श्रीगणेशाय नमः।
शिव महापुराण - २ — पृष्ठ 201–210
शिव महापुराण - २ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 201–210
पृष्ठ 201
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
अ ० ४१ ] शतरुद्रसंहिता नन्दीश्वर उवाच
इत्युक्त्वा तं स्वहस्ताभ्यामुत्थाप्य प्रभुरर्जुनम् ।
विलज्जं कारयामास गणैश्च स्वामिनो गुणैः ॥ २६
पुनः शिवोऽर्जुनं प्राह पाण्डवं वीरसम्मतम् ।
हर्षयन् सर्वथा प्रीत्या शङ्करो भक्तवत्सलः ॥२७
शिव उवाच
हे पार्थ पाण्डवश्रेष्ठ प्रसन्नोऽस्मि वरं वृणु ।
प्रहारैस्ताडनैस्तेऽद्य पूजनं मानितं मया ॥ २८
इच्छया च कृतं मेऽद्य नापराधस्तवाधुना ।
नादेयं विद्यते तुभ्यं यदिच्छसि वृणीष्व तत् ॥ २ ९
ते शत्रुषु यशोराज्यस्थापनाय शुभं कृतम् ।
एतद्दुःखं न कर्तव्यं वैक्लव्यं च त्यजाखिलम् ॥ ३०
नन्दीश्वर उवाच
इत्युक्तस्त्वर्जुनस्तेन प्रभुणा शङ्करेण सः ।
उवाच शङ्करं भक्त्या सावधानतया स्थितः ॥ ३१
अर्जुन उवाच
भक्तप्रियस्य शम्भोस्ते सुप्रभो किं समीहितम् ।
वर्णनीयं मया देव कृपालुस्त्वं सदाशिव ॥ ३२
इत्युक्त्वा संस्तुतिं तस्य शङ्करस्य महाप्रभोः ।
चकार पाण्डवः सोऽथ सद्भक्तिं वेदसम्मताम् ॥ ३३ ।
अर्जुन उवाच
नमस्ते देवदेवाय नमः कैलासवासिने ।
सदाशिव नमस्तुभ्यं पञ्चवक्त्राय ते नमः ॥३४
कपर्दिने नमस्तुभ्यं त्रिनेत्राय नमोऽस्तु ते ।
नमः प्रसन्नरूपाय सहस्रवदनाय च ॥ ३५
१८ ९ नन्दीश्वर बोले- इस प्रकार कहकर प्रभु सदाशिवने स्वयं अपने हाथोंसे अर्जुनको उठाया और स्वामी [ शिवजी ] -के जैसे गुणोंवाले गणोंद्वारा उन [ अर्जुन ] -की लज्जा दूर करायी । उसके अनन्तर भक्तवत्सल भगवान् शिव वीरोंमें माननीय पाण्डुपुत्र अर्जुनको प्रीतिसे पूर्णतः हर्षित करते हुए कहने लगे— ॥ २६-२७ ॥ शिवजी बोले- हे पाण्डवश्रेष्ठ! हे पृथापुत्र अर्जुन! मैं प्रसन्न हूँ, तुम वर माँगो । मैंने तुम्हारे द्वारा आज किये गये प्रहारों एवं सन्ताड़नोंको अपनी पूजा मान ली है । आज यह सब मैंने अपनी इच्छासे किया है, इसमें तुम्हारा कोई अपराध नहीं है, मुझे तुम्हारे लिये इस समय कुछ भी अदेय नहीं है, तुम जो चाहते हो, उसे माँग लो । मैंने शत्रुओंमें तुम्हारा यश तथा राज्य प्रतिष्ठित करनेके लिये [ ही यह ] कल्याणकर [ कृत्य ] किया है । तुम इस घटनाके लिये दुःख न मानो और अपनी सारी विकलताका त्याग करो ॥ २८-३० ॥ नन्दीश्वर बोले- प्रभु शंकरजीके द्वारा इस प्रकार कहे जानेपर अर्जुन सावधान होकर भक्तिपूर्वक शिवजीसे कहने लगे — ॥ ३१ ॥
अर्जुन बोले - हे प्रभो! आप भक्तप्रिय हैं, आपकी इच्छाका वर्णन मैं किस प्रकार कर सकता हूँ । हे सदाशिव! आप कृपालु हैं [ हर प्रकारसे भक्तोंपर दया करते हैं ] ॥ ३२ ॥
[ नन्दीश्वर बोले- - ] इस प्रकार कहकर वे पाण्डुपुत्र अर्जुन महाप्रभु सदाशिवकी वेदसम्मत तथा सद्भक्तियुक्त स्तुति करने लगे ॥ ३३ ॥
अर्जुन बोले – हे देवाधिदेव! आपको नमस्कार है । कैलासवासी आपको नमस्कार है, सदाशिव! आपको नमस्कार है, पाँच मुखवाले आपको नमस्कार है ॥ ३४ ॥
जटा - जूटधारी आपको नमस्कार है, त्रिनेत्र आपको
नमस्कार है, प्रसन्न स्वरूपवाले आपको नमस्कार है ।
। सहस्रमुख आपको नमस्कार है ॥ ३५ ॥
पृष्ठ 202
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
१ ९ ० नीलकण्ठ नमस्तेऽस्तु सद्योजाताय वै नमः वृषध्वज नमस्तेऽस्तु वामाङ्गगिरिजाय च दशदोष नमस्तुभ्यं नमस्ते परमात्मने डमरूकपालहस्ताय नमस्ते मुण्डमालिने शुद्धस्फटिकसंकाशशुद्धकर्पूरवर्ष्मणे पिनाकपाणये तुभ्यं त्रिशूलवरधारिणे ॥
व्याघ्रचर्मोत्तरीयाय गजाम्बरविधारिणे ।
नागाङ्गाय नमस्तुभ्यं गंगाधर नमोऽस्तु ते ॥
सुपादाय नमस्तेऽस्तु आरक्तचरणाय च ।
नन्द्यादिगणसेव्याय गणेशाय च ते नमः ॥
नमो गणेशरूपाय कार्तिकेयानुगाय च ।
भक्तिदाय च भक्तानां मुक्तिदाय नमो नमः ॥
अगुणाय नमस्तेऽस्तु सगुणाय नमो नमः ।
अरूपाय सरूपाय सकलायाकलाय च ॥
नमः किरातरूपाय मदनुग्रहकारिणे ।
युद्धप्रियाय वीराणां नानालीलानुकारिणे ॥
यत्किञ्चित् दृश्यते रूपं तत्तेजस्तावकं स्मृतम् ।
चिद्रूपस्त्वं त्रिलोकेषु रमसेऽन्वयभेदतः ॥
गुणानां ते न सङ्ख्यास्ति यथा भूरजसामिह ।
आकाशे तारकाणां हि कणानां वृष्ट्यपामपि ॥
न ते गुणांस्तु सङ्ख्यातुं वेदा वै सम्भवन्ति हि । श्रीशिवमहापुराण [ अ ० ४१ । हे नीलकण्ठ! आपको नमस्कार है । सद्योजातरूप ॥ ३६ आपके लिये नमस्कार है । हे वृषभध्वज! आपको | नमस्कार है, वामभागमें पार्वतीको धारण करनेवाले आपको नमस्कार है । दस भुजावाले आपको नमस्कार । है, परमात्मन्! आपको नमस्कार है, हाथमें डमरू ॥ ३७ तथा कपाल लेनेवाले आपको नमस्कार है, मुण्डमालाधारी आपको नमस्कार है ॥ ३६-३७ ॥ शुद्ध स्फटिक तथा शुद्ध कर्पूरके समान ३८ उज्ज्वल गौर - वर्णवाले आपको नमस्कार है । पिनाक नामक धनुष एवं श्रेष्ठ त्रिशूल धारण करनेवाले आपको नमस्कार है । व्याघ्र - चर्मका उत्तरीय तथा गजचर्मका वस्त्र धारण करनेवाले आपको नमस्कार ३ ९ है । सर्पसे आवेष्टित अंगोंवाले तथा सिरपर गंगाको धारण करनेवाले आपको नमस्कार है ॥ ३८-३९ ॥ सुन्दर पैरवाले आपको नमस्कार है । अरुणाभ ४० चरणोंवाले आपको नमस्कार है । नन्दी आदि प्रमुख गणोंसे सेवित आपको नमस्कार है । गणेशरूप आपको नमस्कार है । कार्तिकेयके अनुगामी आपको नमस्कार है, भक्तोंको भक्ति देनेवाले तथा [ मुमुक्षुओंको ] मुक्ति ४१ देनेवाले आपको नमस्कार है॥४०-४१ ॥ गुणरहित आपको नमस्कार है, सगुणरूपधारी ४२ आपको नमस्कार है । अरूप, सरूप, सकल एवं अकल आपको नमस्कार है । किरातरूप धारणकर मुझपर अनुग्रह करनेवाले, वीरोंसे प्रीतिपूर्वक युद्ध करनेवाले ४३ एवं [ नटकी भाँति ] अनेक प्रकारकी लीला दिखानेवाले आपको नमस्कार है॥४२-४३ ॥ इस त्रिलोकीमें जो भी रूप दिखायी देता है, वह ४४ आपका ही तेज कहा गया है । आप ज्ञानस्वरूप हैं और शरीरभेदसे रमण करते हैं । हे प्रभो! जिस प्रकार संसारमें पृथ्वीके रजकण, आकाशके तारे तथा वृष्टिकी ४५ बूँदें असंख्य हैं, उसी प्रकार आपके गुण भी असंख्य हैं ॥ ४४-४५ ॥ हे नाथ! आपके गुणोंकी गणना करनेमें तो । वेद भी असमर्थ हैं मैं तो मन्दबुद्धि ही हूँ । आप मन्दबुद्धिरहं नाथ वर्णयामि कथं पुनः ॥ ४६ गुणोंका वर्णन कैसे, करूँ? हे महेश्वर! आप जो हैं,
पृष्ठ 203
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
अ ० ४१ ]
सोऽसि योऽसि नमस्तेऽस्तु कृपां कर्तुमिहार्हसि ।
दासोऽहं ते महेशान स्वामी त्वं मे महेश्वर ॥
नन्दीश्वर उवाच
इति श्रुत्वा वचस्तस्य पुनः प्रोवाच शङ्करः ।
सुप्रसन्नतरो भूत्वा विहसन्प्रभुरर्जुनम् ॥
शङ्कर उवाच
वचसा किम्बहूक्तेन शृणुष्व वचनं मम ।
शीघ्रं वृणु वरं पुत्र सर्वं तच्च ददामि ते ॥
नन्दीश्वर उवाच इत्युक्तश्चार्जुनस्तेन प्रणिपत्य सदाशिवम् । शतरुद्रसंहिता १ ९ १ । सो हैं, आपको नमस्कार है । हे महेशान! मैं आपका ४७ सेवक हूँ, आप मेरे स्वामी हैं, अतः मुझपर कृपा | कीजिये ॥ ४६-४७ ॥ नन्दीश्वर बोले- अर्जुनके द्वारा की गयी स्तुतिको सुनकर परम प्रसन्न हुए भगवान् सदाशिवने ४८ हँसकर अर्जुनसे फिर कहा- ॥ ४८ ॥
शिवजी बोले- हे पुत्र! बारंबार कहनेसे क्या प्रयोजन, मेरी बात सुनो । तुम शीघ्र ही मुझसे वर ४ ९ माँगो, मैं तुम्हें वह सब कुछ दूँगा ॥ ४ ९ ॥ नन्दीश्वर बोले- शिवजीका यह वचन सुनकर अर्जुनने सदाशिवको हाथ जोड़कर प्रणाम साञ्जलिर्नतकः प्रेम्णा प्रोवाच गद्गदाक्षरम् ॥५० किया और सिर झुका करके प्रेमपूर्वक गद्गद वाणीसे अर्जुन उवाच
किं ब्रूयां त्वं च सर्वेषामन्तर्यामितया स्थितः ।
तथापि वर्णितं मेऽद्य श्रूयतां च त्वया विभो ॥
शत्रूणां सङ्कटं यच्च तद्गतं दर्शनात्तव ।
ऐहिकीं च परां सिद्धिं प्राप्नुयां वै तथा कुरु ॥
नन्दीश्वर उवाच
इत्युक्त्वा तं नमस्कृत्य शङ्करं भक्तवत्सलम् ।
नतस्कन्धोऽर्जुनस्तत्र बद्धाञ्जलिरुपस्थितः ॥
शिवोऽपि च तथाभूतं ज्ञात्वा पाण्डवमर्जुनम् ।
निजभक्तवरं स्वामी महातुष्टो बभूव ह ॥
अस्त्रं पाशुपतं स्वीयं दुर्जयं सर्वदाखिलैः ।
ददौ तस्मै महेशानो वचनं चेदमब्रवीत् ॥
शिव उवाच
स्वं महास्त्रं मया दत्तं दुर्जयस्त्वं भविष्यसि ।
अनेन सर्वशत्रूणां जयकृत्यमवाप्नुहि ॥
कृष्णं च कथयिष्यामि साहाय्यं ते करिष्यति ।
स वै ममात्मभूतश्च मद्भक्तः कार्यकारकः ॥
कहा- ॥ ५० ॥
अर्जुन बोले- हे प्रभो! आप तो सबके अन्तःकरणमें अन्तर्यामीरूपसे स्थित हैं, अतः आपसे ५१ क्या कहूँ । आप सब कुछ जानते हैं, फिर भी मैं आपसे जो प्रार्थना करता हूँ, उसे सुनिये । आपके दर्शनसे शत्रुओंसे उत्पन्न होनेवाला जो मेरा संकट था, वह दूर हो गया । अब मैं जिस प्रकार इस ५२ लोकमें सर्वश्रेष्ठ सिद्धि प्राप्त करूँ, वैसा उपाय कीजिये ॥ ५१-५२ ॥ नन्दीश्वर बोले- ऐसा कहकर विनम्र हो हाथ जोड़कर अर्जुन नमस्कार करके भक्तवत्सल भगवान् ५३ शिवके सन्निकट स्थित हो गये ॥५३ ॥
स्वामी शिवजी भी पाण्डुपुत्र अर्जुनको इस ५४ प्रकार अपना परमभक्त जानकर बहुत सन्तुष्ट हो गये ॥ ५४ ॥
उन्होंने प्रसन्न होकर सभीके लिये सर्वदा ५५ दुर्जेय अपना पाशुपत अस्त्र अर्जुनको प्रदान किया और यह वचन कहा— ॥ ५५ ॥
शिवजी बोले- मैंने अपना यह महान् पाशुपत - अस्त्र तुम्हें प्रदान किया । [ हे अर्जुन! ] तुम ५६ इससे दुर्जेय हो जाओगे, तुम इस अस्त्रकी सहायतासे शत्रुओंपर विजय प्राप्त करो । मैं स्वयं श्रीकृष्णसे कहूँगा कि वे तुम्हारी सहायता करें । वे मेरे भक्त तथा मेरी आत्मा हैं और कार्य करनेमें सर्वथा समर्थ ५७ हैं॥५६-५७ ॥
पृष्ठ 204
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
श्रीशिवमहापुराण [ अ ० ४१ १ ९ २
त्वं राज्यं निष्कण्टकं कुरु ।
मत्प्रभावान्भारत कारय त्वं च सर्वदा ॥ ५८
धर्म्मान्नानाविधान्भ्रात्रा नन्दीश्वर उवाच
इत्युक्त्वा निजहस्तं च धृत्वा शिरसि तस्य सः ।
ह्यर्जुनेनाशु शङ्करोऽन्तरधीयत ॥ ५ ९
पूजितो प्रसन्नात्मा प्राप्यास्त्रं च वरं प्रभोः ।
अथार्जुनः मुख्यं स्मरन्भक्त्या गुरुं शिवम् ॥ ६०
जगाम स्वाश्रमं
सर्वे ते भ्रातरः प्रीतास्तन्वः प्राणमिवागतम् ।
मिलित्वा तं सुखं प्रापुद्रौपदी चातिसुव्रता ॥ ६१
शिवं परं च सन्तुष्टं पाण्डवाः सर्व एव हि ।
नातृप्यन्सर्ववृत्तान्तं श्रुत्वा हर्षमुपागताः ॥ ६२
आश्रमे पुष्पवृष्टिश्च चन्दनेन समन्विता ।
पपात सुकरार्थं च तेषां चैव महात्मनाम् ॥ ६३
धन्यं च शङ्करं चैव नमस्कृत्य शिवं मुदा ।
अवधिं चागतं ज्ञात्वा जयश्चैव भविष्यति ॥ ६४
एतस्मिन्नन्तरे कृष्णः श्रुत्वार्जुनमथागतम् ।
मेलनाय समायातः श्रुत्वा सुखमुपागतः ॥ ६५
अतश्चैव मयाख्यातः शङ्करः सर्वदुःखहा ।
स सेव्यते मया नित्यं भवद्भिरपि सेव्यताम् ॥ ६६
इत्युक्तस्ते किराताह्वोऽवतारः शङ्करस्य वै ।
तं श्रुत्वा श्रावयन्वापि सर्वान्कामानवाप्नुयात् ॥ ६७
हे भारत! अब तुम मेरे प्रभावसे निष्कण्टक राज्य करो और अपने भ्राता [ युधिष्ठिर ] -से सर्वदा नाना प्रकारका धर्माचरण कराते रहो ॥५८ ॥
नन्दीश्वर बोले- ऐसा कहकर उन शिवने अर्जुनके सिरपर अपना हाथ रखा और उनसे पूजित होकर वे तत्काल अन्तर्धान हो गये और प्रसन्न | मनवाले अर्जुन भी प्रभुसे श्रेष्ठ पाशुपतास्त्र प्राप्तकर भक्तिपूर्वक गुरुवर शिवजीका स्मरण करते हुए अपने आश्रमको चले गये ॥ ५ ९ -६० ॥ जिस प्रकार शरीरमें पुनः प्राण आ जाता है, उसी प्रकार अर्जुनको आया देख [ युधिष्ठिर आदि ] सभी भाई प्रसन्न हो गये और पतिव्रता द्रौपदीको भी अर्जुनके दर्शनसे सुखकी प्राप्ति हुई ॥ ६१ ॥
सभी पाण्डव परमात्मा शिवजीको प्रसन्न जानकर आनन्दित हो गये तथा अर्जुनसे सारा समाचार सुनकर [ भी उस वृत्तान्त - श्रवणसे ] तृप्त नहीं हुए ॥ ६२ ॥
उस समय उन महात्मा पाण्डवोंके आश्रममें उनका मंगल प्रदर्शित करनेके लिये चन्दनयुक्त फूलोंकी वर्षा होने लगी ॥ ६३ ॥
उन लोगोंने भगवान् शंकरको धन्य - धन्य कहते हुए आनन्दके साथ नमस्कार किया और अपने वनवासकी अवधिको समाप्त जानकर यह समझ लिया कि अब अवश्य ही हमलोगोंकी विजय होगी ॥ ६४ ॥
इसी समय अर्जुनको आश्रमपर आया हुआ जानकर श्रीकृष्ण उनसे मिलनेके लिये आये और सारा वृत्तान्त जानकर हर्षित हुए [ और कहने लगे - ] ॥ ६५ ॥
इसीलिये तो मैंने कहा था कि शंकर सभी दुःखोंको नष्ट करनेवाले हैं । मैं उनकी सेवा नित्य करता हूँ, आपलोग भी नित्य उनकी सेवा करें । [ हे सनत्कुमार! ] इस प्रकार मैंने किरातेश्वर नामक शिवावतारका वर्णन आपसे किया, उसको सुनकर | अथवा सुनाकर भी मनुष्य अपने समस्त मनोरथोंको । प्राप्त कर लेता है ॥ ६६-६७ ॥ इति श्रीशिवमहापुराणे तृतीयायां शतरुद्रसंहितायां किरातेश्वरावतारवर्णनं नामैकचत्वारिंशोऽध्यायः ॥ ४१ ॥
॥ इस प्रकार श्रीशिवमहापुराणके अन्तर्गत तृतीय शतरुद्रसंहितामें किरातेश्वरावतारवर्णन नामक इकतालीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ४१ ॥
पृष्ठ 205
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
अ ० ४२ ] शतरुद्रसंहिता १ ९ ३ अथ द्विचत्वारिंशोऽध्यायः भगवान् शिवके द्वादश ज्योतिर्लिंगरूप अवतारोंका वर्णन नन्दीश्वर उवाच
अवतारान् शृणु विभोर्द्वादशप्रमितान्परान् ।
ज्योतिर्लिङ्गस्वरूपान्वै नानोतिकारकान्मुने ॥
सौराष्ट्रे सोमनाथश्च श्रीशैले मल्लिकार्जुनः ।
उज्जयिन्यां महाकाल ओङ्कारे चामरेश्वरः ॥
केदारो हिमवत्पृष्ठे डाकिन्याम्भीमशङ्करः ।
वाराणस्यां च विश्वेशस्त्र्यम्बको गौतमीतटे ॥
वैद्यनाथश्चिताभूमौ नागेशो दारुकावने ।
सेतुबन्धे च रामेशो घुश्मेशश्च शिवालये ॥
अवतारद्वादशकमेतच्छम्भोः परात्मनः ।
सर्वानन्दकरं पुंसां दर्शनात्स्पर्शनान्मुने ॥
तत्राद्यः सोमनाथो हि चन्द्रदुःखक्षयंकरः ।
क्षयकुष्ठादिरोगाणां नाशकः पूजनान्मुने ॥
शिवावतारः सोमेशो लिङ्गरूपेण संस्थितः ।
सौराष्ट्रे शुभदेशे च शशिना पूजितः पुरा ॥
चन्द्रकुण्डं च तत्रैव सर्वपापविनाशकम् ।
तत्र स्नात्वा नरो धीमान्सर्वरोगैः प्रमुच्यते ॥
सोमेश्वरं महालिङ्गं शिवस्य परमात्मकम् ।
दृष्ट्वा प्रमुच्यते पापाद्भुक्तिं मुक्तिं च विन्दति ॥
मल्लिकार्जुनसंज्ञश्चावतारः शङ्करस्य वै ।
द्वितीयः श्रीगिरौ तात भक्ताभीष्टफलप्रदः ॥
संस्तुतो लिङ्गरूपेण सुतदर्शनहेतुतः ।
गतस्तत्र महाप्रीत्या स शिवः स्वगिरेर्मुने ॥
ज्योतिर्लिङ्गं द्वितीयं तद्दर्शनात्पूजनान्मुने । महासुखकरं चान्ते मुक्तिदं नात्र संशयः नन्दीश्वरजी बोले— [ हे सनत्कुमार! ] हे मुने! अब अनेक प्रकारकी लीला करनेवाले परमात्मा १ शिवजीके ज्योतिर्लिंगरूप द्वादशसंख्यक अवतारोंको सुनिये ॥१ ॥
सौराष्ट्रमें सोमनाथ, श्रीशैलपर मल्लिकार्जुन, २ उज्जयिनीमें महाकाल, ॐकारमें अमरेश्वर, हिमालयपर केदारेश्वर, डाकिनीमें भीमशंकर, काशीमें विश्वनाथ, ३ गौतमीतटपर त्र्यम्बकेश्वर, चिताभूमिमें वैद्यनाथ, दारुका-वनमें नागेश्वर, सेतुबन्धमें रामेश्वर एवं शिवालयमें ४ घुश्मेश्वर – [ ये बारह शिवजीके ज्योतिर्लिंगस्वरूप अवतार हैं ] ॥२–४ ॥ हे मुने! ये परमात्मा शिवके बारह ज्योतिर्लिंगावतार ५ दर्शन तथा स्पर्शसे पुरुषोंका कल्याण करनेवाले हैं ॥ ५ ॥
इन द्वादश ज्योतिर्लिंगोंमें प्रथम सोमनाथ नामक ६ ज्योतिर्लिंग चन्द्रमाके दुःखका नाश करनेवाला है, उसके पूजनसे क्षय और कुष्ठ आदि रोगोंका विनाश होता है । यह सोमेश नामक शिवावतार सुन्दर ७ सौराष्ट्रदेशमें लिंगरूपसे स्थित है, पूर्वकालमें चन्द्रमाने इसकी पूजा की थी ॥ ६-७ ॥ वहींपर चन्द्रकुण्ड है, जो समस्त पापोंका नाश ८ करनेवाला है । बुद्धिमान् पुरुष वहाँ स्नान करनेमात्रसे सभी प्रकारके रोगोंसे छुटकारा पा जाता है ॥ ८ ॥
शिवजीके परमात्मस्वरूप महालिंग सोमेश्वरका ९ दर्शन करनेसे मनुष्य पापोंसे मुक्त हो जाता है और भोग तथा मोक्ष प्राप्त करता है ॥ ९ ॥
हे तात! शिवका मल्लिकार्जुन नामक दूसरा १० अवतार श्रीशैलपर हुआ था, जो भक्तोंको मनोवांछित फल प्रदान करता है । हे मुने! वे भगवान् शिव कैलासपर्वतसे पुत्र [ कार्तिकेय ] को देखनेके लिये ११ अत्यन्त प्रीतिपूर्वक श्रीशैलपर गये और वहाँ लिंगरूपसे [ भक्तोंके द्वारा ] संस्तुत हुए ॥ १०-११ ॥ हे मुने! उस द्वितीय ज्योतिर्लिंगकी पूजा करनेसे महान् सुखकी प्राप्ति होती है और अन्त समयमें वह ॥ १२ । निःसन्देह मुक्ति प्रदान करता है ॥१२ ॥
2224 Shivmahapuran IInd Part Section 8 1 Front
पृष्ठ 206
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
१ ९ ४ महाकालाभिधस्तातावतारः शङ्करस्य वै उज्जयिन्यां नगर्यां च बभूव स्वजनावनः दूषणाख्यासुरं यस्तु वेदधर्मप्रमर्दकम् उज्जयिन्यां गतं विप्रद्वेषिणं सर्वनाशनम् ॥
वेदविप्रसुतध्यातो हुङ्कारेणैव स द्रुतम् ।
भस्मसात्कृतवांस्तं च रत्नमालनिवासिनम् ॥
तं हत्वा स महाकालो ज्योतिर्लिङ्गस्वरूपतः ।
देवैः स प्रार्थितोऽतिष्ठत्स्वभक्तपरिपालकः ॥
महाकालाह्वयं लिङ्गं दृष्ट्वाभ्यर्च्य प्रयत्नतः ।
सर्वान्कामानवाप्नोति लभते परतो गतिम् ॥
ओङ्कारः परमेशानो धृतः शम्भोः परात्मनः ।
अवतारश्चतुर्थो हि भक्ताभीष्टफलप्रदः ॥
विधिना स्थापितो भक्त्या स्वलिङ्गात्पार्थिवान्मुने ।
प्रादुर्भूतो महादेवो विन्ध्यकामप्रपूरकः ॥
देवैः संप्रार्थितस्तत्र द्विधारूपेण संस्थितः ।
भुक्तिमुक्तिप्रदो लिङ्गरूपो वै भक्तवत्सलः ॥
प्रणवे चैव चोङ्कारनामासील्लिङ्गमुत्तमम् ।
परमेश्वरनामासीत्पार्थिवश्च मुनीश्वर ॥
भक्ताभीष्टप्रदो ज्ञेयो योऽपि दृष्टोऽर्चितो मुने ।
ज्योतिर्लिंगे महादिव्ये वर्णिते ते महामुने ॥
केदारेशोऽवतारस्तु पञ्चमः परमश्शिवः । श्रीशिवमहापुराण [ अ ० ४२ । हे तात! शिवजीका तीसरा महाकाल नामक ॥ १३ अवतार उज्जयिनीमें अपने भक्तोंकी रक्षाके लिये हुआ था । पूर्वकालमें रत्नमाला [ नामक स्थान ] -पर निवास । । करनेवाला, वेदोक्त धर्मका विध्वंसक, सर्वनाशक , १४ ब्राह्मण - द्वेषी दूषण नामक असुर उज्जयिनी गया । तब । वेद नामक ब्राह्मणके पुत्रने शिवजीका ध्यान किया । तब [ [ प्रकट हुए ] उन शिवजीने उस असुरको हुंकारमात्रसे १५ उसी समय भस्म कर दिया था ॥ १३–१५ ॥ इस प्रकार उस दैत्यको मारकर देवगणोंसे १६ प्रार्थित होकर अपने भक्तजनोंकी रक्षाके लिये वे महाकाल नामक ज्योतिर्लिंगस्वरूपसे वहीं उज्जयिनीमें प्रतिष्ठित हुए । इस महाकाल नामक ज्योतिर्लिंगके १७ दर्शन तथा यत्नपूर्वक पूजनसे सभी कामनाएँ सिद्ध हो जाती हैं और अन्तमें उत्तम गतिकी प्राप्ति होती है ॥ १६-१७ ॥ परमात्मा शिवजीके द्वारा धारण किया गया १८ परमैश्वर्यसम्पन्न चौथा अवतार ॐकारेश्वर नामसे प्रसिद्ध है, जो भक्तोंको इच्छित फल देनेवाला है ॥ १८ ॥
विन्ध्यके द्वारा भक्तिभावसे विधिपूर्वक पार्थिव १ ९ लिंग स्थापित किया गया, जिससे विन्ध्यकी कामनाओंको पूर्ण करनेवाले वे महादेव आविर्भूत हुए ॥१ ९ ॥ देवगणोंके द्वारा प्रार्थना किये जानेपर शिवजी २० वहाँ दो रूपोंमें स्थित हो गये । [ हे मुनीश्वर! ] लिंगरूपसे स्थित हुए वे भक्तोंपर कृपा करनेवाले और भोग तथा मोक्ष देनेवाले हैं ॥ २० ॥
हे मुनीश्वर! प्रणवमें ओंकार नामसे स्थित शिव २१ ओंकारेश्वर नामसे प्रसिद्ध हैं और पार्थिव लिंग परमेश्वर नामसे प्रसिद्ध है, हे महामुने! इनके दर्शन तथा पूजन करनेसे भक्तोंको अभीष्ट फलकी प्राप्ति होती है । इस २२ प्रकार मैंने आपसे चतुर्थ स्थानीय ॐकारेश्वर तथा परमेश्वर ज्योतिर्लिंगोंका वर्णन किया ॥ २१-२२ ॥ परमशिवका पाँचवाँ अवतार केदारेश नामवाला है, ज्योतिर्लिङ्गस्वरूपेण केदारे संस्थितः स च ॥ २३ यह ज्योतिर्लिंगरूपसे केदारक्षेत्रमें स्थित है । हे मुने! विष्णुके जो नर - नारायण नामक अवतार हैं, नरनारायणाख्यौ याववतारौ उनके द्वारा तथा वहाँके निवासियोंद्वारा प्रार्थना किये तत्प्रार्थितः शिवस्तत्स्थैः हरेर्मुने । जानेपर वे शिव हिमालयके केदार नामक स्थानपर
केदारे हिमभूधरे ॥ २४ । स्थित हुए॥२३-२४ ॥
2224 Shivmahapuran_IInd Part Section 8 1_Back
पृष्ठ 207
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
अ ० ४२ ] शतरुद्रसंहिता १ ९ ५
ताभ्यां च पूजितो नित्यं केदारेश्वरसंज्ञकः ।
भक्ताभीष्टप्रदः शम्भुर्दर्शनादर्चनादपि ॥
अस्य खण्डस्य स स्वामी सर्वेशोऽपि विशेषतः ।
सर्वकामप्रदस्तात सोऽवतारः शिवस्य वै ॥
भीमशङ्करसंज्ञस्तु षष्ठः शम्भोर्महाप्रभोः ।
अवतारो महालीलो भीमासुरविनाशनः ॥
सुदक्षिणाभिधं भक्तं कामरूपेश्वरं नृपम् ।
यो ररक्षाद्भुतं हत्वासुरं तं भक्तदुःखदम् ॥
भीमशङ्करनामा स डाकिन्यां संस्थितः स्वयम् ।
ज्योतिर्लिङ्गस्वरूपेण प्रार्थितस्तेन शङ्करः ॥
विश्वेश्वरावतारस्तु काश्यां जातो हि सप्तमः ।
सर्वब्रह्माण्डरूपश्च भुक्तिमुक्तिप्रदो मुने ॥
पूजितः सर्वदेवैश्च भक्त्या विष्ण्वादिभिः सदा ।
कैलासपतिना चापि भैरवेणापि नित्यशः ॥
ज्योतिर्लिङ्गस्वरूपेण संस्थितस्तत्र मुक्तिदः ।
स्वयंसिद्धस्वरूपो हि तथा स्वपुरि स प्रभुः ॥
काशीविश्वेशयोर्भक्त्या तन्नामजपकारकाः निर्लिप्ताः कर्मभिर्नित्यं कैवल्यपदभागिनः त्र्यंबकाख्योऽवतारो यः सोऽष्टमो गौतमीतटे प्रार्थितो गौतमेनाविर्बभूव शशिमौलिनः गौतमस्य प्रार्थनया ज्योतिर्लिङ्गस्वरूपतः स्थितस्तत्राचलः प्रीत्या तन्मुनेः प्रीतिकाम्यया महेशितुः उन दोनोंने ही इन केदारेश्वर नामक ज्योतिर्लिंगकी २५ पूजा की थी । ये केदारेश्वर नामक शिव दर्शन तथा अर्चनसे भक्तोंके मनोरथोंको पूर्ण करनेवाले हैं ॥ २५ ॥
हे तात! शिवजीका यह केदारसंज्ञक २६ अवतार सर्वेश्वर होनेपर भी इस केदारखण्डका विशेषरूपसे स्वामी है, जो भक्तोंकी सभी मनोकामनाएँ पूर्ण करनेवाला है । शिवजीका छठा ज्योतिर्लिंगावतार भीमशंकर नामसे प्रसिद्ध है । यह अवतार महान् लीला २७ करनेवाला है और भीम नामक असुरका विनाशक है ॥ २६-२७ ॥ इन्हीं भीमशंकरने भक्तोंको दुःख देनेवाले [ भीम २८ नामक ] अद्भुत दैत्यको मारकर कामरूप देशके सुदक्षिण नामक भक्त राजाकी रक्षा की थी ॥ २८ ॥
इसलिये वे राजाद्वारा प्रार्थना किये जानेपर २ ९ भीमशंकर नामक ज्योतिर्लिंगके रूपसे उस डाकिनी नामक स्थानमें स्वयं प्रतिष्ठित हुए ॥ २ ९ ॥ हे मुने! शिवजीका सातवाँ विश्वेश्वर नामक ३० अवतार काशीमें हुआ । जो समस्त ब्रह्माण्डका स्वरूप है एवं भोग तथा मोक्षको देनेवाला है ॥ ३० ॥
विष्णु आदि समस्त देवोंने इस विश्वेश्वर ३१ ज्योतिर्लिंगका पूजन किया और कैलासपति भैरव तो इनकी नित्य ही पूजा करते हैं ॥३१ ॥
स्वयं सिद्धस्वरूप ये प्रभु अपनी [ काशी ] ३२ पुरीमें ज्योतिर्लिंगस्वरूपसे विराजमान हैं तथा [ मुमुक्षुओंको ] वहाँपर मुक्ति प्रदान कर रहे हैं ॥ ३२ ॥
। जो लोग भक्तिपूर्वक काशी तथा विश्वेश्वरके ॥ ३३ नामका निरन्तर जप करते हैं, वे कर्मोंसे सर्वदा निर्लिप्त रहकर कैवल्यपदके भागी होते हैं ॥ ३३ ॥
। शिवजीका त्र्यम्बक नामक आठवाँ अवतार ॥ ३४ महर्षि गौतमके द्वारा प्रार्थना किये जानेपर गौतमीके तटपर हुआ और महर्षि गौतमद्वारा प्रार्थना किये । जानेपर वहींपर उनकी प्रसन्नताके लिये शिवजी ॥ ३५ ज्योतिर्लिंगस्वरूपसे अचल होकर प्रेमपूर्वक प्रतिष्ठित हो गये॥३४-३५ ॥ उन महेश्वरके दर्शन, स्पर्श एवं अर्चनसे सभी । कामनाएँ पूर्ण होती हैं और अन्तमें मुक्ति हो जाती है, तस्य सन्दर्शनात्स्पर्शादर्चनाच्च
ततो मुक्तिर्भवेदहो ॥ ३६ । यह आश्चर्यकारी है ॥३६ ॥
सर्वे कामाः प्रसिध्यन्ति 2224 Shivmahapuran_IInd Part_Section_8_2_Front
पृष्ठ 208
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
श्रीशिवमहापुराण [ अ ० ४२ १ ९ ६ तु गौतमी । शिवके अनुग्रहसे वहाँपर गौतमके प्रीतिवश शिवानुग्रहतस्तत्र गङ्गा नाम्ना पवित्र करनेवाली शिवप्रिया गंगा गौतमी नामसे स्थित संस्थिता गौतमप्रीत्या पावनी शङ्करप्रिया ॥ ३७ । वैद्यनाथावतारो हि 1 नवमस्तत्र कीर्तितः आविर्भूतो रावणार्थं बहुलीलाकरः प्रभुः तदानयनरूपं हि व्याजं कृत्वा महेश्वरः ज्योतिर्लिङ्गस्वरूपेण चिताभूमौ प्रतिष्ठितः वैद्यनाथेश्वरो नाम्ना प्रसिद्धोऽभूज्जगत्त्रये हैं ॥ ३७ ॥
। शिवजीका नौवाँ ज्योतिर्लिंगावतार वैद्यनाथेश्वर ॥ ३८ नामसे प्रसिद्ध है । नानाविध लीलाएँ करनेवाले वे प्रभु । रावणके निमित्त प्रकट हुए थे । भगवान् महेश्वर । । रावणके द्वारा लाये जानेके बहाने चिताभूमिमें ॥ ३ ९ ज्योतिर्लिंगस्वरूपसे प्रतिष्ठित हो गये ॥ ३८-३९ ॥ । यह ज्योतिर्लिंग वैद्यनाथेश्वर नामसे तीनों लोकोंमें दर्शनात्पूजनाद्भक्त्या भुक्तिमुक्तिप्रदः स हि ॥ ४० प्रसिद्ध हुआ । भक्तिपूर्वक दर्शन और पूजन करनेसे वैद्यनाथेश्वरशिवमाहात्म्यमनुशासनम् पठतां शृण्वतां चापि भुक्तिमुक्तिप्रदं मुने
नागेश्वरावतारस्तु दशमः परिकीर्तितः ।
आविर्भूतः स्वभक्तार्थं दुष्टानां दण्डदः सदा ॥
हत्वा दारुकनामानं राक्षसं धर्मघातकम् ।
स्वभक्तं वैश्यनाथं च प्रारक्षत्सुप्रियाभिधम् ॥
लोकानामुपकारार्थं ज्योतिर्लिङ्गस्वरूपधृक् ।
सन्तस्थौ साम्बिकः शम्भुर्बहुलीलाकरः परः ॥
तद् दृष्ट्वा शिवलिङ्गं तु मुने नागेश्वराभिधम् ।
विनश्यन्ति द्रुतं चार्च्य महापातकराशयः ॥
रामेश्वरावतारस्तु शिवस्यैकादशः स्मृतः ।
रामचन्द्रप्रियकरो रामसंस्थापितो मुने ॥
ददौ जयवरं प्रीत्या यो रामाय सुतोषितः ।
आविर्भूतः स लिङ्गस्तु शङ्करो भक्तवत्सलः ॥
रामेण प्रार्थितोऽत्यर्थं ज्योतिर्लिङ्गस्वरूपतः
।
निश्चय ही यह भोग तथा मोक्ष देनेवाला है ॥ ४० ॥
हे मुने! वैद्यनाथेश्वर शिवके माहात्म्यरूप ॥ ४१ शास्त्रको पढ़ने तथा सुननेवालोंको भोग तथा मोक्ष दोनों प्राप्त होता है । शिवजीका दसवाँ अवतार नागेश्वर नामवाला कहा गया है, जो भक्तोंकी रक्षाके लिये आविर्भूत हुआ और सर्वदा दुष्टोंका दमन करता ४२ रहता है॥४१-४२ ॥ धर्मनाशक दारुक नामक राक्षसको मारकर ४३ शिवजीने वैश्योंके स्वामी सुप्रिय नामक अपने भक्तकी रक्षा की थी । नाना प्रकारकी लीला करनेवाले वे परमात्मा साम्बसदाशिव लोकोंका कल्याण करनेके ४४ लिये ज्योतिर्लिंगस्वरूप धारण कर नागेश्वर नामसे वहींपर स्थित हो गये॥४३-४४ ॥ हे मुने! उस नागेश्वर नामक शिवलिंगका दर्शन-४५ पूजन करनेसे महापातकोंके समूह शीघ्र ही नष्ट हो । जाते हैं । हे मुने! शिवजीका ग्यारहवाँ अवतार रामेश्वर नामसे प्रसिद्ध है, जो रामचन्द्रका प्रिय करनेवाला है, ४६ यह रामचन्द्रके द्वारा स्थापित किया गया है ॥ ४५-४६ ॥ ज्योतिर्लिंगस्वरूपसे आविर्भूत हुए उन भक्तवत्सल ४७ भगवान् रामेश्वरने ही रामचन्द्रके द्वारा सन्तुष्ट किये जानेपर उनको विजयका वरदान दिया था ॥ ४७ ॥
हे मुने! रामचन्द्रजीद्वारा बहुत प्रार्थना करनेपर सन्तस्थौ सेतुबन्धे च रामसंसेवितो मुने ॥ ४८ उनके द्वारा सेवित हुए शिवजी ज्योतिर्लिंगस्वरूपसे सेतुबन्धमें स्थित हो गये ॥४८ ॥
रामेश्वरस्य महिमाद्भुतोऽभूद्भुवि रामेश्वरकी महिमा इस पृथ्वीतलमें अद्भुत तथा भुक्तिमुक्तिप्रदश्चैव चातुलः । अतुलनीय हुई, ये भोग तथा मोक्षको देनेवाले तथा सर्वदा भक्तकामदः ॥ ४ ९ । भक्तोंके मनोरथको पूर्ण करनेवाले हैं ॥४ ९ ॥ 2224 Shivmahapuran_IInd Part Section_8_2_Back
पृष्ठ 209
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
अ ० ४२ ] शतरुद्रसंहिता १ ९ ७
तं च गङ्गाजलेनैव स्नापयिष्यति यो नरः ।
रामेश्वरं च सद्भक्त्या स जीवन्मुक्त एव हि ॥
दह भुक्त्वाखिलान्भोगान्देवतादुर्लभानपि ।
अतः प्राप्य परं ज्ञानं कैवल्यं मोक्षमाप्नुयात् ॥
घुश्मेश्वरावतारस्तु द्वादशः शङ्करस्य हि ।
नानालीलाकरो घुश्मानन्ददो भक्तवत्सलः ॥
दक्षिणस्यां दिशि मुने देवशैलसमीपतः ।
आविर्बभूव सरसि घुश्माप्रियकरः प्रभुः ॥
सुदेहामारितं घुश्मापुत्रं साकल्यतो मुने ।
तुष्टस्तद्भक्तितः शम्भुर्योऽरक्षद्भक्तवत्सलः ॥
तत्प्रार्थितः स वै शम्भुस्तडागे तत्र कामदः ।
ज्योतिर्लिङ्गस्वरूपेण तस्थौ घुश्मेश्वराभिधः ॥
तं दृष्ट्वा शिवलिङ्गं तु समभ्यर्च्य च भक्तितः ।
इह सर्वसुखं भुक्त्वा ततो मुक्तिं च विन्दति ॥
इति ते हि समाख्याता ज्योतिर्लिङ्गावली मया ।
द्वादशप्रमिता दिव्या भुक्तिमुक्तिप्रदायिनी ॥
एतां ज्योतिर्लिङ्गकथां यः पठेच्छृणुयादपि ।
मुच्यते सर्वपापेभ्यो भुक्तिं मुक्तिं च विन्दति ॥
शतरुद्राभिधा चेयं वर्णिता संहिता मया शतावतारसत्कीर्तिः सर्वकामफलप्रदा इमां यः पठते नित्यं शृणुयाद्वा समाहितः सर्वान्कामानवाप्नोति ततो मुक्तिं लभेद् ध्रुवम् जो मनुष्य रामेश्वरको उत्तम भक्तिपूर्वक गंगाजलसे ५० स्नान कराता है, वह जीवन्मुक्त हो जाता है ॥५० ॥
वह इस लोकमें देवताओंके लिये भी दुर्लभ ५१ सभी प्रकारके सुखोंका उपभोगकर अन्तमें उत्तम ज्ञान प्राप्तकर कैवल्यमोक्ष प्राप्त करता है ॥ ५१ ॥
शिवजीका बारहवाँ अवतार घुश्मेश्वर नामसे प्रसिद्ध ५२ है, जो भक्तोंपर कृपा करनेवाला, अनेकविध लीला करनेवाला तथा घुश्माको आनन्द देनेवाला है ॥ ५२ ॥
हे मुने! दक्षिण दिशामें देवशैलके समीप स्थित ५३ सरोवरमें घुश्माका कल्याण करनेवाले प्रभु शिव प्रकट हुए थे ॥५३ ॥
हे मुने! इन्हीं भक्तवत्सल शिवजीने सुदेहाद्वारा ५४ मारे गये घुश्माके पुत्रकी उसकी भक्तिसे प्रसन्न हो रक्षा की थी और घुश्माके द्वारा प्रार्थना किये जानेपर सम्पूर्ण कामनाओंको देनेवाले ये प्रभु घुश्मेश्वर नामसे उस ५५ सरोवरमें ज्योतिर्लिंग - स्वरूपसे स्थित हो गये ॥ ५४-५५ ॥ उस शिवलिंगका दर्शन एवं भक्तिपूर्वक पूजन ५६ करनेसे मनुष्य इस लोकमें सभी प्रकारका सुख भोगकर अन्तमें मुक्ति प्राप्त कर लेता है ॥ ५६ ॥
[ हे सनत्कुमार! ] इस प्रकार मैंने भोग तथा ५७ मोक्ष देनेवाले इन दिव्य द्वादश ज्योतिर्लिंगोंका वर्णन आपसे कर दिया ॥५७ ॥
जो मनुष्य ज्योतिर्लिंगोंकी इस कथाको पढ़ता ५८ अथवा सुनता है, वह समस्त पापोंसे छूट जाता है और भोग तथा मोक्षको प्राप्त कर लेता है ॥५८ ॥
। मैंने शिवजीके सौ अवतारोंकी उत्तम कीर्तिसे ॥ ५ ९ पूर्ण तथा सभी मनोरथोंको पूर्ण करनेवाली इस शतरुद्र नामक संहिताका वर्णन कर दिया ॥ ५ ९ ॥ जो एकाग्रचित्त होकर इसे नित्य पढ़ता अथवा । सुनता है, उसकी समस्त कामनाएँ पूर्ण हो जाती हैं और ॥ ६० उसके बाद वह मुक्तिको प्राप्त कर लेता है ॥ ६० ॥
इति श्रीशिवमहापुराणे तृतीयायां शतरुद्रसंहितायां सनत्कुमारनन्दीश्वरसंवादे द्वादशज्योतिर्लिङ्गावतारवर्णनं नाम द्विचत्वारिंशोऽध्यायः ॥ ४२ ॥
॥ इस प्रकार श्रीशिवमहापुराणके अन्तर्गत तृतीय शतरुद्रसंहिताके सनत्कुमार - नन्दीश्वर - संवादमें द्वादशज्योतिर्लिंगावतारवर्णन नामक बयालीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ४२ ॥
॥ समाप्तेयं तृतीया शतरुद्रसंहिता ॥ ३ ॥
पृष्ठ 210
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
[ १ ९ ८ ] श्रीरामेश्वरपूजन