षुकके चले जानेपर ब्राह्मणीको विश्वास हो ६५ गया और उस लड़केको लेकर वह अपने पुत्रसहित घर चली गयी ॥६५ ॥
एकचक्रा नामक रमणीय ग्राममें निवास करती ६६ हुई वह ब्राह्मणी उत्तम अन्नोंसे अपने पुत्र तथा राजपुत्रका पालन करने लगी ॥६६ ॥
पुनः ब्राह्मणोंने उन दोनोंका यज्ञोपवीत - संस्कार ६७ सम्पन्न किया, वे दोनों शिवपूजामें तत्पर हो अपने घरमें बढ़ने लगे ॥६७ ॥
हे तात! वे दोनों ही शाण्डिल्य मुनिकी आज्ञासे ६८ नियममें तत्पर होकर शुभ व्रत करके प्रदोषकालमें शिवजीका पूजन करने लगे ॥६८ ॥
किसी समय ब्राह्मणपुत्रके बिना ही नदीमें स्नान ६ ९ करनेके लिये गये हुए राजपुत्रने धनसे परिपूर्ण एक सुन्दर कलश पाया ॥ ६ ९ ॥ इस प्रकार शिवजीकी पूजा करते हुए उन ७० राजकुमार और ब्राह्मणकुमारके सुखपूर्वक चार महीने बीत गये ॥७० ॥
इसी रीतिसे अत्यन्त प्रसन्नतासे पुनः शिवजीका पूजन करते हुए उन दोनोंका उस घरमें एक वर्ष ७१ | व्यतीत हुआ ॥ ७१ ॥
पृष्ठ 156
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
१४४ संवत्सरे व्यतिक्रान्ते स राजतनयो मुने । गत्वा वनान्ते विप्रेण शिवस्यानुग्रहाद्विभोः
अकस्मादागतां तत्र दत्तां तज्जनकेन ह ।
विवाह्य गन्धर्वसुतां चक्रे राज्यमकण्टकम् ॥
या विप्रवनिता पूर्वं तमपुष्णात्स्वपुत्रवत् ।
सैव माताभवत्तस्य स भ्राता द्विजनन्दनः ॥
इत्थमाराध्य देवेशं धर्मगुप्ताह्वयः स वै ।
विदर्भविषये राज्ञ्या तया भोगं चकार ह ॥
भिक्षुवर्यावतारस्ते वर्णितश्च
वर्णितश्च मयाधुना ।
शिवस्य धर्मगुप्ताह्वनृपबालसुखप्रदः ॥
एतदाख्यानमनघं पवित्रं पावनं महत् ।
धर्मार्थकाममोक्षाणां साधनं सर्वकामदम् ॥
य एतच्छृणुयान्नित्यं श्रावयेद्वा समाहितः ।
स भुक्त्वेहाखिलान्कामान् सोऽन्ते शिवपुरं व्रजेत् ॥
इति श्रीशिवमहापुराणे तृतीयायां शतरुद्रसंहितायां ॥ इस प्रकार श्रीशिवमहापुराणके अन्तर्गत श्रीशिवमहापुराण [ अ ० ३२ हे मुने! एक वर्ष बीत जानेपर वह राजपुत्र एक ॥ ७२ दिन उस ब्राह्मणपुत्रके साथ सर्वव्यापक शिवकी कृपासे | वनप्रान्तमें जा पहुँचा और अकस्मात् वहाँपर आयी | तथा उसके पिताद्वारा प्रदत्त गन्धर्वकन्यासे विवाह करके हुई ७३ अकण्टक राज्य करने लगा ॥ ७२-७३ ॥ जिस ब्राह्मणीने अपने पुत्रके समान उसका ७४ | पालन - पोषण किया था, वही उसकी माता हुई तथा वह ब्राह्मणपुत्र उसका भाई हुआ ॥७४ ॥
इस प्रकार शिवजीकी आराधना करके धर्मगुप्त ७५ नामक वह राजपुत्र विदर्भनगरमें उस रानीके साथ सुखोपभोग करने लगा ॥ ७५ ॥
[ हे मुने! ] इस समय मैंने शिवजीके भिक्षुवर्यावतारका ७६ वर्णन आपसे कर दिया, जो धर्मगुप्त नामक राजपुत्रको सुख देनेवाला था ॥७६ ॥
यह आख्यान निष्पाप, पवित्र, पवित्र करनेवाला, ७७ महान् धर्म, अर्थ, काम तथा मोक्षका साधन एवं सम्पूर्ण मनोरथोंको पूर्ण करनेवाला है ॥ ७७ ॥
जो सावधान होकर इसे नित्य सुनता अथवा सुनाता है, वह समस्त इच्छित भोगोंको भोगकर अन्तमें ७८ । शिवपुरको जाता है ॥ ७८ ॥
भिक्षुवर्याह्वशिवावतारचरित्रवर्णनं नामैकत्रिंशोऽध्यायः ॥ ३१ ॥
तृतीय शतरुद्रसंहितामें भिक्षुवर्याह्वशिवावतारचरित्रवर्णन नामक इकतीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ३१ ॥
अथ द्वात्रिंशोऽध्यायः उपमन्युपर अनुग्रह करनेके नन्दीश्वर उवाच
शृणु तात प्रवक्ष्यामि शिवस्य परमात्मनः ।
सुरेश्वरावतारस्ते धौम्याग्रजहितावहम् ॥
व्याघ्रपादसुतो धीमानुपमन्युः सतां प्रियः ।
जन्मान्तरेण संसिद्धः प्राप्तो मुनिकुमारताम् ॥
उवास मातुलगृहे स मात्रा शिशुरेव हि ।
उपमन्युर्व्याघ्रपादिः स्याद्दरिद्रश्च दैवतः ॥
लिये शिवके सुरेश्वरावतारका वर्णन नन्दीश्वर बोले- हे तात! परमेश्वर शिवका जो सुरेश्वरावतार हुआ, जिसने धौम्यके ज्येष्ठ भ्राता १ [ उपमन्यु ] -का हितसाधन किया था, मैं उसका वर्णन करूँगा, आप श्रवण कीजिये ॥ १ ॥
व्याघ्रपादका उपमन्यु नामवाला एक पुत्र था, २ जो परम बुद्धिमान् एवं सज्जनोंका प्रिय था, वह जन्मान्तरीय [ तपस्यासे ] सिद्ध था और मुनिके पुत्ररूपमें उत्पन्न हुआ था ॥ २ ॥
वह व्याघ्रपादपुत्र उपमन्यु जब बालक था, तभीसे अपनी माताके साथ मामाके घर निवास करने ३ लगा, दैवयोगसे वह दरिद्र था ॥३ ॥
पृष्ठ 157
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
अ ० ३२ ] शतरुद्रसंहिता १४५
कदाचित्क्षीरमत्यल्पं पीतवान्मातुलाश्रमे ।
ययाचे मातरं प्रीत्या बहुशो दुग्धलालसः ॥
तच्छ्रुत्वा पुत्रवचनं तन्माता च तपस्विनी ।
सान्तः प्रविश्याथ तदा शुभोपायमरीरचत् ॥
उञ्छवृत्त्यर्जितान्बीजान्पिष्ट्वालोड्य जलेन तान् ।
उपलाल्य सुतं तस्मै सा ददौ कृत्रिमं पयः ॥
पीत्वा च कृत्रिमं दुग्धं मात्रा दत्तं स बालकः ।
नैतत्क्षीरमिति प्राह मातरं चारुदत्पुनः ॥
श्रुत्वा सुतस्य रुदितं प्राह सा दुःखिता सुतम् ।
सम्मा नेत्रे पुत्रस्य कराभ्यां कमलाकृतिः ॥
मातोवाच
क्षीरमत्र कुतोऽस्माकं वने निवसतां सदा ।
प्रसादेन विना शम्भोः पयः प्राप्तिर्भवेन्न हि ॥
पूर्वजन्मनि यत्कृत्यं शिवमुद्दिश्य हे सुत ।
तदेव लभ्यते नूनं नात्र कार्या विचारणा ॥
इति मातृवचः श्रुत्वा व्याघ्रपादिः स बालकः ।
प्रत्युवाच विशोकात्मा मातरं मातृवत्सलः ॥
शोकेनालमिमं मातः शंभुर्यद्यस्ति शङ्करः ।
त्यज शोकं महाभागे सर्वं भद्रं भविष्यति ॥
शृणु मातर्वचो मेऽद्य महादेवोऽस्ति चेत्क्वचित् ।
चिराद्वा ह्यचिराद्वापि क्षीरोदं साधयाम्यहम् ॥
नन्दीश्वर उवाच
इत्युक्त्वा स शिशुः प्रीत्या शिवं मेऽस्त्वित्युदीर्य च ।
विसृज्य तां सुप्रणम्य तपः कर्तुं प्रचक्रमे ॥
उसने कभी अपने मामाके घरमें थोड़ा - सा दूध ४ पी लिया था, फिर दूधके प्रति उसकी लालसा बढ़ गयी और मातासे बारंबार दूध माँगने लगा ॥४ ॥
तब पुत्रका यह वचन सुनकर उस तपस्विनी ५ माताने घरके भीतर प्रवेश करके एक उत्तम उपाय किया ॥५ ॥
उसने उञ्छवृत्तिसे एकत्रित बीजोंको पीसकर ६ उस [ आटे ] -को पानीमें घोलकर पुत्रको बहला-फुसलाकर वह कृत्रिम दूध उसे दे दिया ॥ ६ ॥
माताके द्वारा दिये गये कृत्रिम दूधको पीकर वह ७ बालक ' यह दूध नहीं है ', इस प्रकार मातासे बोला और पुनः रोने लगा ॥ ७ ॥
पुत्रका रुदन सुनकर कमलाके समान कोमलांगी ८ माताने हाथोंसे पुत्रके नेत्रोंको पोछकर दुखी होकर उससे कहा- ॥ ८ ॥
माता बोली - हे पुत्र! हम तो सदैव वनमें निवास करते हैं, अतः यहाँ दूधकी प्राप्ति कैसे सम्भव ९ है? शिवजीको प्रसन्न किये बिना तुम्हें दूधकी प्राप्ति नहीं हो सकती ॥९ ॥
हे पुत्र! पूर्वजन्ममें शिवजीको उद्देश्य करके जो १० कर्म किया जाता है, वह उसे अवश्य प्राप्त होता है, इसमें सन्देह नहीं करना चाहिये ॥१० ॥
माताके इस प्रकारके वचनको सुनकर मातृवत्सल ११ वह व्याघ्रपादपुत्र शोकरहित होकर अपनी मातासे बोला— ॥ ११ ॥
हे मातः! यदि शिवजी कल्याण करनेवाले हैं, १२ तो शोक करना व्यर्थ है, हे महाभागे! शोकका त्याग करो, सब भला ही होगा ॥१२ ॥
हे मातः! अब मेरी बात सुनो, यदि कहीं भी १३ वे महादेवजी होंगे, तो मैं थोड़े अथवा अधिक कालमें उनसे क्षीरका समुद्र प्राप्त कर लूँगा ॥१३ ॥
नन्दीश्वर बोले- इस प्रकार [ अपना निश्चय ] बताकर तथा ‘ मेरा कल्याण हो ' ऐसा प्रेमपूर्वक कहकर वह बालक माताको भलीभाँति प्रणामकर १४ । उससे विदा ले तप करनेके लिये चल पड़ा ॥ १४ ॥
पृष्ठ 158
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
१४६ श्रीशिवमहापुराण [ अ ० ३२ हिमवत्पर्वतगतः वायुभक्षः समाहितः । वह बालक हिमालयपर्वतपर जाकर वायुका अष्टेष्टकाभिः प्रासादं कृत्वा लिङ्गं च मृन्मयम् ॥ १५ पान करते हुए सावधान मनसे आठ ईंटोंसे एक मन्दिर तत्रावाह्य शिवं साम्बं भक्त्या पञ्चाक्षरेण ह पत्रपुष्पादिभिर्वन्यैः समानर्च शिशुः स वै ध्यात्वा शिवं च तं साम्बं जपन्पञ्चाक्षरं मनुम् समभ्यर्च्य चिरं कालं चचार परमं तपः
तपसा तस्य बालस्य ह्युपमन्योर्महात्मनः ।
चराचरं चभुवनं प्रदीपितमभून्मुने ॥
एतस्मिन्नन्तरे शम्भुर्विष्ण्वाद्यैः प्रार्थितः प्रभुः ।
परीक्षितुं च तद्भक्तिं शक्ररूपोऽभवत्तदा ॥
शिवा शचीस्वरूपाभूद्गणाः सर्वेऽभवन्सुराः ।
ऐरावतगजो नन्दी सर्वमेव च तन्मयम् ॥
ततः साम्बः शिवः शक्रस्वरूपः सगणो द्रुतम् ।
जगामानुग्रहं कर्तुमुपमन्योस्तदाश्रमम् ॥
परीक्षितुं च तद्भक्तिं शक्ररूपधरो हरः ।
प्राह गंभीरया वाचा बालकं तं मुनीश्वर ॥
सुरेश्वर उवाच
तुष्टोऽस्मि ते वरं ब्रूहि तपसानेन सुव्रत ।
ददामि चेच्छितान्कामान् सर्वान्नात्रास्ति संशयः ॥
एवमुक्तः स वै तेन शक्ररूपेण शम्भुना ।
वरयामि शिवे भक्तिमित्युवाच कृताञ्जलिः ॥
तन्निशम्य हरिः प्राह मां न जानासि लेखपम् ।
त्रैलोक्याधिपतिं शक्रं सर्वदेवनमस्कृतम् ॥
मद्भक्तो भव विप्रर्षे मामेवार्चय सर्वदा ।
ददामि सर्वं भद्रं ते त्यज रुद्रं च निर्गुणम् ॥
रुद्रेण निर्गुणेनालं किं ते कार्यं भविष्यति । | बनाकर उसमें मिट्टीका शिवलिंग स्थापित करके । । लिंगमें भक्तिपूर्वक पंचाक्षर मन्त्रके द्वारा पार्वतीसहित उस ॥ ॥ १६ । शिवका आवाहनकर वनमें उत्पन्न पत्र, पुष्प आदिसे उनका पूजन करने लगा॥१५-१६ ॥ । इस प्रकार पार्वतीसहित उन शिवजीका ध्यान ॥ १७ करके पंचाक्षर मन्त्रका जप तथा उनकी अर्चना कर । हुए उसने बहुत कालपर्यन्त घोर तप किया ॥१७ ॥
हे मुने! उस महात्मा बालक उपमन्युकी तपस्यासे १८ । सारा चराचर लोक प्रज्वलित हो उठा ॥१८ ॥
इसी समय विष्णु आदि देवताओंके द्वारा प्रार्थित १ ९ भगवान् शिवने उसकी भक्तिकी परीक्षा करनेके लिये इन्द्रका रूप धारण किया । पार्वती इन्द्राणीके रूपवाली हो गयीं, सभी गण देवता हो गये और नन्दीने ऐरावत २० गजका रूप धारण किया । इस प्रकार जब इन्द्ररूपकी सारी सामग्री उपस्थित हो गयी, तब गणों एवं पार्वतीसहित इन्द्ररूप शिवजी उपमन्युके ऊपर अनुग्रह करनेके लिये २१ शीघ्र ही उसके आश्रमपर गये ॥ १ ९ –२१ ॥ हे मुनीश्वर! इन्द्ररूपधारी शिवजीने उसकी २२ भक्तिकी परीक्षा करनेके लिये गम्भीर वाणीमें उस बालकसे कहा— ॥ २२ ॥
सुरेश्वर बोले - हे सुव्रत! मैं तुम्हारी इस तपस्यासे अत्यन्त प्रसन्न हूँ, तुम वर माँगो । मैं तुम्हारा २३ सारा अभीष्ट प्रदान करूँगा, इसमें संशय नहीं है ॥ २३ ॥
इन्द्ररूपधारी उन शिवजीके इस प्रकार कहनेपर २४ उसने हाथ जोड़कर कहा - मैं शिवमें भक्ति होनेका वरदान चाहता हूँ ॥२४ ॥
यह सुनकर इन्द्र बोले- क्या तुम त्रिलोकीके २५ स्वामी, देवगणोंके रक्षक और सभी देवगणोंसे नमस्कृत मुझ इन्द्रको नहीं पहचानते हो ॥ २५ ॥
हे ब्राह्मणश्रेष्ठ! तुम मेरे भक्त हो जाओ और २६ निरन्तर मेरी ही पूजा करो, मैं तुम्हारा सब प्रकारका
कल्याण करूँगा । तुम गुणरहित शिवको छोड़ो ॥ २६ ॥
उन निर्गुण रुद्रसे तुम्हारा क्या कार्य हो सकता है, जो देवजातिसे बाहर होकर पिशाचत्वको प्राप्त
देवजातिबहिर्भूतो यः पिशाचत्वमागतः ॥ २७ । हो गये हैं?॥ २७ ॥
पृष्ठ 159
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
अ ० ३२ ] शतरुद्रसंहिता १४७ नन्दीश्वर उवाच
तच्छ्रुत्वा स मुनेः पुत्रो जपन्पञ्चाक्षरं मनुम् ।
मन्यमानो धर्मविघ्नं प्राह तं कर्तुमागतम् ॥
उपमन्युरुवाच
त्वयैवं कथितं सर्वं भवनिन्दारतेन वै ।
प्रसङ्गाद्देवदेवस्य निर्गुणत्वं पिशाचता ॥
त्वं न जानासि वै रुद्रं सर्वदेवेश्वरेश्वरम् ।
ब्रह्मविष्णुमहेशानां जनकं प्रकृतेः परम् ॥
सदसद् व्यक्तमव्यक्तं यमाहुर्ब्रह्मवादिनः ।
नित्यमेकमनेकं च वरं तस्माद् वृणोम्यहम् ॥
हेतुवादविनिर्मुक्तं साङ्ख्ययोगार्थदं परम् ।
यमुशन्ति हि तत्त्वज्ञा वरं तस्माद् वृणोम्यहम् ॥
नास्ति शम्भोः परं तत्त्वं सर्वकारणकारणम् ।
ब्रह्मविष्ण्वादिदेवानां श्रेष्ठो गुणपराद्विभोः ॥
नाहं वृणे वरं त्वत्तो न विष्णोर्ब्रह्मणोऽपि वा ।
नान्यस्मादमराद्वापि शङ्करो वरदोऽस्तु मे ॥
बहुनात्र किमुक्तेन वच्मि तत्त्वं मतं स्वकम् ।
न प्रार्थये पशुपतेरन्यं देवादिकं स्फुटम् ॥
मद्भावं शृणु गोत्रारे मयाद्यानुमितं त्विदम् ।
भवान्तरे कृतं पापं श्रुता निन्दा भवस्य चेत् ॥
श्रुत्वा निन्दां भवस्याथ तत्क्षणादेव संत्यजेत् ।
स्वदेहं तन्निहत्याशु शिवलोकं स गच्छति ॥
आस्तां तावन्ममेच्छेयं क्षीरं प्रति सुराधम निहत्य त्वां शिवास्त्रेण त्यजाम्येतत्कलेवरम् नन्दीश्वर उवाच एवमुक्त्वोपमन्युस्तं मर्तुं व्यवसितः स्वयम् क्षीरे वाञ्छामपि त्यक्त्वा निहन्तुं शक्रमुद्यतः नन्दीश्वर बोले — यह सुनकर पंचाक्षर मन्त्रका जप करता हुआ वह बालक अपने धर्ममें विघ्न २८ उत्पन्न करनेके लिये उनको आया हुआ जानकर बोला— ॥ २८ ॥
उपमन्यु बोले- शिवनिन्दामें रत तुमने इस प्रकार प्रसंगवश उन देवाधिदेवको निर्गुण एवं पिशाच २ ९ कहा है । तुम अवश्य ही प्रकृतिसे परे, ब्रह्मा - विष्णु तथा महेश्वरको उत्पन्न करनेवाले और सभी देवेश्वरोंके ३० भी ईश्वर उन रुद्रको नहीं जानते ॥ २ ९ -३० ॥ ब्रह्मवादी लोग जिन्हें सत्, असत्, व्यक्त, अव्यक्त, ३१ नित्य, एक तथा अनेक बताते हैं, मैं माँगूँगा ॥ ३१ ॥
तत्त्वज्ञ लोग जिन्हें तर्कसे परे तथा ३२ तात्पर्यार्थको देनेवाला मानते हैं, मैं माँगूँगा ॥ ३२ ॥
विभु शम्भुसे परे कोई तत्त्व नहीं ३३ कारणोंके कारण और गुणोंसे सर्वथा उन्हींसे वर सांख्ययोगके उन्हींसे वर है । वे सभी परे हैं, अतः ब्रह्मा - विष्णु आदि देवोंसे श्रेष्ठ हैं ॥ ३३ ॥
मैं न तो आपसे, न विष्णुजीसे, न ब्रह्माजीसे और ३४ न अन्य किसी देवतासे वर माँगता हूँ, शंकरजी ही मुझे वर प्रदान करेंगे ॥ ३४ ॥
बहुत कहनेसे क्या लाभ? मैं अपना निश्चय ३५ बता रहा हूँ कि मैं पशुपति शिवजीको छोड़कर किसी अन्य देवतासे वरदान नहीं माँगूँगा ॥ ३५ ॥
हे इन्द्र! आप मेरा अभिप्राय सुनें । मैंने आज यह ३६ | अनुमान कर लिया है कि मैंने जन्मान्तरमें अवश्य कोई पाप किया है, जिससे मुझे शिवजीकी निन्दा सुननी पड़ी ॥३६ ॥
शिवकी निन्दाका श्रवण करते ही जो शीघ्र उस ३७ निन्दा करनेवालेका प्रतिकारकर उसी समय अपना शरीर छोड़ देता है, वह शिवलोकको जाता है ॥ ३७ ॥
। हे सुराधम! अब दूधके विषयमें मेरी यह इच्छा ॥ ३८ नहीं रही, [ अब तो मैं ] शिवास्त्रसे तुम्हारा वधकर अपना यह शरीर त्याग दूँगा ॥३८ ॥
नन्दीश्वर बोले- इस प्रकार कहकर उपमन्यु । मरनेके लिये तैयार हो गये और दूधके प्रति भी इच्छाका ॥ ३ ९ । त्यागकर इन्द्रको मारनेके लिये उद्यत हो गये ॥ ३ ९ ॥
पृष्ठ 160
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
१४८ भस्मादाय तदाधारादघोरास्त्राभिमन्त्रितम् विसृज्य शक्रमुद्दिश्य ननाद स मुनिस्तदा स्मृत्वा स्वेष्टपदद्वन्द्वं स्वदेहं दग्धुमुद्यतः आग्नेयीं धारणां बिभ्रदुपमन्युरवस्थितः एवं व्यवसिते विप्रे भगवान् शक्ररूपवान् वारयामास सौम्येन धारणां तस्य योगिनः
तद्विसृष्टमघोरास्त्रं नन्दीश्वरनियोगतः ।
जगृहे मध्यतः क्षिप्तं नन्दी शङ्करवल्लभम् ॥
स्वरूपमेव भगवानास्थाय परमेश्वरः । श्रीशिवमहापुराण [ अ ० ३२ । तब अग्निहोत्रसे भस्म लेकर उसे अघोरास्त्रसे ॥ ४० अभिमन्त्रित करके इन्द्रके ऊपर उस भस्मको छोड़कर उन मुनिने घोर शब्द किया ॥ ४० ॥
1 उसके बाद अपने इष्टदेवके चरणयुगलका ॥ ४१ स्मरणकर अपने शरीरको जलानेहेतु अग्निकी धारणा करते हुए उपमन्यु स्थित हो गये ॥४१ ॥
ब्राह्मण उपमन्युके इतना कर लेनेपर शक्ररूपधारी । ॥ ४२ शिवजीने सौम्य [ तेज ] के द्वारा उस महायोगीकी आग्नेयी धारणाको रोक दिया ॥ ४२ ॥
उनके द्वारा फेंके गये उस शंकरप्रिय अघोरास्त्रको ४३ शिवजीके आदेशसे नन्दीने बीचमें ही पकड़ लिया ॥ ४३ ॥
तदनन्तर भगवान् परमेश्वरने उन ब्राह्मणके समक्ष दर्शयामास विप्राय बालेन्दुकृतशेखरम् ॥४४ मस्तकपर द्वितीयाका चन्द्र धारण किया हुआ अपना
क्षीरार्णवसहस्त्रं च दध्यादेरर्णवं तथा ।
भक्ष्यभोज्यार्णवं तस्मै दर्शयामास स प्रभुः ॥
एवं स ददृशे शम्भुर्देव्या सार्धं वृषोपरि ।
गणेश्वरैस्त्रिशूलाद्यैर्दिव्यास्त्रैरपि संवृतः ॥
दिवि दुन्दुभयो नेदुः पुष्पवृष्टिः पपात ह ।
विष्णुब्रह्मेन्द्रप्रमुखैर्देवैश्छन्ना दिशो दश ॥
अथोपमन्युरानन्दसमुद्रोर्मिभिरावृतः पपात दण्डवद्भूमौ भक्तिनम्रेण चेतसा ॥
एतस्मिन्समये तत्र सस्मितो भगवान्भवः ।
एह्येहीति समाहूय मूर्म्याघ्राय ददौ वरान् ॥
शिव उवाच
वत्सोपमन्यो तुष्टोऽस्मि त्वदाचरणतो वरात् ।
दृढभक्तोऽसि विप्रर्षे मया जिज्ञासितोऽधुना ॥
भक्ष्यभोगान्यथाकामं बान्धवैर्भुङ्क्ष्व सर्वदा ।
सुखी भव सदा दुःखनिर्मुक्तो भक्तिमान्मम ॥
स्वरूप प्रकट किया ॥ ४४ ॥
सर्वसमर्थ उन प्रभुने हजारों दूधके, हजारों दही ४५ आदिके तथा हजारों अन्य भक्ष्य - भोज्य पदार्थोंके समुद्र उन्हें दिखाये । इसी प्रकार उन शम्भुने देवी पार्वतीके साथ बैलपर सवार हो त्रिशूल आदि आयुधोंको हाथमें ४६ धारण किये हुए गणोंके सहित अपना रूप भी उनके
समक्ष प्रकट किया ॥। ४५-४६ ॥
उस समय स्वर्गलोकमें दुन्दुभियाँ बजने लगीं, ४७ आकाशसे फूलोंकी वर्षा होने लगी तथा ब्रह्मा, विष्णु आदि देवगणों [ की उपस्थिति ] -से दसों दिशाएँ ढँक गयीं । इसके बाद उपमन्यु आनन्दसागरसे उठी हुई ४८ लहरोंसे मानो घिर - से गये और भक्तिसे विनम्रचित्त हो शिवजीको दण्डवत् प्रणाम करने लगे ॥ ४७-४८ ॥ इसी समय भगवान् शिवजीने मुसकराकर उपमन्युको ४ ९ ' आओ आओ ' इस प्रकार बुलाकर उनका मस्तक सूँघकर उन्हें वर प्रदान किये ॥४ ९ ॥ शिवजी बोले- हे वत्स! हे उपमन्यो! मैं तुम्हारे इस श्रेष्ठ आचरणसे प्रसन्न हूँ । विप्रर्षे! अब ५० मैंने परीक्षा कर ली कि तुम हमारे दृढ़ भक्त हो ॥ ५० ॥
तुम्हारी मुझमें इसी प्रकारकी भक्ति बनी रहेगी । तुम्हारे सभी दुःख दूर हो जायँगे और तुम सदा सुखी रहोगे । अब तुम सर्वदा अपने भाई - बन्धुओंसहित ५१ स्वेच्छापूर्वक भक्ष्यादि भोगोंका भोग करो ॥५१ ॥