शिव महापुराण - २ — पृष्ठ 951–960
शिव महापुराण - २ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 951–960
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अ ० १४ ] वायवीयसंहिता ( उत्तरखण्ड ) ९ ३७
चत्वारिंशत्समावृत्ती: प्राणानायम्य संस्मरेत् ।
यन्त्र मन्त्रार्थविद्धीमानशक्तः शक्तितो जपेत् ॥
पञ्चकं त्रिकमेकं वा प्राणायामं समाचरेत् ।
अगर्भं वा सगर्भं वा सगर्भस्तत्र शस्यते ॥
सगर्भादपि साहस्त्रं सध्यानो जप उच्यते ।
' पञ्चविधेष्वेकः कर्त्तव्यः शक्तितो जपः ॥
एषु
अङ्गुल्या जपसंख्यानमेकमेवमुदाहृतम् ।
रेखयाष्टगुणं विद्यात्पुत्रजीवैर्दशाधिकम् ॥
शतं स्याच्छंखमणिभिः प्रवालैस्तु सहस्रकम् ।
स्फाटिकैर्दशसाहस्त्रं मौक्तिकैर्लक्षमुच्यते ॥
पद्माक्षैर्दशलक्षं तु सौवर्णैः कोटिरुच्यते ।
कुशग्रंथ्या च रुद्राक्षैरनन्तगुणितं भवेत् ॥
त्रिंशदक्षैः कृता माला धनदा जपकर्मणि ।
सप्तविंशतिसंख्यातैरक्षैः पुष्टिप्रदा भवेत् ॥
पञ्चविंशतिसंख्यातैः कृता मुक्तिं प्रयच्छति । अक्षैस्तु पञ्चदशभिरभिचारफलप्रदा अंगुष्ठं मोक्षदं विद्यात्तर्ज्जनीं शत्रुनाशिनीम् मध्यमां धनदां शांतिं करोत्येषा ह्यनामिका अष्टोत्तरशतं माला तत्र स्यादुत्तमोत्तमा शतसंख्योत्तमा माला पञ्चाशद्भिस्तु मध्यमा चतुःपञ्चाशदक्षैस्तु हृच्छ्रेष्ठा हि प्रकीर्तिता मन्त्रार्थवेत्ता बुद्धिमान् साधक प्राणायाम करते ३१ समय चालीस बार मन्त्रका स्मरण कर ले । जो ऐसा करनेमें असमर्थ हो, वह अपनी शक्तिके अनुसार जितना हो सके, उतने ही मन्त्रोंका मानसिक जप कर ले ॥ ३१ ॥
पाँच, तीन अथवा एक बार अगर्भ या ३२ सगर्भ प्राणायाम करे । इन दोनोंमें सगर्भ प्राणायाम श्रेष्ठ माना गया है ॥ ३२ ॥
सगर्भकी अपेक्षा भी ध्यानसहित जप सहस्रगुना ३३ फल देनेवाला कहा जाता है । इन पाँच प्रकारके जपोंमेंसे कोई एक जप अपनी शक्तिके अनुसार करना चाहिये ॥ ३३ ॥
अँगुलीसे जपकी गणना करना एकगुना बताया ३४ गया है । रेखासे गणना करना आठगुना उत्तम समझना चाहिये । पुत्रजीव ( जियापोता ) - के बीजोंकी मालासे गणना करनेपर जपका दसगुना अधिक फल होता है । ३५ शंखके मनकोंसे सौ गुना, मूँगोंसे हजारगुना, स्फटिकमणिकी मालासे दस हजारगुना, मोतियोंकी मालासे लाखगुना, पद्माक्षसे दस लाखगुना और ३६ सुवर्णके बने हुए मनकोंसे गणना करनेपर कोटिगुना अधिक फल बताया गया है । कुशकी गाँठसे तथा रुद्राक्षसे गणना करनेपर अनन्तगुने फलकी प्राप्ति होती है॥३४–३६ ॥ तीस रुद्राक्षके दानोंसे बनायी गयी माला जप-३७ कर्ममें धन देनेवाली होती है । सत्ताईस दानोंकी माला पुष्टिदायिनी और पचीस दानोंकी माला मुक्तिदायिनी होती है, पंद्रह रुद्राक्षोंकी बनी हुई माला अभिचारकर्ममें ॥ ३८ फलदायक होती है ॥ ३७-३८ ॥ । जपकर्ममें अँगूठेको मोक्षदायक समझना चाहिये ॥ ३ ९ और तर्जनीको शत्रुनाशक । मध्यमा धन देती है और अनामिका शान्ति प्रदान करती है । एक सौ आठ । दानोंकी माला उत्तमोत्तम मानी गयी है । सौ दानोंकी ॥ ४० माला उत्तम और पचास दानोंकी माला मध्यम होती है । चौवन दानोंकी माला मनोहारिणी एवं श्रेष्ठ कही गयी है । इस तरहकी मालासे जप करे । वह जप
।
दिखाये नहीं ॥ ३ ९ –४१ ॥
इत्येवं मालया कुर्याज्जपं कस्मै न दर्शयेत् ॥ ४१ । किसीको
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९ ३८ कनिष्ठा क्षरणी प्रोक्ता जपकर्मणि शोभना अंगुष्ठेन जपेज्जप्यमन्यैरंगुलिभिः सह
अंगुष्ठेन विना जप्यं कृतं तदफलं यतः ।
गृहे जपं समं विद्याद् गोष्ठे शतगुणं विदुः ॥
पुण्यारण्ये तथारामे सहस्त्रगुणमुच्यते ।
अयुतं पर्वते पुण्ये नद्यां लक्षमुदाहृतम् ॥
कोटिं देवालये प्राहुरनन्तं मम सन्निधौ । श्रीशिवमहापुराण [ अ ० १४ । G कनिष्ठिका अंगुलि अक्षरणी ( जपके ॥ ४२ / क्षरित - नष्ट न करनेवाली ) मानी गयी है फलक जपकर्ममें शुभ है । दूसरी अंगुलियों साथ; इसलिय अंगुष्ठद्वार जप करना चाहिये; क्योंकि अंगुष्ठके बिना किया हुआ जप निष्फल होता है ॥ ४२१ / २ ॥ ४३ घरमें किये हुए जपको समान या समझना चाहिये । गोशालामें उसका फल एकगुना जाता है, पवित्र वन या उद्यानमें किये हुए जपका ४४ सहस्रगुना बताया जाता है । पवित्र पर्वतपर फल | हजारगुना, नदीके तटपर लाखगुना, देवालयमें कोटिगुना दस और मेरे निकट किये हुए जपको अनन्तगुना कहा गया है॥४३-४४१ / २ ॥ सूर्यस्याग्नेर्गुरोरिन्दोर्दीपस्य च जलस्य च ॥४५ सूर्य, अग्नि, गुरु, चन्द्रमा, दीपक, जल, ब्राह्मण
विप्राणां च गवां चैव सन्निधौ शस्यते जपः ।
तत्पूर्वाभिमुखं वश्यं दक्षिणं चाभिचारिकम् ॥
पश्चिमं धनदं विद्यादौत्तरं शांतिदं भवेत् । और गौओंके समीप किया हुआ जप श्रेष्ठ होता है ॥ ४५१/२ ॥ ४६ पूर्वाभिमुख किया हुआ जप वशीकरणमें और दक्षिणाभिमुख जप अभिचारकर्ममें सफलता प्रदान करनेवाला है । पश्चिमाभिमुख जपको धनदायक जानना चाहिये और उत्तराभिमुख जप शान्तिदायक होता है ॥ ४६१/२ ॥ सूर्य्याग्निविप्रदेवानां गुरूणामपि सन्निधौ ॥ ४७ सूर्य, अग्नि, ब्राह्मण, देवता तथा अन्य श्रेष्ठ पुरुषोंके समीप उनकी ओर पीठ करके जप अन्येषां च प्रसक्तानां मन्त्रं न विमुखो जपेत् । नहीं करना चाहिये, सिरपर पगड़ी रखकर, कुर्ता उष्णीषी कंचुकी नग्नो मुक्तकेशो गलावृतः ॥ ४८ पहनकर, नंगा होकर, बाल खोलकर, गलेमें कपड़ा लपेटकर, अशुद्ध हाथ लेकर, सम्पूर्ण शरीरसे अशुद्ध अपवित्रकरोऽशुद्धो विलपन्न जपेत् क्वचित् । रहकर तथा विलापपूर्वक कभी जप नहीं करना क्रोधं मदं चाहिये ॥ ४७-४८१ / २ ॥ क्षुतं त्रीणि निष्ठीवनविजृंभणे ॥ ४ ९ जप करते समय क्रोध, मद, छींकना, थूकना, दर्शनं च श्वनीचानां वर्जयेज्जपकर्मणि जँभाई लेना तथा कुत्तों और नीच पुरुषोंकी ओर आचमेत्संभवे तेषां । देखना वर्जित है । यदि कभी वैसा सम्भव हो जाय तो स्मरेद्वा मां त्वया सह ॥ ५० आचमन करे अथवा तुम्हारे साथ मेरा( पार्वतीसहित ज्योतींषि च प्रपश्येद्वा कुर्याद् वा प्राणसंयमम् । शिवका ) स्मरण करे या ग्रह - नक्षत्रोंका दर्शन करे अनासनः शयानो वा गच्छन्नुत्थित अथवा प्राणायाम कर ले ॥ ४ ९ -५०१ / २ ॥ एव वा ॥ ५१ बिना आसनके बैठकर, सोकर, चलते - चलते रथ्यायामशिवे स्थाने न जपेत्तिमिरान्तरे अथवा खड़ा होकर जप न करे । गलीमें या सड़कपर, प्रसार्य्य न जपेत्पादौ कुक्कुटासन एव । | अपवित्र स्थानमें तथा अँधेरेमें भी जप न करे । दोनों वा ॥ ५२ पाँव फैलाकर, कुक्कुट आसनसे बैठकर, सवारी या
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अ ० १४ ] वायवीयसंहिता ( उत्तरखण्ड ) ९ ३ ९
यानशय्याधिरूढो वा चिन्ताव्याकुलितोऽथवा ।
शक्तश्चेत्सर्वमेवैतदशक्तः शक्तितो जपेत् ॥
किमत्र बहुनोक्तेन समासेन वचः शृणु ।
सदाचारी जपन् शुद्ध ध्यायन्भद्रं समश्नुते ॥
आचारः परमो धर्म आचारः परम धनम् ।
आचारः परमा विद्या आचारः परमा गतिः ॥
आचारहीनः पुरुषो लोके भवति निन्दितः ।
परत्र च सुखी न स्यात्तस्मादाचारवान्भवेत् ॥
यस्य यद्विहितं कर्म वेदे शास्त्रे च वैदिकैः ।
तस्य तेन समाचारः सदाचारो न चेतरः ॥
सद्भिराचरितत्वाच्च सदाचारः स उच्यते ।
सदाचारस्य तस्याहुरास्तिक्यं मूलकारणम् ॥
आस्तिकश्चेत्प्रमादाद्यैः सदाचारादविच्युतः ।
न दुष्यति नरो नित्यं तस्मादास्तिकतां व्रजेत् ॥
यथेहास्ति सुखं दुःखं सुकृतैर्दुष्कृतैरपि ।
तथा परत्र चास्तीति मतिरास्तिक्यमुच्यते ॥
रहस्यमन्यद्वक्ष्यामि गोपनीयमिदं प्रिये ।
न वाच्यं यस्य कस्यापि नास्तिकस्याथ वा पशोः ॥
सदाचारविहीनस्य पतितस्यान्त्यजस्य च ।
पञ्चाक्षरात्परं नास्ति परित्राणं कलौ युगे ॥
गच्छतस्तिष्ठतो वापि स्वेच्छया कर्म कुर्वतः । अशुचेर्वा शुचेर्वापि मन्त्रोऽयं न च निष्फलः अनाचारवतां पुंसामविशुद्धषडध्वनाम् । अनादिष्टोऽपि गुरुणा मन्त्रोऽयं न च निष्फलः खाटपर चढ़कर अथवा चिन्तासे व्याकुल होकर जप ५३ न करे । यदि शक्ति हो तो इन सब नियमोंका पालन करते हुए जप करे और अशक्त पुरुष यथाशक्ति जप करे ॥ ५१-५३ ॥ इस विषयमें बहुत कहनेसे क्या लाभ? ५४ संक्षेपसे मेरी यह बात सुनो । सदाचारी मनुष्य शुद्धभावसे जप और ध्यान करके कल्याणका भागी होता है । ५५ आचार परम धर्म है, आचार उत्तम धन है, आचार श्रेष्ठ विद्या है और आचार ही परम गति है । आचारहीन पुरुष संसारमें निन्दित होता है और ५६ परलोकमें भी सुख नहीं पाता । इसलिये सबको आचारवान् होना चाहिये ॥५४–५६ ॥ वेदज्ञ विद्वानोंने वेद - शास्त्रके कथनानुसार जिस ५७ वर्णके लिये जो कर्म विहित बताया है, उस वर्णके पुरुषको उसी कर्मका सम्यक् आचरण करना चाहिये । वही उसका सदाचार है, दूसरा नहीं । सत्पुरुषोंने ५८ उसका आचरण किया है; इसीलिये वह सदाचार कहलाता है । उस सदाचारका भी मूल कारण आस्तिकता है ॥ ५७-५८ ॥ यदि मनुष्य आस्तिक हो तो प्रमाद आदिके कारण ५ ९ सदाचारसे कभी भ्रष्ट हो जानेपर भी दूषित नहीं होता । अतः सदा आस्तिकताका आश्रय लेना चाहिये । जैसे इहलोकमें सत्कर्म करनेसे सुख और दुष्कर्म करनेसे ६० दु: ख होता है, उसी तरह परलोकमें भी होता है — इस विश्वासको आस्तिकता कहते हैं ॥५ ९ -६० ॥ हे प्रिये! मैं तुमसे एक और रहस्यमय बात कहता हूँ, ६१ इसे [ सदा ] गुप्त रखना चाहिये । जिस किसी भी नास्तिक अथवा पशुतुल्य प्राणीको इसे नहीं बताना ॥ ६१ ॥
सदाचारसे हीन, पतित और अन्त्यजका उद्धार ६२ करनेके लिये कलियुगमें पंचाक्षर - मन्त्रसे बढ़कर दूसरा कोई उपाय नहीं है । चलते - फिरते, खड़े होते अथवा स्वेच्छानुसार कर्म करते हुए अपवित्र या पवित्र ॥ ६३ पुरुषके जप करनेपर भी यह मन्त्र निष्फल नहीं होता ॥ ६२-६३ ॥ आचारहीन तथा षडध्वशोधनसे रहित पुरुषोंके लिये और जिसे गुरुसे मन्त्रकी दीक्षा प्राप्त नहीं हुई ॥ ६४ । उनके लिये भी यह मन्त्र निष्फल नहीं होता है ॥ ६४ ॥
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९ ४० श्रीशिवमहापुराण [ अ ० १४ अन्त्यजस्यापि मूर्खस्य मूढस्य पतितस्य च । अन्त्यज, मूर्ख, मूढ़, पतित, मर्यादारहित निर्मर्यादस्य नीचस्य मन्त्रोऽयं न च निष्फलः ॥ ६५ नीचके लिये भी यह मन्त्र निष्फल नहीं होता । किसी और | भी अवस्थामें पड़ा हुआ मनुष्य भी, यदि मुझमें सर्वावस्थां गतस्यापि मयि भक्तिमतः परम् । | भक्तिभाव रखता है, तो उसके लिये यह मन्त्र निःसंदेह उत्तम सिध्यत्येव न संदेहो नापरस्य तु कस्यचित् ॥ ६६ | सिद्ध होगा ही, किंतु दूसरे किसीके लिये वह नहीं हो सकता ॥ ६५-६६ ॥ सिद्ध न लग्नतिथिनक्षत्रवारयोगादयः प्रिये । प्रिये! इस मन्त्रके लिये लग्न, तिथि, नक्षत्र अस्यात्यन्तमवेक्ष्याः स्युर्नैष सुप्तः सदोदितः ॥ ६७ | और योग आदिका अधिक विचार अपेक्षित नहीं , वार । यह मन्त्र कभी सुप्त नहीं होता, सदा जाग्रत् ही रहता है । न कदाचिन्न कस्यापि रिपुरेष महामनुः ॥ यह महामन्त्र कभी किसीका शत्रु नहीं होता है । सुसिद्धो वापि सिद्धो वा साध्यो वापि भविष्यति ॥ ६८ सुसिद्ध, सिद्ध अथवा साध्य ही रहता है ॥ ६७-६८ । यह सदा ॥ सिद्धेन गुरुणादिष्टः सुसिद्ध इति कथ्यते । सिद्ध गुरुके उपदेशसे प्राप्त हुआ मन्त्र सुसिद्ध असिद्धेनापि वा दत्तः सिद्धसाध्यस्तु केवलः ॥ ६ ९ कहलाता है । असिद्ध गुरुका भी दिया हुआ मन्त्र सिद्ध कहा गया है । जो केवल परम्परासे प्राप्त हुआ है, किसी गुरुके उपदेशसे नहीं मिला है, वह मन्त्र साध्य असाधितः साधितो वा सिध्यत्येव न संशयः । होता है । जो मुझमें, मन्त्रमें तथा गुरुमें अतिशय श्रद्धा श्रद्धातिशययुक्तस्य मयि मन्त्रे तथा गुरौ ॥ ७० रखनेवाला है, उसको मिला हुआ मन्त्र किसी गुरुके द्वारा साधित हो या असाधित, सिद्ध होकर ही रहता है, इसमें संशय नहीं है ॥ ६ ९ -७० ॥ तस्मान्मन्त्रान्तरांस्त्यक्त्वा सापायानधिकारतः । इसलिये अधिकारकी दृष्टिसे विघ्नयुक्त होनेवाले आश्रयेत्परमां विद्यां साक्षात्पञ्चाक्षरीं बुधः ॥ ७१ दूसरे मन्त्रोंको त्यागकर विद्वान् पुरुष साक्षात् परमा
मन्त्रान्तरेषु सिद्धेषु मन्त्र एष न सिध्यति ।
सिद्धे त्वस्मिन्महामन्त्रे ते च सिद्धा भवत्युत ॥ ७२
यथा देवेष्वलब्धोऽस्मि लब्धेष्वपि महेश्वरि ।
मयि लब्धे तु ते लब्धा मन्त्रेष्वेषु समो विधिः ॥ ७३
ये दोषाः सर्वमन्त्राणां न तेऽस्मिन् संभवन्त्यपि ।
अस्य मन्त्रस्य जात्यादीननपेक्ष्य प्रवर्तनात् ॥ ७४
तथापि नैव क्षुद्रेषु फलेषु प्रतियोगिषु
।
सहसा विनियुञ्जीत तस्मादेष महाबलः ॥ ७५
उपमन्युरुवाच एवं साक्षान्महादेव्यै महादेवेन शूलिना । हिताय जगतामुक्तः पञ्चाक्षरविधिर्यथा ॥ ७६ विद्या पंचाक्षरीका आश्रय ले । दूसरे मन्त्रोंके सिद्ध हो जानेसे ही यह मन्त्र सिद्ध नहीं होता । परंतु इस महामन्त्रके सिद्ध होनेपर वे दूसरे मन्त्र अवश्य सिद्ध हो जाते हैं॥७१-७२ ॥ महेश्वरि! जैसे अन्य देवताओंके प्राप्त होनेपर भी मैं नहीं प्राप्त होता; परंतु मेरे प्राप्त होनेपर वे सब देवता प्राप्त हो जाते हैं, यही न्याय इन सब मन्त्रोंके लिये भी है । सब मन्त्रोंके जो दोष हैं, वे इस मन्त्रमें सम्भव नहीं हैं; क्योंकि यह मन्त्र जाति आदिकी अपेक्षा न रखकर प्रवृत्त होता है । तथापि छोटे - छोटे तुच्छ फलोंके लिये सहसा इस मन्त्रका विनियोग नहीं करना चाहिये; क्योंकि यह मन्त्र महान् फल देनेवाला है ॥७३–७५ ॥ उपमन्यु कहते हैं- यदुनन्दन! इस प्रकार त्रिशूलधारी महादेवजीने तीनों लोकोंके हितके | लिये साक्षात् महादेवी पार्वतीसे इस पंचाक्षर - मन्त्रकी
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अ ० १५ ] वायवीयसहिता ( उत्तरखण्ड ) ९ ४१ य इदं कीर्त्तयेद्भक्त्या शृणुयाद्वा समाहितः । विधि कही थी, जो एकाग्रचित्त हो भक्ति - भावसे इस सर्वपापविनिर्मुक्तः प्रसंगको सुनता या सुनाता है, वह सब पापोंसे मुक्त प्रयाति परमां गतिम् ॥ ७७ हो परमगतिको प्राप्त होता है ॥ ७६-७७ ॥ इति श्रीशिवमहापुराणे सप्तम्यां वायवीयसंहितायामुत्तरखण्डे पंचाक्षरमहिमवर्णनं ॥ इस प्रकार श्रीशिवमहापुराणके अन्तर्गत नाम चतुर्दशोऽध्यायः ॥ १४ ॥
महिमवर्णन सातवीं वायवीयसंहिताके उत्तरखण्डमें पंचाक्षर-नामक चौदहवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ १४ ॥
अथ पञ्चदशोऽध्यायः त्रिविध दीक्षाका निरूपण, शक्तिपातकी आवश्यकता तथा उसके लक्षणोंका वर्णन, गुरुका महत्त्व, ज्ञानी गुरुसे ही मोक्षकी प्राप्ति तथा गुरुके द्वारा शिष्यकी परीक्षा श्रीकृष्ण उवाच
भगवन्मन्त्रमाहात्म्यं भवता कथितं प्रभो ।
तत्प्रयोगविधानं च साक्षाच्छ्रुतिसमं यथा ॥
इदानीं श्रोतुमिच्छामि शिवसंस्कारमुत्तमम् ।
मन्त्रसंग्रहणे किञ्चित्सूचितं न तु विस्तृतम् ॥
उपमन्युरुवाच
हन्त ते कथयिष्यामि सर्वपापविशोधनम् ।
संस्कारं परमं पुण्यं शिवेन परिभाषितम् ॥
सम्यक् कृताधिकारः स्यात्पूजादिषु नरो यतः ।
संस्कारः कथ्यते तेन षडध्वपरिशोधनम् ॥
दीयते येन विज्ञानं क्षीयते पाशबन्धनम् ।
तस्मात्संस्कार एवायं दीक्षेत्यपि च कथ्यते ॥
शांभवी चैव शाक्ती च मांत्री चैव शिवागमे ।
दीक्षोपदिश्यते त्रेधा शिवेन परमात्मना ॥
गुरोरालोकमात्रेण स्पर्शात्संभाषणादपि ।
सद्यः संज्ञा भवेज्जन्तोः पाशोपक्षयकारिणी ॥
सा दीक्षा शांभवी प्रोक्ता सा पुनर्भिद्यते द्विधा ।
तीव्रा तीव्रतरा चेति पाशोपक्षयभेदतः ॥
यया स्यान्निर्वृतिः सद्यः सैव तीव्रतरा मता ।
तीव्रा तु जीवतोऽत्यन्तं पुंसः पापविशोधिका ॥
श्रीकृष्ण बोले- भगवन्! आपने मन्त्रका माहात्म्य तथा उसके प्रयोगका विधान बताया, जो १ साक्षात् वेदके तुल्य है । अब मैं उत्तम शिव-संस्कारकी विधि सुनना चाहता हूँ, जिसे मन्त्र-ग्रहणके प्रकरणमें आपने कुछ सूचित किया था, पर २ उसका विस्तृत वर्णन नहीं किया था॥१-२ ॥ उपमन्युने कहा- — -अच्छा, मैं तुम्हें शिवद्वारा कथित परम पवित्र संस्कारका विधान बता रहा हूँ, जो ३ समस्त पापोंका शोधन करनेवाला है ॥ ३ ॥
मनुष्य जिसके प्रभावसे पूजा आदिमें उत्तम ४ अधिकार प्राप्त कर लेता है, उस षडध्वशोधन कर्मको संस्कार कहते हैं । संस्कार अर्थात् शुद्धि करनेसे ही उसका नाम संस्कार है ॥४ ॥
यह विज्ञान देता है और पाशबन्धनको क्षीण करता ५ है । इसलिये इस संस्कारको ही दीक्षा भी कहते हैं ॥ ५ ॥
शिव - शास्त्रमें परमात्मा शिवने ' शाम्भवी ', ' शाक्ती ' और ' मान्त्री ' तीन प्रकारकी दीक्षाका उपदेश ६ किया है ॥६ ॥
गुरुके दृष्टिपातमात्रसे, स्पर्शसे तथा सम्भाषणसे ७ भी जीवको जो तत्काल पाशोंका नाश करनेवाली संज्ञा अर्थात् सम्यक् बुद्धि प्राप्त होती है, वह शाम्भवी दीक्षा कहलाती है । उस दीक्षाके भी दो भेद हैं- तीव्रा और तीव्रतरा । पाशोंके क्षीण होनेमें जो शीघ्रता या मन्दता होती ८ है, उसीके भेदसे ये दो भेद हुए हैं । जिस दीक्षासे तत्काल सिद्धि या शान्ति प्राप्त होती है, वही तीव्रतरा मानी गयी है । जीवित पुरुषके पापका अत्यन्त शोधन करनेवाली ९ जो दीक्षा है, उसे तीव्रा कहा गया है ॥ ७ – ९ ॥
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९ ४२ शाक्ती ज्ञानवती दीक्षा शिष्यदेहं प्रविश्य तु गुरुणा योगमार्गेण क्रियते ज्ञानचक्षुषा मान्त्री क्रियावती दीक्षा कुंडमंडलपूर्विका । मंदमंदतरोद्देशात्कर्तव्या गुरुणा बहिः
शक्तिपातानुसारेण शिष्योऽनुग्रहमर्हति ।
शैवधर्मानुसारस्य तन्मूलत्वात्समासतः ॥
यत्र शक्तिर्न पतिता तत्र शुद्धिर्न जायते ।
न विद्या न शिवाचारो न मुक्तिर्न च सिद्धयः ॥
तस्मात् लिङ्गानि संवीक्ष्य शक्तिपातस्य भूयसः ।
ज्ञानेन क्रियया वाथ गुरुः शिष्यं विशोधयेत् ॥
योऽन्यथा कुरुते मोहात् स विनश्यति दुर्मतिः ।
तस्मात्सर्वप्रकारेण गुरुः शिष्यं परीक्षयेत् ॥
लक्षणं शक्तिपातस्य प्रबोधानन्दसम्भवः ।
सा यस्मात्परमा शक्तिः प्रबोधानन्दरूपिणी ॥
आनन्दबोधयोर्लिङ्गमन्तःकरणविक्रियाः 1 यथा स्यात्कम्परोमाञ्चस्वरनेत्राङ्गविक्रियाः श्रीशिवमहापुराण [ अ ० १५ । गुरु योगमार्गसे शिष्यके शरीरमें प्रवेश ॥ १० ज्ञानदृष्टिसे जो ज्ञानवती दीक्षा देते हैं, वह शाक्ती करक गयी है ॥१० ॥ कही
क्रियावती दीक्षाको मान्त्री दीक्षा कहते हैं ॥ ११ पहले होमकुण्ड और यज्ञमण्डपका निर्माण । इसम किया । जाता है । फिर गुरु बाहरसे मन्द या मन्दतर उद्देश्यको । लेकर शिष्यका संस्कार करते हैं । शक्तिपातके अनुसार । शिष्य गुरुके अनुग्रहका भाजन होता है । शैव - धर्मका १२ अनुसरण शक्तिपात - मूलक है; अतः संक्षेपसे उसके विषयमें निवेदन किया जाता है ॥ ११-१२ ॥ जिस शिष्यमें गुरुकी शक्तिका पात नहीं हुआ, १३ उसमें शुद्धि नहीं आती तथा उसमें न तो विद्या, न शिवाचार, न मुक्ति और न सिद्धियाँ ही होती हैं; अत: प्रचुर शक्तिपातके लक्षणोंको देखकर गुरु ज्ञान अथवा १४ क्रियाके द्वारा शिष्यका शोधन करे॥१३-१४ ॥ जो मोहवश इसके विपरीत आचरण करता १५ है, वह दुर्बुद्धि नष्ट हो जाता है; अतः गुरु सब प्रकारसे शिष्यका परीक्षण करे । उत्कृष्ट बोध और आनन्दकी प्राप्ति ही शक्तिपातका लक्षण है; क्योंकि १६ वह परमाशक्ति प्रबोधानन्दरूपिणी ही है । आनन्द और बोधका लक्षण है अन्तःकरणमें ( सात्त्विक ) विकार । जब अन्त: करण द्रवित होता है, तब बाह्य शरीरमें ॥ १७ कम्प, रोमांच, स्वरविकार, १ नेत्रविकार और अंगविकार शिष्योऽपि प्रकट होते हैं ॥ १५–१७ ॥ लक्षणैरेभिः कुर्याद्गुरुपरीक्षणम् । शिष्य भी शिवपूजन आदिमें गुरुका सम्पर्क तत्सम्पर्कैः शिवार्चादौ सङ्गतैर्वाथ तद्गतैः ॥ १८ प्राप्त करके अथवा उनके साथ रह करके उनमें प्रकट शिष्यस्तु शिक्षणीयत्वाद्गुरोगौरवकारणात् होनेवाले इन लक्षणोंसे गुरुकी परीक्षा करे । शिष्य गुरुका । शिक्षणीय होता है और उसका गुरुके प्रति गौरव होता तस्मात् सर्वप्रयत्नेन गुरोगौरवमाचरेत् ॥ १ ९ है । इसलिये सर्वथा प्रयत्न करके शिष्य ऐसा आचरण यो गुरुः स शिवः प्रोक्तो यः शिवः स गुरुः करे, जो गुरुके गौरवके अनुरूप हो ॥ १८-१९ ॥ गुरुर्वा शिव एवाथ विद्याकारेण स्मृतः । जो गुरु है, वह शिव कहा गया है और जो शिव संस्थितः ॥ २० है, वह गुरु माना गया है । विद्याके आकारमें शिवही यथा शिवस्तथा विद्या यथा गुरु बनकर विराजमान हैं । जैसे शिव हैं, वैसी विद्या शिवविद्या गुरूणां विद्या तथा गुरुः । है । जैसी विद्या है, वैसे गुरु हैं । शिव, विद्या और च पूजया सदृशं फलम् ॥ २१ गुरुके पूजनसे समान फल मिलताहै ॥ २०-२१ ॥ १. कण्ठसे गद्गदवाणीका प्रकट होना । २. नेत्रोंसे अश्रुपात होना । ३. शरीरमें स्तम्भ ( जड़ता ) तथा स्वेद आदिकाउदय होना ।
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अ ० १५ ] वायवीयसहिता
सर्वदेवात्मकश्चासौ सर्वमन्त्रमयो गुरुः ।
तस्मात्सर्वप्रयत्नेन तस्याज्ञां शिरसा वहेत् ॥ २२ ।
श्रेयोऽर्थी यदि गुर्वाज्ञां मनसापि न लंघयेत् ।
गुर्वाज्ञापालको यस्मात् ज्ञानसंपत्तिमश्नुते ॥ २३
गच्छंस्तिष्ठन् स्वपन् भुञ्जन्नान्यत्कर्म समाचरेत् ।
समक्षं यदि कुर्वीत सर्वं चानुज्ञया गुरोः ॥ २४
गुरोर्गृहे समक्षं वा न यथेष्टासनो भवेत् ।
गुरुर्देवो यतः साक्षात्तद्गृहं देवमन्दिरम् ॥ २५
पापिनां च यथा सङ्गात्तत्पापात्पतितो भवेत् ।
यथेह वह्निसम्पर्कात् मलं त्यजति काञ्चनम् ।
तथैव गुरुसम्पर्कात् पापं त्यजति मानवः ॥ २६
यथा वह्निसमीपस्थो घृतकुम्भो विलीयते ।
तथा पापं विलीयेत ह्याचार्यस्य समीपतः ॥ २७
यथा प्रज्वलितो वह्निः शुष्कमार्द्रं च निर्दहेत् ।
तथायमपि सन्तुष्टो गुरुः पापं क्षणाद्दहेत् ॥ २८
मनसा कर्मणा वाचा गुरोः क्रोधं न कारयेत् ॥ २ ९
तस्य क्रोधेन दह्यन्ते ह्यायुः श्रीज्ञानसत्क्रियाः ।
तत्क्रोधकारिणो ये स्युस्तेषां यज्ञाश्च निष्फलाः ॥ ३०
यमाश्च नियमाश्चैव नात्र कार्या विचारणा ।
गुरोर्विरुद्धं यद्वाक्यं न वदेज्जातुचिन्नरः ॥ ३१
वदेद्यदि महामोहाद्रौरवं नरकं व्रजेत् ।
मनसा कर्मणा वाचा गुरुमुद्दिश्य यत्नतः ॥ ३२
श्रेयोऽर्थी चेन्नरो धीमान्न मिथ्याचारमाचरेत् ।
गुरोर्हितं प्रियं कुर्यादादिष्टो वा न वा सदा ॥ ३३
( उत्तरखण्ड ) ९ ४३ शिव सर्वदेवात्मक हैं और गुरु सर्वमन्त्रमय । अतः सम्पूर्ण यत्नसे गुरुकी आज्ञाको शिरोधार्य करना चाहिये ॥ २२ ॥
यदि शिष्य [ अपने ] कल्याणका इच्छुक है, तो वह मनसे भी गुरुकी आज्ञाका उल्लंघन न करे क्योंकि गुरुकी आज्ञाका पालन करनेवाला ज्ञानरूपी सम्पदा प्राप्त करता है ॥ २३ ॥
चलते, बैठते, सोते तथा भोजन करते समय अन्य कर्म नहीं करना चाहिये । यदि गुरुके सामने कर्म करे तो सब कुछ उनकी आज्ञासे करे । गुरुके घरमें अथवा उनके सामने अपनी इच्छाके अनुरूप आसनपर न बैठे, क्योंकि गुरु साक्षात् देवता होते हैं और उनका घर देवमन्दिर है ॥ २४-२५ ॥ जैसे पापियोंके संगके कारण उनके पापसे मनुष्य पतित हो जाता है, जैसे अग्निके सम्पर्कसे सोना मल ( गन्दगी ) छोड़ देता है, वैसे ही गुरुके सम्पर्कसे मनुष्य पापसे मुक्त हो जाता है । जैसे अग्निके पास स्थित घड़े में रखा हुआ घृत पिघल जाता है, वैसे ही आचार्यके सम्पर्कसे शिष्यका पाप गल जाता है । जैसे प्रज्वलित अग्नि सूखे तथा गीले पदार्थको जला डालती है, वैसे ही प्रसन्न हुए ये गुरु भी क्षणभरमें पापको जला देते हैं ॥ २६–२८ ॥ मन, वचन तथा कर्मसे गुरुको कुपित नहीं करना चाहिये, उनके क्रोधसे आयु, श्री, ज्ञान तथा सत्कर्म दग्ध हो जाते हैं, जो उन्हें कुपित करते हैं, उनके यज्ञ, यम तथा नियम निष्फल हो जाते हैं, इसमें सन्देह नहीं करना चाहिये ॥ २ ९ -३० ॥ मनुष्यको चाहिये कि जो वचन गुरुके विरुद्ध हो, उसे कभी न बोले । यदि वह महामोहके कारण बोलता है, तो रौरव नरकमें पड़ता है ॥ ३११/२ ॥ यदि मनुष्य अपना कल्याण चाहनेवाला और बुद्धिमान् है तो वह गुरुके प्रति मन, वाणी और क्रियाद्वारा कभी मिथ्याचार - कपटपूर्ण बर्ताव न करे । गुरु आज्ञा दें या न दें, शिष्य सदा उनका हित और | प्रिय करे ॥ ३२-३३ ॥
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९ ४४ श्रीशिवमहापुराण [ अ ० १५ असमक्षं समक्षं वा तस्य कार्यं समाचरेत् । उनके सामने और पीठ पीछे भी उनका कार्य नित्यमुद्युक्तमानसः ॥ ३४ करता रहे । ऐसे आचारसे युक्त गुरुभक्त और इत्थमाचारवान्भक्तो | मनमें उत्साह रखनेवाला जो गुरुका प्रिय सदा गुरुप्रियकरः शिष्यः शैवधर्मांस्ततोऽर्हति । | करनेवाला शिष्य है, वही शैव धर्मोंके उपदेशका कार्य अधिकारी है ॥ ३४१/२ ॥ गुरुश्चेद्गुणवान् प्राज्ञः परमानन्दभासकः ॥३५ यदि गुरु गुणवान्, विद्वान्, परमानन्दका प्रकाशक तत्त्वविच्छिवसंसक्तो मुक्तिदो न तु चापरः । | तत्त्ववेत्ता और शिवभक्त है तो वही मुक्ति देनेवाला, संवित्सञ्जननं तत्त्वं परमानन्दसम्भवम् ॥ ३६ दूसरा नहीं । ज्ञान उत्पन्न करनेवाला जो परमानन्दजनित है, तत्तत्त्वं विदितं येन स एवानन्ददर्शकः । | तत्त्व है, उसे जिसने जान लिया है, वही आनन्दका । न पुनर्नाममात्रेण संविदारहितस्तु यः ॥ ३७ साक्षात्कार करा सकता है । ज्ञानरहित नाममात्रका गुरु ऐसा नहीं कर सकता ॥ ३५–३७ ॥ अन्योऽन्यं तारयेन्नौका किं शिला तारयेच्छिलाम् । नौकाएँ एक - दूसरीको पार लगा सकती हैं, किंतु एतस्य नाममात्रेण मुक्तिर्वै नाममात्रिका ॥ ३८ क्या कोई शिला दूसरी शिलाको तार सकती है? नाममात्रके
यैः पुनर्विदितं तत्त्वं ते मुक्ता मोचयन्त्यपि ।
तत्त्वहीने कुतो बोधः कुतो ह्यात्मपरिग्रहः ॥ ३ ९
परिग्रहविनिर्मुक्तः पशुरित्यभिधीयते ।
पशुभिः प्रेरितश्चापि पशुत्वं नातिवर्तते ॥ ४०
तस्मात्तत्त्वविदेवेह मुक्तो मोचक इष्यते ।
सर्वलक्षणसंयुक्तः सर्वशास्त्रविदप्ययम् ॥ ४१
सर्वोपायविधिज्ञोऽपि तत्त्वहीनस्तु निष्फलः ।
यस्यानुभवपर्यन्ता बुद्धिस्तत्त्वे प्रवर्तते ॥ ४२
तस्यावलोकनाद्यैश्च परानन्दोऽभिजायते ।
तस्माद्यस्यैव संपर्कात्प्रबोधानंदसंभवः॥ ४३
गुरुं तमेव वृणुयान्नापरं मतिमान्नरः । स शिष्यैर्विनयाचारचतुरैरुचितो गुरुः ॥ ४४ यावद्विज्ञायते तावत्सेवनीयो मुमुक्षुभिः । ज्ञाते तस्मिन्स्थिरा भक्तिर्यावत्तत्त्वं समाश्रयेत् ॥ ४५ | गुरुसे नाममात्रकी ही मुक्ति प्राप्त हो सकती है । जिन्हें तत्त्वका ज्ञान है, वे ही स्वयं मुक्त होकर दूसरोंको भी मुक्त करते हैं । तत्त्वहीनको कैसे बोध होगा और बोधके बिना कैसे ‘ आत्मा ' का अनुभव होगा? ॥ ३८-३९ ॥ जो आत्मानुभवसे शून्य है, वह ' पशु ' कहलाता है । पशुकी प्रेरणासे कोई पशुत्वको नहीं लाँघ सकता; अतः तत्त्वज्ञ पुरुष ही ' मुक्त ' और ' मोचक ' हो
सकता है, अज्ञ नहीं ॥। ४०१/२ ॥
समस्त शुभ लक्षणोंसे युक्त, सम्पूर्ण शास्त्रोंका ज्ञाता तथा सब प्रकारके उपाय - विधानका जानकार होनेपर भी जो तत्त्वज्ञानसे हीन है, उसका जीवन निष्फल है ॥४११ / २ ॥ जिस पुरुषकी अनुभवपर्यन्त बुद्धि तत्त्वके अनुसंधानमें प्रवृत्त होती है, उसके दर्शन, स्पर्श आदिसे परमानन्दकी प्राप्ति होती है । अतः जिसके सम्पर्कसे ही उत्कृष्ट बोधस्वरूप आनन्दकी प्राप्ति सम्भवहो, बुद्धिमान् पुरुष उसीको अपना गुरु चुने, दूसरेको नहीं ॥ ४२-४३१ / २ ॥ योग्य गुरुका जबतक अच्छी तरह ज्ञान न हो जाय, तबतक विनयाचार - चतुर मुमुक्षु शिष्योंको उनकी निरन्तर सेवा करनी चाहिये । उनका अच्छी तरह ज्ञान — सम्यक् परिचय हो जानेपर उनमें सुस्थिर भक्ति करे । जबतक तत्त्वका बोध न प्राप्त हो जाय, तबतक निरन्तर गुरुसेवनमें लगा रहे ॥ ४४-४५ ॥
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अ ० १५ ] वायवीयसहिता तत्त्वं त्यजेज्जातु नोपेक्षेत कथंचन । न तु प्रबोधो वा नाल्पमप्युपलभ्यते यत्रानंदः ॥ ४६ वत्सरादपि शिष्येण सोऽन्यं गुरुमुपाश्रयेत् । प्रपन्नेऽपि नावमन्येत पौर्विकम् । गुरुमन्यं गुरोभ्रांतॄंस्तथा पुत्रान् बोधकान् प्रेरकानपि ॥ ४७
तत्रादावुपसङ्गम्य ब्राह्मणं वेदपारगम् ।
गुरुमाराधयेत्प्राज्ञं शुभगं प्रियदर्शनम् ॥ ४८
सर्वाभयप्रदातारं करुणाक्रान्तमानसम् ।
तोषयेत्तं प्रयत्नेन मनसा कर्मणा गिरा ॥ ४ ९
तावदाराधयेच्छिष्यः प्रसन्नोऽसौ भवेद्यथा ।
तस्मिन् प्रसन्ने शिष्यस्य सद्यः पापक्षयो भवेत् ॥ ५०
तस्माद्धनानि रत्नानि क्षेत्राणि च गृहाणि च ।
भूषणानि च वासांसि यानशय्यासनानि च ॥५१
एतानि गुरवे दद्याद्भक्त्या वित्तानुसारतः ।
वित्तशाठ्यं न कुर्वीत यदीच्छेत्परमां गतिम् ॥ ५२
स एव जनको माता भर्ता बन्धुर्धनं सुखम् ।
सखा मित्रं च यत्तस्मात्सर्वं तस्मै निवेदयेत् ॥ ५३
निवेद्य पश्चात्स्वात्मानं सान्वयं सपरिग्रहम् ।
समर्प्य सोदकं तस्मै नित्यं तद्वशगो भवेत् ॥ ५४
यदा शिवाय स्वात्मानं दत्तवान् देशिकात्मने ।
तदा शैवो भवेद्देही न ततोऽस्ति पुनर्भवः ॥ ५५
गुरुश्च स्वाश्रितं शिष्यं वर्षमेकं परीक्षयेत् । ( उत्तरखण्ड ) ९ ४५ तत्त्वको न तो कभी छोड़े और न किसी तरह भी उसकी उपेक्षा ही करे । जिसके पास एक वर्ष रहनेपर भी शिष्यको थोड़ेसे भी आनन्द और प्रबोधकी उपलब्धि न हो, वह शिष्य उसे छोड़कर दूसरे गुरुका आश्रय ले ॥४६१ / २ ॥ दूसरे गुरुके शरणागत होनेपर भी पूर्वगुरुका, गुरुके भाइयोंका, उनके पुत्रोंका, उपदेशकोंका तथा प्रेरकोंका अपमान न करे ॥ ४७ ॥
सर्वप्रथम ब्राह्मण, वेदमें पारंगत, प्रज्ञासम्पन्न, सुन्दर, प्रियदर्शन, सब प्रकारसे अभय प्रदान करनेवाले तथा करुणामय चित्तवाले गुरुके पास जाकर उनकी आराधना करनी चाहिये और मन - वचन - कर्मसे प्रयत्नपूर्वक उन्हें प्रसन्न करना चाहिये ॥ ४८-४९ ॥ शिष्यको चाहिये कि तबतक उनकी आराधना करे, जबतक वे प्रसन्न न हो जायँ । उनके प्रसन्न हो जानेपर शीघ्र ही शिष्यके पापका नाश हो जाता है, अतः धन, रत्न, क्षेत्र, गृह, आभूषण, वस्त्र, वाहन, शय्या, आसन — यह सब भक्तिपूर्वक अपने धन-सामर्थ्यके अनुसार गुरुको प्रदान करना चाहिये । यदि शिष्य परमगति चाहता है, तो उसे धनकी कृपणता नहीं करनी चाहिये ॥ ५०–५२ ॥ वे ही पिता, माता, पति, बन्धु, धन, सुख, सखा तथा मित्र हैं, इसलिये उन्हें सब कुछ अर्पित कर देना चाहिये । इस प्रकार निवेदित करके बादमें परिवार तथा बन्धुजनोंसहित अपनेको भी संकल्पपूर्वक उन्हें समर्पित करके सदाके लिये उनके अधीन हो जाना चाहिये । जब मनुष्य शिवस्वरूप गुरुके निमित्त अपनेको समर्पित कर देता है, तब वह शैव हो जाता है और उसके बाद उसका पुनर्जन्म नहीं होता है ॥५३-५५ ॥ गुरुको भी चाहिये कि वह अपने आश्रित ब्राह्मण-वैश्यं द्विवर्षं च त्रिवर्षकम् ॥ ५६ जातीय शिष्यकी एक वर्षतक परीक्षा करे । क्षत्रिय शिष्यकी ब्राह्मणं क्षत्रियं दो वर्ष और वैश्यकी तीन वर्षतक परीक्षा करे ॥ ५६ ॥
प्राणोंको संकटमें डालकर सेवा करने और अधिक धन देने आदिका अनुकूल - प्रतिकूल आदेश देकर, उत्तम जातिवालोंको छोटे काममें लगाकर और प्राणद्रव्यप्रदानाद्यैरादेशैश्च समासमैः । छोटोंको उत्तम काममें नियुक्त करके उनके धैर्य और परीक्षा करे ॥५७ ॥
उत्तमांश्चाधमे नीचानुत्तमकर्मणि ॥ ५७ । सहनशीलताकी कृत्वा
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९ ४६ श्रीशिवमहापुराण [ अ ० १५ वापि ये विषादं न यान्त्यपि । गुरुके तिरस्कार आदि करनेपर भी जो विषादक ते आक्रुष्टास्ताडिता योग्याः संयताः शुद्धाः शिवसंस्कारकर्मणि ॥ ५८ / नहीं प्राप्त होते, वे ही संयमी, शुद्ध तथा शिव - संस्कार । कर्मके योग्य हैं । जो किसीकी हिंसा नहीं करते अहिंसका दयावन्तो नित्यमुद्युक्तचेतसः । | प्रति दयालु होते हैं, सदा हृदयमें उत्साह रखकर, सबक अमानिनो बुद्धिमन्तः त्यक्तस्पर्द्धाः प्रियंवदाः ॥ ५ ९ कार्य करनेको उद्यत रहते हैं; अभिमानशून्य बुद्धिमान सब और स्पर्धारहित होकर प्रिय वचन बोलते, हैं ऋजवो मृदवः स्वच्छा विनीताः स्थिरचेतसः । | कोमल, स्वच्छ, विनयशील, सुस्थिरचित्त शौचाचारसे ; सरल, , शौचाचारसमायुक्ताः शिवभक्ता द्विजातयः ॥ ६० संयुक्त और शिवभक्त होते हैं, ऐसे आचार - व्यवहारवाले | द्विजातियोंको मन, वाणी, शरीर और क्रियाद्वारा एवं वृत्तसमोपेता वाङ्मनःकायकर्मभिः । यथोचित रीतिसे शुद्ध करके तत्त्वका बोध शोध्या बोध्या यथान्यायमिति शास्त्रेषु निश्चयः ॥ ६१ चाहिये, यह शास्त्रोंका निर्णय है॥५८–६१ कराना ॥ । नाधिकारः स्वतो नार्याः शिवसंस्कारकर्मणि । शिव - संस्कार कर्ममें नारीका स्वतः अधिकार नियोगाद्भर्तुरस्त्येव भक्तियुक्ता यदीश्वरे ॥ ६२ नहीं है । यदि वह शिवभक्त हो तो पतिकी आज्ञासे ही तथैव भर्तृहीनाया पुत्रादेरभ्यनुज्ञया ।
अधिकारो भवत्येव कन्यायाः पितुराज्ञया ।
शूद्राणां मर्त्यजातीनां पतितानां विशेषतः ॥ ६३
तथा सङ्करजातीनां नाध्वशुद्धिर्विधीयते ।
तेऽप्यकृत्रिमभावाश्चेच्छिवे परमकारणे ॥ ६४
पादोदकप्रदानाद्यैः कुर्युः पापविशोधनम् ।
अत्रानुलोमजाता ये युक्ता एव द्विजातिषु ॥ ६५
तेषामध्वविशुद्धयादि कुर्यान्मातृकुलोचितम् ।
या तु कन्या स्वपित्राद्यैः शिवधर्मे नियोजिता ॥ ६६
स भक्ताय प्रदातव्या नापराय विरोधिने ।
दत्ता चेत्प्रतिकूलाय प्रमादाद्बोधयेत्पतिम् ॥ ६७
अशक्ता तं परित्यज्य मनसा धर्ममाचरेत् ।
यथा मुनिवरं त्यक्त्वा पतिमत्रिं पतिव्रता ॥ ६८
कृतकृत्याभवत्पूर्वं तपसाराध्य शङ्करम् ।
यथा नारायणं देवं तपसाराध्य पांडवाः ॥ ६ ९
पतील्लब्धवती धर्मे गुरुभिर्न नियोजिता ।
अस्वातन्त्र्यकृतो दोषो नेहास्ति परमार्थतः ॥ ७०
शिवधर्मे नियुक्तायाः शिवशासनगौरवात् । । | उक्त संस्कारकी अधिकारिणी होती है ॥ ६२ ॥
विधवा स्त्रीका पुत्र आदिकी अनुमतिसे और कन्याका पिताकी आज्ञासे शिव - संस्कारमें अधिकार होता है । शूद्रों, पतितों और वर्णसंकरोंके लिये षडध्वशोधन ( शिव-| संस्कार ) - का विधान नहीं है । वे भी यदि परमकारण शिवमें स्वाभाविक अनुराग रखते हों तो शिवका चरणोदक । लेकर अपने पापोंकी शुद्धि करें ॥ ६३-६४१ / २ ॥ द्विजातियोंमें जो वर्णसंकर उत्पन्न हुए हैं, उनकी अध्व - शुद्धि माताके कुलके अनुसार करना चाहिये ॥ ६५१/२ ॥ जो कन्या पिता आदिके द्वारा शिवधर्ममें नियुक्त की गयी हो, [ पिता आदिको चाहिये कि वे ] उसे शिवभक्त वरको ही प्रदान करें, किसी शिवविरोधीको नहीं । यदि असावधानीवश किसी प्रतिकूलको दे दी जाय, तो वह कन्या पतिको समझाये; यदि वह असमर्थ हो, तो उसे छोड़कर मनोयोगसे [ एकाकिनी ही रहकर ] शिवधर्मका आचरण करे; जैसे कि अपने पति मुनिवर अत्रिको छोड़कर पतिव्रता अनसूया तपस्यासे शंकरकी आराधना करके कृतकृत्य हुईं और जैसे तपस्याके द्वारा भगवान् नारायणकी आराधना करके द्रौपदीने गुरुजनोंके द्वारा धर्मानुशासित होकर पतिरूपमें पाण्डवोंका वरण किया । शिवधर्मके आधारपर [ इस प्रकारका ] व्यवहार करनेवाली द्रौपदीको शिवजीके धर्मानुशासनके गौरववश वस्तुतः इस प्रसंगसे यथेच्छाचाररूप पाप भी नहीं लगा ॥ ६६-७०१ / २ ॥