शिव महापुराण - २ — पृष्ठ 211–220

शिव महापुराण - २ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 211–220

पृष्ठ 211

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॥ ॐ श्रीसाम्बशिवाय नमः ॥ ॥ ॐ श्रीगणेशाय नमः ॥ श्रीशिवमहापुराण चतुर्थी कोटिरुद्रसंहिता अथ प्रथमोऽध्यायः द्वादश ज्योतिर्लिंगों एवं उनके उपलिंगोंके माहात्म्यका वर्णन यो धत्ते निजमाययैव भुवनाकारं विकारोज्झितो यस्याहुः करुणाकटाक्षविभवौ स्वर्गापवर्गाभिधौ । प्रत्यग्बोधसुखाद्वयं हृदि सदा पश्यन्ति यं योगिन-स्तस्मै शैलसुताञ्चितार्धवपुषे शश्वन्नमस्तेजसे ॥ कृपाललितवीक्षणं स्मितमनोज्ञवक्त्राम्बुजं

शशाङ्ककलयोज्ज्वलं शमितघोरतापत्रयम् ।

करोतु किमपि स्फुरत्परमसौख्यसच्चिद्वपु-धराधरसुताभुजोद्वलयितं महो मङ्गलम् ॥

ऋषय ऊचुः

सम्यगुक्तं त्वया सूत लोकानां हितकाम्यया ।

शिवावतारमाहात्म्यं नानाख्यानसमन्वितम् ॥

पुनश्च कथ्यतां तात शिवमाहात्म्यमुत्तमम् ।

लिङ्गसम्बन्धि सुप्रीत्या धन्यस्त्वं शैवसत्तम ॥

शृण्वन्तस्त्वन्मुखाम्भोजान्न तृप्ताः स्मो वयं प्रभो ।

शैवं यशोऽमृतं रम्यं तदेव पुनरुच्यताम् ॥

पृथिव्यां यानि लिङ्गानि तीर्थे तीर्थे शुभानि हि ।

अन्यत्र वा स्थले यानि प्रसिद्धानि स्थितानि वै ॥

तानि तानि च दिव्यानि लिङ्गानि परमेशितुः ।

व्यासशिष्य समाचक्ष्व लोकानां हितकाम्यया ॥

जो निर्विकार होते हुए भी अपनी मायासे विराट् विश्वका आकार धारण कर लेते हैं, स्वर्ग तथा अपवर्ग जिनके कृपाकटाक्षके वैभव बताये जाते हैं तथा योगीजन जिन्हें सदा अपने हृदयके भीतर आत्मज्ञानानन्दस्वरूपमें देखते हैं, उन तेजोमय भगवान् १ शंकरको, जिनका आधा शरीर शैलराजकुमारी पार्वतीसे सुशोभित है, निरन्तर मेरा नमस्कार है ॥१ ॥

जिसकी कृपापूर्ण चितवन बड़ी ही सुन्दर है, जिसका मुखारविन्द मन्द मुसकानकी छटासे अत्यन्त मनोहर दिखायी देता है, जो चन्द्रमाकी कलासे परम उज्ज्वल है, जो तीनों भीषण तापोंको शान्त कर देनेमें समर्थ है, जिसका स्वरूप सच्चिन्मय एवं परमानन्दरूपसे प्रकाशित होता है तथा जो गिरिराजनन्दिनी पार्वतीके २ भुजपाशसे आवेष्टित है, वह [ शिव नामक ] कोई [ अनिर्वचनीय ] तेज: पुंज सबका मंगल करे ॥ २ ॥

ऋषिगण बोले – हे सूत! आपने लोकका कल्याण करनेके निमित्त अनेक प्रकारके आख्यानोंसे ३ युक्त शिवजीके अवतारोंका माहात्म्य भलीभाँति कहा । अब हे तात! आप शिवजीके लिंगसम्बन्धी माहात्म्यका प्रेमपूर्वक वर्णन कीजिये । हे शिवभक्तोंमें श्रेष्ठ! आप ४ धन्य हैं ॥ ३-४ ॥ हे प्रभो! आपके मुखकमलसे शिवके अमृतरूप ५ मनोहर यशको सुनते हुए हम लोग तृप्त नहीं हुए, अतः उसीको फिरसे कहिये ॥५ ॥

इस पृथ्वीके सभी तीर्थोंमें जितने शुभ लिंग ६ हैं, अथवा इस भूतलपर अन्यत्र भी जो प्रसिद्ध लिंग स्थित हैं, हे व्यासशिष्य! लोकहितकी कामनासे परमेश्वर शिवके उन सभी दिव्य लिंगोंका वर्णन ७ कीजिये॥६-७ ॥

पृष्ठ 212

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२०० सूत उवाच साधु पृष्टमृषिश्रेष्ठा लोकानां हितकाम्यया कथयामि भवत्स्नेहात्तानि संक्षेपतो द्विजाः सर्वेषां शिवलिङ्गानां मुने संख्या न विद्यते सर्वा लिंगमयी भूमिः सर्वं लिंगमयं जगत् लिंगयुक्तानि तीर्थानि सर्वं लिंगे प्रतिष्ठितम् संख्या न विद्यते तेषां तानि किंचिद्ब्रवीम्यहम्

यत्किंचिद् दृश्यते दृश्यं वर्ण्यते स्मर्यते च यत् ।

तत्सर्वं शिवरूपं हि नान्यदस्तीति किंचन ॥

तथापि श्रूयतां प्रीत्या कथयामि यथाश्रुतम् ।

लिंगानि च ऋषिश्रेष्ठाः पृथिव्यां यानि तानि ह ॥

पाताले चापि वर्तन्ते स्वर्गे चापि तथा भुवि ।

सर्वत्र पूज्यते शम्भुः स देवासुरमानुषैः ॥

त्रिजगच्छम्भुना व्याप्तं सदेवासुरमानुषम् ।

अनुग्रहाय लोकानां लिंगरूपेण सत्तमाः ॥

अनुग्रहाय लोकानां लिंगानि च महेश्वरः ।

दधाति विविधान्यत्र तीर्थे चान्यस्थले तथा ॥

यत्र यत्र यदा शंभुर्भक्त्या भक्तैश्च संस्मृतः ।

तत्र तत्रावतीर्याथ कार्यं कृत्वा स्थितस्तदा ॥

लोकानामुपकारार्थं स्वलिंगं चाप्यकल्पयत् ।

तल्लिंगं पूजयित्वा तु सिद्धिं समधिगच्छति ॥

पृथिव्यां यानि लिंगानि तेषां संख्या न विद्यते । तथापि च प्रधानानि कथ्यन्ते च श्रीशिवमहापुराण [ अ ० १ सूतजी बोले- हे ऋषिवरो! आपलोगोंने लोक-। | हितकी कामनासे अच्छी बात पूछी है, अतः हे द्विजो आपलोगोंके स्नेहसे मैं उन लिंगोंका वर्णन करता हूँ ॥! ॥ ८ हे मुने! शिवजीके सम्पूर्ण लिंगोंकी ८ ॥ । । निश्चित ] संख्या नहीं है; क्योंकि यह समस्त [ पृथ्वी कोई ॥ ९ । लिंगमय है और सारा जगत् लिंगमय है । सभी तीर्थ । । लिंगमय हैं; सारा प्रपंच लिंगमें ही प्रतिष्ठित है । | यद्यपि उनकी कोई संख्या नहीं है, फिर [ भी ] मैं कुछ ॥ १० लिंगोंका वर्णन कर रहा हूँ॥९ -१० ॥ इस जगत्में जो कुछ भी दृश्य देखा जाता है, ११ कहा जाता है और [ मनसे ] स्मरण किया जाता है, वह सब शिवस्वरूप ही है । शिवके अतिरिक्त अन्य कुछ भी नहीं है । फिर भी हे श्रेष्ठ ऋषिगण! इस पृथ्वीपर जितने १२ भी दिव्य लिंग हैं, जैसा कि मुझे ज्ञात है । उनको मैं बता रहा हूँ, आपलोग प्रेमपूर्वक सुनिये ॥ ११-१२ ॥ पातालमें, स्वर्गमें एवं पृथ्वीपर सभी जगह १३ शिवलिंग हैं; क्योंकि देवता, असुर एवं मनुष्य — ये सभी शिवजीका पूजन करते हैं ॥ १३ ॥

हे महर्षियो! शिवजीने लोकोंके कल्याणार्थ ही १४ लिंगरूपसे देव, मनुष्य तथा दैत्योंके सहित इस समस्त त्रिलोकीको व्याप्त कर रखा है । वे महेश्वर लोकोंके हितके लिये तीर्थ - तीर्थमें तथा अन्य स्थलोंमें भी १५ विविध लिंगोंको धारण करते हैं ॥ १४-१५ ॥ जिस - जिस स्थानमें जब - जब शिवजीके भक्तोंने १६ भक्तिपूर्वक उनका स्मरण किया है, उस समय उन-उन स्थानोंमें प्रकट होकर [ भक्तजनोंका ] कार्य करके वे वहाँ स्थित हो गये । उन्होंने लोकोपकारार्थ अपने १७ लिंगको प्रकट किया, उस लिंगका पूजन करके मनुष्य सिद्धिको प्राप्त होता है ॥ १६-१७ ॥ हे द्विजो! पृथिवीपर जितने लिंग हैं, उनकी कोई मया द्विजाः ॥ १८ गणना नहीं है, फिर भी मैं प्रधान लिंगोंको कहताहूँ । प्रधानेषु च यानीह मुख्यानि प्रवदाम्यहम् प्रधान लिंगोंमें जो [ विशेषरूपसे ] मुख्य लिंग हैं, । यच्छ्रुत्वा सर्वपापेभ्यो मुच्यते मानवः उनको मैं कहता हूँ, जिनके सुननेसे मनुष्य उसी समय क्षणात् ॥ १ ९ पापोंसे मुक्त हो जाता है॥१८-१९ ॥ ज्योतिर्लिंगानि यानीह मुख्यमुख्यानि हे मुनिसत्तम! इस लोकमें मुख्योंमें भी मुख्य तान्यहं कथयाम्यद्य श्रुत्वा पापं सत्तम । जितने ज्योतिर्लिंग हैं, उन्हें मैं इस समय कहता हूँ, व्यपोहति ॥ २० जिन्हें सुनकर प्राणी पापोंसे छूट जाता है ॥ २० ॥

पृष्ठ 213

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अ ० १ ] कोटिरुद्रसंहिता २०१

सौराष्ट्रे सोमनाथं च श्रीशैले मल्लिकार्जुनम् ।

उज्जयिन्यां महाकालमोंकारे परमेश्वरम् ॥ २१

केदार हिमवत्पृष्ठे डाकिन्यां भीमशंकरम् ।

वाराणस्यां च विश्वेशं त्र्यम्बकं गौतमीतटे ॥ २२

वैद्यनाथं चिताभूमौ नागेशं दारुकावने ।

सेतुबंधे च रामेशं घुश्मेशं च शिवालये ॥ २३

द्वादशैतानि नामानि प्रातरुत्थाय यः पठेत् ।

सर्वपापविनिर्मुक्तः सर्वसिद्धिफलं लभेत् ॥ २४

यं यं काममपेक्ष्यैव पठिष्यन्ति नरोत्तमाः ।

प्राप्स्यन्ति कामं तं तं हि परत्रेह मुनीश्वराः ॥ २५

ये निष्कामतया तानि पठिष्यन्ति शुभाशयाः ।

तेषां च जननीगर्भे वासो नैव भविष्यति ॥ २६

एतेषां पूजनेनैव वर्णानां दुःखनाशनम् ।

इहलोके परत्रापि मुक्तिर्भवति निश्चितम् ॥ २७

ग्राह्यमेषां च नैवेद्यं भोजनीयं प्रयत्नतः ।

तत्कर्तुः सर्वपापानि भस्मसाद्यान्ति वै क्षणात् ॥ २८

ज्योतिषां चैव लिंगानां ब्रह्मादिभिरलं द्विजाः ।

विशेषतः फलं वक्तुं शक्यते न परैस्तथा ॥ २ ९

एकं च पूजितं येन षण्मासं तन्निरन्तरम् ।

तस्य दुःखं न जायेत मातृकुक्षिसमुद्भवम् ॥ ३०

हीनयोनौ यदा जातो ज्योतिर्लिंगं च पश्यति ।

तस्य जन्म भवेत्तत्र विमले सत्कुले पुनः ॥ ३१

सत्कुले जन्म संप्राप्य धनाढ्यो वेदपारगः । सौराष्ट्रमें सोमनाथ, श्रीशैलपर मल्लिकार्जुन, उज्जयिनीमें महाकाल, ॐकार क्षेत्रमें परमेश्वर, हिमालयपर केदार, डाकिनीमें भीमशंकर, वाराणसीमें विश्वेश्वर, गौतमी नदीके तटपर त्र्यम्बकेश्वर, चिताभूमिमें वैद्यनाथ, दारुकवनमें नागेश, सेतुबन्धमें रामेश्वर तथा शिवालयमें घुश्मेश्वर [ नामक ज्योतिर्लिंग ] हैं । जो [ प्रतिदिन ] प्रात: काल उठकर इन बारह नामोंका पाठ करता है, उसके सभी प्रकारके पाप छूट जाते हैं और उसको सम्पूर्ण सिद्धियोंका फल प्राप्त हो जाता है ॥ २१-२४ ॥ हे मुनीश्वरो! उत्तम पुरुष जिस - जिस मनोरथकी अपेक्षा करके इनका पाठ करेंगे, वे उस - उस मनोकामनाको इस लोकमें तथा परलोकमें प्राप्त करेंगे और जो शुद्ध अन्तःकरणवाले पुरुष निष्कामभावसे इनका पाठ करेंगे, वे [ पुनः ] माताके गर्भमें निवास नहीं करेंगे ॥ २५-२६ ॥ इस लोकमें इन लिंगोंका पूजन करनेसे [ ब्राह्मण आदि ] सभी वर्णोंका दुःख नष्ट हो जाता है और परलोकमें निश्चित रूपसे उनकी मुक्ति भी हो जाती है । इन लिंगोंपर चढ़ाया गया प्रसाद सर्वथा ग्रहण करनेयोग्य होता है; उसे [ श्रद्धासे ] विशेष यत्नसे ग्रहण करना चाहिये । ऐसा करनेवालेके समस्त पाप उसी क्षण विनष्ट हो जाते हैं ॥ २७-२८ ॥ हे द्विजो! इन ज्योतिर्लिंगोंका विशेष फल कहनेमें ब्रह्मा आदि भी समर्थ नहीं हैं, फिर दूसरोंकी बात ही क्या? जिसने किसी एक लिंगका भी छ: मासतक यदि निरन्तर पूजन कर लिया, उसे पुनर्जन्मका दु: ख नहीं उठाना पड़ता है ॥ २ ९ -३० ॥ नीच कुलमें उत्पन्न हुआ पुरुष भी यदि किसी ज्योतिर्लिंगका दर्शन करता है, तो उसका जन्म पुनः निर्मल एवं उत्तम कुलमें होता है । वह उत्तम कुलमें जन्म प्राप्तकर धनसे सम्पन्न एवं वेदका पारगामी विद्वान् होता है । उसके बाद [ वेदोचित ] शुभ कर्म करके वह शुभकर्म तदा कृत्वा मुक्तिं यात्यनपायिनीम् ॥ ३२ स्थिर रहनेवाली मुक्ति प्राप्त करता है ॥ ३१-३२ ॥ हे मुनीश्वरो! म्लेच्छ, अन्त्यज अथवा नपुंसक कोई भी हो — वह [ ज्योतिर्लिंगके दर्शनके प्रभावसे ] म्लेच्छो वाप्यन्त्यजो वापि षण्ढो वापि मुनीश्वराः । द्विजकुलमें जन्म लेकर मुक्त हो जाता है, इसलिये चरेत् ॥ ३३ । ज्योतिर्लिंगका दर्शन [ अवश्य ] करना चाहिये ॥ ३३ ॥

द्विजो भूत्वा भवेन्मुक्तस्तस्मात्तद्दर्शनं

पृष्ठ 214

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२०० श्रीशिवमहापुराण [ अ ० १ सूतजी बोले- हे ऋषिवरो! आपलोगोंने लोक-सूत लोकानां उवाच हितकाम्यया । । हितकी कामनासे अच्छी बात पूछी है, अतः हे द्विजो! साधु पृष्टमृषिश्रेष्ठा संक्षेपतो द्विजाः ॥ ८ आपलोगोंके स्नेहसे मैं उन लिंगोंका वर्णन करता हूँ ॥ ८ ॥

कथयामि भवत्स्नेहात्तानि हे मुने! शिवजीके सम्पूर्ण लिंगोंकी [ कोई सर्वेषां शिवलिङ्गानां मुने संख्या न विद्यते । निश्चित ] संख्या नहीं है; क्योंकि यह समस्त पृथ्वी सर्वा लिंगमयी भूमिः सर्वं लिंगमयं जगत् ॥ ९ लिंगमय है और सारा जगत् लिंगमय है । सभी तीर्थ लिंगयुक्तानि तीर्थानि सर्वं लिंगे प्रतिष्ठितम् संख्या न विद्यते तेषां तानि किंचिद्रवीम्यहम् यत्किंचिद् दृश्यते दृश्यं वर्ण्यते स्मर्यते च यत् तत्सर्वं शिवरूपं हि नान्यदस्तीति किंचन तथापि श्रूयतां प्रीत्या कथयामि यथाश्रुतम् लिंगानि च ऋषिश्रेष्ठाः पृथिव्यां यानि तानि ह ॥

पाताले चापि वर्तन्ते स्वर्गे चापि तथा भुवि ।

सर्वत्र पूज्यते शम्भुः स देवासुरमानुषैः ॥

त्रिजगच्छम्भुना व्याप्तं सदेवासुरमानुषम् ।

अनुग्रहाय लोकानां लिंगरूपेण सत्तमाः ॥

अनुग्रहाय लोकानां लिंगानि च महेश्वरः ।

दधाति विविधान्यत्र तीर्थे चान्यस्थले तथा ॥

यत्र यत्र यदा शंभुर्भक्त्या भक्तैश्च संस्मृतः ।

तत्र तत्रावतीर्याथ कार्यं कृत्वा स्थितस्तदा ॥

लोकानामुपकारार्थं स्वलिंगं चाप्यकल्पयत् ।

तल्लिंगं पूजयित्वा तु सिद्धिं समधिगच्छति ॥

पृथिव्यां यानि लिंगानि तेषां संख्या न विद्यते ।

तथापि च प्रधानानि कथ्यन्ते च मया द्विजाः ॥

प्रधानेषु च यानीह मुख्यानि प्रवदाम्यहम् ।

यच्छ्रुत्वा सर्वपापेभ्यो मुच्यते मानवः क्षणात् ॥

ज्योतिर्लिंगानि यानीह मुख्यमुख्यानि सत्तम । तान्यहं कथयाम्यद्य श्रुत्वा पापं व्यपोहति । लिंगमय हैं; सारा प्रपंच लिंगमें ही प्रतिष्ठित है । ॥ १० यद्यपि उनकी कोई संख्या नहीं है, फिर [ भी ] मैं कुछ लिंगोंका वर्णन कर रहा हूँ ॥ ९ -१० ॥ । इस जगत्में जो कुछ भी दृश्य देखा जाता है, ॥ ११ कहा जाता है और [ मनसे ] स्मरण किया जाता है, वह सब शिवस्वरूप ही है । शिवके अतिरिक्त अन्य कुछ भी । नहीं है । फिर भी हे श्रेष्ठ ऋषिगण! इस पृथ्वीपर जितने १२ भी दिव्य लिंग हैं, जैसा कि मुझे ज्ञात है । उनको मैं बता रहा हूँ, आपलोग प्रेमपूर्वक सुनिये ॥ ११-१२ ॥ पातालमें, स्वर्गमें एवं पृथ्वीपर सभी जगह १३ शिवलिंग हैं; क्योंकि देवता, असुर एवं मनुष्य — ये सभी शिवजीका पूजन करते हैं ॥१३ ॥

हे महर्षियो! शिवजीने लोकोंके कल्याणार्थ ही १४ लिंगरूपसे देव, मनुष्य तथा दैत्योंके सहित इस समस्त त्रिलोकीको व्याप्त कर रखा है । वे महेश्वर लोकोंके हितके लिये तीर्थ - तीर्थमें तथा अन्य स्थलोंमें भी १५ विविध लिंगोंको धारण करते हैं ॥ १४-१५ ॥ जिस - जिस स्थानमें जब - जब शिवजीके भक्तोंने १६ भक्तिपूर्वक उनका स्मरण किया है, उस समय उन-उन स्थानोंमें प्रकट होकर [ भक्तजनोंका ] कार्य करके वे वहाँ स्थित हो गये । उन्होंने लोकोपकारार्थ अपने १७ लिंगको प्रकट किया, उस लिंगका पूजन सिद्धिको प्राप्त होता है॥१६-१७ मनुष्य ॥ हे द्विजो! पृथिवीपर जितने लिंग हैं, उनकी कोई १८ गणना नहीं है, फिर भी मैं प्रधान लिंगोंको कहता हूँ । प्रधान लिंगोंमें जो [ विशेषरूपसे ] मुख्य लिंग हैं, उनको मैं कहता हूँ, जिनके सुननेसे मनुष्य उसी समय १ ९ पापोंसे मुक्त हो जाता है ॥ १८-१९ ॥ हे मुनिसत्तम! इस लोकमें मुख्योंमें भी मुख्य जितने ज्योतिर्लिंग हैं, उन्हें मैं इस समय कहताहूँ, ॥ २० । जिन्हें सुनकर प्राणी पापोंसे छूट जाताहै ॥ २० ॥

पृष्ठ 215

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अ ० १ ] कोटिरुद्रसंहिता २०१

सौराष्ट्रे सोमनाथं च श्रीशैले मल्लिकार्जुनम् ।

उज्जयिन्यां महाकालमोंकारे परमेश्वरम् ॥ २१

केदारं हिमवत्पृष्ठे डाकिन्यां भीमशंकरम् । ।

वाराणस्यां च विश्वेशं त्र्यम्बकं गौतमीतटे ॥ २२

वैद्यनाथं चिताभूमौ नागेशं दारुकावने ।

सेतुबंधे च रामेशं घुश्मेशं च शिवालये ॥ २३

द्वादशैतानि नामानि प्रातरुत्थाय यः पठेत् ।

सर्वपापविनिर्मुक्तः सर्वसिद्धिफलं लभेत् ॥२४

यं यं काममपेक्ष्यैव पठिष्यन्ति नरोत्तमाः ।

प्राप्स्यन्ति कामं तं तं हि परत्रेह मुनीश्वराः ॥ २५

ये निष्कामतया तानि पठिष्यन्ति शुभाशयाः! तेषां च जननीगर्भे वासो नैव भविष्यति ॥ २६ ।

एतेषां पूजनेनैव वर्णानां दुःखनाशनम् ।

इहलोके परत्रापि मुक्तिर्भवति निश्चितम् ॥ २७

ग्राह्यमेषां च नैवेद्यं भोजनीयं प्रयत्नतः ।

तत्कर्तुः सर्वपापानि भस्मसाद्यान्ति वै क्षणात् ॥ २८

ज्योतिषां चैव लिंगानां ब्रह्मादिभिरलं द्विजाः ।

विशेषतः फलं वक्तुं शक्यते न परैस्तथा ॥ २ ९

एकं च पूजितं येन षण्मासं तन्निरन्तरम् ।

तस्य दुःखं न जायेत मातृकुक्षिसमुद्भवम् ॥ ३०

हीनयोनौ यदा जातो ज्योतिर्लिंगं च पश्यति ।

तस्य जन्म भवेत्तत्र विमले सत्कुले पुनः ॥ ३१

सत्कुले जन्म संप्राप्य धनाढ्यो वेदपारगः ।

शुभकर्म तदा कृत्वा मुक्तिं यात्यनपायिनीम् ॥ ३२

म्लेच्छो वाप्यन्त्यजो वापि षण्ढो वापि मुनीश्वराः ।

द्विजो भूत्वा भवेन्मुक्तस्तस्मात्तद्दर्शनं चरेत् ॥ ३३

सौराष्ट्रमें सोमनाथ, श्रीशैलपर मल्लिकार्जुन, उज्जयिनीमें महाकाल, ॐकार क्षेत्रमें परमेश्वर, हिमालयपर केदार, डाकिनीमें भीमशंकर, वाराणसीमें विश्वेश्वर, गौतमी नदीके तटपर त्र्यम्बकेश्वर, चिताभूमिमें वैद्यनाथ, दारुकवनमें नागेश, सेतुबन्धमें रामेश्वर तथा शिवालयमें घुश्मेश्वर [ नामक ज्योतिर्लिंग ] हैं । जो [ प्रतिदिन ] प्रात: काल उठकर इन बारह नामोंका पाठ करता है, उसके सभी प्रकारके पाप छूट जाते हैं और उसको सम्पूर्ण सिद्धियोंका फल प्राप्त हो जाता है । २१–२४ ॥ हे मुनीश्वरो! उत्तम पुरुष जिस - जिस मनोरथकी अपेक्षा करके इनका पाठ करेंगे, वे उस - उस मनोकामनाको इस लोकमें तथा परलोकमें प्राप्त करेंगे और जो शुद्ध अन्तःकरणवाले पुरुष निष्कामभावसे इनका पाठ करेंगे, वे [ पुनः ] माताके गर्भमें निवास नहीं करेंगे ॥ २५-२६ ॥ इस लोकमें इन लिंगोंका पूजन करनेसे [ ब्राह्मण आदि ] सभी वर्णोंका दुःख नष्ट हो जाता है और परलोकमें निश्चित रूपसे उनकी मुक्ति भी हो जाती है । इन लिंगोंपर चढ़ाया गया प्रसाद सर्वथा ग्रहण करनेयोग्य होता है; उसे [ श्रद्धासे ] विशेष यत्नसे ग्रहण करना चाहिये । ऐसा करनेवालेके समस्त पाप उसी क्षण विनष्ट हो जाते हैं ॥ २७-२८ ॥ हे द्विजो! इन ज्योतिर्लिंगोंका विशेष फल कहनेमें ब्रह्मा आदि भी समर्थ नहीं हैं, फिर दूसरोंकी बात ही क्या? जिसने किसी एक लिंगका भी छः मासतक यदि निरन्तर पूजन कर लिया, उसे पुनर्जन्मका दुःख नहीं उठाना पड़ता है ॥ २ ९ -३० ॥ नीच कुलमें उत्पन्न हुआ पुरुष भी यदि किसी ज्योतिर्लिंगका दर्शन करता है, तो उसका जन्म पुनः निर्मल एवं उत्तम कुलमें होता है । वह उत्तम कुलमें जन्म प्राप्तकर धनसे सम्पन्न एवं वेदका पारगामी विद्वान् होता है । उसके बाद [ वेदोचित ] शुभ कर्म करके वह स्थिर रहनेवाली मुक्ति प्राप्त करता है ॥ ३१-३२ ॥ हे मुनीश्वरो! म्लेच्छ, अन्त्यज अथवा नपुंसक कोई भी हो - वह [ ज्योतिर्लिंगके दर्शनके प्रभावसे ] द्विजकुलमें जन्म लेकर मुक्त हो जाता है, इसलिये । ज्योतिर्लिंगका दर्शन [ अवश्य ] करना चाहिये ॥ ३३ ॥

पृष्ठ 216

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श्रीशिवमहापुराण [ अ ० १ २०२ ज्योतिषां चैव लिंगानां किंचित्प्रोक्तं फलं मया । हे मुनिसत्तमो! मैंने संक्षेपमें इन ज्योतिर्लिंगोंके चोपलिंगानि श्रूयन्तामृषिसत्तमाः ॥ ३४ फलका वर्णन किया; अब इनके उपलिंगोंको ज्योतिषां

सोमेश्वरस्य यल्लिंगमन्तकेशमुदाहृतम् ।

मह्याः सागरसंयोगे तल्लिंगमुपलिङ्गकम् ॥ ३५

मल्लिकार्जुनसंभूतमुपलिंगमुदाहृतम् रुद्रेश्वरमिति ख्यातं भृगुकक्षे सुखावहम् ॥ ३६

महाकालभवं लिंगं दुग्धेशमिति विश्रुतम् ।

नर्मदायां प्रसिद्धं तत्सर्वपापहरं स्मृतम् ॥ ३७

ॐकारजं च यल्लिंगं कर्दमेशमिति श्रुतम् ।

प्रसिद्धं बिन्दुसरसि सर्वकामफलप्रदम् ॥ ३८

केदारेश्वरसंजातं भूतेशं यमुनातटे ।

महापापहरं प्रोक्तं पश्यतामर्चतां तथा ॥ ३ ९

भीमशंकरसंभूतं भीमेश्वरमिति स्मृतम् ।

सह्याचले प्रसिद्धं तन्महाबलविवर्द्धनम् ॥ ४०

विश्वेश्वराच्च यज्जातं शरण्येश्वर विश्रुतम् ।

त्र्यम्बकस्य च यत्प्रोक्तं सिद्धेश्वर इति श्रुतम् ॥ ४१

वैद्यनाथाच्च यज्जातं वैजनाथ इति स्मृतम् ।

नागेश्वरसमुद्भूतं भूतेश्वरमुदाहृतम् ॥ ४२

मल्लिकासरस्वतीतीरे दर्शनात्पापहारकम् ।

रामेश्वराच्च यज्जातं गुप्तेश्वरमिति स्मृतम् ॥४३

घुश्मेशाच्चैव यज्जातं व्याघ्रेश्वरमिति स्मृतम् ।

ज्योतिर्लिंगोपलिंगानि प्रोक्तानीह मया द्विजाः ॥ ४४

दर्शनात्पापहारीणि सर्वकामप्रदानि च ।

एतानि सुप्रधानानि मुख्यतां हि गतानि च ।

अन्यानि चापि मुख्यानि श्रूयन्तामृषिसत्तमाः ॥ ४५ ।

सुनिये ॥३४ ॥

महीनदी तथा सागरके संगमपर जो अन्तकेश नामक लिंग स्थित है, वह सोमेश्वरका उपलिंग कहा जाता है । भृगुकच्छमें स्थित परम सुखदायक रुद्रेश्वर नामक लिंग ही मल्लिकार्जुनसे प्रकट हुआ उपलिंग कहा गया है ॥ ३५-३६ ॥ नर्मदाके तटपर महाकालसे प्रकट हुआ दुग्धेश्वर नामसे प्रसिद्ध उपलिंग है; जो सम्पूर्ण पापोंका विनाश करनेवाला है । ओंकारेश्वरसम्बन्धी उपलिंग कर्दमेश्वर नामसे प्रसिद्ध तथा बिन्दुसरोवरके तटपर स्थित है और यह सम्पूर्ण कामनाओंका फल देनेवाला है ॥ ३७-३८ ॥ यमुनाके तटपर केदारेश्वरसे उत्पन्न भूतेश्वर नामक उपलिंग स्थित है, जो दर्शन एवं पूजन करनेवालोंके लिये महापापनाशक कहा गया है । सह्यपर्वतपर स्थित भीमेश्वर नामक लिंग भीमशंकरका उपलिंग कहा गया है; वह प्रसिद्ध लिंग महान् बलको बढ़ानेवाला है । विश्वेश्वरसे उत्पन्न लिंग शरण्येश्वर नामसे प्रसिद्ध हुआ, त्र्यम्बकेश्वरसे सिद्धेश्वर लिंग प्रकट हुआ तथा वैद्यनाथसे वैजनाथ नामक लिंगका प्राकट्य हुआ ॥ ३ ९ —४१ ॥ मल्लिका - सरस्वतीके तटपर स्थित एक अन्य भूतेश्वर नामका ही शिवलिंग नागेश्वरसे उत्पन्न उपलिंग कहा गया है, जो दर्शनमात्रसे पापहारी है । रामेश्वरसे जो प्रकट हुआ, वह गुप्तेश्वर और घुश्मेश्वरसे जो प्रकट हुआ, वह व्याघ्रेश्वर कहा गया है ॥ ४२-४३ ॥ हे ब्राह्मणो! इस प्रकार मैंने ज्योतिर्लिंगों तथा उनके उपलिंगोंका वर्णन किया; ये दर्शनमात्रसे पापोंको दूर करनेवाले तथा सम्पूर्ण मनोरथोंको सिद्ध करनेवाले हैं । हे ऋषिश्रेष्ठो! ये प्रधान लिंग तथा उनके उपलिंग मुख्य रूपसे प्रसिद्ध हैं; अब अन्य प्रसिद्ध लिंगोंको भी सुनिये ॥ ४४-४५ ॥ इति श्रीशिवमहापुराणे चतुर्थ्यां कोटिरुद्रसंहितायां ज्योतिर्लिंगतदुपलिंगमाहात्म्यवर्णनं ॥ इस प्रकार श्रीशिवमहापुराणके अन्तर्गत चतुर्थ कोटिरुद्रसंहितामें नाम प्रथमोऽध्यायः ॥ १ ॥

माहात्म्यवर्णन ज्योतिर्लिंग और उनके उपलिंगोंका नामक पहला अध्याय पूर्ण हुआ ॥१ ॥

पृष्ठ 217

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अ ० २ ] कोटिरुद्रसंहिता २०३ अथ द्वितीयोऽध्यायः काशीस्थित तथा पूर्व दिशामें प्रकटित सूत उवाच

गंगातीरे सुप्रसिद्धा काशी खलु विमुक्तिदा ।

सा हि लिंगमयी ज्ञेया शिववासस्थली स्मृता ॥ १

लिंगं तत्रैव मुख्यं च सम्प्रोक्तमविमुक्तकम् ।

कृत्तिवासेश्वरः साक्षात्तत्तुल्यो वृद्धकालकः ॥ २

तिलभाण्डेश्वरश्चैव दशाश्वमेध एव च ।

गंगासागरसंयोगे संगमेश इति स्मृतः ॥ ३

भूतेश्वरो यः संप्रोक्तो भक्तसर्वार्थदः सदा ।

नारीश्वर इति ख्यातः कौशिक्याः स समीपगः ॥ ४

वर्तते गण्डकीतीरे बटुकेश्वर एव सः ।

पूरेश्वर इति ख्यातः फल्गुतीरे सुखप्रदः ॥ ५

सिद्धनाथेश्वरश्चैव दर्शनात्सिद्धिदो नृणाम् ।

दूरेश्वर इति ख्यातः पत्तने चोत्तरे तथा ॥ ६

श्रृंगेश्वरश्च नाम्ना वै वैद्यनाथस्तथैव च ।

जप्येश्वरस्तथा ख्यातो यो दधीचिरणस्थले ॥ ७

गोपेश्वरः समाख्यातो रंगेश्वर इति स्मृतः ।

वामेश्वरश्च नागेशः कामेशो विमलेश्वरः ॥ ८

व्यासेश्वरश्च विख्यातः सुकेशश्च तथैव हि ।

भाण्डेश्वरश्च विख्यातो हुंकारेशस्तथैव च ॥ ९

सुरोचनश्च विख्यातो भूतेश्वर इति स्वयम् ।

संगमेशस्तथा प्रोक्तो महापातकनाशनः ॥ १०

ततश्च तप्तकातीरे कुमारेश्वर एव च ।

सिद्धेश्वरश्च विख्यातः सेनेशश्च तथा स्मृतः ॥ ११

रामेश्वर इति प्रोक्तो कुंभेशश्च परो मतः ।

नन्दीश्वरश्च पुंजेशः पूर्णायां पूर्णकस्तथा ॥ १२

ब्रह्मेश्वरः प्रयागे च ब्रह्मणा स्थापितः पुरा ।

दशाश्वमेधतीर्थे हि चतुर्वर्गफलप्रदः ॥ १३

विशेष एवं सामान्य लिंगोंका वर्णन सूतजी बोले- गंगाके तटपर परम प्रसिद्ध काशी नगरी है, जो सबको मुक्ति प्रदान करनेवाली है । उसे लिंगमयी ही जानना चाहिये, वह सदाशिवकी निवास - स्थली मानी गयी है ॥ १ ॥

वहींपर अविमुक्त नामका मुख्य लिंग कहा गया है । उसीके समान कृत्तिवासेश्वरलिंग एवं वृद्धकाल लिंग काशीमें है । काशीमें तिलभाण्डेश्वर तथा दशाश्वमेध लिंग है । गंगासागरके संगमपर संगमेश्वर नामक लिंग कहा गया है ॥ २-३ ॥ जिन्हें भूतेश्वर कहा गया है और जो नारीश्वर नामसे विख्यात हैं- ये कौशिकी नदीके तटपर विराजमान । हैं और भक्तोंको सभी फल प्रदान करनेवाले हैं ॥४ ॥

गण्डकी नदीके तटपर बटुकेश्वर नामक लिंग है । फल्गु नदीके तटपर सुखदायी पूरेश्वर नामक लिंग है । उत्तर नामक नगरमें सिद्धनाथेश्वर तथा दूरेश्वर नामक लिंग हैं, जो दर्शनमात्रसे मनुष्योंको सिद्धि प्रदान करनेवाले हैं॥५-६ ॥ शृंगेश्वर तथा वैद्यनाथेश्वर नामक लिंग भी वैसे ही हैं । दधीचिकी संग्रामभूमिमें जप्येश्वर नामक प्रसिद्ध लिंग है । इसी प्रकार गोपेश्वर, रंगेश्वर, वामेश्वर, नागेश्वर, कामेश्वर तथा विमलेश्वर नामक लिंग कहे गये हैं ॥७-८ ॥ व्यासेश्वर, शुकेश्वर, भाण्डेश्वर, हुंकारेश्वर, सुरोचनेश्वर, भूतेश्वर, संगमेश्वर नामक लिंग कहे गये हैं, जो महापातकका नाश करनेवाले हैं ॥ ९ -१० ॥ तप्तका नदीके तटपर कुमारेश्वर, सिद्धेश्वर तथा सेनेश्वर नामक प्रसिद्ध लिंग कहे गये हैं ॥११ ॥

पूर्णा नदीके तटपर रामेश्वर, कुम्भेश्वर, नन्दीश्वर, पुंजेश्वर तथा पूर्णकेश्वर लिंग कहे गये हैं ॥१२ ॥

पूर्व समयमें ब्रह्माके द्वारा प्रयागके दशाश्वमेध तीर्थमें स्थापित किया गया ब्रह्मेश्वर नामक लिंग धर्म, । अर्थ, काम तथा मोक्षको देनेवाला है ॥१३ ॥

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२०४ श्रीशिवमहापुराण [ अ ० २ तथा सोमेश्वरस्तत्र सर्वापद्विनिवारकः । वहींपर सभी विपत्तियोंको दूर करनेवाला भारद्वाजेश्वरश्चैव ब्रह्मवर्चःप्रवर्द्धकः शूलटंकेश्वरः साक्षात्कामनाप्रद ईरितः माधवेशश्च तत्रैव भक्तरक्षाविधायकः नागेशाख्यः प्रसिद्धो हि साकेतनगरे द्विजाः सूर्यवंशोद्भवानां च विशेषेण सुखप्रदः पुरुषोत्तमपुर्यां तु भुवनेशः सुसिद्धिदः लोकेशश्च महालिंगः सर्वानन्दप्रदायकः कामेश्वरः शंभुलिंगो गंगेशः परशुद्धिकृत् । शुक्रेश्वरः शुक्रसिद्धो लोकानां हितकाम्यया

तथा वटेश्वरः ख्यातः सर्वकामफलप्रदः ।

सिन्धुतीरे कपालेशो वक्त्रेशः सर्वपापहा ॥

धौतपापेश्वरः साक्षादंशेन परमेश्वरः ।

भीमेश्वर इति प्रोक्तः सूर्येश्वर इति स्मृतः ॥

नन्दीश्वरश्च विज्ञेयो ज्ञानदो लोकपूजितः ।

नाकेश्वरो महापुण्यस्तथा रामेश्वरः स्मृतः ॥

विमलेश्वरनामा वै कंटकेश्वर एव च ।

पूर्वसागरसंयोगे धर्तुकेशस्तथैव च ॥

चन्द्रेश्वरश्च विज्ञेयश्चन्द्रकान्तिफलप्रदः ।

सर्वकामप्रदश्चैव सिद्धेश्वर इति स्मृतः॥

बिल्वेश्वरश्च विख्यातश्चान्धकेशस्तथैव च । ॥ १४ । सोमेश्वर नामक लिंग तथा ब्रह्मतेजकी वृद्धि करनेवाला । भारद्वाजेश्वर नामक लिंग है । वहींपर कामनाओंको | देनेवाला साक्षात् शूलटंकेश्वर लिंग तथा भक्तोंकी । । रक्षा करनेवाला माधवेश्वर लिंग बताया गया ॥ १५ है ॥ १४-१५ ॥ । हे द्विजो! साकेत ( अयोध्यापुरी ) -में नागेश ॥ १६ नामका प्रसिद्ध लिंग है, जो विशेष रूपसे सूर्यवंशमें उत्पन्न हुए लोगोंको सुख देनेवाला है ॥१६ ॥

। पुरुषोत्तम ( जगन्नाथ ) -पुरीमें उत्तम सिद्धि प्रदान ॥ १७ करनेवाला भुवनेश्वर लिंग है । लोकेश्वर नामक महालिंग सभी प्रकारके आनन्दको देनेवाला है ॥ १७ ॥

कामेश्वर तथा गंगेश शिवलिंग परम शुद्धि ॥ १८ प्रदान करनेवाले हैं । इसी प्रकार लोकहित करनेवाला तथा शुक्रको सिद्धि प्रदान करनेवाला शुक्रेश्वर लिंग है । वटेश्वर नामक लिंग सभी कामनाओंका फल प्रदान करनेवाला कहा गया है । सिन्धुतटपर स्थित १ ९ कपालेश्वर एवं वक्त्रेश्वर सभी पापोंको दूर करनेवाले हैं ॥ १८-१९ ॥ धौतपापेश्वर, भीमेश्वर तथा सूर्येश्वर नामक २० लिंग साक्षात् शिवके अंश कहे गये हैं । लोक-पूजित नन्दीश्वर लिंगको ज्ञानप्रद जानना चाहिये । नाकेश्वर तथा रामेश्वर महापुण्यके प्रदाता कहे गये २१ हैं ॥ २०-२१ ॥ विमलेश्वर, कण्टकेश्वर तथा धर्तुकेश नामक २२ लिंग पूर्व सागरके संगमपर स्थित हैं । चन्द्रेश्वरको चन्द्रमाके समान कान्तिरूप फलको देनेवाला जानना चाहिये । सिद्धेश्वर नामक लिंग सम्पूर्ण कामनाओंको २३ सिद्ध करनेवाला कहा गया है ॥ २२-२३ ॥ जहाँपर शिवजीने पूर्वकालमें अन्धक दैत्यका यत्र वा ह्यन्धको दैत्यः शंकरेण हतः पुरा ॥ २४ किया था, वहींपर बिल्वेश्वर तथा अन्धकेश्वर वध भी प्रसिद्ध हैं । [ अन्धकका वध करनेके उपरान्त लिंग ] ये अयं स्वरूपमंशेन धृत्वा शंभुः शिवजी अपने अंशसे स्वरूप धारणकर पुनः वहीं स्थित शरणेश्वरविख्यातो पुनः स्थितः । हो गये । सर्वदा लोकको सुख देनेवाला लोकानां सुखदः सदा ॥ २५ । लिंग तो प्रसिद्ध ही है ॥ २४-२५ शरणेश्वर ॥

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अ ० ३ ] कोटिरुद्रसंहिता २०५

कर्दमेशः परः प्रोक्तः कोटीशश्चार्बुदाचले ।

अचलेशश्च विख्यातो लोकानां सुखदः सदा ॥ २६

नागेश्वरस्तु कौशिक्यास्तीरे तिष्ठति नित्यशः ।

अनन्तेश्वरसंज्ञश्च कल्याणशुभभाजनः ॥ २७

योगेश्वरश्च विख्यातो वैद्यनाथेश्वरस्तथा ।

कोटीश्वरश्च विज्ञेयः सप्तेश्वर इति स्मृतः ॥ २८

भद्रेश्वरश्च विख्यातो भद्रनामा हरः स्वयम् ।

चण्डीश्वरस्तथा प्रोक्तः संगमेश्वर एव च ॥ २ ९

पूर्वस्यां दिशि जातानि शिवलिंगानि यानि च ।

सामान्यान्यपि चान्यानि तानीह कथितानि ते ॥ ३०

दक्षिणस्यां दिशि तथा शिवलिंगानि यानि च ।

संजातानि मुनिश्रेष्ठ तानि ते कथयाम्यहम् ॥ ३१

कर्दमेश्वरको श्रेष्ठ लिंग कहा गया है । कोटीश अर्बुदाचलपर स्थित हैं । प्रसिद्ध अचलेश नामक लिंग लोगोंको सदा सुख देनेवाला है । कौशिकी नदीके तटपर नागेश्वर लिंग नित्य विराजमान है । अनन्तेश्वर नामक लिंग कल्याण तथा मंगल करनेवाला है ॥ २६-२७ ॥ योगेश्वर, वैद्यनाथेश्वर, कोटीश्वर तथा सप्तेश्वर लिंग विख्यात कहे गये हैं । भद्र नामक शिव भद्रेश्वर लिंगके रूपमें विख्यात हैं । इसी प्रकार चण्डीश्वर तथा संगमेश्वर भी कहे जाते हैं ॥ २८-२९ ॥ पूर्व दिशामें जितने विशेष एवं सामान्य लिंग प्रकट हुए हैं, इस प्रसंगमें उन सभीका वर्णन मैंने आपसे किया । हे मुनिश्रेष्ठ! अब दक्षिण दिशामें जो शिवलिंग प्रकट हुए हैं, उनका वर्णन मैं आपसे करता | हूँ ॥ ३०-३१ ॥ इति श्रीशिवमहापुराणे चतुर्थ्यां कोटिरुद्रसंहितायां शिवलिंगमाहात्म्यवर्णनं नाम द्वितीयोऽध्यायः ॥२ ॥

॥ इस प्रकार श्रीशिवमहापुराणके अन्तर्गत चतुर्थ कोटिरुद्रसंहितामें शिवलिंगमाहात्म्यवर्णन नामक दूसरा अध्याय पूर्ण हुआ ॥ २ ॥

अथ तृतीयोऽध्यायः अत्रीश्वरलिंगके प्राकट्यके प्रसंगमें सूत उवाच

ब्रह्मपुर्यां चित्रकूटे लिंगं मत्तगजेन्द्रकम् ।

ब्रह्मणा स्थापितं पूर्वं सर्वकामसमृद्धिदम् ॥

तत्पूर्वदिशि कोटीश लिंगं सर्ववरप्रदम् ।

गोदावर्याः पश्चिमे तल्लिंगं पशुपतिनामकम् ॥

दक्षिणस्यां दिशि कश्चिदत्रीश्वर इति स्वयम् ।

लोकानामुपकारार्थमनसूयासुखाय च ॥

प्रादुर्भूतः स्वयं देवो ह्यनावृष्ट्यामजीवयत् ।

स एव शंकरः साक्षादंशेन स्वयमेव हि ॥

ऋषय ऊचुः

सूत सूत महाभाग कथमत्रीश्वरो हरः ।

उत्पन्नः परमो दिव्यस्तत्त्वं कथय सुव्रत ॥

अनसूया तथा अत्रिकी तपस्याका वर्णन सूतजी बोले- ब्रह्मपुरीके समीपमें चित्रकूट-पर्वतपर मत्तगजेन्द्र नामक लिंग है, जिसे ब्रह्माजीने १ पूर्वकालमें स्थापित किया था; वह सभी कामनाओंको पूर्ण करनेवाला है । उसके पूर्वमें सभी प्रकारके वरोंको देनेवाला कोटीश्वर नामक लिंग है । गोदावरी नदीके २ पश्चिमकी ओर पशुपति नामक लिंग है॥१-२ ॥ दक्षिण दिशामें कोई अत्रीश्वर नामक लिंग है, ३ जिसके रूपमें लोककल्याणके लिये एवं अनसूयाको सुख देनेहेतु साक्षात् शिवजीने अपने अंशसे स्वयं प्रकट होकर अनावृष्टि होनेपर [ मरणासन्न ] समस्त ४ प्राणियोंको जीवनदान दिया था ॥ ३-४ ॥ ऋषिगण बोले — हे महाभाग्यवान् सूत! हे सुव्रत! वहाँपर परम दिव्य अत्रीश्वर नामक लिंगका प्रादुर्भाव किस प्रकार हुआ है, उसे आप [ यथार्थ ५ । रूपसे ] बताइये? ॥ ५ ॥

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२०६ श्रीशिवमहापुराण [ अ ० ३ सूत उवाच सूतजी बोले- हे श्रेष्ठ ऋषियो! आपलोगोंने साधु पृष्टमृषिश्रेष्ठाः कथयामि कथां शुभाम् । | बहुत ही उत्तम प्रश्न किया है; अब मैं उस शुभ यां कथां सततं श्रुत्वा पातकैर्मुच्यते ध्रुवम् ॥ ६ कथाको कहता हूँ, जिसे निरन्तर सुनकर मनुष्य

दक्षिणस्यां दिशि महत् कामदं नाम यद्वनम् ।

चित्रकूटसमीपेऽस्ति तपसां हितदं सताम् ॥

तत्र च ब्रह्मणः पुत्रो ह्यत्रिनामा ऋषिः स्वयम् ।

तपस्तेपेऽतिकठिनमनसूयासमन्वितः ॥

पूर्वं कदाचित्तत्रैव ह्यनावृष्टिरभून्मुने ।

दुःखदा प्राणिनां दैवाद्विकटा शतवार्षिकी ॥

वृक्षाः शुष्कास्तदा सर्वे पल्लवानि फलानि च ।

नित्यार्थं न जलं क्वापि दृष्टमासीन्मुनीश्वराः ॥

आर्द्रीभावो न लभ्येत खरा वाता दिशो दश ।

हाहाकारो महानासीत्पृथिव्यां दुःखदोऽति हि ॥

संवर्तं चैव भूतानां दृष्ट्वात्रिगृहिणी प्रिया ।

साध्वी चैवाब्रवीदत्रिं मया दुःखं न सह्यते ॥

समाधौ च विलीनोऽभूदासने संस्थितः स्वयम् ।

प्राणायामं त्रिरावृत्त्या कृत्वा मुनिवरस्तदा ॥

ध्यायति स्म परं ज्योतिरात्मस्थमात्मना च सः ।

अत्रिर्मुनिवरो ज्ञानी शंकरं निर्विकारकम् ॥

स्वामिनि ध्यानलीने च शिष्यास्ते दूरतो गताः ।

अन्नं विना तदा ते तु मुक्त्वा तं स्वगुरुं मुनिम् ॥

एकाकिनी तदा जाता सानसूया पतिव्रता । सिषेवे सा च सततं तं मुदा मुनिसत्तमम् । निश्चितरूपसे सभी पापोंसे मुक्त हो जाता है ॥६ ॥

७ चित्रकूटके समीप दक्षिण दिशामें कामद नामक एक विशाल वन है, जो सज्जनों एवं तपस्वियोंका कल्याण करनेवाला है । वहाँ ब्रह्माके पुत्र महर्षि अत्रि [ अपनी पत्नी ] ८ अनसूयाके साथ अति कठिन तप करते थे ॥ ७-८ ॥ हे मुने! पहले किसी समय दुर्भाग्यसे जीवोंको ९ दुःख देनेवाली सौ वर्षकी भयानक अनावृष्टि हुई ॥ ९ ॥

हे मुनीश्वरो! उस समय सभी वृक्ष, पत्ते १० तथा फल सूख गये । नित्यकर्मके लिये भी कहीं [ नाममात्रका ] जल नहीं दिखायी पड़ता था ॥ १० ॥

आर्द्रता कहीं भी नहीं थी और दसों दिशाओंमें शुष्क ११ पवन बहने लगा, जिससे पृथ्वीपर चारों ओर अतिशय दुःखदायक महान् हाहाकार मच गया । तब अत्रिकी पतिव्रता पत्नीने प्राणियोंका विनाश देखकर अत्रिसे कहा १२ कि यह दुःख मुझसे सहन नहीं हो रहा है ॥ ११-१२ ॥ तब वे मुनिवर [ अत्रि ] स्वयं आसनपर स्थित हो १३ तीन बार प्राणायामकर समाधिमें लीन हो गये । इस प्रकार वे ज्ञानी मुनिश्रेष्ठ अत्रि आत्मामें स्थित निर्विकार १४ शिवस्वरूप परमज्योतिका ध्यान करने लगे ॥ १३-१४ ॥ तब गुरुके समाधिमें लीन हो जानेपर उनके शिष्य १५ अन्नके अभावमें अपने गुरुको छोड़कर दूर चले गये । तब वे पतिव्रता अनसूया अकेली हो गयीं और वे पार्थिवं सुन्दरं कृत्वा ॥ १६ प्रसन्नताके साथ निरन्तर उन मुनिश्रेष्ठकी सेवा करने मानसैरुपचारैश्च मंत्रेण विधिपूर्वकम् । लगीं । वे सुन्दर पार्थिव शिवलिंग बनाकर मन्त्रके द्वारा पूजयामास शंकरम् ॥ १७ विधिवत् मानस उपचारोंसे पूजन करती थीं और बारंबार तुष्टाव शंकरं भक्त्या संसेवित्वा मुहुर्मुहुः । शंकरजीकी सेवाकर भक्तिसे उनकी बद्धाञ्जलिपुटा भूत्वा प्रक्रम्य स्वामिनं शिवम् ॥ १८ हाथ जोड़कर स्तुति करती थीं । दण्डवत्प्रणिपातेन प्रतिप्रक्रमणं स्वामी सदाशिवकी प्रदक्षिणाकर सुन्दर चकार सुचरित्रा तदा । चरित्रवाली वे मुनिपत्नी अनसूया प्रत्येक परिक्रमामें सानसूया मुनिकामिनी ॥ १ ९ दण्डवत् प्रणाम करती थीं ॥ १५–१९ ॥ दैत्याश्च दानवाः सर्वे दृष्ट्वा तु सुन्दरीं तदा । उस समय उन शोभाशालिनी [ अनसूया विह्वलाश्चाभवँस्तत्र तेजसा दूरतः स्थिताः ॥ २० देखकर सम्पूर्ण दैत्य एवं दानव वहाँ घबड़ा ] -को अग्निं दृष्ट्वा यथा दूरे वर्तन्ते तद्वदेव उनके तेजके कारण दूर खड़े हो गये । जिस गये प्रकार और तथैनां च तदा दृष्ट्वा नायान्तीह हि । अग्निको देखकर लोग दूर रहते हैं, उसी प्रकार उनको समीपगाः ॥ २१ । देखकर लोग समीपमें नहीं आते थे ॥ २०-२१ ॥