शिव महापुराण - २ — पृष्ठ 241–250
शिव महापुराण - २ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 241–250
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अ ० ९ ] कोटिरुद्रसंहिता २२७
बहुभिस्तत्र सुतपस्तप्तं सम्पूज्य तं विभुम् ।
लब्धा हि परमा सिद्धिरिहामुत्रापि सौख्यदा ॥ २३
गोकर्णे शिवलिंगं तु मोक्षद्वार उदाहृतः ।
महाबलाभिधानोऽसौ पूजितः संस्तुतो द्विजाः ॥ २४
माघासितचतुर्दश्यां महाबलसमर्चनम् ।
विमुक्तिदं विशेषेण सर्वेषां पापिनामपि ॥ २५
अस्यां शिवतिथौ सर्वे महोत्सवदिदृक्षवः ।
आयान्ति सर्वदेशेभ्यश्चातुर्वर्ण्यमहाजनाः ॥ २६
स्त्रियो वृद्धाश्च बालाश्च चतुराश्रमवासिनः ।
दृष्ट्वा तत्रैत्य देवेशं लेभिरे कृतकृत्यताम् ॥ २७
महाबलप्रभावात्ते तच्च लिंगं शिवस्य तु ।
सम्पूज्यैकाथ चाण्डाली शिवलोकं गता द्रुतम् ॥ २८
वहाँ बहुतसे लोगोंने घोर तप किया और उन प्रभुकी पूजाकर इस लोक तथा परलोकमें भी सुख देनेवाली सिद्धि प्राप्त की है । हे द्विजो! गोकर्णक्षेत्रमें स्थित यह महाबलेश्वर नामक शिवलिंग भलीभाँति पूजा तथा स्तवन किये जानेपर [ साक्षात् ] मोक्षद्वार ही है — ऐसा कहा गया है॥२३-२४ ॥ माघमासमें कृष्णपक्षकी चतुर्दशीके दिन महाबलेश्वरका पूजन विशेषरूपसे मुक्ति प्रदान करता है, इस दिन तो पूजा करनेपर पापियोंका भी समुद्धार हो जाता है ॥ २५ ॥
इस शिवचतुर्दशीमें महोत्सवको देखनेकी इच्छावाले चारों वर्णोंके मनुष्य सभी देशोंसे यहाँ आते हैं । [ ब्रह्मचारी आदि ] चारों आश्रमोंके लोग, स्त्री, वृद्ध तथा बालक वहाँ आकर देवेश्वरका दर्शनकर महाबलेश्वरके प्रभावसे कृतकृत्य हो जाते हैं । भगवान् शिवके उस महाबलेश्वर नामक लिंगका पूजन करके एक चाण्डाली भी तत्क्षण शिवलोकको प्राप्त हो गयी | थी ॥ २६–२८ ॥ इति श्रीशिवमहापुराणे चतुर्थ्यां कोटिरुद्रसंहितायां महाबलमाहात्म्यवर्णनं नामाष्टमोऽध्यायः ॥ ८ ॥
॥ इस प्रकार श्रीशिवमहापुराणके अन्तर्गत चतुर्थ कोटिरुद्रसंहितामें महाबलमाहात्म्यवर्णन नामक आठवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ८ ॥
अथ नवमोऽध्यायः संयोगवश हुए शिवपूजनसे ऋषय ऊचुः
सूत सूत महाभाग धन्यस्त्वं शैवसत्तमः ।
चाण्डाली का समाख्याता तत्कथां कथय प्रभो ॥
सूत उवाच
द्विजाः शृणुत सद्भक्त्या तां कथां परमाद्भुताम् ।
शिवप्रभावसंमिश्रां शृण्वतां भक्तिवर्धिनीम् ॥
चांडाली सा पूर्वभवेऽभवद् ब्राह्मणकन्यका ।
सौमिनी नाम चन्द्रास्या सर्वलक्षणसंयुता ॥
अथ सा समये कन्या युवतिः सौमिनी द्विजाः ।
पित्रा दत्ता च कस्मैचिद्विधिना द्विजसूनवे ॥
2224 Shivmahapuran_IInd Part_Section_9_2_Front चाण्डालीकी सद्गतिका वर्णन ऋषिगण बोले- हे सूतजी! हे महाभाग! आप परम शैव हैं, अतः आप धन्य हैं, हे विभो! वह १ चाण्डाली कौन थी, उसकी कथा कहिये ॥१ ॥
सूतजी बोले- हे ब्राह्मणो! सुननेवालोंकी भक्तिको बढ़ानेवाली तथा शिवके प्रभावसे मिश्रित २ उस अत्यन्त अद्भुत कथाको आपलोग भक्तिपूर्वक सुनिये ॥२ ॥
वह चाण्डाली पूर्वजन्ममें सभी लक्षणोंसे समन्वित ३ तथा चन्द्रमाके समान मुखवाली सौमिनी नामक ब्राह्मणकन्या थी । हे द्विजो! सौमिनीके युवती हो जानेपर उसके पिताने किसी ब्राह्मणपुत्रसे विधिपूर्वक ४ । उसका विवाह सम्पन्न कर दिया॥३-४ ॥
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२२८ श्रीशिवमहापुराण [ अ ० ९
सा भर्तारमनुप्राप्य किंचित्कालं शुभव्रता ।
रेमे तेन द्विजश्रेष्ठा नवयौवनशालिनी ॥
अथ तस्याः पतिर्विप्रस्तरुणः सुरुजार्दितः ।
सौमिन्याः कालयोगात्तु पञ्चत्वमगमद् द्विजाः ॥
मृते भर्तरि सा नारी दुःखितातिविषण्णधीः ।
किंचित्कालं शुभाचारा सुशीलोवास सद्मनि ॥
ततः सा मन्मथाविष्टहृदया विधवापि च ।
युवावस्थाविशेषेण बभूव व्यभिचारिणी ॥
तज्ज्ञात्वा गोत्रिणस्तस्या दुष्कर्म कुलदूषणम् ।
समेतास्तत्यजुर्दूरं नीत्वा तां सकचग्रहाम् ॥
कश्चिच्छूद्रवरस्तां वै विचरन्तीं निजेच्छया । हे ब्राह्मणश्रेष्ठो! तदनन्तर नवीन यौवनशालिनी ५ वह उत्तम व्रतवाली सौमिनी पतिको प्राप्त करके उसके साथ सुखपूर्वक रहने लगी ॥५ ॥
हे द्विजो! [ कुछ काल बीतनेके पश्चात् ] उस ६ सौमिनीका नवयुवक ब्राह्मण पति रोगग्रस्त हो गया और कालयोगसे मृत्युको प्राप्त हो गया ॥ ६ ॥
पतिके मर जानेपर सुशील तथा उत्तम आचारवाली ७ | उस स्त्रीने दुःखित तथा व्यथितचित्त होकर कुछ काल अपने घरमें निवास किया । उसके अनन्तर विधवा होते हुए भी युवती होनेके कारण कामसे आविष्ट मनवाली ८ वह व्यभिचारिणी हो गयी ॥ ७-८ ॥ तब कुलको कलंकित करनेवाले उसके इस ९ कुकर्मको जानकर उसके कुटुम्बियोंने परस्पर मिलकर उसके बालोंको खींचते हुए उसे दूर. ले जाकर छोड़ दिया॥९॥
कोई शूद्र उसे वनमें स्वच्छन्द विचरण करती दृष्ट्वा वने स्त्रियं चक्रे निनाय स्वगृहं ततः ॥ १० हुई देख अपने घर ले आया और उसने उसे अपनी पत्नी बना लिया ॥ १० ॥
अथ सा पिशिताहारा नित्यमापीतवारुणी । अब वह प्रतिदिन मांसका भोजन करती, मदिरा अजीजनत्सुतां तेन शूद्रेण सुरतप्रिया ॥ ११ पीती और व्यभिचारनिरत रहती थी । इस प्रकार उस कदाचिद्भर्तरि शूद्रके सम्बन्धसे उसने एक कन्याको जन्म दिया ॥ ११ ॥
क्वापि याते पीतसुराथ सा । किसी समय पतिके कहीं चले जानेपर उस इयेष पिशिताहारं सौमिनी व्यभिचारिणी ॥ १२ व्यभिचारिणी सौमिनीने मद्यपान किया और वह
ततो मेषेषु बद्धेषु गोभिः सह बहिर्व्रजे ।
निशामुखे तमोऽन्धे हि खड्गमादाय सा ययौ ॥ १३
अविमृश्य मदावेशान्मेषबुद्ध्यामिषप्रिया ।
एकं जघान गोवत्सं क्रोशन्तमतिदुर्भगा ॥ १४
हतं तं गृहमानीय ज्ञात्वा गोवत्समङ्गना ।
भीता शिव शिवेत्याह केनचित्पुण्यकर्मणा ॥ १५
सा मुहूर्तं शिवं ध्यात्वामिषभोजनलालसा ।
छित्त्वा तमेव गोवत्सं चकाराहारमीप्सितम्॥ १६
मांसके आहारकी इच्छा करने लगी ॥ १२ ॥
इसके बाद रात्रिके समय घोर अन्धकारमें तलवार लेकर वह घरके बाहर गोष्ठमें गायोंके साथ बँधे हुए मेषोंके बीच गयी । उस समय मांससे प्रेम रखनेवाली उस दुर्भगाने मद्यके नशेके कारण बिना विचार किये चिल्लाते हुए एक बछड़ेको मेष समझकर मार डाला ॥ १३-१४ ॥ मरे हुए उस पशुको घर लाकर बादमें उसे बछड़ा जानकर वह स्त्री भयभीत हो गयी और किसी पुण्य कर्मसे [ पश्चात्तापपूर्वक ] ‘ शिव-शिव ' - ऐसा उच्चारण करने लगी । क्षणभर शिवजीका ध्यान करके मांसके आहारकी इच्छावाली उसने उस बछड़ेको ही काटकर अभिलषित भोजन कर लिया ॥ १५-१६ ॥ 2224 Shivmahapuran_IInd Part_Section_9_2_Back
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अ ० ९ ] कोटिरुद्रसंहिता २२ ९
एवं बहुतिथे काले गते सा सौमिनी द्विजाः ।
कालस्य वशमापन्ना जगाम यमसंक्षयम् ॥
यमोऽपि धर्ममालोक्य तस्याः कर्म च पौर्विकम् ।
निवर्त्य निरयावासाच्चक्रे चाण्डालजातिकाम् ॥
साथ भ्रष्टा यमपुराच्चाण्डालीगर्भमाश्रिता ।
ततो बभूव जन्मान्धा प्रशांतांगारमेचका ॥
जन्मान्धा साथ बाल्येऽपि विध्वस्तपितृमातृका ।
ऊढा न केनचिद्दुष्टा महाकुष्ठरुजार्दिता ॥
ततः क्षुधार्दिता दीना यष्टिपाणिर्गतेक्षणा ।
चाण्डालोच्छिष्टपिंडेन जठराग्निमतर्पयत् ॥
एवं कृच्छ्रेण महता नीत्वा स्वविपुलं वयः ।
जरया ग्रस्तसर्वाङ्गी दुःखमाप दुरत्ययम् ॥
कदाचित्साथ चांडाली गोकर्णं तं महाजनान् ।
आयास्यन्त्यां शिवतिथौ गच्छतो बुबुधेऽध्वगान् ॥
अथासावपि चांडाली वसनाशनतृष्णया ।
महाजनान् याचयितुं सञ्चचार शनैः शनैः ॥
गत्वा तत्राथ चांडाली प्रार्थयन्ती महाजनान् ।
यत्र तत्र चचारासौ दीनवाक्प्रसृताञ्जलिः ॥
एवमभ्यर्थयन्त्यास्तु चांडाल्याः प्रसृताञ्जलौ ।
एकः पुण्यतमः पान्थः प्राक्षिपद्विल्वमंजरीम् ॥
तामंजलौ निपतितां सा विमृश्य पुनः पुनः ।
अभक्ष्यमिति मत्वाथ दूरे प्राक्षिपदातुरा ॥
तस्याः कराद्विनिर्मुक्ता रात्रौ सा बिल्वमंजरी ।
पपात कस्यचिद्दिष्ट्या शिवलिंगस्य मस्तके ॥
सैवं शिवचतुर्दश्यां रात्रौ पान्थजनान् मुहुः ।
याचमानापि यत्किंचिन्न लेभे दैवयोगतः ॥
एवं शिवचतुर्दश्या व्रतं जातं च निर्मलम् । हे द्विजो! इस प्रकार बहुत - सा समय बीतनेके १७ पश्चात् वह सौमिनी कालके वशीभूत हो गयी और यमलोक चली गयी । यमराजने भी उसके पूर्वजन्मके कर्म तथा धर्मका निरीक्षणकर उसे नरकसे निकालकर १८ चाण्डाल जातिवाली बना दिया ॥ १७-१८ ॥ यमराजपुरीसे लौटकर वह [ सौमिनी ] चाण्डालीके १ ९ गर्भसे उत्पन्न हुई । वह जन्मसे अन्धी एवं कोयलेके समान काली थी । जन्मसे अन्धी, बाल्यावस्थामें ही माता - पितासे रहित और महाकुष्ठ रोगसे ग्रस्त उस २० दुष्टासे किसीने विवाह भी नहीं किया ॥ १ ९ -२० ॥ उसके बाद वह अन्धी चाण्डाली भूखसे २१ पीड़ित एवं दीन हो लाठी हाथमें लेकर जहाँ - तहाँ डोलती और चाण्डालोंके जूठे अन्नसे अपने पेटकी ज्वाला शान्त करती थी । इस प्रकार महान् कष्टसे अपनी अवस्थाका बहुत भाग बिता लेनेके पश्चात् २२ वृद्धावस्थासे ग्रस्त शरीरवाली वह घोर दुःख पाने लगी ॥ २१-२२ ॥ किसी समय उस चाण्डालीको ज्ञात हुआ कि २३ आगे आनेवाली शिवतिथिमें बड़े - बड़े लोग उस गोकर्णक्षेत्रकी ओर जा रहे हैं ॥२३ ॥
वह चाण्डाली भी वस्त्र एवं भोजनके लोभसे २४ महाजनोंसे माँगनेके लिये धीरे - धीरे [ गोकर्णकी ओर ] चल पड़ी । वहाँ जाकर वह हाथ फैलाकर दीनवचन बोलती हुई और महाजनोंसे प्रार्थना करती हुई इधर-२५ उधर घूमने लगी ॥ २४-२५ ॥ इस प्रकार याचना करती हुई उस २६ चाण्डालीकी फैली हुई अंजलिमें एक पुण्यात्मा यात्रीने बेलकी मंजरी डाल दी । बार - बार विचार करके ‘ यह खानेयोग्य नहीं है ' – ऐसा समझकर २७ भूखसे व्याकुल उसने अंजलिमें पड़ी हुई उस मंजरीको दूर फेंक दिया ॥ २६-२७ ॥ उसके हाथसे छूटी हुई वह बिल्वमंजरी २८ शिवरात्रिमें भाग्यवश किसी शिवलिंगके मस्तकपर जा गिरी ॥ २८ ॥
इस प्रकार चतुर्दशीके दिन यात्रियोंसे बार - बार २ ९ याचना करनेपर भी दैवयोगसे उसे कुछ भी प्राप्त नहीं हुआ । तब इस तरहसे अनजानेमें उसका शिवचतुर्दशीका
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२३० श्रीशिवमहापुराण [ अ ० १० अज्ञानतो जागरणं परमानन्ददायकम् ॥ ३० | उत्तम व्रत और अत्यन्त आनन्ददायक जागरण भी हो
ततः प्रभाते सा नारी शोकेन महतावृता ।
शनैर्निववृते दीना स्वदेशायैव केवलम् ॥ ३१
श्रांता चिरोपवासेन निपतंती पदे पदे ।
अतीत्य तावतीं भूमिं निपपात विचेतना ॥ ३२
अथ सा शंभुकृपया जगाम परमं पदम् ।
आरुह्य सुविमानं च नीतं शिवगणैर्द्रुतम् ॥ ३३
आदौ यदेषा शिवनाम नारी प्रमादत वाप्यसती जगाद । तेनेह भूयः सुकृतेन विप्रा महाबलस्थानमवाप दिव्यम् ॥ ३४
श्रीगोकर्णे शिवतिथावुपोष्य शिवमस्तके ।
कृत्वा जागरणं सा हि चक्रे बिल्वार्चनं निशि ॥ ३५
अकामतः कृतस्यास्य पुण्यस्यैव च तत्फलम् ।
भुनक्त्यद्यापि सा चैव महाबलप्रसादतः ॥ ३६
एवंविधं महालिंगं शंकरस्य महाबलम् ।
सर्वपापहरं सद्यः परमानन्ददायकम् ॥ ३७
एवं वः कथितं विप्रा माहात्म्यं परमं मया ।
महाबलाभिधानस्य शिवलिंगवरस्य हि ॥ ३८
अथान्यदपि वक्ष्यामि माहात्म्यं तस्य चाद्भुतम् ।
श्रुतमात्रेण येनाशु शिवे भक्तिः प्रजायते ॥ ३ ९ ।
इति श्रीशिवमहापुराणे चतुर्थ्यां कोटिरुद्रसंहितायां गया । उसके पश्चात् प्रभात होनेपर वह स्त्रा महान् | शोकसे युक्त होकर धीरे - धीरे अपने घरके लिये चल पड़ी ॥ २ ९ –३१ ॥ बहुत समयके उपवाससे थक चुकी ह पग - पगपर गिरती हुई उसी ( गोकर्णक्षेत्रकी ) भूमिपर चलते - चलते प्राणहीन होकर गिर पड़ी । उसने शिवजीकी कृपासे परम पद प्राप्त किया; शिव - गण उसे विमानपर बैठाकर शीघ्र ही ले गये ॥ ३२-३३ ॥ हे ब्राह्मणो! पूर्वजन्ममें इस व्यभिचारिणी स्त्रीने जो अज्ञानमें शिवजीके नामका उच्चारण किया था, उसी पुण्यसे उसने दूसरे जन्ममें महाबलेश्वरके दिव्य स्थानको प्राप्त किया ॥ ३४ ॥
उसने गोकर्णमें शिवतिथिको उपवास करके शिवके मस्तकपर बिल्वपत्र अर्पितकर पूजन किया तथा रात्रिमें जागरण किया । निष्कामभावसे किये गये इस पुण्यका ही फल है कि वह आज भी महाबलेश्वरकी कृपासे सुख भोग रही है ॥ ३५-३६ ॥ [ हे ब्राह्मणो! ] शिवजीका इस प्रकारका महाबलेश्वर नामक महालिंग शीघ्र ही सभी पापोंको नष्ट करनेवाला तथा परमानन्द प्रदान करनेवाला है ॥३७ ॥
हे ब्राह्मणो! इस प्रकार मैंने महाबलेश्वर नामक उत्तम शिवलिंगके परम माहात्म्यका वर्णन आपलोगोंसे किया । अब मैं उसके अन्य अद्भुत माहात्म्यको भी कह रहा हूँ, जिसके सुननेमात्रसे शीघ्र ही शिवजीके प्रति भक्ति उत्पन्न होती है ॥ ३८-३९ ॥ चाण्डालीसद्गतिवर्णनं नाम नवमोऽध्यायः॥९ ॥
॥ इस प्रकार श्रीशिवमहापुराणके अन्तर्गत चतुर्थ कोटिरुद्रसंहितामें चाण्डालीसद्गतिवर्णन नामक नौवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ९ ॥
अथ दशमोऽध्यायः महाबलेश्वर शिवलिंगके माहात्म्य - वर्णन - प्रसंगमें राजा मित्रसहकी कथा सूत उवाच सूतजी बोले - [ हे महर्षियो! ] समृद्धिसम्पन्न श्रीमतीक्ष्वाकुवंशे हि राजा परमधार्मिकः । इक्ष्वाकुवंशमें परम धार्मिक तथा सभी धनुषधारियोंमें आसीन्मित्रसहो नाम श्रेष्ठः सर्वधनुष्मताम् ॥ श्रेष्ठ मित्रसह नामक राजा था ॥ १ ॥
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अ ० १० ] कोटिरुद्रसंहिता २३१
तस्य राज्ञः सुधर्मिष्ठा मदयन्ती प्रिया शुभा ।
दमयन्ती नलस्येव बभूव विदिता सती ॥
स एकदा हि मृगयास्नेही मित्रसहो नृपः ।
महद्बलेन संयुक्तो जगाम गहनं वनम् ॥
विहरंस्तत्र स नृपः कमठाह्वं निशाचरम् ।
निजघान महादुष्टं साधुपीडाकरं खलम् ॥
अथ तस्यानुजः पापी जयेयं छद्मनैव तम् ।
मत्वा जगाम नृपतेरन्तिकं छद्मकारकः ॥
तं विनम्राकृतिं दृष्ट्वा भृत्यतां कर्तुमागतम् ।
चक्रे महानसाध्यक्षमज्ञानात्स महीपतिः ॥
अथ तस्मिन्वने राजा कियत्कालं विहृत्य सः ।
निवृत्तो मृगयां हित्वा स्वपुरीमाययौ मुदा ॥
पितुः क्षयाहे सम्प्राप्ते निमंत्र्य स्वगुरुं नृपः ।
वसिष्ठं गृहमानिन्ये भोजयामास भक्तितः ॥
रक्षसा सूदरूपेण संमिश्रितनरामिषम् ।
शाकामिषं पुरः क्षिप्तं दृष्ट्वा गुरुरथाब्रवीत् ॥
गुरुरुवाच
धिक् त्वां नरामिषं राजंस्त्वयैतच्छद्मकारिणा ।
खलेनोपहृतं मह्यं ततो रक्षो भविष्यसि ॥
रक्षःकृतं च विज्ञाय तदैवं स गुरुस्तदा ।
पुनर्विमृश्य तं शापं चकार द्वादशाब्दिकम् ॥
स राजानुचितं शापं विज्ञाय क्रोधमूर्च्छितः ।
जलांजलिं समादाय गुरुं शप्तुं समुद्यतः ॥
तदा च तत्प्रिया साध्वी मदयन्ती सुधर्मिणी ।
पतित्वा पादयोस्तस्य शापं तं हि न्यवारयत् ॥
ततो निवृत्तशापस्तु तस्या वचनगौरवात् ।
तत्याज पादयोरंभः पादौ कल्मषतां गतौ ॥
उस राजाकी मदयन्ती नामक धर्मनिष्ठ तथा २ कल्याणमयी पत्नी थी, जो कि राजा नलकी प्रसिद्ध गुणोंवाली साध्वी दमयन्तीके समान सतीत्वसम्पन्न थी ॥२ ॥
आखेटमें रुचि रखनेवाला वह राजा मित्रसह एक ३ बार विशाल सेनाको साथ लेकर घने वनमें गया ॥ ३ ॥
वहाँ घूमते हुए उस राजाने साधुओंको दुःख ४ देनेवाले महादुष्ट तथा नीच कमठ नामक राक्षसको मार डाला । तब उस निशाचरका पापी छोटा भाई ' मैं इस राजाको छलसे जीत लूँगा ' – ऐसा निश्चय करके ५ कपटरूप धारणकर राजाके पास गया ॥ ४-५ ॥ उसे विनम्र आकृतिवाला तथा सेवा करनेके ६ लिये आया हुआ देखकर उस राजाने बिना सोचे-समझे ही उसे रसोईका अध्यक्ष बना दिया ॥६ ॥
उसके अनन्तर कुछ समयतक उस वनमें विहार ७ करके वह राजा शिकारसे निवृत्त हो उस वनको छोड़कर आनन्दपूर्वक अपने नगरको लौट आया ॥७ ॥
उसके बाद राजाने पिताका श्राद्धदिन आनेपर ८ अपने गुरु वसिष्ठजीको आमन्त्रितकर उन्हें घर बुलाया और भक्तिपूर्वक भोजन कराया ॥८ ॥
रसोइयेका रूप धारण करनेवाले उस राक्षसने ९ वसिष्ठजीके सामने मनुष्यके मांससे मिश्रित शाकामिष परोसा; तब गुरु इसे देखकर कहने लगे - ॥९ ॥
गुरुजी बोले - हे राजन्! तुम्हें धिक्कार है, जो कि कपटी तथा दुष्ट तुमने मुझे मनुष्यका मांस १० परोस दिया; अत: तुम राक्षस हो जाओगे । पुनः इसे उस राक्षसका कृत्य जानकर उन गुरुने विचार करके उस ११ शापकी अवधि बारह वर्षपर्यन्त कर दी ॥ १०-११ ॥ तब वह राजा [ गुरुके द्वारा बिना सोचे - समझे १२ दिये गये ] इस शापको अनुचित जानकर क्रोधसे व्याकुल हो गया और अंजलिमें जल लेकर गुरुको शाप देनेको उद्यत हुआ । तब उसकी धर्मशीला १३ पतिव्रता स्त्री मदयन्तीने उसके चरणोंमें गिरकर उसे गुरुको शाप देनेसे मना किया ॥ १२-१३ ॥ तब राजा अपनी पत्नीकी बातका आदर करके शाप देनेसे रुक गया और उसने जलको अपने चरणोंपर १४ गिरा दिया, जिससे उसके चरण काले पड़ गये ॥ १४ ॥
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२३२ श्रीशिवमहापुराण [ अ ० १० ततः प्रभृति राजा भूत्स लोकेऽस्मिन्मुनीश्वराः । हे मुनीश्वरो! उसी समयसे वह राजा उस कल्मषांघ्रिरिति ख्यातः प्रभावात्तज्जलस्य हि ॥ १५ / जलके प्रभावसे इस लोकमें कल्माषपाद नामसे राजा मित्रसहः शापाद् गुरोर्ऋषिवरस्य हि बभूव राक्षसो घोरो हिंसको वनगोचरः स बिभ्रद्राक्षसं रूपं कालान्तकयमोपमम् चखाद विविधाञ्जंतून् मानुषादीन्वनेचरः स कदाचिद्वने क्वापि रममाणौ किशोरकौ अपश्यदन्तकाकारो नवोढौ मुनिदम्पती राक्षसः स नराहारः किशोरं मुनिनन्दनम् जग्धुं जग्राह शापार्त्तो व्याघ्रो मृगशिशुं यथा ॥
कक्षे गृहीतं भर्तारं दृष्ट्वा भीता च तत्प्रिया ।
सा चक्रे प्रार्थनां तस्मै वदती करुणं वचः ॥
प्रार्थ्यमानोऽपि बहुशः पुरुषादः स निर्घृणः ।
चखाद शिर उत्कृत्य विप्रसूनोर्दुराशयः ॥
अथ साध्वी च सा दीना विलप्य भृशदुःखिता ।
आहृत्य भर्तुरस्थीनि चितां चक्रे किलोल्बणाम् ॥
भर्तारमनुगच्छन्ती संविशंती हुताशनम् ।
राजानं राक्षसाकारं सा शशाप द्विजाङ्गना ॥
अद्यप्रभृति नारीषु यदा त्वं संगतो भवेः ।
तदा मृतिस्तवेत्युक्त्वा विवेश ज्वलनं सती ॥
सोऽपि राजा गुरोः शापमनुभूय कृतावधिम् ।
पुनः स्वरूपमास्थाय स्वगृहं मुदितो ययौ ॥
ज्ञात्वा विप्रसतीशापं मदयन्ती रतिप्रियम् ।
प्रसिद्ध हुआ ॥ १५ ॥
। तदनन्तर ऋषिश्रेष्ठ गुरुके शापसे वह राजा मित्रसह ॥ १६ वनमें विचरण करनेवाला भयानक हिंसक राक्षस हो गया । कालान्तक यमके समान राक्षसरूप धारणकर वह । राजा वनमें घूमता हुआ अनेक प्रकारके जन्तुओं एवं ॥ १७ मनुष्योंका भक्षण करने लगा ॥ १६-१७ ॥ । यमराजके समान रूपवाले उस राक्षसने किसी ॥ १८ समय वनमें विहार करते हुए किन्हीं नवविवाहित किशोर मुनिदम्पतीको देखा । तब मनुष्यका आहार । करनेवाले उस शापग्रस्त राक्षसने किशोर मुनिपुत्रको १ ९ खानेके लिये इस प्रकार पकड़ लिया, जिस प्रकार व्याघ्र मृगशावकको पकड़ लेता है ॥ १८-१९ ॥ इसके बाद राक्षसद्वारा काँखमें दबाये गये अपने २० पतिको देखकर उसकी पत्नी भयभीत होकर करुण वचन बोलती हुई उससे प्रार्थना करने लगी ॥ २० ॥
किंतु उसके अनेक बार प्रार्थना करनेपर भी २१ नरभक्षी, निर्दयी तथा दूषित अन्तःकरणवाला वह [ राक्षस ] ब्राह्मणपुत्रका सिर नोचकर खा गया ॥ २१ ॥
तब अत्यन्त दुःखित उस दीन साध्वी स्त्रीने २२ विलापकर पतिकी अस्थियाँ एकत्रितकर विशाल चिताका निर्माण किया ॥२२ ॥
उसके बाद पतिका अनुगमन करनेवाली उस २३ ब्राह्मण - पत्नीने अग्निमें प्रवेश करते समय राक्षसरूपधारी राजाको शाप दिया कि ' आजसे यदि तुम किसी स्त्रीसे संगम करोगे, तो उसी क्षण तुम्हारी मृत्यु हो २४ जायगी ' – ऐसा कहकर वह पतिव्रता अग्निमें प्रविष्ट हो गयी ॥ २३-२४ ॥ वह राजा भी निर्धारित अवधितक गुरुके शापका २५ अनुभव करके पुनः अपना [ वास्तविक ] रूप धारणकर प्रसन्न होकर अपने घर चला गया ॥ २५ ॥
ब्राह्मणीके शापको जानकर वैधव्यसे अत्यन्त पतिं निवारयामास वैधव्यादतिबिभ्यती ॥ २६ डरती हुई मदयन्तीने रतिके लिये उत्सुक अपने पतिको अनपत्यो विनिर्विण्णो राज्यभोगेषु रोका ॥ २६ ॥
पार्थिवः । तब सन्तानविहीन वह राजा राज्यभोगोंसे उदासीन विसृज्य सकलां लक्ष्मीं वनमेव जगाम ह ॥ २७ | होकर सम्पूर्ण राज्यको छोड़कर वनमें ही चला गया ॥ २७ ॥।
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अ ० १० ] कोटिरुद्रसंहिता २३३
स्वपृष्ठतः समायान्तीं ब्रह्महत्यां सुदुःखदाम् ।
ददर्श विकटाकारां तर्जयन्तीं मुहुर्मुहुः ॥ २८
तस्या निर्भद्रमन्विच्छन् राजा निर्विण्णमानसः ।
बकार नानोपायान्स जपव्रतमखादिकान्॥ २ ९
नानोपायैर्यदा राज्ञस्तीर्थस्नानादिभिर्द्विजाः ।
न निवृत्ता ब्रह्महत्या मिथिलां स ययौ तदा ॥ ३०
बाह्योद्यानगतस्तस्याश्चिन्तया परयार्दितः ।
ददर्श मुनिमायान्तं गौतमं पार्थिवश्च सः ॥ ३१
अभिसृत्य स राजेन्द्रो गौतमं विमलाशयम् ।
तद्दर्शनाप्तकिञ्चित्कः प्रणनाम मुहुर्मुहुः ॥ ३२
अथ तत्पृष्टकुशलो दीर्घमुष्णं च निःश्वसन् ।
तत्कृपादृष्टिसंप्राप्तसुखः प्रोवाच तं नृपः ॥ ३३
राजोवाच
मुने मां बाधते ह्येषा ब्रह्महत्या दुरत्यया ।
अलक्षिता परैस्तात तर्जयन्ती पदे पदे ॥ ३४
यन्मया शापदग्धेन विप्रपुत्रश्च भक्षितः ।
तत्पापस्य न शान्तिर्हि प्रायश्चित्तसहस्रकैः ॥ ३५
नानोपायाः कृता मे हि तच्छान्त्यै भ्रमता मुने ।
न निवृत्ता ब्रह्महत्या मम पापात्मनः किमु ॥ ३६
अद्य मे जन्मसाफल्यं सम्प्राप्तमिव लक्षये ।
यतस्त्वद्दर्शनादेव ममानन्दभरोऽभवत् ॥ ३७
अद्य मे तव पादाब्जशरणस्य कृतैनसः ।
शांतिं कुरु महाभाग येनाहं सुखमाप्नुयाम् ॥ ३८
सूत उवाच
इति राज्ञा समादिष्टो गौतमः करुणार्द्रधीः ।
समादिदेश घोराणामघानां साधु निष्कृतिम् ॥ ३ ९
उसने अपने पीछे - पीछे आती हुई तथा बार - बार धमकाती हुई विकट आकारवाली दुःखदायिनी ब्रह्महत्याको देखा । उससे पीछा छुड़ानेकी इच्छावाले दुःखितचित्त उस राजाने जप, व्रत, यज्ञ आदि अनेक उपाय किये ॥ २८-२९ ॥ हे ब्राह्मणो! जब तीर्थ - स्नान आदि अनेक उपायोंसे भी उस राजाकी ब्रह्महत्या दूर नहीं हुई, तब वह राजा मिथिलापुरी चला गया । उस ब्रह्महत्याकी चिन्तासे अत्यन्त दुःखित राजा मिथिलापुरीके बाहर उद्यानमें पहुँचा; वहाँ उसने मुनि गौतमको आते हुए देखा॥३०-३१ ॥ राजाने विशुद्ध अन्तःकरणवाले उन महर्षिके पास जाकर उनके दर्शनसे कुछ शान्ति प्राप्त करके बार - बार उन्हें प्रणाम किया ॥३२ ॥
उसके अनन्तर ऋषिने उसका कुशल - मंगल पूछा । तब उनकी कृपादृष्टिसे कुछ सुखका अनुभव करके दीर्घ तथा गर्म श्वास लेकर राजाने उनसे कहा— ॥ ३३ ॥
राजा बोले- हे मुने! हे तात! दूसरोंके द्वारा न देखी जा सकनेवाली यह दुस्तर ब्रह्महत्या पग - पगपर धमकी देती हुई मुझे बहुत दुःख दे रही है ॥ ३४ ॥
शापग्रस्त होनेके कारण जो मैंने ब्राह्मणपुत्रका भक्षण किया था, उस पापकी शान्ति हजारों प्रायश्चित्त करनेपर भी नहीं हो पा रही है ॥ ३५ ॥
हे मुने! [ इधर - उधर ] घूमते हुए उसकी शान्तिके लिये मेरे द्वारा अनेक उपाय किये गये, फिर भी मुझ पापीकी ब्रह्महत्या निवृत्त नहीं हुई ॥३६ ॥
आज मुझे मालूम पड़ता है कि मेरा जन्म सफल हो गया; क्योंकि आपके दर्शनमात्रसे मुझे विशेष आनन्द प्राप्त हो रहा है ॥ ३७ ॥
अतः हे महाभाग! आपके चरणकमलकी शरणमें आये हुए मुझ पापकर्माको शान्ति प्रदान कीजिये, जिससे मैं सुख प्राप्त कर सकूँ ॥ ३८ ॥
सूतजी बोले - [ हे ऋषियो! ] राजाके इस प्रकार प्रार्थना करनेपर करुणासे आर्द्र चित्तवाले गौतमजीने घोर पापोंसे छुटकारा पानेके लिये [ राजाको ] । श्रेष्ठ उपाय बताया ॥ ३ ९ ॥
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२३४ श्रीशिवमहापुराण [ अ ० १० गौतम उवाच गौतमजी बोले- हे राजेन्द्र! तुम धन्य हो साधु राजेन्द्र धन्योऽसि महाघेभ्यो भयं त्यज । अब तुम महापापोंके भयका त्याग करो; सबपर शासन, शिवे शास्तरि भक्तानां क्व भयं शरणैषिणाम् ॥ ४० करनेवाले शिवके रहनेपर उनके शरणागतोंको भय कहाँ? ॥४० ॥
शृणु राजन्महाभाग क्षेत्रमन्यत्प्रतिष्ठितम् । हे राजन्! हे महाभाग! सुनो; महापातकोंको महापातकसंहारि गोकर्णाख्यं शिवालयम् ॥ ४१ दूर करनेवाला गोकर्ण नामक एक अन्य प्रसिद्ध शिवक्षेत्र है, वहाँपर शिवजी महाबल नामसे स्वयं तत्र स्थितिर्न पापानां महद्भयो महतामपि । विराजमान रहते हैं — वहाँ बड़े - से - बड़े पाप भी टिक महाबलाभिधानेन शिवः संनिहितः स्वयम् ॥ ४२ नहीं सकते ॥ ४१-४२ ॥ सर्वेषां शिवलिंगानां सार्वभौमो महाबलः । महाबलेश्वर लिंग सभी लिंगोंका सार्वभौम सम्राट् चतुर्युगे चतुर्वर्णः सर्वपापापहारकः ॥ ४३ है, जो चार युगोंमें चार प्रकारके वर्ण धारण करता है और सभी प्रकारके पापोंको विनष्ट करनेवाला है ॥ ४३ ॥
पश्चिमाम्बुधितीरस्थं गोकर्णं तीर्थमुत्तमम् । पश्चिमी समुद्रके तटपर उत्तम गोकर्णतीर्थ स्थित तत्रास्ति शिवलिंगं तन्महापातकनाशकम् ॥ ४४ है; वहाँपर जो शिवलिंग है, वह महापातकोंका नाश
तत्र गत्वा महापापाः स्नात्वा तीर्थेषु भूरिशः ।
महाबलं च संपूज्य प्रयाताः शांकरं पदम् ॥ ४५
तथा त्वमपि राजेन्द्र गोकर्णं गिरिशालयम् ।
गत्वा सम्पूज्य तल्लिंगं कृतकृत्यत्वमाप्नुयाः ॥ ४६
तत्र सर्वेषु तीर्थेषु स्नात्वाभ्यर्च्य महाबलम् ।
सर्वपापविनिर्मुक्तः शिवलोकं त्वमाप्नुयाः ॥४७
सूत उवाच
इत्यादिष्टः स मुनिना गौतमेन महात्मना ।
महाहृष्टमना राजा गोकर्णं प्रत्यपद्यत ॥ ४८
तत्र तीर्थेषु सुस्नात्वा समभ्यर्च्य महाबलम् ।
निर्धूताशेषपापौघोऽलभच्छंभोः परं पदम् ॥ ४ ९
य इमां शृणुयान्नित्यं महाबलकथां प्रियाम् ।
त्रिसप्तकुलजैः सार्धं शिवलोके व्रजत्यसौ ॥ ५०
इति वश्च समाख्यातं माहात्म्यं परमाद्भुतम् ।
महाबलस्य गिरिशलिंगस्य निखिलाघहृत् ॥ ५१ ।
इति श्रीशिवमहापुराणे चतुर्थ्यां कोटिरुद्रसंहितायां करनेवाला है । महापापी भी वहाँ जाकर सभी तीर्थोंमें बारंबार स्नानकर महाबलेश्वरकी पूजाकर शैव पदकों प्राप्त हुए हैं ॥ ४४-४५ ॥ हे राजेन्द्र! उसी प्रकार तुम भी उस गोकर्ण नामक शिवस्थानमें जाकर उस लिंगका पूजनकर अपने मनोरथको प्राप्त करो । तुम वहाँ सभी तीर्थोंमें स्नानकर महाबलेश्वरका भलीभाँति पूजन करके सभी पापोंसे छुटकारा पाकर शिवलोकको प्राप्त करो ॥ ४६-४७ ॥ सूतजी बोले - [ हे महर्षियो! ] इस प्रकार महान् आत्मावाले महर्षि गौतम मुनिसे आज्ञा प्राप्तकर वह राजा अत्यन्त प्रसन्नचित्त होकर गोकर्णतीर्थमें गया और वहाँ सभी तीर्थोंमें स्नानकर महाबलेश्वरकी पूजा करके अपने सम्पूर्ण पापोंसे मुक्त होकर उसने शिवके परम पदको प्राप्त किया ॥ ४८-४९ ॥ जो [ मनुष्य ] महाबलेश्वरकी इस प्रिय कथाको नित्य सुनता है, वह इक्कीस पीढ़ीके वंशजोंसहित शिवलोकको जाता है । [ हे महर्षियो! ] इस प्रकार मैंने आपलोगोंसे महाबलेश्वर नामक शिवलिंगके सर्वपापनाशक परम अद्भुत माहात्म्यका वर्णन किया ॥ ५०-५१ ॥ ॥ इस प्रकार श्रीशिवमहापुराणके महाबलाह्वशिवलिंगमाहात्म्यवर्णनं नाम दशमोऽध्यायः ॥ १० ॥
अन्तर्गत चतुर्थ कोटिरुद्रसंहितामें महाबल नामक शिवलिंगका माहात्म्यवर्णन नामक दसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥१० ॥
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अ ० ११ ] कोटिरुद्रसंहिता २३५ अथैकादशोऽध्यायः उत्तरदिशामें विद्यमान शिवलिंगोंके वर्णन - क्रममें चन्द्रभाल एवं पशुपतिनाथलिंगका माहात्म्य - वर्णन ऋषय ऊचुः
सूत सूत महाभाग धन्यस्त्वं शिवसक्तधीः ।
महाबलस्य लिंगस्य श्रावितेयं कथाद्भुता ॥
उत्तरस्यां दिशायां च शिवलिंगानि यानि च ।
तेषां माहात्म्यमनघं वद त्वं पापनाशकम् ॥
सूत उवाच
शृणुतादरतो विप्रा औत्तराणां विशेषतः ।
माहात्म्यं शिवलिंगानां प्रवदामि समासतः ॥
गोकर्णं क्षेत्रमपरं महापातकनाशनम् ।
महावनं च तत्रास्ति पवित्रमतिविस्तरम् ॥
तत्रास्ति चन्द्रभालाख्यं शिवलिंगमनुत्तमम् ।
रावणेन समानीतं सद्भक्त्या सर्वसिद्धिदम् ॥
तस्य तत्र स्थितिर्वैद्यनाथस्येव मुनीश्वराः ।
सर्वलोकहितार्थाय करुणासागरस्य च ॥
स्नानं कृत्वा तु गोकर्णे चन्द्रभालं समर्च्य च ।
शिवलोकमवाप्नोति सत्यं सत्यं न संशयः ॥
चन्द्रभालस्य लिंगस्य महिमा परमाद्भुतः ।
न शक्यो वर्णितुं व्यासाद्भक्तिस्नेहरतस्य हि ॥
चन्द्रभालमहादेवलिंगस्य महिमा महान् ।
यथाकथंचित्संप्रोक्तः परलिंगस्य वै शृणु ॥
दाधीचं शिवलिंगं तु मिश्रर्षिवरतीर्थके ।
दधीचिना मुनीशेन सुप्रीत्या च प्रतिष्ठितम् ॥
तत्र गत्वा च तत्तीर्थे स्नात्वा सम्यग्विधानतः ।
शिवलिंगं समर्चेद्वै दाधीचेश्वरमादरात् ॥
दधीचमूर्तिस्तत्रैव समर्च्या विधिपूर्वकम् ।
शिवप्रीत्यर्थमेवाशु तीर्थयात्राफलार्थिभिः ॥
ऋषिगण बोले — हे महाभाग! हे सूतजी! शिवजीमें आसक्त चित्तवाले आप धन्य हैं, जो कि १ आपने महाबलेश्वर लिंगकी यह अद्भुत कथा हमें सुनायी । अब उत्तर दिशामें स्थित जो शिवलिंग हैं, उनका २ पापनाशक निर्मल माहात्म्य आप सुनायें ॥ १-२ ॥ सूतजी बोले- हे ब्राह्मणो! मैं उत्तर दिशामें विराजमान मुख्य - मुख्य शिवलिंगोंके माहात्म्यका संक्षेपमें ३ वर्णन कर रहा हूँ; आपलोग आदरपूर्वक सुनिये ॥ ३ ॥
गोकर्ण नामक एक दूसरा भी पापनाशक क्षेत्र है; ४ वहाँपर एक पवित्र तथा अति विस्तृत महावन है ॥ ४ ॥
वहाँपर चन्द्रभाल नामक उत्तम तथा सर्वसिद्धि-५ दायक शिवलिंग है, जिसे रावण सद्भक्तिपूर्वक लाया था । हे मुनीश्वरो! वहाँपर उस करुणासागर शिवलिंगकी स्थिति सारे संसारके हितके लिये वैद्यनाथ नामक ६ ज्योतिर्लिंगके तुल्य है ॥ ५-६ ॥ गोकर्णमें स्नानकर तथा चन्द्रभालका ७ मनुष्य अवश्य ही शिवलोकको प्राप्त करता संशय नहीं है ॥७ ॥
भक्तोंके ऊपर स्नेह करनेवाले उन ८ नामक शिवकी महिमा बड़ी अद्भुत है; उसका वर्णन नहीं किया जा सकता है । नामक महादेवके लिंगकी महती महिमाका पूजनकर है, इसमें चन्द्रभाल विस्तारसे चन्द्रभाल वर्णन मैंने जिस - किसी प्रकार कर दिया; अब दूसरे लिंगका ९ माहात्म्य सुनिये ॥ ८ - ९ ॥ मिश्रर्षि ( मिसरिख ) नामक उत्तम तीर्थमें १० दाधीच नामक शिवलिंग है, जिसे दधीचिमुनिने परम प्रीतिपूर्वक स्थापित किया था । वहाँ जाकर उस तीर्थमें विधिपूर्वक स्नानकर दाधीचेश्वर शिवलिंगका आदर-११ पूर्वक पूजन अवश्य ही करना चाहिये ॥ १०-११ ॥ तीर्थयात्राका फल शीघ्र प्राप्त करनेकी इच्छावालोंको शिवजीको प्रसन्न करनेके लिये वहाँपर विधिपूर्वक दधीचिकी मूर्तिका पूजन करना १२ | चाहिये ॥ १२ ॥
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२३६ श्रीशिवमहापुराण [ अ ० १२ एवं कृते मुनिश्रेष्ठाः कृतकृत्यो भवेन्नरः । हे मुनिश्रेष्ठो! ऐसा करनेसे मनुष्य कृतकृत्य हो इह सर्वसुखं भुक्त्वा परत्र गतिमाप्नुयात् ॥ १३ जाता है और इस लोकमें सभी सुख भोगकर परलोकमें सद्गति प्राप्त करता है ॥१३ ॥
नैमिषारण्यतीर्थे तु निखिलर्षिप्रतिष्ठितम् । नैमिषारण्यमें सभी ऋषियोंद्वारा स्थापित ऋषीश्वर ऋषीश्वरमिति ख्यातं शिवलिंगं सुखप्रदम् तद्दर्शनात्पूजनाच्च जनानां पापिनामपि भुक्तिर्मुक्तिश्च तेषां तु परत्रेह मुनीश्वराः
हत्याहरणतीर्थे तु शिवलिंगमघापहम् ।
पूजनीयं विशेषेण हत्याकोटिविनाशनम् ॥
देवप्रयागतीर्थे तु ललितेश्वरनामकम् ।
शिवलिंगं सदा पूज्यं नरैः सर्वाघनाशनम् ॥
नयपालाख्यपुर्यां तु प्रसिद्धायां महीतले ।
लिंगं पशुपतीशाख्यं सर्वकामफलप्रदम् ॥
शिरोभागस्वरूपेण शिवलिंगं तदस्ति हि ।
तत्कथां वर्णयिष्यामि केदारेश्वरवर्णने ॥
तदारान्मुक्तिनाथाख्यं शिवलिंगं महाद्भुतम् ।
दर्शनादर्चनात्तस्य भुक्तिर्मुक्तिश्च लभ्यते ॥
इति वश्च समाख्यातं लिंगवर्णनमुत्तमम् ।
चतुर्दिक्षु मुनिश्रेष्ठाः किमन्यच्छ्रोतुमिच्छथ ॥
॥ १४ नामक सुखदायक शिवलिंग है । हे मुनीश्वरो! उसके । दर्शन एवं पूजनसे पापी लोगोंको भी इस लोकमें भोग ॥ १५ तथा परलोकमें मोक्ष प्राप्त होता है ॥ १४-१५ ॥ हत्याहरण तीर्थमें पापोंको दूर करनेवाला तथा १६ करोड़ों हत्याओंका नाश करनेवाला शिवलिंग है, उसकी विशेष रूपसे पूजा करनी चाहिये ॥ १६ ॥
देवप्रयागतीर्थमें ललितेश्वर नामक शिवलिंग है, १७ उस लिंगकी हमेशा पूजा करनी चाहिये, जिससे सभी प्रकारके पाप दूर हो जाते हैं ॥१७ ॥
पृथिवीपर प्रसिद्ध नेपाल नामक पुरीमें पशुपतीश्वर १८ नामक शिवलिंग है, जो सम्पूर्ण कामनाओंका फल प्रदान करता है । वह शिवलिंग शिरोभागमात्रसे वहाँ स्थित है, उसकी कथा केदारेश्वरवर्णनके प्रसंगमें १ ९ कहूँगा ॥ १८-१९ ॥ उसके समीप मुक्तिनाथ नामक अत्यन्त अद्भुत २० शिवलिंग है, उसके दर्शन एवं अर्चनसे भोग तथा मोक्ष प्राप्त होते हैं ॥ २० ॥
हे मुनीश्वरो! इस प्रकार मैंने आपलोगोंसे चारों दिशाओंमें स्थित शिवलिंगोंका उत्तम वर्णन किया; २१ । अब आपलोग और क्या सुनना चाहते हैं? ॥२१ ॥
इति श्रीशिवमहापुराणे चतुर्थ्यां कोटिरुद्रसंहितायां चन्द्रभालपशुपतिनाथलिंगमाहात्म्यवर्णनं नामैकादशोऽध्यायः ॥ ११ ॥
॥ इस प्रकार श्रीशिवमहापुराणके अन्तर्गत चतुर्थ कोटिरुद्रसंहितामें चन्द्रभालपशुपतिनाथलिंगमाहात्म्य-वर्णन नामक ग्यारहवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ११ ॥
अथ द्वादशोऽध्यायः हाटकेश्वरलिंगके प्रादुर्भाव एवं माहात्म्यका वर्णन ऋषय ऊचुः ऋषि बोले — हे सूतजी! आप व्यासजीकी कृपासे सूत जानासि सकलं वस्तु व्यासप्रसादतः । सब कुछ जानते हैं, कोई भी बात आपसे अज्ञात नहीं तवाज्ञातं न विद्येत तस्मात्पृच्छामहे वयम् ॥ १ है, इसीलिये हमलोग आपसे पूछते हैं ॥ १ ॥
लिंगं च पूज्यते आपने पूर्वमें कहा था कि लोकमें सभी जगह लोके तत्त्वया कथितं च यत् । शिवलिंगकी पूजा होती है । क्या वह लिंग होनेके कारण तत्तथैव न चान्यद्वा कारणं विद्यते त्विह ॥ २ ही पूजित है अथवा अन्य कोई कारण है? ॥ २ ॥