शिव महापुराण - २ — पृष्ठ 231–240
शिव महापुराण - २ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 231–240
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अ ० ६ ] कोटिरुद्रसंहिता २१७ स उवाच प्रियां स्वीयां दृष्ट्वा गामंगणे स्थिताम् । खिन्न हो उसे दुहनेकी इच्छासे उसने अपनी पत्नीसे अदुग्धां खेदनिर्विण्णो दोग्धुकामो मुनीश्वराः ॥ २ कहा- हे प्रिये! तुमने अभीतक गाय नहीं दुही? पत्नीसे गौ: प्रिये नैव दुग्धा ते सेत्युक्ता वत्समानयत् । ऐसा कहकर वह बछड़ेको ले आया । इसके बाद हे दोहनार्थं समाहूय स्त्रियं शीघ्रतरं तदा ॥ ३ मुनियो! दुहनेके उद्देश्यसे शीघ्र ही स्त्रीको बुलाकर वत्सं कीले स्वयं बद्धुं यत्नं चैवाकरोत्तदा ब्राह्मणः स गृहस्वामी मुनयो दुग्धलालसः वत्सोऽपि कर्षमाणश्च पादे वै पादपीडनम् चकार ब्राह्मणश्चैव कष्टं प्राप्तश्च सुव्रताः तेन पादप्रहारेण स द्विजः क्रोधमूर्छितः वत्सं च ताडयामास कूपैर्दृढतरं तदा वत्सोऽपि पीडितस्तेन श्रांतश्चैवाभवत्तदा दुग्धा गौर्मोचितो वत्सो न क्रोधेन द्विजन्मना गौर्दोग्धुं च महत्प्रीत्या रोदनं चाकरोत्तदा दृष्ट्वा च रोदनं तस्या वत्सो वाक्यमथाब्रवीत् वत्स उवाच कथं च रुद्यते मातः किं ते दुःखमुपस्थितम् तन्निवेदय मे प्रीत्या तच्छ्रुत्वा गौरवोचत श्रूयतां पुत्र मे दुःखं वक्तुं शक्नोम्यहं न हि दुष्टेन ताडितस्त्वं च तेन दुःखं ममाप्यभूत् सूत उवाच स्वमातुर्वचनं श्रुत्वा स वत्सः प्रत्यबोधयत् प्रत्युवाच स्वजननीं प्रारब्धपरिनिष्ठितः किं कर्त्तव्यं क्व गंतव्यं कर्मबद्धा वयं यतः कृतं चैव यथा पूर्वं भुज्यते च तथाधुना हसता क्रियते कर्म रुदता परिभुज्यते दुःखदाता न कोऽप्यस्ति सुखदाता न कश्चन सुखदुःखे परो दत्त इत्येषा कुमतिर्मता अहं चापि करोम्यत्र मिथ्याज्ञानं तदोच्यते स्वकर्मणा भवेद्दुःखं सुखं तेनैव कर्मणा तस्माच्च पूज्यते कर्म सर्वं कर्मणि संस्थितम् ॥ । दूधकी इच्छावाला वह गृहपति ब्राह्मण स्वयं बछड़ेको ॥ ४ खूंटेमें बाँधनेका प्रयत्न करने लगा॥१–४ ॥ । हे सुव्रतो! ब्राह्मणद्वारा खींचे जानेपर बछड़ेने ॥ ५ उसके पैरमें लात मार दी, जिससे ब्राह्मणको कष्ट हुआ ॥५ ॥
। उस पादप्रहारके कारण क्रोधसे तमतमाये हुए ॥ ६ उस ब्राह्मणने कुहनीसे उस बछड़ेको जोरसे मारा ॥ ६ ॥
। इस प्रकार उसके द्वारा मारे जानेपर बछड़ा भी शान्त ॥ ७ हो गया । उसके बाद उस ब्राह्मणने गायको दुह लिया, किंतु क्रोधके कारण बछड़ेको मुक्त नहीं किया ॥७ ॥
। वह गाय अपने बछड़ेको प्रीतिपूर्वक दूध पिलानेके ॥ ८ लिये महान् रुदन करने लगी; तब उसका रुदन देखकर बछड़ेने यह वाक्य कहा —॥८ ॥
बछड़ा बोला – हे माता! तुम क्यों रो रही हो, तुम्हें । कौन- न - सा दुःख आ पहुँचा; उसे प्रेमपूर्वक मुझे बताओ । | 11 ९ | यह सुनकर गाय बोली - हे पुत्र! मेरा दुःख सुनो; मैं । उसे कह नहीं सकती हूँ । इस दुष्टने तुमको मारा है, ॥ १० इससे मुझे भी [ बहुत ] दुःख हुआ है ॥ ९ -१० ॥ सूतजी बोले- अपनी माताकी बात सुनकर । प्रारब्धसे सन्तुष्ट उस बछड़ेने अपनी माताको समझाते ॥ ११ हुए कहा- ॥ ११ ॥
हे मातः! क्या किया जाय और कहाँ जाया । जाय; क्योंकि हम सभी कर्मके बन्धनमें बँधे हुए हैं, ॥ १२ इसलिये पूर्वमें जैसा कर्म किया गया है, वही इस समय भोगना पड़ रहा है ॥१२ ॥
। प्राणी हँसते हुए तो कर्म करता है और रोते हुए उसका फल भोगता है । कोई किसीको न सुख देनेवाला ॥ १३ है और न ही किसीको दुःख देनेवाला है ॥ १३ ॥
। ' कोई दूसरा सुख और दुःख देनेवाला है ' — यह ॥ १४ दुर्बुद्धि मानी गयी है । ' मैं ही करता हूँ ' यह मिथ्या ज्ञान कहा जाता है । [ प्राणीको ] अपने कर्मोंसे दुःख होता है । और उसी कर्मसे सुख भी होता है, इसलिये कर्मकी पूजा १५ । होती है; सब कुछ कर्ममें ही स्थित है ॥ १४-१५ ॥
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२१८ श्रीशिवमहापुराण [ अ ० ६ त्वं चैवाहं च जननी इमे जीवादयश्च ये । हे माता! तुम, मैं और ये जीव आदि जो भी ते सर्वे कर्मणा बद्धा न शोच्याः कर्हिचित्त्वया ॥१६ हैं — वे सब कर्मसे बँधे हुए हैं, इसलिये तुम किसी प्रकारका सोच मत करो ॥ १६ ॥
सूत उवाच सूतजी बोले — इस प्रकार अपने पुत्रके ज्ञानपूर्ण एवं श्रुत्वा स्वपुत्रस्य वचनं ज्ञानगर्भितम् । वचनको सुनकर पुत्रशोकसे युक्त एवं दुःखित उस पुत्रशोकान्विता दीना सा च गौरब्रवीदिदम् ॥ १७ गायने यह कहा —॥१७ ॥
गौरुवाच वत्स सर्वं विजानामि कर्माधीनाः प्रजा इति तथापि मायया ग्रस्ता दुःखं प्राप्नोम्यहं पुनः रोदनं च कृतं भूरि दुःखशान्तिर्भवेन्न हि इत्येतद्वचनं श्रुत्वा प्रसूं वत्सोऽब्रवीदिदम् ॥ वत्स उवाच यद्येवं च विजानासि पुनश्च रुदनं कुतः । कृत्वा च साध्यते किञ्चित्तस्माद्दुःखं त्यजाधुना सूत उवाच
एवं पुत्रवचः श्रुत्वा तन्माता दुःखसंयुता ।
निःश्वस्याति तदा धेनुर्वत्सं वचनमब्रवीत् ॥
गौरुवाच
मम दुःखं तदा गच्छेद्यदा दुःखं तथाविधम् ।
भवेद्धि ब्राह्मणस्यापि सत्यमेतद्ब्रवीम्यहम् ॥
प्रातश्चैव मया पुत्र श्रृंगाभ्यां हि हनिष्यते ।
हतश्च जीवितं सद्यो यास्यत्यस्य न संशयः ॥
वत्स उवाच
प्रथमं यत्कृतं कर्म तत्फलं भुज्यतेऽधुना ।
अस्याश्च ब्रह्महत्याया मातः किं फलमाप्स्यसे ॥
समाभ्यां पुण्यपापाभ्यां भवेज्जन्म च भारते ।
तयोः क्षये च भोगेन मातर्मुक्तिरवाप्यते ॥
कदापि कर्मणो नाशः कदा भोगः प्रजायते ।
तस्माच्च पुनरेवं त्वं कर्म मा कर्तुमुद्यता ॥
अहं कुतस्ते पुत्रोऽद्य त्वं माता कुत एव च ।
वृथाभिमानः पुत्रत्वे मातृत्वे च विचार्यताम् ॥
गाय बोली — हे वत्स! मैं सब जानती हूँ कि । सभी प्राणी कर्मके अधीन हैं, किंतु मोहसे ग्रस्त होनेके ॥ १८ कारण मैं बारंबार दुःख प्राप्त कर रही हूँ । मैंने [ तुम्हारी ममतावश ] बहुत रुदन भी किया, किंतु तब । भी दुःख शान्त नहीं हो रहा है । तब यह बात सुनकर १ ९ बछड़ेने मातासे यह कहा— ॥ १८-१९ ॥ बछड़ा बोला – यदि तुम ऐसा जानती हो, तो फिर रोना कैसा! कुछ भी करके उसका भोग करना ॥ २० ही पड़ता है, अत: अब दुःख छोड़ो ॥२० ॥
सूतजी बोले – पुत्रकी यह बात सुनकर उसकी माता बहुत दुःखित हुई । इसके बाद लम्बी साँस २१ लेकर गायने बछड़ेसे यह वचन कहा- ॥ २१ ॥
गाय बोली- हे पुत्र! मेरा दुःख तो तभी दूर होगा, जब वैसा ही दुःख इस ब्राह्मणको भी होगा; २२ यह मैं सत्य कह रही हूँ ॥ २२ ॥
हे पुत्र! मैं प्रात: काल उसे अवश्य ही दोनों २३ सींगोंसे मारूँगी और तब घायल होनेपर इसके प्राण अवश्य छूट जायँगे; इसमें संशय नहीं है ॥ २३ ॥
बछड़ा बोला — हे मातः! तुमने पूर्वजन्ममें जो कर्म किया है, उसका फल इस समय भोग रही हो और अब २४ इस ब्रह्महत्याका फल किस प्रकार भोगोगी? ॥ २४ ॥
हे माता! पुण्य और पापके समान होनेपर २५ भारतमें जन्म प्राप्त होता है और भोगके द्वारा उन दोनोंके नष्ट होनेपर मुक्ति प्राप्त होती है ॥ २५ ॥
कभी - कभी कर्मके द्वारा कर्मका नाश हो २६ जाता है तो कभी वह कर्म भोगका भी कारण बनता है । इसलिये तुम पुनः इस प्रकारका कर्म करनेके लिये तत्पर मत होओ । मैं कहाँसे आज तुम्हारा पुत्र हूँ और कहाँसे तुम मेरी माता हो; अतः पुत्रत्व और मातृत्वका अभिमान व्यर्थ है- तुम इसपर २७ | विचार करो ॥ २६-२७ ॥
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अ ० ६ ] क्व माता क्व पिता विद्धि क्व स्वामी क्व कलत्रकम् न कोऽपि कस्य चास्तीह सर्वेऽपि स्वकृतंभुजः एवं ज्ञात्वा त्वया मातर्दुःखं त्याज्यं सुयत्नतः सुभगाचरणं कार्यं परलोकसुखेप्सया गौरुवाच एवं जानाम्यहं पुत्र माया मां न जहात्यसौ त्वद्दुःखेन समं दुःखं तस्मै दास्ये तदेव हि पुनश्च ब्रह्महत्याया नाशो यत्र भवेदिह । तत्स्थलं च मया दृष्टं हत्या मे हि गमिष्यति सूत उवाच इत्येतद्वचनं श्रुत्वा स्वमातुर्गोर्द्विजोत्तमाः मौनत्वं स्वीकृतं तत्र वत्सेनोक्तं न किञ्चन तयोस्तदद्भुतं वृत्तं श्रुत्वा पान्थो द्विजस्तदा । हृदा विचारयामास विस्मितो हि मुनीश्वराः इदमत्यद्भुतं वृत्तं दृष्ट्वा प्रातर्मया खलु । गन्तव्यं पुनरेवातो गन्तव्यं तत्स्थलं पुनः सूत उवाच विचार्येति हृदा विप्रः स द्विजाः सेवकेन च । सुष्वाप तत्र जननीभक्तः परमविस्मितः प्रातःकाले तदा जाते गृहस्वामी समुत्थितः । कोटिरुद्रसंहिता २१ ९ । तुम विचार करो कि कौन किसकी माता ॥ २८ और कौन किसका पिता है? कौन किसका स्वामी और कौन किसकी स्त्री है; यहाँपर कोई भी किसीका नहीं है, सभी अपने किये हुए कर्मका फल भोगते हैं ॥ २८ ॥
। हे मातः! ऐसा विचारकर आपको धैर्यसे दुःखका ॥ २ ९ त्याग करना चाहिये और परलोकमें सुखकी इच्छासे सद्धर्मका आचरण करना चाहिये ॥ २ ९ ॥ गाय बोली — हे पुत्र! [ यद्यपि ] मैं यह जानती । हूँ, किंतु यह मोह मुझे नहीं छोड़ता । उसने तुम्हें जिस ॥ ३० प्रकारका दुःख दिया है, मैं वैसा ही दुःख उसे भी दूँगी । उसके बाद मैं वहाँ जाऊँगी, जहाँ ब्रह्महत्याका नाश होता है, वह स्थान मैंने देखा है, जिससे मेरी ॥ ३१ हत्या दूर हो जायगी॥३०-३१ ॥ सूतजी बोले- हे श्रेष्ठ ब्राह्मणो! अपनी माता । उस गायकी बात सुनकर बछड़ा चुप हो गया और ॥ ३२ [ इसके आगे ] कुछ भी नहीं कह सका ॥३२ ॥
हे मुनीश्वरो! तब उन दोनोंकी यह अद्भुत ॥ ३३ बात सुनकर वह तीर्थयात्री ब्राह्मण विस्मित होकर मनमें विचार करने लगा कि प्रातःकाल इस अद्भुत घटनाको देखकर ही मुझे जाना चाहिये; फिर मुझे ॥ ३४ उस [ ब्रह्महत्याविनाशक ] स्थानपर अवश्य चलना चाहिये ॥ ३३-३४ ॥ सूतजी बोले – हे ब्राह्मणो! वह मातृभक्त ब्राह्मण मनमें ऐसा निश्चयकर सेवकसहित अति ॥ ३५ विस्मित हो रात्रिमें सो गया ॥३५ ॥
इसके बाद प्रात: काल होनेपर गृहपति ब्राह्मण बोधयामास तं पान्थं वचनं चेदमब्रवीत् ॥ ३६ उठा और उस पथिकको जगाने लगा तथा उससे यह द्विज उवाच
स्वपिषि त्वं किमर्थं हि प्रातःकालो भवत्यलम् ।
स्वयात्रां कुरु तं देशं गमनेच्छा च यत्र ह ॥
तेनोक्तं श्रूयतां ब्रह्मन् शरीरे सेवकस्य मे ।
वर्तते हि व्यथा स्थित्वा मुहूर्तं गम्यते ततः ॥
वचन कहने लगा —॥३६ ॥
ब्राह्मण बोला— [ हे पथिक! ] तुम अभीतक क्यों सो रहे हो? प्रातः काल हो गया है, अतः जहाँ ३७ जानेकी इच्छा हो, उस स्थानके लिये अपनी यात्रा आरम्भ करो । तब उसने कहा- हे ब्रह्मन्! सुनिये, मेरे सेवकके शरीरमें वेदना है, अतः मुहूर्तभर रुककर हम ३८ | चले जायँगे ॥ ३७-३८ ॥
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२२० सूत उवाच
इत्येवं च मिषं कृत्वा सुष्वाप पुरुषस्तदा ।
तद्वृत्तमखिलं ज्ञातुमद्भुतं विस्मयावहम् ॥
दोहनस्य तदा काले ब्राह्मणः स्वसुतं प्रति उवाच गंतुकामश्च कार्यार्थं कुत्रचिच्च सः पितोवाच
मया तु गम्यते पुत्र कार्यार्थं कुत्रचित्पुनः ।
धेनुर्दोह्या त्वया वत्स सावधानादियं निजा ॥
सूत उवाच
इत्युक्त्वा ब्राह्मणवरः स जगाम च कुत्रचित् ।
पुत्रः समुत्थितस्तत्र वत्सं च मुक्तवांस्तदा ॥
माता च तस्य दोहार्थमाजगाम स्वयं तदा ।
द्विजपुत्रस्तदा वत्सं खिन्नं कीलेन ताडितम् ॥
बंधनार्थं हि गोः पार्श्वमनयद्दुग्धलालसः ।
पुनर्गौश्च तदा क्रुद्धा श्रृंगेनाताडयच्च तम् ॥
पपात मूर्च्छा संप्राप्य सोऽपि मर्मणि ताडितः ।
लोकाश्च मिलितास्तत्र गवा बालो विहिंसितः ॥
जलं जलं वदन्तस्ते पित्राद्या यत्र संस्थिताः ।
यत्नश्च क्रियते यावत्तावद् बालो मृतस्तदा ॥
मृते च बालके तत्र हाहाकारो महानभूत् ।
तन्माता दुःखिता ह्यासीद् रुरोद च पुनः पुनः ॥
किं करोमि क्व गच्छामि को मे दुःखं व्यपोहयेत् ।
रुदित्वेति तदा गां च ताडयित्वा व्यमोचयत् ॥
श्वेतवर्णा तदा सा गौर्द्रुतं श्यामा व्यदृश्यत ।
अहो च दृश्यतां लोकाश्चुक्रुशुश्च परस्परम् ॥
ब्राह्मणश्च तदा पान्थो दृष्ट्वाश्चर्यं विनिर्गतः ।
यत्र गौश्च गता तत्र तामनु ब्राह्मणो गतः ॥
श्रीशिवमहापुराण [ अ ० ६ सूतजी बोले- इस प्रकार बहाना बनाकर | उस अद्भुत तथा आश्चर्यजनक सम्पूर्ण घटना ३ ९ विषयमें जाननेके लिये वह व्यक्ति पुनः सो गया । तदनन्तर गाय दुहनेके समय कार्यवश कहीं जानेकी । इच्छावाले उस [ गृहपति ] ब्राह्मणने अपने पुत्रसे ॥ ४० कहा— ॥ ३ ९ -४० ॥ पिता बोला- हे पुत्र! मैं कार्यवश फिर कहीं अन्यत्र जा रहा हूँ; तुम सावधानीपूर्वक अपनी इस ४१ गायको दुह लेना ॥ ४१ ॥
सूतजी बोले – [ हे महर्षियो! ] ऐसा कहकर वह ब्राह्मणश्रेष्ठ कहीं चला गया । फिर पुत्र उठा और ४२ उसने बछड़ेको खोला ॥ ४२ ॥
उसी समय उसकी माता गाय दुहनेके लिये ४३ स्वयं आयी । तब ब्राह्मणपुत्र कोहनीसे मारे जानेके कारण दुखी बछड़ेको दूधकी इच्छासे बाँधनेके लिये जब गायके पास ले गया, तब गाय क्रोधमें भरकर उसे ४४ सींगसे मारने लगी ॥ ४३-४४ ॥ तब मर्मस्थानमें चोट खाया हुआ वह ४५ मूर्च्छित होकर गिर पड़ा । उसी समय सब लोग एकत्रित हो गये । ‘ गायने बालकको मार डाला, जल लाओ, जल लाओ ' इस प्रकार कहते हुए वे जहाँ उसके पिता आदि थे, वहाँ पहुँचे । जबतक उसे ४६ बचानेका प्रयत्न किया गया, इतनेमें वह बालक मर गया ॥ ४५-४६ ॥ बालकके मर जानेपर वहाँ हाहाकार मच गया; ४७ उसकी माता दुखी हो उठी और बारंबार रोने लगी ॥४७ ॥
4 ' अब मैं क्या करूँ! कहाँ जाऊँ! कौन मेरे ४८ दुःखको दूर करेगा ' – इस प्रकार विलाप करके उसने गायको मारकर उसका बन्धन खोल दिया ॥४८ ॥
श्वेतवर्णकी वह गाय [ ब्रह्महत्याके पापसे ] ४ ९ श्यामवर्ण हो गयी । सभी लोग आपसमें जोर - जोरसे कहने लगे — देखिये, यह कैसा आश्चर्य है! ॥ ४ ९ ॥ तब यात्री ब्राह्मण यह आश्चर्य देखकर चल
दिया और वह गाय जहाँ गयी, वहाँ उसीके पीछे-५० । पीछे वह ब्राह्मण भी गया ॥५० ॥
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अ ० ६ ] ऊर्ध्वपुच्छं तदा कृत्वा शीघ्रं गौर्नर्मदां प्रति आगत्य नन्दिकस्यास्य समीपे नर्मदाजले संनिमज्य त्रिवारं तु श्वेतत्वं च गता हि सा यथागतं गता सा च ब्राह्मणो विस्मयं गतः अहो धन्यतमं तीर्थं ब्रह्महत्यानिवारणम् स्वयं ममज्ज तत्रासौ ब्राह्मणः सेवकस्तथा निमज्य हि गतौ तौ च प्रशंसन्तौ नदीं च ताम् मार्गे च मिलिता काचित्सुन्दरी भूषणान्विता तयोक्तं तं च भोः पांथ कुतो यासि सुविस्मितः सत्यं ब्रूहि च्छलं त्यक्त्वा विप्रवर्य ममाग्रतः सूत उवाच एवं वचस्तदा श्रुत्वा द्विजेनोक्तं यथातथम् । पुनश्चायं द्विजस्तत्र स्त्रियोक्तः स्थीयतां त्वया तयोक्तं च समाकर्ण्य स्थितः स ब्राह्मणस्ततः कोटिरुद्रसंहिता २२१ । वह गाय अपनी पूँछ ऊपर उठाये शीघ्र ही ॥ ५१ नर्मदा नदीकी ओर आकर इन नन्दिकेश्वरके निकट । नर्मदा नदीके जलमें तीन बार अवगाहन करके ॥ ५२ पुनः श्वेतवर्ण हो गयी । फिर वह जैसे आयी थी, वैसे चली गयी; इससे ब्राह्मण आश्चर्यचकित हो गया ॥ वह बोला- अहो! ब्रह्महत्याका नाश करनेवाला ॥ ५३ यह तीर्थ परम धन्य है । तब स्वयं उस ब्राह्मणने । सेवकके साथ वहीं स्नान किया । स्नान करके उस ॥ ५४ नदीकी प्रशंसा करते हुए वे दोनों चल दिये; इसके बाद मार्गमें आभूषणसे भूषित कोई सुन्दरी स्त्री उन्हें मिली ॥५१–५४ ॥ । उसने पूछा — हे पथिक! आप चकित होकर ॥ ५५ कहाँ जा रहे हैं? हे विप्रवर! छल त्यागकर आप मेरे सामने सत्य - सत्य कहिये ॥ ५५ ॥
सूतजी बोले- उस स्त्रीकी बात सुनकर ब्राह्मणने सारी घटना यथार्थ रूपमें बता दी; फिर ॥ ५६ स्त्रीने उस ब्राह्मणसे कहा — तुम यहाँ रुको । तब उसकी बात सुनकर वह ब्राह्मण रुक गया और विनम्र । प्रत्युवाच विनीतात्मा कथ्यते किं वदेति च ॥५७ होकर बोला- तुम क्या कहती हो? मुझे यह सा चाह पुनरेवात्र त्वया दृष्टं स्थलं च यत् तत्राधुना क्षिपास्थीनि मातुः किं गम्यतेऽन्यतः तव माता पान्थवर्य साक्षाद्दिव्यमयं वरम् देहं धृत्वा द्रुतं साक्षाच्छंभोर्यास्यति सद्गतिम् वैशाखे चैव संप्राप्ते सप्तम्याञ्च दिने शुभे । सिते पक्षे सदा गंगा ह्यायाति द्विजसत्तम अद्यैव सप्तमी या सा गंगाऽहं यामि तत्र वै इत्युक्त्वान्तर्दधे देवी सा गंगा मुनिसत्तमाः निवृत्तश्च द्विजः सोऽपि मात्रस्थ्यर्द्धं स्ववस्त्रतः । क्षिपेद्यावत्तत्र तीर्थे तावच्चित्रमभूत्तदा बताओ ॥ ५६-५७ ॥ । तब वह पुनः बोली– ' तुमने जिस स्थलको ॥ ५८ अभी देखा है, वहीं अपनी माताकी अस्थियोंको विसर्जित कर दो । अन्यत्र क्यों जाते हो? हे पथिकश्रेष्ठ! । [ ऐसा करनेसे ] तुम्हारी माता साक्षात् दिव्य तथा ॥ ५ ९ उत्तम शरीर धारणकर शीघ्र ही शिवकी [ कृपासे ] सद्गतिको प्राप्त कर लेंगी । हे ब्राह्मणश्रेष्ठ! वैशाखमासमें ॥ ६० शुक्लपक्षकी सप्तमीके शुभ अवसरमें यहाँ सर्वदा गंगाजी आती हैं । आज ही वह सप्तमी तिथि है और । वह गंगा मैं ही हूँ तथा वहीं जा भी रही हूँ ' हे ॥ ६१ मुनीश्वरो! यह कहकर [ स्त्रीरूपधारी ] वे गंगाजी अन्तर्धान हो गयीं ॥ ५८–६१ ॥ इसके बाद उस ब्राह्मणने भी लौटकर माताकी आधी ही अस्थियोंको अपने वस्त्रसे ज्यों ही उस तीर्थमें विसर्जित किया, तभी एक विचित्र दृश्य ॥ ६२ उपस्थित हो गया ॥६२ ॥
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२२२ दिव्यदेहत्वमापन्ना स्वमाता च व्यदृश्यत धन्योऽसि कृतकृत्योऽसि पवित्रं च कुलं त्वया ॥
धनं धान्यं तथा चायुर्वंशो वै वर्धतां तव ।
इत्याशिषं मुहुर्दत्त्वा स्वपुत्राय दिवं गता ॥
तत्र भुक्त्वा सुखं भूरि चिरकालं महोत्तमम् ।
शंकरस्य प्रसादेन गता सा ह्युत्तमां गतिम् ॥
ब्राह्मणश्च सुतस्तस्याः क्षिप्त्वास्थीनि पुनस्ततः ।
प्रसन्नमानसोऽभूत्स शुद्धात्मा स्वगृहं गतः ॥
श्रीशिवमहापुराण [ अ ० ७ । उसने दिव्य शरीर धारण की हुई अपनी माताको ६३ देखा; माताने उससे कहा– [ हे पुत्र! ] तुम धन्य हो, | कृतकृत्य हो; तुमने अपने कुलको पवित्र कर दिया तुम्हारे धन, धान्य, आयु एवं वंशकी वृद्धि हो - बार-, ६४ बार अपने पुत्रको इस प्रकारका आशीर्वाद देकर वे स्वर्ग चली गयीं ॥ ६३-६४ ॥ वहाँपर बहुत समयतक अत्युत्तम परम सुख ६५ भोगकर शिवकृपासे उन्होंने श्रेष्ठ गति प्राप्त की ॥ ६५ ॥
इसके बाद उसका पुत्र वह ब्राह्मण भी अस्थियाँ विसर्जितकर प्रसन्न मनवाला हो गया एवं शुद्धचित्त ६६ । हो अपने घर चला गया ॥६६ ॥
इति श्रीशिवमहापुराणे चतुर्थ्यां कोटिरुद्रसंहितायां नन्दिकेश्वरलिंगमाहात्म्यवर्णने ब्राह्मणीस्वर्गतिवर्णनं नाम षष्ठोऽध्यायः ॥ ६ ॥
॥ इस प्रकार श्रीशिवमहापुराणके अन्तर्गत चतुर्थ कोटिरुद्रसंहिताके नन्दिकेश्वरलिंगमाहात्म्यवर्णनमें ब्राह्मणीस्वर्गतिवर्णन नामक छठवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ६ ॥
अथ सप्तमोऽध्यायः नन्दिकेश्वरलिंगका माहात्म्य - वर्णन ऋषय ऊचुः
कथं गंगा समायाता वैशाखे सप्तमीदिने ।
नर्मदायां विशेषेण सूतैतद्वर्णय प्रभो ॥
ईश्वरश्च कथं जातो नन्दिकेशो हि नामतः ।
वृत्तं तदपि सुप्रीत्या कथय त्वं महामते ॥
सूत उवाच
साधु पृष्टमृषिश्रेष्ठा नन्दिकेशाश्रितं वचः ।
तदहं कथयाम्यद्य श्रवणात्पुण्यवर्धनम् ॥
ब्राह्मणी ऋषिका नाम्नी कस्यचिच्च द्विजन्मनः ।
सुता विवाहिता कस्मैचिद् द्विजाय विधानतः ॥
पूर्वकर्मप्रभावेण पत्नी सा हि द्विजन्मनः ।
सुव्रतापि च विप्रेन्द्रा बालवैधव्यमागता ॥
अथ सा द्विजपत्नी हि ब्रह्मचर्यव्रतान्विता ।
पार्थिवार्चनपूर्वं हि तपस्तेपे सुदारुणम् ॥
ऋषिगण बोले- हे सूत! हे प्रभो! वैशाख-मासके शुक्लपक्षकी सप्तमीके दिन नर्मदानदीमें १ गंगाजी कैसे आयी थीं; इसे विशेषरूपसे बताइये । हे महामते! उस स्थानपर शिवजी नन्दिकेश नामसे कैसे प्रसिद्ध हुए; आप इस वृत्तान्तको भी अत्यन्त २ प्रीतिपूर्वक कहिये ॥ १-२ ॥ सूतजी बोले- हे ऋषिश्रेष्ठो! आपलोगोंने नन्दिकेशसे सम्बन्धित यह बहुत ही उत्तम बात पूछी ३ है; अब मैं उसका वर्णन करता हूँ, इसके सुननेमात्रसे पुण्यकी वृद्धि होती है । [ पूर्व समयमें ] किसी ब्राह्मणकी ऋषिका नामक एक कन्या थी; उसने अपनी उस ४ कन्याका विवाह विधानपूर्वक किसी ब्राह्मणसे कर दिया ॥ ३-४ ॥ हे ब्राह्मणश्रेष्ठो! पूर्वजन्मके कर्मके प्रभावसे ५ वह ब्राह्मणपत्नी पातिव्रत्यधर्ममें परायण होनेपर भी बाल्यावस्थामें ही विधवा हो गयी ॥ ५ ॥
तब वह ब्राह्मणपत्नी ब्रह्मचर्यव्रतके पालनमें तत्पर ६ । हो, पार्थिवपूजनपूर्वक कठोर तप करने लगी ॥ ६ ॥
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अ ० ७ ] तस्मिन्नवसरे दुष्टो मूढनामासुरो बली ययौ तत्र महामायी कामबाणेन ताडितः तपन्तीं तां समालोक्य सुन्दरीमतिकामिनीम् तया भोगं ययाचे स नानालोभं प्रदर्शयन् ॥ अथ सा सुव्रता नारी शिवध्यानपरायणा तस्मिन्दृष्टिं दधौ नैव कामदृष्ट्या मुनीश्वराः न मानितवती तं च ब्राह्मणी सा तपोरता अतीव हि तपोनिष्ठासीच्छिवध्यानमाश्रिता अथ मूढः स दैत्येन्द्रः तया तन्व्या तिरस्कृतः चुक्रोध विकटं तस्यै पश्चाद्रूपमदर्शयत् अथ प्रोवाच दुष्टात्मा दुर्वचो भयकारकम् त्रासयामास बहुशस्तां च पत्नीं द्विजन्मनः तदा सा भयसंत्रस्ता बहुवारं शिवेति च बभाषे स्नेहतस्तन्वी द्विजपत्नी शिवाश्रया विह्वलातीव सा नारी शिवनामप्रभाषिणी जगाम शरणं शम्भोः स्वधर्मावनहेतवे शरणागतरक्षार्थं कर्तुं सद्वृत्तमाहितम् आनन्दार्थं हि तस्यास्तु शिव आविर्बभूव ह अथ तं मूढनामानं दैत्येन्द्रं कामविह्वलम् । चकार भस्मसात्सद्यः शंकरो भक्तवत्सलः ततश्च परमेशानो कृपादृष्ट्या विलोक्य ताम् वरं ब्रूहीति चोवाच भक्तरक्षणदक्षधी: श्रुत्वा महेशवचनं सा साध्वी द्विजकामिनी ददर्श शांकरं रूपमानन्दजनकं शुभम् ॥ ततः प्रणम्य तं शंभुं परमेशं सुखावहम् तुष्टाव साञ्जलिः साध्वी नतस्कन्धा शुभाशया ऋषिकोवाच देवदेव महादेव शरणागतवत्सल कोटिरुद्रसंहिता २२३ । उसी समय महामायावी ' मूढ ' नामक बलवान् ॥ ७ दुष्ट असुर कामबाणसे पीड़ित होकर उस स्थानपर । गया और तपस्या करती हुई उस परम सुन्दरी स्त्रीको ८ देखकर वह अनेक प्रकारका प्रलोभन देते हुए उसके साथ सहवासकी याचना करने लगा ॥ ७-८ ॥ । हे मुनीश्वरो! उस समय शिवध्यानमें परायण ॥ ९ । उस सुव्रता स्त्रीने कामभावनासे उसकी ओर देखातक । नहीं । वह अत्यन्त तपोनिष्ठ तथा शिवध्यानमें मग्न थी । अतः तपस्यामें संलग्न उस ब्राह्मणीने उसका ॥ १० सम्मान भी नहीं किया॥९ -१० ॥ । तब उस स्त्रीके द्वारा तिरस्कृत हुए उस मूर्ख ॥ ११ दैत्यने उसपर अत्यन्त क्रोध किया और उसे अपना विकट रूप दिखाया ॥११ ॥
। इसके बाद वह दुष्टात्मा [ राक्षस ] उस ब्राह्मणीको ॥ १२ भयकारक दुर्वचन कहने लगा तथा उसे अनेक । प्रकारसे डराने लगा । तब शिवपरायणा वह कृशांगी ॥१३ द्विजपत्नी भयभीत होकर प्रेमपूर्वक बारंबार ' शिव-शिव ' – ऐसा उच्चारण करने लगी ॥ १२-१३ ॥ । अत्यन्त व्याकुल एवं शिवनामका जप करती ॥ १४ हुई वह स्त्री अपने धर्मकी रक्षाके लिये जब शिवजीकी शरणमें चली गयी, तब शरणागतकी रक्षा, सदाचारकी । स्थापना तथा उस ब्राह्मणीके आनन्दके लिये सदाशिव ॥ १५ वहीं प्रकट हो गये ॥ १४-१५ ॥ तत्पश्चात् भक्तवत्सल शिवजीने कामपीड़ित उस ॥ १६ मूढ नामक दैत्यको उसी समय भस्म कर दिया ॥ १६ ॥
। इसके बाद भक्तोंकी रक्षा करनेमें दक्ष बुद्धिवाले ॥ १७ शिवजीने दयादृष्टिसे उसकी ओर देखकर ' वर माँगो'– इस प्रकार कहा ॥ १७ ॥
। वह पतिव्रता ब्राह्मणी शिवजीके इस वचनको १८ सुनकर उनके मनोहर तथा आनन्दप्रद रूपकी ओर देखने लगी । तदनन्तर उत्तम विचारोंवाली वह पतिव्रता । [ ब्राह्मणी ] सुख देनेवाले महेश्वर शिवको प्रणाम ॥ १ ९ करके सिर झुकाकर तथा हाथ जोड़कर उनकी स्तुति करने लगी ॥ १८-१९ ॥ ऋषिका बोली- हे देवदेव! हे महादेव! हे । शरणागतवत्सल! आप दीनोंके बन्धु, सबके ईश्वर दीनबन्धुस्त्वमीशानो भक्तरक्षाकरः सदा ॥ २० तथा सर्वदा भक्तोंकी रक्षा करनेवाले हैं ॥२० ॥
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२२४ श्रीशिवमहापुराण [ अ ० ७ त्वया मे रक्षितो धर्मो मूढनाम्नोऽसुरादिह । [ हे प्रभो! ] आपने इस मूढ नामक दैत्यसे मेरे यदयं निहतो दुष्टो जगद्रक्षा कृता त्वया ॥ २१ धर्मकी रक्षा की और आपने जो इसका वध किया है । । उससे आपने [ सम्पूर्ण ] जगत्की भी रक्षा की है ॥ २१ स्वपादयोः परां भक्तिं देहि मे ह्यनपायिनीम् । अब आप मुझे अपने चरणोंमें सदा स्थिर ॥ अयमेव वरो नाथ किमन्यदधिकं ह्यतः ॥ २२ रहनेवाली श्रेष्ठ भक्ति प्रदान कीजिये । हे नाथ! यही
अन्यदाकर्णय विभो प्रार्थनां मे महेश्वर ।
लोकानामुपकारार्थमिह त्वं संस्थितो भव ॥२३
सूत उवाच
इति स्तुत्वा महादेवमृषिका सा शुभव्रता ।
तूष्णीमासाथ गिरिशः प्रोवाच करुणाकरः ॥ २४
गिरिश उवाच
ऋषिके सुचरित्रा त्वं मम भक्ता विशेषतः ।
दत्ता वराश्च ते सर्वे तुभ्यं ये ये हि याचिताः ॥ २५
एतस्मिन्नन्तरे तत्र हरिब्रह्मादयः सुराः ।
शिवाविर्भावमाज्ञाय ययुर्हर्षसमन्विताः ॥ २६
शिवं प्रणम्य सुप्रीत्या समानर्चुश्च तेऽखिलाः ।
तुष्टुवुर्नतका विप्राः करौ बद्ध्वा सुचेतसः ॥ २७
एतस्मिन्समये गंगा साध्वीं तां स्वर्धुनी जगौ ।
ऋषिकां सुप्रसन्नात्मा प्रशंसन्ती च तद्विधिम् ॥ २८
गंगोवाच
ममार्थं चैव वैशाखे मासि देयं त्वया वचः ।
स्थित्यर्थं दिनमेकं मे सामीप्यं कार्यमेव हि ॥ २ ९
सूत उवाच
गंगावचनमाकर्ण्य सा साध्वी प्राह सुव्रता ।
तथास्त्विति वचः प्रीत्या लोकानां हितहेतवे ॥ ३०
आनन्दार्थं शिवस्तस्याः सुप्रसन्नश्च पार्थिवे ।
तस्मिँल्लिंगे लयं यातः पूर्णांशेन तया हरः ॥ ३१
देवाः सर्वे सुप्रसन्नाः प्रशंसन्ति शिवं च ताम् ।
स्वं स्वं धाम ययुर्विष्णुर्ब्रह्माद्या अपि स्वर्णदी ॥ ३२ ।
| मेरा वर है; इससे अधिक दूसरा वर क्या हो सकता | है! हे विभो! हे महेश्वर! मेरी एक और प्रार्थना आप सुनें - आप लोककल्याणके निमित्त यहीं पर निवास कीजिये ॥ २२-२३ ॥ सूतजी बोले- इस प्रकार महादेवकी स्तुतिकर उत्तम व्रतवाली वह ऋषिका चुप हो गयी; तब दयालु शिवजी कहने लगे- ॥ २४ ॥
गिरिश बोले- हे ऋषिके! तुम उत्तम चरित्रवाली हो और तुम मुझमें विशेष रूपसे भक्ति रखती हो, इसलिये तुमने जो - जो वर माँगा, उन सभी वरोंको मैंने तुम्हें प्रदान किया ॥ २५ ॥
इसी अवसरपर शिवजीको प्रकट हुआ जानकर ब्रह्मा, विष्णु आदि देवता हर्षयुक्त होकर वहाँ पहुँच गये । हे विप्रो! उन सभीने अत्यन्त प्रीतिपूर्वक शिवजीको प्रणामकर उनका पूजन किया और सिर झुकाकर हाथ जोड़कर प्रसन्न चित्तसे उनकी स्तुति की ॥ २६-२७ ॥ इसी समय स्वर्नदी गंगाजीने [ वहाँ आकर ] साध्वी ऋषिकाके भाग्यकी प्रशंसा करते हुए प्रसन्नचित्त होकर उससे कहा— ॥२८ ॥
गंगाजी बोलीं– [ हे साध्वि! ] तुम वैशाख महीनेमें एक दिन मेरे कल्याणके लिये अपने समीपमें मुझे रहनेका वचन दो, जिससे मैं एक दिन तुम्हारा सामीप्य प्राप्त करूँ ॥ २ ९ ॥ सूतजी बोले — गंगाजीका वचन सुनकर श्रेष्ठ व्रतवाली उस साध्वीने लोकहितके लिये प्रेमपूर्वक यह वचन कहा — ' ऐसा ही हो'॥३० ॥
शिवजी भी उसके आनन्दके लिये उसके द्वारा निर्मित उस पार्थिव लिंगमें प्रसन्न होकर अपने पूर्णांशसे प्रविष्ट हो गये ॥३१ ॥
इसके बाद ब्रह्मा, विष्णु आदि सभी देवता तथा गंगाजी प्रसन्न हो शिवजीकी तथा उस [ ब्राह्मणी ] -की प्रशंसा करने लगे और अपने - अपने स्थानको चले गये ।
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अ ० ८ ] तद्दिनात्पावनं तीर्थमासीदीदृशमुत्तमम् । नन्दिकेशः शिवः ख्यातः सर्वपापविनाशनः गंगापि प्रतिवर्षं तद्दिने याति शुभेच्छया क्षालनार्थं स्वपापस्य यद् गृहीतं नृणां द्विजाः तत्र स्नातो नरः सम्यङ् नंदिकेशं समर्च्य च ब्रह्महत्यादिभिः पापैर्मुच्यते ह्यखिलैरपि कोटिरुद्रसंहिता २२५ उसी दिनसे इस प्रकारका यह परम पावन तीर्थ हो गया ॥ ३३ और शिवजी भी वहाँ सभी पापोंका विनाश करनेवाले नन्दिकेश नामसे प्रसिद्ध हो गये ॥ ३२-३३ ॥ । हे द्विजो! तभीसे गंगाजी भी सबके कल्याणकी ॥ ३४ इच्छासे तथा मनुष्योंसे ग्रहण किया हुआ अपना पाप धोनेके लिये प्रत्येक वर्ष इस दिन यहाँ आती हैं ॥ ३४ ॥
मनुष्य वहाँ स्नानकर और भलीभाँति । नन्दिकेश्वरकी पूजाकर ब्रह्महत्या आदि सभी पापोंसे ॥ ३५ । छूट जाता है ॥३५ ॥
इति श्रीशिवमहापुराणे चतुर्थ्यां कोटिरुद्रसंहितायां नन्दिकेश्वरशिवलिंगमाहात्म्यवर्णनं नाम सप्तमोऽध्यायः ॥ ७ ॥
॥ इस प्रकार श्रीशिवमहापुराणके अन्तर्गत चतुर्थ कोटिरुद्रसंहितामें नन्दिकेश्वरशिवलिंग-माहात्म्यवर्णन नामक सातवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ७ ॥
अथाष्टमोऽध्यायः पश्चिम दिशाके शिवलिंगोंके वर्णन सूत उवाच
द्विजाः शृणुत सद्भक्त्या शिवलिंगानि तानि च ।
पश्चिमायां दिशायां वै यानि ख्यातानि भूतले ॥
कपिलायां नगर्यां तु कालरामेश्वराभिधे ।
शिवलिंगे महादिव्ये दर्शनात्पापहारके ॥
पश्चिमे सागरे चैव महासिद्धेश्वरः स्मृतः ।
धर्मार्थकामदश्चैव तथा मोक्षप्रदोऽपि हि ॥
पश्चिमाम्बुधितीरस्थं गोकर्णं क्षेत्रमुत्तमम् ।
ब्रह्महत्यादिपापघ्नं सर्वकामफलप्रदम् ॥
गोकर्णे शिवलिंगानि विद्यन्ते कोटिकोटिशः ।
असंख्यातानि तीर्थानि तिष्ठन्ति च पदे पदे ॥
बहुनात्र किमुक्तेन गोकर्णस्थानि सर्वशः ।
शिवप्रत्यक्षलिंगानि तीर्थान्यम्भांसि सर्वशः ॥
गोकर्णे शिवलिंगानां तीर्थानामपि सर्वशः ।
वर्ण्यते महिमा तात पुराणेषु महर्षिभिः ॥
कृते युगे स हि श्वेतस्त्रेतायां सोऽतिलोहितः ।
द्वापरे पीतवर्णश्च कलौ श्यामो भविष्यति ॥
- क्रममें महाबलेश्वरलिंगका माहात्म्य - कथन सूतजी बोले- हे ब्राह्मणो! अब पश्चिम दिशामें जो - जो लिंग भूतलपर प्रसिद्ध हैं, उन शिवलिंगोंको १ सद्भक्तिपूर्वक सुनिये ॥ १ ॥
कपिला नगरीमें कालेश्वर एवं रामेश्वर नामक दो महादिव्य लिंग हैं, जो दर्शनमात्रसे पापोंको नष्ट २ करनेवाले हैं । पश्चिम सागरके तटपर महासिद्धेश्वर लिंग बताया गया है, जो धर्म, अर्थ, काम एवं ३ मोक्षतक प्रदान करनेवाला है॥२-३ ॥ पश्चिम समुद्रके तटपर गोकर्ण नामक उत्तम ४ क्षेत्र है, जो ब्रह्महत्या आदि पापोंको नष्ट करनेवाला और सम्पूर्ण कामनाओंका फल प्रदान करनेवाला है । गोकर्ण क्षेत्रमें करोड़ों शिवलिंग हैं और पद - पदपर असंख्य तीर्थ हैं । इस विषयमें अधिक क्या कहें, गोकर्णक्षेत्रमें स्थित सभी लिंग शिवस्वरूप हैं एवं ६ वहाँका समस्त जल तीर्थस्वरूप है॥४–६ ॥ हे तात! महर्षियोंके द्वारा गोकर्णमें स्थित ७ सभी लिंगों एवं तीर्थोंकी महिमाका वर्णन पुराणोंमें किया गया है । [ गोकर्णक्षेत्रमें स्थित ] महाबलेश्वर शिवलिंग कृतयुगमें श्वेतवर्ण, त्रेतामें अतीव लोहितवर्ण, द्वापरमें पीतवर्ण तथा कलियुगमें श्यामवर्णका हो ८ | जाता है ॥ ७-८ ॥ 2224 Shivmahapuran_IInd Part_Section_9_1_Front
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२२६ श्रीशिवमहापुराण [ अ ० ८ आक्रान्तसप्तपातालकुहरोऽपि महाबलः । सातों पातालोंको आक्रान्त करनेवाला वह प्राप्ते कलियुगे घोरे मृदुतामुपयास्यति ॥ महाबलेश्वरलिंग घोर कलियुग प्राप्त होनेपर कोमल हो जायगा । महापाप करनेवाले लोग भी यहाँ महापातकिनश्चात्र समभ्यर्च्य महाबलम् । गोकर्णक्षेत्रमें [ विराजमान ] महाबलेश्वर लिंगकी शिवलिंगं च गोकर्णे प्रयाताः शांकरं पदम् ॥ १० पूजाकर शिवपदको प्राप्त हुए हैं॥९ -१० ॥ गोकर्णे तत्र मुनयो गत्वा पुण्यर्क्षवासरे । हे मुनिगण! जो लोग गोकर्णक्षेत्रमें जाकर येऽर्चयन्ति च तं भक्त्या ते रुद्राः स्युर्न संशयः ॥ ११ उत्तम नक्षत्रयुक्त दिनमें भक्तिपूर्वक उनकी पूजा करते हैं, वे [ साक्षात् ] शिवस्वरूप ही हैं; इसमें सन्देह नहीं है ॥११ ॥
यदा कदाचिद्गोकर्णे यो वा को वापि मानवः । जिस किसी भी समयमें जो कोई भी मनुष्य पूजयेच्छिवलिंगं तत्स गच्छेद् ब्रह्मणः पदम् ॥ १२ गोकर्णक्षेत्रमें स्थित उस शिवलिंगका पूजन करता है,
ब्रह्मविष्ण्वादिदेवानां शंकरो हितकाम्यया ।
महाबलाभिधानेन देवः संनिहितः सदा ॥ १३
घोरेण तपसा लब्धं रावणाख्येन रक्षसा ।
तल्लिंगं स्थापयामास गोकर्णे गणनायकः ॥ १४
विष्णुर्ब्रह्मा महेन्द्रश्च विश्वेदेवा मरुद्गणाः ।
आदित्या वसवो दस्त्रौ शशांकश्च सतारकः ॥ १५
एते विमानगतयो देवाश्च सह पार्षदैः ।
पूर्वद्वारं निषेवन्ते तस्य वै प्रीतिकारणात् ॥ १६
यमो मृत्युः स्वयं साक्षाच्चित्रगुप्तश्च पावकः ।
पितृभिः सह रुद्रैश्च दक्षिणद्वारमाश्रितः ॥ १७
वरुणः सरितां नाथो गंगादिसरितां गणैः ।
महाबलं च सेवन्ते पश्चिमद्वारमाश्रिताः ॥ १८
तथा वायुः कुबेरश्च देवेशी भद्रकालिका ।
मातृभिश्चण्डिकाद्याभिरुत्तरद्वारमाश्रिताः ॥ १ ९
सर्वे देवाः सगन्धर्वाः पितरः सिद्धचारणाः ।
विद्याधराः किंपुरुषाः किन्नरा गुह्यकाः खगाः ॥ २०
नानापिशाचा वेताला दैतेयाश्च महाबलाः ।
नागाः शेषादयः सर्वे सिद्धाश्च मुनयोऽखिलाः ॥ २१
प्रणुवन्ति च तं देवं प्रणमन्ति महाबलम् ।
लभन्त ईप्सितान्कामान् रमन्ते च यथासुखम् ॥ २२
वह ब्रह्मपदको प्राप्त कर लेता है । वहाँपर शिवजी ब्रह्मा, विष्णु आदि देवताओंका हित करनेकी इच्छासे महाबल नामसे सदा निवास करते हैं ॥ १२-१३ ॥ रावण नामक राक्षसने कठोर तपके द्वारा उस लिंगको प्राप्तकर गोकर्णमें स्थापित किया था । गोकर्णमें गणेश, विष्णु, ब्रह्मा, महेन्द्र, विश्वेदेव, मरुद्गण, सभी आदित्य, सभी वसु, दोनों अश्विनीकुमार, नक्षत्रोंके सहित चन्द्रमा - विमानसे चलनेवाले ये सभी देवता अपने - अपने पार्षदोंके साथ उन [ महाबलेश्वर शिव ] -को प्रसन्न करनेके लिये पूर्वद्वारपर विराजमान रहते हैं॥१४–१६ ॥ यम, स्वयं मृत्यु, साक्षात् चित्रगुप्त तथा अग्निदेव, सभी पितरों एवं रुद्रोंके साथ दक्षिण द्वारपर स्थित रहते हैं । नदियोंके स्वामी वरुण गंगा आदि नदियोंके साथ पश्चिम द्वारपर स्थित होकर महाबलकी सेवा करते हैं ॥ १७-१८ ॥ वायु, कुबेर, देवेश्वरी भद्रकाली, चण्डिका आदि देवता तथा देवियाँ मातृकाओंके साथ उत्तर द्वारपर स्थित रहती हैं ॥ १ ९ ॥ सभी देवता, गन्धर्व, पितर, सिद्ध, चारण, विद्याधर, किंपुरुष, किन्नर, गुह्यक, खग, नानाविध पिशाच, वेताल, महाबली दैत्य, शेष आदि नाग, सभी सिद्ध एवं मुनिगण उन महाबलेश्वर देवका स्तवन करते हैं और उनसे इच्छित मनोरथोंको प्राप्तकर सुखपूर्वक रमण करते हैं ॥ २०-२२ ॥ 2224 Shivmahapuran_IInd Part_Section_9_1_Back