शिव महापुराण - २ — पृष्ठ 961–970

शिव महापुराण - २ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 961–970

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अ ० १६ ] वायवीयसहिता किमुक्तेन योऽपि कोऽपि शिवाश्रयः ॥ ७१ बहुनात्र

संस्कार्यों गुर्वधीनश्चेत्संस्क्रिया न प्रभिद्यते ।

गुरोरालोकनादेव स्पर्शात्संभाषणादपि ॥ ७२

यस्य सञ्जायते प्रज्ञा तस्य नास्ति पराजयः ।

मनसा यस्तु संस्कारः क्रियते योगवर्त्मना ॥ ७३

स नेह कथितो गुह्यो गुरुवक्त्रैकगोचरः ।

क्रियावान् यस्तु संस्कार: कुंडमंडपपूर्वकः ।

स वक्ष्यते समासेन तस्य शक्यो न विस्तरः ॥ ७४

( उत्तरखण्ड ) ९ ४७ इस विषयमें अधिक क्या कहा जाय! जो कोई भी शिवजीका आश्रय ले ले और गुरुका अनुगत हो जाय [ तो गुरुको चाहिये कि वे ] उसको दीक्षा आदिसे संस्कारसम्पन्न करें, [ यह अवश्य है कि अधिकारी - भेदसे ] संस्कारकी प्रक्रिया भिन्न हो जाती है ॥ ७११/२ ॥ गुरुके द्वारा [ कृपापूर्वक ] देखने, छूने अथवा वार्तालाप करनेमात्रसे उस [ साधक ] -में निर्मल बुद्धिका उदय होता है और तब वह [ नानाविध दोषोंसे ] पराजित नहीं होता । यौगिक रीतिसे [ शिष्यको ] जो मानसी दीक्षा प्रदान की जाती है, वह विषय अतीव गोपनीय होनेके कारण गुरुमुखसे ही जाननेयोग्य है, अतएव यहाँ उसका वर्णन नहीं किया गया । कुण्ड-मण्डप आदिका निर्माण करके जिस दीक्षाप्रक्रियाका सम्पादन किया जाता है, उसीको यहाँ संक्षेपमें बताया जा रहा है, क्योंकि उसका विस्तृत वर्णन करना । सम्भव नहीं है ॥ ७२–७४ ॥ इति श्रीशिवमहापुराणे सप्तम्यां वायवीयसंहितायामुत्तरखण्डे दीक्षाविधाने गुरुमाहात्म्यवर्णनं नाम पञ्चदशोऽध्यायः ॥ १५ ॥

॥ इस प्रकार श्रीशिवमहापुराणके अन्तर्गत सातवीं वायवीयसंहिताके उत्तरखण्डमें दीक्षाविधानमें गुरुमाहात्म्यवर्णन नामक पन्द्रहवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ १५ ॥

अथ षोडशोऽध्यायः समय - संस्कार या समयाचारकी दीक्षाकी विधि उपमन्युरुवाच

पुण्येऽहनि शुचौ देशे बहुदोषविवर्जिते ।

देशिकः प्रथमं कुर्यात्संस्कारं समयाह्वयम् ॥

परीक्ष्य भूमिं विधिवद् गन्धवर्णरसादिभिः ।

शिल्पिशास्त्रोक्तमार्गेण मण्डपं तत्र कल्पयेत् ॥

कृत्वा वेदिं च तन्मध्ये कुण्डानि परिकल्पयेत् ।

अष्टदिक्षु तथा दिक्षु तत्रैशान्यां पुनः क्रमात् ॥

प्रधानकुण्डं कुर्वीत यद्वा पश्चिमभागतः ।

प्रधानमेकमेवाथ कृत्वा शोभां प्रकल्पयेत् ॥

वितानध्वजमालाभिर्विविधाभिरनेकशः वेदिमध्ये ततः कुर्यान्मंडलं शुभलक्षणम् ॥ उपमन्यु कहते हैं — यदुनन्दन! नाना प्रकारके दोषोंसे रहित शुद्ध स्थान और पवित्र दिनमें गुरु पहले १ शिष्यका ' समय ' नामक संस्कार करे ॥ १ ॥

गन्ध, वर्ण और रस आदिसे विधिपूर्वक भूमिकी परीक्षा करके वास्तु - शास्त्रमें बतायी हुई पद्धतिसे वहाँ २ मण्डपका निर्माण करे ॥२ ॥

मण्डपके बीचमें वेदी बनाकर आठों ३ दिशाओंमें छोटे - छोटे कुण्ड बनाये । फिर ईशानकोणमें या पश्चिम - दिशामें प्रधानकुण्डका निर्माण करे । एक ही प्रधान कुण्ड बनाकर चँदोवा, ध्वज तथा ४ अनेक प्रकारकी बहुसंख्यक मालाओंसे उसको सजाये । तत्पश्चात् वेदीके मध्यभागमें शुभ लक्षणोंसे युक्त मण्डल बनाये ॥ ३–५ ॥ ५

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९ ४८ ( श्रीशिवमहापुराण [ अ ० १६ लालरंगके सुवर्ण आदिके चूर्णसे वह रक्तहेमादिभिश्चणैरीश्वरावाहनोचितम् निर्धनः ॥ ६ बनाना चाहिये । मण्डल ऐसा हो कि उसमें ईश्वरक मण्डल सिंदूरशालिनीवारचूर्णैरेवाथ एकहस्तं द्विहस्तं वा सितं वा रक्तमेव वा एकहस्तस्य पद्मस्य कर्णिकाष्टांगुला मता केसराणि तदर्धानि शेषं चाष्टदलादिकम् द्विहस्तस्य तु पद्मस्य द्विगुणं कर्णिकादिकम् ॥

कृत्वा शोभोपशोभाढ्या मैशान्यां तस्य कल्पयेत् ।

एकहस्तं तदर्द्धं वा पुनर्वेद्यां तु मंडलम् ॥

व्रीहितंदुलसिद्धार्थतिलपुष्पकुशास्तृते तत्र लक्षणसंयुक्तं शिवकुंभं प्रसाधयेत् ॥

सौवर्णं राजतं वापि ताम्रजं मृन्मयं तु वा ।

गन्धपुष्पाक्षताकीर्णं कुशदूर्वाङ्कुराचितम् ॥

सितसूत्रावृतं कंठे नववस्त्रयुगावृतम् ।

शुद्धाम्बुपूर्णमुत्कूर्चं सद्रव्यं सपिधानकम् ॥

भृङ्गारं वर्धनीं चापि शंखं च चक्रमेव वा ।

विना सूत्रादिकं सर्वं पद्मपत्रमथापि वा ॥

तस्यासनारविंदस्य कल्पयेदुत्तरे दले । अग्रतश्चंदनांभोभिरस्त्रराजस्य । आवाहन किया जा सके । निर्धन मनुष्य सिन्दूर अगहनी या तिन्नीके चावलके चूर्ण से मण्डल बनाये तथा । उस मण्डपमें एक या दो हाथका श्वेत ॥ ६ ॥

॥ ७ । कमल बनाये । एक हाथके कमलकी कर्णिका या लाल आठ अंगुलकी होनी चाहिये ॥७ ॥

। उसके केसर चार अंगुलमें हों और शेष भागमें ८ अष्टदल आदिकी कल्पना करे । दो हाथके कमलको कर्णिका आदि एक हाथवालेसे दुगुनी होनी चाहिये । | उक्त वेदी या मण्डपके ईशानकोणमें पुन: एक वेदीपर ९ एक हाथ या आधे हाथका मण्डल बनाये और उसे शोभाजनक सामग्रियोंसे सुशोभित करे ॥ ८ - ९ ॥ तत्पश्चात् धान, चावल, सरसों, तिल, फूल और १० कुशासे उस मण्डलको आच्छादित करके उसके ऊपर शुभ लक्षणसे युक्त शिवकलशकी स्थापना करे ॥ १० ॥

वह कलश सोना, चाँदी, ताँबा अथवा मिट्टीका ११ होना चाहिये । उसपर गन्ध, पुष्प, अक्षत, कुश और दूर्वांकुर रखे जायँ, उसके कण्ठमें सफेद सूत लपेटा जाय और उसे दो नूतन वस्त्रोंसे आच्छादित किया जाय । उसमें शुद्ध जल भर दिया जाय । कलशमें एक १२ मुट्ठा कुश अग्रभाग ऊपरकी ओर करके डाला जाय । सुवर्ण आदि द्रव्य छोड़ा जाय और उस कलशको ऊपरसे ढक दिया जाय॥११-१२ ॥ उस आसनरूप कमलके उत्तर दलमें सूत्र १३ आदिके बिना झारी या गडुआ, वर्धनी ( विशिष्ट जलपात्र ), शंख, चक्र और कमलदल आदि सब सामग्री संग्रह करके रखे । उक्त आसन - मण्डलके वर्धनीम् ॥ १४ अग्रभागमें चन्दनमिश्रित जलसे भरी हुई वर्धनी अस्त्रराजके लिये रखे॥१३-१४ ॥ मण्डलस्य ततः प्राच्यां मन्त्रकुंभे च पूर्ववत् । फिर मण्डलके पूर्वभागमें पूर्ववत् मन्त्रयुक्त कृत्वा विधिवदीशस्य महापूजां समाचरेत् ॥ १५ कलशकी स्थापना करके शिवकी विधिपूर्वक महापूजा अथार्णवस्य तीरे वा नद्यां गोष्ठेऽपि आरम्भ करे ॥ १५ ॥

देवागारे गृहे वा गिरौ । समुद्र या नदीके किनारे, गोशालामें, पर्वतके वापि देशेऽन्यस्मिन्मनोहरे ॥ १६ शिखरपर, देवालयमें अथवा घरमें या किसी भी कृत्वा पूर्वोदितं सर्वं विना वा मंडपादिकम् मनोहर स्थानमें मण्डपादि रचनाके बिना पूर्वोक्त सब । कार्य करे ॥ १६१/२ ॥

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अ ० १६ ] वायवीयसहिता मंडलं पूर्ववत्कृत्वा स्थंडिलं च विभावसोः ॥ १७ ।

प्रविश्य पूजाभवनं प्रहृष्टवदनो गुरुः ।

सर्वमङ्गलसंयुक्तः समाचरितनैत्यकः ॥ १८

महापूजा महेशस्य कृत्वा मण्डलमध्यतः ।

शिवकुंभे तथा भूयः शिवमावाह्य पूजयेत् ॥ १ ९

पश्चिमाभिमुखं ध्यात्वा यज्ञरक्षकमीश्वरम् ।

अर्चयेदस्त्रवर्द्धन्यामस्त्रमीशस्य दक्षिणे ॥ २०

मन्त्रकुम्भे च विन्यस्य मन्त्रं मन्त्रविशारदः ।

कृत्वा मुद्रादिकं सर्वं मन्त्रयागं समाचरेत् ॥ २१

ततः शिवानले होमं कुर्याद्देशिकसत्तमः ।

प्रधानकुण्डे परितो जुहुयुश्चापरे द्विजाः ॥ २२

आचार्यात्पादमर्द्ध वा होमस्तेषां विधीयते ।

प्रधानकुण्ड एवाथ जुहुयाद्देशिकोत्तमः ॥ २३

स्वाध्यायमपरे कुर्युः स्तोत्रं मङ्गलवाचनम् । जपं च विधिवच्चान्ये शिवभक्तिपरायणाः । २४

नृत्यं गीतं च वाद्यं च मङ्गलान्यपराणि च ।

पूजनं च सदस्यानां कृत्वा सम्यग्विधानतः ॥ २५

पुण्याहं कारयित्वाथ पुनः संपूज्य शङ्करम् ।

प्रार्थयेद्देशिको देवं शिष्यानुग्रहकाम्यया ॥ २६

प्रसीद देवदेवेश देहमाविश्य मामकम् ।

विमोचयैनं विश्वेश घृणया च घृणानिधे ॥ २७

अथ चैवं करोमीति लब्धानुज्ञस्तु देशिकः ।

आनीयोपोषितं शिष्यं हविष्याशिनमेव वा ॥ २८

एकाशनं वा विरतं स्नातं प्रातःकृतक्रियम् ।

जपन्तं प्रणवं देवं ध्यायन्तं कृतमङ्गलम् ॥ २ ९

( उत्तरखण्ड ) ९ ४ ९ फिर पूर्ववत् मण्डल और अग्निकी वेदी बनाकर गुरु प्रसन्नमुखसे पूजा - भवनमें प्रवेश करे । वहाँ सब प्रकारके मंगल - कृत्यका सम्पादन करके नित्यकर्मके अनुष्ठानपूर्वक मण्डलके मध्यभागमें महेश्वरकी महापूजा करनेके अनन्तर पुनः शिवकलशपर शिवका आवाहन - पूजन करे ॥ १७-१९ ॥ पश्चिमाभिमुख यज्ञरक्षक ईश्वरका ध्यान करके अस्त्रराजकी वर्धनीमें दक्षिणकी ओर ईश्वरके अस्त्रकी पूजा करे । फिर मन्त्रयुक्त कलशमें मन्त्र तथा मुद्रा आदिका न्यास करके मन्त्रविशारद गुरु मन्त्र-याग करे ॥ २०-२१ ॥ इसके बाद देशिकशिरोमणि गुरु प्रधान कुण्डमें शिवाग्निकी स्थापना करके उसमें होम करे । साथ ही दूसरे ब्राह्मण भी चारों ओरसे उसमें आहुति डालें । आचार्यसे आधे या चौथाई होमका उनके लिये विधान है । आचार्यशिरोमणिको प्रधान कुण्डमें ही हवन करना चाहिये ॥ २२-२३ ॥ दूसरे लोगोंको स्वाध्याय, स्तोत्र एवं मंगलपाठ करना चाहिये । अन्य शिवभक्त भी वहाँ विधिवत् जप करें ॥ २४ ॥

नृत्य, गीत, वाद्य एवं अन्य मंगल - कृत्य भी होने चाहिये । सदस्योंका विधिवत् पूजन, पुण्याहवाचन तथा पुनः भगवान् शंकरका पूजन सम्पन्न करके शिष्यपर अनुग्रह करनेकी इच्छा मनमें ले आचार्य महादेवजीसे इस प्रकार प्रार्थना करे – ‘ देवदेवेश्वर! प्रसन्न होइये । विश्वनाथ! दयानिधे! मेरे शरीरमें प्रवेश करके आप कृपापूर्वक इस शिष्यको बन्धनमुक्त

कराइये । ' ॥ २५–२७ ॥

तदनन्तर ' मैं ऐसा ही करूँगा ' इस प्रकार इष्टदेवकी अनुमति पाकर गुरु उस शिष्यको, जिसने उपवास किया हो या हविष्य भोजन किया हो, अपने निकट बुलाये । वह शिष्य एक समय भोजन करनेवाला और विरक्त हो । स्नान करके प्रातःकालका कृत्य पूरा कर चुका हो । मंगलकृत्यका सम्पादन करके प्रणवका जप और महादेवजीका ध्यान कर रहा हो ॥ २८-२९ ॥

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९ ५० श्रीशिवमहापुराण [ अ ० १६ दक्षिणस्य वा । उसे पश्चिम या दक्षिण द्वारके सामने द्वारस्य पश्चिमस्याग्रमण्डले शिशुम् ॥ ३० कुशके आसनपर उत्तरकी ओर मुँह करके बिठाये मण्डल म दर्भासने समासीनं विधायोदङ्मुखं

स्वयं प्राग्वदनस्तिष्ठन्नूर्ध्वकायं कृताञ्जलिम् ।

संप्रोक्ष्य प्रोक्षणीतोयैर्मूर्द्धन्यस्त्रेण मुद्रया ॥

पुष्पक्षेपेण सन्ताड्य बध्नीयाल्लोचनं गुरुः ।

दुकूलार्द्धेन वस्त्रेण मन्त्रितेन नवेन च ॥

ततः प्रवेशयेच्छिष्यं गुरुद्वरिण मंडलम् ।

सोऽपि तेनेरितः शंभोराचरेत् त्रिःप्रदक्षिणाम् ॥

ततः सुवर्णसंमिश्रं दत्त्वा पुष्पाञ्जलिं प्रभोः ।

प्राङ्मुखश्चोदङ्मुखो वा प्रणमेद्दण्डवत्क्षितौ ॥

ततः संप्रोक्ष्य मूलेन शिरस्यस्त्रेण पूर्ववत् ।

सन्ताड्य देशिकस्तस्य मोचयेन्नेत्रबन्धनम् ॥

स दृष्ट्वा मंडलं भूयः प्रणमेत्साञ्जलिः प्रभुम् । । गुरु स्वयं पूर्वकी ओर मुँह करके खड़ा रहे । और । ऊपरकी ओर मुँह करके हाथ जोड़ ले । गुरु प्रोक्षणीक शिष्य ३१ जलसे शिष्यका प्रोक्षण करके उसके मस्तकपर । अस्त्रमुद्राद्वारा फूल फेंककर मारे । फिर अभिमन्त्रित ३२ नूतन वस्त्र - आधे दुपट्टेसे उसकी आँखोंको बा दे॥३०–३२ ॥ इसके बाद शिष्यको दरवाजेसे मण्डलके ३३ भीतर प्रवेश कराये । शिष्य भी गुरुसे प्रेरित हो । शंकरजीकी तीन बार प्रदक्षिणा करे । इसके प्रभुको सुवर्णमिश्रित पुष्पांजलि चढ़ाकर पूर्व बाद या ३४ उत्तरकी ओर मुँह करके पृथ्वीपर दण्डकी भाँति गिरकर साष्टांग प्रणाम करे ॥ ३३-३४ ॥ तदनन्तर मूलमन्त्रसे गुरु शिष्यका प्रोक्षण करके ३५ पूर्ववत् अस्त्रमन्त्रके द्वारा उसके मस्तकपर फूलसे ताड़न करनेके पश्चात् नेत्र - बन्धन खोल दे ॥ ३५ ॥

शिष्य पुनः मण्डलकी ओर देखकर हाथ जोड़ अथासीनं शिवाचार्यो मंडलस्य तु दक्षिणे ॥ ३६ प्रभुको प्रणाम करे । इसके बाद शिवस्वरूप आचार्य उपवेश्यात्मनः सव्ये शिष्यं दर्भासने गुरुः । शिष्यको मण्डलके दक्षिण अपने बायें भागमें कुशके आराध्य च महादेवं शिवहस्तं प्रविन्यसेत् आसनपर बिठाये और महादेवजीकी आराधना करके ॥ ३७ उसके मस्तकपर शिवका वरद हाथ रखे ॥ ३६-३७ ॥ शिवतेजोमयं पाणिं शिवमन्त्रमुदीरयेत् । ‘ मैं शिव हूँ ’ इस अभिमानसे युक्त गुरु शिवके शिवाभिमानसंपन्नो न्यसेच्छिष्यस्य मस्तके ॥ ३८ तेजसे सम्पन्न अपने हाथको शिष्यके मस्तकपर रखे सर्वाङ्गालम्बनं चैव कुर्यात्तेनैव देशिकः और शिवमन्त्रका उच्चारण करे । उसी हाथसे वह शिष्योऽपि प्रणमेद्भूमौ देशिकाकृतिमीश्वरम् । शिष्यके सम्पूर्ण अंगोंका स्पर्श करे । शिष्य भी ॥ ३ ९ आचार्यरूपमें उपस्थित हुए ईश्वरको पृथ्वीपर गिरकर ततः शिवानले देवं समभ्यर्च्य साष्टांग प्रणाम करे ॥ ३८-३९ ॥ यथाविधि । तदनन्तर जब शिष्य शिवाग्निमें महादेवजीकी हुताहुतित्रयं शिष्यमुपवेश्य यथा पुरा ॥ ४० विधिवत् पूजा करके तीन आहुति दे ले, तब गुरु पुनः दर्भाग्रैः संस्पृशंस्तं च विद्ययात्मानमाविशेत् पूर्ववत् शिष्यको अपने पास बिठा ले । कुशोंके । अग्रभागसे उसका स्पर्श करते हुए विद्या या मन्त्रद्वारा नमस्कृत्य महादेवं अपने - आपको उसके भीतर आविष्ट करे ॥ ४०१/२ ॥ नाडीसन्धानमाचरेत् ॥ ४१ तत्पश्चात् महादेवजीको प्रणाम करके नाड़ी-शिवशास्त्रोक्तमार्गेण कृत्वा प्राणस्य निर्गमम् संधान करे । फिर शिव - शास्त्रमें बताये हुए मार्गसे प्राणका शिष्यदेहप्रवेशं च स्मृत्वा मन्त्रांस्तु । निष्क्रमण करके शिष्यके शरीरमें प्रवेशकी भावना करे, तर्पयेत् ॥ ४२ । साथ ही मन्त्रोंका तर्पण भी करे ॥ ४१-४२ ॥

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अ ० १६ ] वायवीयसंहिता

सन्तर्पणाय मूलस्य तेनैवाहुतयो दश ।

देयास्तिस्त्रस्तथाङ्गानामङ्गरैव यथाक्रमम् ॥ ४३

ततः पूर्णाहुतिं दत्त्वा प्रायश्चित्ताय देशिकः ।

पुनर्दशाहुतीः कुर्यान्मूलमन्त्रेण मन्त्रवित् ॥ ४४

पुनः संपूज्य देवेशं सम्यगाचम्य देशिकः ।

चैव यथान्यायं स्वजात्या वैश्यमुद्धरेत् ॥ ४५

तस्यैवं जनयेत्क्षात्रमुद्धारं च ततः पुनः ।

कृत्वा तथैव विप्रत्वं जनयेदस्य देशिकः ॥ ४६

राजन्यं चैवमुद्धृत्य कृत्वा विप्रं पुनस्तयोः 1 रुद्रत्वं जनयेद्विप्रे रुद्रनामैव साधयेत् ॥ ४७

प्रोक्षणं ताडनं कृत्वा शिशोः स्वात्मानमात्मनि ।

शिवात्मकमनुस्मृत्य स्फुरन्तं विस्फुलिंगवत् ॥ ४८

नाड्या यथोक्तया वायुं रेचयेन्मन्त्रतो गुरुः ।

निर्गम्य प्रविशेन्नाड्यां शिष्यस्य हृदयं तथा ॥ ४ ९

प्रविश्य तस्य चैतन्यं नीलबिन्दुनिभं स्मरन् ।

स्वतेजसापास्तमलं ज्वलन्तमनुचिन्तयेत् ॥ ५०

तमादाय तया नाड्या मन्त्री संहारमुद्रया ।

पूरण निवेश्यैनमेकीभावार्थमात्मनः ॥ ५१

कुंभकेन तथा नाड्या रेचकेन यथा पुरा ।

तस्मादादाय शिष्यस्य हृदये तं निवेशयेत् ॥ ५२

तमालभ्य शिवाल्लब्धं तस्मै दत्त्वोपवीतकम् ।

हुत्वाऽऽहुतित्रयं पश्चाद्दद्यात्पूर्णाहुतिं ततः ॥ ५३

देवस्य दक्षिणे शिष्यमुपवेश्य वरासने ।

कुशपुष्पपरिस्तीर्णे बद्धाञ्जलिरुदङ्मुखम् ॥५४

( उत्तरखण्ड ) ९ ५१ मूलमन्त्रके तर्पणके लिये उसीके उच्चारणपूर्वक दस आहुतियाँ देनी चाहिये । फिर अंगोंके तर्पणके लिये अंग - मन्त्रोंद्वारा ही क्रमशः तीन आहुतियाँ दे । इसके बाद पूर्णाहुति देकर मन्त्रवेत्ता गुरु प्रायश्चित्तके निमित्त मूलमन्त्रसे पुनः दस आहुतियाँ अग्निमें डाले ॥ ४३-४४ ॥ फिर देवेश्वर शिवका पूजन करके सम्यक् आचमन और हवन करनेके पश्चात् यथोचित रीतिसे जातितः वैश्यका उद्धार करे । भावनाद्वारा उसके वैश्यत्वको निकालकर उसमें क्षत्रियत्वकी उत्पत्ति करे । फिर इसी तरह क्षत्रियत्वका भी उद्धार करके गुरु उसमें ब्राह्मणत्वकी उद्भावना करे ॥ ४५-४६ ॥ इसी प्रणालीसे जातितः क्षत्रियका भी उद्धार करके ब्राह्मण बनाये । फिर उन दोनों शिष्योंमें रुद्रत्वकी उत्पत्ति करे । जो जातिसे ही ब्राह्मण है, उस शिष्यमें केवल रुद्रत्वकी ही स्थापना करे । फिर शिष्यका प्रोक्षण और ताड़न करके आगकी चिनगारियोंके समान प्रकाशमान शिवस्वरूप उसकी आत्माको अपने आत्मामें स्थित होनेकी भावना करे ॥ ४७-४८ ॥ तदनन्तर पूर्वोक्त नाड़ीसे गुरु मन्त्रोच्चारणपूर्वक वायुका रेचन ( निःसारण ) करे । वायुका निःसारण करके उस नाड़ीके द्वारा ही शिष्यके हृदयमें वह स्वयं प्रवेश करे । प्रवेश करके उसके चैतन्यका नील बिन्दुके समान चिन्तन करे । साथ ही यह भावना करे कि मेरे तेजसे इसका सारा मल नष्ट हो गया और यह पूर्णतः प्रकाशित हो रहा है ॥४ ९ -५० ॥ इसके बाद उस जीव - चैतन्यको लेकर नाड़ीसे संहारमुद्रा एवं पूरक प्राणायामद्वारा अपने आत्मासे एकीभूत करनेके लिये उसमें निविष्ट करे । फिर रेचककी ही भाँति कुम्भकद्वारा उसी नाड़ीसे उस जीव - चैतन्यको वहाँसे लेकर शिष्यके हृदयमें स्थापित कर दे॥५१-५२ ॥ तत्पश्चात् शिष्यका स्पर्श करके शिवसे उपलब्ध हुए यज्ञोपवीतको उसे देकर गुरु तीन बार आहुति दे पूर्णाहुति होम करे ॥५३ ॥

इसके बाद आराध्यदेवके दक्षिणभागमें शिष्यको कुश तथा फूलसे आच्छादित करके श्रेष्ठ आसनपर | बिठाकर उसका मुँह उत्तरकी ओर करके उसे

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९ ५२ स्वस्तिकासनमारूढं विधाय प्राङ्मुखः स्वयम् वरासनस्थितो मन्त्रैर्महामङ्गलनिःस्वनैः

समादाय घटं पूर्णं पूर्णमेव प्रसाधितम् ।

ध्यायमानः शिवं शिष्यमभिषिञ्चेत देशिकः ॥

अथापनुद्य स्नानाम्बु परिधाय सिताम्बरम् ।

आचान्तोऽलंकृतः शिष्यः प्राञ्जलिर्मण्डपं व्रजेत् ॥

उपवेश्य यथापूर्वं तं गुरुर्दर्भविष्टरे ।

संपूज्य मंडले देवं करन्यासं समाचरेत् ॥

ततस्तु भस्मना देवं ध्यायेन्मनसि देशिकः ।

समालभेत पाणिभ्यां शिशुं शिवमुदीरयेत् ॥

अथ तस्य शिवाचार्यो दहनप्लावनादिकम् ।

सकलीकरणं कृत्वा मातृकान्यासवर्त्मना ॥

ततः शिवासनं ध्यात्वा शिष्यमूर्द्धनि देशिकः । श्रीशिवमहापुराण [ अ ० १६ । । स्वस्तिकासनमें स्थित करे । शिष्य गुरुकी और ॥ ५५ । जोड़े रहे । गुरु स्वयं पूर्वाभिमुख हो एक हाथ आसनपर खड़ा रहे और पहलेसे ही स्थापनपूर्वक श्रेष्ठ | सिद्ध किये हुए पूर्ण घटको लेकर शिवका ध्यान करत ५६ हुए मन्त्रपाठ तथा मांगलिक वाद्योंकी ध्वनिके साथ शिष्यका अभिषेक करे ॥ ५४–५६ ॥ तदनन्तर शिष्य उस अभिषेकके जलको ५७ पोंछकर श्वेत वस्त्र धारण करे, आचमन करके । अलंकृत हो हाथ जोड़ मण्डपमें जाय । तब पहलेकी भाँति उसे कुशासनपर बिठाकर मण्डल गुरु में ५८ महादेवजीकी पूजा करके करन्यास करे । इसके बाद मन - ही - मन महादेवजीका ध्यान करते हुए दोनों ५ ९ हाथोंमें भस्म ले शिष्यके अंगोंमें लगाये और शिव-मन्त्रका उच्चारण करे ॥ ५७–५९ ॥ तदनन्तर शिवाचार्य मातृकान्यासके मार्गसे ६० शिष्यका दहन - प्लावनादि सकलीकरण करके उसके मस्तक - पर शिवके आसनका ध्यान करे और वहाँ तत्रावाह्य यथान्यायमर्चयेन्मनसा शिवम् ॥ ६१ शिवका आवाहन करके यथोचित रीतिसे उनकी मानसिक पूजा करे ॥ ६०-६१ ॥ प्रार्थयेत्प्राञ्जलिर्देवं नित्यमत्र स्थितो भव । तत्पश्चात् हाथ जोड़ महादेवजीकी प्रार्थना इति विज्ञाप्य तं शंभोस्तेजसा भासुरं स्मरेत् ॥ ६२ करे – ' प्रभो! आप नित्य यहाँ विराजमान हों । ' इस तरह प्रार्थना करके मन - ही - मन यह भावना करे कि संपूज्याथ शिवं शैवीमाज्ञां प्राप्य शिवात्मिकाम् शिष्य भगवान् शंकरके तेजसे प्रकाशित हो रहा है ॥ कर्णे शिष्यस्य शनकैः शिवमन्त्रमुदीरयेत् इसके बाद पुनः शिवकी पूजा करके शिवारूपिणी ॥ ६३ शैवी आज्ञा प्राप्त करके गुरु शिष्यके कानमें धीरे - धीरे शिवमन्त्रका उच्चारण करे ॥ ६२-६३ ॥ स तु बद्धाञ्जलिः श्रुत्वा मन्त्रं तद्गतमानसः । शिष्य हाथ जोड़े हुए उस मन्त्रको सुनकर शनैस्तं व्याहरेच्छिष्यः शिवाचार्यस्य शासनात् ॥ ६४ उसीमें मन लगा शिवाचार्यकी आज्ञाके अनुसार ततः शाक्तं च संदिश्य मन्त्रं मन्त्रविचक्षणः धीरे - धीरे उसकी आवृत्ति करे । फिर मन्त्र - ज्ञानकुशल । उच्चारयित्वा च सुखं तस्मै मङ्गलमादिशेत् आचार्य शाक्त - मन्त्रका उपदेश दे, उसका सुख-॥ ६५ पूर्वक उच्चारण करवाकर शिष्यके प्रति मंगलाशंसा करे ॥ ६४-६५ ॥ ततः समासान्मन्त्रार्थं वाच्यवाचकयोगतः तत्पश्चात् संक्षेपसे वाच्यवाचक योगके समादिश्येश्वरं रूपं योगमासनमादिशेत् । | अनुसार ईश्वररूप मन्त्रका उपदेश देकर योगासनकी ॥ ६६ | शिक्षा दे ॥ ६६ ॥

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अ ० १६ ] वायवीयसहिता गुर्वाज्ञया शिष्यः शिवाग्निगुरुसन्निधौ । अथ दीक्षावाक्यमुदीरयेत् भक्त्यैवमभिसन्धाय ॥ ६७

वरं प्राणपरित्यागश्छेदनं शिरसोऽपि वा ।

न त्वनभ्यर्च्य भुञ्जीत भगवन्तं त्रिलोचनम् ॥ ६८

स एव दद्यान्नियतो यावन्मोहविपर्ययः ।

तावदाराधयेद्देवं तन्निष्ठस्तत्परायणः ॥ ६ ९

ततः स समयो नाम भविष्यति शिवाश्रमे ।

लब्धाधिकारो गुर्वाज्ञापालकस्तद्वशो भवेत् ॥ ७०

अतः परं न्यस्तकरो भस्मादाय स्वहस्ततः ।

दद्याच्छिष्याय मूलेन रुद्राक्षं चाभिमन्त्रितम् ॥ ७१

प्रतिमा वापि देवस्य गूढदेहमथापि वा ।

पूजाहोमजपध्यानसाधनानि च संभवे ॥ ७२

सोऽपि शिष्यः शिवाचार्याल्लब्धानि बहुमानतः ।

आददीताज्ञया तस्य देशिकस्य न चान्यथा ॥ ७३

आचार्यादाप्तमखिलं शिरस्याधाय भक्तितः ।

रक्षयेत्पूजयेच्छंभुं मठे वा गृह एव वा ॥ ७४

अतः परं शिवाचारमादिशेदस्य देशिकः ।

भक्तिश्रद्धानुसारेण प्रज्ञायाश्चानुसारतः ॥ ७५

यदुक्तं यत्समाज्ञातं यच्चैवान्यत्प्रकीर्तितम् ।

शिवाचार्येण समये तत्सर्वं शिरसा वहेत् ॥ ७६

शिवागमस्य ग्रहणं वाचनं श्रवणं तथा ।

देशिकादेशतः कुर्यान्न स्वेच्छातो न चान्यतः ॥ ७७

( उत्तरखण्ड ) ९ ५३ तदनन्तर शिष्य गुरुकी आज्ञासे शिव, अग्नि तथा गुरुके समीप भक्तिभावसे प्रतिज्ञापूर्वक निम्नांकितरूपसे दीक्षावाक्यका उच्चारण करे- ' मेरे लिये प्राणोंका परित्याग कर देना अच्छा होगा अथवा सिर कटा देना भी अच्छा होगा; किंतु मैं भगवान् त्रिलोचनकी पूजा किये बिना कभी भोजन नहीं कर सकता । ' ॥ ६७-६८ ॥ जबतक मोह दूर न हो, तबतक वह भगवान् शिवमें ही निष्ठा रखकर उन्हींके आश्रित हो नियमपूर्वक उन्हींकी आराधना करता रहे । फिर भगवान् शिव ही । उसे योगक्षेम प्रदान करते हैं । ऐसा करनेसे उस शिष्यका नाम ' समय ' होगा । उसे शिवाश्रममें रहनेका अधिकार प्राप्त होगा । वहाँ रहनेवाले शिष्यको गुरुकी आज्ञाका पालन करते हुए सदा उनके वशमें रहना चाहिये ॥ ६ ९ -७० ॥ इसके बाद गुरु करन्यास करके अपने हाथसे भस्म लेकर मूलमन्त्रका उच्चारण करते हुए उस भस्म तथा रुद्राक्षको अभिमन्त्रित करके शिष्यके हाथमें दे दे । साथ ही महादेवजीकी प्रतिमा अथवा उनका गूढ़ शरीर ( लिंग ) और यथासम्भव पूजा, होम, जप एवं ध्यानके साधन भी दे ॥ ७१-७२ ॥ फिर वह शिष्य भी शिवाचार्यसे प्राप्त हुई उन वस्तुओंको उन्हींकी आज्ञासे बड़े आदरके साथ ग्रहण करे । उनकी आज्ञाका उल्लंघन न करे, आचार्यसे प्राप्त हुई सारी वस्तुओंको भक्तिभावसे सिरपर रखकर ले जाय और उनकी रक्षा करे । अपनी रुचिके अनुसार मठमें या घरमें शंकरजीकी पूजा करता रहे॥७३-७४ ॥ इसके बाद गुरु भक्ति, श्रद्धा और बुद्धिके अनुसार शिष्यको शिवाचारकी शिक्षा दे । शिवाचार्यने समयाचारके विषयमें जो कुछ कहा हो, जो आज्ञा दी हो तथा और भी जो कुछ बातें बतायी हों, उन सबको शिष्य शिरोधार्य करे ॥ ७५-७६ ॥ गुरुके आदेशसे ही वह शिवागमका ग्रहण, पठन और श्रवण करे । न तो अपनी इच्छासे करे और न दूसरेकी प्रेरणासे ही । इस प्रकार मैंने संक्षेपसे

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९ ५४ श्रीशिवमहापुराण [ अ ० १७ इति संक्षेपतः प्रोक्तः संस्कारः समयाह्वयः । | समयाख्य - संस्कार - समयाचारकी दीक्षाका वर्णन किया । है । यह मनुष्योंको साक्षात् शिवधामकी प्राप्ति करानेक

साक्षाच्छिवपुरप्राप्तौ नृणां परमसाधनम् ॥ ७८ । लिये सबसे उत्तम साधन है ॥ ७७-७८ ॥

इति श्रीशिवमहापुराणे सप्तम्यां वायवीयसंहितायामुत्तरखण्डे शिष्यसंस्कारवर्णनं नाम षोडशोऽध्यायः ॥ १६ ॥ इस प्रकार श्रीशिवमहापुराणके अन्तर्गत सातवीं वायवीयसंहिताके उत्तरखण्डमें ॥ शिष्य - संस्कारवर्णन नामक सोलहवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ १६ ॥

अथ सप्तदशोऽध्यायः षडध्वशोधनका निरूपण उपमन्युरुवाच

अतः परं समावेक्ष्य गुरुः शिष्यस्य योग्यताम् ।

षडध्वशुद्धिं कुर्वीत सर्वबन्धविमुक्तये ॥

कला तत्त्वं च भुवनं वर्णं पदमतः परम् ।

मन्त्रश्चेति समासेन षडध्वा परिपठ्यते ॥

निवृत्त्याद्याः कलाः पञ्च कलाध्वा कथ्यते बुधैः ।

व्याप्ताः कलाभिरितरे त्वध्वानः पञ्च पञ्चभिः ॥

शिवतत्त्वादिभूम्यन्तं तत्त्वाध्वा समुदाहृतः ।

षड्विंशत्संख्ययोपेतः शुद्धाशुद्धोभयात्मकः ॥

आधाराद्युन्मनान्तश्च भुवनाध्वा प्रकीर्तितः ।

विना भेदोपभेदाभ्यां षष्टिसंख्यासमन्वितः ॥

पञ्चाशद् रुद्ररूपास्तु वर्णा वर्णाध्वसंज्ञिताः ।

अनेकभेदसम्पन्नः पदाध्वा समुदाहृतः ॥

सर्वोपमन्त्रैर्मन्त्राध्वा व्याप्तः परमविद्यया ।

यथा शिवो न तत्त्वेषु गण्यते तत्त्वनायकः ॥

मन्त्राध्वनि न गण्येत तथासौ मन्त्रनायकः ।

कलाध्वनो व्यापकत्वं व्याप्यत्वं चेतराध्वनाम् ॥

न वेत्ति तत्त्वतो यः स नैवार्हत्यध्वशोधनम् ।

षड्विधस्याध्वनो रूपं न येन विदितं भवेत् ॥

व्याप्यव्यापकता तेन ज्ञातुमेव न शक्यते । उपमन्यु कहते हैं- यदुनन्दन! इसके बाद शिष्यकी योग्यताको देखकर उसके सम्पूर्ण बन्धनोंकी गुरु १ निवृत्तिके लिये षडध्वशोधन करे ॥ १ ॥

कला, तत्त्व, भुवन, वर्ण, पद और मन्त्र — ये ही २ संक्षेपसे छः अध्वा कहे गये हैं ॥ २ ॥

निवृत्ति * आदि जो पाँच कलाएँ हैं, उन्हें विद्वान् ३ पुरुष कलाध्वा कहते हैं । अन्य पाँच अध्वा इन पाँचों कलाओंसे व्याप्त हैं ॥३ ॥

शिवतत्त्वसे लेकर भूमिपर्यन्त जो छब्बीस तत्त्व ४ हैं, उनको ' तत्त्वाध्वा ' कहा गया है । यह अध्वा शुद्ध और अशुद्धके भेदसे दो प्रकारका है ॥४ ॥

आधारसे लेकर उन्मनातक ' भुवनाध्वा ' कहा गया ५ है । यह भेद और उपभेदोंको छोड़कर साठ है ॥ ५ ॥

रुद्रस्वरूप जो पचास वर्ण हैं, उन्हें ' वर्णाध्वा ' ६ की संज्ञा दी गयी है । पदोंको ‘ पदाध्वा ' कहा गया है, जिसके अनेक भेद हैं ॥ ६ ॥

सब प्रकारके उपमन्त्रोंसे ' मन्त्राध्वा ' होता ७ है, जो परम विद्यासे व्याप्त है । जैसे तत्त्वनायक शिवकी तत्त्वोंमें गणना नहीं होती, उसी प्रकार उस मन्त्रनायक महेश्वरकी मन्त्राध्वामें गणना ८ नहीं होती । कलाध्वा व्यापक है और अन्य अध्वा व्याप्य हैं॥७-८ ॥ जो इस बातको ठीक - ठीक नहीं जानता है, ९ वह अध्वशोधनका अधिकारी नहीं है । जिसने छः प्रकारके अध्वाका रूप नहीं जाना, वह उनके । व्याप्य - व्यापक भावको समझ ही नहीं सकता है । * निवृत्ति, प्रतिष्ठा, विद्या, शान्ति और शान्त्यतीता - ये पाँच कलाएँ हैं ।

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अ ० १७ ] वायवीयसंहिता च व्याप्यव्यापकतां तथा ॥ १० तस्मादध्वस्वरूपं

यथावदवगम्यैव कुर्यादध्वविशोधनम् ।

कुण्डमण्डलपर्यन्तं तत्र कृत्वा यथा पुरा ॥ ११

द्विहस्तमानं कुर्वीत प्राच्यां कलशमण्डलम् ।

ततः स्नातः शिवाचार्यः सशिष्यः कृतनैत्यकः ॥ १२

प्रविश्य मण्डलं शम्भोः पूजां पूर्ववदाचरेत् ।

तत्राढकावरैः सिद्धं तन्दुलैः पायसं प्रभोः ॥ १३ ।

अर्द्ध निवेद्य होमार्थं शेषं समुपकल्पयेत् ।

पुरतः कल्पिते वाथ मण्डले वर्णिमण्डिते ॥ १४

स्थापयेत्पञ्चकलशान्दिक्षु मध्ये च देशिकः ।

तेषु ब्रह्माणि मूलार्णैर्बिन्दुनादसमन्वितैः ॥ १५

नम आद्यैर्यकारान्तैः कल्पयेत्कल्पवित्तमः ।

ईशानं मध्यमे कुम्भे पुरुषं पुरतः स्थिते ॥ १६

अघोरं दक्षिणे वामे वामं सद्यं च पश्चिमे ।

रक्षां विधाय मुद्रां च बद्धा कुम्भाभिमन्त्रणम् ॥ १७

कृत्वा शिवानलैर्होमं प्रारभेत यथा पुरा ।

यदर्द्धं पायसं पूर्वं होमार्थं परिकल्पितम् ॥१८

हुत्वा शिष्यस्य तच्छेषं भोक्तुं समुपकल्पयेत् ।

तर्पणान्तं च मन्त्राणां कृत्वा कर्म यथा पुरा ॥१ ९

हुत्वा पूर्णाहुतिं तेषां ततः कुर्यात्प्रदीपनम् ।

ॐकारादनु हुङ्कारं ततो मूलं फडन्तकम् ॥ २०

स्वाहान्तं दीपने प्राहुरङ्गानि च यथाक्रमम् ।

तेषामाहुतयस्तिस्रो देया दीपनकर्मणि ॥ २१

( उत्तरखण्ड ) ९ ५५ इसलिये अध्वाओंके स्वरूप तथा उनके व्याप्य -व्यापक भावको ठीक - ठीक जानकर ही अध्व - शोधन करना चाहिये॥९ -१०१ / २ ॥ पूर्ववत् कुण्ड और मण्डल - निर्माणका कार्य वहाँ करके पूर्वदिशामें दो हाथ लम्बा - चौड़ा कलशमण्डल बनावे । तत्पश्चात् शिवाचार्य शिष्यसहित स्नान और नित्यकर्म करके मण्डलमें प्रविष्ट हो पहलेकी ही भाँति शिवजीकी पूजा करे ॥ ११-१२१ / २ ॥ फिर वहाँ लगभग चार सेर चावलसे तैयार की गयी खीरमेंसे आधा प्रभुको नैवेद्य लगा दे और शेष खीरको होमके लिये रख दे । पूर्वदिशाकी ओर बने हुए अनेक रंगोंसे अलंकृत मण्डलमें गुरु पाँच कलशोंकी स्थापना करे । चारको तो चारों दिशाओंमें रखे और एकको मध्यभागमें॥१३-१४१ / २ ॥ उन कलशोंपर मूलमन्त्रके ' नमः शिवाय ' इन पाँचों अक्षरोंको विन्दु और नादसे युक्त करके उनके द्वारा कल्पविधिका ज्ञाता गुरु ईशान आदि ब्रह्मोंकी स्थापना करे ॥ १५१/२ ॥ मध्यवर्ती कलशपर ' ॐ नं ईशानाय नमः, ईशानं स्थापयामि ' कहकर ईशानकी स्थापना करे । पूर्ववर्ती कलशपर ' ॐ मं तत्पुरुषाय नमः, तत्पुरुषं | स्थापयामि ' कहकर तत्पुरुषकी, दक्षिण कलशपर ‘ ॐ शिं अघोराय नमः, अघोरं स्थापयामि ' कहकर अघोरकी, वाम या उत्तरभागमें रखे हुए कलशपर ' ॐ वां वामदेवाय नमः, वामदेवं स्थापयामि ' कहकर वामदेवकी तथा पश्चिमके कलशपर ‘ ॐ यं सद्योजाताय नमः, सद्योजातं स्थापयामि ' कहकर सद्योजातकी स्थापना करे । तदनन्तर रक्षाविधान करके मुद्रा बाँधकर कलशोंको अभिमन्त्रित करे । इसके बाद पूर्ववत् शिवाग्निमें होम आरम्भ करे ॥ १६-१७१ / २ ॥ पहले होमके लिये जो आधी खीर रखी गयी थी, उसका हवन करके शेषभाग शिष्यको खानेके लिये दे । पहलेकी भाँति मन्त्रोंका तर्पणान्त कर्म करके पूर्णाहुति होम करनेके पश्चात् प्रदीपन कर्म करे । प्रदीपन कर्ममें ' ॐ हुं नमः शिवाय फट् स्वाहा ' का उच्चारण करके क्रमशः हृदय आदि अंगोंको तीन - तीन आहुतियाँ देनी चाहिये । अंगोंमें हृदय, सिर, शिखा, कवच, नेत्रत्रय । और अस्त्र - इन छ: की गणना है ॥ १८-२१ ॥

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९ ५६ [ अ ० १७ मन्त्रैरैकैकशस्तैस्तु विचिन्त्या दीप्तमूर्तयः । इनमेंसे एक - एक अंगको तीन - तीन बार द्विजकन्याकृतं सितम् ॥ २२ । पढ़कर तीन - तीन आहुतियाँ देनी चाहिये । इन सबक मन्त त्रिगुणं त्रिगुणीकृत्य सूत्रं सूत्रेण संमन्त्र्य शिखाग्रे बन्धयेच्छिशोः चरणांगुष्ठपर्यन्तमूर्ध्वकायस्य तिष्ठतः

लम्बयित्वा तु तत्सूत्रं सुषुम्णां तत्र योजयेत् ।

शान्तया मुद्रयादाय मूलमन्त्रेण मन्त्रवित् ॥

हुत्वाहुतित्रयं तस्याः सान्निध्यमुपकल्पयेत् ।

हृदि सन्ताड्य शिष्यस्य पुष्पक्षेपेण पूर्ववत् ॥

चैतन्यं समुपादाय द्वादशान्ते निवेद्य च ।

सूत्रं सूत्रेण संयोज्य संरक्ष्यास्त्रेण वर्मणा ॥

अवगुण्ठ्याथ तत्सूत्रं शिष्यदेहं विचिन्तयेत् ।

मूलत्रयमयं पाशं भोगभोग्यत्वलक्षणम् ॥

विषयेन्द्रियदेहादिजनकं तस्य भावयेत् ।

व्योमादिभूतरूपिण्यः शान्त्यतीतादयः कलाः ॥

सूत्रे स्वनामभिर्योज्यः पूज्यश्चैव नमोयुतैः ।

अथवा बीजभूतैस्तत्कृत्वा पूर्वोदितं क्रमात् ॥

ततो मलादेस्तत्त्वादौ व्याप्तिं समवलोकयेत् । कलाव्याप्तिं । स्वरूपका तेजस्वीरूपमें चिन्तन करना चाहिये । इसक | बाद ब्राह्मणकी कुमारी कन्याके द्वारा काते हुए सफेद । । सूतको एक बार त्रिगुण करके पुनः त्रिगुण करे । फिर | उस सूत्रको अभिमन्त्रित करके उसका एक शिष्यकी शिखाके अग्रभागमें बाँध दे ॥ २२१/२ छोर ॥ २३ • शिष्य सिर ऊँचा करके खड़ा हो जाय ॥ | अवस्थामें वह सूत उसके पैरके अँगूठेतक लटकता , उस रहे । सूतको इस तरह लटकाकर उसमें सुषुम्णा २४ नाड़ीकी संयोजना करे । फिर मन्त्रज्ञ गुरु शान्त मुद्राके साथ मूलमन्त्रसे तीन आहुतिका होम करके उस । नाड़ीको लेकर उस सूत्रमें स्थापित करे । फिर पूर्ववत २५ फूल फेंककर शिष्यके हृदयमें ताड़न करे और उससे | चैतन्यको लेकर बारह आहुतियोंके पश्चात् शिवको २६ निवेदितकर उस लटकते हुए सूत्रको एक सूतसे जोड़े और ‘ हुं फट् ’ मन्त्रसे रक्षा करके उस सूतको शिष्यके शरीरमें लपेट दे । फिर यह भावना करे कि शिष्यका २७ शरीर मूलत्रयमय पाश है, भोग और भोग्यत्व ही इसका लक्षण है, यह विषय, इन्द्रिय और देह आदिका जनक है॥२३–२७१ / २ ॥ तदनन्तर शान्त्यतीता आदि पाँच कलाओंको, २८ जो आकाशादि तत्त्वरूपिणी हैं, उस सूत्रमें उनके नाम ले - लेकर जोड़ना चाहिये । यथा— ' व्योमरूपिणीं शान्त्यतीतकलां योजयामि, वायु-रूपिणीं शान्तिकलां योजयामि, तेजोरूपिणीं विद्याकलां योजयामि, जलरूपिणीं प्रतिष्ठाकलां योजयामि, २ ९ पृथ्वीरूपिणीं निवृत्तिकलां योजयामि । ' इति । इस तरह इन कलाओंका योजन करके उनके नामके अन्तमें ' नमः ' जोड़कर इनकी पूजा करे । यथा — ‘ शान्त्यतीतकलायै नमः, शान्तिकलायै नमः । ' इत्यादि । अथवा आकाशादिके बीजभूत ( हं यं रं वं लं ) मन्त्रोंद्वारा या पंचाक्षरके पाँच अक्षरोंमें नाद-विन्दुका योग करके बीजरूप हुए उन मन्त्राक्षरोंद्वारा क्रमशः पूर्वोक्त कार्य करके तत्त्व आदिमें मलादि पाशोंकी व्याप्तिका चिन्तन करे । इसी तरह मलादि पाशोंमें भी कलाओंकी व्याप्ति देखे । फिर आहुति मलादौ च हुत्वा संदीपयेत्कलाः ॥ ३० करके उन कलाओंकोसंदीपित करे ॥ २८-३० ॥