शिव महापुराण - १ — पृष्ठ 21–30
शिव महापुराण - १ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 21–30
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अ ० २ ]
एतच्छिवपुराणस्य कुर्वन्नित्यमतन्द्रितः ।
पट्टवस्त्रादिना सम्यक् सत्कारं स सुखी सदा ॥
शैवं पुराणममलं शैवसर्वस्वमादरात् ।
सेवनीयं प्रयत्नेन परत्रेह सुखेप्सुना ॥
चतुर्वर्गप्रदं शैवं पुराणममलं परम् ।
श्रोतव्यं सर्वदा प्रीत्या पठितव्यं विशेषतः ॥
वेदेतिहासशास्त्रेषु परं श्रेयस्करं महत् ।
शैवं पुराणं विज्ञेयं सर्वथा हि मुमुक्षुभिः ॥
शैवं पुराणमिदमात्मविदां वरिष्ठं सेव्यं सदा परमवस्तु सता समर्च्यम् । तापत्रयाभिशमनं सुखदं सदैव प्राणप्रियं विधिहरीशमुखामराणाम् ॥
वन्दे शिवपुराणं हि सर्वदाहं प्रसन्नधीः ।
शिवः प्रसन्नतां यायाद् दद्यात्स्वपदयो रतिम् ॥
माहात्म्य १७ जो प्रतिदिन आलस्यरहित हो रेशमी वस्त्र ४६ आदिके वेष्टनसे इस शिवपुराणका सत्कार करता है, वह सदा सुखी होता है ॥ ४६ ॥
यह शिवपुराण निर्मल तथा शैवोंका सर्वस्व है; ४७ इहलोक और परलोकमें सुख चाहनेवालेको आदरके साथ प्रयत्नपूर्वक इसका सेवन करना चाहिये ॥ ४७ ॥
यह निर्मल एवं उत्तम शिवपुराण धर्म, अर्थ, ४८ काम और मोक्षरूप चारों पुरुषार्थोंको देनेवाला है, अतः सदा प्रेमपूर्वक इसका श्रवण एवं विशेष रूपसे पाठ करना चाहिये ॥ ४८ ॥
वेद, इतिहास तथा अन्य शास्त्रोंमें यह शिवपुराण ४ ९ विशेष कल्याणकारी है - ऐसा मुमुक्षुजनोंको समझना चाहिये ॥ ४ ९ ॥ यह शिवपुराण आत्मतत्त्वज्ञोंके लिये सदा सेवनीय है, सत्पुरुषोंके लिये पूजनीय है, तीनों प्रकारके तापोंका शमन करनेवाला है, सुख प्रदान ५० करनेवाला है तथा ब्रह्मा - विष्णु - महेशादि देवताओंको प्राणोंके समान प्रिय है ॥५० ॥
ऐसे शिवपुराणको मैं प्रसन्नचित्तसे सदा वन्दन करता हूँ । भगवान् शंकर मुझपर प्रसन्न हों और अपने ५१ । चरणकमलोंकी भक्ति मुझे प्रदान करें ॥ ५१ ॥
इति श्रीस्कान्दे महापुराणे शिवपुराणमाहात्म्ये तन्महिमवर्णनं नाम प्रथमोऽध्यायः ॥ १ ॥
॥ इस प्रकार श्रीस्कन्दमहापुराणके अन्तर्गत शिवपुराणमाहात्म्यमें उसकी महिमावर्णन नामक पहला अध्याय पूर्ण हुआ ॥ १ ॥
अथ द्वितीयोऽध्यायः शिवपुराणके श्रवणसे देवराजको शिवलोककी प्राप्ति शौनक उवाच सूत सूत महाभाग धन्यस्त्वं परमार्थवित् अद्भुतेयं कथा दिव्या श्राविता कृपया हि नः अघौघविध्वंसकरी मनः शुद्धिविधायिनी शिवसन्तोषजननी कथेयं नः श्रुताद्भुता शौनकजी बोले- हे । धन्य हैं, परमार्थतत्त्वके ज्ञाता ॥ १ हमलोगोंको यह बड़ी अद्भुत है ॥ १ ॥
। हमने यह पापनाशिनी, ॥ २ और भगवान् शिवको प्रसन्न सुनी ॥२ ॥
महाभाग सूतजी! आप हैं, आपने कृपा करके एवं दिव्य कथा सुनायी मनको पवित्र करनेवाली करनेवाली अद्भुत कथा भूतलपर इस कथाके समान कल्याणका सर्वश्रेष्ठ एतत्कथासमानं न भुवि किञ्चित् परात्परम् । साधन दूसरा कोई नहीं है, यह बात हमने आज निश्चयेनेति विज्ञातमस्माभिः कृपया तव ॥ ३ | आपकी कृपासे निश्चयपूर्वक समझ ली । हे सूतजी!
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१८ श्रीशिवमहापुराण [ अ ० २ के के विशुध्यन्त्यनया कथया पापिनः कलौ । कलियुगमें इस कथाके द्वारा कौन - कौन - से पापी शुद्ध वद तान् कृपया सूत कृतार्थं भुवनं कुरु ॥ ४ होते हैं? उन्हें कृपापूर्वक बताइये और इस जगत्को सूत उवाच
ये मानवाः पापकृतो दुराचाररताः खलाः ।
कामादिनिरता नित्यं तेऽपि शुध्यन्त्यनेन वै ॥ ५
ज्ञानयज्ञः परोऽयं वै भुक्तिमुक्तिप्रदः सदा ।
शोधनः सर्वपापानां शिवसन्तोषकारकः ॥ ६
तृष्णाकुलाः सत्यहीनाः पितृमातृविदूषकाः ।
दाम्भिका हिंसका ये च तेऽपि शुध्यन्त्यनेन वै ॥ ७
स्ववर्णाश्रमधर्मेभ्यो वर्जिता मत्सरान्विताः ।
ज्ञानयज्ञेन तेऽनेन सम्पुनन्ति कलावपि ॥ ८
छलच्छद्मकरा ये च ये च क्रूराः सुनिर्दयाः ।
ज्ञानयज्ञेन तेऽनेन सम्पुनन्ति कलावपि ॥ ९
ब्रह्मस्वपुष्टाः सततं व्यभिचाररताश्च ये ।
ज्ञानयज्ञेन तेऽनेन सम्पुनन्ति कलावपि ॥ १०
सदा पापरता ये च ये शठाश्च दुराशयाः ।
ज्ञानयज्ञेन तेऽनेन सम्पुनन्ति कलावपि ॥ ११
मलिना दुर्धियोऽशान्ता देवताद्रव्यभोजिनः ।
ज्ञानयज्ञेन तेऽनेन सम्पुनन्ति कलावपि ॥ १२
पुराणस्यास्य पुण्यं सन्महापातकनाशनम् ।
भुक्तिमुक्तिप्रदं चैव शिवसन्तोषहेतुकम् ॥ १३
अत्रैवोदाहरन्तीममितिहासं पुरातनम् ।
यस्य श्रवणमात्रेण पापहानिर्भवत्यलम् ॥१४
आसीत् किरातनगरे ब्राह्मणो ज्ञानदुर्बलः ।
दरिद्रो रसविक्रेता वेदधर्मपराङ्मुखः ॥ १५
सन्ध्यास्नानपरिभ्रष्टो वैश्यवृत्तिपरायणः ।
देवराज इति ख्यातो विश्वस्तजनवञ्चकः ॥ १६ ।
कृतार्थ कीजिये ॥३-४ ॥
सूतजी बोले- हे मुने! जो मनुष्य पापी, दुराचारी, खल तथा काम - क्रोध आदिमें निरन्तर डूबे रहनेवाले हैं, वे भी इस पुराणसे अवश्य शुद्ध हो जाते हैं ॥५ ॥
यह कथा वास्तवमें उत्तम ज्ञानयज्ञ है, जो सदा सांसारिक भोग और मोक्षको देनेवाला है, सभी पापोंको नष्ट करनेवाला है और भगवान् शिवको प्रसन्न करनेवाला है । जो अत्यन्त लालची, सत्यविहीन, अपने माता - पितासे द्वेष करनेवाले, पाखण्डी तथा हिंसक वृत्तिके हैं; वे भी इस ज्ञानयज्ञसे शुद्ध हो जाते हैं । अपने वर्णाश्रमधर्मका पालन न करनेवाले और ईर्ष्याग्रस्त लोग भी कलिकालमें इस ज्ञानयज्ञके द्वारा पवित्र हो जाते हैं ॥ ६-८ ॥ जो लोग छल - कपट करनेवाले, क्रूर स्वभाववाले और अत्यन्त निर्दयी हैं, कलियुगमें वे भी इस ज्ञानयज्ञसे शुद्ध हो जाते हैं । ब्राह्मणके धनसे पलनेवाले तथा निरन्तर व्यभिचारपरायण जो लोग हैं, वे भी इस ज्ञानयज्ञसे इस कलिकालमें भी पवित्र हो जाते हैं । जो मनुष्य सदा पापकर्मोंमें लिप्त रहते हैं, शठ हैं और अत्यन्त दूषित विचारवाले हैं, वे कलियुगमें भी इस ज्ञानयज्ञसे निर्मल हो जाते हैं । दुश्चरित्र, दुर्बुद्धि, उद्विग्न चित्तवाले और देवताओंके द्रव्यका उपभोग करनेवाले पापीजन भी कलिकालमें भी इस ज्ञानयज्ञसे पवित्र हो जाते हैं ॥ ९ –१२ ॥ इस पुराणके श्रवणका पुण्य बड़े - बड़े पापोंको नष्ट करता है, सांसारिक भोग तथा मोक्ष प्रदान करता है और भगवान् शंकरको प्रसन्न करता है ॥ १३ ॥
इस सम्बन्धमें मुनिगण इस प्राचीन इतिहासका उदाहरण दिया करते हैं, जिसके श्रवणमात्रसे पापोंका पूर्णतया नाश हो जाता है ॥१४ ॥
पहलेकी बात है - किरातनगरमें एक ब्राह्मण रहता था, जो अज्ञानी, दरिद्र, रस बेचनेवाला तथा वैदिक धर्मसे विमुख था । वह स्नान - सन्ध्या आदि कर्मोंसे भ्रष्ट हो गया था और वैश्यवृत्तिमें तत्पर रहता था । उसका नाम था देवराज । वह अपने ऊपर
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अ ० २ ]
स विप्रान् क्षत्रियान् वैश्यान् शूद्रांश्चापि तथापरान् ।
हत्वा नानामिषेणैव तत्तद्धनमपाहरत् ॥
अधर्माद् बहुवित्तानि पश्चात्तेनार्जितानि वै ।
न धर्माय धनं तस्य स्वल्पञ्चापीह पापिनः ॥
एकदैकतडागे स स्नातुं यातो महीसुरः ।
वेश्यां शोभावतीं नाम दृष्ट्वा तत्रातिविह्वलः ॥
स्ववशं धनिनं विप्रं ज्ञात्वा हृष्टाथ सुन्दरी ।
वार्तालापेन तच्चित्तं प्रीतिमत्समजायत ॥
स्त्रियं कर्तुं स तां मेने पतिं कर्तुं च सा तथा ।
एवं कामवशौ भूत्वा बहुकालं विजहतुः ॥
आसने शयने पाने भोजने क्रीडने तथा ।
दम्पतीव सदा द्वौ तु ववृताते परस्परम् ॥
मात्रा पित्रा तथा पल्या वारितोऽपि पुनः पुनः ।
नामन्यत वचस्तेषां पापवृत्तिपरायणः ॥
एकदेर्ष्यावशाद् रात्रौ मातरं पितरं वधूम् ।
प्रसुप्तान् न्यवधीद् दुष्टो धनं तेषां तथाहरत् ॥
आत्मनीनं धनं यच्च पित्रादीनां तथा धनम् ।
वेश्यायै दत्तवान् सर्वं कामी तद्गतमानसः ॥
सोऽभक्ष्यभक्षकः पापी मदिरापानलालसः ।
एकपात्रे सदाभौक्षीत् सवेश्यो ब्राह्मणाधमः ॥
कदाचिद्दैवयोगेन प्रतिष्ठानमुपागतः ।
शिवालयं ददर्शासौ तत्र साधुजनावृतम् ॥
स्थित्वा तत्र च विप्रोऽसौ ज्वरेणातिप्रपीडितः माहात्म्य १ ९ विश्वास करनेवाले लोगोंको ठगा करता था । उसने १७ ब्राह्मणों, क्षत्रियों, वैश्यों, शूद्रों तथा दूसरोंको भी अनेक बहानोंसे मारकर उनका धन हड़प लिया था । बादमें उसने अधर्मसे बहुत सारा धन अर्जित कर १८ लिया, परंतु उस पापीका थोड़ा - सा भी धन कभी धर्मके काममें नहीं लगा ॥ १५–१८ ॥ एक दिन वह ब्राह्मण एक तालाबपर नहाने १ ९ गया । वहाँ शोभावती नामकी एक वेश्याको देखकर वह अत्यन्त मोहित हो गया । वह सुन्दरी भी उस धनी ब्राह्मणको अपने वशीभूत हुआ जानकर प्रसन्न २० हुई । आपसमें वार्तालापसे उनमें प्रीति उत्पन्न हो गयी । उस ब्राह्मणने उस वेश्याको पत्नी बनाना तथा उस वेश्याने उसे पति बनाना स्वीकार कर लिया । इस २१ प्रकार कामवश होकर वे दोनों बहुत समयतक विहार करते रहे ॥ १ ९ –२१ ॥ बैठने, सोने, खाने - पीने तथा क्रीड़ामें वे दोनों २२ निरन्तर पति - पत्नीकी तरह व्यवहार करने लगे । अपने माता - पिता तथा पत्नीके बार - बार रोकनेपर भी पापकृत्यमें संलग्न वह ब्राह्मण उनकी बात नहीं २३ | मानता था॥२२-२३ ॥ एक दिन रात्रिमें उस दुष्टने ईर्ष्यावश अपने सोये २४ हुए माता - पिता और पत्नीको मार डाला और उनका सारा धन हर लिया । वेश्यामें आसक्त चित्तवाले उस कामीने अपना और पिता आदिका सारा धन उस वेश्याको दे २५ दिया । वह पापी अभक्ष्य भक्षण तथा मद्यपान करने लगा और वह नीच ब्राह्मण उस वेश्याके साथ एक २६ ही पात्रमें सदा जूठा भोजन करने लगा ॥ २४–२६ ॥ एक दिन घूमता - घामता वह दैवयोगसे २७ प्रतिष्ठानपुर ( झूसी - प्रयाग ) - में जा पहुँचा । वहाँ उसने एक शिवालय देखा, जहाँ बहुतसे साधु - महात्मा एकत्र हुए थे ॥२७ ॥
देवराज उस शिवालयमें ठहर गया और वहाँ उस ब्राह्मणको ज्वर आ गया । उस ज्वरसे उसको बड़ी पीड़ा होने लगी । वहाँ एक ब्राह्मणदेवता शिवपुराणकी कथा सुना रहे थे । ज्वरमें पड़ा हुआ । देवराज ब्राह्मणके मुखारविन्दसे निकली हुई उस
शुश्राव सततं शैवीं कथां विप्रमुखोद्गताम् ॥ २८ । शिवकथाको निरन्तर सुनता रहा ॥२८ ॥
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२० श्रीशिवमहापुराण [ अ ० २ देवराजश्च मासान्ते ज्वरेणापीडितो मृतः । एक मासके बाद वह ज्वरसे अत्यन्त पीड़ित बद्धो यमभटैः पाशैर्नीतो यमपुरं बलात् ॥ २ ९ होकर चल बसा । यमराजके दूत आये और उसे पाशोंसे बाँधकर बलपूर्वक यमपुरीमें ले गये ॥ २ ९ ॥ तावच्छिवगणाः शुभ्रास्त्रिशूलाञ्चितपाणयः । इतनेमें ही शिवलोकसे भगवान् शिवके पार्षदगण भस्मभासितसर्वाङ्गा रुद्राक्षाञ्चितविग्रहाः शिवलोकात् समागत्य क्रुद्धा यमपुरीं ययुः ताडयित्वा तु तद्भूतांस्तर्जयित्वा पुनः पुनः देवराजं समामोच्य विमाने परमाद्भुते उपवेश्य यदा दूताः कैलासं गन्तुमुत्सुकाः तदा यमपुरीमध्ये महाकोलाहलोऽभवत् धर्मराजस्तु तं श्रुत्वा स्वालयाद् बहिरागमत्
दृष्ट्वाथ चतुरो दूतान् साक्षाद् रुद्रानिवापरान् ।
पूजयामास धर्मज्ञो धर्मराजो यथाविधि ॥
ज्ञानेन चक्षुषा सर्वं वृत्तान्तं ज्ञातवान् यमः । ॥ ३० आ गये । उनके गौर अंग कर्पूरके समान उज्ज्वल थे, हाथ त्रिशूलसे सुशोभित हो रहे थे, उनके सम्पूर्ण अंग । भस्मसे उद्भासित थे और रुद्राक्षकी मालाएँ उनके ॥ ३१ शरीरकी शोभा बढ़ा रही थीं । वे सब - के - सब क्रोध करते हुए यमपुरीमें गये और यमराजके दूतोंको मार-। पीटकर, बारम्बार धमकाकर उन्होंने देवराजको उनके ॥ ३२ चंगुलसे छुड़ा लिया और अत्यन्त अद्भुत विमानपर बिठाकर जब वे शिवदूत कैलास जानेको उद्यत हुए, । उस समय यमपुरीमें बड़ा भारी कोलाहल मच गया ॥ ३०–३२१ / २ ॥ ॥ ३३ उस कोलाहलको सुनकर धर्मराज अपने भवनसे बाहर आये । साक्षात् दूसरे रुद्रोंके समान प्रतीत होनेवाले उन चारों दूतोंको देखकर धर्मज्ञ धर्मराजने ३४ उनका विधिपूर्वक पूजन किया॥३३-३४ ॥ यमने ज्ञानदृष्टिसे देखकर सारा वृत्तान्त जान न भयात् पृष्टवान् किञ्चिच्छम्भोर्दूतान् महात्मनः ॥ ३५ लिया, उन्होंने भयके कारण भगवान् शिवके उन महात्मा दूतोंसे कोई बात नहीं पूछी ॥ ३५ ॥
पूजिताः प्रार्थितास्ते वै कैलासमगमंस्तदा । यमराजसे पूजित तथा प्रार्थित होकर वे शिवदूत ददुः शिवाय साम्बाय तं दयावारिराशये ॥ ३६ कैलासको चले गये और उन्होंने उस ब्राह्मणको
धन्या शिवपुराणस्य कथा परमपावनी ।
यस्याः श्रवणमात्रेण पापीयानपि मुक्तिभाक् ॥
सदाशिवमहास्थानं परं धाम परं पदम् ।
यदाहुर्वेदविद्वांसः सर्वलोकोपरि स्थितम् ॥
ब्राह्मणाः क्षत्रिया वैश्याः शूद्रा अन्येऽपि प्राणिनः ।
हिंसिता धनलोभेन बहवो येन पापिना ॥
मातृपितृवधूहन्ता वेश्यागामी च मद्यपः ।
देवराजो द्विजस्तत्र गत्वा मुक्तोऽभवत् क्षणात् ॥
इति श्रीस्कान्दे महापुराणे दयासागर साम्ब शिवको दे दिया ॥ ३६ ॥
शिवपुराणकी यह परम पवित्र कथा धन्य है, जिसके ३७ सुननेसे पापीजन भी मुक्तिके योग्य बन जाते हैं । भगवान् सदाशिवके परमधामको वेदज्ञ सभी लोकोंमें सर्वश्रेष्ठ ३८ बताते हैं । ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र तथा अन्य प्राणी; यहाँतक कि जिस पापीने धनके लोभसे अनेक लोगोंकी हत्या की तथा अपने माता - पिता और पत्नीको भी मार ३ ९ डाला; वह वेश्यागामी, शराबी ब्राह्मण देवराज भी इस कथाके प्रभावसे भगवान् शिवके परमधामको प्राप्तकर ४० । तत्क्षण मुक्त हो गया ॥ ३७–४० ॥ शिवपुराणमाहात्म्ये देवराजमुक्तिवर्णनं नाम द्वितीयोऽध्यायः ॥ २ ॥
॥इस प्रकार श्रीस्कन्दमहापुराणके अन्तर्गत शिवपुराणमाहात्म्यमें देवराजमुक्तिवर्णन नामक दूसरा अध्याय पूर्ण हुआ ॥ २ ॥
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अ ० ३ ] माहात्म्य २१ अथ तृतीयोऽध्यायः चंचुलाका पापसे शौनक उवाच
सूत सूत महाभाग सर्वज्ञोऽसि महामते ।
त्वत्प्रसादात् कृतार्थोऽहं कृतार्थोऽहं पुनः पुनः ॥
इतिहासमिमं श्रुत्वा मनो मेऽतीव मोदते ।
अन्यामपि कथां शम्भोर्वद प्रेमविवर्धिनीम् ॥
नामृतं पिबतां लोके मुक्तिः क्वापि सभाज्यते ।
शम्भोः कथासुधापानं प्रत्यक्षं मुक्तिदायकम् ॥
धन्या धन्या कथा शम्भोस्त्वं धन्यो धन्य एव च ।
यदाकर्णनमात्रेण शिवलोकं व्रजेन्नरः ॥
सूत उवाच
शृणु शौनक वक्ष्यामि त्वदग्रे गुह्यमप्युत ।
यतस्त्वं शिवभक्तानामग्रणीर्वेदवित्तमः ॥
समुद्रनिकटे देशे ग्रामो बाष्कलसंज्ञकः ।
वसन्ति यत्र पापिष्ठा वेदधर्मोज्झिता जनाः ॥
दुष्टा दुर्विषयात्मानो निर्दैवा जिह्मवृत्तयः ।
कृषीवलाः शस्त्रधराः परस्त्रीभोगिनः खलाः ॥
ज्ञानवैराग्यसद्धर्मं न जानन्ति परं हि ते ।
कुकथाश्रवणाढ्येषु निरताः पशुबुद्धयः ॥
अन्ये वर्णाश्च कुधियः स्वधर्मविमुखाः खलाः ।
कुकर्मनिरता नित्यं सदा विषयिणश्च ते ॥
स्त्रियः सर्वाश्च कुटिलाः स्वैरिण्यः पापलालसाः ।
कुधियो व्यभिचारिण्यः सद्वृत्ताचारवर्जिताः ॥
भय एवं संसारसे वैराग्य शौनकजी बोले- हे महाभाग सूतजी! आप सर्वज्ञ हैं । हे महामते! आपके कृपाप्रसादसे मैं १ बारम्बार कृतार्थ हुआ । इस इतिहासको सुनकर मेरा मन अत्यन्त आनन्दमें निमग्न हो रहा है । अतः अब भगवान् शिवमें प्रेम बढ़ानेवाली शिवसम्बन्धिनी दूसरी २ कथाको भी कहिये ॥ १-२ ॥ अमृत पीनेवालोंको लोकमें कहीं मुक्ति नहीं ३ प्राप्त होती है, किंतु भगवान् शंकरके कथामृतका पान तो प्रत्यक्ष ही मुक्ति देनेवाला है । सदाशिवकी जिस कथाके सुननेमात्रसे मनुष्य शिवलोक प्राप्त कर लेता ४ है, वह कथा धन्य है, धन्य है और कथाका श्रवण करानेवाले आप भी धन्य हैं, धन्य हैं ॥ ३-४ ॥ सूतजी बोले- हे शौनक! सुनिये, मैं आपके सामने गोपनीय कथावस्तुका भी वर्णन करूँगा; ५ क्योंकि आप शिवभक्तोंमें अग्रगण्य तथा वेदवेत्ताओंमें श्रेष्ठ हैं । समुद्रके निकटवर्ती प्रदेशमें एक बाष्कल नामक ग्राम है, जहाँ वैदिक धर्मसे विमुख महापापी ६ द्विज निवास करते हैं । वे सब - के - सब बड़े दुष्ट हैं, उनका मन दूषित विषयभोगोंमें ही लगा रहता है । वे न देवताओंपर विश्वास करते हैं न भाग्यपर; वे सभी ७ कुटिल वृत्तिवाले हैं । किसानी करते और भाँति - भाँतिके घातक अस्त्र - शस्त्र रखते हैं । वे परस्त्रीगमन करनेवाले और खल हैं । ज्ञान, वैराग्य तथा सद्धर्मको वे बिलकुल ८ नहीं जानते हैं । वे सभी पशुबुद्धिवाले हैं और सदा दूषित बातोंको सुननेमें संलग्न रहते हैं॥५–८ ॥ ( जहाँके द्विज ऐसे हों, वहाँके अन्य वर्णोंके ९ विषयमें क्या कहा जाय! ) अन्य वर्णोंके लोग भी उन्हींकी भाँति कुत्सित विचार रखनेवाले, स्वधर्मविमुख एवं खल हैं; वे सदा कुकर्ममें लगे रहते हैं और नित्य विषयभोगोंमें ही डूबे रहते हैं॥९॥
वहाँकी सब स्त्रियाँ भी कुटिल स्वभावकी, स्वेच्छाचारिणी, पापासक्त, कुत्सित विचारवाली और व्यभिचारिणी हैं । वे सद्व्यवहार तथा सदाचारसे १० सर्वथा शून्य हैं ॥१० ॥
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२२ एवं कुजनसंवासे ग्रामे बाष्कलसंज्ञिते तत्रैको बिन्दुगो नाम विप्र आसीन्महाधमः स दुरात्मा महापापी सुदारोऽपि कुमार्गगः वेश्यापतिर्बभूवाथ कामाकुलितमानसः स्वपत्नीं चञ्चलां नाम हित्वा नित्यं सुधर्मिणीम् रेमे स वेश्यया दुष्टः स्मरबाणप्रपीडितः
एवं कालो व्यतीयाय महांस्तस्य कुकर्मिणः ।
सा स्वधर्मभयात् क्लेशात् स्मरार्तापि च चञ्चला ॥
अथ तस्याङ्गना सापि प्ररूढनवयौवना ।
अविषह्यस्मरावेशा स्वधर्माद्विरराम ह ॥
जारेण सङ्गता रात्रौ रेमे पापेन गुप्ततः ।
पतिदृष्टिं वञ्चयित्वा भ्रष्टसत्त्वा कुमार्गगा ॥
कदाचित्तां दुराचारां स्वपत्नीं चञ्चलां मुने ।
जारेण सङ्गतां रात्रौ ददर्श स्मरविह्वलाम् ॥
दृष्ट्वा तां दूषितां पत्नीं कुकर्मासक्तमानसाम् ।
जारेण सङ्गतां रात्रौ क्रोधाद् दुद्राव वेगतः ॥
तमागतं गृहे दुष्टमाज्ञाय बिन्दुगं खलः ।
पलायितो द्रुतं जारो वेगतश्छद्मवान् स वै ॥
अथ स बिन्दुगः पत्नीं गृहीत्वा सुदुराशयः ।
मुष्टिबन्धेन सन्तर्प्य पुनः पुनरताडयत् ॥
सा नारी ताडिता भर्त्रा चञ्चला स्वैरिणी खला ।
कुपिता निर्भया प्राह स्वपतिं बिन्दुगं खलम् ॥
चञ्जुलोवाच भवान् प्रतिदिनं कामं रमते वेश्यया कुधीः । श्रीशिवमहापुराण [ अ ० ३ । कुजनोंके निवासस्थान उस बाष्कल नामक ॥ ११ ग्राममें किसी समय एक बिन्दुग नामधारी ब्राह्मण रहता था, वह बड़ा अधम था ॥ ११ ॥
। वह दुरात्मा और महापापी था । यद्यपि उसकी स्त्री
॥ १२ बड़ी सुन्दर थी, तो भी वह कुमार्गपर ही चलता था ।
कामवासनासे कलुषितचित्त वह वेश्यागामी था ॥ १२ ॥
। उसकी पत्नीका नाम चंचुला था, वह सदा ॥ १३ उत्तम धर्मके पालनमें लगी रहती थी, तो भी उसे छोड़कर वह दुष्ट ब्राह्मण कामासक्त होकर वेश्यागामी हो गया था ॥ १३ ॥
इस तरह कुकर्ममें लगे हुए उस बिन्दुगके बहुत १४ वर्ष व्यतीत हो गये । उसकी स्त्री चंचुला कामसे पीड़ित होनेपर भी स्वधर्मनाशके भयसे क्लेश सहकर भी दीर्घकालतक धर्मसे भ्रष्ट नहीं हुई । परंतु दुराचारी १५ पतिके आचरणसे प्रभावित होनेके कारण कामपीड़ित हो आगे चलकर वह स्त्री भी दुराचारिणी हो गयी ॥ १४-१५ ॥ भ्रष्ट चरित्रवाली वह कुमार्गगामिनी अपने पतिकी १६ दृष्टि बचाकर रात्रिमें चोरी - छिपे अन्य पापी जार पुरुषके साथ रमण करने लगी ॥१६ ॥
हे मुने! एक बार उस ब्राह्मणने अपनी उस १७ दुराचारिणी पत्नी चंचुलाको कामासक्त हो परपुरुषके साथ रात्रिमें संसर्गरत देख लिया ॥ १७ ॥
उस दुष्ट तथा दुराचारमें आसक्त मनवाली १८ पत्नीको रातमें परपुरुषके साथ व्यभिचाररत देखकर वह क्रोधपूर्वक वेगसे दौड़ा ॥१८ ॥
उस दुष्ट बिन्दुगको घरमें आया जानकर वह १ ९ कपटी व्यभिचारी तेजीसे भाग गया ॥१ ९ ॥ तब वह दुष्टात्मा बिन्दुग अपनी पत्नीको पकड़कर २० उसे डाँटता हुआ मुक्कोंसे बार - बार पीटने लगा ॥ २० ॥
वह व्यभिचारिणी दुष्टा नारी चंचुला पीटी २१ जानेपर कुपित होकर निर्भयतापूर्वक अपने दुष्ट पति बिन्दुगसे कहने लगी ॥ २१ ॥
चंचुला बोली- मुझ पतिपरायणा युवती पत्नीको छोड़कर आप कुबुद्धिवश प्रतिदिन वेश्याके साथ इच्छानुसार रमण करते हैं । आप ही बतायें कि मां विहाय स्वपत्नीं च युवतीं पतिसेविनीम् ॥ २२ रूपवती तथा कामासक्त चित्तवाली मुझ युवतीकी
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अ ० ३ ]
रूपवत्या युवत्याश्च कामाकुलितचेतसः ।
विना पतिविहारं स्यात् का गतिर्मे भवान् वदेत् ॥
अहं महारूपवती नवयौवनविह्वला ।
कथं सहे कामदुःखं तव सङ्कं विनार्तधीः ॥
सूत उवाच
इत्युक्तः स तया मूर्खो मूढधीर्ब्राह्मणोऽधमः ।
प्रोवाच बिन्दुगः पापी स्वधर्मविमुखः खलः ॥
बिन्दुग उवाच
सत्यमेतत्त्वयोक्तं हि कामव्याकुलचेतसा ।
हितं वक्ष्यामि तस्मात्ते शृणु कान्ते भयं त्यज ॥
जारैर्विहर नित्यं त्वं चेतसा निर्भयेन वै ।
धनमाकर्ष तेभ्यो हि दत्त्वा तेभ्यः परां रतिम् ॥
तद्धनं देहि सर्वं मे वेश्यासंसक्तचेतसः ।
महत्स्वार्थं भवेन्नूनं तवापि च ममापि च ॥
सूत उवाच
इति भर्तृवचः श्रुत्वा चञ्चला तद्वधूश्च सा ।
तथेति भर्तृवचनं प्रतिजग्राह हृष्टधीः ॥
कृत्वैवं समयं तौ वै दम्पती दुष्टमानसौ ।
कुकर्मनिरतौ जातौ निर्भयेन कुचेतसा ॥
एवं तयोस्तु दम्पत्योर्दुराचारप्रवृत्तयोः ।
महान् कालो व्यतीयाय निष्फलो मूढचेतसोः ॥
अथ विप्रः स कुमतिर्बिन्दुगो वृषलीपतिः ।
कालेन निधनं प्राप्तो जगाम नरकं खलः ॥
भुक्त्वा नरकदुःखानि बह्वहानि स मूढधीः । विन्ध्येऽभवत् पिशाचो हि गिरौ पापी भयङ्करः मृते भर्तरि तस्मिन्वै दुराचारेऽथ बिन्दुगे । उवास स्वगृहे पुत्रैश्चिरकालं विमूढधीः एवं विहरती जारैः सा नारी चञ्चलाह्वया आसीत् कामरता प्रीता किञ्चिदुत्क्रान्तयौवना एकदा दैवयोगेन सम्प्राप्ते पुण्यपर्वणि । सा नारी बन्धुभिः सार्धं गोकर्णं क्षेत्रमाययौ प्रसङ्गात् सा तदा गत्वा कस्मिंश्चित् तीर्थपाथसि सस्नौ सामान्यतो यत्र तत्र बभ्राम बन्धुभिः माहात्म्य २३ पतिसंसर्गके बिना क्या गति होती होगी? मैं अत्यन्त २३ सुन्दर हूँ तथा नवयौवनसे उन्मत्त हूँ । आपके संसर्गके बिना व्यथितचित्तवाली मैं कामजन्य दुःखको कैसे २४ सह सकती हूँ? ॥ २२–२४ ॥ सूतजी बोले – उस स्त्रीके इस प्रकार कहनेपर वह मूढ़बुद्धि मूर्ख ब्राह्मणाधम स्वधर्मविमुख दुष्ट पापी बिन्दुग कहने लगा— ॥२५ ॥
२५ बिन्दुग बोला - कामसे व्याकुलचित्त होकर तुमने यह सत्य ही कहा है । हे प्रिये! तुम भय त्याग दो और मैं जो तुमसे हितकी बात कहता हूँ, उसे २६ सुनो । तुम निर्भय होकर नित्य परपुरुषोंके साथ संसर्ग करो । उन्हें सन्तुष्ट करके उनसे धन खींचो । वह सारा २७ धन वेश्याके प्रति आसक्त मनवाले मुझको दे दिया करो । इससे तुम्हारा और मेरा दोनोंका ही स्वार्थ सिद्ध २८ हो जायगा ॥ २६-२८ ॥ सूतजी बोले- पतिका यह वचन सुनकर उसकी पत्नी चंचुलाने प्रसन्न होकर उसकी कही बात २ ९ मान ली । उन दोनों दुराचारी पति - पत्नीने इस प्रकार समझौता कर लिया तथा वे दोनों निर्भय चित्तसे ३० कुकर्ममें लीन हो गये ॥ २ ९ -३० ॥ इस तरह दुराचारमें डूबे हुए उन मूढ़ चित्तवाले ३१ पति - पत्नीका बहुत - सा समय व्यर्थ बीत गया ॥३१ ॥
तदनन्तर शूद्रजातीय वेश्याका पति बना हुआ वह दूषित बुद्धिवाला दुष्ट ब्राह्मण बिन्दुग समयानुसार ३२ मृत्युको प्राप्त हो नरकमें जा पड़ा । बहुत दिनोंतक नरकके दुःख भोगकर वह मूढबुद्धि पापी विन्ध्यपर्वतपर ॥ ३३ भयंकर पिशाच हुआ ॥ ३२-३३ ॥ इधर, उस दुराचारी पति बिन्दुगके मर जानेपर ॥ ३४ वह मूढहृदया चंचुला बहुत समयतक पुत्रोंके साथ अपने घरमें ही रही ॥ ३४ ॥
। इस प्रकार प्रेमपूर्वक कामासक्त होकर जारोंके ॥ ३५ साथ विहार करती हुई उस चंचुला नामक स्त्रीका कुछ - कुछ यौवन समयके साथ ढलने लगा ॥ ३५ ॥
एक दिन दैवयोगसे किसी पुण्य पर्वके आनेपर ॥ ३६ वह स्त्री भाई - बन्धुओंके साथ गोकर्ण - क्षेत्रमें गयी ॥ तीर्थयात्रियोंके संगसे उसने भी उस समय जाकर ॥ ३७ । किसी तीर्थके जलमें स्नान किया । फिर वह साधारणतया
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२४ श्रीशिवमहापुराण [ अ ० ३ देवालयेऽथ कस्मिंश्चिद्दैवज्ञमुखतः शुभाम् । ( मेला देखनेकी दृष्टिसे ) बन्धुजनोंके साथ यत्र - तत्र शुश्राव सत्कथां शम्भोः पुण्यां पौराणिकीं च सा ॥ ३८ घूमने लगी । [ घूमती - घामती ] किसी देवमन्दिरमें योषितां जारसक्तानां नरके यमकिङ्कराः सन्तप्तलोहपरिघं क्षिपन्ति स्मरमन्दिरे इति पौराणिकेनोक्तां श्रुत्वा वैराग्यवर्धिनीम् कथामासीद्भयोद्विग्ना चकम्पे तत्र सा च वै कथा समाप्तौ सा नारी निर्गतेषु जनेषु च भीता रहसि तं प्राह शैवं संवाचकं द्विजम् चञ्चुलोवाच ब्रह्मन् त्वं शृण्वसद्वृत्तमजानन्त्या स्वधर्मकम् । श्रुत्वा मामुद्धर स्वामिन् कृपां कृत्वातुलामपि
चरितं सूल्बणं पापं मया मूढधिया प्रभो ।
नीतं पौंश्चल्यतः सर्वं यौवनं मदनान्धया ॥
श्रुत्वेदं वचनं तेऽद्य वैराग्यरसजृम्भितम् ।
जाता महाभया साहं सकम्पात्तवियोगिका ॥
धिङ् मां मूढधियं पापां काममोहितचेतसम् ।
निन्द्यां दुर्विषयासक्तां विमुखीं हि स्वधर्मतः ॥
यदल्पस्य सुखस्यार्थे स्वकार्यस्य विनाशिनम् ।
महापापं कृतं घोरमजानन्त्यातिकष्टदम् ॥
यास्यामि दुर्गतिं कां कां घोरां हा कष्टदायिनीम् ।
को ज्ञो यास्यति मां तत्र कुमार्गरतमानसाम् ॥
मरणे यमदूतांस्तान् कथं द्रक्ष्ये भयङ्करान् ।
कथं पाशैर्बलात् कण्ठे बध्यमाना धृतिं लभे ॥
उसने एक दैवज्ञ ब्राह्मणके मुखसे भगवान् शिवकी परम पवित्र एवं मंगलकारिणी उत्तम पौराणिक कथा सुनी ॥ ३६–३८ ॥ । [ कथावाचक ब्राह्मण कह रहे थे कि ] ‘ जो ॥ ३ ९ स्त्रियाँ परपुरुषोंके साथ व्यभिचार करती हैं, वे मरनेके बाद जब यमलोकमें जाती हैं, तब यमराजके दूत । उनकी योनिमें तपे हुए लोहेका परिघ डालते हैं । ' ॥ ४० पौराणिक ब्राह्मणके मुखसे यह वैराग्य बढ़ानेवाली कथा सुनकर चंचुला भयसे व्याकुल हो वहाँ काँपने लगी ॥ ३ ९ -४० ॥ । जब कथा समाप्त हुई और लोग वहाँसे ॥ ४१ बाहर चले गये, तब वह भयभीत नारी एकान्तमें शिवपुराणकी कथा बाँचनेवाले उन ब्राह्मणसे कहने लगी ॥ ४१ ॥
चंचुलाने कहा – ब्रह्मन्! मैं अपने धर्मको नहीं जानती थी । इसलिये मेरे द्वारा बड़ा दुराचार हुआ है । ॥ ४२ स्वामिन्! इसे सुनकर मेरे ऊपर अनुपम कृपा करके आप मेरा उद्धार कीजिये ॥ ४२ ॥
हे प्रभो! मैंने मूढबुद्धिके कारण घोर पाप किया ४३ है । मैंने कामान्ध होकर अपनी सम्पूर्ण युवावस्था व्यभिचारमें बितायी है ॥४३ ॥
आज वैराग्य- रससे ओतप्रोत आपके इस ४४ प्रवचनको सुनकर मुझे बड़ा भय लग रहा है । मैं काँप उठी हूँ और मुझे इस संसारसे वैराग्य हो गया है । मुझ मूढ़ चित्तवाली पापिनीको धिक्कार है । मैं सर्वथा ४५ निन्दाके योग्य हूँ । मैं कुत्सित विषयोंमें फँसी हुई हूँ और अपने धर्मसे विमुख हो गयी हूँ ॥ ४४-४५ ॥ थोड़ेसे सुखके लिये अपने हितका नाश ४६ करनेवाले तथा भयंकर कष्ट देनेवाले घोर पाप मैंने अनजानेमें ही कर डाले ॥ ४६ ॥
हाय! न जाने किस - किस घोर कष्टदायक ४७ दुर्गतिमें मुझे पड़ना पड़ेगा और वहाँ कौन बुद्धिमान् पुरुष कुमार्गमें मन लगानेवाली मुझ पापिनीका साथ देगा? मृत्युकालमें उन भयंकर यमदूतोंको मैं कैसे ४८ | देखूँगी? जब वे बलपूर्वक मेरे गलेमें फंदे डालकर
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अ ० ४ ]
कथं सहिष्ये नरके खण्डशो देहकृन्तनम् ।
यातनां तत्र महतीं दुःखदां च विशेषतः ॥
दिवा चेष्टामिन्द्रियाणां कथं प्राप्स्यामि शोचती ।
रात्रौ कथं लभिष्येऽहं निद्रां दुःखपरिप्लुता ॥
हा हतास्मि च दग्धास्मि विदीर्णहृदयास्मि च ।
सर्वथाहं विनष्टास्मि पापिनी सर्वथाप्यहम् ॥
हा विधे मां महापापे दत्त्वा दुश्शेमुषीं हठात् ।
अपैति यत् स्वधर्माद्वै सर्वसौख्यकरादहो ॥
शूलप्रोतस्य शैलाग्रात्पततस्तुङ्गतो द्विज ।
यद्दुःखं देहिनो घोरं तस्मात् कोटिगुणं मम ॥
अश्वमेधशतं कृत्वा गङ्गां स्नात्वा शतं समाः ।
न शुद्धिर्जायते प्रायो मत्पापस्य गरीयसः ॥
किं करोमि क्व गच्छामि कं वा शरणमाश्रये ।
कस्त्रायते मां लोकेऽस्मिन् पतन्तीं नरकार्णवे ॥
त्वमेव मे गुरुर्ब्रह्मंस्त्वं माता त्वं पितासि च ।
उद्धरोद्धर मां दीनां त्वामेव शरणं गताम् ॥
सूत उवाच इति सञ्जातनिर्वेदां पतितां चरणद्वये । उत्थाप्य कृपया धीमान् बभाषे ब्राह्मणः स हि माहात्म्य २५ मुझे बाँधेंगे, तब मैं कैसे धीरज धारण कर सकूँगी? ४ ९ नरकमें जब मेरे शरीरके टुकड़े - टुकड़े किये जायँगे, उस समय विशेष दुःख देनेवाली उस महायातनाको मैं वहाँ कैसे सहूँगी?॥ ४७–४९ ॥ दुःख और शोकसे ग्रस्त होकर मैं दिनमें सहज ५० इन्द्रियव्यापार और रात्रिमें नींद कैसे प्राप्त कर सकूँगी? हाय! मैं मारी गयी! मैं जल गयी! मेरा हृदय विदीर्ण हो गया और मैं सब प्रकारसे नष्ट हो गयी; क्योंकि मैं हर ५१ तरहसे पापमें ही डूबी रही हूँ ॥ ५०-५१ ॥ हाय विधाता! मुझ पापिनीको आपने हठात् ५२ ऐसी दुर्बुद्धि क्यों दे दी, जो सभी प्रकारका सुख देनेवाले स्वधर्मसे दूर कर देती है! हे द्विज! शूलसे बिँधा हुआ व्यक्ति ऊँचे पर्वत - शिखरसे गिरनेपर जैसा ५३ घोर कष्ट पाता है, उससे भी करोड़ गुना कष्ट मुझे है । सैकड़ों अश्वमेधयज्ञ करके अथवा सैकड़ों वर्षोंतक ५४ गंगास्नान करनेपर भी मेरे घोर पापोंकी शुद्धि सम्भव नहीं दीखती । मैं क्या करूँ, कहाँ जाऊँ और किसका आश्रय लूँ? मुझ नरकगामिनीकी इस संसारमें कौन ५५ रक्षा करेगा? ॥ ५२-५५ ॥ हे ब्रह्मन्! आप ही मेरे गुरु हैं, आप ही माता और ५६ आप ही पिता हैं । आपकी शरणमें आयी हुई मुझ दीन अबलाका उद्धार कीजिये, उद्धार कीजिये ॥ ५६ ॥
सूतजी बोले- हे शौनक! इस प्रकार खेद और वैराग्यसे युक्त हुई चंचुला उस ब्राह्मणके चरणोंमें गिर पड़ी । तब उन बुद्धिमान् ब्राह्मणने कृपापूर्वक उसे ॥ ५७ उठाकर इस प्रकार कहा ॥५७ ॥
इति श्रीस्कान्दे महापुराणे शिवपुराणमाहात्म्ये चञ्चलावैराग्यवर्णनं नाम तृतीयोऽध्यायः ॥ ३ ॥
॥ इस प्रकार श्रीस्कन्दमहापुराणके अन्तर्गत शिवपुराणमाहात्म्यमें चंचुलावैराग्यवर्णन नामक तीसरा अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ३ ॥
अथ चतुर्थोऽध्यायः चंचुलाकी प्रार्थनासे ब्राह्मणका उसे पूरा शिवपुराण सुनाना और समयानुसार शरीर छोड़कर शिवलोकमें जा चंचुलाका पार्वतीजीकी सखी होना ब्राह्मण उवाच ब्राह्मण बोले – सौभाग्यकी बात है कि भगवान् दिष्ट्या काले प्रबुद्धासि शिवानुग्रहतो वराम् । शंकरकी कृपासे शिवपुराणकी इस वैराग्ययुक्त तथा इमां शिवपुराणस्य श्रुत्वा वैराग्यवत्कथाम् ॥ १ श्रेष्ठ कथाको सुनकर तुम्हें समयपर चेत हो गया है । मा भैषीर्द्विजपत्नि त्वं शिवस्य शरणं व्रज । हे ब्राह्मणपत्नी! तुम डरो मत, भगवान् शिवकी शरणमें
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२६ शिवानुग्रहतः सर्वं पापं सद्यो विनश्यति वक्ष्यामि ते परं वस्तु शिवकीर्तिसमन्वितम् भविष्यति गतिर्येन सर्वदा ते सुखावहा सत्कथाश्रवणादेव जाता ते मतिरीदृशी पश्चात्तापान्विता शुद्धा वैराग्यं विषयेषु च
पश्चात्तापः पापकृतां पापानां निष्कृतिः परा ।
सर्वेषां वर्णितं सद्भिः सर्वपापविशोधनम् ॥
पश्चात्तापेनैव शुद्धिः प्रायश्चित्तं करोति सः ।
यथोपदिष्टं सद्भिर्हि सर्वपापविशोधनम् ॥
प्रायश्चित्तमधीकृत्य विधिवन्निर्भयः पुमान् ।
न याति सुगतिं प्रायः पश्चात्तापी न संशयः ॥
एतच्छिवपुराणस्य कथाश्रवणतो यथा ।
जायते चित्तशुद्धिर्हि न तथान्यैरुपायतः ॥
शोध्यमानं दर्पणं हि यथा भवति निर्मलम् ।
तथैतत्कथया चेतो विशुद्धिं यात्यसंशयम् ॥
विशुद्धे चेतसि शिवो नृणां तिष्ठति साम्बिकः ।
ततो याति विशुद्धात्मा साम्बशम्भोः परं पदम् ॥
अतः सर्वस्य वर्गस्यैतत्कथासाधनं मतम् ।
एतदर्थं महादेवो निर्ममे त्वाग्रहादिमाम् ॥
श्रीशिवमहापुराण [ अ ० ४ ॥ २ । जाओ । शिवकी कृपासे सारा पाप तत्काल नष्ट हो । जाता है । मैं तुमसे भगवान् शिवकी कीर्तिकथासे युक्त ॥ ३ उस परम वस्तुका वर्णन करूँगा, जिससे तुम्हें सदा सुख देनेवाली उत्तम गति प्राप्त होगी ॥ १- -३ ॥ । शिवकी उत्तम कथा सुननेसे ही तुम्हारी बुद्धि इस ॥ ४ तरह पश्चात्तापसे युक्त एवं शुद्ध हो गयी है; साथ ही तुम्हारे मनमें विषयोंके प्रति वैराग्य हो गया है । पश्चात्ताप ही पाप करनेवाले पापियोंके लिये सबसे बड़ा प्रायश्चित्त ५ है । सत्पुरुषोंने सबके लिये पश्चात्तापको ही समस्त पापोंका शोधक बताया है । पश्चात्तापसे ही पापोंकी शुद्धि होती है । जो पश्चात्ताप करता है, वही वास्तवमें ६ पापोंका प्रायश्चित्त करता है; क्योंकि सत्पुरुषोंने समस्त पापोंकी शुद्धिके लिये जैसे प्रायश्चित्तका उपदेश किया है, वह सब पश्चात्तापसे सम्पन्न हो जाता है ॥ ४–६ ॥ जो पुरुष विधिपूर्वक प्रायश्चित्त करके निर्भय ७ हो जाता है, पर अपने कुकर्मके लिये पश्चात्ताप नहीं करता, उसे प्रायः उत्तम गति नहीं प्राप्त होती । परंतु जिसे अपने कुकृत्यपर हार्दिक पश्चात्ताप होता है, वह ८ अवश्य उत्तम गतिका भागी होता है, इसमें संशय नहीं है । इस शिवपुराणकी कथा सुननेसे जैसी चित्तशुद्धि होती है, वैसी दूसरे उपायोंसे नहीं होती ॥ ७-८ ॥ जैसे दर्पण साफ करनेपर निर्मल हो जाता है, ९ उसी प्रकार इस शिवपुराणकी कथासे चित्त अत्यन्त शुद्ध हो जाता है – इसमें संशय नहीं है । मनुष्योंके शुद्ध १० चित्तमें जगदम्बा पार्वतीसहित भगवान् शिव विराजमान रहते हैं । इससे वह विशुद्धात्मा पुरुष श्रीसाम्बसदाशिवके परम पदको प्राप्त होता है ॥ ९ -१० ॥ इस प्रकार यह कथारूपी साधन सभी प्राणियोंके ११ लिये उपकारी है और इसी कारण महादेवजीने इसको कथया सिध्यति ध्यानमनया गिरिजापतेः 32 आग्रहपूर्वक प्रकट किया है । इस कथासे भगवान् । उमापतिका ध्यान सिद्ध हो जाता है । उस ध्यानसे परम ज्ञान ध्यानाज्ज्ञानं परं तस्मात् कैवल्यं भवति ध्रुवम् ॥ १२ और उससे मोक्षकी प्राप्ति निश्चय ही होती है । भगवान् असिद्धशङ्करध्यानः कथामेव शृणोति यः । शंकरके ध्यानमें मग्न हुए बिना भी यदि कोई इस कथाको स प्राप्यान्यभवे ध्यानं शम्भोर्याति परां गतिम् ॥ १३ मात्र सुनता है, वह दूसरे जन्ममें भगवान्के ध्यानको सिद्धकर परमपदको पा लेता है । इस कथाके श्रवणसे एतत्कथाश्रवणतः कृत्वा ध्यानमुमापतेः । भगवान् शंकरके ध्यानको प्राप्तकर पश्चात्ताप करनेवाले ते पश्चात्तापिनः पापा बहवः सिद्धिमागताः ॥ १४ | पापी पुरुष सिद्धिको प्राप्त हो गये हैं ॥ ११–१४ ॥