शिव महापुराण - २ — पृष्ठ 251–260
शिव महापुराण - २ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 251–260
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अ ० १२ ] कोटिरुद्रसंहिता २३७
बाणरूपा श्रुता लोके पार्वती शिववल्लभा ।
एतत्किं कारणं सूत कथय त्वं यथाश्रुतम् ॥ ३
सूत उवाच
कल्पभेदकथा चैव श्रुता व्यासान्मया द्विजाः ।
तामेव कथयाम्यद्य श्रूयतामृषिसत्तमाः ॥ ४
पुरा दारुवने जातं यद् वृत्तं तु द्विजन्मनाम् ।
तदेव श्रूयतां सम्यक् कथयामि यथाश्रुतम् ॥ ५
दारुनाम वनं श्रेष्ठं तत्रासन् ऋषिसत्तमाः ।
शिवभक्ताः सदा नित्यं शिवध्यानपरायणाः ॥ ६
त्रिकालं शिवपूजां च कुर्वन्ति स्म निरन्तरम् ।
नानाविधैः स्तवैर्दिव्यैस्तुष्टुवुस्ते मुनीश्वराः ॥ ७
ते कदाचिद्वने याताः समिधाहरणाय च ।
सर्वे द्विजर्षभाः शैवाः शिवध्यानपरायणाः ॥ ८
एतस्मिन्नंतरे साक्षाच्छंकरो नीललोहितः ।यह विरूपं च समास्थाय परीक्षार्थं समागतः ॥ ९
दिगम्बरोऽतितेजस्वी भूतिभूषणभूषितः ।
स चेष्टामकरोद्दुष्टां हस्ते लिंगं विधारयन् ॥ १०
मनसा च प्रियं तेषां कर्तुं वै वनवासिनाम् ।
जगाम तद्वनं प्रीत्या भक्तप्रीतो हरः स्वयम् ॥ ११
तं दृष्ट्वा ऋषिपत्न्यस्ताः परं त्रासमुपागताः ।
विह्वला विस्मिताश्चान्याः समाजग्मुस्तथा पुनः ॥ १२
आलिलिंगुस्तथा चान्याः करं धृत्वा तथापराः ।
परस्परं तु संघर्षात्संमग्नास्ताः स्त्रियस्तदा ॥ १३
एतस्मिन्नेव समये ऋषिवर्याः समागमन् ।
विरुद्धं तं च ते दृष्ट्वा दुःखिताः क्रोधमूर्च्छिताः ॥ १४
तदा दुःखमनुप्राप्ताः कोऽयं कोऽयं तथाब्रुवन् ।
समस्ता ऋषयस्ते वै शिवमायाविमोहिताः ॥ १५
यदा च नोक्तवान् किंचित्सोऽवधूतो दिगम्बरः ।
ऊचुस्तं पुरुषं भीमं तदा ते परमर्षयः ॥ १६
शिववल्लभा पार्वती लोकमें बाणलिंगरूपा कही जाती हैं । हे सूतजी! इसका क्या कारण है, इस विषयमें आपने जैसा सुना है, वैसा कहिये ॥ ३ ॥
सूतजी बोले- हे ब्राह्मणो! हे ऋषिसत्तमो! मैंने व्यासजीसे जो कल्पभेदकी कथा सुनी है, उसीका आज वर्णन कर रहा हूँ, आपलोग सुनें ॥४ ॥
पूर्वकालमें दारुवनमें ब्राह्मणोंके साथ जो घटना घटी, उसीको आप लोग सुनें । जैसा मैंने सुना है, वैसा ही कहता हूँ । हे ऋषिसत्तमो! जो दारु नामक श्रेष्ठ वन है, वहाँ नित्य शिवजीके ध्यानमें तत्पर शिवभक्त [ ब्राह्मण ] रहा करते थे॥५-६ ॥ हे मुनीश्वरो! वे तीनों कालोंमें सदा शिवजीकी पूजा करते थे और नाना प्रकारके स्तोत्रोंसे उनकी स्तुति किया करते थे । शिवध्यानमें मग्न रहनेवाले वे शिवभक्त श्रेष्ठ ब्राह्मण किसी समय समिधा लेनेके लिये वनमें गये हुए थे ॥ ७-८ ॥ इसी बीच उन लोगोंकी परीक्षा लेनेहेतु साक्षात् नीललोहित [ भगवान् ] शंकर विकट रूप धारणकर वहाँ आये । वे दिगम्बर, भस्मरूप भूषणसे विभूषित तथा महातेजस्वी भगवान् शंकर हाथमें [ तेजोमय ] लिंगको धारणकर विचित्र लीला करने लगे ॥ ९ -१० ॥ मनसे उन वनवासियोंका कल्याण करनेके लिये भक्तोंसे प्रेम करनेवाले वे शिव स्वयं प्रेमपूर्वक उस वनमें गये । उन्हें देखकर ऋषिपत्नियाँ अत्यन्त भयभीत हो गयीं और अन्य स्त्रियाँ विह्वल तथा आश्चर्यचकित होकर वहीं चली आयीं । कुछ स्त्रियोंने परस्पर हाथ पकड़कर आलिंगन किया, कुछ स्त्रियाँ आपसमें आलिंगन करनेके कारण अत्यन्त मोहविह्वल हो गयीं ॥११–१३ ॥ इसी समय सभी ऋषिवर [ वनसे समिधा लेकर ] आ गये और वे इस आचरणको देखकर [ उसे समझ नहीं सके और ] दुःखित तथा क्रोधसे व्याकुल हो गये । तब शिवकी मायासे मोहित हुए समस्त ऋषिगण दुःखित हो आपसमें कहने लगे— – ' ' यह कौन है, यह कौन है? ' ॥ १४-१५ ॥ जब उन दिगम्बर अवधूतने कुछ भी नहीं कहा, तब उन महर्षियोंने भयंकर पुरुषका रूप धारण किये हुए उन शिवजीसे कहा- हे अवधूत! तुम वेदमार्गका
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२३८ श्रीशिवमहापुराण [ अ ० १२ त्वया विरुद्धं क्रियते वेदमार्गविलोपि यत् । लोप करनेवाला यह विरुद्ध आचरण कर रहे हो, ततस्त्वदीयं तल्लिंगं पततां पृथिवीतले ॥ १७ अतः तुम्हारा यह विग्रहरूप लिंग [ शीघ्र ही । सूत उवाच इत्युक्ते तु तदा तैश्च लिंगं च पतितं क्षणात् अवधूतस्य तस्याशु शिवस्याद्भुतरूपिणः तल्लिंगं चाग्निवत्सर्वं यद्ददाह पुरा स्थितम् यत्र यत्र च तद्याति तत्र तत्र दहेत्पुनः
पाताले च गतं तच्च स्वर्गे चापि तथैव च ।
भूमौ सर्वत्र तद्यातं न कुत्रापि स्थिरं हि तत् ॥
लोकाश्च व्याकुला जाता ऋषयस्तेऽतिदुःखिताः ।
न शर्म लेभिरे केचिद्देवाश्च ऋषयस्तथा ॥
न ज्ञातस्तु शिवो यैस्तु ते सर्वे च सुरर्षयः ।
दुःखिता मिलिताः शीघ्रं ब्रह्माणं शरणं ययुः ॥
तत्र गत्वा च ते सर्वे नत्वा स्तुत्वा विधिं द्विजाः ।
तत्सर्वमवदन् वृत्तं ब्रह्मणे सृष्टिकारिणे ॥
ब्रह्मा तद्वचनं श्रुत्वा शिवमायाविमोहितान् ।
ज्ञात्वा तान् शङ्करं नत्वा प्रोवाच ऋषिसत्तमान् ॥
ब्रह्मोवाच
ज्ञातारश्च भवन्तो वै कुर्वते गर्हितं द्विजाः ।
अज्ञातारो यदा कुर्युः किं पुनः कथ्यते पुनः ॥
विरुद्ध्यैवं शिवं देवं कुशलं कः समीहते ।
मध्याह्नसमये यो वै नातिथिं च परामृशेत् ॥
तस्यैव सुकृतं नीत्वा स्वीयं च दुष्कृतं पुनः ।
संस्थाप्य चातिथिर्याति किं पुनः शिवमेव वा ॥
यावल्लिंगं स्थिरं नैव जगतां त्रितये शुभम् ।
पृथ्वीपर गिर जाय ॥ १६-१७ ॥
सूतजी बोले - [ हे महर्षियो! ] उनके ऐसा । । कहनेपर अद्भुत रूपवाले उन अवधूतवेषधारी शिवका ॥ १८ [ वह चिन्मय ] लिंग शीघ्र ही पृथ्वीपर गिर पड़ा ॥ १८ ॥
। अग्नितुल्य उस माहेश्वरलिंगने सामने स्थित सभी ॥ १ ९ वस्तुओंको जला डाला और इतना ही नहीं, वह फैलकर जहाँ - जहाँ जाता, सब कुछ भस्म कर देता । वह पातालमें तथा स्वर्गमें भी वैसे ही गया; वह पृथ्वीपर सर्वत्र गया २० और कहीं भी स्थिर न रहा ॥ १ ९ -२० ॥ सारे लोक व्याकुल हो उठे और वे ऋषिगण २१ अत्यन्त दुःखित हो गये । देवता और ऋषियोंमें किसीको भी अपना कल्याण दिखायी न पड़ा ॥ २१ ॥
जिन देवता और ऋषियोंने शिवजीको नहीं २२ पहचाना, वे सब दुःखित हो आपसमें मिलकर ब्रह्माजीकी शरणमें गये । हे ब्राह्मणो! वहाँ जाकर उन सभीने ब्रह्माको प्रणाम तथा स्तुतिकर सृष्टिकर्ता २३ ब्रह्मासे सारा वृत्तान्त निवेदन किया ॥ २२-२३ ॥ तब ब्रह्माजी उनका वचन सुनकर उन श्रेष्ठ २४ ऋषियोंको शिवकी मायासे मोहित जानकर सदाशिवको नमस्कारकर कहने लगे —॥२४ ॥
ब्रह्माजी बोले- हे ब्राह्मणो! आपलोग ज्ञानी होकर भी निन्दित कर्म कर रहे हैं, तो यदि अज्ञानी २५ लोग ऐसा करें, तो फिर क्या कहा जाय!॥ २५ ॥
इस प्रकार सदाशिवसे विरोध करके भला कौन २६ कल्याणकी कामना कर सकता है! यदि कोई मध्याह्नकालमें आये हुए अतिथिका सत्कार नहीं करता, तो वह अतिथि उसका सारा पुण्य लेकर और २७ अपना सारा पाप उसको देकर चला जाता है; फिर शिवजीके विषयमें तो कहना ही क्या! ॥ २६-२७ ॥ अतः जबतक यह [ शैव ] लिंग स्थिर नहीं जायते न तदा क्वापि सत्यमेतद्वदाम्यहम् ॥ २८ होता, तबतक तीनों लोकोंमें कहीं भी लोगोंका कल्याण नहीं हो सकता है; मैं यह सत्य कहता हूँ । भवद्भिश्च तथा कार्यं यथा स्वास्थ्यं हे ऋषियो! अब आपलोग मनसे विचार करें और शिवलिंगस्य भवेदिह । ऐसा उपाय करें, जिससे शिवलिंगकी स्थिरता हो
ऋषयो मनसा संविचार्यताम् ॥ २ ९ । जाय ॥ २८-२९ ॥
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अ ० १२ ] कोटिरुद्रसंहिता २३ ९ सूत उवाच
इत्युक्तास्ते प्रणम्योचुर्ब्रह्माणमृषयश्च वै ।
किमस्माभिर्विधे कार्यं तत्कार्यं त्वं समादिश ॥
इत्युक्तश्च मुनीशैस्तैः सर्वलोकपितामहः ।
मुनीशांस्तांस्तदा ब्रह्मा स्वयं प्रोवाच वै तदा ॥
ब्रह्मोवाच
आराध्य गिरिजां देवीं प्रार्थयन्तु सुराः शिवाम् ।
योनिरूपा भवेच्चेद्वै तदा तत्स्थिरतां व्रजेत् ॥
तद्विधिं प्रवदाम्यद्य सर्वे शृणुत सत्तमाः ।
तामेव कुरुत प्रेम्णा प्रसन्ना सा भविष्यति ॥
कुम्भमेकं च संस्थाप्य कृत्वाष्टदलमुत्तमम् ।
दूर्वायवांकुरैस्तीर्थोदकमापूरयेत्ततः ॥
वेदमंत्रैस्ततस्तं वै कुंभं चैवाभिमंत्रयेत् ।
श्रुत्युक्तविधिना तस्य पूजां कृत्वा शिवं स्मरन् ॥
तल्लिंगं तज्जलेनाभिषेचयेत्परमर्षयः ।
शतरुद्रियमंत्रैस्तु प्रोक्षितं शांतिमाप्नुयात् ॥
गिरिजायोनिरूपं च बाणं स्थाप्य शुभं पुनः ।
तत्र लिंगं च तत्स्थाप्यं पुनश्चैवाभिमंत्रयेत् ॥
सुगन्धैश्चन्दनैश्चैव पुष्पधूपादिभिस्तथा ।
नैवेद्यादिकपूजाभिस्तोषयेत्परमेश्वरम् ॥
प्रणिपातैः स्तवैः पुण्यैर्वाद्यैर्गानैस्तथा पुनः ।
ततः स्वस्त्ययनं कृत्वा जयेति व्याहरेत्तथा ॥
प्रसन्नो भव देवेश जगदाह्लादकारक ।
कर्ता पालयिता त्वं च संहर्ता त्वं निरक्षरः ॥
जगदादिर्जगद्योनिर्जगदन्तर्गतोऽपि च ।
शान्तो भव महेशान सर्वांल्लोकांश्च पालय ॥
सूतजी बोले- ब्रह्माके द्वारा इस प्रकार कहे जानेपर ऋषियोंने उन्हें प्रणामकर कहा - हे ब्रह्मन्! ३० अब हमलोगोंको क्या करना चाहिये? आप उस कार्यके लिये आज्ञा प्रदान कीजिये । तब उन मुनीश्वरोंके द्वारा इस प्रकार कहे जानेपर सर्वलोकपितामह ब्रह्माजीने ३१ उन मुनीश्वरोंसे स्वयं कहा— ॥ ३०-३१ ॥ ब्रह्माजी बोले- हे देवताओ! आपलोग देवी | पार्वतीकी आराधना करके उन शिवासे प्रार्थना कीजिये; ३२ यदि वे योनिपीठात्मकरूप धारण कर लें, तो वह शिवलिंग स्थिर हो जायगा ॥३२ ॥
हे ऋषिसत्तमो! अब मैं उस उपायको आपलोगोंसे ३३ बताता हूँ, आप लोग सुनिये और प्रेमपूर्वक उस विधिका सम्पादन कीजिये; वे [ अवश्य ] प्रसन्न होंगी ॥ ३३ ॥
अष्टदलवाला कमल बना करके उसपर एक ३४ | कलश स्थापितकर उसमें दूर्वा तथा यवांकुरोंसे युक्त तीर्थका जल भर देना चाहिये । फिर वेदमन्त्रोंके द्वारा उस कुम्भको अभिमन्त्रित करना चाहिये । इसके बाद ३५ [ हे महर्षियो! ] वेदोक्त रीतिसे उसका पूजन करके शिवका स्मरण करते हुए शतरुद्रिय मन्त्रोंसे कलशके जलसे उस शिवलिंगका अभिषेक करना चाहिये, फिर ३६ उन्हीं मन्त्रोंसे लिंगका प्रोक्षण करना चाहिये; तब शिवलिंग प्रशान्त हो जायगा ॥ ३४-३६ ॥ इसके बाद योनिरूपा गिरिजा तथा उत्तम ३७ बाणलिंगको स्थापितकर उस प्रतिष्ठित शिवलिंगको पुनः अभिमन्त्रित करना चाहिये । उसके अनन्तर सुगन्ध द्रव्य, चन्दन, पुष्प, धूप एवं नैवेद्य आदिसे ३८ पूजाकर प्रणाम, स्तुति तथा मंगलकारी गीत - वाद्यके द्वारा परमेश्वरको प्रसन्न करना चाहिये । तत्पश्चात् स्वस्तिवाचन करके ' जय ' शब्दका उच्चारण करना ३ ९ चाहिये और प्रार्थना करना चाहिये कि हे देवेश! हे संसारको प्रसन्न करनेवाले! आप [ हमपर ] प्रसन्न होइये; आप ही [ संसारके ] कर्ता, पालन करनेवाले ४० एवं संहार करनेवाले तथा पूर्णतः विनाशरहित हैं । आप इस जगत्के आदि, जगत्के कारण एवं जगत्के आत्मस्वरूप भी हैं । हे महेश्वर! आप शान्त हो जायँ ४१ और सम्पूर्ण जगत्का पालन करें ॥ ३७–४१ ॥
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२४० एवं कृते विधौ स्वास्थ्यं भविष्यति न संशयः विकारो न त्रिलोकेऽस्मिन्भविष्यति सुखं सदा सूत उवाच इत्युक्तास्ते द्विजा देवाः प्रणिपत्य पितामहम् शिवं तं शरणं प्राप्ताः सर्वलोकसुखेप्सया पूजितः परया भक्त्या प्रार्थितः शंकरस्तदा सुप्रसन्नस्ततो भूत्वा तानुवाच महेश्वरः महेश्वर उवाच
हे देवा ऋषयः सर्वे मद्वचः शृणुतादरात् ।
योनिरूपेण मल्लिंगं धृतं चेत्स्यात्तदा सुखम् ॥
पार्वतीं च विना नान्या लिंगं धारयितुं क्षमा ।
तया धृतं च मल्लिंगं द्रुतं शान्तिं गमिष्यति ॥
सूत उवाच
तच्छ्रुत्वा ऋषिभिर्देवैः सुप्रसन्नैर्मुनीश्वराः ।
गृहीत्वा चैव ब्रह्माणं गिरिजा प्रार्थिता तदा ॥
प्रसन्नां गिरिजां कृत्वा वृषभध्वजमेव च ।
पूर्वोक्तं च विधिं कृत्वा स्थापितं लिंगमुत्तमम् ॥
मंत्रोक्तेन विधानेन देवाश्च ऋषयस्तथा ।
चक्रुः प्रसन्नां गिरिजां शिवं च धर्महेतवे ॥
समानर्चुर्विशेषेण सर्वे देवर्षयः शिवम् । श्रीशिवमहापुराण [ अ ० १२ । हे ऋषियो! इस प्रकारका अनुष्ठान करनेपर ॥ ४२ शिवलिंग अवश्य स्थिर हो जायगा । फिर इस त्रैलोक्यमें किसी भी प्रकारका उपद्रव नहीं होगा और सदा सुख रहेगा ॥४२ ॥
सूतजी बोले- ब्रह्माके यह कहनेपर वे ब्राह्मण । तथा देवता पितामह ब्रह्माजीको प्रणामकर सभी ॥ ४३ लोकोंको सुखी बनानेकी इच्छासे उन शिवजीकी शरणमें गये ॥४३ ॥
। उन लोगोंने परम भक्तिसे सदाशिवकी पूजा ॥ ४४ एवं प्रार्थना की, तब प्रसन्न होकर महेश्वरने उनसे कहा- ॥ ४४ ॥
महेश्वर बोले – हे देवताओ! हे ऋषियो! आपलोग आदरपूर्वक मेरी बात सुनिये । यदि यह शिवलिंग योनिपीठात्मिका ( समस्त ब्रह्माण्डका प्रसव ४५ करनेवाली ) भगवती महाशक्तिके द्वारा धारण किया जाय, तभी आपलोगोंको सुख प्राप्त होगा । पार्वतीके अतिरिक्त अन्य कोई भी मेरे इस स्वरूपको धारण करनेमें समर्थ नहीं है; उन महाशक्तिके द्वारा धारण किये जानेपर शीघ्र ही यह मेरा निष्कल स्वरूप ४६ प्रशान्त हो जायगा ॥ ४५-४६ ॥ सूतजी बोले- हे मुनीश्वरो! तब यह सुनकर प्रसन्न हुए देवताओं एवं ऋषियोंने ब्रह्माको साथ ४७ लेकर पार्वतीकी प्रार्थना की और पार्वती तथा शिवको प्रसन्न करके पूर्वोक्त विधि सम्पादितकर उत्तम लिंग ४८ स्थापित किया ॥ ४७-४८ ॥ इस प्रकार मन्त्रोक्त विधानके अनुसार उन ४ ९ देवताओं एवं ऋषियोंने धर्मकी रक्षाके लिये शिव तथा पार्वतीको प्रसन्न किया ॥४ ९ ॥ तत्पश्चात् सभी देवता, ऋषिगण, ब्रह्मा, विष्णु ब्रह्मा विष्णुः परे चैव त्रैलोक्यं सचराचरम् ॥ ५० तथा चराचर त्रिलोकीने शिवजीकी विशेष रूपसे पूजा की ॥५० ॥
सुप्रसन्नः शिवो जातः शिवा च जगदम्बिका । तब शिवजी प्रसन्न हो गये और जगदम्बा धृतं तया च तल्लिंगं तेन रूपेण वै तदा ॥ ५१ पार्वती भी प्रसन्न हो गयीं; इसके बाद उन पार्वतीने उस शिवलिंगको पीठरूपसे धारण कर लिया । हे लोकानां स्थापिते लिंगे द्विजो! तब शिवलिंगके स्थापित हो जानेपर लोकोंका कल्याणं चाभवत्तदा । प्रसिद्धं चैव तल्लिंगं त्रिलोक्यामभवद् कल्याण हुआ और वह शिवलिंग तीनों लोकोंमें
द्विजाः ॥ ५२ । प्रसिद्ध हो गया ॥ ५१-५२ ॥
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अ ० १३ ] कोटिरुद्रसंहिता २४१ हाटकेशमिति ख्यातं तच्छिवाशिवमित्यपि । पार्वतीजी तथा शिवका वह विग्रह हाटकेश्वर– पूजनात्तस्य लोकानां सुखं भवति सर्वथा ॥ ५३ इस नामसे प्रसिद्ध हुआ, उसके पूजनसे सभी लोगोंको सब प्रकारका सुख प्राप्त होता है, इस लोकमें अनेक प्रकारका सुख देनेवाली सम्पूर्ण समृद्धि अधिकाधिक इह सर्वसमृद्धिः स्यान्नानासुखवहाधिका । प्राप्त होती है और परलोकमें उत्तम मुक्ति प्राप्त होती परत्र परमा मुक्तिर्नात्र कार्या विचारणा ॥ ५४ है; इसमें कोई विचार नहीं करना चाहिये ॥ ५३-५४ ॥ इति श्रीशिवमहापुराणे चतुर्थ्यां कोटिरुद्रसंहितायां लिंगस्वरूपकारणवर्णनं नाम द्वादशोऽध्यायः ॥ १२ ॥
॥ इस प्रकार श्रीशिवमहापुराणके अन्तर्गत चतुर्थ कोटिरुद्रसंहितामें लिंगस्वरूपकारणवर्णन नामक बारहवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ १२ ॥
अथ त्रयोदशोऽध्यायः अन्धकेश्वरलिंगकी महिमा एवं बटुककी उत्पत्तिका वर्णन सूत उवाच
यथाभवल्लिंगरूपः संपूज्यस्त्रिभवे शिवः ।
तथोक्तं वा द्विजाः प्रीत्या किमन्यच्छ्रोतुमिच्छथ ॥
ऋषय ऊचुः अन्धकेश्वरलिंगस्य महिमानं वद प्रभो । तथान्यच्छिवलिंगानां प्रीत्या वक्तुमिहार्हसि सूत उवाच पुराब्धिगर्तमाश्रित्य वसन् दैत्योऽन्धकासुरः । स्ववशं कारयामास त्रैलोक्यं सुरसूदनः तस्माद्गर्ताच्च निःसृत्य पीडयित्वा पुनः प्रजाः । प्राविशच्च तदा दैत्यस्तं गर्तं सुपराक्रमः देवाश्च दुःखिताः सर्वे शिवं प्रार्थ्य पुनः पुनः । सर्वं निवेदयामासुः स्वदुःखं च मुनीश्वराः सूत उवाच तदाकर्ण्य वचस्तेषां देवानां परमेश्वरः प्रत्युवाच प्रसन्नात्मा दुष्टहंता सतां गतिः शिव उवाच घातयिष्यामि तं दैत्यमन्धकं सुरसूदनम् सैन्यं च नीयतान्देवा ह्यायामि च गणैः सह तस्माद्गर्तादंधके हि देवर्षिद्रुहि भीकरे निःसृते च तदा तस्मिन्देवा गर्तमुपाश्रिताः सूतजी बोले- हे द्विजो! जिस प्रकार शिवजी तीनों लोकोंमें लिंगस्वरूपसे पूजनीय हुए, उस वृत्तान्तको १ मैंने प्रीतिपूर्वक बता दिया; अब आपलोग और क्या सुनना चाहते हैं? ॥१ ॥
ऋषिगण बोले- हे प्रभो! आप अन्धकेश्वर लिंगकी महिमाका वर्णन कीजिये तथा इसी प्रसंगमें ॥ २ अन्य शिवलिंगोंकी महिमा भी प्रीतिपूर्वक कहिये ॥ २ ॥
सूतजी बोले – हे महर्षियो! पूर्व समयमें समुद्रके गर्तका आश्रय लेकर निवास करते हुए देवशत्रु अन्धक ॥ ३ नामक दैत्यने त्रैलोक्यको अपने वशमें कर लिया था ॥ ३ ॥
वह अत्यन्त पराक्रमशाली दैत्य उस गर्तसे ॥ ४ निकलकर प्रजाओंको पीड़ित करनेके पश्चात् पुनः उसी गड्ढेमें प्रवेश कर जाता था । हे मुनीश्वरो! तब दुखी होकर समस्त देवताओंने बारंबार शिवकी प्रार्थना करते ॥ ५ हुए उनसे अपना सारा दुःख निवेदन किया ॥ ४-५ ॥ सूतजी बोले- तब उन देवगणोंका वचन । सुनकर दुष्टोंका संहार करनेवाले एवं सज्जनोंके ॥ ६ शरणदाता परमेश्वर प्रसन्न होकर कहने लगे ॥६ ॥
शिवजी बोले- हे देवगण! मैं देवताओंको दुःख देनेवाले उस अन्धक दैत्यका वध करूँगा; आपलोग ॥ । ७ अपनी सेना लेकर चलिये, मैं भी गणोंके साथ आ रहा हूँ । तब उस गर्तसे देवताओं और ऋषियोंसे द्वेष । करनेवाले उस भयंकर अन्धकके निकल जानेपर देवता ॥ ८ । लोग उस गर्तमें प्रवेश कर गये॥७-८ ॥
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२४२ श्रीशिवमहापुराण [ अ ० १३ दैत्याश्च देवताश्चैव युद्धं चक्रुः सुदारुणम् । तब देवताओं एवं दैत्योंने [ परस्पर ] अत्यन्त शिवानुग्रहतो देवाः प्रबलाश्चाभवँस्तदा ॥ ९ | भयानक युद्ध किया; शिवजीकी कृपासे देवता । उस [ युद्ध ] -में प्रबल हो गये । देवताओंसे पीड़ित देवैश्च पीडितः सोऽपि यावद्गर्तमुपागतः । | होकर वह ज्यों ही उस गड्ढेमें प्रवेश करने लगा, तावच्छूलेन संप्रोतः शिवेन परमात्मना ॥ १० उसी समय परमात्मा शिवने उसे त्रिशूलमें पिरो तत्रत्यश्च तदा शंभुं ध्यात्वा संप्रार्थयत्तदा अन्तकाले च त्वां दृष्ट्वा तादृशो भवति क्षणात् ॥
इत्येवं संस्तुतः सोऽपि प्रसन्नः शंकरस्तदा ।
उवाच वचनं तत्र वरं ब्रूहि ददामि ते ॥
इत्येवं वचनं श्रुत्वा स दैत्यः पुनरब्रवीत् ।
सुप्रणम्य शिवं स्तुत्वा सत्त्वभावमुपाश्रितः ॥
अन्धक उवाच
यदि प्रसन्नो देवेश स्वभक्तिं देहि मे शुभाम् ।
कृपां कृत्वा विशेषेण संस्थितो भव चेह वै ॥
सूत उवाच
इत्युक्तस्तेन दैत्यं तं तद्गर्ते चाक्षिपद्धरः ।
स्वयं तत्र स्थितो लिंगरूपोऽसौ लोककाम्यया ॥
अन्धकेशं च तल्लिंगं नित्यं यः पूजयेन्नरः ।
षण्मासाज्जायते तस्य वांछासिद्धिर्न संशयः ॥
वृत्त्यर्थं पूजयेल्लिंगं लोकस्य हितकारकम् ।
लिया ॥ ९ -१० ॥
। तब त्रिशूलमें स्थित हुआ वह शिवजीका ध्यान ११ करके प्रार्थना करने लगा कि [ हे शिवजी! ] अन्त समयमें आपका दर्शन करके प्राणी आपके ही सदृश हो जाता है ॥११ ॥
इस प्रकार स्तुत हुए उन शंकरने भी प्रसन्न १२ होकर यह वचन कहा- तुम वर माँगो, मैं तुम्हें दूँगा ॥ १२ ॥
यह वचन सुनकर सात्त्विक भावको प्राप्त हुए १३ | उस दैत्यने शिवजीको भलीभाँति प्रणाम करके तथा उनकी स्तुतिकर [ पुन: ] कहा —॥१३ ॥
अन्धक बोला- हे देवेश! यदि आप प्रसन्न हैं, तो मुझे अपनी शुभ भक्ति प्रदान कीजिये और १४ विशेष कृपा करके यहीं पर निवास कीजिये ॥१४ ॥
सूतजी बोले- उसके इस प्रकार कहनेपर [ भगवान् ] शंकरने उस दैत्यको उसी गड्ढेमें फेंक १५ दिया और लोकहितकी कामनासे वे वहीं लिंगरूप धारणकर स्थित हो गये ॥ १५ ॥
जो मनुष्य नित्य उस अन्धकेश्वर लिंगकी पूजा १६ करता है, उसकी छ: मासके भीतर ही समस्त कामनाएँ पूर्ण हो जाती हैं; इसमें सन्देह नहीं है ॥ १६ ॥
[ परंतु ] जो ब्राह्मण आजीविकाके लिये छ: षण्मासं यो द्विजश्चैव स वै देवलकः स्मृतः ॥ १७ मासतक संसारका हित करनेवाले इस लिंगकी [ द्रव्य लेकर ] पूजा करता है, वह तो देवलक कहा गया है ॥ १७ ॥
यथा देवलकश्चैव स भवेदिह वै तदा । जिस प्रकार देवलक होता है, उसी प्रकार वह देवलकश्च यः प्रोक्तो नाधिकारो द्विजस्य हि ॥ १८ ब्राह्मण भी हो जाता है, [ जो छः महीनेतक वृत्त्यर्थ शिवपूजन करता है ], जो देवलक कहा गया है, वह ऋषय द्विजत्वके अधिकारसे वंचित हो जाता है ॥ १८ ॥
देवलकश्च ऊचुः ऋषिगण बोले — देवलक कौन कहा गया है कः प्रोक्तः किं कार्यं तस्य विद्यते । तत्त्वं वद और उसका क्या कार्य है? हे महाप्राज्ञ! लोकहितके
महाप्राज्ञ लोकानां हितहेतवे ॥ १ ९ । लिये आप इसे बताइये ॥ १ ९ ॥
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अ ० १३ ] कोटिरुद्रसंहिता २४३ सूत उवाच
दधीचिर्नाम विप्रो यो धर्मिष्ठो वेदपारगः ।
शिवभक्तिरतो नित्यं शिवशास्त्रपरायणः ॥
तस्य पुत्रस्तथा ह्यासीत्स्मृतो नाम्ना सुदर्शनः ।
तस्य भार्या दुकूला च नाम्ना दुष्टकुलोद्भवा ॥
तद्वशे स च भर्तासीत्तस्य पुत्रचतुष्टयम् ।
सोऽपि नित्यं शिवस्यैव पूजां च स्म करोत्यसौ ॥
दधीचेस्तु तदा ह्यासीद् ग्रामान्तरनिवेशनम् ।
ज्ञातिसंयोगतश्चैव ज्ञातिभिर्न स मोचितः ॥
कथयित्वा च पुत्रं स शिवभक्तिरतो भव ।
इत्युक्त्वा स गतो मुक्तो दधीचिः शैवसत्तम: ॥
सुदर्शनस्तत्पुत्रोऽपि शिवपूजां चकार ह ।
एवं चिरतरः कालो व्यतीयाय मुनीश्वराः ॥
एवं च शिवरात्रिश्च समायाता कदाचन ।
तस्यां चोपोषिताः सर्वे स्वयं संयोगतस्तदा ॥
पूजां कृत्वा गतः सोऽपि सुदर्शन इति स्मृतः ।
स्त्रीसंगं शिवरात्रौ तु कृत्वा पुनरिहागतः ॥
न स्नानं तेन च कृतं तद्रात्र्यां शिवपूजनम् ।
तेन तत्कर्मपाकेन क्रुद्धः प्रोवाच शङ्करः ॥
महेश्वर उवाच शिवरात्र्यां त्वया दुष्ट सेवनं च स्त्रियाः कृतम् । अस्नातेन मदीया च कृता पूजाविवेकिना
ज्ञात्वा चैवं कृतं यस्मात्तस्मात्त्वं जडतां व्रज ।
ममास्पृश्यो भव त्वं च दूरतो दर्शनं कुरु ॥
सूत उवाच इति शप्तो महेशेन दाधीचिः स सुदर्शनः । जडत्वं प्राप्तवान्सद्यः शिवमायाविमोहितः एतस्मिन्समये विप्रा दधीचिः शैवसत्तमः ग्रामान्तरात्समायातो वृत्तान्तं श्रुतवाँश्च सः सूतजी बोले – ऋषियो! जो दधीचि नामक धर्मिष्ठ, वेदमें पारंगत, शिवभक्तिमें संलग्न तथा २० शिवशास्त्रपरायण विप्र थे, उनका पुत्र भी वैसा ही था; वह सुदर्शन नामसे प्रसिद्ध था । उसकी दुकूला नामक २१ पत्नी थी, जो दुष्टकुलमें उत्पन्न हुई थी ॥ २०-२१ ॥ उसका वह पति [ सुदर्शन ] उसके वशमें रहता २२ था । उसके चार पुत्र हुए । वह [ सुदर्शन ] भी नित्य शिवकी पूजा किया करता था ॥२२ ॥
किसी समय दधीचिको दूसरे गाँवमें जाना पड़ा, २३ वहाँ बान्धवोंके सम्मेलनके कारण बन्धु - बान्धवोंने । उन्हें लौटने नहीं दिया ॥२३ ॥
शैवोंमें श्रेष्ठ वे दधीचि अपने पुत्रसे ' तुम २४ शिवजीकी सेवा करते रहना ' यह कहकर [ पूजन आदि दायित्वोंसे ] मुक्त होकर चले गये । उनका पुत्र सुदर्शन भी शिवजीका पूजन करता रहा । हे मुनीश्वरो! २५
इस प्रकार बहुत समय बीत गया । २४ - २५ ॥
इसी बीच शिवरात्रि आ गयी और उसमें सभी २६ लोगोंने उपवास किया और सुदर्शनने स्वयं भी संयोगवश उपवास किया ॥ २६ ॥
वह सुदर्शन भी पूजा करके चला गया और २७ शिवरात्रिमें स्त्रीसंग करके पुनः वहाँ आ गया ॥ २७ ॥
उसने उस रात्रिमें स्नान नहीं किया, किंतु २८ शिवपूजन किया; तब उसके इस कुकर्मसे क्रोधित हुए [ भगवान् ] शंकरने कहा —॥२८ ॥
महेश्वर बोले- रे दुष्ट! तुझ अविवेकीने शिवरात्रिके दिन स्त्रीका सेवन किया और बिना स्नान किये ही मेरा पूजन भी किया । चूँकि तुमने जान-॥ २ ९ बूझकर ऐसा किया है, इसलिये जड़ हो जाओ । अब तुम मुझे स्पर्श करनेयोग्य नहीं हो, अतः दूरसे ही ३० दर्शन करो ॥ २ ९ -३० ॥ सूतजी बोले - [ हे महर्षियो! ] शिवजीके द्वारा इस प्रकार शापित वह दधीचिपुत्र सुदर्शन शिवमायासे विमोहित होकर उसी क्षण जड़ हो ॥ ३१ गया ॥ ३१ ॥
हे ब्राह्मणो! इसी समय शिवभक्तोंमें श्रेष्ठ । दधीचि दूसरे गाँवसे आ गये और उन्होंने यह ॥ ३२ । समाचार सुना ॥३२ ॥
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२४४ शिवेन भर्सितः सोऽपि दुःखितोऽभूदतीव हि रुरोद हा हतोऽस्मीति दुःखेन सुतकर्मणा पुनः पुनरुवाचेति स दधीचिः सतां मतः अनेनेदं कुपुत्रेण हतं मे कुलमुत्तमम् स पुत्रोऽपि हतो भार्यां पुंश्चलीमुक्तवान्द्रुतम् पश्चात्तापमनुप्राप्य स्वपित्रा परिभसितः तत्पित्रा गिरिजा तत्र पूजिता विधिभिर्वरैः सुयत्नतो महाभक्त्या स्वपुत्रसुखहेतवे सुदर्शनोऽपि गिरिजां पूजयामास च स्वयम् चण्डीपूजनमार्गेण महाभक्त्या शुभैः स्तवैः
एवं तौ पितृपुत्रौ हि नानोपायैः सुभक्तितः ।
प्रसन्नां चक्रतुर्देवीं गिरिजां भक्तवत्सलाम् ॥
तयोः सेवाप्रभावेण प्रसन्ना चण्डिका तदा ।
सुदर्शनं च पुत्रत्वे चकार गिरिजा मुने ॥
शिवं प्रसादयामास पुत्रार्थे चण्डिका स्वयम् ।
क्रुद्धाक्रुद्धा पुनश्चण्डी तत्पुत्रस्य प्रसन्नधीः ॥
अथाज्ञाय प्रसन्नं तं महेशं वृषभध्वजम् ।
नमस्कृत्य स्वयं तस्य ह्युत्संगे तं न्यवेशयत् ॥
घृतस्नानं तश्चक्रे पुत्रस्य गिरिजा स्वयम् ।
त्रिरावृत्तोपवीतं च ग्रन्थिनैकेन संयुतम् ॥
सुदर्शनाय पुत्राय ददौ प्रीत्या तदाम्बिका ।
उद्दिश्य शिवगायत्रीं षोडशाक्षरसंयुताम् ॥
तदों नमः शिवायेति श्रीशब्दपूर्वकाय च । वारान्षोडश संकल्पपूजां श्रीशिवमहापुराण [ अ ० १३ । शिवजीने उन्हें भी धिक्कारा, तब वे अत्यन्त ॥ ३३ दुखी हुए और यह कहकर रोने लगे - हाय! पुत्रके दुःखित करनेवाले कुकर्मसे मैं मारा गया । सत्पुरुषोंमें । श्रेष्ठ दधीचिने बारंबार यह कहा कि इस कुपुत्रके ॥३४ कारण मेरा यह उत्तम कुल नष्ट हो गया ॥ ३३-३४ ॥ । अपने पिताके द्वारा तिरस्कृत उस अभागे पुत्र ॥ ३५ सुदर्शनने भी पश्चात्ताप करके अपनी भार्याके लिये कहा कि यह पुंश्चली है । तदुपरान्त उसके पिताने । वहाँ पुत्रके कल्याणके लिये प्रयत्नपूर्वक श्रेष्ठ विधियोंसे ॥ ३६ परमभक्ति भावसे पार्वतीका पूजन किया ॥ ३५-३६ ॥ । स्वयं सुदर्शनने भी महाभक्तिपूर्वक चण्डीपूजन-॥ ३७ विधानसे पार्वतीका पूजन किया और उत्तम स्तोत्रोंसे उनकी स्तुति भी की ॥ ३७ ॥
इस प्रकार उन दोनों पिता - पुत्रोंने भक्तिपूर्वक ३८ अनेक उपायोंसे भक्तवत्सला देवी गिरिजाको प्रसन्न कर लिया ॥ ३८ ॥
हे मुने! तब उन दोनोंके उत्कृष्ट सेवाभावसे प्रसन्न ३ ९ हुई चण्डिकाने सुदर्शनको अपना पुत्र मान लिया ॥ ३ ९ ॥ चण्डिकाने स्वयं भी उस [ सुदर्शन नामक ] ४० पुत्रके लिये शिवजीको प्रसन्न किया । इसके बाद पूर्वमें सुदर्शनसे क्रोधित किंतु अब उस पुत्रपर क्रोधरहित चण्डिकाने प्रसन्नचित्त होकर उन वृषभध्वज महेश्वरको ४१ [ भलीभाँति ] प्रसन्न जानकर उन्हें नमस्कारकर स्वयं ही उस सुदर्शनको उनकी गोदमें बैठा दिया ॥ ४०-४१ ॥ इसके बाद गिरिजाने स्वयं ही सुदर्शनको घृतसे ४२ स्नान कराकर एक ग्रन्थिसे युक्त त्रिरावृत यज्ञोपवीत प्रसन्नतापूर्वक पहनाया । तत्पश्चात् अम्बिकाने पुत्र ४३ सुदर्शनको सोलह अक्षरसे युक्त शिवगायत्रीका उपदेश दिया और यह भी कहा कि यह वटु श्रीशब्दपूर्वक ' ॐ नमः शिवाय ' - इस मन्त्रका सोलह बार कुर्यादयं बटुः ॥ ४४ उच्चारणकर संकल्प - पूजा किया करे ॥ ४२–४४ ॥ आस्नानादिप्रणामान्तं पूजयन्वृषभध्वजम् । पुनः उन्होंने स्नानसे लेकर प्रणामपर्यन्त विविध मंत्रवादित्रपूजाभिः सर्षीणां सन्निधौ तथा ॥ ४५ उपचारोंसे ऋषियोंके सान्निध्यमें मन्त्र एवं वाद्यके साथ उस बालकसे शिवपूजन करवाया और उससे नाममंत्राननेकांश्च पाठयामास शिवजीके अनेक नामों तथा मन्त्रोंका पाठ कराया । वै तदा । तत्पश्चात् अत्यन्त प्रसन्नचित्त होकर चण्डिका एवं उवाच सुप्रसन्नात्मा चण्डिका च शिवस्तथा ॥ ४६ । शिवजीने उससे कहा- ॥ ४५-४६ ॥
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अ ० १३ ] कोटिरुद्रसंहिता २४५
मदर्पितं च यत्किंचिद्धनधान्यादिकं तथा ।
तत्सर्वं च त्वया ग्राह्यं न दोषाय भविष्यति ॥ ४७
मम कृत्ये भवान्मुख्यो देवीकृत्ये विशेषतः ।
घृततैलादिकं सर्वं त्वया ग्राह्यं मदर्पितम् ॥ ४८
प्राजापत्यं भवेद्यर्हि तर्ह्येको हि भवान्भवेत् ।
तदा पूजा च सम्पूर्णान्यथा सर्वा च निष्फला ॥ ४ ९
तिलकं वर्तुलं कार्यं स्नानं कार्यं सदा त्वया ।
शिवसन्ध्या च कर्तव्या गायत्री च तदीयका ॥ ५०
मत्सेवां प्रथमं कृत्वा कार्यमन्यत्कुलोचितम् ।
एवं कृतेऽखिले भद्रं दोषाः क्षान्ता मया तव ॥ ५१
सूत उवाच
इत्युक्त्वा तस्य पुत्राश्च चत्वारो बटुकास्तदा ।
अभिषिक्ताश्चतुर्दिक्षु शिवेन परमात्मना ॥ ५२
चण्डी चैवात्मनिकटे पुत्रं स्थाप्य सुदर्शनम् ।
तत्पुत्रान्प्रेरयामास वरान्दत्त्वा ह्यनेकशः ॥ ५३
देव्युवाच
उभयोर्व्यूहयोर्मध्ये बटुको यो भवेन्मम ।
तस्य स्याद्विजयो नित्यं नात्र कार्या विचारणा ॥ ५४
भवांश्च पूजितो येन तेनैवाहं प्रपूजिता ।
कर्तव्यं हि भवद्भिश्च स्वीयं कर्म सदा सुत ॥ ५५
सूत उवाच
एवं तस्मै वरा दत्ताः सपुत्राय महात्मने ।
सुदर्शनाय कृपया शिवाभ्यां जगतां कृते ॥ ५६
शिवाभ्यां स्थापिता यस्मात्तस्मात्ते बटुकाः स्मृताः ।
तपोभ्रष्टा यतो जाताः स्मृतास्तस्मात्तपोऽधमाः ॥ ५७
शिवयोः कृपया सर्वे विस्तारं बहुधा गताः ।
तेषां च प्रथमा पूजा महापूजा महात्मनः ॥ ५८
तेन यावत्कृता नैव पूजा वै शंकरस्य च ।
तावत्पूजा न कर्त्तव्या कृता चेन्न शुभापि सा ॥ ५ ९
[ हे पुत्र! ] मेरे लिये जो कुछ भी धन - धान्य आदि अर्पित किया गया हो, वह सब तुम्हें ग्रहण करना चाहिये; इसे ग्रहण करनेमें तुम्हें कोई दोष नहीं लगेगा । मेरे [ समस्त ] कार्यमें और विशेषकर देवीके कार्यमें तुम मुख्य रहोगे । मेरे लिये चढ़ाया गया घृत, तैल आदि सब कुछ तुम्हें ग्रहण करना चाहिये । जब प्राजापत्य होने लगेगा, तब उसमें तुम अकेले ही मुख्य होगे; और तभी पूजा पूर्ण होगी, अन्यथा सब पूजा निष्फल हो जायगी । तुम सर्वदा वर्तुलाकार तिलक लगाना, स्नान करना, शिवसन्ध्या करना और शिवगायत्रीका जप करना । सबसे पहले मेरी सेवा करके तुम कुलोचित अन्य कार्य करना; यह सब किये जानेपर तुम्हारा कल्याण होगा । मैंने तुम्हारे समस्त दोष क्षमा कर दिये ॥ ४७–५१ ॥ सूतजी बोले- ऐसा कहकर परमात्मा शिवजीने उसके चारों बटुक पुत्रोंको चारों दिशाओंमें अभिषिक्त कर दिया । तब भगवती चण्डी पुत्र सुदर्शनको अपने निकट बैठाकर उसके पुत्रोंको अनेक प्रकारके वर देकर शिक्षा देने लगीं ॥ ५२-५३ ॥ देवी बोलीं – दो व्यूहोंके [ युद्धमें ] जिस ओर मेरा बटुक होगा, उसकी सदा विजय होगी; इसमें सन्देह नहीं करना चाहिए । हे पुत्र! जिसने तुम्हारी पूजा की, उसने मानो मेरी पूजा कर ली; तुम सभीको अपना कर्म सदा करते रहना चाहिये ॥ ५४-५५ ॥ सूतजी बोले- हे ऋषियो! इस प्रकार शिव एवं शिवाने कृपापूर्वक संसारके कल्याणके लिये पुत्रोंसहित उस महात्मा सुदर्शनको अनेक वर प्रदान किये । चूँकि शिव एवं पार्वतीने उन्हें [ अपने पुत्रके रूपमें ] प्रतिष्ठित किया, इसलिये वे बटुक कहे गये हैं और अपनी तपस्यासे भ्रष्ट हुए, इसलिये वे तपोऽधम कहे गये हैं॥५६-५७ ॥ शिव - शिवाकी कृपासे वे [ आगे चलकर ] बहुत विस्तृत हो गये । इन बटुकोंकी प्रथम पूजा साक्षात् महात्मा शंकरकी ही महापूजा है ॥ ५८ ॥
इसलिये जबतक बटुकोंकी पूजा न कर ली जाय, तबतक शिवजीकी पूजा नहीं करनी चाहिये । | यदि पूर्वमें शिवजीकी पूजा की जाय, तो वह शुभदायी
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२४६ श्रीशिवमहापुराण [ अ ० १३ शुभं वाप्यशुभं वापि बटुकं न परित्यजेत् । | नहीं होती । शुभ कार्य हो अथवा अशुभ कार्य हो, प्राजापत्ये च भोज्ये वै बटुरेको विशिष्यते ॥ ६० बटुकका कभी भी त्याग न करे । प्राजापत्य भोजमें एक । बटुकका पूजन भी विशिष्ट कहा गया है ॥ ५ ९ -६० ॥ शिवयोश्च तथा कार्ये विशेषोऽत्र प्रदृश्यते । शिव एवं पार्वतीके कार्यमें बटुककी ही विशेषता तदेव शृणु सुप्राज्ञ यथाहं वच्मि तेऽनघ ॥ ६१ देखी जाती है; हे बुद्धिमान् एवं निष्पाप शौनकजी । मैं जैसा कहता हूँ, उसे आप सुनें ॥६१ ॥
तस्यैव नगरे राज्ञो भद्रस्य नित्यभोजने । अन्धकेश्वरके समीप भद्र नामक राजाके प्राजापत्यस्य नियमे ह्यन्धकेशसमीपतः ॥ ६२ नगरमें प्राजापत्य [ नामक यज्ञानुष्ठान, जिसमें नित्यप्रति ब्राह्मणभोजनका सम्पादन होता था ] -के नित्य भोजनवाले नियममें शिवके अनुग्रहसे जो अद्भुत यज्जातमद्भुतं वृत्तं शिवानुग्रहकारणात् । श्रूयतां तच्च सुप्रीत्या कथयामि घटना घटी, उसे प्रीतिपूर्वक सुनिये; जैसा मैंने सुना है, यथाश्रुतम् ॥ ६३ वैसा कह रहा हूँ॥६२-६३ ॥
ध्वज एकश्च तद्राज्ञे दत्तस्तुष्टेन शंभुना ।
प्रोक्तश्च कृपया राजा देवदेवेन तेन सः ॥ ६४
प्रातश्च बध्यतां राजन्ध्वजो रात्रौ पतिष्यति ।
मम त्वेवं च सम्पूर्णे प्राजापत्ये तथा पुनः ॥ ६५
अन्यथायं ध्वजो मे हि रात्रावपि स्थिरो भवेत् ।
इत्युक्त्वान्तर्हितः शंभू राज्ञे तुष्टः कृपानिधिः ॥ ६६
तथेति नियमश्चासीत्तस्य राज्ञो महामुने ।
प्राजापत्यं कृतं नित्यं शिवपूजाविधानतः ॥ ६७
स्वयं प्रातर्विवर्धेत ध्वजः सायं पतेदिति ।
यदि कार्यं च सम्पूर्णं जातं चैव भवेदिह ॥ ६८
एकस्मिन्समये चात्र बटोः कार्यं पुरा ह्यभूत् ।
ध्वजः स पतितो वै हि ब्रह्मभोजं विनापि हि ॥ ६ ९
दृष्ट्वा तच्च तदा तत्र पृष्टा राज्ञा च पण्डिताः ।
भुञ्जते ब्राह्मणा ह्यत्र नोत्थितो वै ध्वजस्त्विति ॥ ७०
कथं च पतितः सोऽत्र ब्राह्मणा ब्रूत सत्यतः ।
ते पृष्टाश्च तदा प्रोचुर्ब्राह्मणाः पण्डितोत्तमाः ॥ ७१
ब्रह्मभोजे महाराज बटुको भोजितः पुरा ।
चण्डीपुत्रः शिवस्तुष्टस्तस्माच्च पतितो ध्वजः ॥ ७२
तच्छ्रुत्वा नृपतिः सोऽथ जनाश्चान्येऽपि सर्वशः ।
अभवन्विस्मितास्तत्र प्रशंसां चक्रिरे ततः ॥ ७३
[ भगवान् ] सदाशिवने प्रसन्न होकर उस भद्र नामक राजाको एक ध्वज प्रदान किया । उसके अनन्तर देवाधिदेव सदाशिवने कृपापूर्वक उस राजासे कहा — हे राजन्! जिस दिन तुम्हारा प्राजापत्य [ यज्ञ ] पूर्ण होगा, उस दिन प्रात: काल यह बँधी हुई ध्वजा बढ़ेगी और रात्रिमें गिर जायगी । यदि तुम्हारी पूजामें कोई त्रुटि होगी, तो यह ध्वजा रात्रिकालमें भी स्थिर रहेगी । इतना कहकर राजासे सन्तुष्ट हुए कृपानिधि शंकर अन्तर्धान हो गये॥६४–६६ ॥ हे महामुने! उस राजाका वैसा ही नियम चलता रहा, वह शिव- पूजाके विधानके अनुसार नित्यप्रति प्राजापत्यका अनुष्ठान करने लगा । जब कार्य पूर्ण हो जाता, तो प्रात: काल ध्वजा स्वयं बढ़ जाती एवं सायंकाल गिर जाती ॥ ६७-६८ ॥ किसी समय ब्राह्मणभोजनके बिना ही बटुकोंकी पूजा पहले हो गयी और वह ध्वजा गिर पड़ी ॥ ६ ९ ॥ यह देखकर राजाने पण्डितोंसे पूछा — ब्राह्मणलोग यहाँ भोजन कर रहे हैं, किंतु यह ध्वज नहीं उठा । हे ब्राह्मणो! वह ध्वज क्यों गिर पड़ा, आपलोग सत्य-सत्य कहिये? तब इस प्रकार पूछे जानेपर पण्डितप्रवर ब्राह्मणोंने कहा — हे महाराज! ब्रह्मभोजमें चण्डीपुत्र बटुकको पहले ही भोजन करा दिया गया; इससे शिवजी सन्तुष्ट हो गये, इसीलिये ध्वजा गिर गयी ॥ ७०–७२ ॥ तब यह सुनकर वह राजा तथा अन्य लोग भी चकित हो उठे और प्रशंसा करने लगे ॥७३ ॥