शिव महापुराण - २ — पृष्ठ 71–80
शिव महापुराण - २ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 71–80
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अ ० १२ ] शतरुद्रसंहिता अत्रान्तरे महाघोरं प्रत्यक्षभयकारणम् । गगनव्यापि दुर्धर्षं शैवतेजः समुद्भवम् ॥ ३
वीरभद्रस्य तद्रूपमदृश्यं तु ततः क्षणात् ।
तद्वै हिरण्मयं सौम्यं न सौरं नाग्निसम्भवम् ॥ ४
न तडिच्चन्द्रसदृशमनौपम्यं महेश्वरम् ।
तदा तेजांसि सर्वाणि तस्मिँल्लीनानि शङ्करे ॥ ५
न तद्व्योमं महत्तेजो व्यक्तान्तश्चाभवत्ततः ।
रुद्रसाधारणं चैव चिह्नितं विकृताकृति ॥ ६
ततस्संहाररूपेण सुव्यक्तं परमेश्वरः ।
पश्यतां सर्वदेवानां जयशब्दादिमंगलैः ॥ ७
सहस्रबाहुर्जटिलश्चन्द्रार्द्धकृतशेखरः समृद्धोग्रशरीरेण पक्षाभ्यां चञ्चना द्विजः ॥ ८
अतितीक्ष्णो महादंष्ट्रो वज्रतुल्यनखायुधः ।
कण्ठे कालो महाबाहुश्चतुष्पाद्वह्निसन्निभः ॥ ९
युगान्तोद्यतजीमूतभीमगम्भीरनिःस्वनः महाकुपितकृत्याग्निव्यावृत्तनयनत्रयः ॥१०
स्पष्टदंष्ट्राधरोष्ठश्च हुंकारैः संयुतो हरः ।
ईदृग्विधस्वरूपश्च ह्युग्र आविर्बभूव ह ॥ ११
हरिस्तद्दर्शनादेव विनष्टबलविक्रमः ।
बिभ्रद्धामसहस्त्रांशोरधः खद्योतविभ्रमम् ॥ १२
अथ विभ्रम्य पक्षाभ्यां नाभिपादान्विदारयन् ।
पादान्बबंध पुच्छेन बाहुभ्यां बाहुमण्डलम् ॥ १३
भिन्दन्नुरसि बाहुभ्यां निजग्राह हरो हरिम् ।
ततो जगाम गगनं देवैस्सह महर्षिभिः ॥ १४
५ ९ इसी बीच महाघोर, प्रत्यक्ष, भयके कारण अत्यन्त प्रचण्ड, आकाशव्यापी, दुर्धर्ष, शिवतेजसे उत्पन्न तथा कभी भी न दिखायी पड़नेवाला वीरभद्रका अद्भुत रूप प्रकट हुआ, जो न तो हिरण्मय था, न सौम्य था, वह तेज न सूर्य और न तो अग्निसे उत्पन्न हुआ था, न बिजलीके समान और न चन्द्रमाके समान था, वह शिवतेज अनुपम था । उस समय सभी तेज उन शंकरके तेजमें विलीन हो गये । वह महातेज आकाशमें भी न समा सका । वह तेज प्रकट कालरूप ही था । अत्यन्त विकृताकार वह तेज रुद्रका साधारण चिह्न था॥३–६ ॥ जय - जय आदि मंगल शब्दोंके साथ उन देवताओंके देखते - देखते ही परमेश्वर स्वयं संहाररूपसे प्रकट हुए ॥७ ॥
हजार भुजाओंसे समन्वित, जटाधर, ललाटपर बालचन्द्र धारण किये हुए अत्यन्त उग्र शरीरवाले वे दो पंख एवं चोंचसे युक्त पक्षीके रूपमें दिखायी पड़ रहे थे । उनके दाँत अत्यन्त विशाल तथा तीक्ष्णतम थे । वे वज्रतुल्य नखरूपी आयुधसे युक्त थे, वे नीलकण्ठ, महाबाहु और चार चरणोंसे युक्त तथा अग्निके समान तेजस्वी थे । वे युगान्तकालीन अर्थात् प्रलयकारी मेघके समान गम्भीर गर्जना कर रहे थे और महाकोपसे व्याप्त नेत्रोंद्वारा कृत्याग्निके समान जान पड़ते थे । उनके दाँत और अधरोष्ठ क्रोधके कारण फड़क रहे थे । इस प्रकारका उग्र स्वरूप धारण किये, हुंकार करते हुए विकटरूपधारी शंकर [ नृसिंहजीके आगे ] प्रकट हो गये॥८–११ ॥ उस रूपको देखते ही नृसिंहका समस्त बल पराक्रम उसी प्रकार लुप्त हो गया, जिस प्रकार सूर्यके तेजसे तिरस्कृत जुगनू विभ्रान्त हो जाता है ॥ १२ ॥
इसके बाद उन्होंने अपने दोनों पक्षोंको घुमाते हुए उनसे नृसिंहके नाभि और चरणोंको विदीर्ण करते हुए अपनी पूँछसे उनके चरणोंको तथा हाथोंसे उनकी भुजाओंको बाँध लिया । इसके बाद भुजाओंसे हृदय विदीर्ण करते हुए शिवजीने नृसिंहको पकड़ लिया । उसके बाद देवताओं और महर्षियोंके साथ आकाशमें | चले गये॥१३-१४ ॥
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६० सहसैवाभयाद्विष्णुं स हि श्येन इवोरगम् उत्क्षिप्योत्क्षिप्य संगृह्य निपात्य च निपात्य च भगवान्पक्षघातविमोहितम् । उड्डीयोड्डीय हरिं हरस्तं वृषभं विवेशानन्त ईश्वरः अनुयान्तं सुराः सर्वे नमोवाक्येन तुष्टुवुः प्रणेमुः सादरं प्रीत्या ब्रह्माद्याश्च मुनीश्वराः नीयमानः परवशो दीनवक्त्रः कृताञ्जलिः तुष्टाव परमेशानं हरिस्तं ललिताक्षरैः नाम्नामष्टशतेनैव स्तुत्वा तं मृडमेव च पुनश्च प्रार्थयामास नृसिंहः शरभेश्वरम् ॥ यदा यदा ममाज्ञेयं मतिः स्याद्गर्वदूषिता तदा तदाऽपनेतव्या त्वयैव परमेश्वर नन्दीश्वर उवाच एवं विज्ञापयन्प्रीत्या शङ्करं नरकेसरी । श्रीशिवमहापुराण [ अ ० १२ जिस प्रकार गरुड निर्भयतापूर्वक साँपको कभी । ऊपर कभी नीचे पटकता है, कभी उसे लेकर उड़ जाता है, ॥ १५ / उसी प्रकार उन्होंने नृसिंहको अपने पंखोंसे मार - मारकर आहत कर दिया । फिर वे अनन्त ईश्वर उन नृसिंहको ॥ १६ लेकर वृषभपर सवार हो चल पड़े ॥ १५-१६ ॥ तत्पश्चात् सभी ब्रह्मादि देवों तथा मुनीश्वरोंने । हुए शिवको आदरपूर्वक प्रणाम किया और वे ॥ १७ जाते लोग ‘ नमः ’ शब्दसे उनकी स्तुति करने लगे ॥ १७ ॥
। इस प्रकार ले जाये जाते हुए पराधीन तथा ॥ १८ दीनमुख नृसिंह हाथ जोड़कर मनोहर अक्षरों [ -वाले स्तोत्रों ] -से उन परमेश्वरकी स्तुति करने लगे । शिवके । १ ९ एक सौ आठ नामोंद्वारा इन शरभेश्वरकी स्तुतिकर नृसिंहने पुनः उनसे प्रार्थना की- हे परमेश्वर! जब-। जब मेरी यह मूढ़ बुद्धि अहंकारसे दूषित हो जाय, ॥ २० तब - तब आप ही उसे दूर करें ॥ १८-२० ॥ नन्दीश्वर बोले- इस प्रकार प्रीतिपूर्वक शिवसे प्रार्थना करते हुए नृसिंहरूपधारी विष्णु जीवनपर्यन्त नत्वाशक्तोऽभवद्विष्णुर्जीवितान्तपराजितः ॥ २१ पराधीनता स्वीकारकर बार - बार प्रणाम करके दीन हो तद्वक्त्रं शेषगात्रान्तं कृत्वा सर्वस्वविग्रहम् । शक्तियुक्तं तदीयाङ्गं वीरभद्रः क्षणात्ततः नन्दीश्वर उवाच
अथ ब्रह्मादयो देवाः शारभं रूपमास्थितम् ।
तुष्टुवुः शङ्करं देवं सर्वलोकैकशङ्करम् ॥
देवा ऊचुः ब्रह्मविष्णिवन्द्रचन्द्रादिसुराः सर्वे महर्षयः । दितिजाद्याः सम्प्रसूताः त्वत्तः सर्वे महेश्वर
ब्रह्मविष्णुमहेन्द्रांश्च सूर्याद्यानसुरान्सुरान् ।
त्वं वै सृजसि पास्यत्सि त्वमेव सकलेश्वरः ॥
यतो हरसि संसारं हर इत्युच्यते बुधैः ।
निगृहीतो हरिर्यस्माद्धर इत्युच्यते बुधैः ॥
यतो बिभर्षि सकलं विभज्य तनुमष्टधा । अतोऽस्मान्पाहि भगवन् सुरान् दानैरभीप्सितैः गये । वीरभद्रने क्षणमात्रमें ही नृसिंहके मुखसहित समस्त शरीर एवं उनकी शक्तिको अपनेमें समाहित ॥ २२ कर लिया ॥ २१-२२ ॥ नन्दीश्वर बोले- तदनन्तर ब्रह्मादि समस्त देवता शरभरूप धारण किये हुए सम्पूर्ण लोकोंके एकमात्र २३ कल्याणकारी भगवान् शंकरकी स्तुति करने लगे ॥ २३ ॥
देवता बोले — हे महेश्वर! ब्रह्मा - विष्णु - इन्द्र-चन्द्रमा आदि समस्त देवता, महर्षि एवं दैत्य आदि-॥ २४ सबके सब आपसे ही उत्पन्न हुए हैं ॥२४ ॥
आप ही ब्रह्मा, विष्णु, महेन्द्र, चन्द्र तथा सूर्य आदि देवताओं एवं असुरोंका सृजन, पालन एवं संहार २५ करते हैं, आप ही सबके स्वामी हैं ॥ २५ ॥
आप संसारका हरण करते हैं, इसलिये विद्वान् २६ लोग आपको ' हर ' कहते हैं और आपने विष्णुका निग्रह किया है, इसलिये भी आप विद्वानोंके द्वारा हर कहे जाते हैं । हे प्रभो! आप अपने शरीरको आठ भागोंमें बाँटकर इस जगत्का संरक्षण करते हैं, अतः हे भगवन्! अभीष्ट वरोंके द्वारा हम देवताओंकी रक्षा ॥ २७ कीजिये ॥ २६-२७ ॥
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अ ० १२ ] शतरुद्रसंहिता
त्वं महापुरुषः शम्भुः सर्वेशः सुरनायकः ।
निःस्वात्मा निर्विकारात्मा परब्रह्म सतां गतिः ॥ २८
दीनबन्धुर्दयासिन्धुरद्भुतोति: परात्मदृक् 1 प्राज्ञो विराट् विभुः सत्यः सच्चिदानन्दलक्षणः ॥ २ ९ नन्दीश्वर उवाच
इत्याकर्ण्य वचः शम्भुर्देवानां परमेश्वरः ।
उवाच तान् सुरान्देवामहर्षीश्च पुरातनान् ॥ ३०
यथा जलं जले क्षिप्तं क्षीरे क्षीरं घृते घृतम् ।
एक एव तदा विष्णुः शिवे लीनो न चान्यथा ॥ ३१
एको विष्णुर्नृसिंहात्मा सदर्पश्च महाबलः ।
जगत्संहार करणे प्रवृत्तो नरकेसरी ॥ ३२
प्रार्थनीयो नमस्तस्मै मद्भक्तैः सिद्धिकारिभिः ।
मद्भक्तप्रवरश्चैव मद्भक्तवरदायकः ॥३३
नन्दीश्वर उवाच
एतावदुक्त्वा भगवान् पक्षिराजो महाबलः ।
पश्यतां सर्वदेवानां तत्रैवान्तरधीयत ॥ ३४
वीरभद्रोऽपि भगवान्गणाध्यक्षो महाबलः ।
नृसिंहकृत्तिं निष्कृष्य समादाय ययौ गिरिम् ॥ ३५
नृसिंहकृत्तिवसनस्तदाप्रभृति शङ्करः ।
तद्वक्त्रं मुण्डमालायां नायकत्वेन कल्पितम् ॥ ३६
ततो देवा निरातङ्काः कीर्तयन्तः कथामिमाम् ।
विस्मयोत्फुल्लनयना जग्मुः सर्वे यथागतम् ॥ ३७
य इदं परमाख्यानं पुण्यं वेदरसान्वितम् ।
पठति शृणुयाच्चैव सर्वान्कामानवाप्नुयात् ॥ ३८
धन्यं यशस्यमायुष्यमारोग्यम्पुष्टिवर्द्धनम् ।
सर्वविघ्नप्रशमनं सर्वव्याधिविनाशनम् ॥ ३ ९
दुःखप्रशमनं वाञ्छासिद्धिदं मंगलालयम् ।
अपमृत्युहरं बुद्धिप्रदं शत्रुविनाशनम् ॥ ४०
६१ आप महापुरुष, शम्भु, सर्वेश्वर, सुरनायक, निः स्वात्मा, निर्विकारात्मा, परब्रह्म, सत्पुरुषोंकी गति, दीनबन्धु, दयासिन्धु, अद्भुत लीला करनेवाले, परात्मदृक्, प्राज्ञ, विराट्, विभु, सत्य एवं सत् - चित् - आनन्द लक्षणसे युक्त हैं ॥ २८-२९ ॥ नन्दीश्वर बोले- इस प्रकार देवताओंके वचनको सुनकर परमेश्वर सदाशिव उन पुरातन देवताओं एवं महर्षियोंसे कहने लगे - ॥३० ॥
[ शिवजी बोले- ] जिस प्रकार जलमें जल, दूधमें दूध और घीमें घी मिलकर समरस हो जाता है, ठीक उसी प्रकार भगवान् विष्णु भी शिवजीमें मिलकर समरस हो गये हैं, इसमें संशय नहीं है ॥ ३१ ॥
इस समय एकमात्र विष्णु ही महाबलवान् तथा अहंकारी नृसिंहका रूप धारणकर संसारके संहार करनेमें प्रवृत्त हुए हैं, उन्हें नमस्कार है । सिद्धिहेतु प्रयत्नशील मेरे भक्तोंके द्वारा वे प्रार्थनाके योग्य हैं, वे स्वयं भी मेरे भक्तोंमें सर्वश्रेष्ठ हैं और मेरे भक्तोंको वर देनेवाले हैं ॥ ३२-३३ ॥ नन्दीश्वर बोले- इस प्रकार कहकर महाबली भगवान् पक्षिराज देवताओंके देखते - देखते वहीं अन्तर्धान हो गये । गणाध्यक्ष महाबलवान् भगवान् वीरभद्र भी नृसिंहका चर्म निकाल और उसे लेकर कैलासपर्वतपर चले गये ॥ ३४-३५ ॥ उसी समयसे शिवजी नृसिंहके चर्मको धारण करते हैं । उन्होंने नृसिंहके मुखको अपनी मुण्डमालाका सुमेरु बनाया था । तदनन्तर सभी देवता निर्भय होकर इस कथाका वर्णन करते हुए विस्मयसे प्रफुल्लितनेत्र हो जैसे आये थे, वैसे ही चले गये॥३६-३७ ॥ जो [ व्यक्ति ] वेदरससे परिपूर्ण इस परम पवित्र आख्यानको पढ़ता है तथा सुनता है, उसकी सम्पूर्ण कामनाएँ पूर्ण हो जाती हैं ॥३८ ॥
यह आख्यान धन्य, यशको प्रदान करनेवाला, आयुको बढ़ानेवाला, आरोग्य देनेवाला तथा पुष्टिकी वृद्धि करनेवाला, समस्त विघ्नोंको शान्त करनेवाला, सभी व्याधियोंका नाश करनेवाला, दुःखोंको दूर करनेवाला, मनोरथ सिद्ध करनेवाला, कल्याणका आश्रयस्थान, अपमृत्युका हरण करनेवाला, बुद्धिको बढ़ानेवाला तथा । शत्रुओंका नाश करनेवाला है ॥ ३ ९ -४० ॥
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६२ इदं तु शरभाकारं परं रूपं पिनाकिनः प्रकाशनीयं भक्तेषु शङ्करस्य चरेषु वै तैरेव पठितव्यं च श्रोतव्यं च शिवात्मभिः नवधाभक्तिदं दिव्यमन्तःकरणबुद्धिदम् शिवोत्सवेषु सर्वेषु चतुर्दश्यष्टमीषु च । पठेत्प्रतिष्ठाकाले तु शिवसन्निधिकारणम् चौरव्याघ्रनृसिंहात्मकृतराजभयेषु च । अन्येषूत्पातभूकम्पदस्वादिपांसुवृष्टिषु उल्कापाते महावाते विनावृष्ट्यतिवृष्टिषु । पठेद्यः प्रयतो विद्वान् शिवभक्तो दृढव्रतः
यः पठेच्छृणुयाद्वापि निष्कामो व्रतमैश्वरम् ।
रुद्रलोकं समासाद्य रुद्रस्यानुचरो भवेत् ॥
रुद्रलोकमनुप्राप्य रुद्रेण सह मोदते ।
ततः सायुज्यमाप्नोति शिवस्य कृपया मुने ॥
श्रीशिवमहापुराण [ अ ० १३ । यह शरभरूप पिनाकधारी शिवजीका उत्तम रूप ॥ ४१ है, इसे शिवके भक्तों तथा गणोंमें प्रकाशित करते. | रहना चाहिये अर्थात् साधारण जनोंके समक्ष यह । । प्रकाश्य नहीं है । उन्हीं शिवभक्तोंको इस आख्यानको ॥ ४२ पढ़ना एवं सुनना चाहिये । यह नौ प्रकारकी भक्ति प्रदान करनेवाला दिव्य एवं अन्तःकरण तथा बुद्धिका वर्धन करनेवाला है ॥ ४१-४२ ॥ शिवजीके सभी उत्सवोंमें, चतुर्दशी तथा अष्टमीको एवं शिवकी प्रतिष्ठाके समय इस आख्यानको ॥ ४३ पढ़नेसे शिवजीका सांनिध्य प्राप्त होता है ॥ ४३ ॥
चोर - बाघ - मनुष्य - सिंहके भयमें, आत्मकृत अर्थात् मनमें अकारण उत्पन्न भय तथा राजभयमें, अन्य प्रकारके ॥ ४४ उत्पात, भूकम्प, डाकू आदिसे भय उपस्थित होनेपर, धूलिवर्षाकालमें, उल्कापात, महावात, अनावृष्टि और ॥ ४५ अतिवृष्टिमें जो विद्वान् सावधान होकर इसे पढ़ता है, वह दृढ़व्रती शिवभक्त हो जाता है । जो निष्काम भावसे इस शिवचरित्रको पढ़ता या सुनता है और शिवव्रत ४६ करता है, वह रुद्रलोकको प्राप्तकर रुद्रका अनुचर हो जाता है । इस प्रकार रुद्रलोकको प्राप्तकर वह रुद्रके साथ आनन्द करता है और हे मुने! उसके बाद शिवजीकी ४७ । कृपासे वह शिवसायुज्य प्राप्त करता है ॥४४–४७ ॥ इति श्रीशिवमहापुराणे तृतीयायां शतरुद्रसंहितायां शरभावतारवर्णनं नाम द्वादशोऽध्यायः ॥ १२ ॥
॥ इस प्रकार श्रीशिवमहापुराणके अन्तर्गत तृतीय शतरुद्रसंहितामें शरभावतारवर्णन नामक बारहवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ १२ ॥
अथ त्रयोदशोऽध्यायः भगवान् शंकरके नन्दीश्वर उवाच
शृणु ब्रह्मसुत प्रीत्या चरितं शशिमौलिनः ।
सोऽवतीर्णो यथा प्रीत्या विश्वानरगृहे शिवः ॥
नाम्ना गृहपतिः सोऽभूदग्निलोकपतिर्मुने ।
अग्निरूपस्तैजसश्च सर्वात्मा परमः प्रभुः ॥
नर्मदायास्तटे रम्ये पुरे नर्मपुरे पुरा ।
पुरारिभक्तः पुण्यात्माभवद्विश्वानरो मुनिः ॥
गृहपति - अवतारकी कथा नन्दीश्वर बोले — हे ब्रह्मपुत्र! अब चन्द्रमाको सिरपर धारण करनेवाले शिवके एक अन्य चरित्रको १ प्रसन्नतापूर्वक सुनिये, जिस प्रकार उन्होंने प्रेमपूर्वक विश्वानरके घरमें जन्म लिया ॥१ ॥
हे मुने! गृहपति नामवाले वे अग्निलोकके २ स्वामी हुए, वे अग्निके सदृश, तेजस्वी, सर्वात्मा एवं परम प्रभु थे । पूर्वकालमें नर्मदाके तटपर नर्मपुरमें शिवजीके भक्त विश्वानर नामवाले पुण्यात्मा मुनि ३ | हुए ॥ २-३ ॥
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अ ० १३ ] शतरुद्रसंहिता
ब्रह्मचर्याश्रमे निष्ठो ब्रह्मयज्ञरतः सदा ।
शाण्डिल्यगोत्रः शुचिमान्ब्रह्मतेजोनिधिर्वशी ॥
विज्ञाताखिलशास्त्रार्थः: सदाचाररतः सदा ।
शैवाचारप्रवीणोऽति लौकिकाचारविद्वरः ॥
चित्ते विचार्य गृहिणीगुणान्विश्वानरः शुभान् ।
उदुवाह विधानेन स्वोचितां कुलकन्यकाम् ॥
अग्निशुश्रूषणरतः पञ्चयज्ञपरायणः ।
षट्कर्मनिरतो नित्यं देवपित्रतिथिप्रियः ॥
एवं बहुतिथे काले गते तस्याग्रजन्मनः ।
भार्या शुचिष्मती नाम भर्तारं प्राह सुव्रता ॥
नाथ भोगा मया सर्वे भुक्ता वै त्वत्प्रसादतः ।
स्त्रीणां समुचिता ये स्युः त्वां समेत्य मुदावहाः ॥
एवं मे प्रार्थितं नाथ चिराय हृदि संस्थितम् ।
गृहस्थानां समुचितं त्वमेतद्दातुमर्हसि ॥
विश्वानर उवाच
किमदेयं हि सुश्रोणि तव प्रियहितैषिणि ।
तत्प्रार्थय महाभागे प्रयच्छाम्यविलम्बितम् ॥
महेशितुः प्रसादेन मम किञ्चिन्न दुर्लभम् ।
इहामुत्र च कल्याणि सर्वकल्याणकारिणः ॥
नन्दीश्वर उवाच
इत्याकर्ण्य वचः पत्युस्तस्य सा पतिदेवता ।
उवाच हृष्टवदना करौ बद्ध्वा विनीतिका ॥
शुचिष्मत्युवाच
वरयोग्यास्मि चेन्नाथ यदि देयो वरो मम ।
महेशसदृशं पुत्रं देहि नान्यं वरं वृणे ॥
६३ वे सदा ब्रह्मचर्याश्रम धर्मका पालन करते हुए ४ नित्य - प्रति ब्रह्मयज्ञ किया करते थे । वे शाण्डिल्यगोत्री थे और बड़े पवित्र, ब्रह्मतेजस्वी तथा जितेन्द्रिय थे ॥ ४ ॥
वे सभी शास्त्रोंके अर्थोंके ज्ञाता, सर्वदा सदाचारमें तत्पर, शैव आचारमें अति प्रवीण तथा लौकिक आचारके ज्ञाताओंमें श्रेष्ठ थे ॥५ ॥
उन्होंने भार्याके उत्तम गुणोंपर विचारकर उचित ६ समयमें विधिपूर्वक अपने योग्य कुलीन कन्यासे विवाह किया ॥६ ॥
वे प्रतिदिन अग्निशुश्रूषा, पंचयज्ञ तथा षट्कर्ममें ७ संलग्न रहते थे और देवता, पितर एवं अतिथियोंका पूजन करते थे ॥७ ॥
इस प्रकार बहुत समय बीत जानेके उपरान्त ८ | [ एक दिन ] उन ब्राह्मणकी शुचिष्मती नामक पतिव्रता पत्नीने पतिसे कहा —॥८ ॥
हे नाथ! मैंने आपकी कृपासे आपके साथ उन ९ सभी भोगोंको भोग लिया है, जो स्त्रियोंके योग्य तथा आनन्ददायक हैं॥९॥
हे नाथ! अब मेरी एक ही विशेष अभिलाषा १० है, जो मेरे हृदयमें चिरकालसे स्थित है और वह गृहस्थोंके लिये उचित भी है, उसे देनेकी कृपा करें ॥ १० ॥
विश्वानर बोले- हे सुश्रोणि! हे प्रियहितैषिणि! मुझे तुम्हारे लिये कुछ भी अदेय नहीं है । हे ११ महाभागे! तुम उसे माँगो, मैं शीघ्र ही प्रदान करूँगा । हे कल्याणि! सम्पूर्ण कल्याण करनेवाले महेश्वरकी १२ कृपासे मुझे इस लोक एवं परलोकमें कुछ भी दुर्लभ नहीं है॥११-१२ ॥ नन्दीश्वर बोले — पतिके इस वचनको सुनकर प्रसन्न मुखवाली वह पतिव्रता स्त्री प्रसन्नतासे विनीत १३ हो दोनों हाथ जोड़कर कहने लगी —॥१३ ॥
शुचिष्मती बोली- हे नाथ! यदि मैं वरके योग्य हूँ और यदि आपको मुझे वर प्रदान करना है तो मुझे शिवके समान पुत्र दीजिये, मैं कोई अन्य वर १४ । नहीं चाहती हूँ ॥१४ ॥
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६४ नन्दीश्वर उवाच इति तस्या वचः श्रुत्वा ब्राह्मणः स शुचिव्रतः क्षणं समाधिमाधाय हृद्येतत्समचिन्तयत्
अहो किं मे तया तन्व्या प्रार्थितं ह्यतिदुर्लभम् ।
मनोरथपथाद्दूरमस्तु वा स हि सर्वकृत् ॥
तेनैवास्या मुखे स्थित्वा वाक्स्वरूपेण शम्भुना ।
व्याहृतं कोऽन्यथा कर्तुमुत्सहेत भवेदिदम् ॥
इति सञ्चिन्त्य स मुनिर्विश्वानर उदारधीः ।
ततः प्रोवाच तां पत्नीमेकपत्नीव्रते स्थितः ॥
नन्दीश्वर उवाच
इत्थमाश्वास्य तां पत्नीं जगाम तपसे मुनिः ।
यत्र विश्वेश्वरः साक्षात्काशीनाथोऽधितिष्ठति ॥
प्राप्य वाराणसीं तूर्णं दृष्ट्वा तां मणिकर्णिकाम् ।
तत्याज तापत्रितयमपि जन्मशतार्जितम् ॥
दृष्ट्वा सर्वाणि लिंगानि विश्वेशप्रमुखानि च ।
स्नात्वा सर्वेषु कुण्डेषु वापीकूपसरस्सु च ॥
नत्वा विनायकान्सर्वान्गौरीं शर्वां प्रणम्य च ।
सम्पूज्य कालराजं च भैरवं पापभक्षणम् ॥
दण्डनायकमुख्यांश्च गणान्स्तुत्वा प्रयत्नतः ।
आदिकेशवमुख्यांश्च केशवं परितोष्य च ॥
लोलार्कमुखसूर्यांश्च प्रणम्य स पुनः पुनः ।
कृत्वा च पिण्डदानानि सर्वतीर्थेष्वतन्द्रितः ॥
सहस्त्रभोजनाद्यैश्च मनीन्विप्रान्प्रतर्प्य च । श्रीशिवमहापुराण [ अ ० १३ नन्दीश्वर बोले- उसके इस वचनको सुनकर | वे पवित्रात्मा ब्राह्मण क्षणभरके लिये समाधिस्थ । होकर अपने हृदयमें विचार करने लगे । अहो! मेरी ॥ १५ इस स्त्रीने अत्यन्त दुर्लभ तथा मनोरथ मार्गसे दूर कैसी | वस्तु माँगी है अथवा वे शिवजी ही सब कुछ पूरा १६ करनेवाले हैं ॥ १५-१६ ॥ उन शम्भुने ही इसके मुखमें वाणीरूपसे स्थित १७ होकर ऐसा कहा है । शिवजीकी यदि ऐसी इच्छा है, तो उसे अन्यथा करनेमें कौन समर्थ हो सकता है!॥ १७ ॥
ऐसा विचारकर उदार बुद्धिवाले तथा एकपत्नी-१८ व्रतमें परायण रहनेवाले विश्वानर मुनिने बादमें उस पत्नीसे कहा- ॥ १८ ॥
नन्दीश्वर बोले- इस प्रकार अपनी पत्नीको [ अनेक प्रकारसे ] आश्वस्त करके मुनि तप करनेके १ ९ लिये वहाँ चले गये, जहाँ साक्षात् काशीनाथ विश्वेश्वर स्थित हैं ॥१ ९ ॥ उन्होंने शीघ्र ही वाराणसी पहुँचकर मणिकर्णिकाका २० दर्शन करके अपने सैकड़ों जन्मोंके अर्जित तीनों तापोंसे मुक्ति प्राप्त कर ली ॥२० ॥
उसके बाद उन्होंने विश्वेश्वर आदि सभी २१ लिंगोंका दर्शन करके काशीस्थ सभी कुण्डों, वापियों एवं सरोवरोंमें स्नान करके, सभी विनायकोंको नमस्कार करके, शिवा गौरीको प्रणाम करके, पापोंका भक्षण २२ करनेवाले कालराज भैरवका भी पूजन किया, फिर प्रयत्नपूर्वक दण्डपाणि विनायक आदि प्रमुख गणोंकी २३ स्तुतिकर, आदिकेशव आदि [ मुख्य द्वादश केशवों ] -को प्रसन्न करके फिर लोलार्क आदि प्रमुख सूर्योंको २४ बार - बार प्रणाम किया, पुनः सभी तीर्थोंमें समाहितचित्त होकर पिण्डदान करके हजारों प्रकारके भोजनादिसे महापूजोपचारैश्च लिंगान्यभ्यर्च्य भक्तितः ॥२५ मुनियों तथा ब्राह्मणोंको सन्तुष्टकर महापूजोपचारसे
असकृच्चिन्तयामास किं लिंगं क्षिप्रसिद्धिदम् ।
यत्र निश्चलतामेति तपस्तनयकाम्यया ॥
क्षणं विचार्य स मुनिरिति विश्वानरः सुधीः ।
क्षिप्रं पुत्रप्रदं लिंगं वीरेशं प्रशशंस ह ॥
भक्तिपूर्वक [ अनेक ] लिंगोंका पूजन करके वे बार-बार विचार करने लगे कि शीघ्र ही सिद्धि प्रदान २६ करनेवाला कौन - सा लिंग है, जहाँ पुत्रकी कामनासे मेरा तप सफल होगा ॥ २१–२६ ॥ उन बुद्धिमान् विश्वानर मुनिने कुछ क्षण ऐसा | विचार करके शीघ्र ही पुत्र देनेवाले वीरेश [ नामक ] २७ लिंगकी प्रशंसा की । [ उन्होंने अपने मनमें विचार किया
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अ ० १३ ] शतरुद्रसंहिता ६५
असंख्याताः सहस्राणि सिद्धाः सिद्धिं गतास्ततः ।
सिद्धलिंगमिति ख्यातं तस्माद्वीरेश्वरं परम् ॥ २८
वीरेश्वरं महालिंगमब्दमभ्यर्च्य भक्तितः ।
आयुर्मनोरथं सर्वं पुत्रादिकमनेकशः ॥ २ ९
अहमप्यत्र वीरेशं समाराध्य त्रिकालतः ।
आशु पुत्रमवाप्स्यामि यथाभिलषितं स्त्रिया ॥ ३०
नन्दीश्वर उवाच
इति कृत्वा मतिं धीरो विप्रो विश्वानरः कृती ।
चन्द्रकूपजले स्नात्वा जग्राह नियमं व्रती ॥ ३१
एकाहारोऽभवन्मासं मासं नक्काशनोऽभवत् ।
अयाचिताशनो मासं मासं त्यक्ताशनः पुनः ॥ ३२
पयोव्रतोऽभवन्मासं मासं शाकफलाशनः ।
मासं मुष्टितिलाहारो मासं पानीयभोजनः ॥ ३३
पञ्चगव्याशनो मासं मासं चान्द्रायणव्रती ।
मासं कुशाग्रजलभुग्मासं श्वसनभक्षणः ॥ ३४
एवमब्दमितं कालं तताप स तपोऽद्भुतम् ।
त्रिकालमर्चयद्भक्त्या वीरेशं लिङ्गमुत्तमम् ॥ ३५
अथ त्रयोदशे मासि स्नात्वा त्रिपथगाम्भसि ।
प्रत्यूष एव वीरेशं यावदायाति स द्विजः ॥ ३६
तावद्विलोकयाञ्चक्रे मध्ये लिंगं तपोधनः ।
विभूतिभूषणं बालमष्टवर्षाकृतिं शिशुम् ॥ ३७
आकर्णायतनेत्रं च सुरक्तदशनच्छदम् ।
चारुपिंगजटामौलिं नग्नं प्रहसिताननम् ॥ ३८
शैशवोचितनेपथ्यधारिणं चितिधारिणम् ।
पठन्तं श्रुतिसूक्तानि हसन्तं च स्वलीलया ॥ ३ ९
तमालोक्य मुदं प्राप्य रोमकञ्चुकितो मुनिः ।
प्रोच्चचार हृदालापान्नमोऽस्त्विति पुनः पुनः ॥ ४०
अभिलाषप्रदैः पद्यैरष्टभिर्बालरूपिणम् ।
तुष्टाव परमानन्दं शंभुं विश्वानरः कृती ॥ ४१
2224 Shivmahapuran_IInd Part_Section_4_1_Front कि ] यह वीरेश्वर सिद्ध लिंग है, [ इसकी पूजाके प्रभावसे ] असंख्य साधक सिद्धिको प्राप्त किये हैं, इसीलिये यह श्रेष्ठ लिंग सबसे अधिक प्रसिद्ध है । लोग भक्तिभावसे समन्वित होकर वर्षपर्यन्त इस वीरेश्वर महालिंगकी पूजा करके आयु तथा पुत्रादि सभी मनोरथ प्राप्त करते हैं । अतः मैं भी यहीं वीरेश लिंगकी त्रिकाल आराधनाकर शीघ्र वैसा ही पुत्र प्राप्त करूँगा, जैसे कि मेरी स्त्रीने अभिलाषा की है ॥ २७–३० ॥ नन्दीश्वर बोले- ऐसा विचारकर बुद्धिमान्, पुण्यात्मा तथा व्रती ब्राह्मण विश्वानरने चन्द्रकूपके जलमें स्नानकर नियम धारण किया ॥ ३१ ॥
उन्होंने एक मासपर्यन्त दिनमें एकाहार, एक मास-पर्यन्त रात्रिमें एकाहार, एक मासपर्यन्त अयाचित आहार पुनः एक मासतक निराहार रहकर तप किया ॥ ३२ ॥
वे एक महीनेतक दूध पीकर, एक महीनेतक शाक - फल खाकर, एक महीनेतक मुट्ठीभर तिल खाकर और एक महीने पानी पीकर रहे ॥ ३३ ॥
वे एक महीनेतक पंचगव्य पीकर, एक मासतक चान्द्रायणव्रतकर, एक मासतक कुशाग्रका जल पीकर पुनः एक महीने वायु भक्षणकर रहने लगे ॥ ३४ ॥
उत्तम वीरेश्वरलिंगकी भक्तिपूर्वक पूजा करते हुए इस प्रकार उन्होंने एक वर्षतक अद्भुत तप किया ॥ ३५ ॥
उसके बाद तेरहवें महीनेमें गंगाके जलमें प्रात: काल स्नानकर ज्यों ही वे ब्राह्मण वीरेश्वरकी ओर आये, उसी समय उन तपोधनने [ वीरेश्वर ] लिंगके मध्यमें विभूतिसे विभूषित, आठ वर्षकी आकृतिवाले एक बालकको देखा । उस बालककी आँखें कानोंतक फैली हुई थीं, उसके ओठ गहरे लाल थे, मस्तकपर अत्यन्त पिंगलवर्णकी जटा शोभा पा रही थी, वह नग्न तथा प्रसन्नमुख था और बालोचित वेशभूषा तथा चिताका भस्म धारण किये हुए श्रुतिके सूक्तोंका पाठ करता हुआ लीलापूर्वक हँस रहा था ॥ ३६- ३ ९ ॥ उसे देखकर आनन्दित होकर रोमांचयुक्त विश्वानर मुनिने बार - बार हृदयसे ' नमोऽस्तु ' कहकर प्रणाम किया । तदनन्तर विश्वानर मुनि कृतार्थ होकर अभिलाषा पूर्ण करनेवाले आठ पद्योंसे बालकरूपधारी परमानन्द-| स्वरूप शिवकी स्तुति करने लगे॥४०-४१ ॥
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श्रीशिवमहापुराण [ अ ० १३ ६६ विश्वानर उवाच विश्वानर बोले- यह सब कुछ एक अद्वितीय समस्तं ब्रह्म ही है, वही सत्य है, वही सत्य है, सर्वत्र उस एकं ब्रह्मैवाद्वितीयं । । ब्रह्मके अतिरिक्त कुछ भी नहीं है । वह ब्रह्म एकमात्र सत्यं सत्यं नेह नानास्ति किञ्चित् एको रुद्रो न द्वितीयोऽवतस्थे तस्मादेकं त्वां प्रपद्ये महेशम् कर्ता हर्ता त्वं हि सर्वस्य शम्भो नानारूपेष्वेकरूपोऽप्यरूपः यद्वत्प्रत्यग्धर्म एकोऽप्यनेक-स्तस्मान्नान्यं त्वां विनेशं प्रपद्ये रज्जौ सर्पः शुक्तिकायां च रौप्यं नैरः पूरस्तन्मृगाख्ये मरीचौ यद्यत्सद्वद्विष्वगेव प्रपञ्चो यस्मिन् ज्ञाते तं प्रपद्ये महेशम् ॥ तोये शैत्यं दाहकत्वं च वह्नौ
तापो भानौ शीतभानौ प्रसादः ।
पुष्पे गन्धो दुग्धमध्येऽपि सर्पि-र्यत्तच्छंभो त्वं ततस्त्वां प्रपद्ये ॥
शब्दं गृह्णास्यश्रवास्त्वं हि जिघ्र-स्यघ्राणस्त्वं व्यंघ्रिरायासि दूरात् । व्यक्षः पश्येस्त्वं रसज्ञोऽप्यजिह्वः कस्त्वां सम्यग्वेत्त्यतस्त्वां प्रपद्ये ॥ नो वेद त्वामीश साक्षाद्धि वेदो नो वा विष्णुर्नो विधाताखिलस्य । नो योगीन्द्रा नेन्द्रमुख्याश्च देवा भक्तो वेद त्वामतस्त्वां प्रपद्ये ॥ नो ते गोत्रं नेश जन्मापि नाख्या नो वा रूपं नैव शीलं न देशः । इत्थम्भूतोऽपीश्वरस्त्वं त्रिलोक्याः सर्वान्कामान्पूरयेस्त्वं भजे त्वाम् ॥ | ही है और दूसरा कोई नहीं है, इसलिये मैं एकमात्र ॥ ४२ आप महेश्वरकी शरण प्राप्त करता हूँ ॥ ४२ ॥
हे शम्भो! एक आप ही सबका सृजन करनेवाले तथा हरण करनेवाले हैं, आप रूपविहीन होकर भी अनेक रूपोंमें एक रूपवाले हैं, जैसे आत्मधर्म एक होता हुआ भी अनेक रूपोंवाला है, इसलिये मैं आप ॥ ४३ महेश्वरको छोड़कर किसी अन्यकी शरण नहीं प्राप्त करना चाहता हूँ ॥४३ ॥
जिस प्रकार रस्सीमें साँप, सीपीमें चाँदी और मृगमरीचिकामें जलप्रवाह [ मिथ्या ] भासित होता है, । उसी प्रकार [ आपमें ] यह सारा प्रपंच भासित हो रहा है । जिसके जान लेनेपर इस प्रपंचका मिथ्यात्व ४४ भलीभाँति ज्ञात हो जाता है, मैं उन महेश्वरकी शरण प्राप्त करता हूँ ॥४४ ॥
हे शम्भो! जिस प्रकार जलमें शीतलता, अग्निमें दाहकता, सूर्यमें ताप, चन्द्रमामें आह्लादकत्व, पुष्पमें गन्ध एवं दुग्धमें घृत व्याप्त रहता है, उसी प्रकार ४५ सर्वत्र आप ही व्याप्त हैं, अतः मैं आपकी शरण प्राप्त करता हूँ ॥४५ ॥
हे प्रभो! आप कानोंके बिना सुनते हैं, नाकके बिना सूँघते हैं, बिना पैरके दूरसे आते हैं, बिना आँखके देखते हैं और बिना जिह्वाके रस ग्रहण करते ४६ हैं, अतः आपको भलीभाँति कौन जान सकता है । इस प्रकार मैं आपकी शरण प्राप्त करता हूँ ॥४६ ॥
हे ईश! आपको न साक्षात् वेद, न विष्णु, न सर्वस्रष्टा ब्रह्मा, न योगीन्द्र और न तो इन्द्रादि देवगण ही जान सकते हैं, केवल भक्त ही आपको जान पाता ४७ है, अतः मैं आपकी शरण प्राप्त करता हूँ ॥४७ ॥
हे ईश! आपका न तो गोत्र है, न जन्म है, न आपका नाम है, न आपका रूप है, न शील है एवं न देश । ऐसा होते हुए भी आप तीनों लोकोंके स्वामी हैं और आप समस्त मनोरथोंको पूर्ण करते हैं, अतः ४८ मैं आपका भजन करता हूँ ॥ ४८ ॥
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अ ० १३ ] शतरुद्रसंहिता ६७ त्वत्तः सर्वं त्वं हि सर्वं स्मरारे
त्वं गौरीशस्त्वं च नग्नोऽतिशान्तः ।
त्वं वै वृद्धस्त्वं युवा त्वं च बाल-स्तत्त्वं यत्किं नान्यतस्त्वां नतोऽहम् ॥ ४ ९
नन्दीश्वर उवाच स्तुत्वेति विप्रो निपपात भूमौ संबद्धपाणिर्भवतीह यावत् । तावत्स बालोऽखिलवृद्धवृद्धः प्रोवाच भूदेवमतीव हृष्टः ॥ ५० बाल उवाच
विश्वानर मुनिश्रेष्ठ भूदेवाहं त्वयाद्य वै ।
तोषितः सुप्रसन्नात्मा वृणीष्व वरमुत्तमम् ॥ ५१
तत उत्थाय हृष्टात्मा मुनिर्विश्वानरः कृती ।
प्रत्यब्रवीन्मुनिश्रेष्ठः शङ्करं बालरूपिणम् ॥५२
विश्वानर उवाच
महेश्वर किमज्ञातं सर्वज्ञस्य तव प्रभो ।
सर्वान्तरात्मा भगवान् शर्वः सर्वप्रदो भवान् ॥ ५३
याच्यां प्रति नियुक्तं मां किं ब्रूषे दैन्यकारिणीम् ।
इति ज्ञात्वा महेशान यथेच्छसि तथा कुरु ॥ ५४
नन्दीश्वर उवाच
इति श्रुत्वा वचस्तस्य देवो विश्वानरस्य हि ।
शुचिः शुचिव्रतस्याथ शुचिं स्मित्वाब्रवीच्छिशुः ॥ ५५
त्वया शुचे शुचिष्मत्यां योऽभिलाषः कृतो हृदि ।
अचिरेणैव कालेन स भविष्यत्यसंशयम् ॥ ५६
तव पुत्रत्वमेष्यामि शुचिष्मत्यां महामते ।
ख्यातो गृहपतिर्नाम्ना शुचिः सर्वामरप्रियः ॥ ५७
अभिलाषाष्टकं पुण्यं स्तोत्रमेतत्त्वयेरितम् ।
अब्दत्रिकालपठनात्कामदं शिवसन्निधौ ॥ ५८
एतत्स्तोत्रप्रपठनं पुत्रपौत्रधनप्रदम् ।
सर्वशान्तिकरं चापि सर्वापत्तिविनाशनम् ॥ ५ ९
हे कामशत्रो! सब कुछ आपसे है और आप ही सब कुछ हैं, आप पार्वतीपति हैं, आप दिगम्बर एवं अत्यन्त शान्त हैं । आप वृद्ध, युवा और बालक हैं । कौन ऐसा पदार्थ है, जो आप नहीं हैं, अतः मैं आपको नमस्कार करता हूँ ॥४ ९ ॥ नन्दीश्वर बोले- इस प्रकार स्तुतिकर हाथ जोड़े हुए वे ब्राह्मण जबतक पृथ्वीपर गिरते, तबतक वह बालक वृद्धोंके भी वृद्ध पुरातन पुरुषके रूपमें अत्यन्त प्रसन्न होकर ब्राह्मणसे कहने लगा- ॥ ५० ॥
बालक बोला- हे विश्वानर! हे मुनिश्रेष्ठ! हे
ब्राह्मण! आपने आज मुझे अत्यन्त सन्तुष्ट कर दिया ।
अतः आप प्रसन्नचित्त होकर उत्तम वर माँगिये ॥ ५१ ॥
तब मुनियोंमें श्रेष्ठ वे विश्वानर मुनि प्रसन्नचित्त हो उठकर बालकरूपी शिवजीसे कहने लगे ॥५२ ॥
विश्वानर बोले- हे महेश्वर! आप तो सर्वज्ञ हैं, अतः आपसे कौन ऐसी बात है, जो छिपी रह सकती है । हे प्रभो! आप सर्वान्तरात्मा, भगवान्, शर्व तथा सब कुछ प्रदान करनेवाले हैं ॥५३ ॥
दीनता प्रकट करनेवाली याचनाके लिये मुझे नियुक्त करके आप मुझसे क्या कहलाना चाहते हैं, हे महेशान! ऐसा जानकर आप जैसा चाहते हैं, वैसा करें ॥ ५४ ॥
नन्दीश्वर बोले- पवित्र व्रत करनेवाले उन विश्वानरके इस पवित्र वचनको सुनकर परम पवित्र उस बालकरूप महादेवने मन्द मन्द मुसकराकर कहा- ॥ ५५ ॥
हे शुचे! आपने शुचिष्मतीमें हृदयसे जो इच्छा की है, वह थोड़े ही दिनोंमें निःसन्देह पूर्ण हो जायगी ॥५६ ॥
हे महामते! मैं शुचिष्मतीके गर्भसे आपके पुत्ररूपमें जन्म लूँगा और शुद्धात्मा तथा सभी देवताओंको प्रिय मैं गृहपति नामसे प्रसिद्ध होऊँगा ॥५७ ॥
आपके द्वारा कहा गया यह पवित्र अभिलाषाष्टकस्तोत्र एक वर्षपर्यन्त तीनों कालमें शिवकी सन्निधिमें पढ़ते रहनेपर [ मनुष्योंको ] सम्पूर्ण कामनाओंको देनेवाला होगा ॥५८ ॥
इस स्तोत्रका पाठ पुत्र - पौत्र- धन प्रदान करनेवाला, सभी प्रकारकी शान्ति करनेवाला तथा सम्पूर्ण आपत्तियोंका | विनाश करनेवाला है और यह स्वर्ग, मोक्ष तथा 2224 Shivmahapuran_IInd Part_Section_4_2_Front
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श्रीशिवमहापुराण [ अ ० १४ ६८
स्वर्गापवर्गसम्पत्तिकारकं नात्र संशयः ।
सर्वस्तोत्रसमं ह्येतत्सर्वकामप्रदं सदा ॥ ६०
प्रातरुत्थाय सुस्नातो लिंगमभ्यर्च्य शाम्भवम् ।
वर्षं जपन्निदं स्तोत्रमपुत्रः पुत्रवान्भवेत् ॥ ६१
अभिलाषाष्टकमिदं न देयं यस्य कस्यचित् ।
गोपनीयं प्रयत्नेन महावन्ध्याप्रसूतिकृत् ॥ ६२
स्त्रिया वा पुरुषेणापि नियमाल्लिंगसन्निधौ ।
अब्दं जप्तमिदं स्तोत्रं पुत्रदं नात्र संशयः ॥ ६३
नन्दीश्वर उवाच
इत्युक्त्वान्तर्दधे शम्भुर्बालरूपः सतां गतिः ।
सोऽपि विश्वानरो विप्रो हृष्टात्मा स्वगृहं ययौ ॥ ६४ ।
इति श्रीशिवमहापुराणे तृतीयायां शतरुद्रसंहितायां ॥ इस प्रकार श्रीशिवमहापुराणके अन्तर्गत । सम्पत्ति देनेवाला है, इसमें संशय नहीं है । यह स्तोत्र अकेला ही सभी स्तोत्रोंके तुल्य है तथा सम्पूर्ण कामनाओंको प्रदान करनेवाला है ॥ ५ ९ -६० ॥ प्रात: काल उठकर भली - भाँति स्नान करके शिव - लिंगकी पूजाकर वर्षपर्यन्त इस स्तोत्रका पाठ करता हुआ पुत्रहीन मनुष्य पुत्रवान् हो जाता है ॥ ६१ ॥
इस अभिलाषाष्टकस्तोत्रको जिस किसीको नहीं बताना चाहिये और इसे प्रयत्नपूर्वक गुप्त रखना | चाहिये, यह महावन्ध्या स्त्रीको भी सन्तान देनेवाला है ॥ ६२ ॥
जो स्त्री अथवा पुरुष नियमपूर्वक शिवलिंगके समीप एक वर्षपर्यन्त इस स्तोत्रका पाठ करता है, उसे यह स्तोत्र पुत्र प्रदान करता है, इसमें सन्देह नहीं है ॥६३ ॥
नन्दीश्वर बोले - – ऐसा कहकर सज्जनोंको गति प्रदान करनेवाले बालक - रूपधारी शिवजी अन्तर्धान हो गये और वे विश्वानर ब्राह्मण भी प्रसन्नचित्त होकर अपने घर चले गये ॥ ६४ ॥
गृहपत्यवतारवर्णनं नाम त्रयोदशोऽध्यायः ॥ १३ ॥
तृतीय शतरुद्रसंहितामें गृहपत्यवतारवर्णन नामक तेरहवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ १३ ॥
अथ चतुर्दशोऽध्यायः विश्वानरके पुत्ररूपमें नन्दीश्वर उवाच
स विप्रो गृहमागत्य महाहर्षसमन्वितः ।
प्रियायै कथयामास तद्वृत्तान्तमशेषतः ॥
तच्छ्रुत्वा विप्रपत्नी सा मुदं प्राप शुचिष्मती ।
अतीव प्रेमसंयुक्ता प्रशशंस विधिं निजम् ॥
अथ कालेन तद्योषिदन्तर्वत्नी बभूव ह ।
विधिवद् विहिते तेन गर्भाधानाख्यकर्मणि ॥
ततः पुंसवनं तेन स्पन्दनात्प्राग्विपश्चिता ।
गृह्योक्तविधिना सम्यक् कृतं पुंस्त्वविवृद्धये ॥
गृहपति नामसे शिवका प्रादुर्भाव नन्दीश्वर बोले - हे सनत्कुमार! घर आकर उस ब्राह्मणने परम हर्षसे युक्त होकर अपनी स्त्रीसे १ सारा वृत्तान्त कह सुनाया ॥ १ ॥
यह सुनकर उस विप्रपत्नी शुचिष्मतीको महान् २ आनन्द प्राप्त हुआ और वह प्रेमयुक्त होकर अपने भाग्यकी सराहना करने लगी ॥२ ॥
तदनन्तर कुछ समयके बाद उस ब्राह्मणद्वारा ३ यथाविधि गर्भाधानकर्म किये जानेपर उसकी पत्नी गर्भवती हुई ॥३ ॥
तत्पश्चात् उस विद्वान् ब्राह्मणने गृह्यसूत्रमें कथित विधिके अनुसार पुंस्त्वकी वृद्धिके लिये गर्भस्पन्दनके ४ पहले ही भलीभाँति पुंसवन संस्कार किया ॥४ ॥
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