शिव महापुराण - २ — पृष्ठ 191–200
शिव महापुराण - २ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 191–200
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अ ० ३ ९ ] शिव उवाच स्वस्थानं गच्छत सुराः सर्वे सत्यं न संशयः सर्वथाहं करिष्यामि कार्यं वो नात्र संशयः नन्दीश्वर उवाच तच्छ्रुत्वा शम्भुवचनं निश्चयं परमं गताः परावृत्य गताः सर्वे स्वस्थानं ते हि निर्जराः एतस्मिन्नन्तरे दैत्यो मूकनामागतस्तदा सौकरं रूपमास्थाय प्रेषितश्च दुरात्मना दुर्योधनेन विप्रेन्द्र मायिना चार्जुनं तदा यत्रार्जुनः स्थितश्चासीत्तेन मार्गेण वै तदा शृङ्गाणि पर्वतस्यैव च्छिन्दन्वृक्षाननेकशः शब्दं च विविधं कुर्वन्नतिवेगेन संयुतः अर्जुनोऽपि च तं दृष्ट्वा मूकनामासुरं तदा स्मृत्वा शिवपदाम्भोजं विचारे तत्परोऽभवत् अर्जुन उवाच कोऽयं वा कुत आयाति क्रूरकर्मा च दृश्यते शतरुद्रसंहिता १७ ९ शिवजी बोले- हे देवताओ! आप लोगोंकी । बात निःसन्देह सत्य है । अब आपलोग अपने - अपने ॥ ८ स्थानको जाइये; मैं आपलोगोंका कार्य सर्वथा करूँगा; इसमें संशय नहीं है ॥ ८ ॥
। नन्दीश्वर बोले- शिवजीका यह वचन सुनकर देवताओंको पूर्ण विश्वास हो गया और वहाँसे ॥ ९ लौटकर वे अपने - अपने स्थानको चले गये॥९॥
। हे विप्रेन्द्र! इसी बीच दुरात्मा तथा मायावी ॥ १० दुर्योधनके द्वारा अर्जुनके प्रति भेजा गया मूक नामक । दैत्य शूकरका रूप धारणकर वहाँ आया, जहाँ अर्जुन ॥ ११ स्थित थे । वह पर्वतोंके शिखरोंको तोड़ता हुआ, अनेक वृक्षोंको उखाड़ता हुआ तथा विविध प्रकारके । शब्द करता हुआ बड़े वेगसे उसी मार्गसे जा रहा ॥ १२ था ॥ १०–१२ ॥ । उस समय अर्जुन भी मूक नामक दैत्यको ॥ १३ देखकर शिवके चरणकमलोंका स्मरणकर [ अपने मनमें ] विचार करने लगे ॥१३ ॥
अर्जुन बोले- यह कौन है? कहाँसे आ रहा । है? यह तो बड़ा क्रूर कर्म करनेवाला दिखायी दे रहा ममानिष्टं ध्रुवं कर्तुं समागच्छत्यसंशयम् ॥ १४ है! निश्चय ही यह मेरा अनिष्ट करनेके लिये मेरी ममैवं मन आयाति शत्रुरेव न संशयः मया विनिहताः पूर्वमनेके दैत्यदानवाः तदीयः कश्चिदायाति वैरं साधयितुं पुनः अथवा च सखा कश्चिद् दुर्योधनहितावहः यस्मिन्दृष्टे प्रसीदेत्स्वं मनः स हितकृद् ध्रुवम् यस्मिन्दृष्टे तदेव स्यादाकुलं शत्रुरेव सः आचारः कुलमाख्याति वपुराख्याति भोजनम् वचनं श्रुतमाख्याति स्नेहमाख्याति लोचनम् आकारेण तथा गत्या चेष्टया भाषितैरपि नेत्रवक्त्रविकाराभ्यां ज्ञायतेऽन्तर्हितं मनः उज्ज्वलं सरसं चैव वक्रमारक्तकं तथा नेत्रं चतुर्विधं प्रोक्तं तस्य भावं पृथग्बुधाः ओर आ रहा है ॥ १४ ॥
। मेरे मनमें तो यह आ रहा है कि यह शत्रु ही है; ॥ १५ इसमें सन्देह नहीं है । मैंने इससे पूर्व अनेक दैत्य-दानवोंका संहार किया है । उन्हींका कोई सम्बन्धी अपना । वैर साधनेके लिये [ मेरी ओर ] आ रहा है अथवा यह ॥ १६ दुर्योधनका कोई हितकारी मित्र है ॥ १५-१६ ॥ । जिसके देखनेसे अपना मन प्रसन्न हो, वह ॥ १७ निश्चय ही हितैषी होता है और जिसके देखनेसे मनमें व्याकुलता उत्पन्न हो, वह अवश्य ही शत्रु होता है ॥ सदाचारसे कुलका, शरीरसे भोजनका, वचनके द्वारा ॥ १८ शास्त्रज्ञानका तथा नेत्रके द्वारा स्नेहका पता लग जाता है ॥ १७-१८ ॥ । आकार, गति, चेष्टा, सम्भाषण एवं नेत्र तथा ॥ १ ९ मुखके विकारसे मनुष्यके अन्तःकरणकी बात ज्ञात हो जाती है । उज्ज्वल, सरस, टेढ़ा और लाल -— ये चार । प्रकारके नेत्र कहे गये हैं; विद्वानोंने उनका पृथक्-|| २० | पृथक् भाव बताया है ॥ १ ९ -२० ॥
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१८० श्रीशिवमहापुराण [ अ ० ३ ९ उज्ज्वलं मित्रसंयोगे सरसं पुत्रदर्शने । • मित्रके मिलनेपर उज्ज्वल, पुत्रको देखनेपर वक्रं च कामिनीयोगे आरक्तं शत्रुदर्शने ॥ २१ स्त्रीके मिलनेपर वक्र तथा शत्रुके देखनेपर नेत्र लाल सरस से,, । जाते हैं । किंतु इसे देखनेपर तो मेरी सारी इन्द्रियाँ कलुषित अस्मिन्मम तु सर्वाणि कलुषानीन्द्रियाणि च । हो गयी हैं । अतः यह अवश्य ही मेरा शत्रु है अयं शत्रुर्भवेदेव मारणीयो न संशयः ॥ २२ | वध कर देना चाहिये; इसमें सन्देह नहीं है । २१-२२ , इसका गुरोश्च वचनं मेऽद्य वर्तते दुःखदस्त्वया । मेरे गुरुका यह कथन भी है- हे राजन्! तुम ॥ हन्तव्यः सर्वथा राजन्नात्र कार्या विचारणा एतदर्थं त्वायुधानि मम चैव न संशयः विचार्येति च तत्रैव बाणं संस्थाय संस्थितः एतस्मिन्नन्तरे तत्र रक्षार्थं ह्यर्जुनस्य वै तद्भक्तेश्च परीक्षार्थं शङ्करो भक्तवत्सलः विदग्धभिल्लरूपं हि गणैः सार्धं महाद्भुतम् तस्य दैत्यस्य नाशार्थं द्रुतं कृत्वा समागतः बद्धकच्छश्च वल्लीभिर्बद्ध्वा केशान् हरस्तदा शरीरे श्वेतरेखाश्च धनुर्बाणयुतः स्वयम्
बाणानां तूणकं पृष्ठे धृत्वा वै स जगाम ह ।
गणश्चैव तथा जातो भिल्लराजोऽभवच्छिवः ॥
शब्दांश्च विविधान्कृत्वा निर्ययौ वाहिनीपतिः ।
सूकरस्य ससाराथ शब्दश्च प्रदिशो दश ॥
वनेचरेण शब्देन व्याकुलश्चार्जुनस्तदा ।
पर्वताद्याश्च तैः शब्दैस्ते सर्वे व्याकुलास्तदा ॥
अहो किन्नु भवेदेष शिवः शुभकरस्त्विह ।
मया चैव श्रुतं पूर्वं कृष्णेन कथितं पुनः ॥
व्यासेन कथितं चैव स्मृत्वा देवैस्तथा पुनः ।
शिवः शुभकरः प्रोक्तः शिवः सुखकरस्तथा ॥
मुक्तिदश्च स्वयं प्रोक्तो मुक्तिदानान्न संशयः ।
तन्नामस्मरणात्पुंसां कल्याणं जायते ध्रुवम् ॥
भजतां सर्वभावेन दुःखं स्वप्नेऽपि नो भवेत् । ॥ २३ । दुःख देनेवालेका सर्वथा वध कर देना, इसमें विचार नहीं करना चाहिये । निस्सन्देह इसीलिये तो ये । भी हैं । इस प्रकार विचारकर अर्जुन [ धनुषपर ] आयुध बाण ॥ २४ चढ़ाकर खड़े हो गये ॥ २३-२४ ॥ । इसी बीच अर्जुनकी रक्षाके लिये एवं उनकी ॥ २५ भक्तिकी परीक्षा करनेके लिये भक्तवत्सल भगवान् । शंकर अपने गणोंके सहित अत्यन्त अद्भुत सुशिक्षित ॥ २६ भीलका रूप धारणकर उस दैत्यका विनाश करनेके । लिये शीघ्र ही वहाँ आ पहुँचे । कच्छ ( लाँग - काछ ) लगाये हुए, लताओंसे अपने केशोंको बाँधे हुए, ॥ २७ शरीरपर श्वेत वर्णकी रेखा अंकित किये हुए, धनुष-बाण धारण किये हुए तथा पीठपर बाणोंका तरकस २८ धारण किये हुए वे गणोंसहित वहाँ गये । वे शिवजी भीलराज बने हुए थे ॥ २५–२८ ॥ वे शिवजी भील सेनाके अधिपति होकर कोलाहल २ ९ करते हुए निकले, उसी समय शूकरके गरजनेकी ध्वनि दसों दिशाओंमें सुनायी पड़ी ॥२ ९ ॥ तब उस वनचारी शूकरके [ घोर घर्घर ] शब्दसे ३० अर्जुन व्याकुल हो गये, साथ ही जो पर्वत आदि थे, वे सभी उन शब्दोंसे व्याकुल हो उठे ॥ ३० ॥
अहो! यह क्या है? कहीं ये कल्याणकारी शिवजी ३१ ही तो नहीं हैं, जो यहाँ पधारे हैं; क्योंकि मैंने ऐसा पूर्वमें सुना था, श्रीकृष्णने भी मुझसे कहा था, व्यासजीने भी ऐसा ही कहा था और देवगणोंने भी स्मरणकर यही ३२ बात कही थी कि शिवजी ही सभी प्रकारका मंगल करनेवाले तथा सुख देनेवाले कहे गये हैं ॥ ३१-३२ ॥ वे मुक्ति देनेके कारण मुक्तिदाता कहे गये ३३ हैं; इसमें सन्देह नहीं है । उनके नामस्मरणमात्रसे निश्चितरूपसे मनुष्योंका कल्याण होता है । सब प्रकारसे इनका भजन करनेवालोंको स्वप्नमें भी दुःख । नहीं होता है । यदि कभी होता है तो उसे कर्मजन्य यदा कदाचिज्जायेत तदा कर्मसमुद्भवम् ॥ ३४ । समझना चाहिये ॥ ३३-३४ ॥,
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अ ० ३ ९ ]
भावितद्बह्वपि ज्ञेयं नूनमल्पं न संशयः ।
प्रारब्धस्याथ वा दोषो नूनं ज्ञेयो विशेषतः ॥
अथवा बहु चाल्पं हि भोग्यं निस्तीर्यं शङ्करः ।
कदाचिदिच्छया तस्य दूरीकुर्यान्न संशयः ॥
विषं चैवामृतं कुर्यादमृतं विषमेव वा ।
यदिच्छति करोत्येव समर्थः किन्निषिध्यते ॥
इत्थं विचार्यमाणेऽपि भक्तैरन्यैः पुरातनैः ।
भाविभिश्च सदा भक्तैरिहानीय मनः स्थिरम् ॥
लक्ष्मीर्गच्छेच्चावतिष्ठेन्मरणं निकटे पुरः ।
निन्दां वाथ प्रकुर्वन्तु स्तुतिं वा दुःखसंक्षयम् ॥
जायते पुण्यपापाभ्यां शङ्करः सुखदः सदा ।
कदाचिच्च परीक्षार्थं दुःखं यच्छति वै शिवः ॥
अन्ते च सुखदः प्रोक्तो दयालुत्वान्न संशयः ।
यथा चैव सुवर्णं च शोधितं शुद्धतां व्रजेत् ॥
एवं चैव मया पूर्वं श्रुतं मुनिमुखात्तथा ।
अतस्तद्भजनेनैव लप्स्येऽहं सुखमुत्तमम् ॥
इत्येवं तु विचारं स करोति यावदेव हि । तावच्च सूकरः प्राप्तो बाणसंमोचनावधिः
शिवोऽपि पृष्ठतो लग्नो ह्यायातः शूकरस्य हि ।
तयोर्मध्ये तदा सोऽयं दृश्यते शृङ्गमद्भुतम् ॥
तस्य प्रोक्तं च माहात्म्यं शिवः शीघ्रतरं गतः । अर्जुनस्य च रक्षार्थं शङ्करो भक्तवत्सलः शतरुद्रसंहिता १८१ [ शिवजीके अनुग्रहसे तो ] प्रबल होनहार भी ३५ अवश्य कम हो जाता है - ऐसा जानना चाहिये; इसमें | सन्देह नहीं है अथवा विशेषरूपसे प्रारब्धका दोष समझना चाहिये और शिवजी स्वयं अपनी इच्छासे ३६ कभी बहुत अथवा कम उस भोगको भुगताकर उस | दुर्भोग्यका निवारण करते हैं, इसमें संशय नहीं है ॥ ३५-३६ ॥ वे विषको अमृत एवं अमृतको विष बना देते ३७ हैं । वे समर्थ हैं, जैसा चाहते हैं, वैसा करते हैं, भला! उन सर्वसमर्थको कौन मना कर सकता है? अन्य पुरातन भक्तोंके द्वारा इस प्रकार विचार किये जानेके ३८ कारण भावी भक्तोंको भी सदा शिवजीमें अपना मन स्थिर रखना चाहिये ॥ ३७-३८ ॥ लक्ष्मी रहे या चली जाय, मृत्यु भले ही ३ ९ सन्निकट और समक्ष खड़ी हो, लोग निन्दा करें अथवा स्तुति करें, [ दुःख बना रहे या ] दुःखनाश हो जाय [ यह इष्ट - अनिष्टात्मक द्वन्द्व तो ] पुण्य तथा ४० | पापके कारण उत्पन्न होता है, [ इसमें शिव निमित्त नहीं हैं ] वे तो सर्वदा अपने भक्तोंको सुख ही देते हैं । कभी - कभी वे अपने भक्तोंकी परीक्षा करनेके लिये उनको दुःख भी देते हैं; किंतु दयालु होनेके कारण ४१ वे अन्तमें सुख देनेवाले ही होते हैं । जैसे सुवर्ण अग्निमें तपानेपर शुद्ध होता है, उसी प्रकार भक्त भी तपानेसे निखरते हैं ॥ ३ ९ –४१ ॥ पूर्वकालमें मैंने मुनियोंके मुखसे ऐसा ही सुना ४२ है, इसलिये मैं उनके भजनसे ही उत्तम सुख प्राप्त करूँगा, जबतक अर्जुन इस प्रकारका विचार कर ही रहे थे, तबतक शरसन्धानका लक्ष्य वह शूकर वहाँ ॥ ४३ आ पहुँचा । उधर, [ भीलवेषधारी ] शिवजी भी शूकरका पीछा करते हुए आ पहुँचे । उस समय उन ४४ दोनोंके बीचमें वह शूकर अद्भुत शिखरके समान दिखायी पड़ रहा था॥४२–४४ ॥ अर्जुनने शिवका माहात्म्य कहा था, इसलिये भक्तवत्सल शिव उनकी रक्षा करनेके लिये वहाँ पहुँच ॥ ४५ | गये ॥ ४५ ॥
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१८२ एतस्मिन्समये ताभ्यां कृतं बाणविमोचनम् शिवबाणस्तु पुच्छे वै ह्यर्जुनस्य मुखे तथा शिवस्य पुच्छतो गत्वा मुखान्निस्सृत्य शीघ्रतः भूमौ विलीनः संयातस्तस्य वै पुच्छतो गतः पपात पार्श्वतश्चैव बाणश्चैवार्जुनस्य च सूकरस्तत्क्षणं दैत्यो मृतो भूमौ पपात ह देवा हर्षं परं प्रापुः पुष्पवृष्टिं च चक्रिरे जयपूर्वं स्तुतिकराः प्रणम्य च पुनः पुनः शिवस्तुष्टमना आसीदर्जुनः सुखमागतः दैत्यस्य च तदा दृष्ट्वा क्रूरं रूपं च तौ तदा
अर्जुनस्तु विशेषेण सुखिना प्राह चेतसा ।
अहो दैत्यवरश्चायं रूपं तु परमाद्भुतम् ॥
कृत्वागतो मद्वधार्थं शिवेनाहं सुरक्षितः ।
ईश्वरेण ममाद्यैव बुद्धिर्दत्ता न संशयः ॥
विचार्येत्यर्जुनस्तत्र जगौ शिव शिवेति च ।
प्रणनाम शिवं भूयस्तुष्टाव च पुनः पुनः ॥
श्रीशिवमहापुराण [ अ ० ४० । इसी समय उन दोनोंने बाण चलाया; शिवजीका ॥ ४६ बाण शूकरकी पूँछमें तथा अर्जुनका बाण मुखमें । । लगा । शिवजीका बाण पूछमें घुसकर मुखसे निकलकर ॥ ४७ शीघ्र ही पृथ्वीमें विलीन गया और अर्जुनका बाण [ मुखमें प्रविष्ट होकर ] पूँछसे निकलकर पार्श्वभाग में । । गिर पड़ा । वह शूकररूप दैत्य उसी क्षण मरकर ॥ ४८ पृथ्वीपर गिर पड़ा॥४६–४८ ॥ । देवता परम हर्षित हो गये और पुष्पवृष्टि करने ॥ ४ ९ लगे । उन्होंने बार - बार प्रणामकर जय - जयकार करते हुए शिवजीकी स्तुति की ॥ ४ ९ ॥ । उस दैत्यके क्रूर रूपको देखकर शिवजी ॥ ५० प्रसन्नचित्त हो गये और अर्जुनको भी सुख प्राप्त हुआ । तब अर्जुनने विशेषरूपसे प्रसन्न मनसे कहा-५१ अरे, यह महादैत्य अत्यन्त अद्भुत रूप धारणकर मेरे वधके लिये आया था, किंतु शिवजीने मेरी रक्षा की । ५२ शिवजीने ही आज मुझे बुद्धि प्रदान की; इसमें सन्देह नहीं है॥५०–५२ ॥ ऐसा विचारकर अर्जुनने ' शिव - शिव ' कहकर उनका यशोगान किया और उन्हें प्रणाम किया तथा ५३ । बार - बार उनकी स्तुति की ॥ ५३ ॥
इति श्रीशिवमहापुराणे तृतीयायां शतरुद्रसंहितायां किरातावतारवर्णने मूकदैत्यवधो नामैकोनचत्वारिंशोऽध्यायः ॥ ३ ९ ॥ ॥। इस प्रकार श्रीशिवमहापुराणके अन्तर्गत तृतीय शतरुद्रसंहिताके किरातावतारवर्णनमें मूकदैत्यवध नामक उनतालीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ३ ९ ॥ अथ चत्वारिंशोऽध्यायः भीलस्वरूप गणेश्वर नन्दीश्वर उवाच
सनत्कुमार सर्वज्ञ शृणु लीलां परात्मनः ।
भक्तवात्सल्यसंयुक्तां तद् दृढत्वविदर्भिताम् ॥
शिवोऽप्यथ स्वभृत्यं वै प्रेषयामास स द्रुतम् ।
बाणार्थं च तदा तत्रार्जुनोऽपि समगात्ततः ॥
एकस्मिन् समये प्राप्तौ बाणार्थं तद्गणार्जुनौ ।
अर्जुनस्तं पराभर्त्स्य स्वबाणं चाग्रहीत्तदा ॥
एवं तपस्वी अर्जुनका संवाद नन्दिकेश्वर बोले — हे सनत्कुमार! हे सर्वज्ञ! अब परमात्मा शिवकी भक्तवत्सलतासे युक्त तथा १ उनकी दृढ़ भक्तिसे भरी हुई लीला सुनिये ॥१ ॥
उसके बाद उन शिवजीने अपना बाण लानेके लिये शीघ्र ही अपने सेवकको वहाँ भेजा और उसी २ समय अर्जुन भी अपना बाण लेनेके लिये वहाँ पहुँचे । एक ही समय शिवका गण तथा अर्जुन बाण लेने हेतु | वहाँ उपस्थित हुए, तब अर्जुनने उसे धमकाकर अपना ३ बाण ले लिया ॥ २-३ ॥
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अ ० ४० ]
गणः प्रोवाच तं तत्र किमर्थं गृह्यते शरः ।
बाणश्चैवास्मदीयो वै मुच्यतां ऋषिसत्तम ॥
इत्युक्तस्तेन भिल्लस्य गणेन मुनिसत्तम ।
सोऽर्जुनः शङ्करं स्मृत्वा वचनं च तमब्रवीत् ॥
अर्जुन उवाच अज्ञात्वा किं च वदसि मूर्खोऽसि त्वं वनेचर । बाणश्च मोचितो मेऽद्य त्वदीयश्च कथं पुनः रेखारूपं च पिच्छानि मन्नामाङ्कित एव च । त्वदीयश्च कथं जातः स्वभावो दुस्त्यजस्तव नन्दीश्वर उवाच इत्येवं तद्वचः श्रुत्वा विहस्य स गणेश्वरः अर्जुनं ऋषिरूपं तं भिल्लो वाक्यमुपाददे तापस श्रूयतां रे त्वं न तपः क्रियते त्वया वेषतश्च तपस्वी त्वं न यथार्थं छलायते तपस्वी च कथं मिथ्या भाषणं कुरुते नरः नैकाकिनं च मां त्वं च जानीहि वाहिनीपतिम् ॥ बहुभिर्वनभिल्लैश्च युक्तः स्वामी स आसते समर्थः सर्वथा कर्तुं विग्रहानुग्रहौ पुनः वर्तते तस्य बाणोऽयं यो नीतश्च त्वयाधुना अयं बाणश्च ते पार्श्वे न स्थास्यति कदाचन तपःफलं कथं त्वं च हातुमिच्छसि तापस चौर्याच्छलादर्द्यमानाद् विस्मयात्सत्यभञ्जनात् तपसा क्षीयते सत्यमेतदेव मया श्रुतम् तस्माच्च तपसस्तेऽद्य भविष्यति फलं कुतः तस्मादमुक्तबाणो हि कृतघ्नस्त्वं भविष्यसि ममैव स्वामिना बाणस्तवार्थे मोचितो ध्रुवम् शत्रुश्च मारितस्तेन पुनर्बाणश्च रक्षितः अत्यन्तं च कृतघ्नोऽसि तपोऽशुभकरस्तथा शतरुद्रसंहिता १८३ तब शिवजीका गण उनसे कहने लगा- हे ४ मुनिसत्तम! यह बाण मेरा है, आप इसे क्यों ले रहे । हैं, आप इसे छोड़ दीजिये । हे मुनिश्रेष्ठ! भीलराजके उस गणद्वारा इस प्रकार कहे जानेपर उन अर्जुनने ५ शिवजीका स्मरण करके उससे कहा- ॥ ४-५ ॥ अर्जुन बोले - हे वनेचर! बिना जाने तुम ऐसा क्यों बोल रहे हो? तुम मूर्ख हो; यह बाण अभी मैंने ॥ ६ चलाया था, फिर यह तुम्हारा किस प्रकार हो सकता है? इस बाणके पिच्छ रेखाओंसे चित्रित हैं तथा इसमें मेरा नाम अंकित है । यह तुम्हारा कैसे हो गया? ॥ ७ निश्चय ही तुम्हारा [ यह हठी ] स्वभाव कठिनाईसे छूटनेवाला है॥६-७ ॥ नन्दीश्वर बोले – उनकी यह बात सुनकर । गणेश्वर उस भीलने महर्षिरूपधारी उन अर्जुनसे यह ॥ ८ वचन कहा — अरे तपस्वी! सुनो, तुम तप नहीं कर रहे । हो, तुम केवल वेषसे तपस्वी हो, यथार्थरूपमें ॥ ९ [ तपोनिरत व्यक्ति ] छल नहीं करते ॥८ - ९ ॥ । तपस्वी व्यक्ति असत्य भाषण कैसे कर सकता १० है? तुम मुझ सेनापतिको यहाँ अकेला मत समझो ॥ १० ॥
। मेरे स्वामी भी वनके बहुत - से भीलोंके साथ यहाँ विद्यमान हैं । वे विग्रह तथा अनुग्रह करनेमें सब ॥ ११ प्रकारसे समर्थ भी हैं । इस समय जिस बाणको तुमने । लिया है, वह उनका ही है, तुम इस बातको अच्छी ॥ १२ तरह जान लो कि यह बाण तुम्हारे पास कभी नहीं रहेगा ॥ ११-१२ ॥ । हे तापस! [ तुम असत्य बोलकर ] अपनी ॥ १३ तपस्याका फल क्यों नष्ट कर रहे हो, क्योंकि चोरीसे, छलसे, किसीको व्यथित करनेसे, अहंकारसे तथा । सत्यको छोड़नेसे व्यक्ति अपनी तपस्यासे रहित हो ॥ १४ जाता है । यह बात मैंने यथार्थ रूपसे सुनी है; तब तुम्हें इस तपस्याका फल कैसे मिलेगा? ॥ १३-१४ ॥ । इसलिये यदि तुम बाणका त्याग नहीं करोगे, तो ॥ १५ कृतघ्न कहे जाओगे; क्योंकि मेरे स्वामीने निश्चितरूपसे तुम्हारी ही रक्षाके लिये यह बाण [ शूकरपर ] चलाया था । उन्होंने तुम्हारे ही शत्रुको मारा है और तुमने । उनके बाणको रख लिया; अतः तुम अति कृतघ्न हो, ॥ १६ । तुम्हारी यह तपस्या अशुभ करनेवाली है ॥ १५-१६ ॥
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१८४ श्रीशिवमहापुराण [ अ ० ४० सत्यं न भाषसे त्वं च किमतः सिद्धिमिच्छसि । जब तुम [ तपस्यामें निरत हो ] सत्यभाषण नहीं प्रयोजनं चेद् बाणेन स्वामी च याच्यतां मम ॥ १७ कर रहे हो, तब तुम इस तपसे सिद्धिकी अपेक्षा कैस
ईदृशांश्च बहून्बाणांस्तदा दातुं क्षमः स्वयम् ।
राजा च वर्तते मेऽद्य किं त्वेवं याच्यते त्वया ॥ १८
उपकारं परित्यज्य ह्यपकारं समीहसे ।
नैतद्युक्तं त्वयाद्यैव क्रियते त्यज चापलम् ॥ १ ९
नन्दीश्वर उवाच
इत्येवं वचनं तस्य श्रुत्वा पार्थोऽर्जुनस्तदा ।
क्रोधं कृत्वा शिवं स्मृत्वा मितं वाक्यमथाब्रवीत् ॥ २०
अर्जुन उवाच
शृणु भिल्ल प्रवक्ष्यामि न सत्यं तव भाषणम् ।
यथा जातिस्तथा त्वां च जानामि हि वनेचर ॥ २ ९
अहं राजा भवान् चौरः कथं युद्धप्रयुक्तता ।
युद्धं मे सबलैः कार्यं नाधमैर्हि कदाचन ॥ २२
तस्मात्ते च तथा स्वामी भविष्यति भवादृशः ।
दातारश्च वयं प्रोक्ताश्चौरा यूयं वनेचराः ॥ २३
कथं याच्यो मया भिल्लराज एवं च साम्प्रतम् ।
त्वमेव याचसे नैव बाणं मां किं वनेचर ॥ २४
ददामि ते तथा बाणान् सन्ति मे बहवो ध्रुवम् ।
राजा च ग्रहणं चैव न दास्यति तथा भवेत् ॥ २५
किं पुनश्च तथा बाणान्प्रयच्छामि वनेचर ।
यदि मे या चिकीर्षा स्यात्कथं नागम्यतेऽधुना ॥ २६
यथागच्छेत्तु ते भर्ता किमर्थं भाषतेऽधुना ।
आगत्य च मया सार्धं जित्वा युद्धे च मां पुनः ॥ २७
नीत्वा बाणमिमं भिल्लस्वामी ते वाहिनीपतिः ।
निजालयं सुखं यातु विलम्बः क्रियते कथम् ॥ २८
नन्दीश्वर उवाच | रखते हो? यदि तुम्हें बाणकी आवश्यकता हो तो स्वामीसे माँग लो ॥१७ ॥, मेरे
वे ऐसे बहुत - से बाण देनेमें समर्थ हैं । वे हमारे राजा हैं, फिर तुम उनसे क्यों नहीं माँग लेते हो? तुम्हें तो उनका उपकार मानना चाहिये, उलटे | अपकार कर रहे हो, इस समय तुम्हारा ऐसा व्यवहार उचित प्रतीत नहीं होता, तुम इस चपलताका त्याग करो ॥ १८-१९ ॥ नन्दीश्वर बोले— तब उसकी यह बात सुनकर | पृथापुत्र अर्जुन क्रोध करके पुनः शिवजीका स्मरण करते हुए मर्यादित वाक्य कहने लगे —॥२० ॥
अर्जुन बोले — हे भील! मैं जो कहता हूँ, तुम उसे सुनो । हे वनेचर! जैसी तुम्हारी जाति है और जैसे तुम हो, मैं उसे [ अच्छी तरह ] जानता हूँ ॥ २१ ॥
मैं राजा हूँ और तुम चोर हो । दोनोंका युद्ध किस प्रकार उचित होगा? मैं बलवानोंसे युद्ध करता हूँ, अधमोंसे कभी नहीं । इसलिये तुम्हारा स्वामी भी तुम्हारे समान ही होगा । देनेवाले तो हम कहे गये हैं, तुम वनेचर तो चोर हो । मैं भीलराजसे किस प्रकार अयुक्त याचना कर सकता हूँ; हे वनेचर! तुम्हीं मुझसे बाण क्यों नहीं माँग लेते हो? ॥२२–२४ ॥ मैं वैसे बहुत - से बाण तुम्हें दे सकता हूँ, मेरे पास बहुत - से बाण हैं । राजा होकर किससे याचना करे अथवा माँगनेपर न दे, तो कैसा राजा? ॥ २५ ॥
हे वनेचर! मैं क्या कहूँ? मैं बहुत - से ऐसे बाण दे सकता हूँ; यदि तुम्हारे स्वामीको मेरे बाणोंकी अपेक्षा है तो वह आकर मुझसे क्यों नहीं माँगता? ॥ २६ ॥
तुम्हारा स्वामी यहाँ आये, वहाँसे क्यों बकवास कर रहा है? यहाँ आकर मेरे साथ युद्ध करे और मुझे युद्धमें पराजित करके तुम्हारा सेनापति भीलराज इस बाणको लेकर सुखसे अपने घर चला जाय, वह देर क्यों कर रहा है? ॥ २७-२८ ॥ नन्दीश्वर बोले- महेश्वरकी कृपासे उत्तम महेश्वरकृपाप्राप्तसद्बलस्यार्जुनस्य हि । | बल प्राप्त किये हुए अर्जुनकी इस प्रकारकी बात
इत्येतद्वचनं श्रुत्वा भिल्लो वाक्यमथाब्रवीत् ॥ २ ९ । सुनकर उस भीलने कहा— ॥ २ ९ ॥
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अ ० ४० ] भिल्ल उवाच
अज्ञोऽसि त्वं ऋषिर्नासि मरणं त्वीहसे कथम् ।
देहि बाणं सुखं तिष्ठ त्वन्यथा क्लेशभाग्भवेः ॥
नन्दीश्वर उवाच
इत्युक्तस्तेन भिल्लेन शिवसच्छक्तिशोभिना ।
गणेन पाण्डवस्तं च प्राह स्मृत्वा च शङ्करम् ॥
अर्जुन उवाच
मद्वाक्यं तत्त्वतो भिल्ल शृणु त्वं च वनेचर ।
आगमिष्यति ते स्वामी दर्शयिष्ये फलं तदा ॥
न शोभते त्वया युद्धं करिष्ये स्वामिना तव । उपहासकरं ज्ञेयं युद्धं सिंहशृगालयोः श्रुतं च मद्वचस्तेऽद्य द्रक्ष्यसि त्वं महाबलम् । गच्छस्व स्वामिनं भिल्ल यथेच्छसि तथा कुरु नन्दीश्वर उवाच
इत्युक्तस्तु गतस्तत्र भिल्लः पार्थेन वै मुने ।
शिवावतारो यत्रास्ते किरातो वाहिनीपतिः ॥
अथार्जुनस्य वचनं भिल्लनाथाय विस्तरात् ।
सर्वं निवेदयामास तस्मै भिल्लपरात्मने ॥
स किरातेश्वरः श्रुत्वा तद्वचो हर्षमागतः ।
आजगाम स्वसैन्येन शङ्करो भिल्लरूपधृक् ॥
अर्जुनश्च तदा सेनां किरातस्य च पाण्डवः ।
दृष्ट्वा गृहीत्वा सशरं धनुः सम्मुख आययौ ॥
अथो किरातश्च पुनः प्रेषयामास तं चरम् ।
तन्मुखेन जगौ वाक्यं भारताय महात्मने ॥
किरात उवाच
पश्य सैन्यं तपस्विंस्त्वं मुञ्च बाणं व्रजाधुना ।
मरणं स्वल्पकार्यार्थं कथमिच्छसि साम्प्रतम् ॥
भ्रातरस्तव दुःखार्ताः कलत्रं च ततः परम् ।
पृथिवी हस्ततस्तेऽद्य यास्यतीति मतिर्मम ॥
नन्दीश्वर उवाच
इत्युक्तं परमेशेन पार्थदार्व्यपरीक्षया ।
सर्वथार्जुनरक्षार्थं धृतरूपेण शम्भुना ॥
शतरुद्रसंहिता १८५ भील बोला- तुम ऋषि नहीं हो, मूर्ख हो, तुम अपनी मृत्यु क्यों चाह रहे हो, बाणको दे दो और ३० सुखपूर्वक रहो, अन्यथा कष्ट प्राप्त करोगे ॥ ३० ॥
नन्दीश्वर बोले- शिवकी श्रेष्ठ शक्तिसे शोभित होनेवाले भीलकी बात सुनकर पाण्डुपुत्र अर्जुनने शिवजीका ३१ स्मरण करते हुए उस भीलसे कहा— ॥ ३१ ॥
अर्जुन बोले — हे वनेचर! हे भील! मेरी बातको भलीभाँति सुनो; जब तुम्हारा स्वामी यहाँ ३२ आयेगा, तब मैं उसको इसका फल दिखाऊँगा ॥ ३२ ॥
तुम्हारे साथ युद्ध करना मुझे शोभा नहीं देता, अतः तुम्हारे स्वामीके साथ युद्ध करूँगा; क्योंकि सिंह ॥ ३३ और गीदड़का युद्ध उपहासास्पद होताहै ॥ ३३ ॥
हे भील! तुमने मेरी बात सुन ली, अब [ आगे ] ॥ ३४ मेरा महाबल भी देखोगे । अब तुम अपने स्वामीके पास जाओ और जैसी तुम्हारी इच्छा हो, वैसा करो ॥ ३४ ॥
नन्दीश्वर बोले- अर्जुनके द्वारा इस प्रकार कहे जानेपर वह भील वहाँ गया, जहाँ शिवावतार ३५ भीलराज स्थित थे । तदुपरान्त उसने अर्जुनका सारा वचन भीलस्वरूपी परमात्मासे विस्तारपूर्वक निवेदन ३६ किया ॥ ३५-३६ ॥ किरातेश्वर शिव उसका वचन सुनकर अत्यन्त ३७ हर्षित हुए, फिर भीलरूपधारी सदाशिव अपनी सेनाके साथ [ जहाँ अर्जुन थे, ] वहाँ आये ॥३७ ॥
उस समय पाण्डुपुत्र अर्जुन भी किरात सेनाको ३८ देखकर धनुष - बाण लेकर सामने आ गये ॥३८ ॥
इसके बाद किरातेश्वरने पुनः भरतवंशीय महात्मा ३ ९ अर्जुनके पास दूत भेजा और उसके मुखसे अपना सन्देश उन्हें कहलवाया ॥ ३ ९ ॥ किरात बोला — हे दूत! तुम जाकर अर्जुनसे कहो, हे तपस्विन्! तुम मेरी इस विशाल सेनाको देखो, ४० मेरा बाण मुझे लौटा दो और अब चले जाओ । स्वल्प कार्यके लिये इस समय क्यों मरना चाहते हो? ॥ ४० ॥
तुम्हारे भाई दुखी होंगे, इससे भी अधिक तुम्हारी ४१ स्त्री दुखी होगी । मुझे तो ऐसा प्रतीत होता है कि तुम्हारे हाथसे आज पृथ्वी भी चली जायगी ॥ ४१ ॥
नन्दीश्वर बोले- अर्जुनकी रक्षाके लिये और उनकी दृढ़ताकी परीक्षाके लिये किरातरूपधारी परमेश्वर ४२ । शिवने इस प्रकार कहा । उसके ऐसा कहनेपर शंकरके
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१८६ इत्युक्तस्तु तदागत्य स गणः शाङ्करश्च तत् विस्तराद् वृत्तमखिलमर्जुनाय न्यवेदयत् तच्छ्रुत्वा तु पुनः प्राह पार्थस्तं दूतमागतम् । वाहिनीपतये वाच्यं विपरीतं भविष्यति
यद्यहं चैव ते बाणं यच्छामि च मदीयकम् ।
कुलस्य दूषणं चाहं भविष्यामि न संशयः ॥
भ्रातरश्चैव दुःखार्ताः भवन्तु च तथा ध्रुवम् विद्याश्च निष्फला मे स्युस्तस्मादागच्छ वै ध्रुवम् ॥
सिंहश्चैव शृगालाद्वा भीतो नैव मया श्रुतः ।
तथा वनेचराद्राजा न बिभेति कदाचन ॥
नन्दीश्वर उवाच इत्युक्तस्तं पुनर्गत्वा स्वामिनं पाण्डवेन सः । सर्वं निवेदयामास तदुक्तं हि विशेषतः
अथ सोऽपि किराताह्वो महादेवः ससैन्यकः ।
तच्छ्रुत्वा सैन्यसंयुक्तो ह्यर्जुनं चागमत्तदा ॥
श्रीशिवमहापुराण [ अ ० ४१ । उस दूतने अर्जुनके पास जाकर सारा वृत्तान्त विस्तारपूर्वक ॥ ४३ निवेदन किया ॥ ४२-४३ ॥ उसकी बात सुनकर अर्जुनने पुनः आये हुए उस ॥ ४४ दूतसे कहा- हे दूत! तुम अपने स्वामीसे जाकर कहो ' । कि इसका परिणाम विपरीत होगा । यदि मैं तुम्हें अ अपना ४५ बाण दे दूँगा, तो मैं कुलकलंकी हो जाऊँगा, इसमें । सन्देह नहीं है । भले ही हमारे भाई दुखी हों, भले ही | हमारी विद्या नष्ट हो जाय, किंतु भीलराज मुझसे युद्ध ४६ | करनेके लिये अवश्य यहाँ आयें I । सिंह गीदड़से डर ४७ जाय, यह बात मैंने कभी नहीं सुनी, इसी प्रकार किसी वनेचरसे राजा डरे, ऐसा नहीं हो सकता ॥ ४४–४७ ॥ नन्दीश्वर बोले — पाण्डुपुत्र अर्जुनके इस प्रकार कहनेपर भीलने अपने स्वामीके पास जाकर अर्जुनद्वारा ॥ ४८ कहे गये सारे वृत्तान्तको विशेष रूपसे वर्णित किया । तब इस वृत्तान्तको सुनकर किरातवेषधारी महादेव ४ ९ । सेनासहित अर्जुनके पास आये ॥ ४८-४९ ॥ इति श्रीशिवमहापुराणे तृतीयायां शतरुद्रसंहितायां किरातावतारवर्णने भिल्लार्जुनसंवादो नाम चत्वारिंशोऽध्यायः ॥ ४० ॥
॥ इस प्रकार श्रीशिवमहापुराणके अन्तर्गत तृतीय शतरुद्रसंहिताके किरातावतारवर्णनमें भील - अर्जुन - संवाद नामक चालीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ४० ॥
अथैकचत्वारिंशोऽध्यायः भगवान् शिवके नन्दीश्वर उवाच
तमागतं ततो दृष्ट्वा ध्यानं कृत्वा शिवस्य सः ।
गत्वा तत्रार्जुनस्तेन युद्धं चक्रे सुदारुणम् ॥
गणैश्च विविधैस्तीक्ष्णैरायुधैस्तं न्यपीडयत् ।
तैस्तदा पीडितः पार्थः सस्मार स्वामिनं शिवम् ॥
अर्जुनश्च तदा तेषां बाणावलिमथाच्छिनत् ।
यदा युद्धं च तैः क्षिप्तं ततः शर्वं परामृशत् ॥
पीडितास्ते गणास्तेन ययुश्चैव दिशो दश ।
गणेशा वारितास्ते च नाजग्मुः स्वामिनं प्रति ॥
किरातेश्वरावतारका वर्णन नन्दीश्वर बोले— सेनाके साथ किरातेश्वरको युद्धके लिये आया देखकर शिवजीका ध्यान करते १ हुए अर्जुनने वहाँ जाकर उसके साथ भयंकर युद्ध किया ॥१ ॥
उस भीलराजने अपने अनेक गणों तथा २ तीक्ष्ण शस्त्रोंके द्वारा अर्जुनको अत्यधिक पीड़ित किया । तब उनसे पीड़ित हुए अर्जुन अपने इष्टदेव शिवका स्मरण करने लगे । अर्जुनने शत्रुओंके सारे बाण काट डाले । जब गणोंने युद्ध करना छोड़ | दिया, तो अर्जुनने [ किरातवेषधारी ] शिवजीको ३ | ललकारा ॥ २-३ ॥ अर्जुनसे पीड़ित गण दसों दिशाओंमें भागने । । लगे । यद्यपि किरातपतिने उन गणस्वामियोंको ऐसा भी । ४ करनेसे रोका, किंतु वे अपने स्वामीके बलानेपर
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अ ० ४१ ] शतरुद्रसंहिता १८७ शिवश्चैवार्जुनश्चैव युयुधाते परस्परम् । नहीं लौटे । तब महाबली एवं पराक्रमी अर्जुन और नानाविधैश्चायुधैर्हि महाबलपराक्रमौ ॥ ५ शिवजीने नाना प्रकारके शस्त्रास्त्रोंसे परस्पर युद्ध किया ॥ ४-५ ॥ शिवोऽपि मनसा नूनं दयां कृत्वार्जुनं ह्यगात् । यद्यपि शिवजी दया करते हुए अर्जुनके पास अर्जुनश्च दृढं तत्र प्रहारं कृतवांस्तदा ॥ ६ गये, किंतु अर्जुनने निर्दयतापूर्वक शिवपर प्रहार
आयुधानि शिवः सो वै ह्यर्जुनस्याच्छिनत्तदा ।
कवचानि च सर्वाणि शरीरं केवलं स्थितम् ॥
तदार्जुनः शिवं स्मृत्वा मल्लयुद्धं चकार सः ।
वाहिनीपतिना तेन भयात्क्लिष्टोऽपि धैर्यवान् ॥
तद्युद्धेन मही सर्वा चकम्पे ससमुद्रका ।
देवा दुःखं समापन्नाः किं भविष्यति वा पुनः ॥
एतस्मिन्नन्तरे देवः शिवो गगनमास्थितः ।
युद्धं चकार तत्रस्थः सोऽर्जुनश्च तथाकरोत् ॥
उड्डीयोड्डीय तौ युद्धं चक्रतुर्देवपार्थिवौ ।
देवाश्च विस्मयं प्रापू रणं दृष्ट्वा तदाद्भुतम् ॥
अथार्जुनोत्तरं ज्ञात्वा स्मृत्वा शिवपदाम्बुजम् ।
दधार पादयोस्तं वै तद्ध्यानादाप्तसद्बलः ॥
धृत्वा पादौ तदा तस्य भ्रामयामास सोऽर्जुनः ।
विजहास महादेवो भक्तवत्सल ऊतिकृत् ॥
दातुं स्वदासतां तस्मै भक्तवश्यतया मुने ।
शिवेनैव कृतं ह्येतच्चरितं नान्यथा भवेत् ॥
पश्चाद्विहस्य तत्रैव शङ्करो रूपमद्भुतम् ।
दर्शयामास सहसा भक्तवश्यतया शुभम् ॥
किया ॥६ ॥
तदनन्तर शिवजीने अर्जुनके समस्त शस्त्र-७ अस्त्रोंको काट डाला और कवचोंको भी छिन्न - भिन्न कर दिया; केवल उनका शरीर शेष रह गया ॥७ ॥
तब धैर्यशाली उन अर्जुनने भयसे व्यथित होते ८ हुए भी शिवजीका स्मरणकर वाहिनीपतिके साथ मल्लयुद्ध करना प्रारम्भ किया । उन दोनोंके संग्रामको देखकर सागरसहित पृथ्वी काँप रही थी और देवता ९ दुखी हो रहे थे कि अब और क्या होनेवाला है? ॥ ८ - ९ ॥ इसी बीचमें शिवजी ऊपर जाकर आकाशमें १० स्थित हो युद्ध करने लगे और अर्जुन भी उसी प्रकार आकाशमें स्थित हो युद्ध करने लगे । इस प्रकार शिव एवं अर्जुन दोनों ही उड़ - उड़कर आकाशमें जब युद्ध ११ कर रहे थे, तब उस अद्भुत युद्धको देखकर देवगण विस्मित हो रहे थे ॥ १०-११ ॥ उसके पश्चात् अर्जुनने उन्हें अपनेसे अधिक १२ बलवान् जानकर शिवजीके चरणोंका स्मरणकर तथा उनके ध्यानसे विशेष बल प्राप्तकर भील दोनों चरणोंको पकड़ लिया । ज्यों ही चरण पकड़कर अर्जुन उन्हें आकाशमें घुमाने लगे, तभी १३ लीला करनेवाले भक्तवत्सल भगवान् शिव हँस पड़े ॥ १२-१३ ॥ हे मुने! भक्तके अधीन रहनेवाले शिवजीने १४ अर्जुनको अपना दास्य प्रदान करनेके लिये जो यह चरित्र किया, वह अन्यथा कैसे हो सकता है । इसके बाद भक्तवश्यताके कारण शिवजीने हँसकर अपना अद्भुत सुन्दर रूप अर्जुनके सामने प्रकट १५ | किया ॥ १४-१५ ॥
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१८८ यथोक्तं वेदशास्त्रेषु पुराणे पुरुषोत्तम व्यासोपदिष्टं ध्यानाय तस्य यत्सर्वसिद्धिदम् तद् दृष्ट्वा सुन्दरं रूपं ध्यानप्राप्तं शिवस्य तु बभूव विस्मितोऽतीव ह्यर्जुनो लज्जितः स्वयम्
अहो शिवश्शिवः सोऽयं यो मे प्रभुतया वृतः ।
त्रिलोकेशः स्वयं साक्षाद् हा कृतं किं मयाधुना ॥
प्रभोर्बलवती माया मायिनामपि मोहिनी ।
किं कृतं रूपमाच्छाद्य प्रभुणा छलितो ह्यहम् ॥
धियेति संविचार्यैवं साञ्जलिर्नतमस्तकः ।
प्रणनाम प्रभुं प्रीत्या तदोवाच स खिन्नधीः ॥
अर्जुन उवाच
देवदेव महादेव करुणाकर शङ्कर ।
ममापराधं सर्वेश क्षन्तव्यश्च त्वया पुनः ॥
किं कृतं रूपमाच्छाद्य छलितोऽस्मि त्वयाधुना ।
धिङ् मां समरकर्तारं स्वामिना भवता प्रभो ॥
नन्दीश्वर उवाच
इत्येवं पाण्डवः सोऽथ पश्चात्तापमवाप सः ।
पादयोर्निपपाताशु शङ्करस्य महाप्रभोः ॥
अथेश्वरः प्रसन्नात्मा प्रत्युवाचार्जुनं च तम् ।
समाश्वास्येति बहुशो महेशो भक्तवत्सलः ॥
शङ्कर उवाच
न खिद्य पार्थ भक्तोऽसि मम त्वं हि विशेषतः ।
परीक्षार्थं मया तेऽद्य कृतमेवं शुचं जहि ॥
श्रीशिवमहापुराण [ अ ० ४१ । हे पुरुषोत्तम! वेद - शास्त्रोंमें तथा पुराणोंमें ॥ १६ / उनके जिस रूपका वर्णन है और व्यासजीने | अर्जुनको ध्यानके लिये जिस रूपका उपदेश था, जिसके दर्शनमात्रसे सारी सिद्धियाँ प्राप्त दिया जाती हैं । [ उसी प्रकारका रूप धारणकर शिवजी हो ॥ प्रकट हुए ] अर्जुन जिस रूपका ध्यान करते थे, उसी ॥ १७ । सुन्दर रूपको अपने सामने प्रत्यक्ष प्रकट देखकर वे । अत्यन्त विस्मित तथा लज्जित हो उठे और मनमें कहने लगे — अहो! यह तो परम कल्याणकारी वे । | शिवजी ही हैं, जिन्हें मैंने अपना स्वामी स्वीकार १८ किया है । ये तो स्वयं त्रिलोकीके साक्षात् ईश्वर हैं; यह मैंने आज क्या कर डाला! ॥ १६-१८ ॥ निश्चय ही भगवान् शिवकी माया बड़ी १ ९ बलवती है, जो बड़े - बड़े मायाविदोंको मोह लेती है । इन्होंने अपना रूप छिपाकर मेरे साथ इस प्रकारका छल क्यों किया; निश्चय ही मैं इनके द्वारा छला गया हूँ ॥१ ९ ॥ इस प्रकार अपने मनमें विचारकर अर्जुनने हाथ २० जोड़कर सिर झुकाकर और खिन्न मनसे भक्तिपूर्वक प्रणाम किया और उनसे कहा- ॥ २० ॥
अर्जुन बोले- हे देवदेव! हे महादेव! हे करुणाकर! हे शंकर! हे सर्वेश! मैं आपका अपराधी हूँ, मुझे क्षमा कीजिये । हे प्रभो! इस २१ समय आपने यह क्या किया, जो अपना रूप छिपाकर मुझसे छल किया । हे प्रभो! आप जैसे स्वामीसे युद्ध करते हुए मुझे लज्जा नहीं आयी; मुझको धिक्कार २२ है! ॥ २१-२२ ॥ नन्दीश्वर बोले - – [ हे सनत्कुमार! ] इस प्रकार पाण्डुपुत्र अर्जुन पश्चात्ताप करने लगे और २३ तत्काल महाप्रभु शिवजीके चरणोंमें शीघ्र गिर पड़े । तदनन्तर भक्तवत्सल महेश्वरने प्रसन्न होकर अर्जुनको अनेक प्रकारसे आश्वासन दिया और उनसे २४ कहा- ॥ २३-२४ ॥ शिवजी बोले — हे पार्थ! तुम खेद मत करो, तुम | मेरे प्रिय भक्त हो; मैंने यह सारी लीला तुम्हारी | परीक्षाके लिये की थी, तुम शोकका परित्याग कर २५ | दो ॥ २५ ॥