शिव महापुराण - २ — पृष्ठ 221–230
शिव महापुराण - २ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 221–230
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अ ० ३ ] कोटिरुद्रसंहिता २०७
अत्रेश्च तपसश्चैवानसूयाशिवसेवनम् ।
विशिष्यते स्म विप्रेन्द्रा मनोवाक्कायसंस्कृतम् ॥
तावत्कालं तु सा देवी परिचर्यां चकार ह ।
यावत्कालं मुनिवरः प्राणायामपरायणः ॥
तौ दम्पती तदा तत्र स्वस्वकार्यपरायणौ ।
संस्थितौ मुनिशार्दूल नान्य: कश्चित्परः स्थितः ॥
एवं जाते तदा काले ह्यत्रिश्च ऋषिसत्तमः ।
ध्याने च परमे लीनो न व्यबुध्यत किंचन ॥
अनसूयापि सा साध्वी स्वामिनं वै शिवं तथा ।
भेजे नान्यत्परं किंचिज्जानीते स्म च सा सती ॥
तस्यैव तपसा सर्वे तस्याश्च भजनेन च ।
देवाश्च ऋषयश्चैव गंगाद्याः सरितस्तथा ॥
दर्शनार्थं तयोः सर्वाः परप्रीत्या समाययुः ।
दृष्ट्वा च तत्तपः सेवां विस्मयं परमं ययुः ॥
तयोस्तदद्भुतं दृष्ट्वा समूचुर्भजनं वरम् ।
उभयोः किं विशिष्टं च तपसो भजनस्य च ॥
अत्रेश्चैव तपःप्रोक्तमनसूयानुसेवनम् ।
तत्सर्वमुभयोर्दृष्ट्वा समूचुर्भजनं वरम् ॥
पूर्वैश्च ऋषिभिश्चैव दुष्करं तु तपः कृतम् ।
एतादृशं तु केनापि क्व कृतं नैतदब्रुवन् ॥
धन्योऽयं च मुनिर्धन्या तथेयमनसूयिका ।
यदैताभ्यां परं प्रीत्या क्रियते सुतपः पुनः ॥
एतादृशं शुभं चैतत्तपो दुष्करमुत्तमम् ।
त्रिलोक्यां क्रियते केन साम्प्रतं ज्ञायते न हि ॥
तयोरेव प्रशंसां च कृत्वा ते तु यथागतम् ।
गतास्ते च तदा तत्र गंगाञ्च गिरिशं विना ॥
गंगा मद्भजनप्रीता साध्वी धर्मविमोहिता ।
कृत्वोपकारमेतस्यागमिष्यामीत्युवाच सा ॥
शिवोऽपि ध्यानसम्बद्धो मुनेरत्रेर्मुनीश्वराः ।
पूर्णांशेन स्थितस्तत्र कैलासं न जगाम ह ॥
हे विप्रेन्द्रो! अत्रिकी तपस्याकी अपेक्षा अनसूयाद्वारा २२ मन, वाणी एवं कर्मसे किया गया शिवसेवन विशिष्ट था । इस प्रकार जबतक मुनिवर अत्रि प्राणायामपरायण २३ होकर समाधिमें लीन रहे, तबतक वे देवी उनकी सेवा करती रहीं । हे मुनिवर! इस प्रकार वे दोनों पति - पत्नी २४ अपने - अपने कार्यमें परायण होकर स्थित रहे, वहाँ कोई अन्य स्थित न रहा, चिरकाल व्यतीत हो जानेपर भी २५ इस प्रकार ध्यानमें मग्न ऋषिश्रेष्ठ अत्रिको किसी वस्तुका भान न रहा ॥ २२–२५ ॥ पतिव्रता अनसूया भी अपने पति अत्रि तथा २६ अपने इष्टदेव सदाशिवकी सेवा करने लगीं और उन सतीको भी किसी अन्य वस्तुका ज्ञान न रहा । तब उन अत्रिकी तपस्या तथा अनसूयाके शिवाराधनसे प्रसन्न २७ होकर सम्पूर्ण देवता, ऋषिगण तथा गंगा आदि सभी नदियाँ – ये सभी उन दोनोंका दर्शन करनेके लिये प्रेमपूर्वक वहाँ आये । अत्रिकी तपश्चर्या एवं अनसूयाकी २८ सेवा देखकर वे बड़े आश्चर्यमें पड़ गये ॥ २६–२८ ॥ उन दोनोंके अद्भुत तप तथा उत्तम सेवाभावको २ ९ देखकर वे कहने लगे कि अत्रिका तप तथा अनसूयाकी आराधना - इन दोनोंमें कौन श्रेष्ठ है? इसके बाद उन दोनोंको देखकर उन्होंने कहा कि भजन श्रेष्ठ है ३० पूर्वकालीन ऋषियोंने भी दुष्कर तप किया था, किंतु ऐसा कठिन तप किसीने कभी भी नहीं किया- ऐसा ३१ उन्होंने कहा । ये अत्रि धन्य हैं एवं ये अनसूया भी धन्य हैं, जो कि ये दोनों प्रेमपूर्वक घोर तपस्या कर ३२ रहे हैं । त्रिलोकीमें इस प्रकारका शुभ, उत्तम तथा कठिन तप किसीने किया हो, यह बात इस समयतक ३३ जानी नहीं जा सकी है ॥२ ९ –३३ ॥ इस प्रकार उनकी प्रशंसाकर वे जैसे आये थे, ३४ वैसे ही [ अपने - अपने स्थानको ] चले गये । परंतु गंगाजी और शिवजी वहीं स्थित रहे । गंगा तो साध्वी अनसूयाके पातिव्रत्य धर्म तथा उनकी सेवासे मुग्ध होकर वहीं रह गयीं । गंगाने कहा कि मैं इन ३५ अनसूयाका उपकार करके ही जाऊँगी ॥ ३४-३५ ॥ हे मुनीश्वरो! शिवजी भी महर्षि अत्रिके ध्यानसे बँधे रहनेके कारण पूर्णांशसे वहीं स्थित हो गये और ३६ । कैलास नहीं गये । हे ऋषिश्रेष्ठो! चौवन वर्ष बीत
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२०८ पञ्चाशच्च तथा चात्र चत्वारि ऋषिसत्तमाः वर्षाणि च गतान्यासन् वृष्टिर्नैवाभवत्तदा यावच्चाप्यत्रिणा ह्येवं तपसा ध्यानमाश्रितम् अनसूया तदा नैव गृह्णामीतीषणा कृता एवं च क्रियमाणे हि मुनिना तपसि स्थिते अनसूयासुभजने यज्जातं श्रूयतामिति श्रीशिवमहापुराण [ अ ० ४ । । गये, किंतु वर्षा नहीं हुई । इधर, अनसूयाने यह प्रतिज्ञा ॥ ३७ कर रखी थी कि जबतक महर्षि समाधिमें लीन रहेंगे, तबतक मैं कुछ भी ग्रहण नहीं करूँगी । इस । । प्रकार [ हे महर्षियो! ] मुनिके द्वारा की जाती हुई ॥ ३८ तपस्यामें स्थित रहने और अनसूयाके शिवभजनमें । । तत्पर रहनेके कारण जो कुछ हुआ, उसे आप लोग ॥ ३ ९ | सुनें ॥ ३६–३९ ॥ इति श्रीशिवमहापुराणे चतुर्थ्यां कोटिरुद्रसंहितायामनसूयात्रितपोवर्णनं नाम तृतीयोऽध्यायः ॥ ३ ॥
। इस प्रकार श्रीशिवमहापुराणके अन्तर्गत चतुर्थ कोटिरुद्रसंहितामें अनसूयात्रितपोवर्णन नामक तीसरा अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ३ ॥
अथ चतुर्थोऽध्यायः अनसूयाके पातिव्रतके प्रभावसे गंगाका प्राकट्य तथा अत्रीश्वरमाहात्म्यका वर्णन सूत उवाच
कदाचित्स ऋषिश्रेष्ठो ह्यत्रिर्ब्रह्मविदां वरः ।
जागृतश्च जलं देहि प्रत्युवाच प्रियामिति ॥
सापि साध्वी त्ववश्यं च गृहीत्वाथ कमण्डलुम् ।
जगाम विपिने तत्र जलं मे नीयते कुतः ॥
किं करोमि क्व गच्छामि कुतो नीयेत वै जलम् ।
इति विस्मयमापन्ना तां गंगां हि ददर्श सा ॥
तामनुव्रजती यावत् साब्रवीच्च तदा हि ताम् ।
गंगा सरिद्वरा देवी बिभ्रती सुन्दरां तनुम् ॥
गंगोवाच
प्रसन्नास्मि च ते देवि कुत्र यासि वदाधुना ।
धन्या त्वं सुभगे सत्यं तवाज्ञां च करोम्यहम् ॥
सूत उवाच
तद्वचश्च तदा श्रुत्वा ऋषिपत्नी तपस्विनी ।
प्रत्युवाच वचः प्रीत्या स्वयं सुचकिता द्विजाः ॥
अनसूयोवाच
का त्वं कमलपत्राक्षि कुतो वा त्वं समागता ।
तथ्यं ब्रूहि कृपां कृत्वा साध्वी सुप्रवदा सती ॥
सूतजी बोले – [ हे महर्षियो! ] किसी समय जब ब्रह्मवेत्ताओंमें श्रेष्ठ ऋषिवर अत्रि समाधिसे १ जगे, तब उन्होंने अपनी प्रिया पत्नीसे कहा —— जल दो ' ॥ १ ॥
वे साध्वी भी ‘ मैं जल अवश्य ही लाऊँगी ' ऐसा २ निश्चयकर कमण्डलु लेकर वनकी ओर चल पड़ीं और विचार करने लगीं कि ' मैं जल कहाँसे लाऊँ, मैं क्या करूँ, कहाँ जाऊँ और कहाँसे जल लाऊँ'-३ इस विस्मयमें पड़ी हुई उन्होंने उन गंगाजीको मार्गमें देखा । गंगाजीके पीछे - पीछे अनसूया भी चलने लगीं । तब नदियोंमें श्रेष्ठ तथा सुन्दर शरीर धारण करनेवाली ४ गंगा देवीने उनसे कहा — ॥२–४ ॥ गंगाजी बोलीं – हे देवि! मैं तुमपर प्रसन्न हूँ, तुम यह बताओ कि इस समय कहाँ जा रही हो? ५ हे सुभगे! सचमुच तुम धन्य हो, मैं तुम्हारी आज्ञाका पालन करूँगी ॥५ ॥
सूतजी बोले - हे ब्राह्मणो! तब उनकी बात सुनकर तपस्विनी ऋषिपत्नी स्वयं आश्चर्यमें पड़ गयीं ६ और प्रेमपूर्वक यह वचन कहने लगीं— ॥ ६ ॥
अनसूया बोलीं – हे कमलनयने! तुम कौन हो और कहाँसे आयी हो? कृपा करके बताओ; तुम मनोहर बोलनेवाली साध्वी सती - जैसी मालूम ७ | पड़ रही हो ॥७ ॥
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अ ० ४ ] कोटिरुद्रसंहिता सूत उवाच
इत्युक्ते च तया तत्र मुनिपत्न्या मुनीश्वराः ।
सरिद्वरा दिव्यरूपा गंगा वाक्यमथाब्रवीत् ॥
गंगोवाच
स्वामिनः सेवनं दृष्ट्वा शिवस्य च परात्मनः ।
साध्वि धर्मं च ते दृष्ट्वा स्थितास्मि तव सन्निधौ ॥
अहं गंगा समायाता भजनात्ते शुचिस्मिते ।
वशीभूता ह्यहं जाता यदिच्छसि वृणीष्व तत् ॥
सूत उवाच
इत्युक्ते गंगया साध्वी नमस्कृत्य पुरः स्थिता ।
उवाचेति जलं देहि चेत्प्रसन्ना ममाधुना ॥
इत्येतद्वचनं श्रुत्वा गर्तं कुर्विति साब्रवीत् ।
शीघ्रं चायाच्च तत्कृत्वा स्थिता तत्क्षणमात्रतः ॥
तत्र सा च प्रविष्टा च जलरूपमभूत्तदा ।
आश्चर्यं परमं गत्वा गृहीतं च जलं तया ॥
उवाच वचनं चैतल्लोकानां सुखहेतवे ।
अनसूया मुनेः पत्नी दिव्यरूपां सरिद्वराम् ॥
अनसूयोवाच
यदि त्वं सुप्रसन्ना मे वर्तसे च कृपा मयि ।
स्थातव्यं च त्वया तावत् मत्स्वामी यावदाव्रजेत् ॥
सूत उवाच
इति श्रुत्वानसूयाया वचनं सुखदं सताम् ।
गंगोवाच प्रसन्नाति ह्यत्रेर्दास्यसि मेऽनघे ॥
इत्युक्ते च तया तत्र ह्यनयापि कृतं तथा ।
स्वामिने तज्जलं दिव्यं दत्त्वा तत्पुरतः स्थिता ॥
स ऋषिश्चापि सुप्रीत्या स्वाचम्य विधिपूर्वकम् ।
पपौ दिव्यं जलं तच्च पीत्वा सुखमवाप ह ॥
२० ९ सूतजी बोले- हे मुनीश्वरो! ऋषिपत्नीके द्वारा इस प्रकार कहे जानेपर नदियोंमें श्रेष्ठ दिव्यरूपधारिणी ८ गंगाजीने यह वचन कहा— ॥ ८ ॥
गंगाजी बोलीं- हे साध्वि! अपने पति तथा परमेश्वर सदाशिवके प्रति तुम्हारी सेवाको देखकर ९ एवं तुम्हारा धर्माचरण देखकर मैं तुम्हारे समीप ही स्थित हो गयी हूँ॥९॥
हे शुचिस्मिते! मैं गंगा हूँ और तुम्हारे शिवाराधनसे १० प्रसन्न होकर यहाँ आयी हूँ तथा तुम्हारी वशवर्तिनी हो गयी हूँ, अत: तुम जो चाहती हो, उसे माँगो ॥ १० ॥
सूतजी बोले - गंगाके द्वारा इस प्रकार कहे जानेपर वे साध्वी अनसूया उन्हें नमस्कारकर आगे ११ खड़ी हो गयीं और बोलीं कि यदि आप इस समय मुझपर प्रसन्न हैं, तो जल दीजिये ॥ ११ ॥
यह वचन सुनकर गंगाजी बोलीं – गड्ढा तैयार १२ करो । तब क्षणमात्रमें वैसा करके वे अनसूया आकर वहाँ खड़ी हो गयीं । इसके बाद वे गंगा उस ( गर्त ) -में प्रविष्ट हो गयीं और जलरूपमें परिणत हो गयीं । १३ तब उन्होंने आश्चर्यचकित हो जलको ग्रहण कर लिया । तत्पश्चात् मुनिपत्नी अनसूयाने लोकोंके सुखके लिये नदियोंमें श्रेष्ठ तथा दिव्य रूपवाली गंगाजीसे १४ यह वचन कहा— ॥ १२–१४ ॥ अनसूया बोलीं- [ हे कृपामयि! ] यदि आप मुझपर प्रसन्न हैं, तो आप तबतक यहीं स्थित रहें, १५ जबतक मेरे स्वामी यहाँ न आ जायँ ॥ १५ ॥
सूतजी बोले- सज्जनोंको सुख देनेवाले अनसूयाके इस वचनको सुनकर गंगाने अत्यन्त प्रसन्न १६ होकर कहा- हे अनघे! तुम मेरे इस जलको अत्रिको दे देना । उनके इस प्रकार कहनेपर अनसूयाने भी वैसा ही किया । वे कभी नष्ट न होनेवाले उस दिव्य जलको अपने स्वामीको देकर उनके आगे खड़ी हो १७ गयीं ॥ १६-१७ ॥ तब उन ऋषिने भी अत्यन्त प्रेमसे विधिपूर्वक आचमनकर उस दिव्य जलका पान किया और उसे १८ । पीकर सुखका अनुभव किया ॥१८ ॥
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२१० अहो नित्यं जलं यच्च पीयते तज्जलं न हि विचार्येति च तेनाशु परितश्चावलोकितम् ॥ शुष्कान्वृक्षान्समालोक्य दिशो रूक्षतरास्तथा उवाच तामृषिश्रेष्ठो न जातं वर्षणं पुनः तदुक्तं तत् समाकर्ण्य नेति नेति प्रियां तदा । तामुवाच पुनः सोऽपि जलं नीतं कुतस्त्वया इत्युक्ते तु तदा तेन विस्मयं परमं गता । अनसूया स्वमनसि सचिन्ता तु मुनीश्वराः
निवेद्यते मया चेद्वै तदोत्कर्षो भवेन्मम ।
निवेद्यते यदा नैव व्रतभङ्गो भवेन्मम ॥
नोभयं च तथा स्याद्वै निवेद्यं तत्तथा मम ।
इति यावद्विचार्येत तावत्पृष्टा पुनः पुनः ॥
अथानुग्रहतः शंभोः प्राप्तबुद्धिः पतिव्रता ।
उवाच श्रूयतां स्वामिन्यज्जातं कथयामि ते ॥
अनसूयोवाच
शंकरस्य प्रतापाच्च तवैव सुकृतैस्तथा ।
गंगा समागतात्रैव तदीयं सलिलं त्विदम् ॥
सूत उवाच
एवं वचस्तदा श्रुत्वा मुनिर्विस्मयमानसः ।
प्रियामुवाच सुप्रीत्या शंकरं मनसा स्मरन् ॥
अत्रिरुवाच
प्रिये सुन्दरि त्वं सत्यमथ वाचं व्यलीककाम् ।
ब्रवीषि च यथार्थं त्वं न मन्ये दुर्लभं त्विदम् ॥
असाध्यं योगिभिर्यच्च देवैरपि सदा शुभे ।
तच्चैवाद्य कथं जातं विस्मयः परमो मम ॥
यद्येवं दृश्यते चेद्वै तन्मन्येऽहं न चान्यथा ।
इति तद्वचनं श्रुत्वा प्रत्युवाच पतिं प्रिया ॥
श्रीशिवमहापुराण [ अ ० ४ । ' अहो, आश्चर्य है, मैं जो जल प्रतिदिन पीता १ ९ था, यह जल वैसा नहीं है ' - ऐसा विचारकर उन्होंने वनमें चारों ओर अपनी दृष्टि दौड़ायी । तब सूखे वृक्षों । । तथा उससे भी अधिक सूखी हुईं दिशाओंको देखकर ऋषिश्रेष्ठने उनसे कहा कि क्या फिर वर्षा नहीं ॥ २० हुई? ॥ १ ९ -२० ॥ उनकी बात सुनकर अनसूयाने कहा — नहीं, ॥ २१ वर्षा नहीं हुई । तब ऋषिने पुनः अनसूयासे कहा कि फिर तुमने यह जल कहाँसे प्राप्त किया? ॥ २१ ॥
हे मुनीश्वरो! ऋषिके ऐसा कहनेपर अनसूया ॥ २२ असमंजसमें पड़ गयी और मनमें विचार करने लगी कि यदि मैं बता देती हूँ, तो इससे मेरी उत्कृष्टता सिद्ध होगी और यदि नहीं बताती, तो मेरा पातिव्रत्य भंग २३ हो जायगा । अब मैं कौन - सा उपाय करूँ कि ये दोनों बातें न हों और मैं सच - सच बात कह भी दूँ । अभी वह इस प्रकार विचार कर ही रही थी कि महर्षिने २४ बारंबार पूछा ॥ २२–२४ ॥ तब शिवजीके अनुग्रहसे बुद्धि प्राप्तकर उन २५ पतिव्रताने कहा – हे स्वामिन्! इस विषयमें जो हुआ, उसे मैं कहती हूँ, आप सुनिये ॥ २५ ॥
अनसूया बोली- महादेवके प्रतापसे तथा आपके पुण्योंसे गंगा यहींपर आयी हुई हैं; यह २६ । उन्हींका जल है ॥ २६ ॥
सूतजी बोले- तब इस वचनको सुनकर महर्षिको बड़ा आश्चर्य हुआ और उन्होंने मनसे २७ शंकरजीका स्मरण करते हुए प्रेमपूर्वक अपनी पत्नीसे कहा- 1 ॥ २७ ॥
अत्रि बोले- हे प्रिये! हे सुन्दरि! यह तुम सत्य वचन कह रही हो अथवा झूठ? तुम सच २८ कहती हो या मिथ्या, मैं निश्चय नहीं कर पा रहा हूँ; क्योंकि यह अत्यन्त दुर्लभ है । हे शुभे! जो सदा योगियों तथा देवताओंके लिये भी असाध्य है, वह आज किस प्रकार हो गया; मुझे तो महान् २ ९ विस्मय हो रहा है । यदि ऐसा है, तो मैं देखना चाहता हूँ; तभी विश्वास करूँगा, अन्यथा नहीं । तब उनका वचन सुनकर उनकी पत्नी अनसूयाने ३० | पतिसे कहा- ॥ २८-३० ॥
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अ ० ४ ] अनसूयोवाच आगम्यतां मया सार्धं त्वया नाथ महामुने सरिद्वराया गंगाया द्रष्टुमिच्छा भवेद्यदि सूत उवाच इत्युक्त्वा तु समादाय पतिं तं सा पतिव्रता गता द्रुतं शिवं स्मृत्वा यत्र गंगा सरिद्वरा ॥ दर्शयामास तां तत्र गंगां पत्ये पतिव्रता गर्ते च संस्थितां तत्र स्वयं दिव्यस्वरूपिणीम् तत्र गत्वा ऋषिश्रेष्ठो गर्तं च जलपूरितम् आकण्ठं सुन्दरं दृष्ट्वा धन्येयमिति चाब्रवीत् किं मदीयं तपश्चैव किमन्येषां पुनस्तदा इत्युक्त्वा मुनिशार्दूलो भक्त्या तुष्टाव तां तदा ततो हि स मुनिस्तत्र सुस्नातः सुभगे जले आचम्य पुनरेवात्र स्तुतिं चक्रे पुनः पुनः अनसूयापि संस्नाता सुन्दरे तज्जले तदा नित्यं चक्रे मुनिः कर्म सानसूयापि सुव्रता ततः सोवाच तां गंगा गम्यते स्वस्थलं मया इत्युक्ते च पुनः साध्वी तामुवाच सरिद्वराम् अनसूयोवाच यदि प्रसन्ना देवेशि यद्यस्ति च कृपा मयि त्वया स्थेयं निश्चलत्वादस्मिन्देवि तपोवने महतां च स्वभावश्च नांगीकृत्य परित्यजेत् इत्युक्त्वा च करौ बध्वा तां तुष्टाव पुनः पुनः ऋषिश्चापि तथोवाच त्वया स्थेयं सरिद्वरे सानुकूला भव त्वं हि सनाथान्देवि नः कुरु तदीयं तद्वचः श्रुत्वा रम्यं गंगा सरिद्वरा प्रसन्नमानसा गंगानसूयां वाक्यमब्रवीत् गंगोवाच शंकरार्चनसंभूतफलं वर्षस्य यच्छसि कोटिरुद्रसंहिता २११ अनसूया बोलीं- हे नाथ! हे महामुने! यदि । आपकी इच्छा नदियोंमें श्रेष्ठ गंगाके दर्शनकी हो, तो ॥ ३१ आप मेरे साथ चलिये ॥३१ ॥
सूतजी बोले- ऐसा कहकर वे पतिव्रता अपने । पतिको साथ लेकर शिवजीका स्मरण करके शीघ्र ही ३२ वहाँ पहुँचीं, जहाँ नदियोंमें श्रेष्ठ गंगा विद्यमान थीं ॥ ३२ ॥
। उसके बाद उन पतिव्रताने अपने पतिको उस गड्ढेमें ॥ ३३ स्थित दिव्यस्वरूपवाली गंगाका दर्शन कराया ॥३३ ॥
। मुनिश्रेष्ठने वहाँ जाकर ऊपरतक जलसे परिपूर्ण ॥ ३४ सुन्दर गड्ढेको देखकर कहा- ये धन्य हैं ॥ ३४ ॥
। क्या यह साक्षात् मेरा तप है अथवा अन्य ॥ ३५ किसीका - इस प्रकार कहकर मुनिश्रेष्ठने भक्तिपूर्वक । उन गंगाकी स्तुति की । इसके बाद उन मुनिने निर्मल ॥ ३६ जलमें भलीभाँति स्नान किया और आचमनकर बार-। बार उनकी स्तुति की । अनसूयाने भी उस निर्मल जलमें स्नान किया । इसके बाद उस पतिव्रता अनसूया तथा ॥ ३७ मुनिने वहाँ नित्यकर्म सम्पन्न किया ॥ ३५–३७ ॥ । उसके बाद गंगाने अनसूयासे कहा कि अब मैं ॥ ३८ अपने स्थानको जा रही हूँ । गंगाके ऐसा कहनेपर उस साध्वीने पुनः उन श्रेष्ठ नदी गंगासे कहा- ॥ ३८ ॥
अनसूया बोलीं – हे देवेशि! यदि आप प्रसन्न । हैं और मुझपर आपकी कृपा है, तो हे देवि! इस ॥ ३ ९ तपोवनमें आप स्थिर होकर निवास करें; क्योंकि बड़े लोगोंका ऐसा स्वभाव होता है कि वे एक बार किसीको स्वीकार करके उसे कभी छोड़ते नहीं— । इतना कहकर दोनों हाथ जोड़कर वे पुन: उनकी ॥ ४० स्तुति करने लगीं ॥ ३ ९ -४० ॥ । तदनन्तर ऋषिने भी इसी प्रकार प्रार्थना की कि ॥ ४१ हे सरिद्वरे! हे देवि! आप यहीं निवास करें, आप हमारे अनुकूल रहें और हम लोगोंको सनाथ करें ॥ ४१ ॥
। तब उनके इस मनोहर वचनको सुनकर नदियोंमें ॥ ४२ श्रेष्ठ गंगाका मन प्रसन्न हो गया; इसके बाद गंगाने अनसूयासे यह वचन कहा —॥४२ ॥
गंगाजी बोलीं- हे अनसूये! यदि तुम भगवान् शंकरके अर्चन एवं अपने स्वामीकी सेवाका वर्षभरका । फल मुझे प्रदान करो, तो मैं देवताओंके उपकारके
स्वामिनश्च तदा स्थास्ये देवानामुपकारणात् ॥ ४३ । लिये यहाँ स्थित रहूँगी ॥ ४३ ॥
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२१२ तथा दानैर्न मे तुष्टिस्तीर्थस्नानैस्तथा च वै यज्ञैस्तथाथवा योगैर्यथा पातिव्रतेन च पतिव्रतां यथा दृष्ट्वा मनसः प्रीणनं भवेत् तथा नान्यैरुपायैश्च सत्यं मे व्याहृतं सति
पतिव्रतां स्त्रियं दृष्ट्वा पापनाशो भवेन्मम ।
शुद्धा जाता विशेषेण गौरीतुल्या पतिव्रता ॥
तस्माच्च यदि लोकस्य हिताय तत्प्रयच्छसि ।
तर्ह्यहं स्थिरतां यास्ये यदि कल्याणमिच्छसि ॥
सूत उवाच
इत्येवं वचनं श्रुत्वानसूया सा पतिव्रता ।
गंगायै प्रददौ पुण्यं सर्वं तद्वर्षसंभवम् ॥
महतां च स्वभावो हि परेषां हितमावहेत् ।
सुवर्णं चन्दनं चेक्षुरसस्तत्र निदर्शनम् ॥
एतद् दृष्ट्वानसूयं तत्कर्म पातिव्रतं महत् ।
प्रसन्नोऽभून्महादेवः पार्थिवादाविराशु वै ॥
शंभुरुवाच
दृष्ट्वा ते कर्म साध्व्येतत् प्रसन्नोऽस्मि पतिव्रते ।
वरं ब्रूहि प्रिये मत्तो यतः प्रियतरासि मे ॥
अथ तौ दम्पती शंभुमभूतां सुन्दराकृतिम् ।
पञ्चवक्त्रादिसंयुक्तं हरं प्रेक्ष्य सुविस्मितौ ॥
नत्वा स्तुत्वा करौ बध्वा महाभक्तिसमन्वितौ । अवोचेतां समभ्यर्च्य शंकरं लोकशंकरम् ॥ दम्पती ऊचतुः यदि प्रसन्नो देवेश प्रसन्ना जगदम्बिका । अस्मिंस्तपोवने तिष्ठ लोकानां सुखदो भव श्रीशिवमहापुराण [ अ ० ४ । हे देवि! दान, तीर्थ - स्नान, यज्ञ तथा योगसे मेरी ॥ ४४ / उतनी सन्तुष्टि नहीं होती, जितनी [ पतिव्रताओंके पातिव्रत्यसे होती है ॥४४ ॥ ]
। पतिव्रताको देखकर मेरे मनको जैसी प्रसन्नता ॥ ४५ होती है, वैसी प्रसन्नता अन्य उपायोंसे नहीं होती । हे सती अनसूये! मैं सत्य कहती हूँ । पतिव्रता स्त्रीको देखकर मेरा पाप नष्ट हो जाता है और मैं विशेषरूपसे ४६ शुद्ध हो जाती हूँ, पतिव्रता [ स्त्री ] पार्वतीके तुल्य है ॥ ४५-४६ ॥ इसलिये यदि तुम लोकहितके लिये वह पुण्य ४७ मुझे देती हो और कल्याणकी इच्छा करती हो, तो मैं यहाँ स्थिर हो जाऊँगी ॥४७ ॥
सूतजी बोले- यह वचन सुनकर पतिव्रता अनसूयाने वर्षभरका वह सारा पुण्य गंगाको दे ४८ दिया ॥ ४८ ॥
बड़े लोगोंका ऐसा स्वभाव है कि वे दूसरोंका ४ ९ हित करते हैं; इस विषयमें सुवर्ण, चन्दन तथा इक्षुरस दृष्टान्तस्वरूप हैं । अनसूयाके उस महान् पातिव्रत्य कर्मको देखकर महादेव प्रसन्न हो गये और उसी क्षण ५० पार्थिव लिंगसे प्रकट हो गये ॥ ४ ९ -५० ॥ शंभु बोले - हे साध्वि! हे पतिव्रते! तुम्हारे इस कर्मको देखकर मैं प्रसन्न हूँ । हे प्रिये! तुम मुझसे ५१ वर माँगो, क्योंकि तुम मुझे अत्यन्त प्रिय हो ॥ ५१ ॥
इसके बाद वे दोनों पति - पत्नी पाँच मुखोंसे ५२ युक्त तथा मनोरम आकृतिवाले शिवको देखकर अत्यन्त आश्चर्यचकित हो गये और उन्होंने दोनों हाथ जोड़कर महाभक्तिसे युक्त हो नमस्कार करके स्तवन किया, फिर लोकका कल्याण करनेवाले उन शंकरकी भलीभाँति अर्चना करके उनसे कहने ५३ लगे - ॥५२-५३ ॥ पति - पत्नी बोले- हे देवेश! यदि आप प्रसन्न हैं और ये जगदम्बा भी प्रसन्न हैं, तो आप इस तपोवनमें निवास ॥ ५४ करें और लोकोंके लिये सुखदायक हों ॥ ५४ ॥
प्रसन्ना च तदा गंगा प्रसन्नश्च शिवस्तदा । इस प्रकार प्रसन्न हुई गंगा तथा प्रसन्न उभौ तौ च स्थितौ तत्र यत्रासीदृषिसत्तमः हुए सदाशिव – वे दोनों वहाँ स्थित हो गये, जहाँ ॥ ५५ । ऋषिश्रेष्ठ अत्रि रहते थे ॥ ५५ ॥
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अ ० ५ ] अत्रीश्वरश्च नाम्नासीदीश्वरः परदुःखहा गंगा सापि स्थिता तत्र तदा गर्तेऽथ मायया तद्दिनं हि समारभ्य तत्राक्षय्यजलं सदा हस्तमात्रे हि तद्गर्ते गंगा मन्दाकिनी ह्यभूत् तत्रैव ऋषयो दिव्याः समाजग्मुः सहांगनाः तीर्थात्तीर्थाच्च ते सर्वे ये पुरा निर्गता द्विजाः यवाश्च व्रीहयश्चैव यज्ञयागपरायणाः युक्ता ऋषिवरैस्तैश्च होमं चक्रुश्च ते जनाः कर्मभिस्तैश्च संतुष्टा वृष्टिं चक्रुर्घनास्तदा आनन्दः परमो लोके बभूवाति मुनीश्वराः अत्रीश्वरस्य माहात्म्यमित्युक्तं वः सुखावहम् कोटिरुद्रसंहिता २१३ । दूसरोंका दुःख दूर करनेवाले सदाशिव अत्रीश्वर ॥ ५६ नामसे वहाँपर प्रसिद्ध हो गये और गंगाजी भी अपनी शक्तिसे उसी गड्ढेमें स्थित हो गयीं ॥५६ ॥
। उसी दिनसे वहाँपर जल सर्वदा अक्षय प्रवाहित ॥ ५७ होने लगा और हाथभरके उस गड्ढेमें [ प्रविष्ट हुई ] गंगा मन्दाकिनी नामसे प्रसिद्ध हुईं ॥५७ ॥
। हे द्विजो! प्रत्येक तीर्थसे उस स्थानपर वे समस्त ॥ ५८ दिव्य ऋषि अपनी पत्नियोंके साथ आ गये, जो वहाँसे पहले दूसरी जगह चले गये थे ॥५८ ॥
। वहाँका सारा प्रदेश यव और व्रीहिसे परिपूर्ण हो ॥ ५ ९ गया, जिनसे उन श्रेष्ठ ऋषियोंके साथ यज्ञ - यागादि करनेवाले वहाँके लोग होम करने लगे ॥ ५ ९ ॥ । हे मुनीश्वरो! उस समय उन कर्मोंसे सन्तुष्ट ॥ ६० होकर मेघोंने बहुत वर्षा की, जिससे संसारमें परम आनन्द छा गया ॥ ६० ॥
[ हे मुनीश्वरो! ] इस प्रकार मैंने अत्रीश्वरका माहात्म्य आपलोगोंसे कहा, जो सुखप्रद, भोग - मोक्ष । देनेवाला, समस्त मनोरथोंको पूर्ण करनेवाला एवं
भुक्तिमुक्तिप्रदं सर्वकामदं भक्तिवर्धनम् ॥ ६१ । भक्तिको बढ़ानेवाला है ॥ ६१ ॥
इति श्रीशिवमहापुराणे चतुर्थ्यां कोटिरुद्रसंहितायामत्रीश्वरमाहात्म्यवर्णनं नाम चतुर्थोऽध्यायः ॥ ४ ॥
॥ इस प्रकार श्रीशिवमहापुराणके अन्तर्गत चतुर्थ कोटिरुद्रसंहितामें अत्रीश्वरमाहात्म्यवर्णन नामक चौथा अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ४ ॥
अथ पञ्चमोऽध्यायः रेवानदीके तटपर स्थित विविध शिवलिंग - माहात्म्य - वर्णनके क्रममें द्विजदम्पतीका वृत्तान्त सूत उवाच कालंजरे गिरौ दिव्ये नीलकण्ठो महेश्वरः लिंगरूपः सदा चैव भक्तानन्दप्रदः सदा महिमा तस्य दिव्योऽस्ति श्रुतिस्मृतिप्रकीर्तितः तीर्थं तदाख्यया तत्र स्नानात्पातकनाशकृत् रेवातीरे यानि सन्ति शिवलिंगानि सुव्रताः सर्वसौख्यकराणीह तेषां संख्या न विद्यते सूतजी बोले- दिव्य कालंजर पर्वतपर नीलकण्ठ । नामक महादेव लिंगरूपसे सदा निवास करते हैं, जो ॥ १ भक्तजनोंको सर्वदा आनन्द प्रदान करनेवाले हैं ॥१ ॥
। उनकी महिमा परम दिव्य है, जिसका वर्णन वेद ॥ २ तथा स्मृतियोंमें किया गया है । वहाँपर नीलकण्ठ नामक तीर्थ है, जो स्नान करनेसे [ मनुष्योंके ] पापोंको नष्ट करनेवाला है ॥२ ॥
हे सुव्रतो! रेवा नदीके तटपर जितने शिवलिंग । हैं, उनकी गणना नहीं की जा सकती; वे सभी सब ॥ ३ । प्रकारके सुखोंको देनेवाले हैं ॥३ ॥
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२१४ सा च रुद्रस्वरूपा हि दर्शनात्पापहारिका तस्यां स्थिताश्च ये केचित्पाषाणाः शिवरूपिणः तथापि च प्रवक्ष्यामि यथान्यानि मुनीश्वराः प्रधानशिवलिंगानि भुक्तिमुक्तिप्रदानि च आर्तेश्वरसुनामा हि वर्तते पापहारकः परमेश्वर इति ख्यातः सिंहेश्वर इति स्मृतः शर्मेशश्च तथा चात्र कुमारेश्वर एव च पुण्डरीकेश्वरः ख्यातो मण्डपेश्वर एव च तीक्ष्णेशनामा तत्रासीद्दर्शनात्पापहारकः धुंधुरेश्वरनामासीत्पापहा नर्मदातटे शूलेश्वर इति ख्यातस्तथा कुंभेश्वरः स्मृतः । श्रीशिवमहापुराण [ अ ० ५ । [ साक्षात् ] रुद्रस्वरूप वह रेवा दर्शनमात्रसे ॥ ४ पापका नाश कर देनेवाली है और उसमें जो भी पाषाण स्थित हैं, वे शिवस्वरूप हैं । फिर भी हे मुनि! । भोग एवं मोक्षको देनेवाले प्रधान शिवलिंगोंका वर्णन ॥ ५ यथोचितरूपसे कर रहा हूँ॥४-५ ॥ । वहाँ आर्तेश्वर नामक लिंग है, जो सभी पापोंको ॥ ६ दूर करनेवाला है । इसी प्रकार परमेश्वर एवं सिंहेश्वर नामक लिंग भी कहे गये हैं ॥६ ॥
। इसी प्रकार वहाँपर शर्मेश्वर, कुमारेश्वर, ॥ ७ पुण्डरीकेश्वर एवं मण्डपेश्वर नामक लिंग भी हैं ॥ ७ ॥
। वहाँ नर्मदा नदीके किनारे दर्शनमात्रसे पापको नष्ट ॥ ८ करनेवाला तीक्ष्णेश्वर नामक लिंग है तथा पापको दूर करनेवाला धुन्धुरेश्वर नामक लिंग भी है ॥८ ॥
शूलेश्वर, कुम्भेश्वर, कुबेरेश्वर तथा सोमेश्वर कुबेरेश्वरनामापि तथा सोमेश्वरः स्मृतः ॥ ९ नामक लिंग भी प्रसिद्ध हैं । नीलकण्ठ तथा मंगलेश
नीलकण्ठो मंगलेशो मंगलायतनो महान् ।
महाकपीश्वरो देवः स्थापितो हि हनूमता ॥
ततश्च नंदिको देवो हत्याकोटिनिवारकः ।
सर्वकामार्थदश्चैव मोक्षदो हि प्रकीर्तितः ॥
नन्दिकेशं च यश्चैव पूजयेत्परया मुदा ।
नित्यं तस्याखिला सिद्धिर्भविष्यति न संशयः ॥
तत्र तीरे च यः स्नाति रेवायां मुनिसत्तमाः ।
तस्य कामाश्च सिध्यन्ति सर्वं पापं विनश्यति ॥
ऋषय ऊचुः
एवं तस्य च माहात्म्यं कथं तत्र महामते ।
नन्दिकेशस्य कृपया कथ्यतां च त्वयाधुना ॥
सूत उवाच सम्यक् पृष्टं भवद्भिश्च कथयामि यथाश्रुतम् । शौनकाद्याश्च तो महामंगलके स्थान ही हैं । महाकपीश्वर महादेवकी १० स्थापना स्वयं हनुमानजीने की थी॥९ -१० ॥ इसी क्रममें करोड़ों हत्याओंके पापको नष्ट करनेवाले, सम्पूर्ण कामनाओंका फल प्रदान करनेवाले ११ और मोक्षदायक नन्दिकदेव भी कहे गये हैं । जो अति प्रसन्नतापूर्वक नन्दिकेश्वरका पूजन करता है, उसे १२ सम्पूर्ण सिद्धियाँ नित्य प्राप्त होती हैं; इसमें संशय नहीं है ॥ ११-१२ ॥ हे श्रेष्ठ मुनियो! वहाँ रेवा नदीके तटपर जो १३ स्नान करता है, उसकी समस्त इच्छाएँ पूर्ण हो जाती हैं तथा उसके सारे पाप नष्ट हो जाते हैं ॥ १३ ॥
ऋषिगण बोले- उस नन्दिकेश्वर लिंगका ऐसा माहात्म्य क्यों है; आप इस समय कृपा करके १४ उसे बतायें? ॥ १४ ॥
सूतजी बोले – [ हे ऋषियो! ] आपलोगोंने बड़ा उत्तम प्रश्न किया; इस विषयमें मैंने जैसा सुना है, मुनयः सर्वे हि शृणुतादरात् ॥ १५ वैसा कह रहा हूँ । शौनक आदि आप सभी मुनिलोग पुरा युधिष्ठिरेणैवं पृष्टश्च ऋषिसत्तमः । आदरपूर्वक सुनिये । पूर्व समयमें युधिष्ठिरके प्रश्न यथोवाच तथा वच्मि भवत्स्नेहानुसारतः करनेपर ऋषिवर व्यासजीने जैसा कहा था, वही बात ॥ १६ मैं आपलोगोंके स्नेहके कारण कह रेवायाः पश्चिमे रेवा ( नर्मदा ) नदीके पश्चिमी रहा हूँ ॥ १५-१६ ॥ तीरे कर्णिकी नाम वै पुरी । नामक तटपर कर्णिकी विराजते सुशोभाढ्या चतुर्वर्णसमाकुला एक नगरी विराजमान है, जो सम्पूर्ण शोभासे ॥ १७ युक्त है और चारों वर्णोंसे भरी पड़ी है ॥ १७ ॥
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अ ० ५ ] कोटिरुद्रसंहिता
तत्र द्विजवरः कश्चिदुतथ्यकुलसम्भवः ।
काश्यां गतश्च पुत्राभ्यामर्पयित्वा स्वपलिकाम् ॥
तत्रैव स मृतो विप्रः पुत्राभ्यां च श्रुतं तदा ।
तदीयं चैव तत्कृत्यं चक्राते पुत्रकावुभौ ॥
पत्नी च पालयामास पुत्रौ पुत्रहितैषिणी ।
किञ्चिच्च वर्जयित्वा च विभक्तं वै धनं तया ॥
स्वीयं च रक्षितं किंचिद्धनं मरणहेतवे ।
ततश्च द्विजपत्नी हि कियत्काले गते च सा ॥
कदाचिन्प्रियमाणा सा विविधं पुण्यमाचरत् ।
न मृता दैवयोगेन द्विजपत्नी च सा द्विजाः ॥
यदा प्राणान्न मुमुचे माता दैवात्तयोश्च सा ।
तद् दृष्ट्वा जननीकष्टं पुत्रकावूचतुस्तदा ॥
पुत्रावूचतुः
किं न्यूनं विद्यते मातः कष्टं यद्विद्यते महत् ।
व्रियतां तद् द्रुतं प्रीत्या तदावां करवावहे ॥
सूत उवाच
तच्छ्रुत्वोक्तं तया तत्र न्यूनं मे विद्यते बहु ।
तदेव क्रियते चेद्वै सुखेन मरणं भवेत् ॥
ज्येष्ठपुत्रश्च यस्तस्यास्तेनोक्तं कथ्यतां त्वया ।
करिष्यामि तदेतद्धि तया च कथितं तदा ॥
द्विजपत्न्युवाच
शृणु पुत्र वचः प्रीत्या पुरासीन्मे मनः स्पृहा ।
काश्यां गंतुं तथा नासीदिदानीं म्रियते पुनः ॥
ममास्थीनि त्वया पुत्र क्षेपणीयान्यतन्द्रितम् ।
गंगाजले शुभं तेऽद्य भविष्यति न संशयः ॥
सूत उवाच
इत्युक्ते च तया मात्रा स ज्येष्ठतनयोऽब्रवीत् ।
मातरं मातृभक्तस्तु सुव्रतां मरणोन्मुखीम् ॥
२१५ वहीं उतथ्यके कुलमें उत्पन्न कोई श्रेष्ठ १८ ब्राह्मण [ रहता था, वह ] अपनी पत्नीको अपने दो पुत्रोंको सौंपकर काशी चला गया । वह विप्र वहींपर मर गया । जब उसके पुत्रोंने यह समाचार १ ९ सुना, तो दोनों पुत्रोंने उसका [ श्राद्ध आदि ] कृत्य कर दिया ॥ १८-१९ ॥ पुत्रोंका हित चाहनेवाली उसकी पत्नीने अपने २० बालकोंका लालन - पालन किया । [ पुत्रोंके बड़े हो जानेपर ] उसने कुछ धन बचाकर शेष धनका बँटवारा कर दिया । उसने कुछ धन अपने मरण - कृत्यके लिये २१ सुरक्षितकर अपने पास रख लिया । कुछ समय बीतनेपर मरणासन्न होनेपर उस ब्राह्मणीने अनेक प्रकारके पुण्य कार्य किये, किंतु हे द्विजो! दैवयोगसे २२ वह ब्राह्मणी मरी नहीं ॥ २० - २२ ॥ जब दैववश उन दोनोंकी माताके प्राण नहीं २३ निकले, तब माताके उस कष्टको देखकर उसके दोनों पुत्रोंने कहा— ॥ २३ ॥
पुत्र बोले- हे माता! अब किस बातकी कमी रह गयी है, जिससे आपको यह महान् कष्ट मिल २४ रहा है? आप शीघ्रतासे हमें बतायें, हमलोग प्रेमपूर्वक उसे करेंगे ॥२४ ॥
सूतजी बोले- यह सुनकर माताने कहा कि कमी तो बहुत रह गयी है, किंतु यदि तुमलोग उसे २५ पूरा करो, तो सुखपूर्वक मेरी मृत्यु हो सकती है । तब उसका जो ज्येष्ठ पुत्र था, उसने कहा कि आप बताइये; मैं उसे अवश्य पूर्ण करूँगा । तब उसने २६ कहा— ॥ २५-२६ ॥ द्विजपत्नी बोली- हे पुत्र! मेरी बात प्रेमसे सुनो; पहले मेरी इच्छा काशी जानेकी थी, किंतु वैसा २७ नहीं हो सका और अब मैं मर रही हूँ । हे पुत्र! तुम आलस्यका त्यागकर मेरी अस्थियोंको [ काशीमें ] गंगाजलमें फेंक देना; तुम्हारा कल्याण होगा, इसमें २८ संशय नहीं है ॥ २७-२८ ॥ सूतजी बोले- माताके इस प्रकार कहनेपर मातामें भक्ति रखनेवाले उस ज्येष्ठ पुत्रने सुव्रता, २ ९ मरणासन्न मातासे कहा- ॥ २ ९ ॥
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२१६ श्रीशिवमहापुराण [ अ ० ६ पुत्र बोला — हे मातः! आप सुखपूर्वक अपने प्राणास्त्याज्या पुत्र उवाच न संशयः । प्राणोंका त्याग कीजिये, मैं सर्वप्रथम आपका कार्य मातस्त्वया तव कार्यं पुरा सुखेनैव कृत्वा पश्चात्कार्यं मदीयकम् ॥ ३० । करनेके बाद ही अपना काम करूँगा; इसमें संशय इति हस्ते जलं दत्त्वा यावत्पुत्रो गृहं गतः तावत्सा च मृता तत्र हरस्मरणतत्परा तस्याश्चैव तु यत्कृत्यं तत्सर्वं संविधाय सः मासिकं कर्म कृत्वा तु गमनाय प्रचक्रमे द्वयोः श्रेष्ठतरो यो वै सुवादो नाम विश्रुतः तदस्थीनि समादाय निःसृतस्तीर्थकाम्यया संगृह्य सेवकं कंचित्तेनैव सहितस्तदा आश्वास्य भार्यां पुत्रांश्च मातुः प्रियचिकीर्षया श्राद्धदानादिकं भोज्यं कृत्वा विधिमनुत्तमम् मंगलस्मरणं कृत्वा निर्जगाम गृहाद् द्विजः तद्दिने योजनं गत्वा विंशति ग्रामके शुभे उवासास्तं गते भानौ गृहे विप्रस्य कस्यचित् ॥ चक्रे सन्ध्यादि सत्कर्म स द्विजो विधिपूर्वकम् स्तवादि कृतवांस्तत्र शंभोरद्भुतकर्मणः ॥
सेवकेन तदा युक्तो ब्राह्मणः संस्थितस्तदा ।
यामिनी च गता तत्र मुहूर्तद्वयसंमिता ॥
एतस्मिन्नन्तरे तत्रैकमाश्चर्यमभूत्तदा ।
शृणुतादरतस्तच्च मुनयो वो वदाम्यहम् ॥
| नहीं है I । इसके बाद [ अपनी माताके ] हाथमें जल । । देकर ज्यों ही पुत्र घर गया, तभी वह शिवजीका ध्यान ॥ ३१ करती हुई वहाँ मर गयी ॥ ३०-३१ ॥ । तब उसका जो भी कृत्य था, वह सब भलीभाँति ॥ ३२ करके पुनः सारा मासिक [ पिण्डदानादि ] कार्य करके वह काशी जानेको तैयार हो गया । दोनोंमें ज्येष्ठ पुत्र । जो सुवाद नामसे प्रसिद्ध था, वह उसकी अस्थियोंको ॥ ३३ लेकर तीर्थकी कामनासे निकल पड़ा ॥ ३२-३३ ॥ । श्राद्धदान तथा ब्राह्मणभोजन आदि उत्तम विधि ॥ ३४ सम्पन्नकर अपनी भार्या और पुत्रोंको आश्वासन देकर माताका हित करनेकी इच्छासे किसी सेवकको बुलाकर । उसीके साथ मंगलस्मरण करके वह द्विज घरसे चल ॥ ३५ दिया ॥ ३४-३५ ॥ । उस दिन उसने एक योजन चलकर सूर्यास्त ३६ होनेपर किसी विंशति नामक शुभ ग्राममें किसी ब्राह्मणके घरमें निवास किया ॥ ३६ ॥
। उसके बाद उस द्विजने विधिपूर्वक सन्ध्यादि ३७ सत्कर्म किया और अद्भुत क्रिया - कलापवाले शंकरकी स्तुति आदि की ॥ ३७ ॥
इस प्रकार सेवकके सहित वह ब्राह्मण वहाँ ३८ रुका रहा और दो मुहूर्तभर रात बीत गयी ॥३८ ॥
हे मुनियो! इसी बीच वहाँ जो आश्चर्यमयी घटना घटी, उसे आपलोग आदरपूर्वक सुनिये; मैं ३ ९ । आपलोगोंको बता रहा हूँ ॥ ३ ९ ॥ इति श्रीशिवमहापुराणे चतुर्थ्यां कोटिरुद्रसंहितायां नन्दिकेश्वरमाहात्म्ये ब्राह्मणीमरणवर्णनं नाम पञ्चमोऽध्यायः ॥ ५ ॥
॥ इस प्रकार श्रीशिवमहापुराणके अन्तर्गत चतुर्थ कोटिरुद्रसंहितामें नन्दिकेश्वरमाहात्म्यमें ब्राह्मणीमरणवर्णन नामक पाँचवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ५ ॥
अथ षष्ठोऽध्यायः नर्मदा एवं नन्दिकेश्वरके माहात्म्य - कथनके प्रसंगमें ब्राह्मणीकी स्वर्गप्राप्तिकावर्णन सूत उवाच सूतजी बोले- [ हे ऋषियो! ] वहाँपर आँगनमें गौश्चैकाप्यभवत्तत्र ह्यंगणे बंधिता शुभा । एक उत्तम गाय बँधी थी । रातको जब बाहर गया तदैव ब्राह्मणो रात्रावाजगाम हुआ [ गृहपति ] ब्राह्मण आया, तब हे मुनीश्वरो! बहिर्गतः ॥ १ । गायको बिना दुही हुई आँगनमें स्थित देख करके