शिव महापुराण - २ — पृष्ठ 81–90
शिव महापुराण - २ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 81–90
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अ ० १४ ] शतरुद्रसंहिता ६ ९
सीमन्तोऽथाष्टमे मासे गर्भरूपसमृद्धिकृत् ।
सुखप्रसवसिद्धौ च तेनाकारि क्रियाविदा ॥
अथातः शुभतारासु ताराधिपवराननः ।
केन्द्रे गुरौ शुभे लग्ने सुग्रहेषु युगेषु च ॥
अरिष्टदीपनिर्वाणः सर्वारिष्टविनाशकृत् ।
तनयो नाम तस्यां तु शुचिष्मत्यां बभूव ह ॥
शर्वः समस्तसुखदो भूर्भुवः स्वर्निवासिनाम् ।
गन्धवाहनवाहाश्च दिग्वधूर्मुखवाससः ॥
इष्टगन्धप्रसूनौघैर्ववृषुस्ते घनाघनाः ।
देवदुन्दुभयो नेदुः प्रसेदुः सर्वतो दिशः ॥
परितः सरितः स्वच्छा भूतानां मानसैः सह ।
तमोऽताम्यत्तु नितरां रजोऽपि विरजोऽभवत् ॥
सत्त्वाः सत्त्वसमायुक्ताः सुधावृष्टिर्बभूव वै ।
कल्याणी सर्वथा वाणी प्राणिनः प्रियवत्यभूत् ॥
रंभामुख्या अप्सरसो मङ्गलद्रव्यपाणयः ।
विद्याधर्यश्च किन्नर्यस्तथामर्यः सहस्रशः ॥
गन्धर्वोरगयक्षाणां सुमानिन्यः शुभस्वराः । तत्पश्चात् आठवाँ महीना आनेपर क्रियावेत्ता ५ उस ब्राह्मणने सुखपूर्वक प्रसवके लिये गर्भके रूपकी वृद्धि करनेवाला सीमन्त - संस्कार कराया ॥ ५ ॥
तदुपरान्त ताराओंके अनुकूल होनेपर बृहस्पतिके ६ केन्द्रवर्ती होनेपर और शुभ ग्रहोंका योग होनेपर शुभ लग्नमें चन्द्रमाके समान सुन्दर मुखवाला सूतिकागृहके दीपकको अपने तेजसे शान्त अर्थात् प्रभाहीन - सा ७ करनेवाला तथा सभी अरिष्टोंका विनाश करनेवाला पुत्र उस शुचिष्मतीके गर्भसे उत्पन्न हुआ ॥ ६-७ ॥ वह बालक शिवजी ही थे, जो भूर्भुवः स्वः-८ इन तीनों लोकोंको समग्र सुख देनेके लिये अवतीर्ण हुए । उस समय गन्धको समग्र वहन करनेवाले वायुके वाहन ( मेघ ) दिशारूपी वधुओंके मुखपर वस्त्रसे बन गये अर्थात् चारों ओर काली घटा उमड़ आयी । वे ९ घनघोर बादल गन्धवाली पुष्पराशिकी वर्षा करने लगे । देवदुन्दुभियाँ बज उठीं और सारी दिशाएँ निर्मल हो गयीं । प्राणियोंके मनोंके साथ चारों ओर नदियाँ १० स्वच्छ हो गयीं, अन्धकार पूर्णरूपसे दूर हो गया, रजोगुण विरज अर्थात् विनष्ट हो गया । प्राणी सत्त्वगुणसे सम्पन्न हो गये । [ चारों ओरसे ] अमृतकी ११ वर्षा होने लगी । सभी प्राणियोंकी वाणी कल्याणकारी और प्रिय लगनेवाली हो गयी ॥ ८-११ ॥ रम्भा आदि अप्सराएँ, विद्याधरियाँ, किन्नरियाँ, १२ देवपत्नियाँ और गन्धर्व - उरग एवं यक्षोंकी पत्नियाँ हजारोंकी संख्यामें अपने - अपने हाथोंमें मंगल - द्रव्य धारण किये हुए सुन्दर स्वरोंमें मंगल गीत गाती हुई गायन्त्यो मंगलं गीतं तत्राजग्मुरनेकशः ॥१३ वहाँ आ गयीं॥१२-१३ ॥
मरीचिरत्रिः पुलहः पुलस्त्यः क्रतुरङ्गिराः ।
वसिष्ठः कश्यपोऽगस्त्यो विभाण्डो माण्डवीसुतः ॥
लोमशो रोमचरणो भरद्वाजोऽथ गौतमः ।
भृगुस्तु गालवो गर्गो जातूकर्ण्यः पराशरः ॥
आपस्तम्बो याज्ञवल्क्यो दक्षवाल्मीकिमुद्गलाः ।
शातातपश्च लिखितः शिलादः शंख उञ्छभुक् ॥
जमदग्निश्च संवर्ती मतंगो भरतोंऽशुमान् ।
व्यासः कात्यायनः कुत्सः शौनकः सुश्रुतः शुकः ॥
मरीचि, अत्रि, पुलह, पुलस्त्य, क्रतु, अंगिरा, १४ वसिष्ठ, कश्यप, अगस्त्य, विभाण्ड, माण्डवीपुत्र लोमश, रोमचरण, भरद्वाज, गौतम, भृगु, गालव, १५ गर्ग, जातूकर्ण्य, पराशर, आपस्तम्ब, याज्ञवल्क्य, दक्ष, वाल्मीकि, मुद्गल, शातातप, लिखित, शिलाद, १६ उंछवृत्तिसे जीविका चलानेवाले शंख, जमदग्नि, संवर्त, मतंग, भरत, अंशुमान्, व्यास, कात्यायन, १७ कुत्स, शौनक, सुश्रुत, शुक, ऋष्यशृंग, दुर्वासा, शुचि,
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श्रीशिवमहापुराण [ अ ० १४ ७०
दुर्वासाः शुचिर्नारदतुम्बुरू ।
ऋष्यशृङ्गोऽथ पवनोऽसितदेवलौ ॥
उत्तंको वामदेवश्च भार्गवः ।
सालङ्कायनहारीतौ विश्वामित्रोऽथ ॥
मृकण्डः सह पुत्रेण, पर्वतो दारुकस्तथा
धौम्योपमन्युवत्साद्या मुनयो मुनिकन्यकाः ।
तच्छान्त्यर्थं समाजग्मुर्धन्यं विश्वानराश्रमम् ॥
ब्रह्मा बृहस्पतियुतो देवो गरुडवाहनः ।
नन्दिभृङ्गिसमायुक्तो गौर्या सह वृषध्वजः ॥
महेन्द्रमुख्या गीर्वाणा नागाः पातालवासिनः ।
रत्नान्यादाय बहुशः ससरित्का महाब्धयः ॥
स्थावरा जंगमं रूपं धृत्वायाताः सहस्रशः ।
महामहोत्सवे तस्मिन् बभूवाकालकौमुदी ॥
जातकर्म स्वयं तस्य कृतवान्विधिरानतः ।
श्रुतिं विचार्य तद्रूपं नाम्ना गृहपतिस्त्वयम् ॥
इति नाम ददौ तस्मै देयमेकादशेऽहनि ।
नामकर्मविधानेन तदर्थं श्रुतिमुच्चरन् ॥
चतुर्निगममन्त्रोक्तैराशीर्भिरभिनन्द्य च ।
समयाद्धं समारुह्य सर्वेषां च पितामहः ॥
कृत्वा बालोचितां रक्षां लौकिकीं गतिमाश्रितः ।
आरुह्य यानं स्वं धाम हरोऽपि हरिणा ययौ ॥
अहो रूपमहो तेजस्त्वहो सर्वांगलक्षणम् ।
अहो शुचिष्मतीभाग्यमाविरासीत्स्वयं हरः ॥
अथवा किमिदं चित्रं शर्वभक्तजनेष्वहो ।
स्वयमाविरभूद् रुद्रो यतो रुद्रस्तदर्चितः ॥
इति स्तुवन्तस्तेऽन्योऽन्यं सम्प्रहृष्टतनूरुहाः
।
विश्वानरं समापृच्छ्य जग्मुः सर्वे ` यथागतम् ॥
अतः पुत्रं समीहन्ते गृहस्थाश्रमवासिनः ।
पुत्रेण लोकाञ्जयति श्रुतिरेषा सनातनी ॥
| नारद, तुम्बुरु, उत्तंक, वामदेव, पवन, असित, देवल १८ सालंकायन, हारीत, विश्वामित्र, भार्गव, अपने, [ मार्कण्डेय ] -के साथ मृकण्ड, पर्वत, दारुक धौम्य पुत्र १ ९ उपमन्यु, वत्स आदि मुनिगण तथा मुनिकन्याएँ , उ, | बालककी [ अदृष्ट ] शान्तिके लिये विश्वानरके प्रशंसनीय २० आश्रमपर आ गये॥१४–२० ॥ बृहस्पतिसहित ब्रह्मा तथा भगवान् विष्णु, नन्दी भृंगी तथा पार्वतीसहित शंकर, महेन्द्र आदि देवता, २१ | पातालवासी नागगण एवं अनेक प्रकारके रत्न लेकर, | नदियोंसहित समुद्र वहाँ गये और स्थावर [ पर्वत २२ आदि ] हजारोंकी संख्यामें जंगमरूप धारणकर वहाँ आये । उस महोत्सवमें अचानक असमयमें चाँदनी २३ उत्पन्न हो गयी॥२१–२३ ॥ उसके बाद ब्रह्माने विनम्र होकर स्वयं उसका २४ जातकर्म - संस्कार किया, फिर वेदविधिका विचार करके ग्यारहवें दिन उसके रूपको देखकर उसका नाम गृहपति रखा । उन्होंने नामकरणके समय श्रुतिके २५ मन्त्रोंका उच्चारण करते हुए चारों वेदोंके चार मन्त्रोंसे उसे आशीर्वाद देकर लौकिक रीतिका आश्रय लेकर २६ [ रक्षामन्त्रोंसे ] उसकी बालोचित रक्षा सम्पन्न की और हंसपर सवार हो सबके पितामह वे ब्रह्माजी अपने धामको चले गये । इसी प्रकार विष्णुके साथ २७ शंकर भी अपने वाहनपर सवार हो अपने लोकको चले गये॥२४–२७ ॥ वे आपसमें विचार कर रहे थे कि अहो! कैसा २८ इसका रूप है, इसका विलक्षण तेज कैसा है और इसके सभी अंगलक्षण कैसे हैं, देखो शुचिष्मती कैसी भाग्यवती है कि [ इसके गर्भसे ] साक्षात् शिवजी २ ९ प्रकट हो गये अथवा शिवजीके भक्तोंमें इस प्रकारकी घटना कोई आश्चर्यकी बात नहीं है; जिससे उनके द्वारा अर्चित रुद्र स्वयं प्रकट हो गये ॥ २८-२९ ॥ इस प्रकार आपसमें प्रशंसा करते हुए पुलकित ३० रोमोंवाले सभी देवता विश्वानरसे आज्ञा ले जिस प्रकार आये थे, उसी प्रकार चले गये ॥३० ॥
पुत्रवान् व्यक्ति पुत्रसे लोकोंको जीतता है - यह | सनातनी श्रुति है, इसीलिये समस्त गृहस्थ पुत्रकी ३१ । कामना करते हैं ॥ ३१ ॥
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अ ० १४ ] शतरुद्रसंहिता ७१
अपुत्रस्य गृहं शून्यमपुत्रस्यार्जनं वृथा ।
अपुत्रस्य तपश्छिन्नं नो पवित्रत्यपुत्रतः ॥
न पुत्रात्परमो लाभो न पुत्रात्परमं सुखम् ।
न पुत्रात्परमं मित्रं परत्रेह च कुत्रचित् ॥
निष्क्रमोऽथ चतुर्थेऽस्य मासि पित्रा कृतो गृहात् ।
अन्नप्राशनमब्दार्द्धे चूडाब्दे चार्थवत्कृता ॥
कर्णवेधं ततः कृत्वा श्रवणर्क्षे स कर्मवित् ।
ब्रह्मतेजोभिवृद्ध्यर्थं पञ्चमेऽब्दे व्रतं ददौ ॥
उपाकर्म ततः कृत्वा वेदानध्यापयत्सुधीः ।
त्र्यब्दं वेदान्स विधिनाध्यैष्ट सांगपदक्रमान् ॥
विद्याजातं समस्तं च साक्षिमात्रं गुरोर्मुखात् ।
विनयादिगुणानाविष्कुर्वञ्जग्राह शक्तिमान् ॥
ततोऽथ नवमे वर्षे पित्रोः शुश्रूषणे रतम् ।
विश्वानरं गृहपतिं द्रष्टुमायाच्च नारदः ॥
विश्वानरोटजं प्राप्य देवर्षिस्तं तु कौतुकी ।
अपृच्छत्कुशलं तत्र गृहीतार्घासनः क्रमात् ॥
ततः सर्वं च तद्भाग्यं पुत्रधर्मं च सम्मुखे । विश्वानरं समवदत्स्मृत्वा शिवपदाम्बुजम् नन्दीश्वर उवाच मुनिना बालः पित्रोराज्ञामवाप्य सः पुत्रहीनका घर सूना है, पुत्रहीनका धन कमाना ३२ व्यर्थ है, अपुत्रका तप खण्डित है, जिसको पुत्र नहीं है, वह कभी पवित्र नहीं होता ॥३२ ॥
पुत्रसे बढ़कर कोई परम लाभ नहीं, पुत्रसे ३३ बढ़कर कोई परम सुख नहीं और इस लोक तथा परलोकमें पुत्रसे बढ़कर कोई परम मित्र नहीं है ॥ ३३ ॥
चौथे महीनेमें गृहपतिके पिताने उसका ३४ गृहनिष्क्रमण - संस्कार किया । फिर छठे महीनेमें उसका विधिपूर्वक अन्न - प्राशन और वर्ष पूरा होनेपर । चूडाकरणसंस्कार किया ॥३४ ॥
इसके बाद उस कर्मवेत्ताने श्रवणनक्षत्रमें कर्णवेध ३५ करके उसके ब्रह्मतेजकी अभिवृद्धिके लिये पाँच वर्षकी अवस्थामें यज्ञोपवीत - संस्कार किया ॥ ३५ ॥
पुनः बुद्धिमान् पिताने उपाकर्मकर उसे वेदोंका ३६ अध्ययन कराया । इस प्रकार तीन वर्षमें ही उसने विधिपूर्वक अंग, पद तथा क्रमसहित समस्त वेदोंको | पढ़ लिया ॥ ३६ ॥
प्रतिभाशाली उस बालकने गुरु पिताके मुखसे ३७ समस्त विद्याएँ अपने विनय आदि गुणोंको प्रकाशित करते हुए मात्र साक्षिभावसे ग्रहण कर लिया ॥ ३७ ॥
तदुपरान्त नौवें वर्षमें माता - पिताकी सेवामें निरत ३८ गृहपति तथा उसके पिता विश्वानरको देखनेके लिये नारदजी [ वहाँ ] आये ॥ ३८ ॥
कौतुकी देवर्षि नारदजीने विश्वानरकी पर्णशालामें ३ ९ प्रवेशकर अर्घ्य, आसन आदि क्रमसे ग्रहणकर उनसे कुशल - मंगल पूछा और उसके बाद शिवके चरणोंका ध्यान करके उनके सामने ही उनके समग्र भाग्य तथा ॥ ४० पुत्रधर्मका वर्णन विश्वानरसे किया ॥३ ९ -४० ॥ नन्दीश्वर बोले - [ हे सनत्कुमार! तदुपरान्त ] । मुनि नारदजीके द्वारा इस प्रकार कहे जानेपर वह इत्युक्तो भक्त्या प्रह्न उपाविशत् ॥ ४१ शोभासम्पन्न बालक माता - पिताकी आज्ञा प्राप्तकर प्रणम्य नारदं श्रीमान् भक्तिपूर्वक उनको नम्रतासे प्रणामकर बैठ गया ॥ ४१ ॥
नारद उवाच नारदजी बोले - हे वैश्वानर! मैं तुम्हारे लक्षणोंकी वैश्वानर समभ्येहि ममोत्संगे निषीद भोः । परीक्षा करूँगा, तुम आओ, मेरी गोदमें बैठ जाओ और लक्षणानि परीक्षेऽहं पाणिं दर्शय दक्षिणम् ॥ ४२ अपना दाहिना हाथ मुझे दिखाओ । तब विद्वान् नारदजी ` दृष्ट्वा तु सर्वं हि तालुजिह्वादि नारदः । बालकके तालु, जिह्वा आदिको देखकर शिवजीकी विश्वानरं समवदच्छिवप्रेरणया सुधीः ॥ ४३ | प्रेरणासे विश्वानरसे कहने लगे - ॥ ४२-४३ ॥
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श्रीशिवमहापुराण [ अ ० १५ ७२ नारदजी बोले - हे विश्वानर! हे मुने! मैं नारद उवाच | पुत्रके सब लक्षणोंको कहता हूँ, उसे आदरपूर्वक आपके विश्वानर मुने वच्मि शृणु पुत्राङ्कमादरात् । | आपके पुत्रके सभी अंग उत्तम लक्षणोंसे युक्त हैं इसलिये सुनिये, सर्वांगस्वङ्कवान्पुत्रो महालक्षणवानयम् ॥ ४४ अत्यन्त भाग्यशाली है । किंतु इसके सर्वगुणसम्पन्न ,
किन्तु सर्वगुणोपेतं सर्वलक्षणलक्षितम् ।
सम्पूर्णनिर्मलकलं पालयेद्विधुवद्विधिः ॥
तस्मात्सर्वप्रयत्नेन रक्षणीयस्त्वसौ शिशुः ।
गुणोऽपि दोषतां याति वक्रीभूते विधातरि ॥
शंकेऽस्य द्वादशे वर्षे प्रत्यूहो विद्युदग्नितः ।
इत्युक्त्वा नारदोऽगच्छद्देवलोकं यथागतम् ॥
| यह | सम्पूर्ण शुभ लक्षणोंसे समन्वित और चन्द्रमाके स समान, ४५ निर्मल कलाओंसे सुशोभित होनेपर भी विधाता ही इसकी । रक्षा करें । इसलिये सब तरहके उपायोंसे इस बालककी | रक्षा करनी चाहिये; क्योंकि विधाताके विपरीत होनेपर ४६ गुण भी दोष हो जाता है । मुझे इस बातकी शंका है कि । बारहवें वर्षमें इसे बिजली अथवा अग्निसे विघ्न है । | ऐसा कहकर नारदजी जैसे आये थे, वैसे देवलोकको ४७ | चले गये॥४४–४७ ॥ इति श्रीशिवमहापुराणे तृतीयायां शतरुद्रसंहितायां गृहपत्यवतारोपाख्याने गृहपत्यवतारवर्णनं नाम चतुर्दशोऽध्यायः ॥ १४ ॥
॥ इस प्रकार श्रीशिवमहापुराणके अन्तर्गत तृतीय शतरुद्रसंहितामें गृहपत्यवतारवर्णन नामक चौदहवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ १४ ॥
अथ पञ्चदशोऽध्यायः भगवान् शिवके गृहपति नन्दीश्वर उवाच
विश्वानरः सपत्नीकः नारदेरितम् ।
तदेवं मन्यमानोऽभूद्वज्रपातं सुदारुणम् ॥
हा हतोऽस्मीति वचसा हृदयं समताडयत् ।
मूर्च्छामवाप महतीं पुत्रशोकसमाकुलः ॥
शुचिष्मत्यपि दुःखार्ता रुरोदातीव दुस्सहम् ।
अतिस्वरेण हारावैरत्यन्तं व्याकुलेन्द्रिया ॥
श्रुत्वार्तनादमिति विश्वनरोऽपि मोहं हित्वोत्थितः किमिति किं त्विति किं किमेतत् । उच्चैर्वदन् गृहपतिः क्व स मे बहिस्थः प्राणोऽन्तरात्मनिलयस्सकलेन्द्रियेशः ॥ ततो दृष्ट्वा स पितरौ बहुशोकसमावृतौ
स्मित्वोवाच ।
गृहपतिः सबालः शङ्करांशजः ॥
नामक अग्नीश्वरलिंगका माहात्म्य नन्दीश्वर बोले – - [ हे सनत्कुमार! ] नारदजीकी बात सुनकर स्त्रीसहित विश्वानरने उसे अत्यन्त दारुण १ वज्रपातके समान समझा ॥ १ ॥
' हाय मैं मर गया ' – ऐसा कहकर वे छाती २ पीटने लगे और पुत्रके शोक सन्तप्त होकर मूर्च्छित हो गये । शुचिष्मती भी अत्यधिक दुःखित होकर ऊँचे ३ स्वरमें हाहाकार करती हुई व्याकुल इन्द्रियोंवाली होकर रोने लगी ॥ २-३ ॥ शुचिष्मतीके विलापको सुनकर विश्वानर भी मूर्च्छाका त्याग करके उठकर अरे! यह क्या हुआ, यह क्या हुआ, इस प्रकार ऊँचे स्वरमें रोते हुए ४ बोले — हाय! मेरी सम्पूर्ण इन्द्रियोंका स्वामी, मेरा | बाहर विचरनेवाला प्राण तथा मेरे आत्मामें निवास करनेवाला मेरा पुत्र गृहपति कहाँ है? तब अपने | माता - पिताको अत्यधिक शोकसे व्याकुल देखकर | शंकरजीके अंशसे उत्पन्न वह बालक गृहपति मुसकराकर ५ कहने लगा- ॥ ४-५ ॥
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अ ० १५ ] शतरुद्रसंहिता ७३ गृहपतिरुवाच
हे मातस्तात किं जातं कारणं तद्वदाधुना ।
किमर्थं रुदितोऽत्यर्थं त्रासस्तादृक् कुतो हि वाम् ॥
न मां कृतवपुस्त्राणं भवच्चरणरेणुभिः ।
कालः कलयितुं शक्तो वराकी चञ्चलाल्पिका ॥
प्रतिज्ञां शृणुतां तातौ यदि वां तनयो ह्यहम् ।
करिष्येऽहं तथा येन मृत्युस्त्रस्तो भविष्यति ॥
मृत्युञ्जयं समाराध्य सर्वज्ञं सर्वदं सताम् ।
जपिष्यामि महाकालं सत्यं तातौ वदाम्यहम् ॥
नन्दीश्वर उवाच
इति श्रुत्वा वचस्तस्य जारितौ द्विजदम्पती ।
अकालामृतवर्षौघैर्गततापौ तदोचतुः ॥
द्विजदम्पती ऊचतुः
पुनब्रूहि पुनब्रूहि कीदृक् कीदृक् पुनर्वद ।
कालः कलयितुं नालं वराकी चञ्चलास्ति का ॥
आवयोस्तापनाशाय महोपायस्त्वयेरितः ।
मृत्युञ्जयाख्यदेवस्य समाराधनलक्षणः ॥
तद्वच्च शरणं शम्भोर्नातः परतरं हि तत् ।
मनोरथपथातीतकारिणः पापहारिणः ॥
किं न श्रुतं त्वया तात श्वेतकेतुं यथा पुरा ।
पाशितं कालपाशेन ररक्ष त्रिपुरान्तकः ॥
शिलादतनयं मृत्युग्रस्तमष्टाब्दमात्रकम् ।
शिवो निजजनं चक्रे नन्दिनं विश्वनंदिनम् ॥
क्षीरोदमथनोद्भूतं प्रलयानलसन्निभम् ।
पीत्वा हालाहलं घोरमरक्षद्भुवनत्रयम् ॥
जलंधरं महादर्पं हृतत्रैलोक्यसम्पदम् । रुचिरांगुष्ठरेखोत्थचक्रेण निजघान यः गृहपति बोला- हे माता! हे पिता! क्या हुआ है? जिससे कि आपलोग इतने दुखी होकर रो रहे ६ हैं, इसका कारण मुझे बताइये । इस तरह आपलोग भयभीत क्यों हो रहे हैं? ॥६ ॥
आपलोगोंकी चरणधूलिसे सुरक्षित मेरे शरीरको ७ काल भी मारनेमें समर्थ नहीं हो सकता, फिर अत्यन्त अल्प बिजली मेरा कर ही क्या सकती है? ॥ ७ ॥
हे माता - पिता! आपलोग मेरी प्रतिज्ञा सुनें, यदि ८ मैं आप दोनोंका पुत्र हूँ, तो ऐसा कार्य करूँगा, जिससे मृत्यु भी सन्त्रस्त हो जायगी । हे माता - पिता! मैं सत्पुरुषोंको सब कुछ देनेवाले सर्वज्ञ मृत्युंजय भगवान्की ९ भलीभाँति आराधना करके महाकालको भी जीत लूँगा, यह मैं सत्य कह रहा हूँ ॥८ - ९ ॥ नन्दीश्वर बोले- उसकी इस प्रकारकी बातको सुनकर मुरझाये हुए द्विजदम्पती अकालमें हुई अमृतकी १० सघन वृष्टिके समान दुःखरहित होकर कहने लगे ॥ १० ॥
द्विजदम्पती बोले- [ हे पुत्र! ] फिर कहो! फिर कहो! तुमने क्या कहा कि मुझे काल भी मारनेमें समर्थ ११ नहीं है । फिर बेचारी बिजली कौन है? तुमने हमलोगोंके शोकका निवारण करनेके लिये मृत्युंजयदेवताका १२ समाराधनरूप उपाय उचित ही कहा है ॥ ११-१२ ॥ शिवजीका आश्रय ही सचमुच ऐसा है, उनसे बड़ा कोई नहीं है, वे सभी पापोंको दूर करनेवाले एवं १३ मनोरथमार्गसे भी परे कामनाको पूर्ण करनेवाले हैं ॥ १३ ॥
हे तात! क्या तुमने नहीं सुना है कि पूर्वकालमें १४ जब श्वेतकेतु कालपाशमें बाँध लिया गया था, तब शिवजीने उसकी रक्षा की थी? शिलादपुत्र नन्दीश्वर जो केवल आठ वर्षका बालक था, शिवजीने कालपाशसे १५ छुड़ाकर उसे अपना गण तथा विश्वका रक्षक बना दिया ॥ १४-१५ ॥ क्षीरसागरके मन्थनसे उत्पन्न तथा प्रलयाग्निके १६ समान महाभयानक हालाहल विषको पीकर शिवजीने ही तीनों लोकोंकी रक्षा की थी ॥ १६ ॥
जिन्होंने त्रिलोकीकी सम्पत्तियोंका हरण करनेवाले महान् अभिमानी जलन्धर नामक दैत्यको अपने सुन्दर अँगूठेकी रेखासे उत्पन्न चक्रके द्वारा मार डाला । जिन्होंने ॥ १७ त्रिलोककी सम्पदाको प्राप्तकर मोहित हुए त्रिपुरको
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७४ य एकेषुनिपातोत्थज्वलनैस्त्रिपुरम्पुरा त्रैलोक्यैश्वर्यसम्मूढं शोषयामास भानुना कामं दृष्टिनिपातेन त्रैलोक्यविजयोर्जितम् निनायानंगपदवीं वीक्ष्यमाणेष्वजादिषु तं ब्रह्माद्यैककर्तारं मेघवाहनमच्युतम् प्रयाहि पुत्र शरणं विश्वरक्षामणिं शिवम् ॥ नन्दीश्वर उवाच पित्रोरनुज्ञां प्राप्येति प्रणम्य चरणौ तयोः । प्रादक्षिण्यमुपावृत्य बह्वाश्वास्य विनिर्ययौ
सम्प्राप्य काशीं दुष्प्रापां ब्रह्मनारायणादिभिः ।
महासंवर्त्तसन्तापहन्त्रीं विश्वेशपालिताम् ॥
स्वर्धुन्या हारयष्ट्येव राजितां कण्ठभूमिषु ।
विचित्रगुणशालिन्या हरपल्या विराजिताम् ॥
तत्र प्राप्य स विप्रेशः प्राग्ययौ मणिकर्णिकाम् ।
तत्र स्नात्वा विधानेन दृष्ट्वा विश्वेश्वरं प्रभुम् ॥
साञ्जलिर्नतशीर्षोऽसौ महानन्दान्वितः सुधीः ।
त्रैलोक्यप्राणसन्त्राणकारिणं प्रणनाम ह ॥
आलोक्यालोक्य तल्लिङ्गं तुतोष हृदये मुहुः ।
परमानन्दकन्दाढ्यं स्फुटमेतन्न संशयः ॥
अहो न मत्तो धन्योऽस्ति त्रैलोक्ये सचराचरे ।
यदद्राक्षिषमद्याहं श्रीमद्विश्वेश्वरं विभुम् ॥
मम भाग्योदयायैव नारदेन महर्षिणा ।
पुरागत्य तथोक्तं यत्कृतकृत्योऽस्म्यहं ततः ॥
नन्दीश्वर उवाच
इत्यानन्दामृतरसैर्विधाय स हि पारणम् ।
ततः शुभेऽह्नि संस्थाप्य लिङ्गं सर्वहितप्रदम् ॥
जग्राह नियमान्धोरान् दुष्करानकृतात्मभिः ।
अष्टोत्तरशतैः कुम्भैः पूर्णैर्गङ्गाऽम्भसा शुभैः ॥
श्रीशिवमहापुराण [ अ ० १५ । एक ही बाण चलाकर उससे उत्पन्न हुई ज्वालाओंवाली अग्निसे सुखा डाला और जिन्होंने त्रिलोकके विजयसे ॥ १८ । उन्मत्त हुए कामदेवको ब्रह्मा आदिके देखते - ही - देखते । दृष्टिनिक्षेपमात्रसे अनंग बना दिया । हे पुत्र! तुम ब्रह्मा ॥ १ ९ आदिके एकमात्र जन्मदाता, मेघपर सवार होनेवाले, । । अविनाशी तथा विश्वकी रक्षारूप मणि उन शिवजीकी २० शरणमें जाओ ॥ १७ - २० ॥ नन्दीश्वर बोले - हे मुने! माता - पिताकी आज्ञा पाकर उनके चरणोंमें प्रणाम करके उनकी प्रदक्षिणा ॥ २१ करके और उन्हें बहुत तरहसे आश्वासन देकर वह वहाँसे चल दिया और उस काशीपुरीमें पहुँचा, जो ब्रह्मा, नारायण आदि देवोंके लिये दुर्लभ, महाप्रलयके २२ सन्तापका विनाश करनेवाली, विश्वेश्वरद्वारा पालित, कण्ठ अर्थात् तटप्रदेशमें हारकी तरह पड़ी हुई गंगाजीसे २३ सुशोभित और अद्भुत गुणोंसे सम्पन्न हरपत्नी [ भगवती गिरिजा ] -से शोभायमान है ॥ २१–२३ ॥ वहाँ पहुँचकर वे विप्रवर पहले मणिकर्णिका २४ गये । वहाँ विधिपूर्वक स्नान करके प्रभु विश्वेश्वरका दर्शन करके उन बुद्धिमान्ने परम आनन्दसे युक्त होकर तीनों लोकोंके प्राणोंकी रक्षा करनेवाले शिवजीको २५ हाथ जोड़कर सिर झुकाकर प्रणाम किया । वे बार-बार उसे देखकर हर्षित हो रहे थे और मनमें विचार कर रहे थे कि सचमुच यह लिंग परम आनन्दकन्दसे २६ परिपूर्ण है, यह स्पष्ट ही है, इसमें संशय नहीं है॥२४–२६ ॥ अहो! इस चराचर त्रिलोकीमें मुझसे बढ़कर २७ कोई धन्य नहीं है, जो कि मैंने आज ऐश्वर्यमय तथा सर्वव्यापी विश्वेश्वरका दर्शन किया ॥ २७ ॥
मेरे भाग्योदयके लिये ही महर्षि नारदने जो मुझे २८ आकर पहले ही बता दिया था, जिससे आज मैं [ विश्वेश्वरका दर्शन प्राप्तकर ] कृतकृत्य हो गया ॥ २८ ॥
नन्दीश्वर बोले — मुने! इस प्रकार आनन्दामृतरूपी रसोंद्वारा पारण करके गृहपतिने शुभ २ ९ दिनमें सर्वहितप्रद शिवलिंगकी स्थापना की ॥ २ ९ ॥ तत्पश्चात् अजितेन्द्रियोंके लिये अति दुष्कर कठोर नियमोंको ग्रहणकर अनुष्ठानपरायण हुआ पवित्र ३० चित्तवाला वह प्रतिदिन वस्त्रोंसे छाने गये गंगाजलसे
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अ ० १५ ] शतरुद्रसंहिता ७५
संस्नाप्य वाससा पूतैः पूतात्मा प्रत्यहं शिवम् ।
नीलोत्पलमयीं मालां समर्पयति सोऽन्वहम् ॥
अष्टाधिकसहस्त्रैस्तु सुमनोभिर्विनिर्मिताम् ।
स पक्षे वाथ वा मासे कन्दमूलफलाशनः ॥
शीर्णपर्णाशनैर्धीरः षण्मासं सम्बभूव सः ।
षण्मासं वायुभक्षोऽभूत्षण्मासं जलबिन्दुभुक् ॥
एवं वर्षद्वयं तस्य व्यतिक्रान्तं महात्मनः ।
शिवैकमनसो विप्रास्तप्यमानस्य नारद ॥
जन्मतो द्वादशे वर्षे तद्वचो नारदेरितम् ।
सत्यं करिष्यन्निव तमभ्यगात्कुलिशायुधः ॥
उवाच च वरं ब्रूहि दद्मि त्वन्मनसि स्थितम् ।
अहं शतक्रतुर्विप्र प्रसन्नोऽस्मि शुभव्रतैः ॥
नन्दीश्वर उवाच
इत्याकर्ण्य महेन्द्रस्य वाक्यं मुनिकुमारकः ।
उवाच मधुरं धीरः कीर्तयन्मधुराक्षरम् ॥
गृहपतिरुवाच
मघवन् वृत्रशत्रो त्वां जाने कुलिशपाणिनम् ।
नाहं वृणे वरं त्वत्तः शङ्करो वरदोऽस्ति मे ॥
इन्द्र उवाच
न मत्तः शङ्करस्त्वन्यो देवदेवोऽस्म्यहं शिशो ।
विहाय बालिशत्वं त्वं वरं याचस्व मा चिरम् ॥
गृहपतिरुवाच गच्छाहल्यापतेऽसाधो गोत्रारे पाकशासन न प्रार्थये पशुपतेरन्यं देवान्तरं स्फुटम् नन्दीश्वर उवाच इति तस्य वचः श्रुत्वा क्रोधसंरक्तलोचनः पूर्ण एक सौ आठ पवित्र घड़ोंसे शिवजीको स्नान ३१ कराने लगा और एक हजार आठ नीलकमलोंसे बनी हुई माला समर्पित करने लगा ॥ ३०-३११ / २ ॥ पहले वह पक्षमें [ एक बार ] फिर महीने - महीनेमें ३२ फल - मूल - कन्दको खाकर [ छ: महीनेतक ] रहा । इसके बाद अत्यन्त धीर वह गृहपति पुनः छः मास सूखे पत्ते ३३ खाकर और छः महीने वायु पीकर, फिर छ: महीने एक बूँद जल पीकर तपस्या करनेमें लगा रहा ॥ ३२-३३ ॥ हे नारद! इस प्रकार एकमात्र शिवजीको मनमें ३४ | धारण करके तपमें निरत उस महात्माके दो वर्ष बीत गये । हे शौनक! तब जन्मसे बारहवें वर्षमें देवर्षि नारदद्वारा कही गयी बातको मानो सत्य करनेकी ३५ इच्छासे स्वयं इन्द्रदेव उसके पास आये और बोले— हे विप्र! मैं इन्द्र इस उत्तम तपस्यासे अत्यन्त प्रसन्न हो गया हूँ, तुम्हारे मनमें जो अभिलषित हो, उस ३६ वरको माँगो, मैं प्रदान कर रहा हूँ॥३४–३६ ॥ नन्दीश्वर बोले — इन्द्रके इस वचनको सुनकर महा - धीर मुनिकुमारने मधुर मधुराक्षरमयी वाणीमें ३७ | कहा— ॥ ३७ ॥
गृहपति बोला- हे मघवन्! हे वृत्रशत्रो! मैं वज्र धारण करनेवाले आपको जानता हूँ । मैं आपसे वर नहीं ३८ माँगता, मुझे वर देनेवाले तो शिवजी हैं ॥ ३८ ॥
इन्द्र बोले – हे बालक! मेरे सिवा कोई दूसरा शिव नहीं है, मैं सभी देवताओंका भी देव हूँ । अतः तुम अपना लड़कपन त्यागकर [ मुझसे ] वर माँगो ३ ९ और देर मत करो ॥ ३ ९ ॥ गृहपति बोला- तुम अहल्याके शीलको नष्ट करनेवाले असाधु हो, पाक नामक असुरका वध । करनेवाले पर्वतोंके शत्रु हे इन्द्र! तुम चले जाओ, यह ॥ ४० स्पष्ट है कि मैं शिवजीके अतिरिक्त और किसी देवतासे वरकी प्रार्थना नहीं करता ॥ ४० ॥
नन्दीश्वर बोले— उसकी यह बात सुनते ही । क्रोधसे लाल नेत्रोंवाले इन्द्र अपना घोर वज्र उठाकर उद्यम्य कुलिशं घोरं भीषयामास बालकम् ॥ ४१ बालकको भयभीत करने लगे ॥ ४१ ॥
विद्युज्ज्वालाके समान प्रज्वलित वज्रको स दृष्ट्वा बालको वज्रं विद्युज्ज्वालासमाकुलम् । देखकर नारदकी बातका स्मरण करता हुआ वह स्मरन्नारदवाक्यं च मुमूर्च्छ भयविह्वलः ॥ ४२ | बालक भयसे व्याकुल होकर मूर्च्छित हो गया । उसके
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श्रीशिवमहापुराण [ अ ० १५ ७६ । । पश्चात् अन्धकारका नाश करनेवाले गौरीपति अथ गौरीपतिः शम्भुराविरासीत्तमोनुदः शिवजी प्रकट हो गये और हाथके स्पर्शसे उत्तिष्ठोत्तिष्ठ भद्रं ते स्पर्शैः संजीवयन्निव ॥ ४३ | जीवित - सा करते हुए उससे बोले- उठो उसे उन्मील्य नेत्रकमले सुप्ते इव दिनक्षये अपश्यदग्रे चोत्थाय शम्भुमर्कशताधिकम् भाले लोचनमालोक्य कण्ठेकालं वृषध्वजम् वामाङ्गसन्निविष्टाद्रितनयं चन्द्रशेखरम् ॥ कपर्देन विराजन्तं त्रिशूलाजगवायुधम् । तुम्हारा कल्याण हो ॥ ४२-४३ ॥, उठो, । तब [ उस अपूर्व स्पर्शको प्राप्त करके ] उसने | रात्रिमें सोये हुएके समान अपने नेत्रकमलोंको खोलकर ॥ ४४ । उठ करके अपने आगे सैकड़ों सूर्योंसे भी अधिक । प्रकाशमान शिवजीको देखा । उनके मस्तकमें नेत्र ४५ | शोभित हो रहा था, कण्ठमें विषकी कालिमा थी, वे | बैलपर सवार थे, उनके बायीं ओर भगवती पार्वती स्थित थीं, उनके मस्तकपर अर्धचन्द्र सुशोभित हो स्फुरत्कर्पूरगौरांगं परिणद्धगजाजिनम् ॥ ४६ रहा था, वे जटाजूटसे युक्त थे, त्रिशूल एवं अजगव धनुष परिज्ञाय महादेवं गुरुवाक्यत आगमात् । हर्षबाष्पाकुलासन्नकण्ठरोमाञ्चकञ्चकः
क्षणं च गिरिवत्तस्थौ चित्रकृत्रिमपुत्रकः ।
यथा तथा सुसम्पन्नो विस्मृत्यात्मानमेव च ॥
न स्तोतुं न नमस्कर्तुं किञ्चिद्विज्ञप्तुमेव च ।
यदा स न शशाकालं तदा स्मित्वाह शङ्करः ॥
ईश्वर उवाच
शिशो गृहपते शक्राद्वज्रोद्यतकरादहो ।
ज्ञातं भीतोऽसि मा भैषीर्जिज्ञासा ते मया कृता ॥
मम भक्तस्य नो शक्रो न वज्रं चान्तकोऽपि च ।
प्रभवेदिन्द्ररूपेण मयैव त्वं बिभीषितः ॥
वरं ददामि ते भद्र त्वमग्निपदभाग्भव ।
सर्वेषामेव देवानां वरदस्त्वं भविष्यसि ॥
सर्वेषामेव भूतानां त्वमग्नेऽन्तश्चरो भव ।
धर्मराजेन्द्रयोर्मध्ये दिगीशो राज्यमाप्नुहि ॥
त्वयेदं स्थापितं लिङ्गं तव नाम्ना भविष्यति । अग्नीश्वर इति ख्यातं सर्वतेजोविबृंहणम् धारण किये हुए थे । उनका गौर शरीर कर्पूरके समान उज्ज्वल था और वे गजचर्म धारण किये हुए थे । तब ॥ ४७ गुरुवाक्य तथा आगमप्रमाणसे उन्हें महादेव जानकर हर्षातिरेकसे उसका कण्ठ रुँध गया और शरीर रोमांचित हो गया । उसकी स्मृति लुप्त हो गयी । फिर ४८ भी वह जैसे - तैसे क्षणभरके लिये चित्रलिखित पुतलेके समान स्तम्भित हो अवाक् खड़ा रहा ॥ ४४–४८ ॥ जब वह न तो स्तुति, न नमस्कार और न कुछ ४ ९ कहने में ही समर्थ रहा, तब शिवजीने मुसकराकर उससे कहा —॥४ ९ ॥ ईश्वर बोले — हे बालक! हे गृहपते! मैंने समझ लिया कि तुम हाथमें वज्र लिये हुए इन्द्रसे डर ५० गये हो, अब डरो मत! यह तो मैंने ही तुम्हारी परीक्षा ली थी । मेरे भक्तको इन्द्र, वज्र अथवा काल भी नहीं ५१ डरा सकते हैं । यह तो मैंने ही इन्द्रका रूप धारणकर तुम्हें डराया था ॥ ५०-५१ ॥ हे भद्र! अब मैं तुम्हें वर प्रदान करता हूँ ५२ कि तुम अग्निका पद ग्रहण करनेवाले हो जाओ । तुम सभी देवताओंके वरदाता बनोगे । तुम सभी प्राणियोंके अन्दर [ वैश्वानर नामकी ] अग्नि बनकर विचरण करो ५३ और दक्षिण एवं पूर्व दिशाके मध्यमें [ आग्नेयकोणका ] दिगीश्वर बनकर राज्य करो ॥ ५२-५३ ॥ तुम्हारे द्वारा स्थापित यह लिंग [ आजसे ] तुम्हारे ही नामसे [ प्रसिद्ध ] होगा । यह अग्नीश्वर नामवाला ॥ ५४ । होगा, जो सभी तेजोंका विशिष्ट रूपसे अभिवर्धन
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अ ० १५ ] शतरुद्रसंहिता ७७
अग्नीश्वरस्य भक्तानां न भयं विद्युदग्निभिः ।
अग्निमान्द्यभयं नैव नाकालमरणं क्वचित् ॥
अग्नीश्वरं समभ्यर्च्य काश्यां सर्वसमृद्धिदम् ।
अन्यत्रापि मृतो दैवाद्वह्निलोके महीयते ॥
नन्दीश्वर उवाच
इत्युक्त्वानीय तद्बन्धून्पित्रोश्च परिपश्यतोः ।
दिक्पतित्वेऽभिषिच्याग्निं तत्र लिंगे शिवोऽविशत् ॥
इत्थमग्न्यवतारस्ते वर्णितो मे जनार्दनः ।
नाम्ना गृहपतिस्तात शङ्करस्य परात्मनः ॥
चित्रहोत्रपुरी रम्या सुखदार्चिष्मती वरा ।
जातवेदसि ये भक्ता ते तत्र निवसन्ति वै ॥
अग्निप्रवेशं ये कुर्युर्दृढसत्त्वा जितेन्द्रियाः ।
स्त्रियो वा सत्त्वसम्पन्नास्ते सर्वेऽप्यग्नितेजसः ॥
अग्निहोत्ररता विप्रा: स्थापिता ब्रह्मचारिणः ।
पञ्चाग्निवर्त्तिनोऽप्येवमग्निलोकेऽग्निवर्चसः ॥
शीते शीतापनुत्त्यै यस्त्वेधो भारान्प्रयच्छति ।
कुर्यादग्नीष्टिकां वाथ स वसेदग्निसन्निधौ ॥
अनाथस्याग्निसंस्कारं यः कुर्याच्छ्रद्धयान्वितः ।
अशक्तः प्रेरयेदन्यं सोऽग्निलोके महीयते ॥
अग्निरेको द्विजातीनां निःश्रेयसकरः परः ।
गुरुर्देवो व्रतं तीर्थं सर्वमग्निर्विनिश्चितम् ॥
करेगा । अग्नीश्वरके भक्तोंको विद्युत् एवं अग्निसे भय ५५ नहीं होगा । उन्हें अग्निमान्द्यका भय नहीं होगा और अकालमरण भी कभी नहीं होगा ॥ ५४-५५ ॥ सम्पूर्ण समृद्धियोंको देनेवाले इस अग्नीश्वर ५६ लिंगका काशीमें पूजन करके मनुष्य दैवयोगसे यदि कहीं भी मृत्युको प्राप्त होगा, तो उसे अग्निलोककी प्राप्ति हो जायगी ॥ ५६ ॥
नन्दीश्वर बोले- इस प्रकार कहकर शिवजीने गृहपतिके [ माता - पिता एवं ] बन्धुओंको बुलाकर ५७ उनके माता - पिताके देखते - देखते उस बालकको अग्निकोणके दिक्पालपदपर अभिषिक्तकर स्वयं उस लिंगमें प्रवेश किया ॥५७ ॥
हे तात! इस प्रकार मैंने परमात्मा शिवके ५८ गृहपति नामक अग्निके रूपमें दुर्जनोंको पीड़ा देनेवाले अवतारका वर्णन किया ॥५८ ॥
चित्रहोत्र नामक सुखदायिनी, रम्य तथा प्रकाशमान ५ ९ पुरी है, जो लोग अग्निके भक्त हैं, वे वहाँ निवास करते हैं ॥५ ९ ॥ जितेन्द्रिय एवं दृढ़ सत्त्व भाववाले पुरुष अथवा ६० सत्त्वसम्पन्न स्त्रियाँ उस अग्निलोकमें प्रवेश करती हैं, वे सभी अग्निके समान तेजस्वी होते हैं ॥ ६० ॥
अग्निहोत्रमें तत्पर ब्राह्मण, अग्निको स्थापित ६१ करनेवाले ब्रह्मचारी तथा पंचाग्नि तापनेवाले तपस्वी लोग भी अग्निके समान तेजस्वी होकर अग्निलोकमें निवास करते हैं ॥ ६१ ॥
जो शीतकालमें शीतको दूर करनेके लिये ६२ काष्ठ - समूहका दान करता है अथवा ईंटोंसे अग्निकुण्डका निर्माण करता है, वह अग्निके सान्निध्यमें निवास करता है । जो श्रद्धायुक्त होकर अनाथ व्यक्तिका अग्नि-संस्कार करता है अथवा स्वयं अशक्त होनेपर [ इसके लिये ] दूसरेको प्रेरित करता है, वह अग्निलोकमें ६३ पूजित होता है॥६२-६३ ॥ एकमात्र अग्निदेव ही द्विजातियों ( ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य ) -का परम कल्याण करनेवाले हैं । अग्नि ही उनके गुरु, देवता, व्रत, तीर्थ एवं सब कुछ हैं— ६४ । ऐसा निश्चित है ॥ ६४ ॥
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७८ अपावनानि सर्वाणि वह्निसंसर्गतः क्षणात् पावनानि भवन्त्येव तस्माद्यः पावकः स्मृतः अन्तरात्मा ह्ययं साक्षान्निश्चयो ह्याशुशुक्षणिः । मांसग्रासान्पचेत्कुक्षौ स्त्रीणां नो मांसपेशिकाम्
तैजसी शाम्भवी मूर्तिः प्रत्यक्षा दहनात्मिका ।
कर्त्री हर्त्री पालयित्री विनैतां किं विलोक्यते ॥
चित्रभानुरयं साक्षान्नेत्रं त्रिभुवनेशितुः ।
अन्धे तमोमये लोके विनैनं कः प्रकाशनः ॥
धूपप्रदीपनैवेद्यपयोदधिघृतैक्षवम् एतद्भुक्तं निषेवन्ते सर्वे दिवि दिवौकसः ॥ श्रीशिवमहापुराण [ अ ० १६ अग्निके संसर्गमात्रसे क्षणभरमें ही सभी अपवित्र । ॥ ६५ वस्तुएँ पवित्र हो जाती हैं, इसलिये इन्हें पावक पत्र गया है ॥६५ ॥
ये अग्नि प्राणियोंके साक्षात् अन्तरात्मा हैं और ॥ ६६ निश्चय ही सब कुछ जला देनेवाले हैं । ये स्त्रियोंकी कुक्षिमें | मांसके ग्रासोंको तो पचा देते हैं, किंतु उसीमें रहनेवाले । मांसपेशी ( गर्भ ) को [ दयावश ] नहीं पचाते ॥ ६६ ॥
ये अग्नि साक्षात् शिवकी तेजोमयी दहनात्मिका ६७ मूर्ति हैं । यही [ अग्निरूपा मूर्ति ] सृष्टि करनेवाली विनाश करनेवाली एवं पालन करनेवाली है । इनके, बिना कुछ नहीं दिखायी पड़ता है ॥ ६७ ॥
ये अग्नि शिवजीके साक्षात् नेत्र हैं । अन्धकारसे ६८ पूर्ण इस तमोमय संसारको अग्निके बिना कौन प्रकाशित कर सकता है ॥ ६८ ॥
धूप, दीप, नैवेद्य, दूध, दही, घी एवं मिष्टान्नादि पदार्थ अग्निमें हवन करनेपर स्वर्गमे निवास करनेवाले ६ ९ । देवगण उसे प्राप्त करते हैं ॥६ ९ ॥ इति श्रीशिवमहापुराणे तृतीयायां शतरुद्रसंहितायां गृहपत्यवतारवर्णनं नाम पञ्चदशोऽध्यायः ॥ १५ ॥
॥ इस प्रकार श्रीशिवमहापुराणके अन्तर्गत तृतीय शतरुद्रसंहितामें गृहपत्यवतार-वर्णन नामक पन्द्रहवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ १५ ॥
अथ षोडशोऽध्यायः यक्षेश्वरावतारका वर्णन नन्दीश्वर उवाच यक्षेश्वरावतारं च शृणु शंभोर्मुनीश्वर गर्विणं गर्वहन्तारं सतां भक्तिविवर्द्धनम् पुरा देवाश्च दैत्याश्च पीयूषार्थं महाबलाः क्षीरोदधिं ममन्थुस्ते सुकृतस्वार्थसन्धयः
मध्यमानेऽमृते पूर्वं क्षीराब्धेः सुरदानवैः ।
अग्नेः समुत्थितं तस्माद्विषं कालानलप्रभम् ॥
तं दृष्ट्वा निखिला देवा दैत्याश्च भयविह्वलाः ।
विद्रुत्य तरसा तात शंभोस्ते शरणं ययुः ॥
नन्दीश्वर बोले - हे मुनीश्वर! अब आप । [ भगवान् ] शम्भुके यक्षेश्वरावतारको सुनिये, जो ॥ १ अहंकारसे युक्त जनोंके गर्वको नष्ट करनेवाला तथा सज्जनोंकी भक्तिका संवर्धन करनेवाला है ॥१ ॥
। पूर्वकालमें महाबलवान् देवता एवं दैत्योंने अपने-॥ २ अपने स्वार्थके लिये आपसमें भलीभाँति सन्धिकर अमृत प्राप्त करनेके लिये क्षीरसागरका मन्थन किया था ॥२ ॥
जब देवता एवं दानव अमृतके लिये क्षीरसागरका ३ मन्थन कर रहे थे तो सर्वप्रथम [ समुद्रमें विद्यमान ] अग्निसे कालाग्निके समान विष निकला ॥ ३ ॥
हे तात! उस विषको देखते ही समस्त देवता | और दानव भयसे व्याकुल हो गये और वे भागकर ४ शीघ्र ही शिवजीकी शरणमें गये ॥४ ॥