श्रीगणेशाय नमः।

शिव महापुराण - २ — पृष्ठ 181–190

शिव महापुराण - २ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 181–190

पृष्ठ 181

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अ ० ३७ ] शतरुद्रसंहिता १६ ९

तं दृष्ट्वा ते तदा प्रीता उत्थाय पुरतः स्थिताः ।

दत्त्वासनं तदा तस्मै कुशाजिनसुशोभितम् ॥

तत्रोपविष्टं तं व्यासं पूजयन्ति स्म हर्षिताः ।

स्तुतिं च विविधां कृत्वा धन्याः स्म इति वादिनः ॥

तपश्चैव सुसन्तप्तं दानानि विविधानि च ।

तत्सर्वं सफलं जातं तृप्तास्ते दर्शनात्प्रभो ॥

दुःखं च दूरतो जातं दर्शनात्ते पितामह ।

दुष्टैश्चैव महादुःखं दत्तं नः क्रूरकर्मभिः ॥

श्रीमतां दर्शने जाते दुःखं चैव गमिष्यति ।

कदाचिन्न गतं तत्र निश्चयोऽयं विचारितः ॥

महतामाश्रमे प्राप्ते समर्थे सर्वकर्मणि ।

यदि दुःखं न गच्छेत्तु दैवमेवात्र कारणम् ॥

निश्चयेनैव गच्छेत्तु दारिद्र्यं दुःखकारणम् ।

महतां च स्वभावोऽयं कल्पवृक्षसमो मतः ॥

तद्गुणानेव गणयन्महतो वस्तुमात्रतः ।

आश्रयस्य वशादेव पुंसो वै जायते प्रभो ॥

लघुत्वं च महत्त्वं च नात्र कार्या विचारणा ।

उत्तमानां स्वभावोऽयं यद्दीनप्रतिपालनम् ॥

रंकस्य लक्षणं लोके ह्यतिश्रेयस्करं मतम् । पुरोऽस्य परयत्नो वै सुजनानां च सेवनम् अतः परं च भाग्यं वै दोषश्चैव न दीयताम् एतस्मात्कारणात्स्वामिंस्त्वयि दृष्टे शुभं तदा त्वदागमनमात्रेण सन्तुष्टानि मनांसि नः दिशोपदेशं येनाशु दुःखं नष्टं भवेच्च नः तब उन्हें देखकर वे पाण्डव प्रसन्न हो उठकर २४ उनके आगे खड़े हो गये और कुशासे युक्त मृगचर्मका आसन उन्हें देकर उसपर बैठे हुए व्यासजीका हर्षित होकर पूजन किया, अनेक प्रकारसे उनकी स्तुति की २५ और कहा कि हम धन्य हो गये ॥ २४-२५ ॥ हमने जो कठिन तप किया, अनेक प्रकारके दान २६ दिये, वह सब सफल हो गया । हे प्रभो! हम सब आपके दर्शनसे तृप्त हो गये ॥२६ ॥

हे पितामह! आपके दर्शनसे दुःख दूर हो गया, २७ क्रूर कर्मवाले इन दुष्टोंने हमलोगोंको बड़ा दुःख दिया है ॥ २७ ॥

आप - जैसे श्रीमानोंका दर्शन हो जानेपर जो २८ दुःख कभी न गया, वह अब चला ही जायगा— ऐसा हमलोगोंका विचारपूर्ण निश्चय है । सब कुछ करनेमें समर्थ आप - जैसे महात्माओंके आश्रममें पधारनेपर २ ९ भी यदि दुःख दूर न हुआ तो इसमें दैव ही कारण है ॥ २८-२९ ॥ बड़े लोगोंका स्वभाव कल्पवृक्षके समान माना ३० गया है, उनके आनेपर दुःखका कारणभूत दारिद्र्य निश्चित रूपसे चला जाता है ॥३० ॥

हे प्रभो! महापुरुषोंके गुणोंका कथन करनेसे, ३१ उनका नामसंकीर्तनमात्र करनेसे अथवा उनका आश्रय लेनेसे व्यक्ति महत्ता या [ उपेक्षा करनेसे ] लघुताको प्राप्त करता है— इसमें कोई विचार नहीं करना चाहिये ॥ ३११/२ ॥ ३२ उत्तम पुरुषोंमें स्वभाव ही ऐसा होता है कि वे दीनजनोंका परिपालन करते हैं ॥ ३२ ॥

निर्धनताको लोकमें परम कल्याणकारी माना ॥ ३३ गया है, क्योंकि इसके सामने अर्थात् लक्ष्यके रूपमें दूसरेका उपकार और सज्जनोंकी सेवा - ये ही रहते हैं ॥ ३३ ॥

। उसके बाद जो भाग्य है, उसमें किसीको दोष ॥ ३४ नहीं देना चाहिये । इसलिये हे स्वामिन्! आपके दर्शनसे हमलोग अपना मंगल ही मानते हैं । आपके आगमन - मात्रसे हमारा मन हर्षित हो उठा है । अब । आप हमलोगोंको शीघ्र ही ऐसा उपदेश दें, जिससे ॥ ३५ | हमारा दुःख दूर हो ॥ ३४-३५ ॥

पृष्ठ 182

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१७० श्रीशिवमहापुराण [ अ ० ३७ नन्दीश्वर उवाच नन्दीश्वर बोले— पाण्डवोंका यह वचन इत्येतद्वचनं श्रुत्वा पाण्डवानां महामुनिः । प्रसन्नचित्त हुए महामुनि व्यासजीने यह कहा— सुनकर प्रसन्नमानसो भूत्वा व्यासश्चैवाब्रवीदिदम् ॥ ३६ ॥३६ ॥

हे पाण्डवाश्च यूयं वै न कष्टं कर्तुमर्हथ धन्याः स्थ कृतकृत्याः स्थ सत्यं नैव विलोपितम् सुजनानां स्वभावोऽयं प्राणान्तेऽपि सुशोभनः धर्मं त्यजन्ति नैवात्र सत्यं सफलभाजनम् ॥

अस्माकं चैव यूयं च ते चापि समतां गताः ।

तथापि पक्षपातो वै धर्मिष्ठानां मतो बुधैः ॥

धृतराष्ट्रेन दुष्टेन प्रथमं च ह्यचक्षुषा ।

धर्मस्त्यक्तः स्वयं लोभाद्युष्माकं राज्यमाहृतम् ॥

तस्य यूयं च ते चापि पुत्रा एव न संशयः ।

पितर्युपरते बाला अनुकम्प्या महात्मनः ॥

पश्चात्पुत्रश्च तेनैव वारितो न कदाचन ।

अनर्थो नैव जायेत यच्चैवं च कृतं तदा ॥

अतः परं च यज्जातं तज्जातं नान्यथा भवेत् ।

अयं दुष्टो भवन्तश्च धर्मिष्ठाः सत्यवादिनः ॥

तस्मादन्ते च तस्यैवाशुभं हि भविता ध्रुवम् ।

यच्चैवं वापितं बीजं तत्प्ररोहो भवेदिह ॥

तस्माद्दुःखं न कर्तव्यं भवद्भिः सर्वथा ध्रुवम् ॥ हे पाण्डवो! आपलोग दुःख मत कीजिये, ॥ ३७ आपलोग धन्य हैं और कृतकृत्य हैं, जो कि आपलोगों ने सत्यका लोप नहीं होने दिया ॥३७ ॥

। सत्पुरुषोंका ऐसा अत्युत्तम स्वभाव होता है कि ३८ वे मृत्युपर्यन्त मनोहर फल देनेवाले सत्य तथा धर्मका त्याग नहीं करते हैं ॥ ३८ ॥

३ ९ दोनों प्रति ४० त्याग हड़प उनके यद्यपि हमारे लिये आपलोग तथा वे [ कौरव ] ही बराबर हैं, फिर भी विद्वानोंके द्वारा धर्मात्माओंके पक्षपात उचित कहा गया है ॥ ३ ९ ॥ अन्धे तथा दुष्ट धृतराष्ट्रने पहले ही धर्मका किया और लोभसे स्वयं आपलोगोंका राज्य लिया । आपलोग तथा वे [ कौरव ] दोनों ही पुत्र हैं, इसमें सन्देह नहीं है । पिता ( पाण्डु ) -४१ के मर जानेपर उन महात्माके बालकोंके ऊपर उन्हें कृपा करनी चाहिये॥४०-४१ ॥ उन्होंने कभी भी अपने पुत्र [ दुर्योधन ] -को मना ४२ नहीं किया, यदि उन्होंने ऐसा किया होता तो यह अनर्थ न होता । जो होना था, वह हो चुका; होनहार कभी मिथ्या नहीं होता । यह [ दुर्योधन ] दुष्ट है, ४३ आपलोग धर्मात्मा एवं सत्यवादी हैं ॥ ४२-४३ ॥ इसलिये अन्तमें निश्चित रूपसे उसका ही ४४ अशुभ होगा, जो बीज यहाँ उसने बोया है, वह अवश्य उत्पन्न होगा ॥ ४४ ॥

इसलिये निश्चय ही आपलोगोंको दुखी नहीं भविष्यति शुभं वो हि नात्र कार्या विचारणा ॥ ४५ होना चाहिये । हर प्रकारसे आपलोगोंका अवश्य ही नन्दीश्वर उवाच शुभ होगा, इसमें सन्देहकी आवश्यकता नहीं है ॥ ४५ ॥

इत्युक्त्वा पाण्डवाः सर्वे तेन व्यासेन प्रीणिताः । नन्दीश्वर बोले- इस प्रकार कहकर महात्मा युधिष्ठिरमुखास्ते व्यासजीने उन पाण्डवोंको प्रसन्न कर लिया, तब च पुनरेवाब्रुवन्वचः ॥ ४६ युधिष्ठिर आदि पाण्डवोंने पुनः उनसे यह वचन कहा— ॥ ४६ ॥

पाण्डवा ऊचुः पाण्डव बोले- हे नाथ! आपने सत्य कहा, सत्यमुक्तं त्वया नाथ दुष्टैर्दुःखं निरन्तरम् । किंतु मलिन चित्तवाले ये दुष्ट हमें इस वनमें भी बार-दुष्टात्मभिर्वने चापि दीयते हि मुहुर्मुहुः ॥ ४७ बार निरन्तर दुःख ही दे रहे हैं ॥४७ ॥

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अ ० ३७ ] शतरुद्रसंहिता १७१

तन्नाशयाशुभं मेऽद्य किञ्चिद्देयं शुभं विभो ।

कृष्णेन कथितं पूर्वमाराध्यः शङ्करः सदा ॥ ४८

प्रमादश्च कृतोऽस्माभिस्तद्वचः शिथिलीकृतम् ।

स देवमार्गस्तु पुनरिदानीमुपदिश्यताम् ॥ ४ ९

नन्दीश्वर उवाच

इत्येतद्वचनं श्रुत्वा व्यासो हर्षसमन्वितः ।

उवाच पाण्डवान्प्रीत्या स्मृत्वा शिवपदाम्बुजम् ॥ ५०

व्यास उवाच

श्रूयतां वचनं मेऽद्य पाण्डवा धर्मबुद्धयः ।

सत्यमुक्तं तु कृष्णेन मया संसेव्यते शिवः ॥ ५१

भवद्भिः सेव्यतां प्रीत्या सुखं स्यादतुलं सदा ।

सर्वदुःखं भवत्येव शिवासेवात एव हि ॥ ५२

नन्दीश्वर उवाच

अथ पञ्चसु तेष्वेव विचार्य शिवपूजने ।

अर्जुनं योग्यमुच्चार्य व्यासो मुनिवरस्तथा ॥ ५३

तपः स्थानं विचार्यैवं ततः स मुनिसत्तमः ।

पाण्डवान्धर्मसन्निष्ठान्पुनरेवाब्रवीदिदम् ॥ ५४

व्यास उवाच

श्रूयतां पाण्डवाः सर्वे कथयामि हितं सदा ।

शिवं सर्वं परं दृष्ट्वा परं ब्रह्म सतां गतिम् ॥ ५५

ब्रह्मादित्रिपरार्द्धान्तं यत्किंचिद् दृश्यते जगत् ।

तत्सर्वं शिवरूपं च पूज्यं ध्येयं च तत्पुनः ॥ ५६

सर्वेषां चैव सेव्योऽसौ शङ्करः सर्वदुःखहा ।

शिवः स्वल्पेन कालेन संप्रसीदति भक्तितः ॥ ५७

सुप्रसन्नो महेशो हि भक्तेभ्यः सकलप्रदः ।

भुक्तिं मुक्तिमिहामुत्र यच्छतीति सुनिश्चितम् ॥५८

तस्मात्सेव्यः सदा शम्भुर्भुक्तिमुक्तिफलेप्सुभिः ।

पुरुषः शङ्करः साक्षाद् दुष्टहन्ता सतां गतिः ॥ ५ ९

परन्तु प्रथमं शक्रविद्यां दृढमना जपेत् ।

क्षत्रियस्य पराख्यस्य चेदमेव समाहितम् ॥ ६०

इसलिये हे विभो! हमारे अशुभका नाश कीजिये और हमें मंगल प्रदान कीजिये । इसके पूर्व श्रीकृष्णने [ हमलोगोंसे ] कहा था कि तुमलोगोंको सर्वदा शिवजीकी आराधना करनी चाहिये, किंतु हमलोगोंने प्रमाद किया और उनकी आज्ञाके पालनमें शिथिलता की । अब आप पुनः उस देवमार्गका उपदेश कीजिये ॥ ४८-४९ ॥ नन्दीश्वर बोले- यह वचन सुनकर व्यासजी बहुत ही प्रसन्न हुए और शिवजीके चरणकमलोंका ध्यान करके पाण्डवोंसे प्रेमपूर्वक कहने लगे- ॥ ५० ॥

व्यासजी बोले — हे धर्मबुद्धिवाले पाण्डवो! मेरी बात सुनो । श्रीकृष्णने सत्य ही कहा था, क्योंकि मैं भी सदाशिवकी उपासना करता हूँ ॥५१ ॥

आपलोग भी प्रेमपूर्वक उनका सेवन कीजिये, जिससे सदा अपार सुखकी प्राप्ति होती रहे । शिवकी सेवा न करनेके कारण ही सारा दुःख होता है ॥ ५२ ॥

नन्दीश्वर बोले- उसके अनन्तर विचार करके मुनिवर व्यासजीने पाँचों पाण्डवोंमें अर्जुनको शिवपूजाके योग्य समझा और इसके बाद उन मुनिश्रेष्ठने [ उनके लिये ] तपस्याका स्थान निश्चितकर धर्मनिष्ठ पाण्डवोंसे | पुन: यह कहा – ॥ ५३-५४ ॥ व्यासजी बोले- हे पाण्डवो! मैं तुमलोगोंके हितकी जो बात कह रहा हूँ, उसे सुनो । तुमलोग सज्जनोंके रक्षक सर्वोत्कृष्ट परब्रह्म शिवका दर्शन प्राप्त करो ॥ ५५ ॥

ब्रह्मासे लेकर त्रिपरार्धपर्यन्त जो भी जगत् दिखायी पड़ता है, वह सब शिवस्वरूप है, इसलिये वह पूजा तथा ध्यान करनेयोग्य है ॥५६ ॥

शंकरजी सभी प्रकारके दुःखोंको विनष्ट करनेवाले हैं । अतः सभी लोगोंको उनकी सेवा करनी चाहिये । थोड़े समयमें ही भक्तिसे शिव प्रसन्न हो जाते हैं, अति प्रसन्न होनेपर महेश्वर भक्तोंको सब कुछ दे देते हैं । वे इस लोकमें भोग तथा परलोकमें मुक्ति प्रदान करते हैं - यह बात सुनिश्चित है ॥ ५७-५८ ॥ अतः भोग एवं मोक्षका फल चाहनेवाले पुरुषोंको सर्वदा शिवजीकी सेवा करनी चाहिये । शंकरजी साक्षात् पुरुषोत्तम हैं, दुष्टोंके विनाशक और सज्जनोंके रक्षक हैं । परंतु सबसे पहले स्वस्थ मनसे शक्रविद्याका जप करना चाहिये, श्रेष्ठ कहलानेवाले क्षत्रियके लिये | यही विधि है ॥ ५ ९ -६० ॥

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१७२ श्रीशिवमहापुराण [ अ ० ३८ अतोऽर्जुनश्च प्रथमं शक्रविद्यां जपेद् दृढः । अतः दृढ़चित्त होकर अर्जुनको सर्वप्रथम करिष्यति परीक्षां प्राक् सन्तुष्टस्तद्भविष्यति ॥ ६१ शक्रविद्याका जप करना चाहिये । इन्द्र पहले परीक्षा सुप्रसन्नश्च विघ्नानि संहरिष्यति सर्वदा पुनश्चैवं शिवस्यैव वरं मन्त्रं प्रदास्यति नन्दीश्वर उवाच इत्युक्त्वार्जुनमाहूयोपेन्द्रविद्यामुपादिशत् स्नात्वा च प्राङ्मुखो भूत्वा जग्राहार्जुन उग्रधीः पार्थिवस्य विधानं च तस्मै मुनिवरो ददौ प्रत्युवाच च तं व्यासो धनञ्जयमुदारधीः व्यास उवाच

इतो गच्छाधुना पार्थ इन्द्रकीले सुशोभने ।

जाह्नव्याश्च समीपे वै स्थित्वा सम्यक् तपः कुरु ॥

अदृश्या चैव विद्या स्यात्सदा ते हितकारिणी ।

इत्याशिषं ददौ तस्मै ततः प्रोवाच तान्मुनिः ॥

धर्ममास्थाय सर्वे वै तिष्ठन्तु नृपसत्तमाः ।

सिद्धिः स्यात्सर्वथा श्रेष्ठा नात्र कार्या विचारणा ॥

नन्दीश्वर उवाच

इति दत्त्वाशिषं तेभ्यः पाण्डवेभ्यो मुनीश्वरः ।

स्मृत्वा शिवपदाम्भोजं व्यासश्चान्तर्दधे क्षणात् ॥

। करेंगे, उसके बाद सन्तुष्ट होंगे । सन्तुष्ट हो जानेपर । । इन्द्र सर्वदा विघ्नोंका विनाश करेंगे और शिवजीका ॥ ६२ उत्तम मन्त्र प्रदान करेंगे ॥ ६१-६२ ॥ नन्दीश्वर बोले- व्यासजीने इस प्रकार कहकर | अर्जुनको अपने पास बुलाकर उन्हें इन्द्रविद्याका ॥ ६३ उपदेश किया और तीक्ष्ण बुद्धिवाले अर्जुनने भी स्नानकर पूर्वाभिमुख हो उसे ग्रहण कर लिया ॥ ६३ ॥

। उस समय उदार बुद्धिवाले मुनिवर व्यासजीने ॥ ६४ अर्जुनको पार्थिव पूजनके विधानका भी उपदेश किया और उनसे कहा —॥६४ ॥

व्यासजी बोले – हे पार्थ! आप इसी समय शीघ्र ही यहाँसे अत्यन्त शोभासम्पन्न इन्द्रकील ६५ पर्वतपर जाइये और वहाँ गंगाके तटपर स्थित होकर भलीभाँति तपस्या कीजिये । यह अदृश्य विद्या सर्वदा ६६ आपका हित करती रहेगी- मुनिने उन्हें यह आशीर्वाद दिया । उसके बाद पाण्डवोंसे कहा- हे श्रेष्ठ राजाओ! आपलोग धर्मका आश्रय लेकर यहाँ निवास करें, ६७ आपलोगोंको श्रेष्ठ सिद्धि अवश्य प्राप्त होगी, इसमें सन्देह नहीं करना चाहिये॥६५–६७ ॥ नन्दीश्वर बोले- उन पाण्डवोंको यह आशीर्वाद देकर शिवजीके चरणकमलोंका ध्यान करके मुनीश्वर ६८ । व्यास क्षणभरमें अन्तर्धान हो गये ॥६८ ॥

इति श्रीशिवमहापुराणे तृतीयायां शतरुद्रसंहितायां किरातावतारवर्णनप्रसंगेऽर्जुनाय व्यासोपदेशवर्णनं नाम सप्तत्रिंशोऽध्यायः ॥ ३७ ॥

॥ इस प्रकार श्रीशिवमहापुराणके अन्तर्गत तृतीय शतरुद्रसंहितामें किरातावतारवर्णनप्रसंगमें अर्जुनको व्यासका उपदेशवर्णन नामक सैंतीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ३७ ॥

अथाष्टत्रिंशोऽध्यायः इन्द्रका अर्जुनको वरदान देकर शिवपूजनका उपदेश देना नन्दीश्वर उवाच नन्दीश्वर बोले— [ हे सनत्कुमार! ] उस अर्जुनोऽपि तदा तत्र दीप्यमानो व्यदृश्यत । समय शिवस्वरूप मन्त्रके कारण अतुल तेज धारण | किये हुए अर्जुन भी अत्यन्त दीप्तिमान् दिखायी पड़ने मन्त्रेण शिवरूपेण तेजश्चातुलमावहन् ॥ १ । लगे ॥ १ ॥

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अ ० ३८ ] शतरुद्रसंहिता १७३

ते सर्वे चार्जुनं दृष्ट्वा पाण्डवा निश्चयं गताः ।

जयोऽस्माकं ध्रुवं जातं तेजश्च विपुलं यतः ॥

इदं कार्यं त्वया साध्यं नान्येन च कदाचन ।

व्यासस्य वचनाद्भाति सफलं कुरु जीवितम् ॥

इति प्रोच्यार्जुनं ते वै विरहौत्सुक्यकातराः ।

अनिच्छन्तोऽपि तत्रैव प्रेषयामासुरादरात् ॥

द्रौपदी दुःखसंयुक्ता नेत्राश्रूणि निरुध्य च ।

प्रेषयन्ती शुभं वाक्यं तदोवाच पतिव्रता ॥

द्रौपद्युवाच

व्यासोपदिष्टं यद्राजंस्त्वया कार्यं प्रयत्नतः ।

शुभप्रदोऽस्तु ते पन्थाः शङ्करः शं करोतु वै ॥

ते सर्वे चावसंस्तत्र विसृज्यार्जुनमादरात् ।

अत्यन्तदुःखमापन्ना मिलित्वा पञ्च एव च ॥

स्थितास्तत्र वदन्ति स्म श्रूयतामृषिसत्तम । दुःखेऽपि प्रियसंगो वै न दुःखाय प्रजायते वियोगे द्विगुणं तस्य दुःखं भवति नित्यशः । तत्र धैर्यधरस्यापि कथं धैर्यं भवेदिह नन्दीश्वर उवाच कुर्वत्स्वेव तदा दुःखं पाण्डवेषु मुनीश्वर । कृपासिन्धुश्च स व्यास ऋषिवर्यः समागतः तं तदा पाण्डवास्ते वै नत्वा सम्पूज्य चादरात् दत्त्वासनं हि दुःखाढ्याः करौ बध्वा वचोऽब्रुवन् पाण्डवा ऊचुः श्रूयतामृषभश्रेष्ठ दुःखदग्धा वयं प्रभो दर्शनं तेऽद्य सम्प्राप्य ह्यानन्दं प्राप्नुमो मुने कियत्कालं वसात्रैव दुःखनाशाय नः प्रभो दर्शनात्तव विप्रर्षे सर्वं दुःखं विलीयते उस समय उन सभी पाण्डवोंने अर्जुनको देखकर २ यह निश्चय कर लिया कि हमलोग अवश्य विजयी होंगे; क्योंकि अर्जुनका तेज बढ़ा हुआ है ॥२ ॥

[ उन लोगोंने अर्जुनसे कहा- हे अर्जुन! ] ३ व्यासजीके कथनसे प्रतीत होता है कि इस कार्यको तुम्हीं सिद्ध कर सकते हो, कोई दूसरा कभी नहीं; अतः जीवनको सफल करो ॥ ३ ॥

अर्जुनसे इस प्रकार कहकर उनके विरहसे ४ व्याकुल हुए समस्त पाण्डवोंने न चाहते हुए भी उन्हें आदरपूर्वक वहाँ भेज दिया ॥४ ॥

अर्जुनको भेजते समय दुःखसे भरी हुई पतिव्रता ५ द्रौपदीने नेत्रोंके आँसुओंको रोककर यह शुभ वचन कहा —॥५ ॥

द्रौपदी बोली- हे राजन्! व्यासजीने आपको जैसा उपदेश किया है, वैसा आपको प्रयत्नपूर्वक ६ [ कार्य ] करना चाहिये । आपका मार्ग मंगलप्रद हो और भगवान् शंकरजी आपका कल्याण करें ॥ ६ ॥

उसके अनन्तर पाँचों ( द्रौपदीसहित ) पाण्डव ७ अर्जुनको आदरपूर्वक विदा करके अत्यन्त दुखी होते हुए परस्पर मिलकर वहाँ निवास करने लगे ॥७ ॥

हे ऋषिसत्तम सनत्कुमार! सुनिये, पाण्डवोंने वहाँ ॥ ८ रहते हुए आपसमें कहा कि दुःख उपस्थित होनेपर भी प्रियजनका संयोग बना रहे तो दुःख नहीं जान पड़ता है । किंतु प्रियजनके वियोग रहनेपर दुःख आ पड़े तो ॥ ९ वह निरन्तर द्विगुणित होता जाता है, उस समय धैर्यवान्‌को भी धीरज कैसे रह सकता है ॥ ८ - ९ ॥ नन्दीश्वर बोले – हे मुनीश्वर! इस प्रकार पाण्डवोंके दुःख प्रकट करनेपर करुणासागर ऋषिवर्य व्यासजी वहाँ आये । तब दुःखसे व्याकुल हुए वे ॥ १० पाण्डव व्यासजीको नमस्कार करके आसन देकर । आदरपूर्वक उनकी पूजा करके हाथ जोड़कर यह ॥ ११ वचन कहने लगे- ॥ १०-११ ॥ पाण्डव बोले — हे श्रेष्ठोत्तम! हे प्रभो! सुनिये, । हम दुःखसे जल रहे थे, किंतु हे मुने! आज आपका ॥ १२ दर्शन प्राप्तकर हमलोग आनन्दित रहे हैं ॥ १२ ॥

हे प्रभो! आप हमलोगोंका दुःख दूर करनेके लिये । कुछ कालपर्यन्त यहीं निवास कीजिये; क्योंकि हे विप्रर्षे! ॥ १३ । आपके दर्शनमात्रसे सारा दुःख नष्ट हो जाता है ॥ १३ ॥

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१७४ नन्दीश्वर उवाच इत्युक्तः स ऋषिश्रेष्ठो न्यवसत्तत्सुखाय वै कथाभिर्विविधाभिश्च तद्दुःखं नोदयंस्तदा वार्तायां क्रियमाणायां तेन व्यासेन सन्मुने सुप्रणम्य विनीतात्मा धर्मराजोऽब्रवीदिदम् धर्मराज उवाच शृणु त्वं हि ऋषिश्रेष्ठ दुःखशान्तिर्मता मम । पृच्छामि त्वां महाप्राज्ञ कथनीयं त्वया प्रभो

ईदृशं चैव दुःखं च पुरा प्राप्तश्च कश्चन ।

वयमेव परं दुःखं प्राप्ता वै नैव कश्चन ॥

व्यास उवाच

राज्ञस्तु नलनाम्नो वै निषधाधिपतेः पुरा ।

भवद्दुःखाधिकं दुःखं जातं तस्य महात्मनः ॥

हरिश्चन्द्रस्य नृपतेर्जातं दुःखं महत्तरम् ।

अकथ्यं तद्विशेषेण परशोकावहं तथा ॥

दुःखं तथैव विज्ञेयं रामस्याप्यथ पाण्डव ।

यच्छ्रुत्वा स्त्रीनराणां च भवेन्मोहो महत्तरः ॥

तस्माद्वर्णयितुं नैव शक्यते हि मया पुनः ।

शरीरं दुःखराशिं च मत्वा त्याज्यं त्वयाधुना ॥

येनेदं च धृतं तेन व्याप्तमेव न संशयः ।

प्रथमं मातृगर्भे वै जन्म दुःखस्य कारणम् ॥

कौमारेऽपि महादुःखं बाललीलानुसारि यत् ।

ततोऽपि यौवने कामान्भुञ्जानो दुःखरूपिणः ॥

गतागतैर्दिनानां हि कार्यभारैरनेकशः । श्रीशिवमहापुराण [ अ ० ३८ नन्दीश्वर बोले- उन लोगोंके इस प्रकार कहने । । उन ऋषिवरने उनके सुखके लिये वहाँ निवास किया पर ॥ १४ / और वे अनेक प्रकारकी कथाओंसे उस समय उनका । कष्ट दूर करने लगे । हे सन्मुने! व्यासजीके द्वारा की । । जाती हुई वार्ताके समय उन्हें प्रणाम करके विनीतात्मा ॥ १५ धर्मराजने उनसे यह पूछा- ॥ १४-१५ ॥ युधिष्ठिर बोले- हे ऋषिश्रेष्ठ! हे महाप्राज्ञ ! [ आपके वचनोंसे ] मेरे दुःखकी शान्ति हो गयी, किंतु ॥ १६ हे प्रभो! मैं आपसे जो पूछता हूँ, उसे बताइये ॥ १६ ॥

क्या इस प्रकारका दुःख पहले और किसीको १७ प्राप्त हुआ है अथवा यह महान् दुःख हमें ही मिला है, अन्य किसीको नहीं? ॥१७ ॥

व्यासजी बोले— [ हे युधिष्ठिर! ] पूर्व समयमें निषधदेशके अधिपति महात्मा नलको आपसे भी १८ अधिक दुःख प्राप्त हुआ था ॥१८ ॥

राजा हरिश्चन्द्रको भी अत्यधिक दुःख प्राप्त १ ९ हुआ था, जो अनिर्वचनीय और सुननेमात्रसे दूसरोंको भी दुखित करनेवाला है ॥१ ९ ॥ हे पाण्डव! वैसा ही दुःख श्रीरामचन्द्रका भी २० जानना चाहिये, जिसे सुनकर स्त्री - पुरुषोंको अत्यधिक कष्ट होता है । मैं पुन: इसका वर्णन करनेमें असमर्थ हूँ, अतः शरीरको दुःखोंका समूह समझकर इस समय २१ तुम्हें शोकका त्याग करना चाहिये ॥ २०-२१ ॥ जिस किसीने यह शरीर धारण किया है, वह २२ दुःखोंसे व्याप्त हुआ है, इसमें सन्देह नहीं है । सर्वप्रथम माताके गर्भसे जन्म लेना ही दु: खका कारण होता है । फिर कुमारावस्थामें भी बालकोंकी लीलाके अनुसार २३ महान् दुःख होता है । इसके अनन्तर मनुष्य युवावस्थामें दुःखरूपी कामनाओंका भोग करता है ॥ २२-२३ ॥ [ हे युधिष्ठिर! ] अनेक प्रकारके कार्यभारोंसे आयुश्च क्षीयते नित्यं न जानाति ह तत्पुनः ॥ २४ तथा दिनोंके गमनागमनसे पुरुषकी सारी आयु इसी प्रकार नष्ट हो जाती है और मनुष्यको उसका ज्ञान नहीं रहता ॥ २४ ॥

अन्त समयमें जब पुरुषकी मृत्यु होती है, उस समय उसे इससे भी अधिक कष्ट उठाना पड़ता है । अन्ते च मरणं चैव महादुःखमतः परम् । । इसके बाद भी अज्ञानी अनेक प्रकारके नरकोंकी नानानरकपीडाश्च भुज्यन्तेऽज्ञैर्नरैस्तदा ॥ २५ । पीड़ा प्राप्त करते हैं ॥ मनुष्य २५ ॥

पृष्ठ 187

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अ ० ३८ ] शतरुद्रसंहिता १७५

तस्मादिदमसत्यं च त्वं तु सत्यं समाचर ।

येनैव तुष्यते शम्भुस्तथा कार्यं नरेण च ॥

नन्दीश्वर उवाच

एवं विविधवार्ताभिः कालनिर्यापणं तदा ।

चक्रुस्ते भ्रातरः सर्वे मनोरथपथैः पुनः ॥

अर्जुनोऽपि स्वयं गच्छन्दुर्गाद्रिषु दृढव्रतः ।

यक्षं लब्ध्वा च तेनैव दस्यून्निघ्नन्ननेकशः ॥

मनसा हर्षसंयुक्तो जगामाचलमुत्तमम् ।

तत्र गत्वा च गंगायाः समीपं सुन्दरं स्थलम् ॥

अशोककाननं यत्र तिष्ठति स्वर्ग उत्तमः ।

तत्र तस्थौ स्वयं स्नात्वा नत्वा च गुरुमुत्तमम् ॥

यथोपदिष्टं वेषादि तथा चैवाकरोत्स्वयम् ।

इन्द्रियाण्यपकृष्यादौ मनसा संस्थितोऽभवत् ॥

पुनश्च पार्थिवं कृत्वा सुन्दरं समसूत्रकम् ।

तदग्रे प्रणिदध्यौ स तेजोराशिमनुत्तमम् ॥

त्रिकालं चैव सुस्नातः पूजनं विविधं तदा ।

चकारोपासनं तत्र हरस्य च पुनः पुनः ॥

तस्यैव शिरसस्तेजो निस्सृतं तच्चरास्तदा ।

दृष्ट्वा भयं समापन्नाः प्रविष्टश्च कदा ह्ययम् ॥

पुनस्ते च विचार्यैवं कथनीयं विडौजसे ।

इत्युक्त्वा तु गतास्ते वै शक्रस्यान्तिकमञ्जसा ॥

चरा ऊचुः देवो वाथ ऋषिश्चैव सूर्यो वाथ विभावसुः । तपश्चरति देवेश न जानीमो वने च तम् तस्यैव तेजसा दग्धा आगतास्तव सन्निधौ निवेदितं चरित्रं तत्क्रियतामुचितं तु यत् ॥ नन्दीश्वर उवाच इत्युक्तस्तैश्चरैः सर्वं ज्ञात्वा पुत्रचिकीर्षितम् स गोत्रपान्विसृज्यैव तत्र गन्तुं मनो दधे इसलिये यह सब असत्य है, आप सत्यका आचरण २६ कीजिये । जिस प्रकार भी शिवजी सन्तुष्ट हों, उसी प्रकारका कार्य मनुष्यको करना चाहिये ॥ २६ ॥

नन्दीश्वर बोले- इस प्रकार उन सभी भाइयोंने अनेक प्रकारकी वार्ताओं तथा मनोरथोंसे समय बिताना २७ प्रारम्भ किया ॥ २७ ॥

कठिन पहाड़ी मार्गोंसे जाते हुए दृढ़ व्रतवाले २८ अर्जुन भी एक यक्षको प्राप्तकर उसीके साथ अनेक डाकुओंका संहार करते हुए मनमें हर्षित हो उत्तम [ इन्द्रकील ] पर्वतपर चले गये । वहाँ जाकर उन्होंने २ ९ गंगाके समीप एक सुन्दर स्थानको प्राप्त किया, जो स्वर्गसे भी उत्तम तथा अशोकवनसे युक्त था, वहींपर वे बैठ गये । इसके बाद स्वयं स्नान करके श्रेष्ठ ३० गुरुको नमस्कारकर उन्होंने यथोपदिष्ट वेश धारण किया और इन्द्रियोंको वशमें करके एकाग्रचित्त हो ३१ [ तपस्याके लिये ] स्थित हो गये । उस समय वे अत्यन्त सुन्दर समसूत्रयुक्त पार्थिव शिवलिंगका निर्माण करके उसके आगे [ आसनस्थ होकर ] उत्तम तेजोराशि ३२ [ शिवजीका ] ध्यान करने लगे ॥ २८–३२ ॥ इस प्रकार अर्जुन तीनों समय स्नान करके ३३ बारंबार अनेक प्रकारसे शिवजीकी पूजा करते हुए । उपासनामें तत्पर हो गये ॥३३ ॥

इसके बाद उस समय उनके शिरोभागसे निकले ३४ हुए तेजको देखकर इन्द्रके अनुचर भयभीत हो गये और सोचने लगे कि यह इस स्थानपर कब आ गया? ॥३४ ॥

उन्होंने पुनः अपने मनमें विचार किया कि यह ३५ समाचार इन्द्रसे निवेदन करना चाहिये । परस्पर ऐसा कहकर वे शीघ्र ही इन्द्रके समीप गये ॥ ३५ ॥

चर बोले - हे देवेश! कोई देवता, ऋषि, सूर्य अथवा अग्निदेव इस वनमें घोर तप कर रहे हैं, हमलोग ॥ ३६ उन्हें नहीं जानते । उनके तेजसे सन्तप्त होकर हमलोग । आपके पास आये हैं । हमने उस चरित्रको आपसे कह दिया, ३७ अब जैसा उचित हो, आप वैसा कीजिये ॥ ३६-३७ ॥ नन्दीश्वर बोले- दूतोंके ऐसा कहनेपर इन्द्रने । अपने पुत्र [ अर्जुन ] -का अभिप्राय जानकर पर्वतरक्षकोंको ॥ ३८ । विदाकर स्वयं वहाँ जानेका विचार किया ॥३८ ॥

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१७६ श्रीशिवमहापुराण [ अ ० ३८ स वृद्धब्राह्मणो भूत्वा ब्रह्मचारी शचीपतिः । हे विप्रेन्द्र! वे शचीपति इन्द्र ब्रह्मचारी जगाम तत्र विप्रेन्द्र परीक्षार्थं हि तस्य वै ॥ ३ ९ ब्राह्मणका रूप धारणकर उनकी परीक्षाके लिये वृद्ध वहाँ तमागतं तदा दृष्ट्वाकार्षीत्पूजां च पाण्डवः स्थितोऽग्रे च स्तुतिं कृत्वा क्वायातोऽसि वदाधुना इत्युक्तस्तेन देवेशो धैर्यार्थं तस्य प्रीतितः परीक्षागर्भितं वाक्यं पाण्डवं तं ततोऽब्रवीत् ब्राह्मण उवाच नवे वयसि वै तात किं तपस्यसि साम्प्रतम् मुक्त्यर्थं वा जयार्थं किं सर्वथैतत्तपस्तव नन्दीश्वर उवाच

इति पृष्टस्तदा तेन सर्वं संवेदितं पुनः ।

तच्छ्रुत्वा स पुनर्वाक्यमुवाच ब्राह्मणस्तदा ॥

ब्राह्मण उवाच

युक्तं न क्रियते वीर सुखं प्राप्तुं च यत्तपः ।

क्षात्रधर्मेण क्रियते मुक्त्यर्थं कुरुसत्तम ॥

इन्द्रस्तु सुखदाता वै मुक्तिदाता भवेन्न हि ।

तस्मात्त्वं सर्वथा श्रेष्ठ कर्तुमर्हसि सत्तपः ॥

नन्दीश्वर उवाच

इदं तद्वचनं श्रुत्वा क्रोधं चक्रेऽर्जुनस्तदा ।

प्रत्युवाच विनीतात्मा तदनादृत्य सुव्रतः ॥

अर्जुन उवाच

राज्यार्थं न च मुक्त्यर्थं किमर्थं भाषसे त्विदम् ।

व्यासस्य वचनेनैव क्रियते तप ईदृशम् ॥

इतो गच्छ ब्रह्मचारिन्मां पातयितुमिच्छसि ।

प्रयोजनं किमत्रास्ति तव वै ब्रह्मचारिणः ॥

नन्दीश्वर उवाच इत्युक्तः स प्रसन्नोऽभूत्सुन्दरं रूपमद्भुतम् । । पहुँचे । तब उन्हें आया हुआ देखकर अर्जुनने उनकी । । पूजा की और आगे खड़े होकर स्तुति करके उनसे ॥ ४० पूछा कि इस समय आप कहाँसे आये हैं, [ कृपया यह बताइये? तब उनके द्वारा प्रीतिपूर्वक इस प्रकार ] । । कहे जानेपर अर्जुनके धैर्यके परीक्षणार्थ देवराज ॥ ४१ प्रतिप्रश्न करने लगे ॥ ३ ९ –४१ ॥ ब्राह्मण बोले— हे तात! । युवावस्थामें तप क्यों कर रहे ॥ ४२ । यह तपस्या सर्वथा मुक्तिके लिये लिये है? ॥४२ नन्दीश्वर बोले — इस प्रकार अपना सारा समाचार कह सुनाया ४३ पुनः यह वचन कहा —॥४३ ॥

ब्राह्मण बोले- हे वीर! इन्द्र तुम इस समय हो? क्या तुम्हारी है अथवा विजयके पूछे जानेपर अर्जुनने । तब उन ब्राह्मणने तुम क्षात्रधर्म में स्थित होकर सुख पानेकी इच्छासे जो तप कर रहे ४४ हो, वह उचित नहीं है । हे कुरुश्रेष्ठ! क्षत्रिय तो मुक्तिहेतु तप करता है । हे श्रेष्ठ! इन्द्र सुख देनेवाले [ देवता ] हैं, वे मुक्ति नहीं दे सकते; इसलिये तुम्हें ४५ [ इस सकाम तपको छोड़कर ] सर्वथा श्रेष्ठ तप करना चाहिये ॥ ४४-४५ ॥ नन्दीश्वर बोले— उनके इस वचनको सुनकर दृढ़व्रत एवं विनयी अर्जुनने क्रोध किया और उनका ४६ निरादर करते हुए कहा —॥४६ ॥

अर्जुन बोले- मैं न तो राज्यके लिये और न तो मुक्तिके लिये तप कर रहा हूँ । तुम ऐसा क्यों बोल ४७ रहे हो? मैं व्यासजीकी आज्ञासे इस प्रकारका तप कर रहा हूँ । हे ब्रह्मचारिन्! अब यहाँसे [ शीघ्र ] चले जाओ, मुझे अपने संकल्पसे मत गिराओ । तुझ ४८ ब्रह्मचारीका यहाँ क्या प्रयोजन है? ॥ ४७-४८ ॥ नन्दीश्वर बोले — ऐसा कहे जानेपर वे [ इन्द्रदेव ] प्रसन्न हो उठे और [ वज्र आदि ] अपने उपस्करणोंसे युक्त स्वोपस्करणसंयुक्तं दर्शयामास वै निजम् ॥ ४ ९ अद्भुत तथा मनोहर अपना रूप उन्होंने दिखाया ॥ ४ ९ ॥ तब इन्द्रके रूपको देखकर अर्जुन लज्जित हो शक्ररूपं तदा दृष्ट्वा लज्जितश्चार्जुनस्तदा । उठे । इसके बाद उन्हें आश्वस्त करके इन्द्रने पुनः यह स इन्द्रस्तं समाश्वास्य पुनरेव वचोऽब्रवीत् ॥ ५० । वचन कहा- ॥ ५० ॥

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अ ० ३८ ] इन्द्र उवाच

वरं वृणीष्व हे तात धनंजय महामते ।

यदिच्छसि मनोऽभीष्टं नादेयं विद्यते तव ॥

तच्छ्रुत्वा शक्रवचनं प्रत्युवाचार्जुनस्तदा ।

विजयं देहि मे तात शत्रुक्लिष्टस्य सर्वथा ॥

शक्र उवाच

बलिष्ठाः शत्रवस्ते च दुर्योधनपुरःसराः ।

द्रोणो भीष्मश्च कर्णश्च सर्वे ते दुर्जया ध्रुवम् ॥

अश्वत्थामा द्रोणपुत्रो रौद्रोंऽशो दुर्जयोऽति सः । मयासाध्या भवेयुस्ते सर्वथा स्वहितं शृणु एतद्वीरं जयं कर्तुं न शक्तः कश्चनाधुना । वर्तते हि शिवो वर्यस्तस्माच्छम्भोर्जपोऽधुना शंकरः सर्वलोकेशश्चराचरपतिः स्वराट् । सर्वं कर्तुं समर्थोऽस्ति भुक्तिमुक्तिफलप्रदः अहमन्ये च ब्रह्माद्या विष्णुः सर्ववरप्रदः । अन्ये जिगीषवो ये च ते सर्वे शिवपूजकाः अद्यप्रभृति तन्मन्त्रं हित्वा भक्त्या शिवं भज । शतरुद्रसंहिता १७७ इन्द्र बोले - हे तात! हे धनंजय! हे महामते! तुम्हारा जो भी अभिलषित हो, वह वर मुझसे माँगो । ५१ तुम्हारे लिये कुछ भी अदेय नहीं है । तब इन्द्रके उस वचनको सुनकर अर्जुन बोले- हे तात! हर प्रकारसे ५२ शत्रुओंसे पीड़ित मुझे विजय प्रदान करें॥५१-५२ ॥ शक्र बोले- [ हे तात! ] दुर्योधन आदि तुम्हारे शत्रु बड़े बलवान् हैं और द्रोण, भीष्म एवं कर्ण– ५३ ये सब निश्चय ही [ युद्धमें ] दुर्जय हैं ॥५३ ॥

साक्षात् रुद्रका अंश द्रोणपुत्र अश्वत्थामा तो अत्यन्त ॥ ५४ दुर्जय है । वे सभी ( भीष्म, द्रोण आदि ) मुझसे भी असाध्य हैं; तो भी अपने हितकी बात सुनो ॥ ५४ ॥

हे वीर! इस ( अश्वत्थामा ) -पर विजय प्राप्त ॥ ५५ करनेमें कोई भी समर्थ नहीं है; केवल शिव ही समर्थ हैं, इसलिये अब तुम शिव - मन्त्रका जप करो ॥ ५५ ॥

सभी लोकोंके स्वामी, चराचरपति, स्वराट् और ॥ ५६ भोग तथा मोक्ष प्रदान करनेवाले शंकर सब कुछ करनेमें समर्थ हैं । ब्रह्मा आदि [ देवश्रेष्ठ ], सबको वर देनेवाले विष्णु, मैं [ स्वयं इन्द्र ], अन्य [ देवगण ] ॥ ५७ तथा विजयकी अभिलाषावाले दूसरे लोग - ये सभी भगवान् शिवकी उपासना करते हैं ॥ ५६-५७ ॥ हे भारत! आजसे इस मन्त्रका जप छोड़कर पार्थिवेन विधानेन ध्यानेनैव शिवस्य च ॥ ५८ पार्थिव - विधानसे नानाविध उपचारोंके द्वारा तन्मय उपचारैरनेकैश्च सर्वभावेन भारत सिद्धिः स्यादचला तेऽद्य नात्र कार्या विचारणा नन्दीश्वर उवाच इत्युक्त्वा च चरान्सर्वान्समाहूयाब्रवीदिदम् । सावधानेन वै स्थेयमेतत्संरक्षणे सदा प्रबोध्य स्वचरानिन्द्रोऽर्जुनसंरक्षणादिकम् वात्सल्यपूर्णहृदयः पुनरूचे कपिध्वजम् इन्द्र उवाच राज्यं त्वया प्रमादाद्वै न कर्तव्यं कदाचन श्रेयसे भद्र विद्येयं भवेत्तव परन्तप धैर्यं धार्यं साधकेन सर्वथा रक्षकः शिवः संपत्तीश्च फलं तुभ्यं दास्यते नात्र संशयः होकर भक्तिभावसे शिवजीकी आराधना करो । इस । प्रकार [ पार्थिवार्चन तथा ] ध्यानके द्वारा तुमको ॥ ५ ९ अचल सिद्धि इसी समय प्राप्त होगी, इसमें सन्देह न करो ॥ ५८-५९ ॥ नन्दीश्वर बोले- ऐसा कहकर इन्द्रने अपने सभी 1. सेवकोंको बुलाकर कहा कि तुमलोग सावधान होकर ॥ ६० इनकी रक्षा करनेके लिये सदा यहाँ रहो । इसके बाद । इन्द्रने अपने अनुचरोंको अर्जुनकी रक्षा आदिका आदेश ॥ ६१ देकर वात्सल्यपूर्वक अर्जुनसे पुनः कहा— ॥ ६०-६१ ॥ इन्द्र बोले – हे परन्तप! हे भद्र! तुम कभी भी । प्रमादपूर्वक राज्य मत करना; यह विद्या तुम्हारे ॥ ६२ । कल्याणके लिये होगी । साधकको सदा धैर्य धारण करना चाहिये । रक्षक तो शिवजी हैं ही । वे तुमको । सम्पत्तियोंके साथ फल ( मोक्ष ) भी प्रदान करेंगे; ॥ ६३ । इसमें सन्देह नहीं है ॥ ६२-६३ ॥

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१७८ नन्दीश्वर उवाच इति दत्त्वा वरं तस्य भारतस्य स्मरञ्छिवपदाम्भोजं जगाम भवनं अर्जुनोऽपि महावीरः सुप्रणम्य तपस्तेपे संयतात्मा शिवमुद्दिश्य श्रीशिवमहापुराण [ अ ० ३ ९

सुरेश्वरः ।

स्वकम् ॥ ६४

सुरेश्वरम् । तद्विधम् ॥ ६५ | नन्दीश्वर बोले- - - इस प्रकार अर्जुनको वरदान | देकर इन्द्र शिवजीके चरणकमलोंका स्मरण करते अपने भवनको चले गये ॥६४ ॥ हुए

पराक्रमी अर्जुन भी सुरेश्वरको प्रणामकर संयतचित्त | होकर शिवजीको उद्देश्य करके उसी प्रकारका तप करने लगे ॥ ६५ ॥

इति श्रीशिवमहापुराणे तृतीयायां शतरुद्रसंहितायां किरातावतारवर्णनप्रसंगेऽर्जुनतपोवर्णनं नामाष्टात्रिंशोऽध्यायः ॥ ३८ ॥

॥ इस प्रकार श्रीशिवमहापुराणके अन्तर्गत तृतीय शतरुद्रसंहितामें किरातावतारवर्णन - प्रसंगमें अर्जुनका तपवर्णन नामक अड़तीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ३८ ॥

अथैकोनचत्वारिंशोऽध्यायः मूक नामक नन्दीश्वर उवाच

स्नानं स विधिवत्कृत्वा न्यासादि विधिवत्तथा ।

ध्यानं शिवस्य सद्भक्त्या व्यासोक्तं यत्तथाकरोत् ॥

एकपादतलेनैव तिष्ठन्मुनिवरो यथा ।

सूर्ये दृष्टिं निबध्यैकां मन्त्रमावर्तयन् स्थितः ॥

तपस्तेपेति सम्प्रीत्या संस्मरन्मनसा शिवम् ।

पञ्चाक्षरं मनुं शम्भोर्जपन्सर्वोत्तमोत्तमम् ॥

तपसस्तेज एवासीद्यथा देवा विसिस्मियुः ।

पुनश्चैव शिवं याताः प्रत्यूचुस्ते समाहिताः ॥

देवा ऊचुः

नरेणैकेन सर्वेश त्वदर्थे तप आहितम् ।

यदिच्छति नरः सोऽयं किन्न यच्छति तत्प्रभो ॥

नन्दीश्वर उवाच

इत्युक्त्वा तु स्तुतिं चक्रुर्विविधां ते तदा सुराः ।

तत्पादयोर्दृशः कृत्वा तत्र तस्थुः स्थिराधयः ॥

शिवस्तु तद्वचः श्रुत्वा महाप्रभुरुदारधीः ।

सुविहस्य प्रसन्नात्मा सुरान्वचनमब्रवीत् ॥

दैत्यके वधका वर्णन नन्दीश्वर बोले- इस प्रकार व्यासजीने जैसा कहा था, उसी प्रकार अर्जुन विधिवत् स्नान, न्यासादि १ करके उत्तम भक्तिसे शिवका ध्यान करने लगे ॥१ ॥

वे एक श्रेष्ठ मुनिके समान एक पैरके तलवेपर २ स्थित होकर अपनी एकाग्र दृष्टि सूर्यमें लगाकर विधिपूर्वक शिवके मन्त्रका जप खड़े - खड़े करने लगे ॥२ ॥

वे मनसे शिवका स्मरण करते हुए तथा शिवजीके ३ सर्वोत्तम पंचाक्षरमन्त्रका जप करते हुए प्रीतिपूर्वक तप करने लगे ॥३ ॥

उनके तपका तेज ऐसा था कि देवता भी ४ आश्चर्यचकित हो गये, फिर वे शिवजीके समीप गये और सावधान होकर कहने लगे -॥४ ॥

देवता बोले — हे सर्वेश! एक मनुष्य आपको प्रसन्न करनेके लिये तप कर रहा है । अत: हे प्रभो! ५ यह मनुष्य जो कुछ चाहता है, उसे आप क्यों नहीं दे देते हैं? ॥५ ॥

नन्दीश्वर बोले — तब ऐसा कहकर चिन्ताग्रस्त वे देवगण शिवजीकी अनेक प्रकारसे स्तुति करने ६ लगे । वे उनके चरणोंपर दृष्टि लगाकर वहीं स्थित हो गये ॥६ ॥

तब उदारबुद्धिवाले महाप्रभु शिव उनका वचन सुनकर हँस करके प्रसन्नचित्त होकर देवताओंसे यह ७ वचन कहने लगे -॥७ ॥